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फाइनली दो हज़ार बीस जा रहा है

दो हज़ार बीस अर्थात २०२० ख़त्म होने जा रहा है । पर इस एक साल में जीवन में इतने उतार चढ़ाव देखे । जितने शायद आजतक कभी नहीं देखे । जहाँ पहले २०२० के आने का बेसब्री से इंतज़ार था वहीं अब ये साल जल्दी ख़त्म हो इसका भी इंतज़ार है । जहाँ साल के शुरूआती समय में सब कुछ इतना अच्छा लग रहा था वहीं साल ख़त्म होते होते दिल और दिमाग़ दोनों ही दुखी हो गए । मार्च में कोरोना का आना और लॉकडाउन होना , हम सबका अपने अपने घरों में बंद हो जाना । जिंदगी का ठहर सा जाना । और फिर उस ठहरी हुई जिंदगी में रोज नये नये जतन करके ख़ुश रहना । पर फिर अक्टूबर में अचानक परिवार के दो सदस्यों को पंद्रह दिन में खो देना । जिसके बाद बस यही लगता रहा कि कब ये २०२० ख़त्म हो । और आज आख़िर कार दो हज़ार बीस ख़त्म हो रहा है । अब तो बस यही आशा और उम्मीद करते है कि आने वाला नया साल २०२१ हम सबके जीवन में सुख-शान्ति लाये ।

सतवां महीना लग गया

कल यानि पच्चीस तारीख़ से सतवां महीना शुरू हो गया है । किसका ? अरे कोरोना का और किसका । ☹️ देखते देखते और काम करते करते इतने महीने हो गये पर कोरोना रूकने का , जाने का नाम ही नहीं ले रहा है । सबकी नाक में दम कर रखा है । और जाना तो दूर उलटा दिन दूनी रात चौगुनी रफ़्तार से बढ़ता ही जा रहा है । 😡 ना घूमने की आज़ादी ना ही कहीं आने जाने की ।😒 वैसे छठां महीना अच्छा गुज़रा क्योंकि बर्तन और पोछे से निजात जो मिल गई थी , अरे मतलब पार्वती के आने से कम से कम इन दो कामों से तो छुटकारा मिल ही गया है । और बाक़ी काम तो हो ही जाते है । तो चलिये सातवें महीने को भी विभिन्न प्रकार के भोजन और मिठाई बनाकर बिताया जाये । क्योंकि कोरोना काल में सिर्फ़ एक यही काम है जो निरन्तर चल रहा है बिना किसी रुकावट के । और मनोरंजन का भी ये एक अच्छा साधन रहा है क्योंकि अगर चीज़ अच्छी बन जाये तो बढ़िया और ना बने तो एक और ट्रायल करो । 😜 वैसे भी कोरोना वो बला है जो गोद भराई के बाद चली जाये तो ग़नीमत समझो ।

मुआ कोरोना स्कूल रीयूनियन भी खा गया 😡

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इस साल सितम्बर बहुत ही सूना सूना और खाली खाली सा बीत रहा है । 😧 पिछले तीन सालों से हर साल सितम्बर में हम लोग स्कूल रीयूनियन करते थे । यानि स्कूल फ़्रेंड्स सितम्बर के महीने में चार पाँच दिन के लिये मिलते थे । २०१७ में जब चालीस साल बाद पहली बार हम लोगों ने इलाहाबाद में स्कूल रीयूनियन किया तो हम सभी में वही चपलता और शरारत थी जो स्कूल के ज़माने में स्कूल में थी । बल्कि थोड़ी ज़्यादा ही थी । 😜 पहली बार तो महीनों की तैयारी के बाद इलाहाबाद में पहला रीयूनियन किया गया था । और वहीं ये तय हुआ कि हर साल हम लोग कम से कम चार पाँच दिन सिर्फ़ अपनी स्कूल फ़्रेंड्स के साथ ही बितायेंगें । बिलकुल दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे स्टाइल में -- जा सिमरन जी ले अपनी जिंदगी । 😛 वो चार दिन हम सब घर गृहस्थी की चिन्ताओं को छोड़कर फ़ुल ऑन मस्ती मजा करते थे । और उसी का नतीजा था कि २०१८ में हम लोग दिल्ली में मिले और २०१९ में नैनीताल में हम लोगों ने स्कूल रीयूनियन किया । हर रीयूनियन में अगला रीयूनियन कहाँ होगा ये भी तय हो जाता था । और अगला रीयूनियन आने के महीनों पहले से ही तक जब तब ग्रुप पर चर्चा भी होत

बड़े काम की चीज़

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अब इस कोरोना काल के दौरान बहुत कुछ नया ट्राई किया और बहुत कुछ नई नई खाने की चीज़ें भी बनाई है । और उन्हीं ट्राई की हुई नई चीज़ है ये बेकर्स विप का विपिंग क्रीम पाउडर जिससे व्हिपड क्रीम बनाना और आइसिंग करना दोनों बहुत आसान हो गये है । 😝 अब यूँ तो हम केक हमेशा से बनाते रहें है पर कभी आइसिंग नहीं करते थे । क्यूँ ? बता रहें हैं । दरअसल इसके दो तीन कारण है । एक तो पहले कभी ज़रूरत नहीं महसूस हुई । क्योंकि ख़ास मौक़ों के लिये तो बाज़ार से ही केक आता था । और दूसरे हमें आइसिंग करना बड़ा झंझटी लगता था । पहले व्हिपड क्रीम मंगाओ । कभी मिले कभी ना मिले । तो उससे अच्छा है प्लेन केक खा लो । पर अब नहीं । क्योंकि अब हमें आइसिंग करना आसान लगने लगा है । हांलाकि अभी आइसिंग करने में हम पूरी तरह पक्के नहीं हुए है । 😁 असल में कुछ समय पहले हमारी दीदी ने हमें इस के बारे में बताया था तो हमने अमेजॉन से इसे मँगाया । असल में हमने केक के लिये बल्कि क्रीम रोल बनाने के लिये मँगाया था । 😃 चूँकि ये पाउडर है तो इससे क्रीम बनाने में मुश्किल से कुछ दो चार मिनट लगते है और बस आइसिंग के लिये क्रीम तैयार

लो भइया अब यूज़र चार्ज भी दो 😳

आज सुबह सुबह ये ख़बर पढ़ने को मिली कि अब से ट्रेन में यात्रा करने वालों को यूज़र चार्ज भी देना पड़ेगा । अब सिर्फ़ टिकट लेकर ही नहीं बल्कि ट्रेन और स्टेशन को यात्रा के लिये इस्तेमाल करने के लिये यूज़र चार्ज देना पड़ेगा । हद हो गई । वैसे यूज़र चार्ज लगाने के लिये कहा जा रहा है कि अगर अच्छी सुविधायें यात्रियों को देना है तो चूँकि ख़र्चा बढ़ेगा तो इसलिये चार्ज लगाना पड़ेगा । मतलब हर तरह से जनता को ही लूटना है । लगा लो यूज़र चार्ज हम लोग कर ही क्या सकते है सिवाय पैसा देने के । अब जो ना होय सो थोड़ा वाली बात हो गई ।

आरामे बंदिश 😝

इस महीने जब से हमने अपनी हैल्पर को बुलाना शुरू किया तो हमें आरामे बंदिश टाइप वाली फीलिंग आती रहती है । अरे मतलब उसके आने से जहाँ हमें बर्तन धोने से छुट्टी होने से आराम है तो वहीं उसके रहते हम पर बंदिश भी रहती है । किचन में मत जाओ ड्राइंग रूम या डाइनिंग रूम में जाने से परहेज़ करो । अब वो क्या है ना जब सुबह वो आती है तो जितनी देर वो काम करती है उतनी देर हम अपने कमरे में ही रहते है आराम फ़रमाते टाइप से । क्या करें छ फ़ीट की दूरी जो बनानी है लिहाज़ा जितनी देर वो किचन में बर्तन वग़ैरा धोती रहती है तो हम अंदर ही रहते है । और कभी कभी तो लगता है कि उफ़ क्या मुश्किल है कि उसके रहते हम किचन में चाय तक बनाने नहीं जा सकते है । मतलब अगर उसके काम करते चाय पीने का मन हो तो भी नहीं बना सकते है । उसके जाने का इंतज़ार करना पड़ता है । एक बंधन या यूँ कहें अपने ऊपर एक तरह की बंदिश लगी सी महसूस होती है । सुबह और शाम दोनों समय की चाय उसके आने के पहले ही बनाकर कमरे में आ जाते है और जब वो चली जाती है तब ही कमरे से बाहर निकलते है । और उसके रहते जितनी बार कमरे से निकलो तो मास्क से लैस होकर निकलो

चौदह सितम्बर यानि हिन्दी दिवस

हर साल सितम्बर महीने की चौदह तारीख़ को हिन्दी दिवस मनाया जाता है । तो हिन्दी दिवस की शुभकामनायें । यूँ तो हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है पर फिर भी हिन्दी बोलने में बहुत बार लोग झिझकते है । पर क्यों ? शायद कभी ज़रूरत तो कभी सिर्फ़ दिखावे के लिये । वैसे जब हमने २००७ में ब्लॉगिंग शुरू की थी उस ज़माने में बमुश्किल हिन्दी के दो चार सौ ब्लॉगर थे पर आज के समय में हिन्दी ब्लॉगर भी हज़ारों की संख्या में है । जिसे देखकर अच्छा लगता है । हिन्दी में जो एक सबसे अच्छी बात है कि अब इसमें अंग्रेज़ी के बहुत सारे शब्द भी हिन्दी रूपी हो गये है । मतलब अब उनका आम बोलचाल की भाषा में इतना प्रयोग होता है कि वो अंग्रेज़ी के नहीं बल्कि हिन्दी के ही शब्द लगते है । हिन्दी ने उन शब्दों को आत्मसात कर लिया है । वैसे हिन्दी भले चाहे लोग बोलें या ना बोलें पर हिन्दी गाने और हिन्दी फ़िल्में जरूर देखते है । 🤓

स्मार्ट लाइट का ज़माना आया 😜

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स्मार्ट फोन, स्मार्ट टी वी और अब स्मार्ट लाइट । और ये स्मार्ट लाइट फ़िलिप्स ने बनाई है । और ये थोड़ी महँगी भी है । पर ठीक है ना । स्मार्ट लाइट मतलब वाई फ़ाई से कनेक्शन । और हर बार या हर समय लाइट को ऑन या ऑफ़ करने के लिये उठकर स्विच बोर्ड तक जाने की ज़रूरत नहीं है । वैसे काफ़ी समय से इसके बारे में सुनते थे कि अब ऐसी लाइट आती है जिन्हें ऐलैकसा या गूगल को कमांड देकर ऑन और ऑफ़ करा जा सकता है । 😛 पर चूँकि ये हमारे घर में अभी आई है तो हमारे लिये तो ये नई ही है ना । वैसे इसे ख़रीदने का कई बार प्लान भी बना था । पर ख़रीदी अब गई । और अभी तो सिर्फ़ एक ही बल्ब लगाया है । और ऐलैकसा को कमांड देकर लाइट को जलाया ,बुझाया और लाइट के कलर को भी बदला । 😊 और इसमें लाइट के जलने को भी शेडयूल कर सकते है मतलब टाइमर है , उसे धीमी या मध्यम करने की भी सैटिंग है । और इसे ना सिर्फ़ हम बल्कि घर के बाक़ी लोग भी कमांड दे सकते है । और ना केवल घर से बल्कि घर के बाहर रहते हुये भी । और हाँ इसमें डिस्को लाइट भी है । 💃 और हमें ऐसा करने में मतलब ऐलैकसा को कमांड देने में बडा मजा आया था । अब आप कहेंगें

न्यूज़ है या सीरियल

आजकल तो न्यूज़ देखना मतलब अपना दिमाग़ ख़राब करना होता जा रहा है ।  बस कोई एक न्यूज़ मिल जाये इन न्यूज़ चैनलों को और बस फिर क्या सारे दिन बस एक ही बात को कई कई तरह से दिखाते रहते है । शुरू में लगता था कि टी वी की न्यूज़ अखबार वाली न्यूज़ से बेहतर है पर ऐसा पहले तो था पर अब न्यूज़ चैनलों की टीआरपी की दौड़ में अव्वल आने के चक्कर में ये लोग कुछ भी और किसी भी हद तक जा सकते है । धीरे धीरे अब एक बार फिर लगने लगा है कि अखबार और रेडियो न्यूज़ वाला ज़माना ही ठीक था जिसमें रोज कुछ नई ख़बर पढ़ी जाती थी ना कि पूरे दिन क्या पूरे हफ़्ते तक बस एक ही ख़बर देखते और सुनते रहो । ऐसा नहीं है कि पहले सनसनीख़ेज़ ख़बरें नहीं होती थी पर उन ख़बरों से पूरे समय रूबरू नहीं होते रहते थे । ख़बर ख़बर की तरह होती थी । पर आजकल तो टी वी चैनल वाले पूरी तरह से जेम्स बांड बनते जा रहें है । जो सुराग़ कोई ना ढूँढ पाये वो ये लोग खोज निकालते है । हर चैनल अपनी पीठ ठोंकता रहता है ब्रेकिंग न्यूज़ के बहाने और सबसे पहले ख़बर दिखाने का दावा करने के बहाने । हमें तो अब न्यूज़ न्यूज़ कम सीरियल की तरह ज़्यादा लगता है ।

गुरु घंटाल corona

सबसे पहले तो सभी को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं  और हमारे सभी शिक्षकों को सादर नमन🙏🙏 शिक्षक मतलब जो आपको शिक्षा दे । और ऐसी शिक्षा की शुरुआत सबसे पहले तो घर से ही होती है। जहां मां पापा बाबा दादी भईया दीदी जो समय समय पर कोई ना कोई शिक्षा देते रहते है जो हमारे जीवन के लिए बहुत अहम होती है । स्कूल और यूनिवर्सिटी जहां शिक्षक हमारी सोच और मानसिकता दोनों को सही दिशा देते है ।  दोस्त जो हमारे मन के अन्दर के बच्चे को हमेशा जिन्दा रखने की शिक्षा देते है । और जीवन जो हमें हर पल एक नया अध्याय पढ़ाता है और हमें उस हर अध्याय को अच्छे से समझ बूझ कर उसकी परीक्षा में पास होते रहना होता है । हां कभी कभी फेल भी होते है। और इस बार तो जीवन ने जितना विकट , कठिन और बड़ा अध्याय दिया है उतना ही जटिल गुरु भी  दिया है ।    Corona  -- जो अध्याय भी है और गुरु भी है जिसे पढ़ते पढ़ाते छ: महीने होने को आ रहे है । पर अभी तक ये ज्यादा कुछ समझ नहीं आया है कि कैसे इसको पढ़ें  । पर फिर भी हम सभी अपनी पूरी कोशिश कर रहे है जीवन के इस पाठ्यक्रम को अपनी अपनी तरह से पढ़ने की ।   यूं तो इसे पढ़ते पढ़ाते हुए छः महीने ह

हमने तो बुला लिया 😛

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हाँ हाँ सही पढ़ रहें है । अब वो क्या है ना कि छठां महीना चल रहा है 😜 और अब सारा काम करना थोडा भारी लगने लगा है । और पिछले यानि पाँचवें महीने में हमने ऊह आह आउच के बारे में लिखा भी था । तो हमने सोचा कि ये ऊह आह आउच कहीं ज़्यादा ना बढ जाये । इसलिये हमने पार्वती यानि कि हमारी हैल्पर (कामवाली ) को आज से वापिस काम पर बुला लिया है । वैसे अभी सिर्फ़ बर्तन ही धुलता रहें है । बाक़ी और कोई काम जैसे डस्टिंग और झाड़ू और खाना वग़ैरा नहीं बनवा रहें है । वैसे उसकी और अपनी दोनों की सुरक्षा का खयाल रखा है । क्योंकि ख़तरा तो दोनों के लिये ही है । और उसके आने के पहले सारे इंतज़ाम भी कर लिये मसलन हैंड सैनिटाइजर और मास्क ख़ास उसी के लिये मँगवाया है और दरवाज़े के पास ही रख दिया है । ताकि जैसे ही वो आये तो पहले हाथ सैनिटाइज कर ले और नया मास्क पहन ले और तब ही किचन में जाये । और काम करके वापिस जाते समय मास्क को नीचे डस्टबीन में डालकर जाये । अभी तो आज पहला दिन था उसका काम का । हो सकता है इतने महीनों बाद काम करने से उसे कुछ परेशानी हो पर हमें जो इतने महीनों से काम

पेड़ पौधों पर भी असर हुआ

जब से लॉकडाउन शुरू हुआ तब थोड़े समय बाद ही प्रकृति में बहुत सारे बदलाव दिखने लगे थे । जैसे नदियाँ और वातावरण स्वच्छ हो गया था । प्रदूषण एकदम ख़त्म हो गया था ।आसमान का नीला रंग साफ़ और सुंदर दिखने लगा था । और इन सबका असर पेड़ पौधों पर ना पड़े । ऐसा कैसे हो सकता है । अभी दो तीन दिन पहले यूँ ही बालकनी से बाहर देखते हुये जब इतने हरे भरे पेड़ देखे तो रहा नहीं गया और हमने फोटो खींच ली । इतने स्वस्थ और साफ़ और हरे पेड़ और बिलकुल चमकती हुई पत्तियाँ देखकर मन ख़ुश हो गया । वरना मार्च में कुछ तो पतझड़ के कारण और ज़्यादा प्रदूषण के कारण पेड़ पौधे बिलकुल बेजान से लगते थे । वैसे इसमें बारिश , कोरोना और लॉकडाउन का भी असर है वरना तो दिन भर चलने वाली गाड़ियों के प्रदूषण के कारण भी पेड़ पौधों पर ख़ासा बुरा असर पड़ता है । अब यूँ तो लोग और गाड़ियाँ वग़ैरा चलने लगी है पर फिर भी अभी सब कुछ बिलकुल पहले जैसा नहीं हुआ है । मतलब कि अभी भी लोग कम ही निकलते है । अभी तो फिलहाल सब कुछ हरा भरा है पर जब सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा तब देखना पड़ेगा कि ये हरियाली कितनी रहती है । यहाँ हम एक २२ मार्च की और

जब हमारे राइस कुकर की क़िस्मत जागी 😜

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हम सही कह रहें है । पता नहीं कितने सालों से हमारा राइस कुकर डिब्बे में पूरी तरह से पैक होकर रखा हुआ था । ज़्यादा नहीं बस सात सालों से । 😆 जब तब सफाई करते हुये इसे भी साफ़ करके दोबारा वहीं अलमारी पर रख देते थे । अब इस्तेमाल क्यों नहीं किया तो वो इसलिये कि हमें लगता था कि राइस कुकर में कुछ भी बनाना बडा झंझटी है । लिहाज़ा बेचारा डिब्बे में बस बंद ही पड़ा रहा । पर वो कहते है ना देर है अंधेर नहीं । 😆 और ये कहावत हमारे राइस कुकर के लिये बिलकुल फ़िट बैठती है । और इस कोरोना काल में राइस कुकर की भी क़िस्मत जाग गई । 😜 ऐसे ही एक दिन विचार आया कि क्यूँ ना राइस कुकर में बिरयानी ट्राई करी जाये । और बस फिर क्या था फटाफट राइस कुकर को अलमारी से उतारा गया और धो धाकर बिरयानी बनाने की तैयारी शुरू की गई । वैसे राइस कुकर में कम घी में भी बिरयानी बन जाती है । ये भी हमने पहली बार जाना । कम घी इसलिये कहा क्योंकि हम सभी जानते है कि बिरयानी बनाने में बहुत घी डालना पड़ता है । वरना वो सरकउंया बिरयानी ( मतलब खाते जाओ ) नहीं बनती है ।😛 पर खैर पहली बार कम घी और कम मेहनत मे लज़ीज़ बिरयानी तैयार

एकदम मस्त वर्चुअल किटी और वर्चुअल तंबोला

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अपनी पिछली पोस्ट में हमने कहा था ना कि हम वर्चुअल किटी में जा रहे है । तो सोचा किटी में किये मजे आप लोगों को भी बता दें । 😜 और चूँकि इस बार समय दोपहर का था तो सारे काम आराम से निपटाकर हम लोग किटी के लिये ज़ूम के माध्यम से जुड़े । हांलांकि इस बार सारे लोग नहीं आ पाये क्योंकि किसी किसी को कुछ काम वग़ैरा आ गया था । पर फिर भी जितने लोग थे उन सबने भरपूर मजे किये । खैर सभी लोग तय समय पर ज़ूम पर लॉगइन करने लगे और बस दो मिनट की देर हुई कि हम लोग होस्ट को वहाटसऐप करके ज़ूम रूम में अन्दर आने की परमीशन माँगने लगे । कहने का मतलब कि एक मिनट की भी देरी हम लोगों को मंज़ूर नही थी क्योंकि इस कोरोना के कारण ज़ूम ही हम लोगों का एक साथ होने और जुड़ने का इकलौता माध्यम जो है । 😝 शुरूआती हो हल्ला करने के बाद और एक दूसरे का हाल चाल जानने के बाद तंबोला खेलना शुरू हुआ । और तंबोला में अपने टिकट का नम्बर ना आने पर खिलाने वाले को तंग करते हुये कहना कि अच्छे नम्बर बोलो । 🤓 कमलेश जो वैसे भी जब हम लोग किटी में ( कोरोना काल के पहले ) तंबोला या गेम खेलते थे तो बहुत ही सीरियसली खेलती थी और खूब जीतती भी

राम राम करते पाँच महीना हो गया

अब तो हर महीने की पच्चीस तारीख़ का इंतज़ार रहता है क्योंकि इसी से कोरोना के कारण हुये लॉकडाउन और अनलॉक के महीने पूरा होने का पता चलता है । अब यूँ तो काफ़ी बाज़ार और होटल वग़ैरा खुल गये है पर अभी ज़्यादा बाहर जाने की हिम्मत नहीं होती है । और फिलहाल ऐसी कोई ज़रूरत भी नहीं लग रही है । अब वो क्या है ना कि घर में रहते रहते कुछ ऐसी ही आदत सी हो गई है कि बाहर जाने की इच्छा ही ख़त्म सी होती जा रही है । अभी तो ऐसा ही लगता है । 😳 अब तो ऑनलाइन शॉपिंग की भी ऐसी लत सी लग गई है कि अगर हफ़्ते दस दिन में अमेजॉन से कुछ ऑर्डर ना करो तो बडा ख़ाली ख़ाली और अजीब सा लगता है । ठीक वैसे ही जैसे कोरोना के पहले अगर चार छे दिन में कहीं मार्केट या मॉल ना घूमने जाने पर महसूस होता था । 😜 खैर आज तो हम लोगों की वर्चुअल किटी है तो आज ज़्यादा कुछ नहीं । वर्चुअल किटी है तो क्या हुआ , किटी में जाने की तैयारी भी तो करनी है । 😂

आलस क्या होता है भूल ही गये थे 😁

पर कल हमने फिर से जाना कि आलस क्या होता है । 😃 कल बड़े समय बाद तकरीबन पाँच महीने बाद हमने संडे को बिलकुल संडे की तरह बिताया । मतलब फ़ुल ऑन आलस से भरपूर । अरे जैसा आप सोच रहें है वैसा बिलकुल नहीं है । हमारी काम वाली वापिस नहीं आई है । 😏 इधर जब से कोरोना फैला है तब से तो हर रोज एक ही जैसा । क्या संडे क्या मंडे । हर रोज एक ही रूटीन सुबह उठो ,एक्सरसाइज़ करो फिर किचन का काम धाम करो ,डस्टिंग करो ,छोटू से ( वैक्यूम क्लीनर ) से झाडू लगवाओ, लंच डिनर बनाओ वग़ैरा वग़ैरा । पर कल हमने सब कामों से ब्रेक ले लिया था । यानि संडे को हम सुबह तो जरूर उठे पर एक्सरसाइज़ नहीं करी क्योंकि कभी कभी तो उसमें भी ब्रेक लेना चाहिये । 😜 और जब एक्सरसाइज़ नहीं की तो थोडा आलस सा चढ़ा रहा पूरा दिन और बस फिर क्या पूरा दिन बस यूँ ही बिता दिया इधर उधर डोलते हुये । कुछ ज़्यादा काम धाम नहीं किया । और तो और पूरा दिन फेसबुक और वहाटसऐप तक नहीं देखा । हाँ बस एक बार सुबह देखा था पर फिर फोन भी देखने का मन नहीं हुआ । 😛 और खाने में भी शॉर्ट कट मार दिया । लंच में पिज़्ज़ा बना दिया जो पन्द्रह मिनट में बन जाता है

तीज सूतफेनी और गुझिया

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आज भादों में पड़ने वाली हरतालिका तीज है । तो सभी को तीज की हार्दिक शुभकामनाएं । ये तो सभी जानते है कि हरतालिका तीज पति की लंबी आयु के लिए होता है । और आज के दिन सुहागिनें निर्जला व्रत रखती है। और इलाहाबाद में तो तीज के दिन खास सफेद एकदम महीन सूतफेनी मिलती है (और जो इलाहाबाद के अलावा कहीं नहीं मिलती है )जिसे दूध और चीनी में डालकर खाने का जो स्वाद होता है । आहा कि क्या बताएं। और बहुत सालों तक सूतफेनी की सप्लाई हमें होती रही थी ।😊 यूं तो बचपन से मम्मी को तीज का निर्जला व्रत करते हुए देखते आए है । और हमारी ससुराल में भी ये व्रत होता है ।   इसलिए हमने भी कुछ सालों तक तीज का निर्जला व्रत रक्खा । पर फिर किन्हीं कारणों से हमसे ये व्रत रखना छूट गया ।😔 तीज की सुबह चार बजे उठना नहा धोकर  दूध और सूतफेनी और फलाहार खा कर व्रत की शुरुआत करना । और हम और हमारी दीदी भी मम्मी के साथ सुबह सूतफेनी खाने की लालच में उठते और इसलिए सुबह सुबह नहाते भी थे और फिर चौबीस घंटे बिना कुछ खाए पिए रहना । और फिर अगली सुबह चार बजे भोर में उठकर दूध सूतफेनी खा कर व्रत तोड़ना । पर व्रत और त्योहार का मतलब ये कतई नहीं होता ह

बारिश और ननबरिया 😛

आज सुबह से बारिश हो रही थी तो हमने सोचा कि आज पकौडी ना बनाकर ननबरिया बनाई जाये । और यक़ीन मानिये खाकर मजा़ आ गया । 😝 अब जैसे बारिश और पकौड़ी का सम्बन्ध है ठीक उसी तरह बारिश और ननबरिया या नोनबरिया का भी सम्बन्ध है । आम तौर पर ज़्यादातर लोग जब बारिश होती है तो बेसन और प्याज़ की पकौड़ी बनाते और खाते है । हम लोग भी जब तब पकौडी बनाते और खाते है पर बरसात में ननबरिया खाने का भी अपना ही मजा है । हम लोगों के घर में बारिश मे ननबरिया बनने ,बनाने और खाने का भी चलन है । एक ज़माने में इलाहाबाद में जहाँ बारिश शुरू होती थी और अगर हम सब लोग घर में होते थे तो सबकी फ़रमाइश ननबरिया खाने की होती थी और आवाज़ लगाई जाती ब्रजवासी, सोम ( घर के सेवक ) ननबरिया बनाओ और बस ननबरिया छनना शुरू हो जाती थी । 😋 वैसे हम भी बारिश में ननबरिया जरूर बनाते और खाते है । असल में ननबरिया और पकौडी में बस फ़र्क़ ये है कि ननबरिया आटे में बनती है और पकौडी बेसन में । और दूसरा कि इसमें आलू ज़्यादा पड़ता है । पर स्वाद दोनों का ही ग़ज़ब होता है । 😋😋

गुंजन सक्सेना द कारगिल गर्ल

कल हमने ये फ़िल्म देखी । अब ये मत कहियेगा कि क्यूँ देखी । वैसे जब से फ़िल्म  netflix   पर रिलीज़ हुई है तब से ही विवादों में घिरी हुई है । कुछ तो वायुसेना के अफ़सरों को ग़लत तरीक़े से दिखाये जाने की वजह से तो कुछ किन्हीं और कारणों से । जहाँ तक हम सोचते है कि जब किसी भी बायोपिक में उस इंसान से जुड़े पहलू दिखाये जाते है तो ज़ाहिर सी बात कि ज़्यादातर बातें या घटनायें तो उस इंसान ने ही बताई होंगीं । हाँ थोडा बहुत फ़िक्शनल भी होता है पर ज़्यादातर सही ही दिखाया जाता है । अब इस फ़िल्म में जिस तरह से वायुसेना के अफ़सर दिखाये गये है वो अगर पूरे ना सही तो कुछ ना कुछ तो सही ही दिखाये होगें । और वैसे भी जिस ज़माने की ये कहानी है उस समय तो हालात आज से अलग ही थे । ये तो हम सभी जानते है । यूँ तो आज भी स्त्री पुरूष बराबर के होते हुये भी कहीं ना कहीं असमानता नज़र आ ही जाती है । खैर हमें तो फ़िल्म देखना बहुत पसंद है ही और आजकल तो बायोपिक का चलन चल रहा है । जैसे कुछ दिन पहले शकुन्तला देवी और अब गुंजन सक्सेना । वैसे गुंजन सक्सेना के बारे में भी हम ही क्या ज़्यादातर लोग इतना कहाँ जानते है ।

स्वतन्त्रता दिवस कुछ अलग सा

आप सभी को स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें । वैसे इस बार बाक़ी त्योहारों की तरह ही स्वतन्त्रता दिवस भी कुछ अलग सा ही मनाया गया । कारण वही कोरोना । हर साल हम लोग अपनी सोसाइटी में करीब दस बजे के आस पास स्वतन्त्रता दिवस मनाने के लिये इकट्ठा होते थे । छोटे बच्चे सफ़ेद कुर्ता पैजामा और तिरंगें रंग का का दुपट्टा ओढ़ कर आते थे । हम सब महिलायें और पुरूष भी तैयार होकर झंडा रोहण के लिये जमा होते थे । और जब तक सारे लोग आते तब तक गप्पें और एक दूसरे से मिलना जुलना चलता रहता था । झंडा फहराने के लिये सब बच्चों को इकट्ठा किया जाता और सारे बच्चे और कोई एक बड़ा उनके साथ मिलकर झंडा फहराता था । और फिर बडे और बच्चे मिलकर राष्ट्रीय गान गाते थे । बहुत सारी फोटो खींचीं जाती । और उसके बाद पैकेट में लडडू और समोसा सबको दिया जाता था । जिसे हम लोग लेकर वहीं बग़ीचे में कुर्सी डालकर खाते और थोड़ी देर बातें करते थे । हर एक का अलग ग्रुप था । बच्चे अलग दौड़ भाग करते और खेलते । सारे जेंटस एक तरफ़ गुट बना कर पॉलिटिक्स डिस्कस करते थे । एक अलग ही उत्सव का माहौल होता था । और आधा पौना घंटा बिताकर सब ल

ज़ूम का कमाल

यूँ तो कोरोना से बुरा क्या होगा पर कोरोना के चलते ही हमें अपनी गिटार क्लास वालों से मिलने का मौक़ा मिला । तो कह सकते है कि बुराई में भी अच्छाई । परसों यानि ग्यारह अगस्त को चालीस साल बाद हम अपनी गिटार क्लास के लोगों से ज़ूम के माध्यम से मिले । आठ या नौ अगस्त को तय हुआ कि ग्यारह को गिटार क्लास वालों की एक ज़ूम मीटिंग रखी जाये । और इस मीटिंग को माससाब के बडे बेटे गौरव ने ऑर्गनाइज़ किया था क्योंकि ग्यारह अगस्त को माससाब का जन्मदिन होता है । और चूँकि हम कुछ लोग फेसबुक के ज़रिये जुड़ गये थे इसलिये ये सम्भव हो सकता था । खैर ग्यारह को रात आठ बजे मीटिंग का टाइम रखा गया और गौरव ने सबको आईडी और पासकोड भेज दिया था । ठीक रात आठ बजे हमसब ज़ूम रूम में इकट्ठा हुये और फिर डेढ़ घंटे कैसे बीते पता ही नहीं चला । कहाँ हम सब ने एक दूसरे को बचपन में देखा था और कहाँ अब इतने सालों बाद सबको देखकर बहुत अच्छा भी लगा और ख़ुशी भी हुई । हांलांकि सब लोग बदल गये है । माससाब के चारों बेटे बडे हो गये और सभी म्यूज़िक में नाम कमा रहें है और हम सब वज़न में बढ कर डबल हो गये । 😃 सुरभी जिससे हम अभी तीन चार

कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व

सबसे पहले तो सभी को कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें । कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व के साथ ढेर सारी यादें जुड़ी हुई हैं । छुटपन में आधे दिन का व्रत रखना और फिर पूरे दिन तरह तरह की व्रत में बनने वाले फलाहार खाना । और साथ में खाना भी खा लेना । 😁 आज के दिन इलाहाबाद में तो खूब झांकियाँ सजती थी । और हम लोग शाम को तैयार होकर देखने जाते थे । और इसी में पूरी शाम निकल जाती थी । 😊 पर हमारी ससुराल लखनऊ में तो अम्माजी और हमारी छोटी ननद ख़ुद ही घर के बरामदे में बहुत सुंदर झाँकी सजाती थी । जिसमें छोटे छोटे मिट्टी के खिलौने , रंग बिरंगी बालू , अलग अलग रंग में चावल को रंगकर उनसे बनाना , नदी बानाना , रंग बिरंगी लाइटें और छोटे छोटे पेड़ पौधे लगाना । और ये सब करनें में पूरा दिन लग जाता था पर जब शाम को झाँकी में लाइटें जलती तो उसकी छँटा देखने लायक होती थी । बेहद ख़ूबसूरत । अभी कुछ साल पहले हम लोग अपनी सोसाइटी में भी कृष्ण जन्माष्टमी मनाते थे । शाम को हम लोग इकट्ठा होकर पूजा करते थे प्रसाद चढ़ाते थे । कुछ भजन गाते थे और हमारी दोस्त हरे रामा हरे कृष्णा गाने पर मगन होकरझूम झूम कर डाँस करती थ

आस पास कोरोना ने दी दस्तक

अब कोरोना से ही नहीं कोरोना के नाम से भी सभी को डर लगता है । और हम भी इससे अछूते नहीं है । तकरीबन साढ़े चार महीने से हम लोग घर में ही रह रहें है इसी कोरोना के डर के कारण । क्योंकि बहुत बहादुरी दिखाने की तो इसमें ज़रूरत ही नहीं है । पर कल हम लोगों के आस पास कोरोना के होने की ख़बर मिली जिसे सुनकर डर भी लगा क्योंकि अभी तक हम लोगों की तरफ़ कोरोना के केस नहीं आ रहे थे । अभी दो चार दिन पहले ही हम लोगों ने थोडा टहलना शुरू किया था पर अब इस ख़बर के बाद वापिस घर में रहना पड़ेगा । ☹️ ना जाने मुआ कोरोना कब जायेगा ।

कितना खाना बनाओगे यार 😃

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कल शाम को zomato से एक बड़ा मजेदार मैसेज आया जिसे पढ़कर हम बहुत हंसे ।😃 अब यूं तो जब से फूड डिलीवरी शुरू हुई है रोज़ ही अनेकों मैसेज आते है dominos  , zomato और swiggy के , और अब गुलाटी रेस्टोरेंट का भी मैसेज आया है कि वो पूरी दिल्ली में होम डिलीवरी कर रहे है । कहने का मतलब है कि रोज़ कम से कम पंद्रह बीस ऐसे मैसेज आते है । पर हम बस देख कर डिलीट कर देते है । अब वो क्या है कि जब से corona आया है तब से बाहर से खाना मंगाना बिल्कुल ही बन्द है । वरना पहले तो हफ्ते में कम से कम दो तीन दिन बाहर से खाना आता ही था । पर अब साढ़े चार महीने से zomato को कोई भी ऑर्डर नहीं दिया गया है । और zomato बेचारा डिस्काउंट ऑफर और मैसेज भेज भेज कर लगता है परेशान हो गया था तो उसने ये मैसेज भेजा ।🤓   इसे पढ़कर लगा कि zomato भी हम लोगों के घर में खाना बनाने से परेशान है ।😁

अजुध्या या अयोध्या

कल पूरे दिन टी वी पर अयोध्या देखते रहे और फैजाबाद और अयोध्या से जुड़ी ना जानें कितनी बातें और यादें बरबस ही दिलो दिमाग में घूम गई । फैजाबाद हम लोगों का ननिहाल और अयोध्या हमारी मम्मी का ननिहाल ।  अजुध्या में गांव में मामा लोग जमींदार थे  मामा लोगों के खेत खलिहान बाग बगीचा थे , अरे नहीं अभी भी है , अब मामा के बेटे सब देखते है । बचपन में हम लोग जब भी गर्मी की छुट्टियों में फैजाबाद जाते थे तो नानी कहती थी कि अजुध्या घूम आओ ।  और जब मामा अजुध्या जाते तो हम सब   जिसमें मौसी और मामा के बच्चे होते, उनके साथ जाते थे । वहां गांव में ,खेतों में घूमना , ट्यूब वेल के पानी में खेलना ,मामा को गांव वालों से रौब से बात करते देखना ।  अब उस जमाने में यही सब मनोरंजन होता था और हम सब इसी में खूब खुश और मस्त रहते थे । साठ सत्तर के दशक  में फैजाबाद में तो फिर भी भीड़ भाड़ होती थी पर अजुध्या इतना विकसित नहीं था और ना ही इतनी भीड़ भाड़ होती थी। और गांव में तो वैसे भी शान्ति और हरियाली होती थी जिसका हम लोग भरपूर आनंद लेते थे । अजुध्या जाएं और मंदिर में दर्शन ना करें ऐसा कैसे हो सकता था । क्योंकि बिना दर्शन किए

शकुन्तला देवी ( एक बहुत अच्छी फिल्म )

ये फिल्म तो हमने पिछले हफ्ते ही देख ली थी पर त्यौहार की वजह से लिख नहीं पाए थे ।😊 यूं तो हम लोग शकुन्तला देवी को mathmatician और ज्योतिषी के तौर पर ही जानते थे । पर इस फ़िल्म से पहली बार पता चला कि वो किसी भी स्कूल या कॉलेज नहीं गई थी। क्यूं और किस वजह से उनके पिता ने उन्हें स्कूल नहीं भेजा था । और कैसे वो लंदन जाती है और किस तरह से shows शुरू करने में उन्हें दिक्कतें आती है । वैसे इस फिल्म में मां बेटी के रिश्ते को बखूबी दर्शाया गया है ।और विद्या बालन और सान्या महरोत्रा ने दोनो ने बखूबी निभाया भी है। और तो और अमित साद जो breathe में इतने untidy look में था इसमें काफी अच्छा लगा । 😃 खैर फिल्म तो हमें बहुत बहुत अच्छी लगी और विद्या बालन ने तो कमाल की एक्टिंग की है ।और जब वो एक अजीब से स्टाइल से हंसती है वो तो कमाल है है ।  यूं भी विद्या बालन एक्ट्रेस बहुत अच्छी है ही। और इस फ़िल्म में विद्या बालन कमाल की सुन्दर और स्लिम भी लगी है । अब ये कैमरा का कमाल है या कुछ और मतलब वो पतली हुई है ।🤓 अगर आपने फिल्म नहीं देखी है तो देख लीजिए क्योंकि बहुत अच्छी फिल्म है ।👌👍

आज फ़्रेडशिप डे है

सबसे पहले तो फ़्रेडशिप डे की सभी को ढेर सारी शुभकामनायें । वैसे दो दिन पहले भी वहाटसऐप ग्रुप पर फ़्रेंडशिप डे खूब मनाया गया था । बहुत सारे मैसेज भेजे गये थे । और आज फिर से फ़्रेडशिप डे के संदेश मिल रहें है । अच्छा है दोस्ती को जितना सेलिब्रेट करो उतनी ही पक्की होती है । फ़्रेंड या दोस्त कौन वो जिससे बेझिझक कोई भी बात कह सकें । फ़्रेंड की कोई एक परिभाषा नहीं है और ना ही फ़्रेंडशिप या दोस्ती को किसी टेप से नापा जा सकता है । चाहकर भी नहीं नाप सकते है । क्या ग़लत कह रहें है । ज़रूरी नहीं कि साथ पढ़ने और खेलने वाले ही दोस्त हों । हम उम्र ही सिर्फ़ दोस्त हो । ये भी ज़रूरी नहीं है । स्कूल और यूनिवर्सिटी में पढ़ते हुये बहुत दोस्त बने । और जिनमें से कईयों से आज तक दोस्ती क़ायम है । जब तब बातें होती रहती है । नब्बे के दशक में जब हम काम करते थे तो उस ऑफ़िस में हमारी कुछ दोस्तें हमारी हमउमर थीं तो वहीं हमारी दो दोस्तें हमसे उम्र में जरूर बड़ी थी पर हमारी सोच एक थी और आज भी हमारी दोस्ती बख़ूबी चल रही है । हमारे किटी ग्रुप में कुछ हमसे बड़ी तो कुछ छोटी है पर जब हम सब मिलते है तो ऐस

इस बार राखी कुछ अलग सी

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अब कोरोना ना जाने का नाम ले रहा है और ना ही ख़त्म होने का । और ये त्योहार भी कोरोना की भेंट चढ़ गया । तो ज़ाहिर सी बात है कि इस साल राखी भी ऐसे ही अपने घर पर रहकर ही मनाना है । ना किसी को आना और ना किसी को जाना । भले आना जाना नहीं है तो क्या राखी तो राखी है । पर हाँ इस बार राखी कुछ अलग सी हो रही है । इस बार तो ऑनलाइन ही सब भाई-बहन मिलेंगें । घर पर ही बनी मिठाई अपने - अपने घर पर खायेंगें । अब जहाँ पिछले साल तक राखी के लिये हम बाज़ार से मिठाई वग़ैरा ख़रीद लाते थे वहीं इस साल राखी के लिये मिठाई घर पर ही बनानी है । अब वैसे भी हम लोगों के यहाँ त्योहार पर खाना बनाने का ही इतना काम हो जाता है उस पर से मिठाई बनाने का भी काम बढ गया है । 😏 अब काम बढ़े या जो भी हो मिठाई तो बनानी ही है । आख़िर रक्षाबंधन का त्योहार है । खैर हमने तो शुरूआत कर भी दी । हमने बूंदी के लड्डू बना लिये है ट्रायल के तौर पर।  लड्डू बाज़ार जैसे बराबर तो नहीं है पर ख़ुद से बनाये है । और पहले इसलिये बना लिये क्योंकि ऐन त्योहार के दिन बनाने में गड़बड़ हो जाये तो बस । वैसे पहले ट्रायल में तो बूं

अच्छा हुआ जो हम पहले ही पढ़ चुके

कोरोना काल में बडे बडे बदलाव हो रहें है । अब कल शिक्षा नीति में बहुत बड़ा बदलाव किया गया है । अब अच्छा या बुरा ये तो बाद में ही पता चलेगा । पता तो क्या ही चलेगा जो हो गया सो हो गया । अब हम लोगों के समय में साइंस , आर्टस और कॉमरस अलग अलग स्ट्रीम मानी जाती थी और हमारे बेटों ने भी इसी तरह से दसवीं और बारहवीं में पढ़ाई की थी । पर अब नई शिक्षा नीति के तहत अब कोई भी स्ट्रीम से पढ़ाई करो , सब बराबर है । वैसे साइंस वालों को पहले बहुत गुमान होता था कि हम साइंस साइड से है पर इस शिक्षा नीति ने सबको बराबर कर दिया ।😊 अब हम लोगों के समय में ग्रेजुएशन दो साल में और पोस्ट ग्रेजुएशन दो साल का होता था हालाँकि हमारे समय में ज़ीरो ईयर हो गया था जिसकी वजह से एक साल एक्स्ट्रा लगा था । 🤓 पर ऐसा हमेशा नहीं होता था । पर फिर कुछ साल बाद ग्रेजुएशन तीन साल और पोस्ट ग्रेजुएशन दो साल का हुआ मतलब पाँच साल का । और अब नये नियम से ग्रेजुएशन चार साल का होगा और मास्टर्स एक साल का मतलब ये भी पाँच साल का होगा पर ग्रेजुएशन में एक साल बढ़ा दिया गया है । पता नहीं क्यों ? अब बच्चे पढ़ाई के दौरान ब्रेक ले

कभी कभी नाम से भी धोखा हो जाता है 😳

ओ बाबा कॉमन नाम होना भी कभी कभी परेशानी का सबब बन सकता है ये पहली बार जाना । अब जुड़वा भाई - बहन में तो सुना है कि एक ग़लती करता है तो डाँट दूसरे को पड़ती है । पर एक सा नाम होने पर भी ऐसा कुछ हो सकता है । कभी सोचा ना था । 🤓 हाल ही में हमारे साथ एक ऐसा ही वाक्या हुआ । दरअसल हम एक ग्रुप के मेंबर है जहाँ हमारे ही नाम की किसी ने कोई अंडर बंडक मतलब कोई बहुत ही ख़राब पोस्ट ( आपत्तिजनक ) लिखी और ग्रुप में सबमिट की । पर उस ग्रुप के सभी एडमिन काफ़ी सतर्क और सचेत रहते है और कोई भी पोस्ट उनके अप्रूव्ड हुये बिना ग्रुप पर नहीं दिखती है ।तो वो पोस्ट तो ग्रुप पर नहीं आई पर ..... रात में हमे एक मैसेज मिला कि आपने फ़लाँ फ़लाँ पोस्ट लिखी है और आपसे अनुरोध है कि आप इस तरह की पोस्ट ना लिखें और ना ग्रुप पर भेंजें क्योंकि इस ग्रुप पर इस तरह की पोस्ट नहीं लगती है । और आगे हमारे ब्लॉग की तारीफ़ भी की । और कुछ विषयों पर ग्रुप पर लिखने के लिये भी कहा । पहले तो मैसेज पढ़कर हमें समझ नहीं आया । बहुत सोचा कि अभी पिछले कुछ दिनों में हमने उस ग्रुप पर क्या लिखा है पर कुछ आपत्तिजनक लिखा हो ऐसा हमें य

ब्रीद इन टू द शैडोज ( breathe : into the shadows)

कल हमने ब्रीद इन टू द शैडोज देख लिया । वही अभिषेक बच्चन वाला शो जो अमेजॉन पर दिखाया जा रहा है । वैसे हमने पहले वाला ब्रीद जिसमें माधवन था , नहीं देखा था । पहले एपिसोड में ही अच्छा नहीं लगा था । वो थोडा ज़्यादा ही वीभत्स लगा था । पर खैर ये वाला हमने पूरा देख लिया । हाँ थोड़ी बहुत मारकाट इसमें भी है पर इतनी कि आराम से देखी जा सकती है । और आजकल के चलते ट्रेंड से जरा अलग मतलब कोई गाली गलौज वग़ैरा नहीं । ( जहाँ डायलॉग के बदले पूरी पूरी लाइन में सिर्फ़ गाली ही बोली जाती है । ) हमने एक दिन में नहीं तीन चार दिन में ये पूरा शो देखा क्योंकि एक तो बारह एपिसोड और वो भी चालीस पैंतालीस मिनट के । तो एक दिन में दो एपिसोड से ज़्यादा देख ही नहीं पाते थे । शुरू के एपिसोड में तो शो ठीक ठाक लगा पर आख़िर के तीन चार एपिसोड बहुत अच्छे लगे । सभी कलाकारों ने ठीक काम किया है । अभिषेक बच्चन और अमित साद की कहीं अच्छी तो कहीं बुरी एक्टिंग है । पर ओवरऑल दोनों ने ठीक ही काम किया है । पर हाँ नित्या मेनन की एक्टिंग हमें बहुत पसंद आई । कह सकते है कि ये एक साफ़ सुथरी थ्रीलर सीरीज है । और ये भी कि बिना बह

चौथा महीना पूरा हो गया

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आज चौथा महीना भी पूरा हो गया । अब ये मत कहियेगा कि क्या दिन और महीना गिन रही हो । अब क्या करें महीना ना गिने तो पता कैसे चले कि कितने दिन हो गये है । 😃 पर ये कोरोना तो जाने का नाम ही नहीं ले रहा है । सच में अब तो कभी कभी मन करता है कि इसे डंडा लेकर दौड़ाया जाये । पर ऐसा हो नहीं सकता है । पर सोचने में क्या जाता है ।😇 कल शाम को हम अपनी सोसाइटी की एक फ़्रेंड से मिलने नीचे गये पर दस मिनट बाद ही लगा कि बात करना तक मुश्किल हो रहा है । कहीं बैठो तो कोरोना के चिपकने का डर रहता है । ज़्यादा देर मास्क पहने रहो तो साँस फूलने लगती है और ज़्यादा दिन ना मिलो तो मन । ख़ुशी ख़ुशी काम तो कर ही रहें है पर उसमें भी कभी कभी लगता है कि उफ़ कब तक । चमकते बर्तन और घर देखकर खूब ख़ुश भी होते है । पर फिर भी कभी कभी दिल पूछता है आख़िर कब तक । कोई नहीं कोरोना नहीं जा रहा है तो कोई बात नहीं । सब कुछ अपने समय पर ही होता है । चलिये चौथा महीना पूरा होने की ख़ुशी में एक नहीं दो सेल्फ़ी हो जाये । 😁

एक्स्ट्रा टायर नहीं पंक्चर रिपेयर किट

सही पढ़ रहे है कि अब से कार में एक्स्ट्रा स्टेपनी नही बल्कि पंक्चर रिपेयर किट होगा । और सभी टायर में एक तरह का प्रेशर मॉनिटरिंग सिस्टम होगा जिससे कार चालक को टायर की हवा के दबाव के बारे में पता चलता रहेगा । ऐसा भारत सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि ये सड़क सुरक्षा के लिये उपयोगी होगा । और जिन कारों में ये टायर मॉनिटिरिंग सिस्टम और टायर रिपेयर किट स्पेयर होगा उनमें स्टेपनी की ज़रूरत नही होगी । वैसे पंक्चर का कोई एक कारण तो होता नहीं है । आम तौर पर पंक्चर कोई कील या शीशा वग़ैरा टायर में लगने से होता है । तो मतलब कि अगर आपकी कार में पंक्चर हो जाये तो पहले आप ख़ुद ही टायर निकालो और फिर बैठकर पहले पंक्चर बनाओ फिर वापिस टायर लगाओ और तब कार चलाओ । जहाँ तक हमारा खयाल है कि स्टेपनी रहने से ये आराम रहता है कि अगर कहीं भी रास्ते में टायर पंक्चर हुआ तो बस स्टेपनी निकालो और टायर बदल लो । ( ख़ासकर जब हाई वे पर जा रहें हों तो ।) और फिर पंक्चर टायर को कहीं से भी रिपेयर करवा लो । वैसे टायर बदलना ही कौन सा बड़ा आसान होता है कि अब लोग टायर का पंक्चर भी बनायें । वैसे आत्म निर्भर बनने की ओ

touchless key for lifts and doors

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आजकल कोरोना के चलते हर तरह की सावधानी बरती जा रही है । अब जब भी हमें लिफ़्ट का इस्तेमाल करना होता है तो हम साथ में टिशू पेपर और हैंड सैनिटाइजर लेकर चलते है । पर अब हमें ऐसा करने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि हमारे पास अब टचलेस की है । 😜 अभी चार पाँच दिन पहले ही मँगाई है । ये ब्रास की है तो एक तो ये सेफ़ है और दूसरे इसमें जंग और करेंट वग़ैरा लगने का ख़तरा भी नहीं है । और इसपर किसी भी तरह के जीवाणु ( कोरोना वायरस भी ) ज़्यादा देर तक नहीं टिकते है । तो इस लिहाज़ से भी ये सेफ़ है । और लिफ़्ट वग़ैरा चलाने के लिये तो बहुत बढ़िया है । हाँ दरवाज़ा खोलने में इसके इस्तेमाल की अभी थोड़ी आदत डालनी पड़ेगी । 😊 इसमें सबसे अच्छी बात ये लगी कि ये बहुत भारी भरकम नहीं है । हल्की सी है बिलकुल दूसरी चाबियों की तरह । और इसे लेकर चलने में कोई दिक़्क़त नही है । और घर आकर इसे बडे आराम से सैनीटाइज भी कर सकते है । इसको रखने के लिये एक छोटा सा पाउच भी है । तो अब नीचे जाने के लिये बस मास्क लगाया और ये टचलेस की ली और चल दिये । 😊

आख़िरकार गरजत बरसत सावन आओ रे

इतने दिन से इंतज़ार करते करते आख़िरकार आज सावन के आने का एहसास हो रहा है । अरे पहले तो जब देखो रात के अंधेरे में गरज बरस कर चले जाते थे । पर आज जम कर बरस रहे है । 😊 हम जब छोटे थे तो जब बादल गरजते और बरसते थे तो हम लोग बोलते थे बरसों राम धड़ाके से आज तो वैसी ही बारिश हो रही है और सारे बरसात वाले गाने भी मन में आ रहें है । आज पहली बार लग रहा है कि हाँ दिल्ली में मानसून मतलब सावन आया है । वरना अब तो सावन ख़त्म होने में गिने चुने दिन ही बचे है । वैसे दिल्ली या यूं कहें कि अब तो किसी भी शहर में जरा ज़्यादा बारिश हुई नहीं कि बस हर तरफ़ पानी ही पानी भर जाता है । जिससे और सदियों तरह की समस्यायें खड़ी हो जाती है । सड़कों पर कारें बसें वग़ैरह पानी में फँस जाते है । लोगों को आने जाने में दिक़्क़त का सामना करना पड़ता है । वैसे आजकल तो लोग थोडा कम ही बाहर जा रहें है तो फिलहाल इस सुहावने मौसम का आनंद लेते है । ⛈☔️ वैसे पोस्ट लिखते लिखते बारिश रुक गई है ।😄

फ़्यूशिया पिंक 😜

डिस्क्लेमर -- महज़ पोस्ट समझें अन्यथा ना लें ।🙏🙏 अब आज के फैशनेबल समय में भले ही इसे फ़्यूशिया पिंक कहा जाये पर हम लोग जब बहुत छोटे थे तो ऐसे गुलाबी रंग को सुशीला पिंक कहते थे । 😃 अब इसके पीछे की कहानी कुछ ऐसी कि कोई सुशीला नाम की महिला ने चटक गुलाबी रंग की साड़ी पहनी थी । तो बस हम लोगों ने बस मस्ती में इस रंग का नाम सुशीला पिंक रख दिया । अब वो क्या है कि हम लोगों के शहर में हमारे घर के पास जब भी कोई मेला वग़ैरा लगता था तो इस तरह के गुलाबी रंग की साड़ी और कपडें में औरतें और लड़कियाँ बहुत नज़र आती थी । हम लोग अपनी छत पर बैठकर इन सुशीला पिंक को गिना करते थे । क्योंकि ये रंग दूर से चमकता हुआ दिख जाता था । 😛 वैसे बाद में हम लोगों ने ये कहना छोड़ दिया था और उसकी वजह थी कि हम लोगों के बहुत ही क़रीबी जानने वालों में दो लोगों के नाम है । 🙏🙏

उड़ने वाली कार

आज एक बडी ही मज़ेदार ख़बर पढ़ी कि अगले कुछ सालों में ओला और उबर उड़ने वाली कारें ( फ़्लाइंग टैक्सी ) बना देंगे । जो लोगों को उनके घर या ऑफ़िस से पिक करके उन्हें उनके गंतव्य पर छोड़ेगी । इस ख़बर को पढ़ते ही चाचा चौधरी की याद आ गई । जब हमारे बेटे छोटे थे तो वो चाचा चौधरी की कॉमिक्स पढ़ा करते थे । उन्हीं में से किसी एक कॉमिक्स में उड़ने वाली कार की कहानी थी । पूरी तरह से तो याद नहीं है पर उसमें चाचा चौधरी और साबू उड़ने वाली कार में सवार होकर विलेन का पीछा करते है और विलेन की उड़ती हुई कार एक बड़ी सी होर्डिंग से टकरा जाती है और वो पकड़ा जाता है । ऐसा ही कुछ था । और तब हम लोग दिल्ली के ट्रैफ़िक को देखकर कहते थे कि यहाँ भी उड़ने वाली कार आ जाये तो ट्रैफ़िक से छुट्टी मिले । वैसे कई इंगलिश फ़िल्में है जिनमें इस तरह की उड़ती हुई कारें वग़ैरा दिखाई जाती है । नाम नहीं याद आ रहा है । एक ब्रुस विलिस की ऐसी फ़िल्म देखी थी । 🤓 पर अब तो सच में ही ऐसी उड़ने वाली कारें आने वाली है । चलो हो सकता है सड़क पर तब कुछ ट्रैफ़िक कम हो जायेगा पर तब कहीं आसमान में इन उड़ने वाली कारों से ट्रै

संडे बारिश पकौड़ी और हम 😃

इस साल पता नहीं कैसे बारिश हो रही है । कभी आधी रात को होती है और कभी सुबह पाँच बजे होती है । जब तक जागो बारिश ग़ायब । 😛 हम बेचारे रोज बारिश होने के समय पकौड़ी खाने का मजा़ लेना चाहते है पर इस बार जब बारिश होती है तो पकौड़ी नहीं और जब पकौड़ी बनती है तो बारिश नहीं । आज भी सुबह छ: बजे धुँआधार बारिश हो रही थी तो हमें लगा कि चलो आज संडे भी है बारिश भी है तो पकौड़ी का पूरा मजा़ मिलेगा । पर जो हम सोचते हैं वो कहां होता है । 😬 आज भी वही हुआ सुबह बारिश देखकर पकौड़ी की तैयारी कर ली । पर जब तक हमने पकौड़ी बनाई बारिश हमारे यहाँ से रफ़ू चक्कर हो गई । तो आज एक बार फिर बिना बारिश के हमने पकौड़ी खाई । 😂

कोरोना क्या आया कि बाक़ी सब ग़ायब

मार्च में जब से कोरोना अपने देश में फैला तब से बाक़ी बीमारियॉं एक तरह से ग़ायब सी हो गई है । बीमारियाँ ग़ायब हुई है या फिलहाल बैक सीट पर है कहना मुश्किल है । वैसे कोरोना के डर के चलते ना तो हम लोग किसी भी तरह के टेस्ट करा रहे है जो पहले हर छ: महीने पर कराते थे ( और जो कराने भी है ) और ना ही किसी अस्पताल में जाने की हिम्मत कर पाते है । फिलहाल तो भगवान की कृपा से सब ठीक ठाक चल रहा है पर कभी कभी कुछ दूसरे ग्रुप पर लोग ऐसे सवाल पूछते रहते है कि क्या हॉस्पिटल जाना सेफ़ है । और तब ज़्यादातर लोग यही सलाह देते है कि अगर बहुत ज़रूरी ना हो तो हॉस्पिटल मत जाओ । डाक्टर से फोन पर बात कर लो वग़ैरा वग़ैरा । पर कोरोना ने ऐसा कर दिया है कि बाकी सब बीमारियाँ बिलकुल बैक सीट पर चली गई हैं ।

ग्लो एंड लवली

कुछ समय पहले तक जो क्रीम फ़ेयर एंड लवली नाम से जानी जाती थी अब उसका नाम बदल कर ग्लो एंड लवली कर दिया गया है । पता नहीं कितने लोग इस क्रीम को लगाकर गोरे हुये होंगें । पर जब बिकती है तो लोग इस्तेमाल भी करते ही होंगें । पहले तो जब फ़ेयर एंड लवली के एड आते थे तब उसमें एक बहुत ही डार्क कॉम्पलैक्शन या यूँ कहे कि काली लड़की को दिखाते थे जो इंटरव्यू ( या ऑफ़िस )के लिये जाती है तो लोग उसे अजीब सी नज़रों से देखते है और वो उदास सी घर आती है और आईने में अपने को देखती है । फिर वो फ़ेयर एंड लवली इस्तेमाल करती है और छ: हफ़्ते के बाद वो एकदम गोरी हो जाती है । और जब दोबारा वो जाती है तो लोग उसकी गोराई देखते ही रह जाते है । पर क्यूँ गोरी होना ? क्या डार्क कॉम्पलैक्शन में कोई बुराई है । हमें तो ऐसा कभी नहीं लगा और ना ही कभी किसी ने इस बात का एहसास कराया । बल्कि हम लोगों के समय में तो ये गाना भी बड़ा पॉपुलर था -- हम कोले हैं तो क्या हुआ दिलवालों है । 😃 और गोरे लोगों के लिये भी गाना बड़ा पॉपुलर था -- गोरे रंग पे ना इतना गुमान कर । 😁 तो इसी फ़ंडे को फ़ॉलो करते हुये हम कभी भी इस चक्कर में नह

ऊह आह आउच

आजकल काम करते करते यही हाल हो रहा है ।😘 जहाँ जरा सा कंधे पर दबाओ तो फट से आवाज़ निकलती है ऊह । पैर को जरा दबाओ तो आह की आवाज़ निकलती है और कमर को तो जब हाथ लगाओ तो आउच की आवाज़ निकलती है । 😝 ( बिलकुल धक धक वाले गाने की स्टाइल में ) 😂 यूं तो कोरोना ने काम में काफ़ी पक्का कर दिया है । पर फिर भी हम जो इतने आराम परस्त थे तो कभी कभी काम करते करते ऊह आह आउच के चक्कर में फँस ही जाते है । अब अपना तो ऐसे ही ऊह आह आउच करते करते काम धाम हो रहा है । आप लोगों का पता नहीं । 😁 क्या आपको भी ये ऊह आह आउच वाली फीलिंग आती है । 🤓

अब भला ये भी कोई डे है 😳😜

नहीं है हमें भी पता है पर आज सुबह सुबह हमारी एक किटी मेंबर ने कुछ ऐसी ही पोस्ट ग्रुप पर लगाई । 😳 आम तौर पर हम मोबाइल सब काम निपटाकर ग्यारह बजे या उसके बाद ही मोबाइल देखते है । पर आज सुबह एक्सरसाइज़ का मन नहीं था तो यूँ ही मोबाइल उठाया तो हमारे किटी ग्रुप पर पहला मैसेज देखा । शुरू हुई पोस्ट तो एक सीढ़ी सी बनी थी और लिखा था नीचे मत जाना , पर हम माने नहीं और नीचे जाने लगे । 🤓 वैसे पता था कि अंत में कुछ फनी ही होगा पर फिर भी हमने पूरी पोस्ट पढ़ी और अंत तक जाते जाते हँसी आने लगी । और अंत में लिखा था कि आज पागल डे है । वैसे कोरोना ने तो हम सबको काम करा करा के पागल बना ही दिया है । लिहाज़ा एक दिन क्या आजकल तो रोज ही पागल डे मन रहा है । 😂

क़िस्सा ऐ सरकार

आजकल कोरोना की ख़बर के साथ साथ पूरे समय राजस्थान की ख़बरें भी दिखाई जा रहीं है । वैसे हम कोई राजनीति के ज्ञाता तो नहीं है पर थोड़ी बहुत समझ आती है । अजीब तरह की राजनीति आजकल होने लगी है । एक अच्छी खासी चल रही सरकार को कुछ लोग अचानक गिराने की कोशिश करते है । और सफल भी हो जाते है । नेताओं का पहले तो फिर भी कुछ ईमान धर्म होता था पर आजकल के नेता तो बस । जहाँ चंद करोड़ दिखे बस उधर ही चल पड़े । पहले तो ख़रीद फ़रोख़्त छुपा छुपी होती थी पर अब तो जग ज़ाहिर रहती है । आजकल तो राजनीति बिलकुल मंडी की तरह होती जा रही है । जो ज़्यादा बोली लगा ले । वो चाहे मध्य प्रदेश हो या राजस्थान । क्या सिंधिया क्या पायलेट । सब मौक़ा परस्त । और मजे की बात कि इस सरकार गिराने और बचाने में सारे नेता कोरोना को बिलकुल ही भूल जाते है । ना किसी को कोरोना का डर ना ही सोशल डिटेंसिंग ।

सावनी पोस्ट

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जी हाँ आज की हमारी पोस्ट कुछ कुछ सावनी टाइप की है । अब फिलहाल हमारे यहाँ सावन में बारिश की थोड़ी आंखमिचौली सी चल रही है । अब बरसते भी है तो आधी रात में जब बारिश का मजा भी ना ले पायें । 😏 अब सावन शुरू होते ही हर ग्रुप पर सावन ,घेवर और अनरसा की बातें होती रहती है । पिछले हफ़्ते हमारी दीदी ने अनरसा की गोली बनाई और ग्रुप पर फोटो लगाई । देखने में इतने सुन्दर लग रहे थे कि हमें भी बनाने का मन कर गया । वैसे हमें याद नहीं कि आख़िरी बार हमने कब अनरसा की गोली खाई थी पर हाँ घेवर तो जरूर हर साल सावन में हम ख़रीद ही लाते थे । पर इस कोरोना ने तो वो सुविधा भी छीन ली है । अब आजकल तो बाज़ार की मिठाई वग़ैरा तो बंद है तो ज़ाहिर सी बात है कि अगर खाना है तो ख़ुद ही बनाओ । वैसे हमें घेवर बहुत ज़्यादा पसंद नही है क्योंकि बहुत घी घी सा होता है । पर जब ख़ुद बनाया तो खाने में बड़ा मजा आया । 😋 जी हाँ हमने घर पर घेवर बनाया । 😁 हमने सोचा कि जब सभी तरह की मिठाई बनाने की कोशिश कर रहें है तो फिर घेवर भी बना ही लेते है । 😃 बनाने में आसान भी है और मुश्किल

अमिताभ बच्चन को भी कोरोना हुआ

आज सुबह से ही ये ख़बर हर तरफ़ से आ रही है कि अमिताभ बच्चन भी कोरोना से संक्रमित हो गये है । खबर सुनकर लगा कि अरे ऐसा कैसे हो सकता है । और अमिताभ बच्चन ने ख़ुद भी ये बात कही है कि वो कोरोना पॉज़िटिव हो गये है । कोरोना का भी कुछ पता नहीं है कि कब किसे कहाँ और कैसे पकड़ लेगा । कल जहाँ एक तरफ़ धारावी में कोरोना पर क़ाबू पाने की अच्छी ख़बर आई थी कि किस तरह मुम्बई के धारावी जो बहुत घनी आबादी वाली जगह है वहाँ शुरू में कोरोना के केस काफ़ी आये थे पर फिर वहाँ कैसे टेस्टिंग वग़ैरा करके कोरोना पर कंट्रोल पाया गया है । अभी अच्छी ख़बर आये ज़्यादा समय नहीं हुआ था कि अमिताभ और अभिषेक बच्चन के कोरोना से संक्रमित होने की ख़बर आ गई । उम्मीद करते है कि दोनों जल्द ही ठीक और स्वस्थ हो जायेंगें ।

भला हो ऑनलाइन शॉपिंग का

इस कोरोना के कारण घर से निकलना तो बंद है ही और वो वाली सारी शॉपिंग भी बंद है मतलब जिसमें बाक़ायदा बाज़ार जाकर चार -छे दुकानों पर घूमकर और अच्छे से देख परख कर ख़रीदारी करते थे । कई बार हम सोचते है कि अगर ऑनलाइन शॉपिंग ना होती इस समय तो हम लोग क्या करते और कैसे रहते । पर इस कोरोना काल में ये ऑनलाइन शॉपिंग ही एकमात्र सहारा था और है जिसमें राशन से लेकर फल -सब्ज़ी , कपड़े से लेकर चादर , और जितने भी इलैक्ट्रॉनिक सामान ( गैजेट ) वो चाहे छोटू ( वैक्यूम क्लीनर ) हो या ओवन ही क्यूँ ना हो । हम जो हमेशा घर में सबको ऑनलाइन शॉपिंग करने पर टोका करते थे पर अब हम ख़ुद ही सारी चीज़ें ऑनलाइन मंगाने लग गये है । हमें हमेशा लगता था कि कपड़े वग़ैरा तो देखकर ही लेना चाहिये पर इस कोरोना ने हमारी वो सोच भी बदल दी । 😜 अब तो हम भी धड़ल्ले से कुछ भी मँगा लेते है । और मज़े की बात की अभी तक कोई भी सामान ख़राब नहीं निकला है । 😃 इस कोरोना और लॉकडाउन वग़ैरा के चलते तो बाहर जाना छूट ही गया है और अब इस ऑनलाइन शॉपिंग की वजह से बाजार जाने की भी आदत छूट जायेगी । 😊

मैचिंग मास्क का कल्चर

कोरोना के चलते मास्क सबसे ज़्यादा पॉपुलर हो रहा है । पहले तो कभी भी कोई मास्क में नज़र नहीं आता था पर अब कोई बिना मास्क के नज़र नहीं आता है । पर जब हम लोग जापान घूमने गये थे तो वहाँ लोग अलग अलग तरह का मास्क लगाये नज़र आते थे । जो हम लोगों को देखने में अजीब लगा था । तो पूछने पर कि यहाँ लोग मास्क लगाकर क्यूँ रहते है । हम लोगों की गाइड ने बताया था कि वहाँ अगर किसी को जरा सा भी सर्दी ज़ुकाम होता है तो वो मास्क पहनकर ही बाहर निकलता है । ताकि दूसरे लोगों को इनफ़ेक्शन ना हो । और ना केवल बडे लोग बल्कि छोटे छोटे बच्चे भी मास्क लगाते है अगर उन्हें खाँसी ज़ुकाम होता है तो । खैर पहले तो अपने यहाँ मास्क कल्चर था नही पर अब तो कम्प्लसरी हो गया है । तो भला कपड़े बनाने और बेचने वाली कम्पनियाँ कहाँ पीछे रहती । आजकल सूट और कुर्ते से मैचिंग मास्क मतलब जो कुर्ते का प्रिंट डिज़ाइन वहीं मास्क में भी मिल रहा है । 😊 जैसे लहरिया , वाग प्रिंट , राजस्थानी प्रिंट , प्लेन मास्क और प्रिंटेड मास्क जिसमें फूल पत्ती से लेकर कुछ भी बना होता है । बच्चों के लिये कार्टून फ़िगर वाले मास्क । मतलब जैसा च

क्या जजमेंट है 😳

कभी कभी ऐसे अजीब से जजमेंट सुनने को मिलते है कि समझ नहीं आता है कि क्या कहें अपनी न्याय पालिका को । तलाक़ के बहुत तरह के जजमेंट और ऑर्डर दिये गये है पर पिछले हफ़्ते एक जरा अजीब सा जजमेंट आया जिसमें पति को पत्नी से सिर्फ़ इसलिये तलाक़ मिल सकता है क्योंकि पत्नी सिंदूर और चूड़ी नहीं पहन रही थी या पहनना चाह रही थी । अब आज की पीढ़ी तो छोड़िये हमारी वाली पीढ़ी ने भी ना जाने कब से इन सब चीज़ों को लगाना और पहनना कम कर दिया है । तो क्या हम ....... 😃 समझ गये । अब इन सब चीज़ों से ही शादीशुदा होने को जोड़ा जाय ये आज के ज़माने में कहाँ तक न्याय संगत है । ठीक है हमारे हिन्दू धर्म में ये सब पहनना सुहाग की निशानी मानते है पर सिर्फ़ इस बात पर पति पत्नी को तलाक़ दे सकता है । ये बात समझ से परे है ।

सावन आया झूम के , अरे कहाँ

पहले तो सावन मास शुरू होने की शुभकामनायें । परसों की बारिश देखकर लग रहा था कि सोमवार को हम कहेंगें आया सावन झूम के । पर बादलों ने कहा ज़्यादा ख़ुश होने की ज़रूरत नहीं है और वापिस चले गये । और बेतहाशा गरमी कर गये । 😏 अब तो सावन में बस यही रहता है कि बस अच्छी बारिश होती रहे । वरना एक ज़माना था जब बारिश का अपना एक अलग अंदाज हुआ करता था । पुराने ज़माने में ना जाने कितने गाने बारिश और सावन पर बने है । हालाँकि आजकल ऐसे गानों का भी कुछ अभाव सा हो गया है । अब इस कोरोना काल में तो क्या सावन क्या भादों । सब एक बराबर है । वरना सावन में होने वाली किटटी में भी सावन की थीम का होना और सबका हरा रंग पहनना मेंहदीं , चूड़ी और फ़ुल ऑन हरियाली बनकर किटटी में जाना । 😃 और इस बार तो सावन में पड़ने वाली किटटी भी वर्चुअल होने वाली है । इसमें कितना भी सजधज लो पर वो बात नहीं आती है । पर फिलहाल तो इसी वर्चुअल तरीक़े से ही जुड़े रह सकते है । अब इस सावन में तो मेंहदी भी खुद से ही लगानी पड़ेगी । 😫 हाँ बस सावन और बारिश में जो एक बात नहीं बदलती है वो है चाय -पकौड़ी । इधर बारिश शुरू हुई और उधर चाय

गुरू पूर्णिमा

आज गुरू पूर्णिमा है तो पहले तो सबको गुरू पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें । और हमारे सभी गुरूओं को प्रणाम । 🙏🙏 गुरू कौन -- वो जो हमें ज्ञान दे और ग़लत सही की पहचान कराये । गुरू हर वो है जो आपको कुछ ना कुछ सिखाता रहता है फिर वो चाहे समय हो या कोरोना हो । कोरोना जिसने जीवन का फ़लसफ़ा ही बदल दिया ।  अब जैसे जीवन और जिंदगी चलते रहते है वैसे ही हम सब पूरे समय कुछ ना कुछ सीखते ही रहते है । समय समय पर हमारे गुरू बदलते रहते है क्योंकि जीवन भी तो निरंतर बदलता ही रहता है ।  कहने की ज़रूरत नहीं है कि सभी बड़ों ने जो पग पग पर किसी ना किसी रूप में हमारे गुरू रहे है जैसे मम्मी पापा ,अम्माजी पापाजी , भइया - दीदी लोग ,दोस्त और हमारे सभी शिक्षकों ने हमेशा हमारा मार्गदर्शन किया है । वैसे गुरू की लिस्ट में हमारे नये गुरूओं को कैसे छोड़ सकते है और वो है हमारे पतिदेव और बेटे जिन्होंने ठोंक ठोंक कर हमको टैक सैवी बनाया है । 😂 और आजकल के सबसे बडे गुरू कहें कि गुरू घोटाले कहें -- वो है गूगल बाबा । चाहे कोई भी समस्या हो गूगल बाबा के पास उसका हल जरूर रहता है । और बिलकुल इंस्टैंट जवाब मिलता है ।

नो टच नो कॉन्टैक्ट

आजकल कोरोना के कारण कोई भी ऑनलाइन सर्विस हो या कोई और तरह की सर्विस हर कोई नो टच नो कॉन्टैक्ट पॉलिसी को फ़ॉलो कर रहा है । अमेजॉन तो अपने एड में भी दिखाता है नो कॉन्टैक्ट । और इस नो टच और नो कॉन्टैक्ट से हमें वो पुराना ज़माना याद आ रहा है जब हम लोगों की दादी इस तरह किया करती थी और तब हम लोग बहुत ग़ुस्सा करते थे कि दादी ऐसे क्यूँ करती है । दादी दिन में दो बार तो जरूर ही नहाती और पूजा करती थी । पर अगर कोई छू जाये तो वो फिर से नहाती थी और पूछने पर कहती कि फ़लाँ से हम छुआ गये है । या फ़लाँ ने हमको छू लिया । हम लोगों के पास एक डॉगी था और दादी को उसे छूना और प्यार करना अच्छा तो लगता था पर हर समय वो उसे नहीं प्यार करती या छूती थी । बस वो उसे सिर्फ़ नहाने के पहले ही छूती थी । 😊 दादी की रसोई में कोई घुस नहीं सकता था । कोई सामान आता था तो हमेशा कहती थी वहीं सामान धर दा और जा । फिर वो सामान को थोडा शुद्ध करके उठाती थी और फिर इस्तेमाल करती थी । और बहुत शुरू में ना केवल हमारी दादी बल्कि हमारी मम्मी भी ये सब बहुत मानती और करती थी । वो तो बाद में धीरे धीरे मम्मी ने सब कुछ थोडा छोड़ा था पर

अच्छे फल और सब्ज़ियाँ का मिलना

अब यूँ तो कोरोना से बुरा कुछ हो नहीं सकता है पर इस कोरोना के चलते आजकल बेहद उम्दा फल और सब्ज़ियाँ बाज़ार में मिल रही है । आजकल हर तरह की बेस्ट क्वालिटी की सब्ज़ियाँ और फल हिन्दुस्तान के बाज़ार में उपलब्ध है । और अच्छे फल सब्ज़ी ना केवल बाज़ार में बल्कि आजकल तो ऑनलाइन ऑर्डर करने पर भी होम डिलीवरी हो रही है । अब कोरोना के कारण हम लोगों का बाहर जाना तो हो नहीं रहा है पर हमारे यहाँ ऑनलाइन ऑर्डर करने पर ( फिर वो चाहे बिग बास्केट हो या फिर स्पार हो ) भी खूब अच्छी सब्ज़ियाँ वग़ैरा आ रही है । जबकि पहले जब भी सब्ज़ी और फल मँगाते थे तो कुछ ना कुछ ख़राब ही निकल जाता था । जैसे टमाटर या तो बहुत पके या थोड़े कच्चे से आते थे । फूल गोभी वग़ैरा तो अकसर गड़बड़ होती थी । जिसके कारण हमने ऑनलाइन फल सब्ज़ी मंगाना बंद कर दिया था । पर आजकल क्या बढ़िया टमाटर ,गोभी ,गाजर ,भिंडी ,करेला यहाँ तक की पालक भी बहुत ही बढ़िया मिल रही है । और फल भी लाजवाब वो चाहे आम हो लीची हो पल्म हो या ख़रबूज़ा और तरबूज ही क्यूँ ना हो । कहने का मतलब है कि कोरोना और लॉकडाउन ने भले ही हम लोगों को घर में बंद कर दिया है

आर्या ( वेब सीरीज़ )

कुछ तीन चार दिन पहले हॉटस्टार पर आर्या देखी जिसमें सुष्मिता सेन और चन्द्रचूड़ सिंह है । दोनों ही कलाकार काफ़ी अरसे बाद दिखाई दिये । वैसे तो नाम से ही पता चलता है कि कहानी आर्या पर ही होगी । हीरोइन प्रधान सीरीज है कि कैसे उसकी लाइफ़ अचानक से बदल जाती है । और कैसे वो अपनी फ़ैमिली को प्रोटेक्ट करती है । और ये सब करने में उसे कितनी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है । पर इस सीरीज़ में एक अजीब बात हमें ये लगी कि कहने को तो ये थ्रीलर है पर कहीं कुछ भी सस्पेंस नहीं है । सब कुछ बिलकुल प्रिडिक्टेड सा है । यहाँ तक की आख़िरी सीन भी । सीन शुरू होने के साथ ही समझ आ जाता है कि अब कुछ गड़बड़ होने वाला है या फ़लाँ मर जायेगा । हो सकता है हमारा ज़्यादा फ़िल्में और सीरीज़ देखने का नतीजा है । 🤓 पर हाँ सुष्मिता सेन ने एक्टिंग जरूर अच्छी करी है । और उसी की वजह से ये सीरीज़ देखी भी जा रही है । चन्द्रचूड़ सिंह तो इतनी कम देर के लिये थे कि बस क्या कहें । हाँ बीच बीच में एक दो मिनट के लिये गाना गाते जरूर नज़र आ जाते थे । आख़िर हीरो जो थे । कहाँ माचिस वाला चन्द्रचूड़ सिंह और कहाँ इस सीरीज़ वाला । 😒

कुछ भी नाम रख देते है 😳

कल जब न्यूज़ देख रहे थे तो उसमें एक कपड़े धोने वाले साबुन मतलब डिटरजेंट का एड आया और उस साबुन का नाम सुन और पढ़ कर हम सोचने लगे कि कम्पनियाँ कैसे नाम सोचती है । या बस कुछ भी नाम रख देती है । क्या सोचकर ऐसे नाम रखती है । जिस साबुन का एड देखा था उस साबुन का नाम छोकरा साबुन है । और उसमें ये भी कहते हैं कि पैंसठ सालों का विश्वास । अब खैर हमने तो पहले इस साबुन का नाम कभी सुना ही नहीं था । बहुत सारे साबुन के थोड़े अजीब नाम तो होते है । जैसे निरमा ,घड़ी , व्हील ,फेना वग़ैरा तो खूब सुने और देखे है । पर ये छोकरा साबुन । हमारी तो समझ के बाहर है ।

बर्तनों का शॉवर 😄( अनलॉक ३.० )

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क्या हुआ ? चौंक गए शीर्षक पढ़कर ।😜 अरे सच में हमने अपने बर्तनों के लिए शॉवर मंगाया है । बड़ा ही अच्छा और क्यूट सा है । क्या यकीन नहीं आ रहा है । इसे देखिए और बताइए की हमारे बर्तनों का शॉवर क्यूट है या नहीं ।😍  

आसमानी ऊँचाई पर डीज़ल पेट्रोल के दाम क्यूँ ( अनलॉक ३.० )

जब पहला लॉकडाउन शुरू हुआ था उस समय डीज़ल का दाम शायद पैंसठ या सत्तर ऐसा ही कुछ था पर आजकल तो अस्सी रूपये से भी ज़्यादा हो गया है । जबकि डीज़ल को हमेशा सस्ता माना जाता रहा है क्योंकि डीज़ल कारों के साथ साथ कमरशियल वाहनों जैसे ट्रक ,टेम्पो वग़ैरा में तो डीज़ल ही इस्तेमाल होता है । और डीज़ल हमेशा पेट्रोल से सस्ता भी होता था पर आजकल हालात बदल गये है । डीज़ल पेट्रोल से महँगा हो गया है । अजीब बात है पर आजकल कुछ भी हो सकता है । फिलहाल तो बढ़ी हुई क़ीमत का हम लोगों पर ज़्यादा असर नहीं है क्योंकि आजकल कोरोना के चलते हम लोग तो घर में ही है इसलिये आजकल कार बहुत कम चलती है वरना अगर पहले की तरह ही घूमते फिरते होते तब इस बढ़ी हुई क़ीमत का असर हम पर भी शायद कुछ होता । खैर हम पर तो नही पर इतनी बढ़ी हुई क़ीमत का असर दूसरे लोगों जैसे ट्रक और टैम्पो चलाने वालों पर तो बहुत ही पड़ रहा होगा । क्योंकि एक तो पहले ही लॉकडाउन ने सब गड़बड़ कर रखा है उस पर पेट्रोल और डीज़ल की रोज क़ीमत बढ जाती है । इस पूरे जून के महीने में रोज कभी दस पैसा तो कभी पन्द्रह पैसे कर कर के पेट्रोल डीज़ल के दाम सरकारें बढ़ा

बादलों को भी कोरोना से डर लगता है (अनलॉक ३.० )

पिछले कई दिनों से रोज सुबह शाम बादल छा जाते है पर नतीजा वही सिफ़र मतलब नो बारिश । 😊 हमें तो लगता है जब बादल दिल्ली पर छाते है तभी इन्द्र देव बादलों से पूछते है कि अभी तुम कहाँ हो । और जैसे ही बादल कहते है कि हम दिल्ली पर छाये हुये है । तो इन्द्र देव कहते है कि फ़ौरन दिल्ली से निकलो । पर क्यूँ भगवन । तो इन्द्र देव कहते है क्या तुम्हें पता नहीं है कि वहाँ कोरोना फैला हुआ है । अब हम तो यहाँ आ गये है भगवन । अच्छा तो जरा सी झींसी करके निकल लो । 🌨 तो उसके बाद हम कहाँ जायें भगवन ? कहाँ बरसें । कहीं भी जाओ , नोयडा जाओ ,ग़ाज़ियाबाद जाओ ,राजस्थान जाओ और नहीं तो इलाहाबाद और लखनऊ और नहीं तो मुम्बई ही जाकर बरसो । और दिल्ली पर छाये बादल इन्द्र देव की बात मानकर कुछ बूँदें गिराकर दिल्ली से उड़ जाते है । 💦

मुबारक हो तीन महीने हो गये ( अनलॉक ३.० )

हम सबको आत्म निर्भर बने हुये पूरे तीन महीने हो चुके है । बिलकुल प्रेगनेंसी टाइप वाली फीलिंग आ रही है ना । 😜 शुरू शुरू में कुछ परेशानियाँ और तीन महीने बीतते बीतते सब कुछ सैटल सा हो रहा है । 😁 अब विदेश में तो लोग अपना हर काम स्वयं ही करते है पर अपने देश में ये कामवाली और हैल्पर की जो सहूलियत हम लोगों को थी वो भी इस कोरोना ने छीन ली । 😬 हम लोगों ने हमेशा कामवाली हैल्पर और सेवक को अपने घरों में काम करते देखा है पर अब तो हम लोग ही फ़ुल टाइम सेवक टाइप हो गये है । पर इन तीन महीनों में हम ने बहुत कुछ सीखा और समझा है । पहली बात तो आत्म निर्भर होने की है जो हमने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि हम कभी इतने आत्म निर्भर बन सकते है और बन जायेंगें । पर कोरोना ने वो भी बना दिया । अपना तो ये हाल था कि अगर पार्वती एक दिन छुट्टी कर ले तो ना तो हम काम करते थे और ना ही घर में कोई हमें करने देता था । 🤓 बाहर का खाना जो हमारे यहाँ जब तब आता था अब पिछले तीन महीने से बंद है और हम हर तरह का खाना बनाने में हाथ आज़मा रहें है । 😛 वैसे पार्वती या कोमल तो नहीं है पर फिर भी हमारी मदद के लिये

बोर्ड की परीक्षायें रद्द कर दी गई है ( अनलॉक ३.० )

वैसे ये ख़बर तो कल ही आ गई थी । हालाँकि पिछले कुछ दिनों से थोड़ी असमंजस की स्थिति सी भी थी । कभी होता था कि इम्तिहान जुलाई में होगें तो कभी कोई तारीख़ एनाउंस करते थे कि फ़लाँ तारीख़ से बोर्ड की परीक्षा हो सकती है । पर खैर अब ये निश्चित हो गया है कि बोर्ड के इम्तिहान नहीं होंगे । इम्तिहान ना होने की ख़बर से बच्चों को और उनके माता पिता को जरूर बडी राहत मिली होगी । क्योंकि इस कोरोना के माहौल में स्कूल , पढ़ाई और इम्तिहान से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है कोरोना से सुरक्षा । वैसे कुछ राज्यों को बच्चों के इम्तिहान ज़्यादा ज़रूरी लग रहें है और वहाँ परीक्षायें भी हो रही है । पता नहीं क्यूँ । वैसे जहाँ कुछ बच्चे बोर्ड के इम्तिहान ना होने पर शायद ख़ुश होंगें तो वहीं कुछ बच्चे शायद अपसेट भी होगें क्योंकि उन्हें फ़ुल मार्कस शायद नहीं मिल पायेंगें । ऐसा हम इसलिये कह रहें है क्योंकि हमारी एक फ्रैंड है जिनका नाती बारहवीं क्लास में है और इम्तिहान ना होने की ख़बर पाकर थोडा अपसेट हो गया क्योंकि अब वो कम्प्यूटर में फ़ुल नम्बर ( १०० ) नहीं ला पायेगा । क्योंकि अब तो इम्तिहान ही कैंसिल हो गया है ।

जब ख़ुद पर आई तो ( अनलॉक ३.० )

आजकल पूरे देश मे कोरोना बढने की रफ़्तार दिन पर दिन तेज़ ही होती जा रही है । जहाँ आम लोगों को कवैरंटीन सेंटर और हॉस्पिटल पहुँचना और इलाज में आने वाली परेशानियों को हम सब रोज देख सुन और पढ़ रहे है । आम लोगों को जहाँ सरकारी अस्पताल में इलाज करवाने के बारे में बडी बडी बातें सब करते है कि वहाँ हर तरह की सुविधाये मरीज़ों के लिये उपलब्ध है वग़ैरा वग़ैरा । वैसे डाक्टर, नर्सें , हॉस्पिटल स्टाफ़ सब भरसक कोशिश करते है और बहुत ही ज़्यादा काम कर रहें है ताकि मरीज़ों का सही तरीक़े से इलाज हो सके । और मरीज़ ठीक भी होते है । अभी तक तो साधारण लोग मतलब आम आदमी इसकी चपेट में आ रहा था । पर अब कुछ नेताओं को भी इस कोरोना ने पकड़ना शुरू कर दिया है । और ये सारे नेता वो चाहे किसी भी पार्टी के हों , सब सरकारी अस्पताल ना जाकर सीधे मैक्स हॉस्पिटल में भरती होते है । और तो और बाहर से भी नेता गण आकर मैक्स में एडमिट होकर इलाज करवा रहें है । क्योंकि दिल्ली में मैक्स में फिलहाल कोरोना का सबसे अच्छा और सही इलाज हो रहा है । तो भला नेता लोग कहीं और क्यूँ जायेंगें । ठीक है जो सक्षम है ,ओहदे से और पैसे से वो

गूगल बाबा पर ज़्यादा भरोसा 🤓 ( अनलॉक ३.० ) पहला दिन

अभी कल ही की बात है हमारे बेटे ने पूछा कि फ़लाँ काम को कैसे करें । तो हमने जब बताया तो उन्हें यक़ीन नहीं हुआ और उसने फ़ौरन नेट पर सर्च किया और थोड़ी देर बाद आकर हमसे बोला कि हाँ मॉम आप सही कह रही थी । अब क्या करें आजकल गूगल बाबा पर सबक़ो ज़्यादा ही भरोसा है । और हो भी क्यों ना क्योंकि गूगल बाबा के पास हर सवाल का जवाब जो होता है । 😜 तो हमने उससे कहा कि आज तो हमें नानी की कही बात यानि मुहावरा याद आ गया । हमारी मम्मी आम बोलचाल की भाषा में भी खूब मुहावरे बोला करती थी । और हर बात के लिये उनके पास कोई ना कोई मुहावरा होता ही था । 😁 हांलांकि हम मुहावरों का बिलकुल भी इस्तेमाल नहीं करते है । पर कभी कभी जब कुछ ऐसी बात हो जाती है तो अनायास ही मम्मी वाले मुहावरे बोल देते है । 😛

हमेशा अपने बारे में ही सोचते है ( अनलॉक २.० ) सोलहवां दिन

कल शालू ने एक पोस्ट शेयर की थी जिसे पढ़कर लगा कि हम लोग जो सिर्फ़ तीन महीने से ही घर में रह रहे है और इतने दिनों में ही परेशान भी हो रहें है कि हम लोग घर से बाहर नहीं जा पा रहें है । कब सब ठीक होगा और कब हम लोग एक बार फिर से उसी आज़ादी से घूम फिर सकेंगें । घर से बाहर निकल सकेंगे । पर कल उस पोस्ट को पढ़ कर लगा कि वो लोग जो किसी मजबूरी या बीमारी की वजह से घर से बाहर नहीं जा पाते है । उनकी भी तो इच्छा होती होगी बाहर की दुनिया देखने की । पर ऐसा नहीं है कि बीमारी की वजह से उन लोगों ने हार मान ली हो । वो घर पर अपनी परेशानियों के साथ रहते हुये भी बहुत कुछ करते है और ख़ुश रहते है । और हालात से कभी हार नहीं मानते है । हम लोगों को उनसे हिम्मत और प्रेरणा लेनी चाहिये ।

कपड़े बडी जल्दी ख़राब हो रहें है 🤓 ( अनलॉक २.० ) पन्द्रहवां दिन

अब आप कहेगें कि भला घर में रहते हुये कपड़े कैसे जल्दी ख़राब हो सकते है । अरे हो रहें है । आप माने या ना माने पर हमारे कपड़े तो जल्दी ख़राब हो रहें है । अब वो क्या है नै कि पहले तो एक दिन में कम से कम तीन या चार बार कपड़े बदलते थे । ओ हो यक़ीन नहीं आ रहा है । चलिये बताते है कि कैसे हम इतने कपड़े बदलते थे । देखिये पहले सुबह सुबह मॉरनिंग वॉक पर जाने के कपड़े बदलते थे । फिर लौटकर नहा धोकर कपड़े बदलते थे । उसके बाद दिन या शाम को अगर मन हुआ तो मॉल वग़ैरा घूमने जाने या फ़िल्म देखने के लिये एक बार फिर से कपड़े बदल कर तैयार होते थे । 😁 और फिर रात में तो गाउन पहनते ही थे । तो इस तरह कोई भी कपड़ा पूरे दिन नहीं लादते थे मतलब पहनते थे । 😜 पर आजकल क्या है कि सुबह नहाने के बाद जो एक ड्रेस पहनते है वही सारे दिन लादे रहते है । फिर रात में जाकर कहीं नाइटी पहनते है । और इसीलिये जो कपड़े हम मार्च में पहन रहे थे उनकी हालत काफ़ी ख़राब सी हो गई तो हमने उन कपड़ों को रिटायर कर दिया । 😂

पापा

पूरा दिन इसी ऊहापोह में निकल गया कि पापा पर क्या लिखूँ क्यों कि पापा एक ऐसी शख़्सियत जिनको शब्दों में बयां करना हमारे बस की बात नहीं । पर हाँ पापा का हाथ हम सब के सिर पर होना जब वो थे तब भी और अब जब वो नहीं है तब भी उस प्यार भरे एहसास को हम सब आज भी महसूस क़रते है । पापा का हम सब भाई बहनों में कोई भी फ़र्क़ ना करना याद नहीं कभी भी पापा ने हम कोडाँटा हो हाँ मम्मी के डाँटने पर मम्मी को ही टोकना हम पापा कहते तो भइया कभी पापा तो कभी डैड कहते तो कभी दीदी ए पा कहती पापा कहने की ज़रूरत नहीं है कि हम सब आपसे कितना प्यार करते है हम सब आपको कितना याद करते है और आपको कितना मिस करते है । 🙏🙏

सूर्य ग्रहण तब और आज ( अनलॉक २.० ) चौदहवाँ दिन

आज हमारे पूरे देश में और विदेशों में सूर्य ग्रहण है । और आज के ग्रहण का समय काफ़ी लम्बा है । तकरीबन छ घंटे तक ।और आज रिंग ऑफ़ फ़ायर भी दिखाई देगा । अब जैसा कि हम लोग जानते है कि सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा की छाया सूरज पर पड़ती है और चंद्रमा सूरज और धरती के बीच आ जाता है और सूरज को ढंक लेता है । तब सूर्य ग्रहण होता है । और ऐसे समय में दिन में ही शाम या रात जैसा माहौल हो जाता है । हमें याद है जब हम छोटे थे तब सूर्य ग्रहण के समय मम्मी बहुत ज़्यादा एहतियात बरतती थीं । सारे घर के परदे बंद करवा देती थी । ताकि सूरज की जरा सी भी रोशनी घर में ना आये । बाहर निकलना तो दूर यहाँ तक की बाहर झाँकना भी मना होता था । कुछ भी काटना ,काम करना मना होता था । ग्रहण के दौरान कुछ भी खाने पीने को मना करती थीं क्योंकि ग्रहण के दौरान खाना पीना मना जो होता था । जो भी खाना होता था वो या तो ग्रहण शुरू होने के पहले या फिर ग्रहण ख़त्म के बाद । हालाँकि हमारे पापा इस सब को बहुत ज़्यादा मानते नहीं थे पर चूँकि मम्मी ये सब मानती थी तो वो उन्हें करने देते थे । ग्रहण के बाद वो स्नान और दान वग़ैरा भी करती थ

क्या कल पूरी दुनिया ख़त्म हो जायेगी 😳( अनलॉक २.० ) तेरहवाँ दिन

दो चार दिन पहले पतिदेव अपने किसी मित्र से हुई बात बता रहे थे कि उनके मित्र का कहना है कि इक्कीस जून २०२० को दुनिया ख़त्म हो जायेगी । अब इसमें कितनी सच्चाई है ये तो कल पता चलेगा । और कल यानि इक्कीस जून को ज़बरदस्त भूकम्प वग़ैरा आयेगा । क्योंकि कल सूर्य ग्रहण भी है । वैसे इस बार ग्रहण काफ़ी लम्बा और देर तक रहने वाला है । अब यूँ तो सूर्य ग्रहण में लोग बहुत कुछ करने और ना करने की सलाह देते है । पर पूरे दिन के ग्रहण में कितना पालन हो पायेगा । वैसे एक बार २०१२ के लिये भी कहा गया था कि दिसम्बर २०१२ में पूरी दुनिया ख़त्म हो जायेगी । पर खैर तब तो कुछ नहीं हुआ था । अब देखते है कल क्या होगा । क्या आपको भी ऐसा ही लगता है कि कल पूरी दुनिया ख़त्म हो जायेगी । खैर अगर कल सब ठीक ठाक रहा और दुनिया और हम लोग बच गये तो फिर कल मिलते है ।

बरसो रे ( अनलॉक २.० ) बारहवाँ दिन

बाबा रे इतनी ज़बरदस्त गरमी पड़ रही है कि कुछ पूछिये मत । बाहर मतलब बालकनी में निकलने में भी गरमी लगने लगी है । पिछले दो ढाई महीने से हम लोग रोज शाम को बालकनी में बैठकर कॉफ़ी वग़ैरा पीते थे पर इधर चार पाँच दिन से तो शाम को बाहर निकलने या बैठने का मन ही नहीं करता है । बाहर निकलते ही जैसे लू के थपेड़े मुँह पर लगते है । रोज सारे दिन बादल आते है छाते है और फिर हम सबमें बारिश की उम्मीद जगाते है और फिर टहल जाते है मतलब बिना बारिश किये ही बादल चले जाते है । और बादल आने से एक अजीब तरह की उमस भी हो जाती है जो और अधिक परेशान करती है । अब आज भी सुबह से बादल है और आंधी आने के भी आसार लग रहें है पर पता है शाम होते होते बादल उड जायेंगें । 😗

बाथरूम क्लीनर का रिव्यू (अनलॉक २.० ) ग्यारहवाँ दिन

कुछ दिन पहले हमने अपने इस बाथरूम क्लीनर रूपी हैल्पर के बारे में आप लोगों को बताया था । तो चलिये अब चूँकि हमने इसे इस्तेमाल किया है तो उसी के बारे में थोडा और डीटेल में बताते है ।क्योंकि हमारी एक फ़्रेड ने भी इसके बारे में पूछा था । ये सही है कि इससे बाथरूम की ज़मीन और दीवार पर लगी टाइल्स को साफ़ करने में अच्छा रहता है । क्योंकि ब्रश या झाड़ू से साफ़ करनें में मेहनत तो लगती ही है साथ ही बैठकर ज़मीन साफ़ करनी पड़ती है । तो उस झंझट से ये मुक्ति दिलाता है । और चूँकि इसमें रॉड लगा है तो बस खडे खडे जहाँ भी सफाई करनी है वहाँ कर सकते है । पर ऐसा नहीं है कि एक ही दिन की सफाई में ये टाइल्स को बिलकुल नया सा कर देगा । हाँ जब इसमें ब्रश को बदलना होता है तो चूँकि अभी ये नया नया है तो हमें थोडा ज़ोर लगाना पड़ता है । और हाँ क्योंकि ये मशीन है तो कभी कभी सफाई करते हुये छींटे भी उछालती है ।वैसे तो ब्रश वग़ैरा से सफाई में भी थोड़े बहुत छींटे तो पड़ते ही है । और इसमें ये ध्यान देने की सबसे ज़रूरत है कि इसके ऊपर डायरेक्ट पानी नहीं पड़ना चाहिये । वरना ये ख़राब हो सकता है । क्योंकि ये बैटरी स

डिज़ाइनर मास्क हो भी तो क्या ( अनलॉक २.० ) दसवाँ दिन

अब कोरोना के बाद से जिंदगी ही नहीं हम लोगों का पहनावा भी बदल रहा है । पहले जहाँ साड़ी ,लहगां,कपड़ा वग़ैरा के साथ मैचिंग ज्वैलरी पहनी जाती थी तो वहीं अब डिज़ाइनर मास्क भी पहने जायेंगे । कोरोना के बाद पहले तो वो मास्क मिलने शुरू हुये जिनसे कोरोना से बचा जा सकता था मतलब एन ९५ । और इनके अलावा काले ,हरे ,सफ़ेद रंग के भी मास्क मार्केट में मिलते थे । पर फिर धीरे धीरे लोगों ने घर में ही तीन लेयर का कपडें का मास्क बनाना शुरू किया । और बहुत लोगों ने तो कपड़े और साड़ी से मैचिंग मास्क भी बनाया । और आजकल तो ये हाल है कि हर तरह के एक से बढ़कर एक डिज़ाइनर मास्क भी बनने और मिलने लग गये है । कभी कभी तो फेसबुक खोलते ही मास्क का एड दिखाई देता है । 😁😷 पर मास्क पहनकर कितने भी अच्छे से तैयार हो लो वो बात नहीं आयेगी । अभी हाल ही में हमने एक वीडियो देखा था जिसमें सारी महिलायें खूब सुंदर कपड़े वग़ैरा पहनी हुई थीं और किसी ने गोल्डन तो किसी ने सिल्वर तो किसी ने ड्रेस से मैचिंग कलर के मास्क पहने हुये थे और जैसा कि पार्टी में होता है डी.जे बज रहा था और सब डाँस कर रही थी । अब कहने को तो सबने स्ट

आई मेकअप हुआ ज़रूरी 😁 ( अनलॉक २.० ) नवाँ दिन

जी हाँ 😁 हमें तो कुछ ऐसा ही लग रहा है कि कोरोना के चलते अब आई मेकअप सबसे अहम और ज़रूरी हो जायेगा । क्योंकि कोरोना के कारण मास्क भी अब हम लोगों के कपड़ों की तरह ही हो गया है । अब जब हम मास्क पहनते है तो आधे से ज़्यादा चेहरा तो मास्क ही ढक लेता है और नज़र आती है आँखें । तो अब तो सबसे ज़्यादा ध्यान आँखों के ही मेकअप करने पर रहेगा । अब हम जो कभी भी आई मेकअप नहीं करते थे पर हमें भी अब ये सीखना पड़ेगा । क्योंकि हमें तो हमेशा से ही लिपस्टिक लगाना ज़्यादा पसंद रहा है । 😊 पर मास्क के कारण लिपस्टिक लगाना कम करना पड़ेगा क्योंकि लिपस्टिक लगाने के बाद मास्क पहनने में सारी लिपस्टिक मास्क में लग जाती है । 😛 अब लिपस्टिक भले ना लगाओ क्योंकि मास्क तो पहनना ही होगा पर आँखों को जरूर सजाना होगा । वरना तैयार होना अधूरा लगेगा । अब तो आई लाइनर ,मसकारा, आई शैडोज़ रखने पडेगें । 🤗 क्या कोरोना तुमने अच्छी मुसीबत कर दी है । खामखां में । 😇

रील और रियल लाइफ़ में अंतर ( अनलॉक २.० ) आठवाँ दिन

कल दोपहर में जब अचानक पतिदेव ने कहा कि एक और हीरो इस दुनिया को छोड़ कर चला गया तो हमारा पहला रिएक्शन था कौन और क्या कोरोना से । तब पतिदेव ने सुशांत सिंह राजपूत के सुसाइड की बात बताई । क्योंकि इंटरनेट पर ये ख़बर आ चुकी थी । पर ये ख़बर सुनकर यक़ीन नहीं हो पाया तो टी.वी चलाया तो वहाँ भी यही ख़बर दिखा रहे थे कि सुशांत सिंह राजपूत ने डिप्रेशन के चलते सुसाइड कर लिया । ये ख़बर सुनकर बहुत अजीब भी लगा और दुख भी हुआ । और उसके सुसाइड करने से लगा कि भले इंसान के पास रूपया ,पैसा,नाम,शोहरत ,ज़मीन जायदाद क्यूँ ना हो पर अगर मन ही शांत नहीं है तो सब कुछ बेकार । कहीं पढ़ा था कि सुशांत सिंह ने चाँद पर भी ज़मीन ख़रीदी थी । अब ये कितना सच कितना झूठ हम नहीं जानते है । सुसाइड करना तो हमारी नज़र में बहुत ही ग़लत है क्योंकि सुसाइड किसी समस्या का हल नहीं बल्कि परिवार के लिये जीवन भर का दुख होता है । ख़ुद तो सुसाइड कर लिया पर क्या अपने परिवार के लिये एक बार भी नहीं सोचा कि उन क्या बीतेगी । और सुसाइड क्यूँ किया इसका कारण ही जानने में सारी जिंदगी निकल जाती है । पिछले साल सुशांत सिंह की फ़िल्म छिछोरे

गुलाबो सिताबो ( अनलॉक २.० ) सातवाँ दिन

कल हमने अमिताभ बच्चन और आयुषमान खुराना की गुलाबों सिताबो देखी । सुजीत सरकार ने बनाई है । वैसे इस पिकचर को देखते हुये हमें अपने पुश्तैनी चार मंज़िला घर जो कि बनारस के नदेसर में है उसकी बहुत याद आई क्योंकि वहाँ भी कुछ ऐसे ही किरायेदार रहते है । 😁 खैर चलिये फ़िल्म की बात करते है । फ़िल्म की कहानी बहुत ही सिम्पल है पूरी फ़िल्म एक हवेली फ़ातिमा महल के लिये है । औरैया फ़िल्म में लखनऊ शहर दिखाया गया है । इसमें अमिताभ बच्चन मिर्ज़ा के रोल में और आयुषमान बाँके के रोल में है । कैसे मिरज़ा जो मालिक है भी और नहीं भी और बाँके जो किरायेदार है । कैसे दोनों की नोक झोंक चलती रहती है हर छोटी बडी बात के लिये । 😁 अमिताभ बच्चन ने तो हमेशा की तरह बहुत ही अच्छी एक्टिंग की है । और मिरज़ा के खड़ूस किरदार को बख़ूबी निभाया है । पर पूरी फ़िल्म में जिस तरह से वो एक अजीब से स्टाइल से चलते है वो कमाल का है । घुटने थोडा सा मोड़कर चलना अमिताभ बच्चन जैसे लम्बे क़द के व्यक्ति कि लिये मुश्किल जरूर रहा होगा । आयुषमान खुराना को तो देखकर ऐसा लग रहा था मानो वो पक्का यू.पी का ही रहने वाला हो । चाल ढाल ,कपड़े

कभी कभी मेरे दिल में ( अनलॉक २.० ) छठां दिन

कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है कि कोरोना ने हमारी जिंदगी ही नहीं बदली बल्कि जिंदगी का नज़रिया ही बदल दिया है । कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है कि फिर कब हम दोस्तों से गले मिल पायेगें कब हम दीदी लोगों के घर जा पायेंगें । कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है कब बिना मास्क के हम आज़ादी से घूमेंगें कब बेफ़िक्री से शॉपिंग और मॉल घूमने जायेगें । कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है कि आख़िर कब तक हम घरों में बंद रहेंगें आख़िर कब तक हम आत्म निर्भर बनते रहेंगें । कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है कि ये खयाल शायद मेरे ही नहीं हम सबके दिल में ये खयाल आते है । 😏😒😫☹️

यीस्ट भी बडे कमाल की चीज़ है (अनलॉक २.० ) पाँचवां दिन

जानते जानते है आप लोग यीसट का इस्तेमाल करते आ रहें है पर हमने तो अभी हाल में ही इसका इस्तेमाल शुरू किया है ।और वाक़ई ये बडे कमाल की चीज़ है । अब वैसे तो हमारा फ़ंडा है कि अगर सब कुछ घर में ही बनायेंगें तो बाज़ार से क्या मँगायेंगे । पर इस लॉकडाउन और अनलॉक ने हमारी सोच थोड़ी क्या काफ़ी बदल दी है । अब लॉकडाउन के चलते हमने खूब मिठाइयाँ बनाई और अभी भी बना रहें है । पर अनलॉक में हमने कुकिंग का ट्रैक थोडा बदल दिया है और अब हमने बन ,पाव और ब्रेड वग़ैरा भी बनाने में हाथ आज़माना शुरू किया है । ( और मज़े की बात ये सब बनाने में बेटे को भी मजा आता है । 😂 ) और ये सब बनाने में यीस्ट का बड़ा योगदान है । क्योंकि यीस्ट के बिना ये सब बनाना जरा मुश्किल होता है । और यीस्ट से फटाफट ताज़ा बन या ब्रेड बन जाती है । फटाफट मतलब ढाई तीन घंटे में । 😃 एक बात तो है लॉकडाउन और अनलॉक में और चाहे जो हो पर नई नई चीज़ें बनाने में मजा खूब आने लगा है । और कभी कभार सही चीज़ नहीं बनती है पर जब बढ़िया बनती है तो जी ख़ुश हो जाता है । 😁

आजकल तरबूज कितने ज़्यादा मीठे होते है ( अनलॉक २.० ) चौथा दिन

आज सुबह तरबूज काटते हुये उसका एक टुकड़ा मुँह में डाला और उसकी मिठास से हम सोचने लगे कि पहले तरबूज इतने लाल और मीठे नहीं मिलते थे । और बस गरमियों में ही तरबूज मिला करते थे । पर अब तो तरबूज पूरे साल मिलता है । वो हल्के हरे रंग वाले तरबूज तो कम ही दिखते है । सात आठ किलो वाले तरबूज तो विरले ही मिलते है । अब तो ज़्यादातर गाढ़े हरे रंग वाले ( हाई ब्रीड ) दो - चार किलो वाले तरबूज ही मिलते है । हमें खूब अच्छे से याद है कि जब हम छोटे थे तो हमेशा मम्मी तरबूज ख़रीदने से पहले उसे थोडा सा कटवाकर देखती थी कि तरबूज अंदर से लाल है या नहीं । और तरबूज अगर फीका होता था तो अकसर उस छोटी कटी हुई जगह पर मम्मी चीनी डाल देती थी ताकि तरबूज मीठा हो जाये । 😋 और हमने भी बहुत सालों तक इसी तरह तरबूज का रंग चेक किया और ऐसे ही चीनी डालकर तरबूज को मीठा भी बनाया है । 😃 पर अब तरबूज को चीनी डालकर लाल और मीठा करने की ज़रूरत नहीं है । क्यों कि इधर पिछले कुछ सालों से तरबूज का लाल रंग और चीनी से भी अधिक मिठास बडी आम बात हो गई है । कभी कभार ही अंदर से लाल नहीं होता है । क्या आपको भी ऐसा लगता है ।