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Showing posts from 2010

रवीश जी पूजा जी और पाबला जी का शुक्रिया

आज बड़े दिनों बाद अपना इ-मेल चेक किया तो पूजा जी और पाबला जी ने हमारे ब्लॉग सवा सेर शौपर पर जो कमेन्ट और लिंक छोड़ा था उसे पढकर तो हमारा दिल बाग़-बाग़ हो गया।और इसके लिए आप दोनों का शुक्रिया । अपने ब्लॉग का जिक्र अखबार मे पढ़कर हमारा खुश होना जायज है । रवीश जी आपका शुक्रिया जो आपने दैनिक हिन्दुस्तान के ब्लॉग वार्ता मे बड़े ही खूबसूरत अंदाज मे हमारे ब्लॉग के बारे मे लिखा । अपनी मसरूफियत की वजह से हमारा इस ब्लॉग पर लिखना कुछ कम हो गया था पर आज इस ब्लॉग वार्ता को पढ़कर दोबारा जोश आ गया है। :) तो एक बार फिर से आप लोगों का धन्यवाद।

आज साक्षरता दिवस है पर क्या हम ब्लॉगर साक्षर है ?

आज साक्षरता दिवस है । क्या साक्षरता का मतलब सिर्फ पढना लिखना ही आना है ।नहीं हमे ऐसा नहीं लगता है क्यूंकि हम सब पढ़े-लिखे जो अनपढ़ों की तरह व्यवहार करते है तो क्या हम लोगों को भी साक्षर होने की जरुरत नहीं है। पूरे देश मे जोर-शोर से साक्षरता दिवस मनाया जा रहा है। पर क्या आप लोगों को नहीं लगता है कि ब्लॉग जगत मे भी हम सभी को साक्षर होने की आश्यकता है । अब आप लोग कहेंगे कि कमाल है आप कैसी बात कर रही है अगर हम ब्लॉगर पढ़े-लिखे नहीं होते यानी कि साक्षर नहीं होते तो ब्लॉगिंग कैसे करते। अरे भाई साक्षर होने का मतलब ये तो नहीं होता है कि आप ने किसी को भी खासकर महिलाओं को कुछ भी कहने का अधिकार पा लिया है। ब्लॉगिंग का पिछले २ सालों का इतिहास देखा जाए तो जिस तरह से महिलाओं के लिए अपशब्द इस्तेमाल हुए है वो हमारे साक्षर होने का पुख्ता सबूत देते है । हिंदी ब्लॉगिंग के शुरूआती दिनों मे पुराने और जानकार लोग यही कोशिश कर रहे थे कि ज्यादा से ज्यादा लोग हिंदी मे ब्लॉगिंग शुरू करे और जिस तरह अंग्रेजी ब्लॉगिंग से लोग इतने बड़े पैमाने पर जुड़े है उसी तरह लोग हिंदी ब्लॉगिंग से भी जुड़े । और आज हिंदी

एक सुन्दर शाम मिनाक्षी और रचना के साथ

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अब यूँ तो दिल्ली मे मिनाक्षी और रचना से मिले हुए तकरीबन एक महीना हो गया है पर इस पर पोस्ट देर से लिख रहे है क्यूंकि दिल्ली मे रहते हुए कुछ ज्यादा व्यस्त हो गए थे और अब चूँकि हम ईटानगर आ गए है तो सोचा कि इस मुलाकात पर पोस्ट लिखी जाए । पिछले ३ साल से हम जब भी दिल्ली जाते है रचना और रंजना से से जरुर बात होती थी और मिलने का भी कई बार कार्यक्रम बना पर हम लोग कभी मिल नहीं पाए । हर बार कि तरह इस बार भी जब हम दिल्ली मे थे तो रचना और रंजना से बात की तो पता चला की रंजना तो दिल्ली से बाहर गयी हुई थी पर रचना से बात हुई तो पता चला की मिनाक्षी भी उन दिनों दिल्ली आई हुई थी । तो मिनाक्षी से भी बात हुई और मिलने का कार्यक्रम बना । और मिलने की जगह हमारा घर रक्खा गया और दोपहर बाद यानी ३ -४ बजे का रक्खा गया। पहले इसे ब्लॉगर मीट की तरह रखने की सोची गयी पर जिनके नंबर थे वो या तो busy थे या दि ल्ली से बाहर थे और बाकी लोगों से संपर्क नहीं हुआ। हाँ मनविंदर जी ने भी आने को कहा था पर उस दिन उन्हें कुछ काम आ गया था इसलिए वो नहीं आई थी। खैर हम तीनो ही पहली बार मिल रहे थे ये अलग बात है कि ब्लॉग

कॉमन वेल्थ गेम्स क्वींस बैटन रिले ( C W G queen's baton relay in itanagar)

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अब चाहे जितने भी scam हो कॉमन वेल्थ गेम्स को लेकर पर जिस भी राज्य मे क्वींस बैटन आती है वो पूरा राज्य जोश मे भर जाता है । अब जैसे जुलाई मे जब क्वींस बैटन यहां आई तो ऐसा ही कुछ अरुणाचल मे भी हुआ था । जैसा कि हम सभी को पता है कि इस साल ३ अक्तूबर से दिल्ली मे कॉम न वेल्थ गेम्स होने वाले है और इसके लिए लन्दन से क्वीन एलिजाबेथ 2 ने खिला ड़ियों के लिए स न्देश इस बैट न मे भेजा है और इस सन्देश को ३ अक्तूबर को दिल्ली मे खेलों के उदघाटन समारोह मे पढ़ा जाएगा । क्वीन के सन्देश के साथ इस बैटन ने २९ अक्टूबर २००९ मे बकिंघम पैलस से अपना सफ़र शुरू किया । ये बै टन ७० देशों और पूरे भारत वर्ष मे घूमने के बाद ३ अक्टूबर को दिल्ली पहुंचेगी । इस बैटन के साथ तकरीबन १० - १५ लोगों की टीम चलती है । इस टीम को जनरल कदी यान लीड कर रहे थे । इस बैटन की खासियत ये है

ईटानगर मे स्वतंत्रता दिवस समारोह

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कल १५ अगस्त को सारे भारत वर्ष की तरह ईटानगर मे भी स्वतंत्रता दिवस काफी जोश से मनाया गया। हालाँकि यहां एक दिन पहले बारिश हुई थी जिसकी वजह से १५ अगस्त को मौसम काफी सुहावना था । हाँ थोड़ी - थोड़ी बूंदा - बादी हो रही थी पर उससे लोगों के जोश और उत्साह मे कोई कमी नहीं थी।क्यूंकि लो ग छाता लगाकर परेड देख रहे थे । सुबह - सुबह ६ जब हम लोग उठे तो देखा सर्किट हाउस मे ( हम अभी यही रह रहे है ) बड़ी चहल - पहल दिखी और छोटे - छोटे बच्चे तैयार होकर इकठ्ठा हो रहे थे पूछने पर पता चला कि सभी बच्चे झंडा फहराने के लिए इकठ्ठा हो रहे है। तो सर्किट हाउस वालों से पूछने पर पता चला कि सात बजे झंडा फहराया जायेगा। बस फिर हम अपना कैमरा लेकर तैयार हो गए फोटो खींचने के लिए। और ठीक ७ बजे सर्किट हाउस के जे . इ . ने झंडा फहराया और सभी ने राष्ट्रीय गान भी गाया और उसके बाद जे . इ . ने एक छोटा सा भाषण भी दिया और फिर बच्चों को लड्डू और रसगुल्ले बांटे गए ।

सांसदों और विधायकों को टोल टैक्स देने की जरुरत क्यूँ नहीं ?

हमारे देश के सांसद और विधायक ऐसे है जो देश और जनता के लिए दावा तो कुछ भी करने का करते है पर उनकी जेब से कुछ जाए ये उन्हें मंजूर नहीं है। अरे आप को यकीन नहीं है पर ऐसा ही है। कल मंत्री मंडल की बैठक मे ये निर्णय लिया गया कि अब से सांसदों और विधायकों को टोल टैक्स नहीं देना पड़ेगा । अरे पर आखिर ऐसा फैसला लिया क्यूँ गया ? क्या आम जनता के पास इफरात धन-दौलत है और ये सांसद और विधायक टोल टैक्स देना भी afford नहीं कर सकते है। जबकि किसी भी राज्य या शहर मे देखे तो गाड़ियों पर अपनी पार्टी के झंडे लगाए ये फर्राटे से घूमते नजर आते है। जहाँ से भी जनता को लूटने का मौका मिल भर जाए , बस । जहाँ नेताओं को अपने लिए कुछ भी फैसला लेना होता तो फटाफट सर्व सम्मति से निर्णय ले लिए जाता है। पर सवाल ये है कि अगर ये सांसद और विधायक टोल टैक्स नहीं देंगे तो फिर आम जनता क्यूँ दे। क्या सारे तरह के टैक्स देने का जिम्मा सिर्फ आम जनता का ही है। ऐसा भला ये देश के लिए क्या कर रहे है जो इन्हें टोल टैक्स ना देने की छूट दे दी गयी है।

नबोग्रोह मंदिर (navagraha temple)

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आम तौर पर हम गौहाटी सिर्फ फ्लाईट से आने-जाने के लिए ही जाते है पर वहां रुकते नहीं थे। पर मई के शुरू मे हम ३-४ दिन के लिए गौहाटी गए थे तो जाहिर है कि जब ४ दिन रुकेंगे तो गौहाटी घूमेंगे भी। :) जब गेस्ट हाउस वाले से पूछा कि यहां क्या-क्या घूमने की जगह है तो एक सपाट सा उत्तर मिला कि कामख्या के अलावा तो ज्यादा कुछ नहीं है। मार्केट के बारे मे पूछने पर कहा कि बाजार बहुत दूर है । वो तो बाद मे पता चला कि बाजार सिर्फ १०-१२ कि.मी . दूर था जिसे वो लोग बहुत दूर कह रहे थे। खैर हम लोग के साथ जो सज्जन गए थे उनसे हम लोगों ने एक टूरिस्ट गाइड मंगवाई और गाईड देख कर पता चला कि जैसा लोग कहते है कि यहां कुछ घूमने के लिए नहीं है वो गलत है। सो हम लोगों ने गौहाटी के मंदिरों के साथ - साथ गौहाटी का स्टेट म्यू जी यम , आसाम ज़ू , गौहाटी के मार्केट देखने का कार्यक्रम बनाया ।और गाईड मे एक तरफ पड़ने वाली जगहों को देखने का पूरे दिन का प्रोग्राम बना। तो सबसे पहले नबोग्रोह मंदिर देखने का निश्चित हुआ और अगले दिन सुबह-सुबह

एक-दूसरे पर आक्षेप करना ही क्या ब्लॉगिंग है ?

कितने अफ़सोस की बात है कि हर कुछ दिन पर एक हंगामा होना ब्लॉग जगत का एक नियम सा बन गया है । हर बार हंगामा पिछले हंगामे से ज्यादा बड़ा होता है । कभी महिला ब्लॉगर तो कभी उनके द्वारा लिखे गए लेखों को लेकर हंगामा हो जाता है । और कल तो हद ही हो गयी । कल हमने कई दिन बाद जब ब्लॉग वाणी खोला तो हम कुछ चकरा से गए क्यूंकि कई पोस्टें समीर जी , ज्ञान जी और अनूप जी के नाम के साथ लिखी दिखी । और उन्हें पढ़कर अफ़सोस तो हुआ साथ ही बहुत दुःख भी हुआ । कि आखिर हम लोग किस तरह कि ब्लॉगिंग कर रहे है जिसमे एक - दूसरे पर कीचड उछालना क्या सही है । जब हमने २००७ मे ब्लॉगिंग शुरू की थी तब आज की तुलना मे ब्लोगर जरुर बहुत कम थे ( शायद ५०० - ६०० ) पर इस तरह का रवैया कभी एक - दूसरे के लिए नहीं देखा था । हाँ छोटी - मोटी नोक - झोक होती रहती थी जो ब्लॉगिंग और ब्लॉगर दोनों के लिए जरुरी और अच्छी होती थी । पर अब इस नोक - झोक का स्वरुप

गंगा गोमती ट्रेन का ऐसा हाल

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फरवरी मे हम कुछ दिनों के लिए इलाहाबाद गए थे और वहां से हमने लखनऊ अपनी दीदी के यहां जाने का कार्यक्रम बनाया था। अब इलाहाबाद से लखनऊ जाने के लिए गंगा गोमती ट्रेन ठीक होती है।हालाँकि इस ट्रेन को पकड़ने मे सुबह पूरी बर्बाद हो जाती है। क्यूंकि ६ बजे की ट्रेन के लिए ५ बजे ही उठाना जो पड़ता है। :) और इसमें एक और प्रोब्लम है कि ये ट्रेन प्रयाग स्टेशन पर बस २ मिनट रूकती है जबकि ज्यादा जनता प्रयाग से ही इस ट्रेन मे चढ़ती है । तो हम लोगों ने ए.सी.चेयर कार का टिकट बुक किया। और ट्रेन के समय स्टेशन पर पहुँच गए और इंतज़ार करने लगे। उस दिन अपनी किस्मत ही खराब थी अचानक ही ट्रेन आने से चंद मिनट पहले खूब आंधी और बारिश शुरू हो गयी और जब ट्रेन आई तो पता चला कि ए.सी. वाला कोच एकदम पीछे है। जबकि कुली ने कहा था कि ए.सी.कोच जहाँ हम लोग खड़े थे , वहीँ आता है। खैर जब तक हम लोग कोच तक पहुंचे तो ट्रेन ने धीरे-धीरे चलना शुरू कर दिया था । एक तो बारिश ऊपर से चलती हुई ट्रेन और कुली उसी चलती ट्रेन मे सामान चढाने लगा और जो हम लोगों को बैठाने गया था वो बोला दीदी आप लोग चढ़ जाइए । तो हम ल

स्मार्ट गार्डनर

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अब आजकल तो सभी जगह गर्मी की बहार सी आई हुई है और यहां भी जब कभी सूरज देवता नजर आते है तो अपने पूरे तेज के साथ नजर आते है यानी कड़क धूप । वैसे यहां पर बारिश मे तो लोग छाता लेकर चलते ही है पर अगर धूप निकली हो तब तो जरुर ही छाता लेकर चलते है। क्यूंकि धूप से बचना भी बहुत जरुरी होता है क्यूंकि यहां बिलकुल झुलसा देने वाली धूप होती है। और वो शायद इसलिए क्यूंकि यहां कोई प्रदुषण नहीं है । धूप के समय हर तरफ रंग-बिरंगी छतरी नजर आती है। :) यहां पर बागीचे और पार्कों मे काम करने वाली महिलायें भी इस बात का पूरा ध्यान रखती है । यूँ तो ये लोग पूरे दिन काम नहीं करती है बस सुबह के २ घंटे काम करती है और उसके बाद चली जाती है। ( अभी तक तो हमने इतनी देर ही इन्हें काम करते देखा है ) फिर भी ये ख्याल रखती है और अपना धूप से बचाव करती है और इसके लिए वो कैप,छाता,और सिर पर कपडा वगैरा बाँध करके ही काम करती है। ये बहुत अच्छी बात ये है । वैसे यहां जो औरतें मजदूरी करती है वो भी हमेशा अपना मुंह और सिर कपडे से बांधे रहती है धूप और धूल - मिटटी से

९ बच्चों की मम्मी हमारी मौसी :)

अब बचपन के दिन तो हरेक के जीवन के सबसे सुखद और सुन्दर होते है ,इसमें तो कोई दो राय नहीं है। और बीते हुए दिन जब याद आते है तो कभी-कभी लगता है कि काश वो दिन फिर से दोबारा आ जाए। क्यूँ हम गलत तो नहीं कह रहे है ना। :) आज अचानक हमे ये किस्सा याद आ गया । बात तो ७० के दशक की है । उस जमाने मे गर्मी की छुट्टियाँ बिताने के लिए कभी हम ननिहाल (फैजाबाद ) कभी ददिहाल (बनारस) या फिर अपनी छोटी मौसी के यहां (वो जहाँ भी रहती थी क्यूंकि मौसाजी का ट्रांसफर होता रहता था ) जाते थे , कभी ट्रेन से तो कभी कार से । और उस समय अक्सर ऐसा होता था कि अगर मौसी हम लोगों के यहां इलाहाबाद आती थी तो उनके वापिस लौटने पर हम लोग भी कुछ दिन के लिए उनके यहां चले जाते थे। या अगर हम लोग उनके यहां जाते थे तो हम लोगों के वापिस लौटने पर वो लोग हम लोगों के साथ इलाहाबाद आते थे । वैसे ये बड़ा ही रुटीन फीचर था। :) ऐसी ही एक गर्मी की छुट्टी मे हम चारों बहने मौसी के यहां सीतापुर गए थे और जब कुछ दिन रहने के बाद वहां से इलाहाबाद वापिस लौटने लगे तो मौसी भी अपने पाँचों बच्चों के साथ हम लोगों के साथ चली। उस समय मौसी बहुत

राजीव प्रताप रूडी बन गए है सह -पायलट

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जी हाँ राजनीति के साथ-साथ राजीव प्रताप रूडी अब सह-पायलट भी बन गए है। आजकल वो सह-पायलट की हैसियत से इंडिगो एयर लाईन्स के हवाई जहाज उड़ा रहे है। है ना चौंकाने वाली बात । कल इंडियन एक्सप्रेस अखबार मे जब हमने ये खबर पढ़ी थी। तो हम भी कुछ चौंक गए थे । खैर आप भी खबर पढ़िए और उनकी ये फोटो देखिये । अब ई-पेपर मे तो फोटो नजर नहीं आ रही है इसलिए हम कैमरे से खींच कर यहां लगा दे रहे है। वैसे एक बात है राजीव रूडी पायलट की ड्रेस मे काफी स्मार्ट लग रहे है । क्यूँ ठीक कह रहे है ना। :)

हाय ! जनता के ये नेता है .....

कल भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली मे बढ़ती महंगाई के विरोध मे सरकार के खिलाफ रैली थी जिसमे एक दिन पहले से ही ५ लाख लोगों के जमा होने की आशंका जताई जा रही थी पर शायद ३ लाख लोग इस रैली मे शामिल हुए थे। ऐसा न्यूज़ मे सुनने को मिला । दिल्ली जहाँ आजकल गर्मी का काफी प्रकोप है ऐसे मे दिल्ली मे रैली का होना और फिर उसमे बी.जे.पी.के बड़े-बड़े नेताओं का होना और कार्यकर्ताओं या यूँ कहें की दूसरे शहरों से भर-भर कर बसों मे जो लोग लाये जाते है यानी भारी और अपार भीड़ का जुटना। ऐसा लग रहा था की यू . पी . ए . सरकार की तो शामत ही आ जायेगी इस रैली के साथ ही। पर जो सोचो वैसा होता कहाँ है । दिल्ली मे सूरज देवता कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो रहे थे जिसके फलस्वरूप बी.जे.पी.के अध्यक्ष गडकरी जी को चक्कर आया और वो बेहोश हो गए । बेचारे गडकरी जी जहाँ सूर्य देव की तपन को बर्दाश्त नहीं कर पाए जबकि वो खुली गाडी मे चल रहे थे पैदल नहीं । वहीँ आम जनता पैदल चल रही थी , पूरे -जोश से नारे लगाती घूम रही थी। और बाद मे गडकरी जी को एयर कंडी शंड कार मे उनके घर ले जाया गया

बारिश बादल और कोहरे की आँख-मिचौली

आजकल दिल्ली और उत्तर भारत मे बहुत ज्यादा गर्मी पड़ रही है । आज सुबह ही बेटे से बात हुई तो उसने कहा कि दिल्ली मे गर्मी के मारे बुरा हाल है ।और उसके ठीक उलट यहां ईटानगर मे बारिश के मारे बुरा हाल है ।यहां भी मार्च के दूसरे हफ्ते मे बहुत गर्मी पड़नी शुरू हो गयी थी पर मार्च के आखिरी हफ्ते से जो बारिश शुरू हुई है कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही है । कभी- कभी अचानक ही खूब जोर-जोर से बारिश शुरू हो जाती है तो कभी अचानक बादल या यूँ कहें कि बिलकुल ऐसा घना कोहरा घिर आता है कि सब कुछ उस बादल और कोहरे की धुंध के पीछे छिप जाता है और चंद क्षणों के बाद ही बादल एकदम छंटने लग जाता है और एक खूबसूरत नजारा दिखता है । :) और ऐसा नजारा यहां अक्सर क्या रोज ही देखने को मिल रहा है। इस खूबसूरत नज़ारे का हमने विडियो बनाया है ,आप भी देखिये। आप लोग गर्मी से परेशान है और हम बारिश से । :)

कब तक इसी तरह अजन्मी बच्चियों को मारते रहेंगे ?

कल न्यूज़ मे देखा कि किस तरह अहमदाबाद मे १५ कन्या भ्रूण कचरे मे मिले।जो बहुत ही शर्मनाक और दुखद है कि आखिर इतनी सारी अजन्मी बच्चियों को मारने से उन माँ-बाप और डॉक्टर को क्या मिला। कितने अफ़सोस कि बात है कि एक तरफ तो देश मे लड़कियों को आगे बढाने की बात की जाती है तो वहीँ दूसरी ओर इस निर्ममता से कन्याओं की हत्या की जाती है। ऐसे डॉक्टर जो इस तरह के जघन्य अपराध करते है और जिनके लिए पैसा ही सब कुछ होता है उनसे तो उनकी मेडिकल की डिग्री वापिस ले लेनी चाहिए । डॉक्टर जिन्हें भगवान का रूप माना जाता है वही हत्यारे बन जाते है ।जबकि उन्हें डॉक्टर बनने पर शपथ भी दिलाई जाती है कि वो कभी भी कुछ गलत काम नहीं करेंगे । पर रुपया कमाने की लालच मे वो सब कुछ भूल जाते है । ऐसे डॉक्टर जिनकी अपनी बेटी भी होती होंगी क्या एक क्षण के लिए भी उनका दिल उन्हें धिक्कारता नहीं है ऐसा करने के लिए। इतनी अजन्मी बच्चियों को मारने से मिला रुपया-पैसा कैसे उन्हें फलता-फूलता है। ८० के दशक मे एक बंगाली फ़िल्म देखी थी कन्या भ्रूण पर आधारित ,और तब लगा था कि लोग किस तरह की मानसिकता के साथ जीते है जहाँ बेटी का जन्म

अब इसमें यू.पी.बिहार वाली क्या बात है ?

अरुणाचल प्रदेश मे ज्यादातर बैंक के ए. टी.एम. मे अलग लाईन जैसा कुछ system है शुरू मे ये हमें पता नहीं था। अब वैसे ए.टी.एम मे महिला और पुरुष की अलग लाईन का कोई तुक तो नहीं बनता है ।और कहीं ऐसा देखा भी नहीं था। यहां ए.टी.एम मे कोई भी गेट के बाहर नहीं इंतज़ार करता है बल्कि सभी लोग अन्दर लाईन लगा कर खड़े रहते है ।बिलकुल एक के पीछे एक इतना पास-पास खड़े रहते है कि एक दूसरे का पिन नंबर भी देख सकते है। ये जरुर हमारे पतिदेव ने बताया था। वैसे ए.टी.एम.के बाहर लिखा भी रहता है तो भी हर कोई अन्दर आ जाता है । खैर ये जनवरी की बात है जब हम नए-नए थे, एक दिन हम एक बैंक के ए.टी.एम. मे पैसे निकालने गए और चूँकि वहां ३-४ लड़के अन्दर खड़े थे इसलिए हम शराफत मे गेट पर खड़े होकर अपने नंबर का इंतज़ार करने लगे । ए . टी . एम के अन्दर एक महिला भी थी जो कभी ए . टी . एम . मशीन के पास जाती और कभी वापिस गेट पर आती । हम समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर माजरा क्या है । फिर उसने हमसे पूछा कि क्या हम उसकी पैसे निकालने मे मदद कर देंगे । तो हमने हाँ कह दिया । तब

अमिताभ बच्चन को लेकर इतनी नाराजगी क्यों ?

कल से सभी न्यूज़ चैनल यही खबर दिखा रहे है की मुंबई के बांद्रा सी लिंक के उदघाटन मे अमिताभ बच्चन कैसे गए और उन्हें किसने बुलाया । अरे भाई अगर चले भी गए तो ऐसा कौन सा पहाड़ टूट पड़ा। आखिर अमिताभ बच्चन का अपना भी तो कोई वजूद है और फिर उन्हें इस सदी का महानायक भी कहा जाता है। तो अगर सदी के महानायक पुल के उदघाटन मे चले गए तो इसमें कांग्रेस को अपना इतना अपमान क्यूँ महसूस हो रहा है। और फिर जब कांग्रेस के नेता और मंत्री उससे हाथ मिलाने मे जरा भी नहीं सकुचा रहे थे तो फिर बाद मे इस बात से मुकर जाना कि अमिताभ बच्चन को उन्होंने नहीं बुलाया था ,कहाँ की शराफत है। दुनिया भर मे अमिताभ बच्चन को लोग इतना सम्मान देते है पर अपने ही देश मे इस तरह से अपमान होना ,कहाँ तक सही है।