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ब्लॉग और बॉलीवुड

आजकल जिस धड़ल्ले से बॉलीवुड के सितारे ब्लॉगिंग मे उतरने लगे है कि ब्लॉगिंग या ब्लॉग जगत को अब ब्लौगीवुड कहा जा रहा है।हालांकि अभी तो कुछ ही फिल्मी सितारे ब्लॉग जगत मे आए है जैसे आमिर और अमिताभ बच्चन और अब तो सुना है कि जूही चावला भी अपना ब्लॉग बनाने जा रही है। पर लगता है कि अब जल्दी हो दूसरे सितारे भी इस मे कूदने को तैयार है। अमिताभ बच्चन अपने दिल कि बात ब्लॉग पर लिख रहे है वो चाहे राज ठाकरे से संबंधित हो या शाह रुख से। और अब तो अमिताभ ने शाह रुख और उनके बीच की ग़लत फहमी को दूर करने की पहल भी कर दी है अपने ब्लॉग मे। आमिर अपने ब्लॉग पर अपने कुत्ते जिसका नाम शाह रुख है उस के बारे मे लिख रहे है कि उनका doggi क्या-क्या करता है। और वो उसे कैसे बिस्कुट खिलाते है।कोई कहता है कि आमिर अपने भांजे की फ़िल्म को प्रमोट करने के लिए अपने ब्लॉग का इस्तेमाल कर रहे है ,तो कोई कहता है कि वो अपनी फ़िल्म गजनी को प्रमोट करने के लिए ब्लॉग का इस्तेमाल कर रहे है। पर लगता है कि आमिर अपने फिल्मी दुश्मनों को नीचा दिखाने के लिए ब्लॉग का इस्तेमाल कर रहे है। अब आमिर जैसे perfectionist को इतनी घटिया हर...

आख़िर आमिर खान ने अवार्ड ले ही लिया.

आमिर खान और अवार्ड !! इतने सालों से आमिर खान किसी भी अवार्ड फंक्शन मे ना तो जाते थे और ना ही कोई अवार्ड लेते थे।वो चाहे फ़िल्म फेयर अवार्ड हो या ज़ी सिने अवार्ड हो या फ़िर आई फा अवार्ड ही क्यों ना हो। आमिर ने अपना उसूल बना रखा था इस तरह के अवार्ड फंक्शन से दूर रहने का। पर कल आमिर ने अपने उसूल को तोड़ा । क्या कहा आपको यकीन नही हो रहा है तो इस लिंक पर क्लिक करिये और ख़ुद देखिये और पढिये । और कल आमिर ना केवल अवार्ड फंक्शन मे गए बल्कि ख़ुद ही अवार्ड भी लिया । आमिर खान को ये स्पेशल अवार्ड उनके हिन्दी सिनेमा मे किए गए योगदान के लिए दिया गया है । कल मुम्बई मे हुए एक समारोह मे लता मंगेशकर ने मास्टर दीनानाथ मंगेशकर अवार्ड आमिर खान को दिया ।और अवार्ड लेते हुए आमिर भी खुश ही लग रहे थे।

हो गई ओलम्पिक मशाल की दौड़

ओलम्पिक मशाल और तिब्बतियों के विरोध के बीच मे ओलम्पिक मशाल का भारत मे आना और सही सलामत ओलम्पिक दौड़ का आयोजन हो जाना भारत सरकार इसे एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर मान रही है । पर क्या वाकई ये ओलम्पिक दौड़ का आयोजन सफ़ल रहा है । अब ये तो जानकार लोग ही बता पायेंगे । ओलम्पिक मशाल की दौड़ के बराबर ही तिब्बतियों ने भी एक मशाल रैली निकाली थी । कल जिस दौड़ को दोपहर एक बजे शुरू होना था वो शाम को ४ बजे शुरू हुई । और उसपर भी इतनी सुरक्षा जितनी तो शायद देश के प्रधान मंत्री या राष्ट्रपति की भी नही होती । तकरीबन १७००० सुरक्षा कर्मी लगाए गए थे । खैर मशाल की दौड़ जब शुरू हुई और जो देखने को मिला उसमें ना तो खेल भावना दिखी और ना ही लोगों या जनता मे इस ओलम्पिक मशाल की दौड़ को देखने के लिए कोई उत्साह दिखा । वैसे लोगों मे अगर उत्साह होता भी तो बेचारे सिर्फ़ सुरक्षा कर्मी को ही देख पाते क्यूंकि मशाल को देख पाना तो नामुमकिन ही था । तीन ...

तारे जमी पर ... मेरी नजर से

आख़िर कार हमने भी तारे जमीं पर कल देख ही ली।फिल्म की तारीफ तो हर देखने वाले ने की है और फिल्म है भी तारीफ के काबिल।सभी कलाकारों ने बहुत ही अच्छा अभिनय किया है खासकर दर्शील ने । हर एक किरदार को बहुत ही देख-परख कर सोच - समझ कर बनाया गया है ।टीचर और प्रिंसिपल तो ऐसे बहुत दिखते है।हर स्कूल मे ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे।माँ-बाप का बच्चों के लिए चिंतित होना भी लाजमी सी बात है। हालांकि फिल्म का अंत तो पहले ही समझ मे आ गया था पर फिर भी फिल्म देखने लायक है। पूरी फिल्म को देखने के बाद हमे ये महसूस हुआ कि इस फिल्म को माँ-बाप से कहीं ज्यादा स्कूल के टीचरों और प्रिन्सिपलों को देखनी चाहिऐ क्यूंकि बच्चे को घर मे तो एक बार माँ-बाप भाई-बहन का साथ मिल भी जाता है पर स्कूल मे बच्चा बहुत ही अकेला हो जाता है।ऐसा सिर्फ दर्शील जैसे बच्चों के साथ ही नही जिसे फिल्म मे dyslexic जैसी बीमारी थी बल्कि वो सभी बच्चे जो पढ़ने-लिखने मे जरा कमजोर होते है। तो चलिए हम इस पिक्चर से मिलते -जुलते अपने एक अनुभव को बताते है।जिन लोगों ने पिक्चर देखी है उन्हें वो सीन भी अच्छी तरह याद होगा (और जिन्होंने नही देखी है उनके ल...