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Showing posts from January, 2008

बेटियाँ आशीर्वाद या अभिशाप (१)

इधर कई दिनों से हम यही सोच रहे है की बेटी होना आशीर्वाद है या अभिशाप । अक्सर हम ऐसी बातें पढ़ते और सुनते है जहाँ बेटी का होना अभिशाप माना जाता है । ये आज से नही सदियों से चला आ रहा है । पुराने जमाने मे ज्यादा पीछे नही जाते है पर ५० साल पहले भी बेटियों के पैदा होने पर घरों मे ख़ुशी कम औए मातम ज्यादा मनाया जाता था । हर घर मे बेटे की चाहत होती क्यूंकि बडे - बुजर्गों का मानना था कि वंश तो बेटे से ही चलता है और बेटियाँ तो पराया धन होती है । हमेशा से बेटी के जन्म पर शोक मनाया जाता रहा है जबकि बेटी के पैदा होने पर हमेशा ही ये भी कहा जाता है कि लक्ष्मी आई है । पर बेटे के पैदा होने पर जश्न मनाया जाता है । और बेटे को हमेशा घी का लड्डू माना जाता रहा है । क्यों ये तो सभी जानते है । ऐसा पहले सुनते थे कि राजस्थान मे बेटी पैदा होने पर मार दी जाती थी । पर अब तो राजस्थान क्या सारे देश मे ही बेटियों की बड़ी ही निर्ममता से

आगे-आगे शहंशाह पीछे- पीछे बादशाह

शाह रुख खान हिन्दी फिल्मी दुनिया के बादशाह है तो अमिताभ बच्चन इसी हिन्दी फिल्मी दुनिया के शहंशाह है । और शहंशाह तो वो पिछले १५ - २० सालों से है । अब बेचारे शाह रुख खान आख़िर कब तक बादशाह बने रहेंगे और फिर शाह रुख करे तो क्या करें शहंशाह बनने के लिए । अब शहंशाह बनने का नुस्खा तो उन्होने हाल ही मे हुए एन . डी . टी . वी . के इन्डियन ऑफ़ द ईयर अवार्ड समारोह मे बॉस रजनी कान्त से पूछा था । और रजनीकांत ने उन्हें नुस्खा बताया भी था । अब जब आज तक ब्रिटेन के प्रिन्स चार्ल्स प्रिन्स ही है किंग नही बने :) अरे क्यूंकि क्वीन ने अभी तक गद्दी नही छोडी है । तो शाह रुख पता नही शहंशाह कभी बन भी पायेंगे या नही ये कहना मुश्किल है । अब शाह रुख पिछले ४ - ५ सालों से जाने - अन्जाने अमिताभ बच्चन के पदचिन्हों पर चल रहे है । वो चाहे फिल्में हो या फिर विज्ञापन ही क्यों ना हों । अब डॉन फिल्म इसका जीता जागता सबूत है । आज कल तो कुछ विज्ञापन जिनमे पह

गुलाबी जाड़ा और वाईन टेस्टिंग

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अब गोवा जैसी जगह मे भी जब ठंड पड़ने लगे ,सर्द हवा चलने लगे , मौसम का मिजाज कुछ बदला-बदला सा हो तो गोवा मे रहने का मजा ही कुछ और है।आजकल गोवा का तापमान १५ डिग्री सेल्सियस चल रहा है गोवा के इस गुलाबी जाड़े की वजह से दिल्ली मे ना रहने की कमी खल नही रही है क्यूंकि पिछले ४-५ सालों सेदिल्ली से बाहर ही रह रहे है।इसलिए ठंड से वास्ता जो नही पड़ रहा है।और ऐसे मौसम में वाईन फेस्टिवल का होना । :) गोवा टूरिज्म द्वारा पिछले साल की तरह इस साल भी आइनोक्स जो की गोवा का मल्टीप्लेक्स है वहां ४ दिनों (२४-२७ जनवरी ) के लिए वाईन टेस्टिंग फेस्टिवल मनाया गया। इस फेस्टिवल मे विभिन्न प्रकार की वाईन के अलावा खाने का भी खूब बढिया इंतजाम होता है।और साथ ही साथ मनोरंजन का भी पूरा इंतजाम होता है। जिसमे शास्त्रीय संगीत,फियूज्न ,western और rock music, वगैरा का शो होता है। यहां बस खाओ-पीओ और मौज करो वाला माहौल रहता है। वाईन टेस्टिंग के लिए एक अलग जगह पर इंतजाम रहता है जहाँ वाईन टेस्ट कराने के पहले वाईन के बारे मे भी जानकारी दी जाती है की वाईन कैसे बनाते है,वाईन कहाँ पर बनती है,और किस तरह के खाने के सा

ऐश्वर्या बच्चन कन्या महाविद्यालय

कल अमिताभ बच्चन ने अपनी बहु अब नाम तो हम सभी जानते है ऐश्वर्या के नाम से बाराबंकी के दौलतपुर मे ऐश्वर्या बच्चन कन्या महाविद्यालय खोलने की घोषणा की और इसके लिए पूरा बच्चन परिवार मुम्बई से बाराबंकी गया जहाँ बड़ी ही धूम-धाम से इस की घोषणा की गयी। अब बच्चन परिवार हो और अमर सिंह और मुलायम सिंह ना हो ऐसा भला कहाँ हो सकता है। और कल से बेहतर दिन तो शायद हो ही नही सकता था अरे भाई कल अमर सिंह का जन्मदिन जो था। :) वैसे तो कन्या महाविद्यालय खोलने का उनका विचार बहुत ही नेक है। और इसमे कोई दो राय भी नही है। अभी हाल ही मे अमिताभ बच्चन ने पटना की दो छोटी बच्चियों को जिन्हें उनके माँ-बाप ने छोड़ दिया था उनकी पढाई वगैरा का खर्चा भी उठाने की घोषणा की थी। क्या अच्छा हो अगर अमिताभ बच्चन अपने पिता हरिवंश राय बच्चन जी के नाम से भी कोई संस्थान शुरू करें क्यूंकि उत्तर प्रदेश मे अभी भी बहुत कुछ किया जा सकता है। कल ऐश्वर्या के नाम से महाविद्यालय खुला और आज अमर सिंह ने भी अपने नए बंगले का नाम ऐश्वर्या रख लिया।

शूटिंग ..उफ़ तौबा

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यहां शूटिंग का मतलब गन शूटिंग नही है बल्कि फिल्म की शूटिंग है।वो क्या है ना कि हम जबसे गोवा आये है अक्सर हम अपने पतिदेव से कहते रहें है की यहां पर हमें किसी फिल्म की शूटिंग होती हुई नही दिखाई पड़ती है जबकि आज कल तो आधे से ज्यादा फिल्मों (और विज्ञापनों ) मे गोवा नजर आता है पर हमें कभी शूटिंग देखने को नही मिलती है। ऐसा नही है कि हम ने पहले कभी शूटिंग नही देखी।पर क्या करें दिल है कि मानता नही। :) (शूटिंग देखे बिना) अरे भाई सत्तर के दशक मे जब पहली बार हम बम्बई घूमने गए थे तब बम्बई तो बहुत घूमे थे पर कोई शूटिंग नही देख पाए थे ।बस प्राण से मिले थे जो उस समय किसी घर मे आत्माराम नाम की फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। पर जब तक हम लोग वहां पहुंचे , शूटिंग ख़त्म हो गयी थी और उस समय प्राण ने कहा था की शूटिंग से ज्यादा बोरिंग कुछ नही होता है क्यूंकि एक shot के लिए कई-कई बार रीटेक होते है।उस समय तो चूँकि हमने शूटिंग देखी नही थी त ो उनकी बात समझ नही आई थी। अब भला ये भी कोई बात हुई की हर फिल्म मे गोवा दिखाई दे और हम एक अदद शूटिंग भी ना देखें। वैसे एक-आध बार जब भी पंजिम मे शूटिंग होती

गोवा के गणतंत्र दिवस की कुछ झलकियाँ

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आज २६ जनवरी है यानी गणतंत्र दिवस । आज सारा भारत वर्ष ५९ गणतंत्र दिवस मना रहा है।गोवा मे भी गणतंत्र दिवस जोर-शोर से मनाया जा रहा है।इस परेड को देखने के लिए गोवा के गवर्नर के अलावा के गोवा के मुख्यमंत्री,मुख्य सचिव,मंत्रिगन ,और आम जनता पंजी के कम्पाल मैदान मे एकत्रित हुई. गोवा के गवर्नर एस.सी. जमीर ने परेड का निरीक्षण किया।और उसके बाद परेड की सलामी ली जिसमे सेना के तीनों बल (थल,वायु,जल सेना ),पुलिस,एन.सी.सी.तथा स्कूल के बच्चे ने भाग लिया । सलामी के बाद गवर्नर ने लोगों को पदक प्रदान किये। और उसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हुआ जिसमे करीब डेढ़ हजार से ज्यादा बच्चों ने भाग लिया । कार्यक्रम शुरू होने के पहले तिरंगे रंग के गुब्बारे भी उडाये गए। इस कार्यक्रम का हमने विडियो बनाने की कोशिश तो की है पर विडियो ज्यादा साफ नही आया है। इसलिए हम यहां पर कुछ फोटो ही लगा रहे है। बाद मे विडियो अपलोड करेंगे। इस फोटो मे बच्चों ने देश मे फ़ैल रहे आतंक को दिखाया गया है। साढ़े पांच सौ स्पेशल चिल्ड्रेन ने इस कार्यक्रम को प्रस्तुत किया जिसमे इन बच्चों ने तीन गानों पर डांस क

डी एडिक्शन कैंप (ना कहना सीखो )

इधर कई दिनों से डी एडिक्शन पर लिखना छूट सा गया था पर आज अजित जी की पोस्ट ने हमे वापिस इस विषय पर लिखने के लिए प्रेरित किया।हमने पहले भी लिखा है कि कोई पीना क्यों शुरू करता है । अंडमान मे जब हम लोग हॉस्पिटल मे लोगों की काउन्सेलिंग करते थे तो इस बात का ध्यान रखते थे कि जो भी क्लाइंट ( मरीज ) है उसे हम लोगों से अपनी बात कहने मे कोई भी हिचकिचाहट नही होनी चाहिऐ क्यूंकि अगर वो शराब पीना छोड़ना चाहता है तभी हम लोग उसकी मदद कर सकते है और इसके लिए उसे हमे सही - सही जानकारी देनी होगी।इसके लिए हम सभी काउंसलर क्लाइंट के साथ कई सेशन करते थे । शुरुआत कुछ ऐसे होती थी। काउन्सेलर सबसे पहली बात जो क्लाइंट से पूछते थे कि आपने पीना क्यों शुरू किया ? जिसका जवाब हर कोई अलग-अलग देता था जैसे किसी ने दोस्तों के साथ तो किसी ने झगडे की वजह से वगैरा-वगैरा। और दूसरी बात जो पूछते थे कि आपने पीना कब शुरू किया ? इसका जवाब भी हर कोई अलग-अलग देता जैसे किसी ने ५ साल की उम्र से तो किसी ने ८ साल की उम्र से वगैरा-वगैरा । उसके बाद काउंसलर क्लाइंट के परिवार की जानकारी लेता जिससे उसके शराब

कुएं मे शेर

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क्या आपको यकीन नही आ रहा है की कुएं मे शेर भी हो सकता है तो लीजिये सबूत हाजिर है। :) अब बताइये कुएं और शेर से कुछ याद आया की नही। जी हाँ आप ने बिल्कुल सही समझा हम चालाक खरगोश और शेर की कहानी की ही बात कर रहे है । बचपन मे तो केवल कहानी मे पढ़ा था और अपने बच्चों को भी ये कहानी कई बार सुनाई थी पर शेर को कुएं मे देखने का मौका पहली बार लगा। कुछ पुलिस वाले दिखेंगे जो उस खरगोश को ढूंढ रहे है जिसने इस शेर को कुएं मे गिराया है। :) नोट - इस शेर को कहाँ और किस खरगोश ने गिराया ये तो हम नही जानते है क्यूंकि इस की फोटो खींचने के लिए हम कैमरा लेने जो चले गए थे ।

बुल फाईट (कौन बड़ा जानवर है)

बुल फाईट एक ऐसा खेल है जो इंसान और ( जानवर ) सांड के बीच मे खेला जाता है । या फिर दो सांडों की लड़ाई भी कराई जाती है । इस बुल फाईट के खेल को देख कर ये समझना मुश्किल हो जाता है की आदमी बड़ा जानवर है या सांड । भारत मे तो इस खेल के दोनों रुप प्रचलित है । बुल फाईट का खेल स्पेन , फ़्रांस , लैटिन अमेरिका , पुर्तगाल मे तो बहुत ही जोर - शोर से होता है जहाँ कई लोग इस खेल मे भाग लेते है । इन जगहों पर स्टेडियम मे बाकायदा लोग अपने - अपने बुल लेकर भी आते है । कई बार लोग स्टेडियम मे बुल पर बैठकर प्रवेश करते है पर कई बार बुल उन्हें गिरा भी देता है । कई जगहों पर तो पारंपरिक वेश - भूषा मे लोग बुल फाईट करते है । जहाँ बुल को एक लाल कपड़ा दिखाकर उकसाया जाता है और उसका ध्यान कपडे की ओर खींचा जाता है और जब यही बुल बिगड़ जाता है तो खेलने वाले के जान के लाले पड़ जाते है । जैसा की इस विडियो मे दिखाया गया है । अपने भारत देश मे भी बुल फाईट बह

तारे आस्मां मे

ये खबर तो कल शाम को ही आज तक ने दिखाई थी और आज सुबह जी न्यूज़ और आज तक दोनों चैनल पर ये खबर आ रही थी।तो सोचा आप लोगों तक भी ये खबर पहुंचाई जाये। खबर ये है की दर्शील जिसने तारे जमीं पर मे ईशान की भूमिका निभाई थी उसे अभी हाल ही मे हुए स्टार स्क्रीन अवार्डस मे बेस्ट चाइल्ड ऐक्टर और स्पेशल ज्यूरी अवार्ड का खिताब दिया गया है पर दर्शील का कहना है कि चूँकि वो तारे जमीं पर फिल्म का हीरो है इसलिए उसे बेस्ट ऐक्टर अवार्ड दिया जाना चाहिऐ ना की बेस्ट चाइल्ड ऐक्टर का। दर्शील ने तो यहां तक कह दिया है कि वो ऐसे किसी भी अवार्ड कार्यक्रम मे नही जाएगा जहाँ उसे बतौर चाइल्ड ऐक्टर अवार्ड दिया जाएगा।उसका कहना है कि अवार्ड देना है तो बेस्ट ऐक्टर का दो और नोमिनेशन भी बेस्ट ऐक्टर की श्रेणी मे होना चाहिऐ ना की एक अलग बाल कलाकार की श्रेणी मे ।अभी तक तो शाह रुख खान ही कहते थे आई एम द बेस्ट और अब दर्शील भी यही कह रहे है की वो ही बेस्ट है। अवार्ड से एक और अवार्ड भारत रत्न भी आजकल बहुत चर्चा मे है। अडवानी जी ने अटल बिहारी बाजपेई के नाम की सिफारिश की तो मायावती ने कांशी राम के नाम की तो किसी ने ज्योति बासु

गोवा मे सड़क यातायात कितना सुरक्षित ?

जब से ये नया साल शुरू हुआ है हर जगह कोई ना कोई हादसा हो रहा है तो भला गोवा कैसे इससे अछूता रहता। कल दोपहर गोवा मे भी pernem के पास एक सड़क दुर्घटना जिसमे एक टैंकर जो की रासायनिक तत्वों से भरा था और एक मिनी बस की टक्कर हो गयी थी। उस दुर्घटना मे एक ही परिवार के बारह लोगों की मृत्यु हो गयी और अन्य दस लोग घायल है। मिनी बस मे गुजरात के एक ही परिवार के २२ लोग थे । जिसमे एक नव - विवाहित जोडा भी था । ये पूरा परिवार गोवा घूमने आया था और गोवा से वापिस लौट रहा था । इस दुर्घटना मे मिनी बस वाले की शायद कोई गलती नही थी पर फिर भी टैंकर की तेज रफ़्तार और टैंकर ड्राइवर का एक मोड़ पर गाड़ी को कण्ट्रोल ना कर पाने की वजह से मिनी बस के यात्रियों को अपनी जान गंवानी पड़ी और टक्कर इतनी तेज थी की टैंकर का ड्राइवर भी बच नही पाया । उसकी भी घटना स्थल पर मृत्यु हो गयी । गोवा मे आम तौर लोग बहुत तेज गाड़ी चलते है और यहां की अजीब बात ये है की यहां पर लोग हार्न बहुत कम बजाते है।हर कोई आपसी सूझ-बूझ से गाड़ी चलते है

तारे जमी पर ... मेरी नजर से

आख़िर कार हमने भी तारे जमीं पर कल देख ही ली।फिल्म की तारीफ तो हर देखने वाले ने की है और फिल्म है भी तारीफ के काबिल।सभी कलाकारों ने बहुत ही अच्छा अभिनय किया है खासकर दर्शील ने । हर एक किरदार को बहुत ही देख-परख कर सोच - समझ कर बनाया गया है ।टीचर और प्रिंसिपल तो ऐसे बहुत दिखते है।हर स्कूल मे ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे।माँ-बाप का बच्चों के लिए चिंतित होना भी लाजमी सी बात है। हालांकि फिल्म का अंत तो पहले ही समझ मे आ गया था पर फिर भी फिल्म देखने लायक है। पूरी फिल्म को देखने के बाद हमे ये महसूस हुआ कि इस फिल्म को माँ-बाप से कहीं ज्यादा स्कूल के टीचरों और प्रिन्सिपलों को देखनी चाहिऐ क्यूंकि बच्चे को घर मे तो एक बार माँ-बाप भाई-बहन का साथ मिल भी जाता है पर स्कूल मे बच्चा बहुत ही अकेला हो जाता है।ऐसा सिर्फ दर्शील जैसे बच्चों के साथ ही नही जिसे फिल्म मे dyslexic जैसी बीमारी थी बल्कि वो सभी बच्चे जो पढ़ने-लिखने मे जरा कमजोर होते है। तो चलिए हम इस पिक्चर से मिलते -जुलते अपने एक अनुभव को बताते है।जिन लोगों ने पिक्चर देखी है उन्हें वो सीन भी अच्छी तरह याद होगा (और जिन्होंने नही देखी है उनके

मकर संक्रान्ति यानी माघ मेले की शुरुआत

१४ जनवरी से इलाहाबाद मे हर साल माघ मेले की शुरुआत होती है। १४ दिसम्बर से १४ जनवरी का समय खरवांस के नाम से जाना जाता है। और उत्तर भारत मे तो पहले इस एक महीने मे किसी भी अच्छे कार्य को अंजाम नही दिया जाता था।मसलन शादी-ब्याह नही किये जाते थे पर अब तो समय के साथ लोग काफी बदल गए है। १४ जनवरी यानी मकर संक्रान्ति से अच्छे दिनों की शुरुआत होती है । माघ मेला पहला नहान मकर संक्रान्ति से शुरू होकर शिवरात्री तक यानी आख़िरी नहान तक चलता है। संक्रान्ति के दिन नहान के बाद दान करने का भी चलन है। और आज के दिन बाक़ी जगह का तो पता नही पर हम लोगों के घर मे उरद की दाल की खिचड़ी जरुर बनती है।और इसी लिए कई जगह इस दिन को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है। इस त्यौहार मे सफ़ेद और काले तिल के लड्डू और मेवे की पट्टी का घर मे बनायी जाती है। माघ मेले से कई यादें जुडी हुई है। अब पिछले पच्चीस सालों से तो माघ मेले मे हम नियमित रुप से नही जा पाते है पर जब तक इलाहाबाद मे रहे साल दर साल माघ मेले मे घूमने जाना ,वहां संगम पर स्नान करना,कलब्बासियों के टेंट मे रहना (क्यूंकि हमारी दादी जब तक जिंदा थी हर साल पूरे माघ

पुरस्कार के लिए धन्यवाद और ....

हमने ब्लॉगिंग शुरू की थी तो सिर्फ अपनी ख़ुशी के लिए न कि किसी पुरस्कार प्राप्ति के लिए।जिस दिन हमें इस पुरस्कार के बारे मे पता चला था उस दिन हमे ख़ुशी और आश्चर्य दोंनों हुआ था।और जहाँ ख़ुशी और आश्चर्य होता है वहां दुःख भी होता है । ख़ुशी हमें इस लिए हुई थी कि हमारे ब्लॉग को इस लायक समझा गया कि उसे पुरस्कार के लिए चुना गया और आश्चर्य इस बात का था कि हमारा ब्लॉग कैसे और क्यूँ चुना गया और दुःख इस बात का हुआ जिस तरह हमारा ब्लॉग चुना गया । ब्लॉगिंग की दुनिया को जहाँ तक हमने समझा है उसमे न तो कोई स्त्री है न पुरुष हर कोई सिर्फ एक ब्लॉगर होता है । जहाँ उसकी पहचान उसके ब्लॉग से होती है । इस पुरस्कार को हम स्वीकार नही कर सकते है। निर्णायकों रवि भाई , बालेन्दु भाई , मानस भाई से हमे कोई शिक़ायत नही है । ये पुरस्कार न लेने का हमारा व्यक्तिगत कारण है । इतना वाद - विवाद और कटुता का होना ।

आप सभी का बहुत-बहुत आभार और शुक्रिया

आज सुबह जब हमने रोज की तरह चिट्ठे पढ़ने का काम शुरू किया तो जब हमने शब्दों का सफर की पोस्ट पढ़नी शुरू की जिसमे अजित जी ने उन्हें सृजन सम्मान मिलने की बात लिखी थी और पोस्ट के अंत मे उन्होने अनूप जी का और हमारा नाम लिख कर बधाई दी थी। उस समय हमने सोचा की उन्होने गलती से धन्यवाद की जगह बधाई लिख दिया है। इसलिए हमने भी उन्हें सम्मान मिलने की बधाई दी । उसके बाद हमने जब अपनी कल की पोस्ट और ई-मेल देखी तब तो हम चौंक ही गए क्यूंकि ई मेल मे मैथली जी ने हमें सृजन-सम्मान मिलने की बधाई और शुभकामनाएं दी थी तो हमारी कल की पोस्ट पर रवि जी ने टिप्पणी के रुप मे बधाई दी थी। वैसे तो हम इस क्षेत्र मे बहुत नए है । पर इस पुरस्कार की खबर से हम कुछ खुश और कुछ चकित है।आज तो आप लोगों ने इस पुरस्कार की घोषणा करके हमे वाकई मे फिसड्डी से नंबर वन बना दिया । :) हम इस ब्लॉगर परिवार का शुक्रिया करना चाहते है जिन्होंने हमेशा ही हमारी हौसला अफजाई की है।क्यूंकि अगर आप लोगों का साथ नही होता तो शायद हम यहां इतनी दूर तक नही आते।एक बार फिर से हम आप सबका तहेदिल से शुक्रिया।

जरदारी चले सोनिया की राह

बेनजीर भुट्टो की मौत के बाद पाकिस्तान मे पी.पी.पी. की कमान कौन संभाले पहले तो ये ही निश्चित नही हो पा रहा था। खैर बेनजीर के बेटे बिलावल जरदारी जो कि मात्र उनीस साल के है मतलब अभी बालिग नही हुए है पर उन्हें पी.पी.पी.का अध्यक्ष बना दिया गया है। अध्यक्ष बनने के पहले बिलावल अपने नाम मे भुट्टो नही लगते थे पर अध्यक्ष बनने के बाद से वो अब अपना नाम बिलावल भुट्टो जरदारी लिखने लगे है । अभी हाल ही मे जरदारी ने अपने एक interview मे कहा है कि वो सोनिया गांधी से बहुत प्रभावित है और सोनिया गांधी की तरह ही जरदारी भी अपनी पार्टी को अपना समर्थन और सहयोग देते रहेंगे।मतलब त्याग और बलिदान :) । और अपनी पार्टी के लिए ही वो काम करेंगे पर वो किसी भी पद पर नही रहेंगे।चलिए बाक़ी का interview आप यहां पर क्लिक करके पढ़ सकते है। अब जरदारी सोनिया जैसा बन पाते है या नही या पाकिस्तान मे उन्हें वैसा ही सहयोग मिलेगा जैसा भारत की जनता और नेता सोनिया गांधी को देते है।ये तो समय ही बतायेगा । आपको क्या लगता है ?

करैला खाओ और .....?

सत्तर के दशक मे गर्मी के के समय मे सिर्फ लौकी,परवल, टिंडा , करैला,नेनुआ,(तोरी)जैसी हरी सब्जियां ही मिला करती थी । आज के समय की तरह नही कि बारह मास गोभी,गाजर जैसी सब्जियां मिलती रही हों । और ये बात वैसी ही गर्मी के दिनों की है । हमारे घर मे सभी को करैला पसंद था सिवा हमारे और भईया के।और घर मे हर दूसरे - तीसरे रोज बाक़ी दाल,सब्जी के साथ करैला भी बनता था। और जहाँ करैला देखा कि मुँह बन जाता था हमारा और भईया का। ऐसी ही एक गर्मी के दिनों का ये किस्सा है। उन दिनों आई.ए.एस के इम्तिहान का बहुत चलन था (वो तो आज भी है)पर क्यूंकि तब ज्यादातर लोग सिविल सर्विस मे जाना पसंद करते थे या इंजीनियर या डाक्टर बनते थे। खैर तो चलन के मुताबिक ही भईया और उनके एक दोस्त मिलकर आई.ए.एस.के इम्तिहान की तैयारी कर रहे थे। और भईया का दोस्त हम लोगों के घर मे ही रहता था। तो जाहिर सी बात है कि जब दोनो लोग साथ-साथ पढ़ते थे तो खाना भी घर मे ही खाते थे।भईया के उस दोस्त को करैला पसंद था या नही ये कोई भी नही जानता था क्यूंकि जब भी मम्मी पूछती कि तुम करैला खाते हो या नही ,तो वो फौरन जवाब देते थे कि आंटी

ये जीतना भी कोई जीतना है कंगारूओं

आज सिडनी मे खेले गए दूसरे टेस्ट मैच मे ऑस्ट्रेलिया ने टीम इंडिया को हरा कर २-० की बढ़त तो हासिल कर ली है पर क्या ये बढ़त ऑस्ट्रेलिया जैसी चैम्पियन टीम को उसके अच्छे खेल की बदौलत मिली ?शर्म आनी चाहिऐ इन कंगारूओं को जो ऐसी जीत पर खुश हो रहे है। पर अफ़सोस इस बात का है टीम इंडिया ने कोई खास अच्छा प्रदर्शन नही किया। इस मैच को भारत से जीतने के लिए ऑस्ट्रेलिया की टीम ने साम , दाम , दंड , भेद , इन सभी का भरपूर सहारा लिया। फिर वो भले ही ग्यारह की बजाय तेरह खिलाडी ही क्यों न हो ११ खिलाडी +२ एम्पायर बकनर और बेन्सन । एम्पायर भी ऐसे जिन्हें पहले से ही कह दिया गया था की कुछ भी हो जाये बस ऑस्ट्रेलिया के खिलाडियों को आउट नही देना है और भारतीय खिलाडियों को जबरदस्ती ही आउट देना है।वरना symonds जो की ३५-३६ के आस-पास आउट हुए थे उन्हें एम्पायर ने आउट नही दिया और जिसका नतीजा ये हुआ की symonds ने शतक बना लिया था ,वहीं द्रविड़ और गांगुली को गलत आउट दे कर भारत को मैच ही हरवा दिया। तीसरे दिन के खेल के बाद लग रहा था कि भारत ये मैच ड्रा करवा लेगा पर भारत को हार ही मिली। और इसका सबूत तो हम

कपडे या मानसिकता क्या खराब है ...

दो दिन पहले हमने भी मुम्बई मे हुई घटना पर लिखा था और आज टिप्पणीकार , महर्षि की पोस्ट पढ़कर हमने इस विषय पर फिर से लिखने की सोची है। ये जो घटना हुई है उसमे गलती किसकी है ऐसे कपडे पहनकर रात मे पार्टी करने वालों की या उन ७० लोगों की जिन्हों ने उन लड़कियों के साथ बदतमीजी की , इस बात का तो कभी फैसला ही नही हो सकता है।हाँ बहस जरुर हो सकती है। पार्टी करना क्या इतना बड़ा गुनाह है की जिसकी इतनी बड़ी सजा मिले। क्या इस घटना के पीछे सिर्फ लड़कियों के कपडे ही कारण थे ? ऐसा हम नही मानते है क्यूंकि जहाँ तक कपडे की बात है तो जितनी भी फोटो इन लड़कियों की दिखाई गयी है उनमे उनके कपडे उतने भी खराब नही थे। अगर वो लड़कियां सलवार सूट या साडी पहनें होती तो क्या ये भीड़ उन्हें आदर पूर्वक जाने देती।(कुछ साल पहले दिल्ली मे भी ऐसी ही एक घटना नए साल के समय हुई थी जिसमे शायद महिला ने सलवार सूट पहना था ) अगर कपडे ही इस घटना की वजह थे तब फिर हमारे गावों मे इस तरह की घटनाएं तो कभी होनी ही नही चाहिऐ। पर वहां भी ऐसी घटनाएं क्यों होती है। जबकि वहां तो आम तौर पर लड़कियां और औरतें ज्यादातर साडी

मुम्बई शहर हादसों का शहर है ....

मुम्बई जहाँ नए साल का जश्न मना कर लौट रही लड़कियों के साथ जो कुछ भी हुआ वो तो हर कोई जान गया है।कि किस तरह से उन दो लड़कियों को ७०-८० लोगों की भीड़ ने परेशान किया।और मुम्बई पुलिस कितने हलके ढंग से इस मामले को ले रही है।हालांकि पिछले साल भी मुम्बई मे ऐसा ही हादसा हुआ था।कल ही कोची मे भी एक विदेशी पर्यटक (swedish) की बच्ची के साथ भी लोगों ने छेड़-छाड़ की थी। मुम्बई मे नए साल के आगमन पर लोग बिल्कुल दीवानों के तरह घूमते है । शायद ऐसी घटनाएं पहली भी होती रही होंगी पर तब चूँकि मीडिया इतना ज्यादा नही था इसलिए किसी को पता नही चलता रहा होगा। पर सबसे आश्चर्य जनक बात तो पुलिस चीफ ने कही है कि अगर आप अपनी बीबियों की सुरक्षा चाहते है तो उन्हें घर मे रखिये।अब अगर पुलिस ही ऐसा कहती है तो फिर जनता किससे शिक़ायत करेगी। १९८६ दिसम्बर की बात है हम लोग मुम्बई तब की बम्बई घूमने गए थे। हम लोग और हम लोगों के एक दोस्त की फैमिली थी , बच्चे छोटे थे। और हम लोग जुहू पर ठहरे थे।गाड़ी और ड्राईवर था इसलिए घूमने मे कोई मुश्किल नही हो रही थी।३१ दिसम्बर की सुबह हम लोग एलिफ़नता केव्स द

नव वर्ष की शुभकामनाएं

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आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं ! नव वर्ष आपके और आपके परिवार के लिए मंगलमय हो !!