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इश्क-विश्क प्यार-.....

कल तीन महीने के दौरे के बाद टीम इंडिया कल भारत लौटी तो उसका जोरदार स्वागत हुआ और ढेर सारे इनाम भी दिए गए। अभी ये जश्न थमा भी नही था कि सारे न्यूज़ चैनल सभी नए और अविवाहित खिलाड़ियों की शादी और इश्क के चक्कर मे पड़ गए।कहीं धोनी को दिखाते की उनके लिए किस तरह लड़कियां शादी का प्रस्ताव रख रही है तो कहीं युवराज को दिखाते की उनकी शादी होते-होते रह जाती है। तो कहीं प्रवीण कुमार को दिखाते की उनके लिए कितने रिश्ते आ रहे है। तो कहीं इरफान पठन को दिखाते और उनके प्यार की कहानी बताते । अरे भइया अभी-अभी तो धोनी और युवराज का दीपिका के साथ नाम जुड़ने का अंजाम देख चुके है कि युवराज को उससे उबरने मे कितना समय लगा वो तो जैसे खेलना ही भूल गए थे। अब इरफान पठन कल दिल्ली मे हुए जश्न मे शामिल नही थे तो उसका कारण भी इश्क बताया जा रहा है कि कल इरफान मुम्बई से सीधे अपनी गर्ल फ्रेंड से मिलने चले गए थे।अरे जरा कुछ दिन सब्र तो कर लो। अच्छे भले और सुधरे हुए खिलाड़ियों को क्यों बिगाड़ने मे लगे है ये सभी चैनल वाले। यूं तो प्यार करना कोई ग़लत बात नही है पर ये चैनल वाले जिस तरह से प्यार की रेड़ पीटते है कि बस...

मिथ्या और जोधा अकबर (फ़िल्म समीक्षा )

अरे चौकने की कोई जरुरत नही है।वो क्या हैं ना की हमने अभी हाल ही मे ये दोनों फिल्में देखी तो सोचा की क्यों ना एक साथ ही इन दोनों फिल्मों के बारे मे लिख दिया जाए। मिथ्या और जोधा अकबर इन दोनों फिल्मों मे यूं तो कोई समानता नही है पर फ़िर भी हम दोनों की समीक्षा एक साथ कर रहे है। दोनों फिल्में बिल्कुल ही अलग है हर लिहाज से। वो चाहे कहानी हो या बड़े-बड़े सेट हो या कलाकार ही क्यों ना हो। मिथ्या एक बहुत ही आम सी कहानी पर बनी फ़िल्म है तो जोधा अकबर बहुत ही लैविश फ़िल्म है। मिथ्या फ़िल्म की कहानी एक ऐसे लड़के की कहानी है जो मुम्बई हीरो बनने आता है और मुम्बई मे हुए एक मर्डर को देख लेता है और फ़िर किस तरह वो एक ऐसे डॉन के चक्कर मे पड़ता है कि उसकी सारी जिंदगी ही बदल जाती है। इस फ़िल्म मे नेहा धूपिया भी है और नेहा को इससे पहले हमने किसी फ़िल्म मे नही देखा था सो वो कुछ ख़ास नही लगी । पर पूरी फ़िल्म का श्रेय रणवीर शोरी को जाता है।रणवीर शोरी जिसने इस फ़िल्म मे वी.के.और राजे दोनों की ही भूमिका निभाई है उसने कमाल की एक्टिंग की है। इस फ़िल्म मे रणवीर शोरी को जहाँ एक बहुत ही आम इंसान यानि स्...

द एसैसिनेशन ऑफ़ जेस्सी जेम्स बाय कावर्ड रॉबर्ट फोर्ड (the assassination of jesse james by the coward robert ford )

ये फ़िल्म ऑस्कर मे बेस्ट फ़िल्म के लिए तो नही पर बेस्ट ऐक्टर इन अ सपोर्टिंग रोल के लिए nominated है। हालांकि फ़िल्म मे brad pitt है जो jesse james के रोल मे है और casey affleck जो robert ford के रोल मे है ।फ़िल्म मुख्य रूप से इन्ही दो किरदारों पर है। फ़िल्म की कहानी कुछ ख़ास नही है ।jesse james जो की एक notorious robber है । robert ford बचपन से ही jesse james के जैसा बन कर मशहूर होना चाहता था और इसीलिए robert अपने भाई के साथ jesse james का ग्रुप भी ज्वाईन करना चाहता है । बाद मे किस तरह robert jesse james के काम करने के तरीके को देख कर बदल जाता है । यूं तो फ़िल्म मे brad pitt भी है पर इस फ़िल्म मे brad pitt की एक्टिंग कुछ ख़ास जमी नही। अपने लंबे नाम की तरह ही ये फ़िल्म भी लम्बी है । और फ़िल्म इतनी धीमी गति से आगे बढ़ती है की हमने इस फ़िल्म को टुकड़े-टुकड़े मे देखा अरे मतलब दो -तीन दिन मे। क्लाइमेक्स का सीन तो बिल्कुल ही बोरिंग है। एक बार मे झेलना इस फ़िल्म को हमारे बस की बात नही थी। क्यूंकि फ़ि...

संजय की शादी (देश की सबसे बड़ी खबर)

सारे टी . वी चैनल के मुताबिक आज देश की सबसे बड़ी खबर संजय दत्त की शादी है। आज सुबह से सारे टी.वी.चैनल संजय दत्त की शादी की खबर से भरे पड़े है।कि संजय दत्त और मान्यता की शादी हिंदू रीति-रिवाज से आज हो रही है जबकि गोवा मे अभी हाल ही मे उनकी कोर्ट मैरेज हो चुकी है।सुबह से चैनल वाले लगे है कि क्या संजय कि बहनें शादी मे शामिल होंगी या नही ।कोई चैनल कहता कि संजय ने शादी का निमंत्रण अपनी बहनों को दिया है तो कोई कहता है कि निमंत्रण नही दिया है। कभी कहते है कि प्रिया दत्त ने इस शादी पर कुछ भी कहने से इनकार किया तो कभी कहते है कि संजय ने अपनी बहनों को शादी मे नही बुलाया है। बहनों को अपने भाई की शादी मे शिरकत करनी चाहिऐ क्यूंकि जब उसके बुरे वक्त मे साथ दिया है तो अच्छे वक्त मे भी साथ देना ही चाहिऐ । और ख़ुशी का हकदार तो हर कोई होता है। संजय दत्त की शादी हो रही है तो एक चैनल ने तो बनारस के एक पंडित जी से ही पूछना शुरू कर दिया की उसकी ये शादी सफल होगी या नही और पंडित जी बेचारे बार-बार यही कहते रहे की आज चूँकि बसंत पंचमी है तो आज का दिन शादी के लिए बहुत शुभ है।अब शादी चलती है या नही इ...

क्या स्त्री-पुरुष एक-दुसरे के पूरक नही हो सकते है ?

स्त्री और पुरुष के बिना किसी भी समाज की कल्पना नही की जा सकती है । क्यूंकि ना तो केवल स्त्रियों और ना ही केवल पुरुषों से ही समाज या संसार चलता है । किसी भी इमारत की नींव हमेशा मजबूत होनी चाहिऐ क्यूंकि अगर नींव कमजोर होगी तो इमारत ढह जायेगी । और जिस समाज या संसार मे हम रहते है उसकी नींव स्त्री - पुरुष दोनो होते है । जिस तरह एक इमारत को खड़ा करने के लिए नींव और खम्भों की जरुरत होती है उसी तरह समाज और घर - परिवार रूपी इमारत को खड़ा करने मे स्त्री और पुरुष दोनो की बराबर की हिस्सेदारी होती है । जरा भी संतुलन बिगड़ता है तो इमारत के ढहने का खतरा हो जाता है । स्त्री को जहाँ जननी और अन्नपूर्णा कहा गया है वहीं पुरुष को पालनहार माना गया है । जननी इस शब्द से ही ज्ञात होता है कि एक नए जीवन को इस संसार मे लाना यानी जन्म देना । और जननी के साथ ही जन्मदाता को हम भूल नही सकते है क्यूंकि किसी भी नए जीवन को संसार मे लाने मे जननी और ...

Atonement (एक झलक )

अतोनेमेंट इस साल के ऑस्कर के लिए nominated हुई है । इस फिल्म को ऑस्कर अवार्ड के लिए सात श्रेणियों मे nominate किया गया है । कल हमने ये फिल्म देखी तो सोचा की आज इसके बारे मे ही लिखा जाये । यूं तो इस फिल्म की कहानी द्वितीय विश्व युद्ध के समय को दर्शाती है और साथ ही ये कहानी एक परिवार पर आधारित है और मुख्य रुप से cecilia,briony,roobie पर ही आधारित है। कि किस तरह एक छोटी सी गलती से सबकी जिंदगी बदल जाती है। cecilia और robbie एक -दुसरे से प्यार करते है पर एक ऐसी गलती जो की robbie ने की ही नही थी और जिसके लिए robbie को जेल जाना पड़ता है।यही सबकी जिंदगी बदल देता है। विश्व युद्ध के समय जेल मे गए लोगों को ये option होता था कि या तो वो जेल मे रहे या आर्मी मे भर्ती हो जाएँ ।और robbie आर्मी मे भर्ती हो जाता है।बाद मे briony ,robbie और cecilia का क्या होता है. ये ही तो सस्पेंस है. बाक़ी की कहानी हम नही बता रहे है। इस फिल्म मे कई flash backs है।फिल्म का संगीत तो ठीक था पर कुछ सीन मे फोटोग्राफी बहुत अच्छी है।पर एक्टिंग सबकी ठीक ही लगी।briony के किरदार को बचपन से बु...

शूटिंग ..उफ़ तौबा

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यहां शूटिंग का मतलब गन शूटिंग नही है बल्कि फिल्म की शूटिंग है।वो क्या है ना कि हम जबसे गोवा आये है अक्सर हम अपने पतिदेव से कहते रहें है की यहां पर हमें किसी फिल्म की शूटिंग होती हुई नही दिखाई पड़ती है जबकि आज कल तो आधे से ज्यादा फिल्मों (और विज्ञापनों ) मे गोवा नजर आता है पर हमें कभी शूटिंग देखने को नही मिलती है। ऐसा नही है कि हम ने पहले कभी शूटिंग नही देखी।पर क्या करें दिल है कि मानता नही। :) (शूटिंग देखे बिना) अरे भाई सत्तर के दशक मे जब पहली बार हम बम्बई घूमने गए थे तब बम्बई तो बहुत घूमे थे पर कोई शूटिंग नही देख पाए थे ।बस प्राण से मिले थे जो उस समय किसी घर मे आत्माराम नाम की फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। पर जब तक हम लोग वहां पहुंचे , शूटिंग ख़त्म हो गयी थी और उस समय प्राण ने कहा था की शूटिंग से ज्यादा बोरिंग कुछ नही होता है क्यूंकि एक shot के लिए कई-कई बार रीटेक होते है।उस समय तो चूँकि हमने शूटिंग देखी नही थी त ो उनकी बात समझ नही आई थी। अब भला ये भी कोई बात हुई की हर फिल्म मे गोवा दिखाई दे और हम एक अदद शूटिंग भी ना देखें। वैसे एक-आध बार जब भी पंजिम मे शूटिंग होती...

तारे जमी पर ... मेरी नजर से

आख़िर कार हमने भी तारे जमीं पर कल देख ही ली।फिल्म की तारीफ तो हर देखने वाले ने की है और फिल्म है भी तारीफ के काबिल।सभी कलाकारों ने बहुत ही अच्छा अभिनय किया है खासकर दर्शील ने । हर एक किरदार को बहुत ही देख-परख कर सोच - समझ कर बनाया गया है ।टीचर और प्रिंसिपल तो ऐसे बहुत दिखते है।हर स्कूल मे ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे।माँ-बाप का बच्चों के लिए चिंतित होना भी लाजमी सी बात है। हालांकि फिल्म का अंत तो पहले ही समझ मे आ गया था पर फिर भी फिल्म देखने लायक है। पूरी फिल्म को देखने के बाद हमे ये महसूस हुआ कि इस फिल्म को माँ-बाप से कहीं ज्यादा स्कूल के टीचरों और प्रिन्सिपलों को देखनी चाहिऐ क्यूंकि बच्चे को घर मे तो एक बार माँ-बाप भाई-बहन का साथ मिल भी जाता है पर स्कूल मे बच्चा बहुत ही अकेला हो जाता है।ऐसा सिर्फ दर्शील जैसे बच्चों के साथ ही नही जिसे फिल्म मे dyslexic जैसी बीमारी थी बल्कि वो सभी बच्चे जो पढ़ने-लिखने मे जरा कमजोर होते है। तो चलिए हम इस पिक्चर से मिलते -जुलते अपने एक अनुभव को बताते है।जिन लोगों ने पिक्चर देखी है उन्हें वो सीन भी अच्छी तरह याद होगा (और जिन्होंने नही देखी है उनके ल...

मनोरमा सिक्स फ़ीट अंडर

ये अभी हाल ही मे रिलीज हुई पिक्चर का नाम है।वैसे हमने इसे हॉल मे नही बल्कि घर पर देखी है।क्यूंकि इससे पहले की हम इसे देखते ये पिक्चर हॉल से चली गयी। आज कल जहाँ नाच-गाने से भरपूर फिल्में बन रही है वहीं ये फिल्म धरातल से जुडी लगती है। इसकी कहानी पूरी तो नही पर हाँ थोडी सी बता देते है । इस फिल्म मे कहानी अभय देओल जो की एक इंजीनियर है और साथ-ही साथ एक लेखक भी है और जासूसी का शौक भी रखते है, उनके ही इर्द-गिर्द घूमती है कि किस तरह वो एक हत्या के मामले मे फंस जाते है।और किस तरह वो उससे बाहर निकलते है। अभय देओल और गुल पनाग दोनो ने ही अच्छी एक्टिंग की है।गुल पनाग जो वैसे तो ज्यादा फिल्मों मे दिखाई नही देती है पर इसमे अभय देओल की पत्नी के रोल मे अच्छा काम किया है। और अभय देओल ( जिसकी हमने इससे पहले कोई भी पिक्चर नही देखी थी )ने अपने मार-धाड़ वाले भाइयों (सनी और बॉबी ) के बिल्कुल विपरीत रोल किया है। और काफी नैचुरल एक्टिंग की है। और बाक़ी के कलाकारों जैसे सारिका विनय पाठक,कुलभूषण खरबंदा, आदि ने भी अच्छा अभिनय किया है। वैसे ये पिक्चर ज्यादा नही चली है क्यूंकि ये ना तो पूरी तरह कमर्शियल ...