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dirty politics

यूँ तो राजनीति मे हमेशा ही सभी राजनैतिक पार्टियां एक-दूसरे के काम काज पर ,चुनाव प्रचार पर आरूप प्रत्यारोप लगाती रहती है पर इस बार तो उत्तर प्रदेश के होने वाले चुनाव मे सभी पार्टियों ने सभी सीमाएं तोड़ दी। यूँ तो चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश की सभी हाथियों की मूर्तियों को ढकने का आदेश दिया था और ये काम पूरे जोर-शोर से हो भी रहा था । पर शायद राज नेताओं को इतने से ही संतोष नहीं था। क्यूंकि उन्हें इलाहाबाद के चिल्ड्रेन पार्क जिसे सुमित्रा नंदन पन्त पार्क या जैपनीज पार्क या फिर हाथी पार्क के नाम से भी जाना जाता है वहां बच्चों के झूलने के लिए बने एक हाथी को इन नेताओं की नजर लग गयी। और इन नेताओं ने चुनाव आयोग को उस हाथी ढकने के लिए भी कहा। जो की बहुत ही शर्म की बात है। चिल्ड्रेन पार्क का ये हाथी जिसे कुछ नहीं तो काम से काम ४० साल हो गए है बने हुए । हम लोग भी अपने बचपन मे उस पार्क मे बड़े चाव से जाते थे ,और ४० साल पहले तो हाथी पार्क का कुछ ऐसा क्रेज था (शायाद अभी भी है )की जब भी हमारे घर कोई मौसी,मामा या चाचा और उनका परिवार आता तो हाथी पार्क जाना तो लाजमी था. और हम ही क्या इलाहाबाद मे रहने ...

गंगा गोमती ट्रेन का ऐसा हाल

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फरवरी मे हम कुछ दिनों के लिए इलाहाबाद गए थे और वहां से हमने लखनऊ अपनी दीदी के यहां जाने का कार्यक्रम बनाया था। अब इलाहाबाद से लखनऊ जाने के लिए गंगा गोमती ट्रेन ठीक होती है।हालाँकि इस ट्रेन को पकड़ने मे सुबह पूरी बर्बाद हो जाती है। क्यूंकि ६ बजे की ट्रेन के लिए ५ बजे ही उठाना जो पड़ता है। :) और इसमें एक और प्रोब्लम है कि ये ट्रेन प्रयाग स्टेशन पर बस २ मिनट रूकती है जबकि ज्यादा जनता प्रयाग से ही इस ट्रेन मे चढ़ती है । तो हम लोगों ने ए.सी.चेयर कार का टिकट बुक किया। और ट्रेन के समय स्टेशन पर पहुँच गए और इंतज़ार करने लगे। उस दिन अपनी किस्मत ही खराब थी अचानक ही ट्रेन आने से चंद मिनट पहले खूब आंधी और बारिश शुरू हो गयी और जब ट्रेन आई तो पता चला कि ए.सी. वाला कोच एकदम पीछे है। जबकि कुली ने कहा था कि ए.सी.कोच जहाँ हम लोग खड़े थे , वहीँ आता है। खैर जब तक हम लोग कोच तक पहुंचे तो ट्रेन ने धीरे-धीरे चलना शुरू कर दिया था । एक तो बारिश ऊपर से चलती हुई ट्रेन और कुली उसी चलती ट्रेन मे सामान चढाने लगा और जो हम लोगों को बैठाने गया था वो बोला दीदी आप लोग चढ़ जाइए । तो हम लो...

९ बच्चों की मम्मी हमारी मौसी :)

अब बचपन के दिन तो हरेक के जीवन के सबसे सुखद और सुन्दर होते है ,इसमें तो कोई दो राय नहीं है। और बीते हुए दिन जब याद आते है तो कभी-कभी लगता है कि काश वो दिन फिर से दोबारा आ जाए। क्यूँ हम गलत तो नहीं कह रहे है ना। :) आज अचानक हमे ये किस्सा याद आ गया । बात तो ७० के दशक की है । उस जमाने मे गर्मी की छुट्टियाँ बिताने के लिए कभी हम ननिहाल (फैजाबाद ) कभी ददिहाल (बनारस) या फिर अपनी छोटी मौसी के यहां (वो जहाँ भी रहती थी क्यूंकि मौसाजी का ट्रांसफर होता रहता था ) जाते थे , कभी ट्रेन से तो कभी कार से । और उस समय अक्सर ऐसा होता था कि अगर मौसी हम लोगों के यहां इलाहाबाद आती थी तो उनके वापिस लौटने पर हम लोग भी कुछ दिन के लिए उनके यहां चले जाते थे। या अगर हम लोग उनके यहां जाते थे तो हम लोगों के वापिस लौटने पर वो लोग हम लोगों के साथ इलाहाबाद आते थे । वैसे ये बड़ा ही रुटीन फीचर था। :) ऐसी ही एक गर्मी की छुट्टी मे हम चारों बहने मौसी के यहां सीतापुर गए थे और जब कुछ दिन रहने के बाद वहां से इलाहाबाद वापिस लौटने लगे तो मौसी भी अपने पाँचों बच्चों के साथ हम लोगों के साथ चली। उस समय मौसी बहुत ज्या...

दिल्ली मे तो नही पर इलाहाबाद के ब्लॉगर से हुई मुलाकात

अप्रैल मे जब दिल्ली गए थे तो शुरू मे तो कुछ सोचने समझने की सुध ही नही थी क्यूंकि पापा हॉस्पिटल मे थे पर जब कुछ दिन बाद उनकी तबियत कुछ संभली तो एक दिन हमने रचना को फ़ोन किया तो रचना ने सबसे पहले यही पूछा कि हम कब दिल्ली आ रहे है और ये बताने पर कि हम दिल्ली मे ही है रचना काफ़ी खुश हो गई कि इस बार तो हम लोग जरुर ही मिलेंगे । पर जब हमने पापा के बारे मे बताया तो रचना ने कहा कि कभी भी कोई भी भी हो तो हम उन्हें जरुर बताये । रचना का इतना कहना ही बहुत था । रचना से बात करने के बाद हमने रंजना जी को फ़ोन किया तो पता चला कि रंजना जी कुछ busy थी इसलिए उनसे बात नही हो पायी थी । इस बीच मे २ - ३ बार रचना से बात हुई और हर बार बात इस पर ख़तम होती की इस बार तो हम लोग जरुर मिलेंगे । इलाहाबाद मे जब हम थे तब रचना ने बताया था कि अविनाश वाचस्पति जी ४ जून को दिल्ली मे एक ब्लॉगर मीट रख रहे है और अविनाश जी से भ...

हम वापिस आ गए :)

आज बड़े दिनों बाद जब मेल बॉक्स देखा तो अल्पना जी का मैसेज पढ़ा तो सोचा की आज एक छुटकी सी पोस्ट लिख ही दी जाए । अल्पना जी हमारे गायब होने पर हमारी खोज ख़बर लेने का शुक्रिया । दरअसल कुछ परेशानी के चलते अप्रैल से जून तक हम दिल्ली और इलाहाबाद मे थे और उस बीच मे नेट करने का बिल्कुल भी समय नही मिला था । पर अब हम वापिस गोवा आ गए है और अब २-४ दिन मे पूरी तरह से ब्लॉग पढने और लिखने का काम शुरू कर देंगे । :)

कार चलाना सीखा वो भी तीन दिन मे .....

अब साइकिल और स्कूटर सीखने का किस्सा तो हम ने एक जमाने पहले ही आप लोगों को बता दिया था पर कार का किस्सा बताना रह गया था ।तो सोचा आज आप लोगों को अपने कार चलाने के सीखने का अनुभव भी बता दिया जाए । अब वो क्या है ना चूँकि मायके मे हम सबसे छोटे थे इसलिए कार सीखने का नंबर आते - आते हमारी शादी हो गई थी । :) आप यही सोच रहे है ना कि तीन दिन मे कार चलाना सीखा तो कौन सा बड़ा तीर मार लिया । अरे भई हम जानते है कि आप लोगों ने एक घंटे या एक दिन मे कार चलाना सीखा होगा । :) दिसम्बर ८९ की बात है उस समय बेटे छोटे थे और हम इलाहाबाद गए हुए थे और हमारी बाकी जिज्जी भी इलाहाबाद आई हुई थी । एक दिन शाम को हम सब चाय पी रहे थे और बातें हो रही थी तभी हमें कार चलाना सीखने का भूत चढ़ गया ।तो भइया बोले की कार चलाना तो बहुत आसान है । बस गियर लगाना आना चाहिए । और कार चलाते समय बिल्कुल भी डरना नही चाहिए । फ़िर भइया ने घर मे खड़ी कार मे ही गियर लगाना सिखाया । क्योंकि तब ambassador मे हैंड गियर होता था । ४-५ बार गियर लगाने की प्रैक्टिस करने...

कभी गिनती से जामुन खरीदा है .....

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आपको गिनती से जामुन खरीदने का अनुभव हुआ है कि नही हम नही जानते है पर हमें जरुर अनुभव हुआ है । गिनती से जामुन खरीदने का अनुभव हमें हुआ है और वो भी गोवा में । कल की ही बात है हम सब्जी मंडी गए थे और वहां जामुन देख कर जब बेचने वाली से पूछा कैसे दिया ? तो बोली की ४० रूपये मे १०० । तो हमने कहा कि किलो मे कैसे ? तो वो बोली किलो नही , ४० रूपये मे १०० । हमने कहा कि इतनी गिनती करोगी तो मुस्काराते हुए सर हिलाकर बोली हाँ । और जब हमने कहा कि गड़बड़ तो नही करोगी तो बोली नही । और हमारे कहने पर की ठीक है दे दो तो उसने जामुन गिनना शुरू किया और २ - ३ मिनट मे जामुन से भरा पैकेट हमारे हाथ मे था । :) कहना पड़ेगा कि बड़े ही एक्सपर्ट अंदाज मे फटाफट गिनती करती है ये जामुन बेचने वाली । पहले जामुन कभी गिनती करके नही खरीदा । बनारस , इलाहाबाद और दिल्ली मे तो दरवाजे पर ( घर ) जामुन वाला सिर पर टोकरी लिए आता था । बनारस (६०-७० मे ) ...

कुरता फाड़ होली :)

होली आती है तो अपने साथ ढेरों पुरानी यादें भी ले आती है । वो क्या है जैसे-जैसे बड़े होते जाते है होली खेलने का वो जोश और उत्साह ख़त्म तो नही होता है पर कुछ कम जरुर होने लग जाता है । क्योंकि अगर हम होली जम कर खेलना भी चाहें तो खेलें किसके साथ । खैर होली मे ये सब सोच कर परेशान नही होना चाहिए क्योंकि होली की इतनी सारी यादें जो है रंगने के लिए । :) ये बात ७७ की है हमारी बड़ी जिज्जी की शादी हुई थी और जैसा की रिवाज है लड़की की पहली होली मायके मे होती है तो जिज्जी और जीजाजी इलाहाबाद पहली होली के लिए आए थे ।हम लोगों के मोहल्ले मे लड़कियों की संख्या ज्यादा थी । एक -दो घर को छोड़ कर हर घर मे ४-५ लड़कियां थी । अब उस जमाने मे तो घरों मे बहुत ज्यादा मिलना जुलना होता था और एक घर के जीजाजी मतलब सारे मोहल्ले के जीजाजी वाला हिसाब था और वो भी इकलौते और नए - नए ।तो जाहिर सी बात है की पूरे मोहल्ले को खबर थी की जीजाजी होली पर आ रहें है । सब लड़कियों ने बड़े-बड़े प्लान बनाए थे की उन्हें कैसे-कैसे रंगा जायेगा । :) होली के दिन घर मे सुबह से ही आँगन मे बड़े-बड़े ड्रम और हंडों मे रंग...

ना जाड़ा ना अंगीठी और ना ही मूंगफली :(

आजकल हर तरफ़ जाड़ा छाया हुआ है दिल्ली यू . पी . बिहार हो या चाहे अमेरिका , लन्दन या कनाडा ही क्यूँ न हो पर हमारे यहाँ ..... । कभी -कभी कोस्टल एरिया मे रहने का खामियाजा भी भुगतना पड़ता है :) क्योंकि आम तौर पर ऐसी जगहों पर सारे साल गरमी के जैसा ही मौसम रहता है । गोवा मे जाड़े का अनुभव बस २ - ४ दिन सुबह - सुबह होने वाले कोहरे को देख कर ही होता है । और सूरज देवता के ७ बजे के बाद उगने से पता चलता है की गोवा मे जाड़ा आ गया है । और या फ़िर वाईन टेस्टिंग फेस्टिवल से :) अब आज कल जहाँ आधे से ज्यादा भारत देश मे ठण्ड पड़ रही है वहीं गोवा मे अभी २ - ३ दिन पहले जनवरी का सबसे गर्म दिन हुआ था । :( :) जा डे के कुछ नफे ( ज्यादा ) और नुक्सान ( कम ) है । अब नफ़ा ये है कि इस जाड़े के मौसम मे एक तरफ़ जहाँ मूंगफली और अमरुद खाने का मजा है वहीं दूसरी तरफ़ घुघरी खाने का भी अपना अलग ही मजा है । :) तो जाड़े का नुकसान है कि नल का पानी भी बिल्कुल बरफीला ठंडा हो ज...

आज से नवरात्रि शुरू

कल पितृ पक्ष के समापन के साथ आज से नवरात्र की शुरुआत हो रही है । तो इस पहले दिन की शुरुआत क्यूँ न माँ की स्तुति से की जाए । नवरात्र के साथ कितनी बातें याद आ जाती है जैसे कहीं नौ दिन तक लोग व्रत करते है तो कहीं डांडिया रास ( गुजरात ) खेलते है तो कहीं नवरात्र मे चौकी निकालने का चलन है ( इलाहाबाद मे ) कहीं घर मे कलश मे जाऊ के बीज डाले जाते है और नौवें दिन हवन किया जाता है तो कहीं नौवें दिन कन्या पूजी जाती है और कहीं दुर्गा पूजा के ( कोलकता ) बड़े - बड़े मंडप सजते है । तो आप भी इन नौ दिन यानी नवरात्रों का आनंद उठाइए व्रत करिए डांडिया रास करिए । :) Powered by eSnips.com

इलाहाबाद यात्रा की यादें (६ )प्रयाग राज एक्सप्रेस से वापिस दिल्ली का सफर

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एक हफ्ते इलाहाबाद मे रहकर २९ अगस्त को हम इलाहाबाद से वापिस दिल्ली के लिए प्रयाग राज एक्सप्रेस जो रात ९.३० बजे चल कर सुबह ६.५० पर दिल्ली पहुँचती है उस से चले पर इस बार भी रास्ते मे कुछ न कुछ तो होना ही था । :) जब हम ट्रेन मे अपने कोच A-3 मे अपनी सीट पर पहुंचे तो देखा कि हमारी आधी से ज्यादा सीट पर खूब सारा सामान रखा है बैग और सूट केस वगैरा और नीचे जहाँ सामान रखते है वहां भी जगह खाली नही थी। गनीमत है कि हमारे पास एक छोटी सी अटैची और एक बैग ही था।तो सामने वाली बर्थ पर बैठी हुई महिला से पूछा कि क्या ये आपका सामान है तो उसने इनकार कि या तभी एक और सज्जन ने लपक कर बताया कि ये उनका सामान है और चूँकि वो ५-६ लोग एक साथ है और सबकी सीट अलग-अलग है इसलिए यहाँ पर सबका सामान एक साथ रख दिया है । ये सुनकर खीज तो बहुत हुई पर फ़िर कुली से कहा कि इसे किसी तरह नीचे रख दो। जैसे ही ट्रेन चलने को हुई कि उस ग्रुप मे से एक सज्जन खाने का एक पैकेट लेकर आए और उ से भी उसी सामान पर रख कर चला गए । ट्रेन ठीक समय ९.३० पर चल दी और ट्रेन चलने के १० मिनट बाद उस ग्रुप मे से एक सज्जन आए और खाने का पैकेट ले जात...

इलाहाबाद यात्रा की यादें (५) बाजार और सिनेमा हॉल

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अब आपको जब इलाहाबाद घुमा ही रहे है तो क्यूँ न इलाहाबाद के बाजार और सिनेमा हॉल के बारे मे भी कुछ बता दें। जिस से अगर कभी आप वहां जाए तो इसी बहाने हमें याद करेंगे. :)तो तैयार है न अपना पर्स लेकर बाजार घुमने के लिए। अब इलाहाबाद मे ३ बाजार ज्यादा मशहूर है कटरा , चौक और सिविल लाईन्स । ३०-४० साल पहले तो सिर्फ़ कटरा और चौक मे ही खूब भीड़ होती थी पर अब तो सिविल लाईन्स मे भी भीड़ बहुत होने लगी है। इस बार तो सिविल लाईन्स मे बहुत कुछ नया देखने को मिला जैसे अब सिविल लाईन्स मे भी बहुत सारे शो रूम खुल रहे है जैसे levis , reebok , koutons , t . n . g . बिग बाजार , सालासार , ऐसे ही कुछ और शो रूम ।पर कुछ चीजें सिविल लाईन्स मे बिल्कुल नही बदली है जैसे सांवल दास खन्ना की दुकान या बॉम्बे डाईंग की शॉप और न ही सिविल लाईन्स का सोफ्टी कार्नर बिल्कुल भी बदला है।और न ही वहां खड़ा होने वाला पुड़िया वाला (अरे वही मुरमुरे वाला ) :) हालांकि हमने वहां न तो सोफ्टी खाई और न ही पुडिया खाई। :( कटरा और चौक तो जैसे ४० साल पहले थे वैसे ही अब भी है बस फर्क इतना लगा की कटरा की सभी दुकाने एक म...

इलाहाबाद यात्रा की यादें (४) स्वराज भवन घूमना

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post थोडी लम्बी हो गई है इसलिए थोड़ा धैर्य से पढ़े । :) आनंद भवन की थकान उतर गई हो तो चलिए आज स्वराज भवन घूमने चलते है । आनंद भवन की बिल्डिंग के साथ ही जुड़ी हुई है स्वराज भवन की बिल्डिंग । जहाँ तक हमे याद है ३० - ३५ साल पहले स्वराज भवन मे orphanage था जहाँ सौ - दो सौ बच्चे रहा करते थे पर इस बार देखा तो स्वराज भवन को भी एक संग्रहालय ( museum ) बना दिया गया है । हो सकता है हमने पहले इसपर ध्यान न दिया हो । खैर स्वराज भवन देखने के लिए जब हम २८ तारीख को गए तो देखा बहुत सारे पुलिस वाले वहां मौजूद थे पू छने पर पता चला कि स्वराज भवन मे प्रवेश बंद है क्यूंकि राहुल गाँधी उस दिन इलाहाबाद आने वाले थे तो हम वापस घर आ गए ओर अगले दिन यानी २९ तारीख को फ़िर गए तब स्वराज भवन देखा । जैसे ही गेट से अन्दर जाते है तो जो स ड़क दिखती है वो गोलाकार है और सड़क के दोनों ओर दोनों तरफ़ अशोक के पेड़ लगे है । गेट से ही बीच मे बना ए...