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Showing posts from April, 2010

स्मार्ट गार्डनर

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अब आजकल तो सभी जगह गर्मी की बहार सी आई हुई है और यहां भी जब कभी सूरज देवता नजर आते है तो अपने पूरे तेज के साथ नजर आते है यानी कड़क धूप । वैसे यहां पर बारिश मे तो लोग छाता लेकर चलते ही है पर अगर धूप निकली हो तब तो जरुर ही छाता लेकर चलते है। क्यूंकि धूप से बचना भी बहुत जरुरी होता है क्यूंकि यहां बिलकुल झुलसा देने वाली धूप होती है। और वो शायद इसलिए क्यूंकि यहां कोई प्रदुषण नहीं है । धूप के समय हर तरफ रंग-बिरंगी छतरी नजर आती है। :) यहां पर बागीचे और पार्कों मे काम करने वाली महिलायें भी इस बात का पूरा ध्यान रखती है । यूँ तो ये लोग पूरे दिन काम नहीं करती है बस सुबह के २ घंटे काम करती है और उसके बाद चली जाती है। ( अभी तक तो हमने इतनी देर ही इन्हें काम करते देखा है ) फिर भी ये ख्याल रखती है और अपना धूप से बचाव करती है और इसके लिए वो कैप,छाता,और सिर पर कपडा वगैरा बाँध करके ही काम करती है। ये बहुत अच्छी बात ये है । वैसे यहां जो औरतें मजदूरी करती है वो भी हमेशा अपना मुंह और सिर कपडे से बांधे रहती है धूप और धूल - मिटटी से

९ बच्चों की मम्मी हमारी मौसी :)

अब बचपन के दिन तो हरेक के जीवन के सबसे सुखद और सुन्दर होते है ,इसमें तो कोई दो राय नहीं है। और बीते हुए दिन जब याद आते है तो कभी-कभी लगता है कि काश वो दिन फिर से दोबारा आ जाए। क्यूँ हम गलत तो नहीं कह रहे है ना। :) आज अचानक हमे ये किस्सा याद आ गया । बात तो ७० के दशक की है । उस जमाने मे गर्मी की छुट्टियाँ बिताने के लिए कभी हम ननिहाल (फैजाबाद ) कभी ददिहाल (बनारस) या फिर अपनी छोटी मौसी के यहां (वो जहाँ भी रहती थी क्यूंकि मौसाजी का ट्रांसफर होता रहता था ) जाते थे , कभी ट्रेन से तो कभी कार से । और उस समय अक्सर ऐसा होता था कि अगर मौसी हम लोगों के यहां इलाहाबाद आती थी तो उनके वापिस लौटने पर हम लोग भी कुछ दिन के लिए उनके यहां चले जाते थे। या अगर हम लोग उनके यहां जाते थे तो हम लोगों के वापिस लौटने पर वो लोग हम लोगों के साथ इलाहाबाद आते थे । वैसे ये बड़ा ही रुटीन फीचर था। :) ऐसी ही एक गर्मी की छुट्टी मे हम चारों बहने मौसी के यहां सीतापुर गए थे और जब कुछ दिन रहने के बाद वहां से इलाहाबाद वापिस लौटने लगे तो मौसी भी अपने पाँचों बच्चों के साथ हम लोगों के साथ चली। उस समय मौसी बहुत

राजीव प्रताप रूडी बन गए है सह -पायलट

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जी हाँ राजनीति के साथ-साथ राजीव प्रताप रूडी अब सह-पायलट भी बन गए है। आजकल वो सह-पायलट की हैसियत से इंडिगो एयर लाईन्स के हवाई जहाज उड़ा रहे है। है ना चौंकाने वाली बात । कल इंडियन एक्सप्रेस अखबार मे जब हमने ये खबर पढ़ी थी। तो हम भी कुछ चौंक गए थे । खैर आप भी खबर पढ़िए और उनकी ये फोटो देखिये । अब ई-पेपर मे तो फोटो नजर नहीं आ रही है इसलिए हम कैमरे से खींच कर यहां लगा दे रहे है। वैसे एक बात है राजीव रूडी पायलट की ड्रेस मे काफी स्मार्ट लग रहे है । क्यूँ ठीक कह रहे है ना। :)

हाय ! जनता के ये नेता है .....

कल भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली मे बढ़ती महंगाई के विरोध मे सरकार के खिलाफ रैली थी जिसमे एक दिन पहले से ही ५ लाख लोगों के जमा होने की आशंका जताई जा रही थी पर शायद ३ लाख लोग इस रैली मे शामिल हुए थे। ऐसा न्यूज़ मे सुनने को मिला । दिल्ली जहाँ आजकल गर्मी का काफी प्रकोप है ऐसे मे दिल्ली मे रैली का होना और फिर उसमे बी.जे.पी.के बड़े-बड़े नेताओं का होना और कार्यकर्ताओं या यूँ कहें की दूसरे शहरों से भर-भर कर बसों मे जो लोग लाये जाते है यानी भारी और अपार भीड़ का जुटना। ऐसा लग रहा था की यू . पी . ए . सरकार की तो शामत ही आ जायेगी इस रैली के साथ ही। पर जो सोचो वैसा होता कहाँ है । दिल्ली मे सूरज देवता कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो रहे थे जिसके फलस्वरूप बी.जे.पी.के अध्यक्ष गडकरी जी को चक्कर आया और वो बेहोश हो गए । बेचारे गडकरी जी जहाँ सूर्य देव की तपन को बर्दाश्त नहीं कर पाए जबकि वो खुली गाडी मे चल रहे थे पैदल नहीं । वहीँ आम जनता पैदल चल रही थी , पूरे -जोश से नारे लगाती घूम रही थी। और बाद मे गडकरी जी को एयर कंडी शंड कार मे उनके घर ले जाया गया

बारिश बादल और कोहरे की आँख-मिचौली

आजकल दिल्ली और उत्तर भारत मे बहुत ज्यादा गर्मी पड़ रही है । आज सुबह ही बेटे से बात हुई तो उसने कहा कि दिल्ली मे गर्मी के मारे बुरा हाल है ।और उसके ठीक उलट यहां ईटानगर मे बारिश के मारे बुरा हाल है ।यहां भी मार्च के दूसरे हफ्ते मे बहुत गर्मी पड़नी शुरू हो गयी थी पर मार्च के आखिरी हफ्ते से जो बारिश शुरू हुई है कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही है । कभी- कभी अचानक ही खूब जोर-जोर से बारिश शुरू हो जाती है तो कभी अचानक बादल या यूँ कहें कि बिलकुल ऐसा घना कोहरा घिर आता है कि सब कुछ उस बादल और कोहरे की धुंध के पीछे छिप जाता है और चंद क्षणों के बाद ही बादल एकदम छंटने लग जाता है और एक खूबसूरत नजारा दिखता है । :) और ऐसा नजारा यहां अक्सर क्या रोज ही देखने को मिल रहा है। इस खूबसूरत नज़ारे का हमने विडियो बनाया है ,आप भी देखिये। आप लोग गर्मी से परेशान है और हम बारिश से । :)

कब तक इसी तरह अजन्मी बच्चियों को मारते रहेंगे ?

कल न्यूज़ मे देखा कि किस तरह अहमदाबाद मे १५ कन्या भ्रूण कचरे मे मिले।जो बहुत ही शर्मनाक और दुखद है कि आखिर इतनी सारी अजन्मी बच्चियों को मारने से उन माँ-बाप और डॉक्टर को क्या मिला। कितने अफ़सोस कि बात है कि एक तरफ तो देश मे लड़कियों को आगे बढाने की बात की जाती है तो वहीँ दूसरी ओर इस निर्ममता से कन्याओं की हत्या की जाती है। ऐसे डॉक्टर जो इस तरह के जघन्य अपराध करते है और जिनके लिए पैसा ही सब कुछ होता है उनसे तो उनकी मेडिकल की डिग्री वापिस ले लेनी चाहिए । डॉक्टर जिन्हें भगवान का रूप माना जाता है वही हत्यारे बन जाते है ।जबकि उन्हें डॉक्टर बनने पर शपथ भी दिलाई जाती है कि वो कभी भी कुछ गलत काम नहीं करेंगे । पर रुपया कमाने की लालच मे वो सब कुछ भूल जाते है । ऐसे डॉक्टर जिनकी अपनी बेटी भी होती होंगी क्या एक क्षण के लिए भी उनका दिल उन्हें धिक्कारता नहीं है ऐसा करने के लिए। इतनी अजन्मी बच्चियों को मारने से मिला रुपया-पैसा कैसे उन्हें फलता-फूलता है। ८० के दशक मे एक बंगाली फ़िल्म देखी थी कन्या भ्रूण पर आधारित ,और तब लगा था कि लोग किस तरह की मानसिकता के साथ जीते है जहाँ बेटी का जन्म

अब इसमें यू.पी.बिहार वाली क्या बात है ?

अरुणाचल प्रदेश मे ज्यादातर बैंक के ए. टी.एम. मे अलग लाईन जैसा कुछ system है शुरू मे ये हमें पता नहीं था। अब वैसे ए.टी.एम मे महिला और पुरुष की अलग लाईन का कोई तुक तो नहीं बनता है ।और कहीं ऐसा देखा भी नहीं था। यहां ए.टी.एम मे कोई भी गेट के बाहर नहीं इंतज़ार करता है बल्कि सभी लोग अन्दर लाईन लगा कर खड़े रहते है ।बिलकुल एक के पीछे एक इतना पास-पास खड़े रहते है कि एक दूसरे का पिन नंबर भी देख सकते है। ये जरुर हमारे पतिदेव ने बताया था। वैसे ए.टी.एम.के बाहर लिखा भी रहता है तो भी हर कोई अन्दर आ जाता है । खैर ये जनवरी की बात है जब हम नए-नए थे, एक दिन हम एक बैंक के ए.टी.एम. मे पैसे निकालने गए और चूँकि वहां ३-४ लड़के अन्दर खड़े थे इसलिए हम शराफत मे गेट पर खड़े होकर अपने नंबर का इंतज़ार करने लगे । ए . टी . एम के अन्दर एक महिला भी थी जो कभी ए . टी . एम . मशीन के पास जाती और कभी वापिस गेट पर आती । हम समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर माजरा क्या है । फिर उसने हमसे पूछा कि क्या हम उसकी पैसे निकालने मे मदद कर देंगे । तो हमने हाँ कह दिया । तब