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हैप्पी फादर्स डे आज की पोस्ट पापा के नाम

पिता के बारे मे जितना कहा और लिखा जाए वो कम है। पिता की छत्र छाया मे पल कर बड़े होना जिसमे संस्कार और संरक्षण के साथ-साथ प्यार भी खूब मिलता है । पापा जिनका हाथ पकड़ कर चलना सीखा जिनकी उंगली पकड़ कर आगे बढ़ना सीखा याद नही कभी जब आपने जोर से डांटा हो पर रिक्शे पर अपने पैरों पर बिठा कर घुमाने ले जाना खूब याद है आज फादर्स डे के दिन हम सब भाई-बहनों की ओर से पापा आपको हैप्पी फादर्स डे हम सबको गर्व है कि हम आपके बच्चे है। ब्लॉगर परिवार के सभी सदस्यों को फादर्स डे की हार्दिक शुभकामनाएं ।

बंद और चक्का जाम

चाहे कोई राजनैतिक पार्टी हो या कोई आन्दोलन कारी हो जिस किसी को भी आपना आक्रोश दिखाना होता है वो बंद , और चक्का जाम का सहारा लेता है। पिछले १४-१५ दिनों से आरक्षण के लिए राजस्थान मे गुज्जर आन्दोलन के चलते सारे रेलवे ट्रैक को गुज्जर आन्दोलन कारियों ने जाम कर रक्खा है। कितनी ही ट्रेन रद्द कर दी गई और कितनी ही ट्रेनों के रास्ते बदल दिए गए। और जब ये आन्दोलन और बढ़ा तो इसने दूसरे राज्यों मे भी अपना रूप दिखाया जैसे दिल्ली ,यू,पी,वगैरा मे जब ये आन्दोलन बढ़ा तो ना केवल रेलवे ट्रैक बल्कि सड़कों को भी बंद किया गया और चक्का जाम किया गया। अभी गुज्जरों का आन्दोलन चल ही रहा था कि केन्द्र सरकार द्वारा की गई पेट्रोल ,डीजल ,और एल,पी,जी,गैस के दामों मे हुई बढोत्तरी और महंगाई को लेकर लेफ्ट ने आन्दोलन का एलान कर दिया। लेफ्ट पार्टी यू.पी.ए.सरकार मे पहले दिन से ही उनकी नीतियों के ख़िलाफ़ जब-तब रुठती रहती है और समर्थन वापसी की धमकी भी देती रहती है पर बस जनता के लिए ही वो सरकार का साथ दे रही है। इस तरह से धमकियाँ देते हुए लेफ्ट ने ४ साल तो निकाल ही दिए है पर अब पेट्रोल के दामों के बढ़ने पर एक बा...

चंदौली का घर

अब तो खैर जमाना हो गया है अपने गाँव के घर मे गए हुए पर जब हमारे बाबा थे तो हम लोग जब छुट्टियों मे बनारस जाते तो चंदौली भी जरुर जाते थे।बनारस और चंदौली का सफर मुश्किल से आधे घंटे का होता था और जैसे ही मुख्य सड़क से कार गाँव की गली मे मुडती थी कि एक पल मे ही सब कुछ बदल जाता था। अब ४० साल पहले तो बनारस शहर और चंदौली जैसी छोटी सी तहसील मे बड़ा फर्क होता था। वैसे सुना है की अब चंदौली बहुत ही बदल गया है। पर देखा नही है। वहां पर हम लोगों का चार मंजिला घर था । घर का मेन गेट खूब बड़ा सा होता था और जितना बड़ा गेट उतनी ही बड़ी उसकी सांकल (latch) होती थी।और तब तो घंटी का सिस्टम था नही इसी सांकल को जोर-जोर से खट खटाया जाता था। लकड़ी के गेट से जैसे ही अन्दर जाते तो कुआँ होता था उस ज़माने मे वहां नल नही था।कुएँ का पानी ही नहाने और खाना बनाने और पीने के लिए इस्तेमाल होता था।और फ़िर एक बड़ा सा बरामदा और उसके बाद शुरू होते थे कमरे। गर्मी मे कमरों को ठंडा रखने के लिए खस की पट्टी का इस्तेमाल होता था जिसे हर थोडी देर मे पानी से भिगोना पड़ता था। उस समय खूब बड़े-बड़े पंखे होते थे जो कमरे मे ऊपर की त...

रबर की सड़क

क्या आप रबर की सड़क के बारे मे जानते है। नही तो चलिए हम बता देते है। आजकल की बढ़िया सड़क के बारे मे तो हम लोग जान गए है बकौल लालू यादव हेमा मालिनी के गाल की तरह चिकनी , पर जब हम छोटे थे तब रबर की सड़क होती थी ।क्यों ये सुनकर आश्चर्य हुआ ना ।हमारे दादा खूब किस्से सुनाते थे। तब तो उनकी बातें सुनकर हम सब बच्चे आश्चर्य मे पड़ जाते थे ।ये रबर की सड़क का किस्सा उनमे से ही एक है। अब ६५-७० के दशक मे तो इलाहाबाद की सड़कें तो फ़िर भी ठीक होती थी पर बनारस की सड़क कुछ अजीब सी तरह की होती थी कुछ उबड़-खाबड़ सी और खुरदरी सी और दिखने मे सफ़ेद। और गोदौलिया के चौराहे के पास तो गड्ढे भी होते थे ।सड़क ऐसी की अगर रिक्शे पर जाए तो पूरे शरीर का अंजर-पंजर ढीला हो जाए। इलाहाबाद और बनारस का क्या तब हर हाई वे बस लाजवाब ही होता था। इतनी पतली सड़क की दो गाड़ी आराम से निकल जाए तो गनीमत और उस पर सड़क के दोनों और मिटटी । बारिश मे तो और भी बुरा हाल हो जाता था इन सड़कों का।और बारिश मे जब भी सफर पर जाते तो लगता था की कहीं गाड़ी मिटटी के दलदल मे ना फंस जाए। (इलाहाबाद,बनारस,लखनाऊ ,कानपुर तो ...

संतान हो या ना हो जुल्म करने वालों को कोई फर्क नही पड़ता है

जिंदगी इम्तिहान लेती है वाली पोस्ट पर अमर जी ने जो टिप्पणी छोडी थी इससे दो घटनाएं याद आ गई जिसमे से एक घटना का हम आज जिक्र कर रहे है और अगली घटना का जिक्र अगली पोस्ट मे । और ये घटना हमारे एक बहुत ही करीबी जानने वाले की भांजी के साथ हुई है।अब यही कोई १० साल पहले की घटना है बेबी उसको घर मे सब लोग इसी नाम से बुलाते है ।बेबी के पिता निहायत सीधे इंसान है । घर मे माँ का ही हुक्म चलता है। माँ जो कहें वही सही और वही घर के सब मानते है। उसकी माँ पढी-लिखी और एक हद तक समझदार भी मानी जाती है पर अपनी बेटी के मामले मे वो बहुत ही ग़लत साबित हुई। पहले भी और आज भी भी यू.पी.मे परिवार बेटी की शादी करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना ज्यादा बेहतर समझते है।बेबी परिवार की बड़ी और अकेली बेटी।गोरी ,सुंदर । बहुत लाड-प्यार से माँ-बाप ने पाला । माँ को हमेशा ये लगता था की बेटी की जितनी जल्दी शादी हो जाए उतना ही अच्छा है । लोगों ने समझाया की अब ज़माना बदल गया है पहले उसे पढ़ - लिख लेने दो फ़िर शादी करना पर उन्होंने इस मामले मे किसी की भी ...

माँ,अम्मा,मम्मी

माँ जिन्हें हम सब भाई बहन अलग - अलग नाम से बुलाते कोई माँ तो कोई अम्मा तो कोई मम्मी कहता । आज माँ हम सबसे बहुत दूर है पर आज भी माँ हम सबके बहुत करीब है । आज भी उनका प्यार करना उनका डांटना उनका दुलारना सब याद आता है । माँ जिन्होंने जिंदगी मे कभी हार नही मानी , यहां तक की मौत को भी तीन बार हराया पर आख़िर मे जिंदगी ने उन का साथ छोड़ दिया । और माँ ने हम सबका । आज भी माँ का वो हँसता मुस्कुराता चेहरा आंखों और दिल मे बसा है माथे पर बड़ी लाल बिंदी और मांग मे सुर्ख लाल सिन्दूर सब याद आता है , बहुत याद आता है ।

ट्राइबल गाँव की आँगन वाडी

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गोवा के ट्राइबल गाँव मे घूमते हुए हम यहां की आंगन वाडी मे गए और आँगन वाडी की साफ-सफ़ाई और बच्चों को ड्रेस मे देख कर अचंभित हुए बिना नही रहे। आम तौर पर आँगन वाडी मे ड्रेस का कोई सिस्टम नही होता है पर इस आँगन वाडी मे इंचार्ज और अभिभावकों ने मिल कर ये ड्रेस का सिस्टम रक्खा है।इस ड्रेस का खर्चा बच्चों के माता-पिता ही करते है। और वहां की इंचार्ज ने बताया की इससे अभिभावकों को भी अच्छा रहता है और बच्चो ं मे स्कूल जाने की भावना भी आती है। जब हम लोग यहां पहुंचे तो बच्चे अपने खेल मे मस्त थे।हम लोगों को देख कर पहले टीचर ने और फ़िर बच्चों ने गुड मॉर्निंग कहा। उसके बाद टीचर ने इन बच्चों को एक गाना सुनाने को कहा। और बच्चों ने एक्शन के साथ गाना सुनाया । थोडी देर आँगन वाडी मे रुकने के बाद हम लोग वापिस पंजिम की ओर चल पड़े ।

अंडमान मे रहते हुए जब मजबूरी का एहसास होता है.(१)

यूं तो अंडमान मे हमारा तीन साल का समय बहुत ही अच्छा बीता पर उन्ही तीन सालों मे हमारे मायके और ससुराल मे अच्छे काम भी हुए माने दीदी और ननद की लड़की की शादी हुई। और उन्ही तीन सालों मे हम लोगों के जीवन की सबसे बड़ी ट्रेजडी भी हुई । जून से नवम्बर का समय तो बस अंडमान घुमते हुए मजे मे निकल रहा था। नवम्बर मे दीदी बेटी की शादी मे दिल्ली आए और उसके बाद हम लोग करीब १० दिन दिल्ली रहकर वापिस अंडमान चले गए।अंडमान पहुँचने के एक हफ्ते बाद यानी २ दिसम्बर २००३ की शाम को दिल्ली से हमारी ननद का फ़ोन आया कि पापाजी (ससुरजी ) घर मे गिर गए है।और उनके पैर मे फ्रैक्चर हो गया है। वो लोग पापाजी की खूब देख भाल कर रहे थे।और चूँकि हमारी ननद और नन्दोई डॉक्टर है इसलिए हम लोगों को चिंता करने की कोई जरुरत नही थी। इसलिए हम लोग निश्चिंत थे । रोज हम लोग उनका हाल-चाल लेते थे और उनसे बात करते थे।पर अचानक १३ दिसम्बर को दिल्ली से फ़ोन आया कि पापाजी को हार्ट अटैक हुआ है । पापा की हालत काफ़ी ख़राब है और उन्हें हॉस्पिटल ले जा रहे है। उस समय पापाजी से बात की और ननद और नन्दोई से बात हुई ।और पतिदेव ने...

ये कैसी सोसाइटी ....

मुम्बई मायानगरी की एक बड़ी ही दिल मे हलचल मचाने वाली न्यूज़ देखी । मुम्बई की एक ग्रुप हाऊसिंग सोसाईटी जहाँ सारे घरों मे हिंदू जैन परिवार रहते है उसी सोसाइटी मे एक मुस्लिम परिवार भी रहता है । पर सोसाइटी के लोगों ने इस मुस्लिम परिवार के घर का पानी और बिजली बंद कर रक्खी है । पिछले २ सालों से ये परिवार लालटेन और मोमबत्ती की रौशनी से अपने घर मे उजाला करता है । और मुनिस्पल्टी के नल से जरी कैन मे पानी भर - भर कर अपने घर लाता है । वो भी सीढियों के रास्ते क्यूंकि लिफ्ट मे तो उनको चलने की मनाही है । हफ्ते मे एक दिन वो अपने किसी दूसरे रिश्तेदार के घर जा कर परिवार के कपड़े धोते है । इस मुस्लिम परिवार का कहना है कि बिजली - पानी के लिए उन्होंने १ . २५ लाख का डिपॉजिट भी सोसाइटी को ९ महीने पहले दे दिया था पर आज तक ना तो पानी और ना ही बिजली उनके घर मे आई । इस परिवार को सोसाइटी से बाहर करने के लिए भी बाकी दूसरे परिवार लगे हुए ह...

उच्चारण का फर्क

कई बार हमारे उच्चारण शब्द को बदल या तोड़ देते है और हमे पता ही नही चलता है। और उच्चारण का ये फर्क हमने यहां गोवा आकर ही जाना है। पहले तो सिर्फ़ सुनते थे की champagne को शैम्पेन कहा जाता है फ्रेंच मे । पर यहां आकर तो हम इस तरह के उच्चारण से रूबरू भी हुए ।जैसे यहां पर एम (M) ज्यादातर शब्दोंमे नाम के आख़िर मे होते है पर साथ ही M ज्यादातर शब्दों मे मूक होता है । टी (t) को त बोलते है ।यूं तो स को श और श को स तो बोलते सुना है च को स बोलते सुना है गोवा से पहले अंडमान मे जो हमारा कुक था वो च को श बोलता था मसलन शाय , शीनी वगैरा । पर यहां तो स को च और च को स बोलते है । ना को ण आदि। हो सकता है इनके शब्दों के ऐसे उच्चारण का कारण शायद पुर्तगीज के यहां बहुत समय तक रहने की वजह हो । गोवा मे इंग्लिश मे अधिकतर शब्दों के अंत मे एम (M) लगता है पर एम साइलेंट होता है। जैसे panjim,,bicholim,siolim,morjim, इत्यादी। अब आम हिन्दी भाषी होने के नाते हम लोग इनका उच्चारण पंजिम,बिचोलिम,सिओलिम,मोरजिम ही करते थे पर जब किसी लोकल goan से कहते सिओलिम तो वो कहते अच्छा सिओली...

कहीं टीम इंडिया की लुटिया फ़िर ना डूब जाए

क्या आपको हमारी बात पर यकीन नही हो रहा है।लीजिये सारी जगह शोर मचा हुआ है। अरे अब ग्रेग के बाद गैरी जो आ गए है । बड़ी मुश्किल से तो टीम इंडिया गुरु ग्रेग के बताये हुए नुस्खों से बाहर निकल पायी और टीम इंडिया मे दुबारा भरोसा बनना शुरू हुआ पर लगता है बी.सी.सी.आई. से टीम इंडिया और भारतीय जनता की खुशी देखी नही जा रही है तभी तो एक नया कोच गैरी क्रिस्टन टीम के लिए रख लिया गया है। एक ग्रेग को रख कर देखा और नतीजा जो हुआ वो सारा भारत क्या सारी दुनिया जानती है कि किस तरह टीम इंडिया विश्व कप मे हारी थी और वो भी बांगला देश के हाथों। पर शायद अभी भी बी.सी.सी.आई को कुछ और ही मंजूर है।तभी तो फ़िर एक बार नया विदेशी कोच लाया गया है। भाई जब भारतीय मैनेजर और कोच टीम इंडिया को सही राह दिखा रहे है तो फ़िर विदेशी कोच की क्या जरुरत है। पर बी . सी . सी . आई और पवार साब को कौन समझाए । पवार साब अपने मंत्रालय की बजाय क्रिकेट मे लगे रहते है।पर क्रिकेट की तरह अगर अपने मंत्रालय पर जरा ध्यान दे तो शायद ज्यादा बेहतर होगा। (क्या पता किसानों का कुछ भला ही हो जाएक्यूंकि लोन माफ़ी मे तो बहुत सारे गड़बड़ घ...

आत्महत्या और शिक्षा प्रणाली

मार्च का महीना यानी दसवीं और बारहवीं के बोर्ड के इम्तिहान का समय । हर साल फरवरी और मार्च के महीने मे छात्र -छात्राओं द्वारा आत्महत्या की खबरें पढने -देखने को मिलती है। बच्चों के कोमल दिमागमे पढ़ाई के साथ-साथ मे बोर्ड और फ़ेल और पास होने को लेकर इतना भय रहता है की कई बार बच्चे ऐसी परिस्थितियों से छुटकारा पाने के लिए आत्महत्या का सहारा ले लेते है। ऐसे कदम उठाने मे बच्चे का कोई दोष नही होता है बल्कि माँ-बाप और स्कूल वाले ही उन्हें एक तरह से ऐसा करने को उकसाते है। आज के समय मे जहाँ हर कोई ९० %और १०० %की बात करता है वहां ६०-७०और ८० % वालों की कोई पूछ नही है। पर क्या हमारी शिक्षा प्रणाली इसके लिए जिम्मेदार है।अभी दो-तीन दिन पहले संसद मे भी इस विषय पर चर्चा हुई थी और ये कहा जा रहा है कि इम्तिहान का सिस्टम ही खत्म कर देना चाहिए।पर क्या इमिहान ख़त्म कर देने से सब समस्या हल जायेगी। खैर अगर हम अपने समय की बात करें तब तो हम लोगों के पास(यू.पी.बोर्ड मे ) ओप्शन होता था आर्टस और साईंस का और अपनी पसंद के विषय पढने का।कोई भी पाँच विषय लिए जा सकते थे। उस समय ये नही होता था की सोशल साईंस मे च...

हमार बियाह तो रेडियो से हुआ है ना

ओह हो शीर्षक देख कर चौंकिए मत। यहां हम अपनी बात नही कर रहे है बल्कि अपने पापा-मम्मी के बारे मे बात कर रहे है। दरअसल मे कल हमारी पापा से फ़ोन पर बात हो रही थी और बातों ही बातों मे हमने उनसे पूछा कि आप ने किताब के लिए कुछ लिखना शुरू किया या नही । तो इस पर पापा बोले कि उन्होंने मम्मी के साथ हुए एक वाक़ये को कुछ लिखा तो है पर फ़िर आगे लिखने का मन नही हुआ । हमारे कहने पर कि आप थोड़ा - थोड़ा ही लिखिए । पर लिखिए जरुर । इसपर पापा ने हमे बताया कि उन्होंने क्या लिखा था । ये किस्सा उस समय का है जब पापा - मम्मी की नई - नई शादी हुई थी उस समय पापा यूनिवर्सिटी मे पढ़ते थे और होस्टल मे रहते थे । और चूँकि उस ज़माने मे पढ़ते हुए शादी हो जाती थी इसलिए मम्मी अपनी ससुराल मे रहती थी । ससुराल मे बाबूजी , दादा ( जेठ ) बड़ी अम्मा ( जेठानी ) रहते थे । उस ज़माने मे ससुर जी और जेठ से बहुत ज्यादा बात करने का रिवाज नही था हालांकि बाबूजी हमेशा मम्मी से बात करते थ...

अब कार्ड वालों के लिए ए .टी.एम की सेवा मुफ्त मे होने की सम्भावना

नब्बे के दशक मे कुछ मल्टी नेशनल बैंकों जैसे सिटी बैंक , एस.सी.बी.(stan chart bank) तथा कुछ अन्य बैंकों ने भारत मे जब ए .टी. एम की शुरुआत की थी तब लगता था कि क्या अपने हिन्दुस्तान मे ये क्रेडिट कार्ड और ए . टी . एम सेवा चल पाएगी क्यूंकि ना तो क्रेडिट कार्ड के बारे मे लोग जानते थे और ना ही ए . टी . एम जैसी मशीन के बारे मे भी लोगों ने सुना था । क्रेडिट कार्ड और एम . टी . एम का सबसे बड़ा फायदा था कि बिना बैंक जाए किसी भी समय वक्त - जरुरत पड़ने पर पैसा निकाला जा सकता था । उन दिनों तो ये बैंक एक तरह से लोगों को पकड़ - पकड़ कर अपना ग्राहक बना रहे थे । वैसे आज भी ये सिलसिला जारी है । :) उस समय तक तो हर कोई बैंक से ही पैसा निकालने और जमा करने का आदी था।लोग बैंक मे सुबह दस बजे से ही पैसा निकालने के लिए लाइन मे लगते और कभी १०-१५ मिनट मे तो कभी आधा घंटा लगता पैसा निकालने और जमा करने मे। उस पर से अगर बैंक वाले चाय पीने चले जाते तो कभी पान खाने तो थोड़ा और इंतजार करना पड़ता था। इंग्लिश फिल्मों मे तो बहुत ब...

इश्क-विश्क प्यार-.....

कल तीन महीने के दौरे के बाद टीम इंडिया कल भारत लौटी तो उसका जोरदार स्वागत हुआ और ढेर सारे इनाम भी दिए गए। अभी ये जश्न थमा भी नही था कि सारे न्यूज़ चैनल सभी नए और अविवाहित खिलाड़ियों की शादी और इश्क के चक्कर मे पड़ गए।कहीं धोनी को दिखाते की उनके लिए किस तरह लड़कियां शादी का प्रस्ताव रख रही है तो कहीं युवराज को दिखाते की उनकी शादी होते-होते रह जाती है। तो कहीं प्रवीण कुमार को दिखाते की उनके लिए कितने रिश्ते आ रहे है। तो कहीं इरफान पठन को दिखाते और उनके प्यार की कहानी बताते । अरे भइया अभी-अभी तो धोनी और युवराज का दीपिका के साथ नाम जुड़ने का अंजाम देख चुके है कि युवराज को उससे उबरने मे कितना समय लगा वो तो जैसे खेलना ही भूल गए थे। अब इरफान पठन कल दिल्ली मे हुए जश्न मे शामिल नही थे तो उसका कारण भी इश्क बताया जा रहा है कि कल इरफान मुम्बई से सीधे अपनी गर्ल फ्रेंड से मिलने चले गए थे।अरे जरा कुछ दिन सब्र तो कर लो। अच्छे भले और सुधरे हुए खिलाड़ियों को क्यों बिगाड़ने मे लगे है ये सभी चैनल वाले। यूं तो प्यार करना कोई ग़लत बात नही है पर ये चैनल वाले जिस तरह से प्यार की रेड़ पीटते है कि बस...

बड़ा नही मैं तो छोटा हूँ

हम माँ-बाप अपने बच्चों को बहुत जल्दी बड़ा बना देते है। और ऐसा अक्सर तब होता है जब दूसरा बच्चा जन्म लेता है। तब जाने-अनजाने हम अपने पहले बच्चे को बड़ा बच्चा बना देते है।और इस बात का एहसास हमे हमारे बेटे ने कराया था कि वो बड़ा नही छोटा है। और इसीलिए छोटा बच्चा आने के पहले से ही हमने भी अपने बड़े बच्चे को उसके बड़े होने का एहसास तरह-तरह से कराने की कोशिश की . और जैसा कि दूसरे लोग करते थे हमने भी वही किया क्यूंकि हम समझते थे कि ऐसा करने से दोनों बच्चों मे प्यार रहेगा और बड़ा बच्चा छोटे बच्चे को अपना प्रतिद्वंदी नही मानेगा । जब तब बेटे को कहते कि तुम बड़े हो रहे हो और अब तुम्हे भइया कहने वाला आ रहा है। वगैरा-वगैरा और उस समय हमे लगता कि हम ऐसा करके बहुत अच्छा कर रहे है। पर वो हमारा भ्रम था जिसे हमारे बेटे ने तोडा था। बात उस समय की है जब हमारा बड़ा बेटा तीन साल का था और हमारा छोटा बेटा पैदा हुआ था । हॉस्पिटल और घर मे हर जगह हम लोग उससे यही कहते की अब तुम बड़े हो गए हो देखो ये तुम्हारा छोटा भाई है। तुम्हे इसका ख़्याल रखना होगा। और इसी तरह की ढेर सारी बातें। और हमा...

पुनर्जन्म का चक्कर अब टी.वी.सीरियल मे भी

टी.वी.सीरियल की एक बात बहुत अच्छी है कि इसमे दर्शक कुछ भी मिस नही करता है क्यूंकि आप जब भी देखना शुरू करें लगता है कहानी अभी वहीं की वहीं है हाँ बस खलनायक और खलनायिका के जुल्म जरुर बढ़ गए होते है। वो चाहे क्यूंकि ......हो या कहानी घर....हो सलोनी हो...या दुल्हन ...या फ़िर छूना है आस्मान ही क्यों ना हो। अभी कल ही हमने कई दिनों बाद जी टी.वी.देखा तो दुल्हन सीरियल मे कहानी तो कुछ ख़ास नही बढ़ी थी पर हाँ पुनर्जन्म का किस्सा देखने को मिला और हमे हमारी पोस्ट लिखने का विषय भी मिला। टी.वी.के सीरियल मे भी फिल्मी दांव-पेंच देखने को मिलते है। अब जब टी . वी . मे जब नाच - गाना सब कुछ फिल्मी स्टाइल का होने लगा है तो भला पुनर्जम का विषय कैसे छूट जाता। अभी तक तो फिल्मों मे ही पुनर्जन्म दिखाया जाता था पर अब तो टी . वी . के सीरियल मे भी पुनर्जन्म की कहानी दिखाने का चलन होने जा रहा है।पुनर्जन्म पर बनी फिल्में जैसे सुभाष घई की कर्ज और अभी हाल ही मे बनी फरहा खान की ओम शान्ति ओम काफी चली है। अभी तक एकता कपूर के सीरियल मे तथा ...

बेलिबास योगा ( गुरु और रूप अनेक )

योगा जिसे भारत मे सदियों से ऋषि मुनि और साधू संत लोग करते आए है आज देश विदेश मे मशहूर हो रहा है।माना जाता है कि आज कल की भाग दौड़ भरी जिंदगी मे योगा करने से लोग स्वस्थ रहते है।योगा करने के लिए खुले माहौल जैसे बगीचे मे ,नदी या समुन्दर किनारे को सबसे अच्छा माना जाता रहा है। आज कल योगा बहुत ही ज्यादा प्रचलित हो रहा है । हर कोई योग गुरु बन रहा है। २०-२५ साल पहले दूरदर्शन पर भी योगा दिखाया जाता था जिसमे गुरु (सरदारी लाल सहगल) के दो शिष्य एक महिला और एक पुरूष उनके बताये हुए आसान करते थे। और गुरु बताते थे कि किस तरह से आसन करना है और किस आसन से कौन से रोग ठीक होते है वगैरा - वगैरा । कुछ समय बाद धीरेन्द्र ब्रह्मचारी और डॉली जी का कार्यक्रम दूरदर्शन पर आना शुरू हुआ जिसमे डॉली जी लोगों की समस्याएँ पढ़ती थी और धीरेन्द्र ब्रह्मचारी उनका जवाब देते थे और योग के विभिन्न आसान बताते थे। श्री श्री रवि शंकर जी भी योगा और मेडिटेशन और सुदर्शन क्रिया पर जोर देते है। ना केवल देशी बल्कि विदेशी लोग भी बड़ी संख्या मे इनके भक्त है।इनके एक-एक शिविर मे २५ से ३० हजार लोग आते ह...

सुनामी से हुई बर्बादी और हम

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सुनामी के दिन करीब चार-पांच घंटे बाद जब पानी उतर गया तो बाक़ी दूसरे लोगों की तरह हम लोग भी अपने घर की ओर गए ।घर जाते हुए मन मे एक अजीब सा डर था की पता नही घर का क्या हाल होगा। और जब हम लोग अपने घर पहुंचे तो घर की हालत देख कर सकते मे आ गए , कलेजा मुँह को आ गया।घर का सारा सामान तितर-बितर हो गया था। किचन का सामान जैसे मिक्सी,जूसर का एक पार्ट गार्डन मे तो दूसरा पार्ट दरवाजे पर। और डाइनिंग टेबल का सामान जैसे मैट्स ,स्पून ,अचार और जैम की बोत्तले सब बाहर बगीचे मे ।फ्रिज तो पूरा अप साईड डाउन माने उल्टा पड़ा हुआ था। लौंदरी बैग कपडों के साथ बाहर कीचड मे। ड्राइंग रूम का समान जैसे सोफा सेट वगैरा तो उलट - पलट गए थे । छोटे-छोटे सजावटी सामान इधर-उधर बिखरे पड़े थे।पतिदेव का ऑफिस का बैग बहकर दूर चला गया था । हमारे एक गणेश जी की मूर्ति ड्राइंग रूम से बहकर हमारे घर की सीढियों पर आ गयी थी।जिन्हें हमने उठाकर गाड़ी मे रख लिया था। पूरा घर काले रंग के कीचड और पत्तियों से भरा पड़ा था । चूँकि हमारे पैर मे चोट थी इसलिए हम तो अन्दर नही गए हमारे पतिदेव और बेटे ने घर मे जाकर ऊपर की मंजिल से धी...

बजट लो जी फ़िर आ गया

ये फरवरी के आखिरी दिन बजट के लिए ही बने है। हर साल १५ फरवरी बीतते -बीतते हर तरफ़ सिर्फ़ बजट का ही शोर रह जाता है कि इस साल शायद बजट मे जनता के लिए कुछ जबरदस्त होगा पर बजट पेश होने के बाद वही ढाक के तीन पात ।यानी ना तो आम आदमी और ना ही ख़ास आदमी खुश हो पाता है।आम आदमी ताउम्र सिर्फ़ इसी आस मे बिता देता है कि इस बार ना सही अगले साल का बजट जरुर कुछ अच्छा होगा। वो कहते है ना उम्मीद पर दुनिया कायम है । पहले यानी जब पढ़ते थे तब बजट से कोई ख़ास वास्ता नही रहा , हाँ हमेशा ये जरुर सुनते रहे कि इस साल इन्कम टैक्स मे छूट बढेगी या नही।शादी के बाद भी कुछ ऐसा ही सुनने को मिलता रहा कि इस साल इन्कम टैक्स मे छूट बढेगी या नही। एक्स्साइज ड्यूटी घटेगी या बढेगी। घरेलू चीजों, दवाओं के दामों मे कटौती या बढौती।रेल किराया और हवाई जहाज का किराया बढेगा या वही रहेगा।कौन -कौन सी चीजों पर सबसिडी मिलेगी। घर खर्च पर बजट से क्या असर होगा। लोक सभा मे बजट आने के बाद घर का बजट जरुर गड़बड़ा जाता है। उफ़ बाबा हर साल यही होता है जहाँ फरवरी आई हर कोई अपने हिसाब से सोचने लगता है । पर वित्त मंत्री ...