हमार बियाह तो रेडियो से हुआ है ना
ओह हो शीर्षक देख कर चौंकिए मत। यहां हम अपनी बात नही कर रहे है बल्कि अपने पापा-मम्मी के बारे मे बात कर रहे है। दरअसल मे कल हमारी पापा से फ़ोन पर बात हो रही थी और बातों ही बातों मे हमने उनसे पूछा कि आप ने किताब के लिए कुछ लिखना शुरू किया या नही । तो इस पर पापा बोले कि उन्होंने मम्मी के साथ हुए एक वाक़ये को कुछ लिखा तो है पर फ़िर आगे लिखने का मन नही हुआ । हमारे कहने पर कि आप थोड़ा - थोड़ा ही लिखिए । पर लिखिए जरुर । इसपर पापा ने हमे बताया कि उन्होंने क्या लिखा था । ये किस्सा उस समय का है जब पापा - मम्मी की नई - नई शादी हुई थी उस समय पापा यूनिवर्सिटी मे पढ़ते थे और होस्टल मे रहते थे । और चूँकि उस ज़माने मे पढ़ते हुए शादी हो जाती थी इसलिए मम्मी अपनी ससुराल मे रहती थी । ससुराल मे बाबूजी , दादा ( जेठ ) बड़ी अम्मा ( जेठानी ) रहते थे । उस ज़माने मे ससुर जी और जेठ से बहुत ज्यादा बात करने का रिवाज नही था हालांकि बाबूजी हमेशा मम्मी से बात करते थ...