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Showing posts from 2007

क्या वाकई ये साल भी बेकार गया।

अभी कुछ दिन पहले शास्त्री जी की एक पोस्ट पढ़ी थी जिसे पढ़कर हमने खूब सोचा कि क्या वाकई एक और साल बेकार गया। बहुत सोचने पर लगा कि नही इतना भी बेकार नही गया है । यूं तो आम तौर पर हर साल जीवन मे कुछ अच्छा तो कुछ बुरा होता है । २००७ मे और कुछ अच्छा भले ही न हुआ हो पर एक बात बहुत अच्छी हुई कि हम ने ब्लॉगिंग करना शुरू कर दिया । :) वैसे २००७ हमारे लिए बहुत मायने रखता है। हाँ ये जरुर है कि ये जो कुछ भी हुआ उसे लक्ष्य को पाना भले ही न कहें पर इन सबका हमारे जीवन मे महत्त्व जरुर है।यूं तो ये सब बहुत ही छोटी-छोटी बातें है पर फिर भी हम कुछ बातों का जिक्र यहां करना चाहेंगे। १)इस २००७ मे ही हमने कंप्यूटर चलाना सीखा। इससे पहले भी कई बार सीखा था पर हर बार कुछ दिन करने के बाद छोड़ देते थे। पर इस साल फरवरी से हमने कंप्यूटर पर जो काम करना शुरू किया तो अभी तक कर रहे है। :) २)आख़िर इसी २००७ मे हमने ब्लॉगिंग की दुनिया मे कदम रखा जहाँ शुरू मे तो सभी लोग अनजाने थे ,परिवार छोटा था पर धीरे-धीरे यही अनजाने लोग अपने होते गए और ये परिवार बड़ा ह

क्या सांप की आँख मे मारने वाले की तस्वीर उतर जाती है ?(एक और डरावनी पोस्ट )

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इस सवाल पूछने का एक कारण है वो ये कि ये सांप ( नाग का बच्चा जैसा कि हमारी झाडू लगाने वाली कह रही है )हमारे घर मे खाने के कमरे (dinning room )की बालकनी मे निकला था। क्यूंकि येसांप का बच्चा दरवाजे के पीछे छिपा हुआ था इसलिए झाडू वाली ने इसे पहले नही देखा और उसने जैसे ही दरवाजे के पीछे झाडू लगाई कि ये सांप का बच्चा बाहर आ गया ।झाडू वाली इसे देख कर डर कर जोर से चिल्लाई और जब हम वहां ये देखने को पहुंचे की झाडू वाली आख़िर चिल्लाई क्यूं तो हमारे भी होश उड़ गए इन छोटे मियां को देख कर। बिल्कुल काला ये बच्चा बार - बार अपना फन उठाता था और जीभ निकाल रहा था जिसे देखकर और भी डर लग रहा था । अब सवाल ये था कि इसे भगाया कैसे जाये क्यूंकि ये बच्चा अपने आप जा नही पा रहा था। बार - बार ये दीवार पर चढ़ता तो था पर दीवार ऊँची होने की वजह से बाहर नही जा पा रहा था ।और नाली से बाहर शायद ये जाना नही चाहता था। इसलिए कभी ऊपर कभी नीचे ये इधर-उधर घूमता रहा और इसी बीच हमने इसकी फोटो खींच ली। :) खैर हम लोगों की हिम्मत नही थी इसे भगाने या मारने की।चूँकि

सुनामी ना पहले कभी सुना और ना देखा

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२६ दिसम्बर२००४ को जब हम लोग अपनी गाड़ी मे भाग रहे थे ( ये वही सफ़ेद क्वालिस है जिसने उस दिन हम लोगों को पार लगाया था । )तो सामने हर तरफ पानी नजर आ रहा था और जिस रास्ते से हम लोग हमेशा जाते थे वहां पानी भर रहा था । और सामने के सीधे रास्ते पर गाड़ी ले जाने का मतलब था पानी की चपेट मे आना ।गाड़ी चलाते हुए पतिदेव ने पूछा किधर से चलें तो हमने बिना कुछ सोचे समझे कहा कि बाएँ से वो जो चडाई वाला रास्ता है । इस पर वो बोले रास्ता पता है तो हमने कहा रास्ता तो पता नही है पर जब इतने सारे लोग जा रहें है तो कहीं ना कहीं तो सड़क निकलेगी ही। और जैसे ही हम लोगों ने गाड़ी बायीं ओर मोड़ी तो जो दृश्य देखा कि बयाँ करना मुश्किल है। हर आदमी के चेहरे पर बदहवासी और डर का भाव और हम लोग भी इस भाव से अछूते नही थे।जो जिस तरह था पानी आता देख उसी हालत मे जान बचाने के लिए भाग रहा था। उस चडाई पर चढ़ते हुए लोगों का हुजूम किसी पिक्चर के सीन से कम नही था।उस समय ये तो अंदाजा लग गया था की कुछ गड़बड़ है पर इतनी ज्यादा तबाही ,कभी सोचा भी नही था। हमने उस से कहा कि कैमरा दो । कुछ फो

आजादी एक्सप्रेस एक झलक

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आजादी एक्सप्रेस जो दिल्ली से सितम्बर मे चली थी और कई राज्यों से होती हुई २३ दिसम्बर को गोवा के वास्को-डी-गामा स्टेशन पर तीन दिन के लिए आई थी। तो चलिए हमारे साथ आजादी एक्सप्रेस देखने।इस ट्रेन मे १८५७ से लेकर २००७ तक का भारत दिखाया गया है।किस तरह भारत आजाद हुआ और किस तरह भारत ने हर क्षेत्र मे तरक्की की है। आजादी एक्सप्रेस मे चढ़ने के पहले स्टेशन पर गोवा की आजादी की भी एक छोटी सी फोटो प्रदर्शनी लगाई गयी थी कि किस तरह गोवा १९६१ मे पुर्तगाल से मुक्त होकर भारत का हिस्सा बना था । अनिता जी और संजीत जी ने इसके बारे मे बहुत कुछ लिखा था। जिसने इस ट्रेन को देखने की चाहत जगा दी थी। सो जब ट्रेन गोवा आई तो हम पहुंच गए आजादी एक्सप्रेस देखने के लिए। अनिता जी की पोस्ट पढ़ने के बाद मन मे डर जरुर था की अगर कहीं मुम्बई की तरह यहां भी बहुत भीड़-भाड़ हुई तब तो देखना मुश्किल हो जाएगा। पर हमारी एक पोस्ट पर संजीत जी ने फाये जी का जिक्र किया था जिसके लिए हम संजीत जी का शुक्रिया करते है। खैर गोवा मे मुम्बई जैसी भीड़ नही थी और हमने बडे ही आराम से पूरी ट्रेन

२६ दिसम्बर की वो सुबह

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भला कैसे भूल सकते है अंडमान की २६ दिसम्बर २००४ की वो सुबह जिसने बहुतों की जिंदगी बदल दी।और कुछ हद तक हमारी भी। उस २६ दिसम्बर को हम लोग निकोबार जाने का प्रोग्राम बना रहे थे क्यूंकि निकोबार मे क्रिसमस और नया साल काफी जोश से मनाया जाता था। अब अंडमान मे थे तो सोचा कि निकोबार का क्रिसमस भीदेख लेना चाहिऐ। पर कहते है ना कि जो होता है अच्छे के लिए ही होता है । इसीलिए उस साल हम लोग क्रिसमस के लिए निकोबार न जाकर दो दिन के लिए एक दुसरे छोटे से द्वीप बाराटांग चले गए थे । क्यूंकि बेटा अपनी क्लास छोड़ना नही चाहता था । इसलिए २५ को ही घर वापिस आ गए थे । चूँकि हमारे बेटा जो कि उस समय दसवीं मे था उसने जाने से मना कर दिया था कि एक हफ्ते के लिए वो नहीं जाएगा ,इसलिए हम लोग निकोबार ना जाकर पोर्ट ब्लेयर मे ही थे। उन दिनों हम लोग पोर्ट ब्लेयर के जंगली घाट मे रहते थे।आज भी वो सारा मंजर बिल्कुल आंखों मे बसा हुआ है ,इतने सालों बाद भी कुछ भी नही भूले है। यूं तो उस दिन भी हम लोग सुबह ४.३० बजे उठे थे क्यूंकि हमारे बेटे को ५ बजे टियुशन के लिए जाना होता था (अ

सबसे सस्ती जिंदगी

आजकल जिंदगी से सस्ती तो शायद ही कोई चीज है इस दुनिया मे।जब जो भी जिसकी भी चाहे जिंदगी ले सकता है। वजह कोई भी हो सकती है दोस्त से नही पटी तो मार दो ,तनाव है तो मार दो,छुट्टी न मिले तो मार दो,भाई से गुस्सा तो मार दो ,पत्नी से अनबन तो मार दो,बेटियों को तो लोग बेमोल ही मारते रहते है।मारना भी कितना आसान हो गया है। और सजा मिलते-मिलते तो सालों बीत जाते है।सजा मिली तो ठीक वरना .... । जीवन जो भगवान की दी हुई एक नियामत है पर जिसे छीनने मे मनुष्य ज़रा भी नही झिझकता है।हर दिन ऐसी बातें सुननें और पढ़ने को मिल जाती है। जहाँ मन के खिलाफ बात हुई वहीं झट से जान ले ली। अरे जान ना हुई मानो सब्जी भाजी हो गयी ।पर सब्जी भाजी भी अगर पसंद की नही होती है तो एक बार को लोग छोड़ देते है पर ..... । आज के अखबार मे भी ऐसी ही कुछ खबर छपी थी (जिसने हमे सोचने पर मजबूर किया ) जिसमे एक पिता ने अपनी बेटी जो कि न बोल सकती थी और नाही कुछ समझती थी उसे नदी मे डूबाकर मार डाला ।क्यूंकि पिता का कहना था कि उसके चार बच्चे है और उसके पास कोई नौकरी नही है। ये तो हम सभी जा

ताली बजाना

कल यूं ही हम सहारा वन चैनल पर संगीत पर आधारित कार्यक्रम देख रहे थे जिसमे कार्यक्रम की शुरुआत मे राहुल जो प्रोग्राम के संचालक है वो कोई गाना गा रहे थे और जनता को ताली बजाने का इशारा कर रहे थे। आम तौर पर हर कार्यक्रम वो चाहे टी.वी.का हो या स्टेज पर होने वाले प्रोग्राम चाहे बड़े-बड़े फिल्मी प्रोग्राम हों या कोई और प्रोग्राम हों , होस्ट हमेशा लोगों को ताली बजाने के लिए कहते है कि अब फलां स्टेज पर आ रहें है और फलां का स्वागत जोरदार तालियों के साथ कीजिए।और जनता भी ऐसी होती है कि होस्ट के कहने पर ही ताली बजाती है। कभी-कभी बेमन से तो कभी बडे ही जोरदार ढंग से । जनता के ताली बजाने और न बजाने के दो उदाहरण हमे अभी हाल मे ही हुए दो बड़े समारोह मे देखने को मिले । पहला समारोह एड्स अवएरनेस पर आधारित कार्यक्रम था जिसकी होस्ट बार-बार जनता से मंच पर आने वाले लोगों का जोरदार तालियों से स्वागत करने को कहती थी तभी लोग ताली बजाते थे।यहां तक कि जो कलाकार प्रोग्राम मे भाग लेने आये हुए थे( मुम्बई और लोकल कलाकार) वो लोग़ भी हर थोड़ी देर मे जनता को ताली बजाने का इशारा करते थे। दूसरा उदाहरण लिबरेशन डे के मौ

शब्दों का फेर

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आज दोपहर डेढ़ बजे ज़ी न्यूज़ ने एक ताजा खबर दिखाई जिसमे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी बी.जे.पी.के द्वारा की गयी कल की घोषणा पर बोल रहे थे कि बी.जे.पी.को मोदी से खतरा है इसीलिए बी.जे.पी.ने कल लाल कृष्ण अडवानी को प्रधानमंत्री के पद का उम्मीदवार घोषित किया । ज़ी न्यूज़ मे कुछ इस तरह की ताजा खबर दिखाई जा रही थी। जरा गौर फरमाएं। अब बेचारे अडवानी जी प्रधानमंत्री बनते-बनते पीए बन गए। :) चलिए लगे हाथ एक और हिन्दी का नमूना दिखा देते है। ये बोर्ड बंगलोर के टीपू सुलतान के महल के बाहर बने बगीचे मे लगा है। यहां पर अगर हिन्दी गलत है तो एक बार को समझा भी जा सकता है पर ज़ी न्यूज़ पर गलती होना वो अभी ऐसी। पता नही अडवानी जी और बी.जे.पी के लोगों के दिलों पर क्या बीत रही होगी। :)

रिची -रिच

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अब ये कुछ अजीब सा शीर्षक तो है पर बात ये है की अभी चंद रोज पहले हम बंगलोर गए थे । अब चूँकि बंगलोर हम करीब तीस साल बाद गए थे तो सोचा कि क्यों न बंगलोर घूम ही लिया जाये । और वहां घुमते हुए अचानक ही हम लोग एक सात सितारा होटल जो की अभी बन रहा है उसके सामने से गुजरे तो हम लोगों की गाड़ी के ड्राईवर ने बड़ी ही गर्मजोशी से बताया कि साब ये होटल विजय मालया का है । ये होटल भी शायद बीस मंजिल का है । और इसमे ऊपर हेलीपैड भी बना हुआ है । हमारे ड्राईवर ने ये बताया की चूँकि अब बंगलोर का नया एअरपोर्ट करीब ३० - ३५ कि . मी . की दूरी पर बन रहा है और बंगलोर मे ट्रैफिक बहुत बढ़ रहा है तो होटल से एअरपोर्ट जाने के लिए हेलिकॉप्टर की सुविधा रहेगी । जिससे कम समय मे एअरपोर्ट पहुँचा जा सके । जब तक उसने ये बताया और जब तक हम लोग होटल को देखते तब तक गाड़ी आगे बढ़ चुकी थी । पर फिर भी हमने कोशिश की उसकी फोटो लेने की । हेलीपैड से एक और बा

खुदा के लिए (In the name of god )

तीन दिसम्बर को ईफ्फी २००७ ख़त्म हो गया। यूं तो हमने पहली ही सोचा था की हम ईफ्फी मे देखी हुई कुछ फिल्मों के बारे मे यहां लिखेंगे फिर सोचा कि नही लिखेंगे कि कहीं आप लोग बोर न हो जाएँ । पर कल शास्त्री जी ने अपनी टिप्पणी मे हमे अच्छी फिल्मों के बारे मे लिखने के लिए कहा इसीलिए हम कुछ फिल्मों का जिक्र करेंगे । तेईस से तीन के बीच मे हमने करीब २०-२५ फिल्में देखी। ये तो जाहिर सी बात है कि इतनी फिल्मों मे से हर पिक्चर तो अच्छी हो नही सकती है पर फिर भी कुछ फिल्में बहुत पसंद आई(जिनका हम जिक्र करते रहेंगे) जिनमे से खुदा के लिए एक है । ये पिक्चर पाकिस्तान के डाइरेक्टर शोएब मंसूर ने बनाई है।इस फिल्म की खास बात ये है की इस फिल्म ने एक ऐसे विषय को उठाया है जिस पर आज तक किसी ने भी कुछ कहने की हिम्मत नही की है। की किस तरह एक साधारण लड़का संगीत और अपने परिवार को छोड़कर तालिबानी बन जाता है। फिल्म एक छोटे और सुखी पाकिस्तानी परिवार की है । परिवार मे सबको आजादी है कि वो अपनी जिंदगी अपने ढंग से जियें। परिवार मे दो बेटे है और दोनो गायक है।

ये कैसे डाक्टर ?

आजकल हर तरफ डॉक्टरों के चर्चे हो रहे है। दिल्ली मे डाक्टर A.I.I.M.S.के डाक्टर वेणुगोपाल को लेकर हड़ताल करते है तो कहीं गाँवों मे उनकी नियुक्ति न हो इसको लेकर हड़ताल करते है।पर ये हड़ताली डाक्टर कभी नही सोचते है कि उनके इस तरह बार-बार हड़ताल करने से अगर किसी का नुकसान होता है तो वो मरीजों का होता है ।A.I.I.M.s.मे तो अब आये दिन हड़ताल होने लगी है । जहाँ पर ना केवल दिल्ली अपितु दूर-दराज के शहरों -गाँवों से मरीज आते है।कुछ मरीज जिन्होंने महीनों पहले डाक्टर से समय लिया हुआ होता है तो कुछ जिन्हें इलाज कि सख्त जरुरत होती है उन्हें इस तरह की हड़ताल से कितनी परेशानी होती है इसका ख़याल क्या इन डॉक्टरों को कभी आता है। आजकल हर दो - चार महीने मे डाक्टर हड़ताल करते रहते है । कभी दिल्ली तो कभी तमिल नाडू तो कभी आन्ध्र प्रदेश मे तो कभी यू.पी. तो कभी बिहार मे। हड़ताल का कारण भले ही अलग हो पर भुगतना तो मरीज को ही पड़ता है। ये डाक्टर जिन्हें पढाई खत्म होने पर शपथ दिलाई जाती है कि वो निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करेंगे। उसका तो कोई अर्थ ही नही रह गया है। यूं तो इस शपथ को डॉक्

ईफ्फी २००७ गोवा

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जी हाँ कल से गोवा मे भारत का ३८ वां अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह शुरू हुआ है। जिसमे देश-विदेश से कुल मिला कर करीब २०० फिल्में दिखाई जायेंगी। गोवा मे पिछले चार सालों से ईफ्फी का आयोजन होता आ रहा है और आगे भी गोवा मे ही ईफ्फी होगा क्यूंकि गोवा को ईफ्फी का स्थाई आयोजक बना दिया गया है। ।कल गोवा के कला अकेडमी मे हुए इस उदघाटन समारोह के मुख्य अतिथि शाह रुख खान थे।दक्षिण की हिरोइन प्रिया मणि ,प्रिय रंजन दास मुंशी,गोवा के मुख्य मंत्री,गोवा के मुख्य सचिव ,गोवा के मेयर ,फिल्म फेडरेशन की डाइरेक्टर, आदि लोग इस उदघाटन समारोह मे मौजूद थे। पिछले की तरह इस साल नाच-गाना तो नही हुआ पर भाषण पिछले साल की तरह ही हुए। इस समारोह की शुरुआत मे सभी ने भाषण दिए। भाषण पर हम यहां प्रिय रंजन दास मुंशी के भाषण का जिक्र करना चाहेंगे।( बस जरा चूक हो गयी कि हम रेकॉर्ड नही कर पाए) जिसमे उन्होंने शुरुआत मे तो फिल्म समारोह पर बोला और फिर उन्होने मुख्य अतिथि शाह-रुख खान के बारे मे जो बोलना शुरू किया की रुकने का नाम ही नही लिया कि शाह रुख खान एक महान हस्ती है किंग खान है । और इन्होंने अपना कैरियर फौजी से शुरू किया औ

राखी के नाटक

नच बलिये जो कि स्टार प्लस पर आता है उसमे जब शो शुरू हुआ था तो दस जोडियाँ थी पर हर हफ्ते एक-एक जोड़ी बाहर होती गयी। और अब आख़िर चार जोडियाँ बची है । इस बार के नच बलिये मे राखी सावंत भी भाग ले रही है तो कुछ न कुछ तमाशा तो होना ही था। अब राखी सावंत हो और कोई बात न हो ऐसा कहाँ हो सकता है। राखी सावंत पहले दिन से लोगों का ध्यान अपनी और करने के लिए हर बार कुछ करती है। पहले दिन तो उसने कश्मीरा(वैसे हम न तो कश्मीरा और न ही राखी को पसंद करते है ) के लिए कहा था कि वो नही चाहती है कि राखी शो मे आगे बढे। फिर हर बार नाचने के बाद भी वो कोई न कोई बात जरुर कहती है। यहां तक की एक बार शो के होस्ट हुसैन ने भी कहा था कि आप हर बार कहती है कि ऐसा आपने पहले कभी नही किया है। जबकि सभी जानते है कि वो एक डांसर है और काफी समय से स्टेज शो ( डांस) करती आ रही है और कुछ फिल्मों मे भी डांस किया है । पर फिर भी और हर बार एक नयी बात कहती है। राखी सावंत जो पहले दिन से ही कुछ न कुछ नाटक करती आ रही है नच बलिये मे पहली बार ख़तरे मे आई है । अब राखी सावंत ख़तरे मे हो और वो कुछ न कर

बकरियों कच्चे-पक्के सब खा जाओ

बात उन दिनों की है जब हम लोग इलाहाबाद के म्योराबाद मोहल्ले मे रहते थे यही कोई चालीस -बयालीस साल पहले । तब का म्योराबाद आज के म्योराबाद जैसा नही था । उन दिनों वहां इतनी ज्यादा घनी आबादी नही थी। ज्यादातर ईसाइयों के घर थे और कुछ घर दूसरे लोगों के थे। अब चूँकि उन दिनों आबादी कम थी इसलिए पेड़-पौधे ज्यादा हुआ करते थे।और म्योराबाद मोहल्ला बहुत ही छोटा हुआ करता था बस जहाँ मुम्फोर्ड गंज ख़त्म वहां से सड़क पार करते ही म्योराबाद शुरू हो जाता था।हर घर के आगे बड़ा सा दालान होता था। सारे घर लाइन से बने थे और आगे की लाइन के पीछे एक औए लाइन मे घर बने होते थे। जिनमे खेलने मे बड़ा मजा आता था। हम लोगों के घर से कोई दस कदम की दूरी पर एक परिवार रहता था जिसमे दक्कू , टेरी ,टेरी कि पत्नी बीना आंटी उनके माता - पिता और और दक्कू की दादी रहती थी । दादी यूं तो बहुत अच्छी थी पर हम बच्चों से जरा गुस्सा रहती थी क्यूंकि हम सब उन्हें बहुत तंग जो करते थे । कभी आईस - पाईस खेलते तो उनके घर के बरामदे मे छिप जाते तो कभी उनके दालान से कूद कर भागते थे । अग

मुझे बोलना आता है।

कहीं आप लोग ये तो नही सोच रहे है कि ये हम अपने बारे मे कह रहे है , अरे नही ये हमारे नही ये तो राहुल गाँधी के शब्द है जो उन्होने हाल ही मे अपने उत्तर प्रदेश के दौरे मे कहे थे।जहाँ उन्होने अपनी पार्टी को कैसे मजबूत करे और किस तरह से दुबारा से उत्तर प्रदेश मे तथा अन्य राज्यों मे कैसे उनकी पार्टी अपनी पकड़ बना सके।अब राहुल गाँधी को बोलना आता है या नही उससे भला किसी को क्या फर्क पड़ता है । जब राहुल गाँधी को वाकई मे बोलना नही आता था तब भी लोग उनके बिना कुछ कहे ही सब कुछ समझ लेते थे तो भाई अब तो माशा अल्लाह बोलना भी आ गया है। और इसका तो वो अब दावा भी कर रहे है। जब से राहुल गाँधी की पदोन्नति हुई है तब से तो उनके मिजाज भी कुछ बदल गए है। और बदले भी क्यों न आख़िर इतनी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी का भार जो उनके कन्धों पर डाल दिया गया है। पर भाई बोलने से ये बेहतर नही है कि आपका काम बोले।

मनोरमा सिक्स फ़ीट अंडर

ये अभी हाल ही मे रिलीज हुई पिक्चर का नाम है।वैसे हमने इसे हॉल मे नही बल्कि घर पर देखी है।क्यूंकि इससे पहले की हम इसे देखते ये पिक्चर हॉल से चली गयी। आज कल जहाँ नाच-गाने से भरपूर फिल्में बन रही है वहीं ये फिल्म धरातल से जुडी लगती है। इसकी कहानी पूरी तो नही पर हाँ थोडी सी बता देते है । इस फिल्म मे कहानी अभय देओल जो की एक इंजीनियर है और साथ-ही साथ एक लेखक भी है और जासूसी का शौक भी रखते है, उनके ही इर्द-गिर्द घूमती है कि किस तरह वो एक हत्या के मामले मे फंस जाते है।और किस तरह वो उससे बाहर निकलते है। अभय देओल और गुल पनाग दोनो ने ही अच्छी एक्टिंग की है।गुल पनाग जो वैसे तो ज्यादा फिल्मों मे दिखाई नही देती है पर इसमे अभय देओल की पत्नी के रोल मे अच्छा काम किया है। और अभय देओल ( जिसकी हमने इससे पहले कोई भी पिक्चर नही देखी थी )ने अपने मार-धाड़ वाले भाइयों (सनी और बॉबी ) के बिल्कुल विपरीत रोल किया है। और काफी नैचुरल एक्टिंग की है। और बाक़ी के कलाकारों जैसे सारिका विनय पाठक,कुलभूषण खरबंदा, आदि ने भी अच्छा अभिनय किया है। वैसे ये पिक्चर ज्यादा नही चली है क्यूंकि ये ना तो पूरी तरह कमर्शिय

वाह रे ड्रेस

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जरा इस ड्रेस पर गौर फरमाइए।कहिये कैसी लगी ये ड्रेस। :) ये सारी ड्रेस चोकलेट से बनी है। और हाँ इन्हें देखने के लिए क्लिक करना न भूले।

गोवा की दिवाली कुछ अलग सी .....

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गोवा मे आज दिवाली मनाई जा रही है जबकि शायद बाक़ी सारे देश मे दिवाली कल यानी ९ नवम्बर को मनाई जायेगी। अब चूँकि हम यू.पी.के है तो जाहिर तौर पर आज हम छोटी दिवाली और कल यानी ९ को हम भी बड़ी दिवाली मनाएंगे। यहां गोवा मे दिवाली मनाने का अंदाज उत्तर भारत से बिल्कुल भिन्न है। जैसे उत्तर भारत मे दिवाली भगवान राम के वनवास से अयोध्या वापिस आने की ख़ुशी मे मनाई जाती है पर यहां भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर राक्षस के वध की ख़ुशी मे मनाई जाती है। हम लोग राम की पूजा करते है तो यहां पर कृष्ण की पूजा होती है। जिस तरह दशहरे मे रावण को जलाया जाता है ठीक उसी तरह यहां गोवा मे दिवाली मे नरकासुर को जलाया जाता है।नरकासुर जलाने का चलन तो हमने यहीं पर देखा है। बडे-बडे नरकासुर बनाए जाते है और भोर मे यानी की सुबह ४ बजे इन्हें जलाया जाता है।नरकासुर जलाने का कारण है बुराई पर अच्छाई की जीत या अँधेरे पर रौशनी की जीत। चलिए थोडी इसकी कहानी भी बता देते है। जैसा की नाम से ही पता लग रहा है कि नरकासुर नरक के असुरों का राजा था।और इस नरकासुर ने १६ हजार गन्धर्व रानियों को कैद कर रखा था ।इन रानियों ने भगवान कृष्ण क

ये भी एक खबर है ...

कल यहां गोवा के लोकल अखबार मे ये खबर छपी थी।पर कल हम इसे अपने ब्लोग पर नही लगा पाए थे इसलिए आज इसे पोस्ट कर रहे है। यूं तो ये बड़ी ही अजीबोगरीब खबर है पर फिर भी हमने सोचा की आप लोगों तक इस े पहुंचाया जाये।

जेनरेशन गैप

कुछ अजीब सा विषय है ना पर ये जेनरेशन गैप हर पीढ़ी मे होता है।बस हमारा देखने का नजरिया अलग होता है। आख़िर ये जेनरेशन गैप है क्या बला ? आम तौर पर माना जाये तो ये दो पीढ़ी के बीच मे आने वाला फर्क है या यूं कहें की हर बात मे, सोच मे ,आचार -विचार मे ,बातचीत के तरीके मे ,व्यवहार मे अंतर होने को जेनरेशन गैप कह सकते है।हमेशा नयी पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को और पुरानी पीढ़ी नयी पीढ़ी को यही कहकर चुप करा देती है कि जेनरेशन गैप है।वो चाहे हम लोगों का जमाना रहा हो या फिर आज हमारे बच्चों का जमाना ही क्यों ना हो। ऐसा हम अपने अनुभव के आधार पर कह रहे है । पर हमेशा नयी पीढ़ी को ही क्यों दोष दिया जाता है कि नयी पीढ़ी या आजकल के बच्चे तमीज-तहजीब खो चुके है। उनमे छोटे-बडों का फर्क समझने की बुद्धि नही है। जबकि हम सभी उस नयी पीढ़ी वाले दौर से गुजर चुके है। पर क्या हम सबने अपने बडे-बुजुर्गों से कभी भी ऐसी बातें नही कही या करी है ? और क्या इन सबसे बडे-बुजुर्गों के साथ संबंधों या रिश्तों मे फर्क आ गया था।जब तब नही आया तो अब हम बच्चों को क्यों ये कहकर अहसास दिलाते है । ये तो सोचने वाली बात है की जो बात हम अपने

बैरेन आइलैंड

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barren island जैसा की नाम से ही लग रहा है कि ये एक ऐसा द्वीप होगा जहाँ जनजीवन नही होगा। और बिल्कुल ऐसा ही है । barren island हिंदुस्तान का एकमात्र जीवित ज्वालामुखी है जो अंडमान मे है। ।ये द्वीप पोर्ट ब्लेयर से १३०-१३५ कि .मी.की दूरी पर है। और यहां भी जाने के लिए बोट से ही जाना पड़ता है। अब का तो पता नही कि ये ज्वालामुखी जीवित है या नही पर २००५ मे करीब ९-१० साल बाद ये जीवित हो गया था मतलब ज्वालामुखी फट गया था। शुरू मे जब ये ज्वालामुखी ज्यादा तीव्र था तब तो कम पर बाद मे इसे भी एक पर्यटन स्थल बना दिया गया था क्यूंकि ये भी जिंदगी मे बार-बार कहॉ देखने को मिलता है। कभी-कभी तो वहां बडे शिप भी ले जाये जाते थे जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग इस ज्वालामुखी को देख सकें।और इसके अलावा छोटी बोट barren island जाने के लिए फीनिक्स बे jetty से रात नौ बजे जाती थी और बिल्कुल सुबह तीन बजे इस द्वीप के पास पहुंचती थी। रात मे बोट इसलिये जाती थी क्यूंकि सुबह यानी भोर मे सिर्फ तीन से पांच बजे तक ही लावा दिखता था क्यूंकि अँधेरे मे लाल-पीला लावा साफ तौर पर देखा जा सकता था। और जैसे ही उजाला हो जाता है सिर्

लीजिये हम वापिस आ गए

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केक देखकर तो आप समझ ही गए होंगे की हम इतने दिनों तक क्यों गायब थे। वो क्या है ना कि इसी अक्तूबर को हमारी शादी के पच्चीस साल पूरे हुए है।

खिलाड़ी किस लिए खेलते है ?

खिलाड़ी किस लिए खेलते है देश के लिए ,अवार्ड के लिए,या अपने लिए ? जब से भारत ने twenty-२० विश्व कप जीता है और जब से इस यंग टीम इंडिया पर इनामों की बौछार हुई है लगता है सारे देश के हर खिलाड़ी को वो चाहे कोई भी खेल खेलता हो उन्हें कुछ परेशानी सी होने लगी है। अब वो चाहे हॉकी की टीम हो या चाहे शतरंज के विश्व चैम्पियन हो या चाहे billiards के विश्व चैम्पियन हो और चाहे गोल्फ के चैम्पियन हो। हर किसी को लग रहा है कि उनके साथ राज्य सरकारों ने और लोगों ने वैसा व्यवहार नही किया जैसा कि टीम इंडिया के साथ किया है।वैसे एक तरह से उनका रोष सही भी है क्यूंकि भला कितने लोग जानते है कि जीव मिल्खा सिंह गोल्फ खेलते है या पंकज आडवाणी billiards खेलते है। क्रिकेट एक ऐसा खेल है जिसे ना केवल लड़के और आदमी ही देखते -सुनते है बल्कि बच्चे महिलाएं और ये कहना अतिशयोक्ति नही होगी कि हर कोई देखता है और सुनता है। क्रिकेट के लिए लोगों मे एक जुनून सा है। जिससे हम सब बड़ी ही अच्छी तरह से वाकिफ है।ऐसा नही है कि क्रिकेट के प्रति लोगों का झुकाव अभी हुआ है बल्कि आज से क्या जब से याद है देश मे क्रिकेट के प्रति लोग पागल ही

पारदर्शी मेढक

भाई इसे कहते है विज्ञान की तरक्की। क्या कभी किसी ने सपने मे भी सोचा था की कभी पारदर्शी मेढक भी होगा। हम तो हमेशा से मोटी खाल वाला भूरा -हरा सा मेढक देखते आये है। पर आज के समय मे कुछ भी असंभव नही है फिर भला पारदर्शी मेढक होना भी कहॉ असंभव है।जो दुनिया मे कोई सोच नही सकता उसे जापानियों ने कर दिखाया। पारदर्शी मेढक बनाने जैसा अनूठा कारनामा जापान के शोध कर्ता मसयुकी सुमिदा (masayuki sumida) ने कर दिया है। और ऐसे पारदर्शी मेढक क्यों बनाए तो इसके लिए उनका कहना है की जो विद्यार्थी जीव विज्ञान पढते है और जिन्हे जीवों मे विभिन्न ओर्गंस को समझने के लिए मेढक का dissection करना पड़ता है क्यूंकि स्कूल मे dissection की शरुआत मेढक और केंचुए से ही कराई जाती है । अब कम से कम जापान मे मेढक को चीर-फाड़ करने की जरुरत नही है क्यूंकि अब उसकी ऊपर की खाल इतनी पतली है की अगर उसे लाइट के सामने रखे तो उसके शरीर के सारे ओर्गंस देखे जा सकते है। और ये भी देखा जा सकता है की किस तरह के बदलाव इन tadpoles मे आते है जब ये मेढक बनते है। जिससे मेढक के ओर्गंस को समझना भी आसान और शायद कुछ हद तक दिलचस्प भ

कुछ और गोवा के गणेश चतुर्थी की तसवीरें

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आज हम कुछ और गणेश चतुर्थी की फोटो लगा रहे है ।जो गोवा मे अलग-अलग जगहों पर और कुछ अलग सी चीजों को इस्तेमाल करके बनाया गया है। इनमे गणेश जी के विभिन्न रुप दिखते है । और साथ ही हर मूर्ति मे कुछ नया सा है । यहां घरों मे रखे जाने वाले तथा पंडालों मे स्थापित गणेश की प्रतिमा और सजावट के लिए प्रतियोगिता रखी जाती है । भाई हमने तो इतने विविध रुपी गणेश पहले कभी नही देखे थे , हो सकता है आप लोगों ने देखे हो पर फिर भी हम इन्हें आप लोगों के लिए प्रस्तुत कर रहे है । और हाँ किसी भी फोटो को अगर आप बडे साइज मे देखना चाहते है तो उस फोटो पर क्लिक कर दीजियेगा । इस पहली फोटो मे गणेश जी के साथ ही अन्य भगवानों को भी दिखाया गया है । और इसे पंजिम के पुलिस स्टेशन मे रखा गया था । यहां गोवा के सभी पुलिस स्टेशन के बीच सबसे सुन्दर मूर्ति की प्रतियोगिता भी होती है । ये मूर्ति पंजिम के ही एक पंडाल की है जिसमे साई बाबा को दिखाया गया है । इस मूर्ति मे गण

वाह इसे कहते है चक दे इंडिया

कल के twenty-२० मैच मे यंग टीम इंडिया ने चक दे इंडिया को सही अर्थों साबित कर दिया है और पुरे देश-विदेश मे सिर्फ चक दे इंडिया ही सुनाई दे रहा है। क्या जीत थी .उफ़ इतनी रोमांचक कि हर बॉल पर लगता की अब गए की तब गए।पर आख़िर मे टीम मे नए आये जोगिंदर ने विकेट लेकर भारत का विश्व चैम्पियन बनने का सपना साकार कर दिया। चौबीस साल लग गए विश्व चैम्पियन बनने मे । इधर इंडिया बना विश्व चैम्पियन और उधर पूरा देश पटाखों की आवाज से गूँज गया। बी . सी . सी . आई . ने इन खिलाड़ियों को १२ करोड़ का इनाम देने की घोषणा कर दी है । और ये टीम इनाम की हकदार भी है । युवराज को स्पोर्ट्स कार और एक करोड़ का इनाम भी दिया जाएगा । क्या बात है बल्ले - बल्ले । धोनी की कप्तानी मे टीम इंडिया ने तो कमाल ही कर दिया । पहली कप्तानी मे विश्व कप जीतना किसी कमाल से कम तो है ही नही । इस बार तो जितनी टीम की तारीफ की जाये वो कम है । और धोनी ने जीतने के बाद भी जैसा संतुलन बनाए रखा वो काबिले तारीफ है । और जैसा धोनी ने कहा की वो ह

प्रशांत बन गए इंडियन आइडल

कल रात दार्जिलिंग के प्रशांत ने शिलोंग के अमित पाल को एस.एम.एस.के जरिये होने वाली वोटों की गिनती मे पीछे छोड़ दिया और सिपोय प्रशांत बन गए तीसरे इंडियन आइडल। सात करोड़ वोट बाप रे ऐसा लगता है की लोग सारे काम-धंधे छोड़ कर सिर्फ एस.एम.एस ही करने मे लगे थे। जहाँ तक हमे याद है इतने ज्यादा वोट तो हिंदुस्तान की जनता ने ताज महल के लिए भी नही किया था।यहां देश से बड़ा राज्य हो गया लगता है क्यूंकि जिस तरह से दार्जिलिंग और शिलोंग के लोगों ने वोट किया है ये सात करोड़ वोट यही सच्चाई बताते है। पर ज़ी के शो सा.रे.गा.मा.पा. के विश्व युद्ध से छत्तीसगढ़ की सुमेधा शो से बाहर हो गयी इसलिये नही की वो खराब गाती थी ( वो सबसे अच्छा गाती थी) बल्कि इसलिये बाहर हो गयी क्यूंकि उन्हें छत्तीसगढ़ से वोट नही मिले और जैसा की उनके पिता ने कहा की छत्तीसगढ़ मे ६५ जगहों पर ज़ी टी.वी.नही आता है और लोग नही जानते है की ज़ी पर ऐसा कोई शो हो रहा है। हारने या जीतने पर लोग देश की जनता का नही अपने प्रदेश की जनता को ही श्रेय देते है। पर कोई ये तो बताये की आख़िर वो टॉप फाइव तक कैसे पहुंची ? वैसे एस.एम.एस करने की जैसी दी