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इलाहाबाद यात्रा की यादें (१) राजधानी एक्सप्रेस से दिल्ली से इलाहाबाद का सफर झेलम झेल

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आम तौर पर हम इलाहाबाद प्रयाग राज ट्रेन से जाते है पर इस बार सोचा की क्यूँ न डिबरू गढ़ राजधानी से दिल्ली से इलाहाबाद जाया जाए। इसका सबसे बड़ा फायदा था कि ये ट्रेन दिन मे २ बजे दिल्ली से चल कर रात साढे आठ- नौ तक इलाहाबाद पहुँच जाती है। चूँकि ५ बजे वाली राजधानी रात मे १२-१२.३० बजे पहुँचती है इसलिए २ बजे वाली राजधानी का आप्शन ठीक लगा । तो सबसे पहले नेट पर टिकट बुक करने चले तो पहले तो irctc की साईट ने परेशान किया। पहले साईट नही खुल रही थी फ़िर जैसे ही ऑनलाइन पेमेंट की कि irctc की साईट ब्लॉक हो गई। अब फ़िर बैंक को फ़ोन किया की पेमेंट रोक दे और फ़िर irctc को फ़ोन किया तो वहां के कस्टमर केयर से कहा गया की टिकट बुक नही हुआ है और पेमेंट वापिस बैंक मे भेज दी जायेगी। irctc वालों ने कहा की साईट मे कुछ गड़बड़ है और २-३ दिन बाद साईट ठीक होगी । । तो उस दिन टिकट बुक करने का इरादा छोड़ दिया। २ दिन बाद यानी १८ की सुबह-सुबह नेट पर टिकट बुक किया और इलाहाबाद का २२ अगस्त की राजधानी का टिकट वेटिंग लिस्ट २ मे मिला पर लौटने का इलाहाबाद से प्रयाग राज का कन्फर्म टिकट मिल गया था इसलिए खुश भी...

श्रुति-गोरे ने ये साबित किया कि ......

१० जून को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने इस साल के राष्ट्रीय बालश्री पुरस्कार प्रदान किए। श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने श्रुति और गोरे को बालश्री award प्रदान किया। श्रुति और गोरे जुड़वाँ बहने है । ये दोनों बहने कानपुर उत्तर प्रदेश की रहने वाली है। श्रुति और गोरे की उम्र १६ साल है। ये दोनों बहने बहुत सुंदर पेंटिंग्स करती है।और गाना भी अच्छा गाती है। पूरी ख़बर इस लिंक पर जाकर पढिये। इन दोनों बहनों ने ये साबित कर दिया की अगर मन मे चाह हो तो जीवन मे कुछ भी हासिल किया जा सकता है। और अपनी मंजिल हासिल करने मे ना तो कोई बीमारी और ना ही समाज कोई बाधा खड़ी कर सकता है । श्रुति और गोरे के माता - पिता को भी श्रेय जाता है जिन्होंने अपनी बेटियों को जीवन से हारना नही बल्कि जीवन को जीतना सिखाया है ।

रबर की सड़क

क्या आप रबर की सड़क के बारे मे जानते है। नही तो चलिए हम बता देते है। आजकल की बढ़िया सड़क के बारे मे तो हम लोग जान गए है बकौल लालू यादव हेमा मालिनी के गाल की तरह चिकनी , पर जब हम छोटे थे तब रबर की सड़क होती थी ।क्यों ये सुनकर आश्चर्य हुआ ना ।हमारे दादा खूब किस्से सुनाते थे। तब तो उनकी बातें सुनकर हम सब बच्चे आश्चर्य मे पड़ जाते थे ।ये रबर की सड़क का किस्सा उनमे से ही एक है। अब ६५-७० के दशक मे तो इलाहाबाद की सड़कें तो फ़िर भी ठीक होती थी पर बनारस की सड़क कुछ अजीब सी तरह की होती थी कुछ उबड़-खाबड़ सी और खुरदरी सी और दिखने मे सफ़ेद। और गोदौलिया के चौराहे के पास तो गड्ढे भी होते थे ।सड़क ऐसी की अगर रिक्शे पर जाए तो पूरे शरीर का अंजर-पंजर ढीला हो जाए। इलाहाबाद और बनारस का क्या तब हर हाई वे बस लाजवाब ही होता था। इतनी पतली सड़क की दो गाड़ी आराम से निकल जाए तो गनीमत और उस पर सड़क के दोनों और मिटटी । बारिश मे तो और भी बुरा हाल हो जाता था इन सड़कों का।और बारिश मे जब भी सफर पर जाते तो लगता था की कहीं गाड़ी मिटटी के दलदल मे ना फंस जाए। (इलाहाबाद,बनारस,लखनाऊ ,कानपुर तो ...

क्या धोनी ने सही किया है

धोनी ने कानपुर की पिच बनाने वाले curator शिव कुमार को धन्यवाद दिया की उसने ऐसी पिच बनाई थी जिसकी वजह से इंडिया ने उस मैच मे साउथ अफ्रीका को हरा कर सिरीज एक-एक से बराबर कर ली।धोने ने ना केवल धन्यवाद दिया बल्कि शिव कुमार को १० हजार रूपये भी दिए । जहाँ तक pitch curator को धन्यवाद और award देने की बात है तो हमारे ख़याल से तो ये ठीक नही है। ठीक है हर देश अपने यहां की pitch अपने खिलाडियों को ध्यान मे रखकर बनाता है है पर इस तरह से curator को reward देना । आप क्या सोचते है।