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अंडमान मे रहते हुए जब मजबूरी का एहसास होता है.(१)

यूं तो अंडमान मे हमारा तीन साल का समय बहुत ही अच्छा बीता पर उन्ही तीन सालों मे हमारे मायके और ससुराल मे अच्छे काम भी हुए माने दीदी और ननद की लड़की की शादी हुई। और उन्ही तीन सालों मे हम लोगों के जीवन की सबसे बड़ी ट्रेजडी भी हुई । जून से नवम्बर का समय तो बस अंडमान घुमते हुए मजे मे निकल रहा था। नवम्बर मे दीदी बेटी की शादी मे दिल्ली आए और उसके बाद हम लोग करीब १० दिन दिल्ली रहकर वापिस अंडमान चले गए।अंडमान पहुँचने के एक हफ्ते बाद यानी २ दिसम्बर २००३ की शाम को दिल्ली से हमारी ननद का फ़ोन आया कि पापाजी (ससुरजी ) घर मे गिर गए है।और उनके पैर मे फ्रैक्चर हो गया है। वो लोग पापाजी की खूब देख भाल कर रहे थे।और चूँकि हमारी ननद और नन्दोई डॉक्टर है इसलिए हम लोगों को चिंता करने की कोई जरुरत नही थी। इसलिए हम लोग निश्चिंत थे । रोज हम लोग उनका हाल-चाल लेते थे और उनसे बात करते थे।पर अचानक १३ दिसम्बर को दिल्ली से फ़ोन आया कि पापाजी को हार्ट अटैक हुआ है । पापा की हालत काफ़ी ख़राब है और उन्हें हॉस्पिटल ले जा रहे है। उस समय पापाजी से बात की और ननद और नन्दोई से बात हुई ।और पतिदेव ने...

सुनामी से हुई बर्बादी और हम

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सुनामी के दिन करीब चार-पांच घंटे बाद जब पानी उतर गया तो बाक़ी दूसरे लोगों की तरह हम लोग भी अपने घर की ओर गए ।घर जाते हुए मन मे एक अजीब सा डर था की पता नही घर का क्या हाल होगा। और जब हम लोग अपने घर पहुंचे तो घर की हालत देख कर सकते मे आ गए , कलेजा मुँह को आ गया।घर का सारा सामान तितर-बितर हो गया था। किचन का सामान जैसे मिक्सी,जूसर का एक पार्ट गार्डन मे तो दूसरा पार्ट दरवाजे पर। और डाइनिंग टेबल का सामान जैसे मैट्स ,स्पून ,अचार और जैम की बोत्तले सब बाहर बगीचे मे ।फ्रिज तो पूरा अप साईड डाउन माने उल्टा पड़ा हुआ था। लौंदरी बैग कपडों के साथ बाहर कीचड मे। ड्राइंग रूम का समान जैसे सोफा सेट वगैरा तो उलट - पलट गए थे । छोटे-छोटे सजावटी सामान इधर-उधर बिखरे पड़े थे।पतिदेव का ऑफिस का बैग बहकर दूर चला गया था । हमारे एक गणेश जी की मूर्ति ड्राइंग रूम से बहकर हमारे घर की सीढियों पर आ गयी थी।जिन्हें हमने उठाकर गाड़ी मे रख लिया था। पूरा घर काले रंग के कीचड और पत्तियों से भरा पड़ा था । चूँकि हमारे पैर मे चोट थी इसलिए हम तो अन्दर नही गए हमारे पतिदेव और बेटे ने घर मे जाकर ऊपर की मंजिल से धी...

सुनामी ना पहले कभी सुना और ना देखा

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२६ दिसम्बर२००४ को जब हम लोग अपनी गाड़ी मे भाग रहे थे ( ये वही सफ़ेद क्वालिस है जिसने उस दिन हम लोगों को पार लगाया था । )तो सामने हर तरफ पानी नजर आ रहा था और जिस रास्ते से हम लोग हमेशा जाते थे वहां पानी भर रहा था । और सामने के सीधे रास्ते पर गाड़ी ले जाने का मतलब था पानी की चपेट मे आना ।गाड़ी चलाते हुए पतिदेव ने पूछा किधर से चलें तो हमने बिना कुछ सोचे समझे कहा कि बाएँ से वो जो चडाई वाला रास्ता है । इस पर वो बोले रास्ता पता है तो हमने कहा रास्ता तो पता नही है पर जब इतने सारे लोग जा रहें है तो कहीं ना कहीं तो सड़क निकलेगी ही। और जैसे ही हम लोगों ने गाड़ी बायीं ओर मोड़ी तो जो दृश्य देखा कि बयाँ करना मुश्किल है। हर आदमी के चेहरे पर बदहवासी और डर का भाव और हम लोग भी इस भाव से अछूते नही थे।जो जिस तरह था पानी आता देख उसी हालत मे जान बचाने के लिए भाग रहा था। उस चडाई पर चढ़ते हुए लोगों का हुजूम किसी पिक्चर के सीन से कम नही था।उस समय ये तो अंदाजा लग गया था की कुछ गड़बड़ है पर इतनी ज्यादा तबाही ,कभी सोचा भी नही था। हमने उस से कहा कि कैमरा दो । कुछ फो...

२६ दिसम्बर की वो सुबह

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भला कैसे भूल सकते है अंडमान की २६ दिसम्बर २००४ की वो सुबह जिसने बहुतों की जिंदगी बदल दी।और कुछ हद तक हमारी भी। उस २६ दिसम्बर को हम लोग निकोबार जाने का प्रोग्राम बना रहे थे क्यूंकि निकोबार मे क्रिसमस और नया साल काफी जोश से मनाया जाता था। अब अंडमान मे थे तो सोचा कि निकोबार का क्रिसमस भीदेख लेना चाहिऐ। पर कहते है ना कि जो होता है अच्छे के लिए ही होता है । इसीलिए उस साल हम लोग क्रिसमस के लिए निकोबार न जाकर दो दिन के लिए एक दुसरे छोटे से द्वीप बाराटांग चले गए थे । क्यूंकि बेटा अपनी क्लास छोड़ना नही चाहता था । इसलिए २५ को ही घर वापिस आ गए थे । चूँकि हमारे बेटा जो कि उस समय दसवीं मे था उसने जाने से मना कर दिया था कि एक हफ्ते के लिए वो नहीं जाएगा ,इसलिए हम लोग निकोबार ना जाकर पोर्ट ब्लेयर मे ही थे। उन दिनों हम लोग पोर्ट ब्लेयर के जंगली घाट मे रहते थे।आज भी वो सारा मंजर बिल्कुल आंखों मे बसा हुआ है ,इतने सालों बाद भी कुछ भी नही भूले है। यूं तो उस दिन भी हम लोग सुबह ४.३० बजे उठे थे क्यूंकि हमारे बेटे को ५ बजे टियुशन के लिए जाना होता था (अ...

बैरेन आइलैंड

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barren island जैसा की नाम से ही लग रहा है कि ये एक ऐसा द्वीप होगा जहाँ जनजीवन नही होगा। और बिल्कुल ऐसा ही है । barren island हिंदुस्तान का एकमात्र जीवित ज्वालामुखी है जो अंडमान मे है। ।ये द्वीप पोर्ट ब्लेयर से १३०-१३५ कि .मी.की दूरी पर है। और यहां भी जाने के लिए बोट से ही जाना पड़ता है। अब का तो पता नही कि ये ज्वालामुखी जीवित है या नही पर २००५ मे करीब ९-१० साल बाद ये जीवित हो गया था मतलब ज्वालामुखी फट गया था। शुरू मे जब ये ज्वालामुखी ज्यादा तीव्र था तब तो कम पर बाद मे इसे भी एक पर्यटन स्थल बना दिया गया था क्यूंकि ये भी जिंदगी मे बार-बार कहॉ देखने को मिलता है। कभी-कभी तो वहां बडे शिप भी ले जाये जाते थे जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग इस ज्वालामुखी को देख सकें।और इसके अलावा छोटी बोट barren island जाने के लिए फीनिक्स बे jetty से रात नौ बजे जाती थी और बिल्कुल सुबह तीन बजे इस द्वीप के पास पहुंचती थी। रात मे बोट इसलिये जाती थी क्यूंकि सुबह यानी भोर मे सिर्फ तीन से पांच बजे तक ही लावा दिखता था क्यूंकि अँधेरे मे लाल-पीला लावा साफ तौर पर देखा जा सकता था। और जैसे ही उजाला हो जाता है सिर्...

डी -एडिक्शन (कोई शराब क्यों पीता है )

हमने कुछ समय पहले डी - एडिक्शन के बारे मे लिखा था की हम किस तरह से इस डी-एडिक्शन कैंप से जुडे थे।जिस तरह हर संस्था का कोई नाम होता है ठीक उसी तरह इस संस्था का नाम साथी रक्खा गया था । और अंडमान मे पोर्ट ब्लेयर के जी.बी.पंत हॉस्पिटल के कमरा नम्बर ४७ मे ओ.पी.डी.शुरू की गयी थी । जिस तरह किसी भी काम को शुरू करने के लिए सबसे पहले उसकी तह तक पहुँचना बहुत जरुरी होता है ठीक उसी तरह डी-एडिक्शन मे सबसे पहले ये जानना होता है की आख़िर व्यक्ति को शराब के नशे की आदत कैसे पड़ी। यूं तो शराब पीने के लिए कोई बहाने के जरुरत नही होती है पर फिर भी कुछ ऐसे कारण होते है जिन्हे लोग समझते है कि उन कारणों की वजह से ही उन लोगों ने शराब पीना शुरू किया ।यूं तो पीने के लिए कोई भी कारण नही होता है पर फिर भी लोग ढेरों कारण ढूँढ लेते है। और ऐसे ही कुछ कारण यहां पर हम लिख रहे है जो हमे ओ.पी.डी.मे आये हुए लोगों ने बताये थे। १ )ख़ुशी मनाने के लिए। २ ) दोस्तो का साथ देने के लिए । ३)दुःख भुलाने के लिए। ४)बाप शराबी है। ५)बीबी से पटती नही है। ६)पारिवारिक कलह के कारण। ७)ऑफिस मे अधिक काम होना। ८ )थकान मिटाने के लिए...

एक और डरावनी पोस्ट (सांप )

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पोस्ट के इस नाम की प्रेरणा हमे ज्ञानदत्त जी से मिली है।(हमने आपकी टिपण्णी का बुरा नही माना है । इसलिये आप इसे अन्यथा मत लीजियेगा। ये तो महज एक बहाना है. वरना हम आप लोगों को अपने घर के साँपों से कैसे मिलवाते. ) और कल हमने दीपक ज ी की एक कविता पढी थी जिससे भी हमारी ये पोस्ट कुछ प्रेरित है। अब जब नाम ही ऐसा है तो पोस्ट मे भी कुछ होना चाहिऐ। तो चलिए हम आपको अपने अंडमान के घर के कुछ साँपों से मिलवाते है। पर उससे पहले हम कुछ कहना भी चाहते है। जब हम लोग अंडमान गए तो जैसा की आप सबको अब पता ही है कि वहां बहुत जंगल है तो जंगल मे कुछ जीव-जंतु भी होंगे ही।शुरू-शुरू मे जब हम लोग अंडमान गए तो साँपों के बहुत किस्से सुने और हम लोगों को वहां रहने वालों ने ने हिदायत दी कि कभी भी अलमारी मे से कपडे वगैरा बिना झाडे मत पहनना और दरवाजा हमेशा ठीक से बंद किया करना क्यूंकि अंडमान मे सांप बहुत है। क्या हुआ डर गए. अरे डरिये मत. ये मटमैले रंग का सांप कुछ नही करने वाला है ये बहुत सीधा है. कैसे गुडाई की हुई जमीन मे मजे से घूम रहे है. लोगों ने तो ये तक बताया की कई बार सांप दरवाजे पर दस्तक (नॉक )...

दिगलीपुर मे रॉस एंड स्मिथ

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रॉस एंड स्मिथ किन्ही दो लोगों के नाम नही है बल्कि अंडमान के उत्तर के आख़िरी कोने मे बसे दिगलीपुर के दो बहुत ही छोटे खूबसूरत और नायाब से द्वीपों के नाम है । दिगलीपुर को अंडमान का आख़िरी कोना इसलिये कहा है क्यूंकि इसके आगे सड़क ख़त्म हो जाती है और दूर तक अपार समुन्द्र ही दिखता है।रॉस एंड स्मिथ के बारे मे लिखने से पहले कुछ बातें दिगलीपुर की भी बता दे। दिगलीपुर पोर्ट ब्लेयर से अगर सड़क के रास्ते जाएँ तो २९० कि.मी.की दूरी पर है। पर अगर समुन्द्र के रास्ते जाएँ तो १८० या १९० की.मी. की दूरी पर है। चाहे किसी भी रास्ते जाएँ यहां पहुँचने मे समय बहुत लगता है। सड़क के रास्ते जाने मे करीब १४-से १५ घंटे लगते है। वैसे हम तो हमेशा ही कार से गए है क्यूंकि एक तो हमे sea sickness होती है और दूसरे ड्राइविंग का यहां अपना ही मजा है ।ये रास्ता अच्छा और बुरा दोनों है। अच्छा इसलिये क्यूंकि यहां के ऊँचे-नीचे रास्ते,जंगल और जंगल मे विभिन्न प्रकार की चिड़ियों की आवाजें और चारों ओर फैली हरियाली दूर-दूर तक खाली सड़क बस बीच-बीच मे अंडमान ट्रांसपोर्ट की बसें और प्राइवेट बसें दिखती है अरे कहने का मतलब ह...

मायाबंदर

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नाम पर मत जाइए क्यूंकि यहां ना तो माया (शोर-शराबा )है और ना ही बन्दर ,ये अंडमान का एक छोटा द्वीप या आप इसे एक बहुत- बहुत ही छोटा सा शहर भी कह सकते है। मायाबंदर पोर्ट ब्लेयर से करीब २३० कि.मी.कि दूरी पर है और वहां सड़क के रास्ते और समुन्दर के रास्ते से जा सकते है सड़क के रास्ते जाने के लिए ए.टी.आर से जाना पड़ता है । यूं तो ढाई सौ किलोमीटर की दूरी आराम से तीन या ज्यादा से ज्यादा चार घंटे मे तै कर सकते है पर अंडमान मे ऐसा नही है । यहां पर हम अपनी मर् जी से बिल्कुल भी नही चल सकते है। ये ढाई सौ किलोमीटर की किलोमीटर की दूरी तै करने मे कम से कम नौ घंटे लगते है और कई बार तो ज्यादा भी लग सकते है। इतना समय इसलिये लगता है क्यूंकि एक तो पहले जंगल को पार करना होता है जैसा की हमने पहले भी बताया है की जंगल पार करने के लिए convoy के साथ चलना पड़ता है और दो क्रीक भी पार करनी पड़ती है। और रास्ता ऊंचा -नीचा माने चढ़ाई पड़ती है और कई बार बारिश मे सड़कें भी खराब होती है। अगर पोर्ट ब्लेयेर से सुबह पांच बजे चले तो पहले convoy मे जा सकते है और फिर नाम कुछ भूल रहे है शायद सदर्न क्रीक पर vehicle ferry...

डी एडिक्शन कैंप

अपडेट : हम माफ़ी चाहते है कि हमने पोस्ट लिखते हुए year नही लिखा था । दर असल हम अंडमान मे २००३ से २००६ तक रहे थे । अंडमान मे रहते हुए भी हमे वही समस्या आयी की जब पतिदेव और बेटा स्कूल चले जाते थे तो हम क्या करें। और इसी लिए हमने वहां पता करना शुरू किया की हम किस तरह का जॉब ले सकते है क्यूंकि हम पार्ट टाइम् जॉब करना ही पसंद करते है। अब चाहे इसे हमारा आलसी पन कहिये या चाहे कुछ और। १५ अगस्त २००३ को वहां पर शाम को एल.जी अपने घर पर सबको चाय पर बुलाते है वही पर हमारी मुलाकात एक महिला से हुई जो की सोशल वर्क से जुडी थी और वही उनसे बात चीत मे पता चला की डी एडिक्शन कैंप शुरू हो रहा है और हम उसे ज्वाइन कर ले। पहले तो हमने सोचा कि हम ना करें क्यूंकि शराब पीने वालों से बात करना कोई आसान काम नही है और हमे डर भी लगता था और दुसरे अंडमान इतनी छोटी जगह है कि आपको लोग कहीं भी मिल सकते है और आपके घर तक भी आ सकते है । पर फिर ये भी ख़्याल आया कि अगर हमारी मदद से किसी का घर बन सकता है तो हमे इस challange को स्वीकार करना चाहिऐ। challange इसलिये क्यूंकि इससे पहले हमने ऐसा काम कि...

हट बे

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अरे -अरे गलत मत समझिये ,ये तो अंडमान के एक द्वीप का नाम है । ये अंडमान से करीब आठ घंटे की दूरी पर है । वहां जाने के लिए स्पीड बोट और शिप से जा सकते है। स्पीड बोट तो रोज सुबह साढे छे बजे जाती है ,वैसे तो बडे शिप जो निकोबार जाते है वो भी कई बार हट बे से होते हुए जाते है ।अगर sea sickness नही महसूस होती है तो बोट की यात्रा का आप भरपूर मजा उठा सकते है।कहते है की रास्ते मे dolphin भी दिखती है पर हमे कभी नही दिखी थी। अन्यथा हैलिकॉप्टर से भी वहां जाया जा सकता है । हैलिकॉप्टर से आधे घंटे मे पहुंच जाते है। हट बे भी अंडमान का एक छोट ा सा ही द्वीप है ये द्वीप सीधी सड़क जैसा है और सड़क के साथ-साथ समुन्द्र । यहाँ का butler beach गोल्डन sand beach है मतलब वहां की बालू का रंग सुनहरा सा है। beach तो हर जगह की तरह ये भी बहुत अच्छा है पर यहाँ के beach पर कभी-कभी मगरमच्छ भी आ जाते है। इसलिये वहां थो डा सचेत रहना चाहिऐ। हट बे मे एक कुदरती झरना भी है बिल्कुल जंगल के अन्दर पर है खूबसूरत। हम तो वहां सुनामी के पहले ही गए थे क्यूंकि सुनामी के बाद तो हमे समुद्री यात्रा करने मे डर लगने ...

अफ्तारनुन सिएस्टा

दिल्ली मे पिछले २० सालों से रहते हुए कभी भी बाजार जाने और खरीदारी करने की आदत सी थी पर जब अंडमान गए तो अपनी इस आदत को बदलना पड़ा । वहां जाकर समझ आया कि अफ्तारनुन सिएस्टा क्या है। भाई हम ठहरे दिल्ली वाले जब मन हुआ बाजार चले गए .क्यूंकि दिल्ली मे अफ्तारनुन सिएस्ता जैसा कुछ नही है, सो हम आराम से तैयार होकर करीब १२ बजे जब खरीदारी करने बाजार पहुंचे तो चोंक गए क्यूंकि या तो दुकाने बंद हो गयी थी या बंद हो रही थी। जब हमने अपने ड्राइवर से इसका कारण पूछा तो वो बडे ही शान्त भाव से बोला कि मैडम यहाँ पर तो ऐसे ही है । १२ बजे सब दुकाने बंद हो जाती है और फिर ३ बजे दोपहर मे खुलती है। अब तो आप ३ बजे के बाद ही सामान ले पाएंगी । ये सुनकर ड्राइवर से जब हमने पूछा कि तुमने पहले क्यों नही बताया तो वो बोला कि मैंने समझा कि आप बस घूमने जा रही है। चूंकि अंडमान मे सुबह जल्दी होती है और १२ बजे तक सूरज अपनी चरम सीमा पर होता है और कुछ कोस्तेल एरिया कि वजह से भी ,वहां सभी दुकाने साढे आठ सुबह खुल जाती है ,दोपहर मे १२ से ३ बंद रहती है और फिर ३ बजे के बाद रात ९ बजे तक खुली रहती है। वहां ऑफिस भी साढे आ...

अंडमान निकोबार (बारतांग )

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बारतांग भी पोर्ट ब्ल्येर से दो घंटे की दूरी पर है। वहां जाने के दो साधन है या तो आप बोट से जाये या फिर सड़क से। बोट से जाने मे ४से ५ घंटे लग जाते है जबकि अगर कार या बस से जाएँ तो २ घंटे मे पहुंच जाते है। सड़क का रास्ता इसलिये भी अच्छा है क्यूंकि इसमे जंगल पार करना पड़ता है और इसी जंगल के रास्ते मे जारवा भी मिलते है । जिरका टांग से काफिले की तरह जाना पड़ता है जिसमे सबसे आगे बस मे फॉरेस्ट गार्ड बैठता है और कारों मे भी गार्ड बैठता है जिससे जारवा कोई गाड़ी ना रोक सके। यूं तो अब जारवा पहले की तरह नही है कि देखते ही तीर मार दे पर अभी भी अगर वो गाड़ी रोक ले तो जरा मुश्किल हो जाती है । वैसे अब वो लोग कुछ-कुछ हिंदी भी समझ लेते है और कुछ छोटे-छोटे शब्द भी बोलते है जैसे पान ,बिस्किट , खाना , पैसा वगैरा। अब तो कई बार वो लोग जंगल से जड़ी-बूटी , सुपारी लाते है और दुकानों मे बेचते है और बिस्किट, पान वगैरा खरीदते है। जारवा लड़कियों को सजने का बहुत शौक़ होता है और उन्हें लाल,नीला रंग पसंद है कहने का मतलब है कि उन्हें bright colours पसंद आते है । ज्यादातर महिलाएं गले मे और सिर पर कुछ ...

दुर्योधन

क्या हुआ ये नाम सुनकर चौंक गए , घबराइये मत हम यहाँ कोई महाभारत नही सुनाने जा रहे है। ये नाम यूं तो आम तौर पर सुनाई नही देता है खासकर उत्तर भारत मे पर, अंडमान मे हम कह सकते है कि ये नाम बहुत आम है, वैसे ३ दुर्योधन नाम के व्यक्तियों से हमारा सामना हुआ। पहली बार ये नाम हमने p.w.d.मे काम करने वाले plumber का सुना तो सुनकर यकीन ही नही हुआ कि कोई दुर्योधन नाम भी रख सकता है। पर जब हमने दूसरी बार ये नाम अपने पतिदेव के ऑफिस मे काम करने वाले एक आदमी का सुना तो लगा की लो एक और दुर्योधन मिल गया । उन दिनों हम घर मे काम करने के लिए आदमी खोज रहे थे वैसे आपको शायद यकीन नही होगा कि अंडमान मे servant मिलना किसी खजाने के मिलने से कम नही है क्यूंकि वहां ज़्यादातर लोगों के पास या तो नारियल के बाग़ है सुपारी के बाग़ और काफी लोग खेती भी करते है। चुंकि वहां के लोगों खाना बहुत सादा है चावल और मछली, मतलब ना तो उन्हें काम की जरुरत है और ना वो करना चाहते है। और अगर काम करते भी है तो उन्हें पक्की नौकरी चाहिऐ होती है अगर नौकरी दिला सकते है तो आपको काम करने वाले मिल सकते है। खैर करीब २ महीने की जद्दोज...

अंडमान निकोबार ३ (neil island )

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ये द्वीप पोर्ट ब्लेयेर से २ घंटे की दूरी पर है। पहले वहां बोट सीधे नही जाती थी ,बोट या तो havelock जाते हुए या फिर havelock से वापस आते हुए नील island जाती थी। पर अब स्पीड बोट से सीधे २ घंटे मे पहुंच जाते है। बोट से उतरते ही आप jetty से दोनो तरफ रंग - बिरंगी मछलियाँ ( कौवा फिश ) देख सकते है । ये द्वीप बहुत ही छोटा है पर खूबसूरत है और शांति तो इतनी कि एक बार को मन ये सोचने को मजबूर हो जाता है क ि क्या हम इसी दुनिया मे है ,क्यूंकि वहां गाडियां बहुत कम है इसलिये ना तो वहां गाड़ियों का शोर है और ना ही कोई भागम- भाग है। वहां जाकर सब कुछ भूलकर आप प्रकृति का लुत्फ़ उठा सकते है। वहां २-३ beach है पर चूंकि वहां ज्यादा लोग नही जाते है इसलिये beach खाली रहते है। जो एक तरह से अच्छा भी है और खराब भी है क्यूंकि भगवन ना करे अगर कोई हादसा होता है तो वहाँ कोई बचाने वाला नही होगा । हम लोग जब वहां गए तो ऐसा ही कुछ हमारे साथ हुआ था। सीतापुर beach जहाँ चट्टानें है और काफी आगे जाकर एक गुफा सी है। वहां लहरों के साथ टहलते -टहलते हम लोग गुफा तक जा पहुंचे ,और फोटो खिचाने के लिए...

घर की खोज

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कुछ दिन गेस्ट हाउस मे रहने के बाद घर की खोज शुरू हुई ,घर तो कई थे पर हमारी इच्छा थी की हमारा घर समुन्द्र के सामने हो बिल्कुल फिल्मी स्टाइल मे । इस चक्कर मे कुछ समय निकल गया ,हमारा ये कहना था की अगर हम अंडमान मे समुन्द्र के सामने नही रहेंगे तो कहॉ रहेंगे। बस अब इसे हमारी जिद ही समझ लीजिये .खैर कुछ दिन बाद हमे एक घर जो की sea facing था मिल गया। और उस जगह का नाम था जंगली घाट ,चौन्किये मत अंडमान मे नाम जरा अलग तरह के होते है । जब हमने घर पसंद कर लिया तो हमारे ड्राइवर ने कहा कि मैडम ये घर ठीक नही है.क्यूंकि यहाँ से ही शमशान घाट का रास्ता है । ये सुनते ही हमने उस घर को लेने से मना कर दिया और हम गेस्ट हाउस वापस आ गए । पर वो कहते है ना कि जो किस्मत मे लिखा हो उसे आप बदल नहीं सकते। गेस्ट हाउस मे रहते हुए समय अच्छे से बीत रहा था .रोज वहां से हम समुन्द्र का ,उसके पानी के अलग -अलग रंगों का मजा उठा रहे थे और जिंदगी मजे मे कट रही थी । यूं तो गेस्ट हाउस का खाना खाकर ज्यादा दिन नहीं रहा जा सकता था सो एक बार फिर से घर कि खोज शुरू हो गयी। और हमारी किस्मत कि इस बार भी हमे घर मिला तो वहीँ जंगल...

अंडमान निकोबार 2

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अंडमान पहुंच कर हम लोग बहुत खुश थे । एअरपोर्ट से साऊथ प्वाइंट circuit house का रास्ता ५ मिनट का है ओर circuit house थोडा ऊंचाई पर है । और वहां से बहुत ही सुन्दर view दिखायी देता है । अगर आप अपनी बालकनी से या कमरे से बाहर देंखे तो सामने समुन्द्र और पहाड़ और बादलों का अदभुत नजारा देखने हो मिलता है । चुंकि हम लोग जून मे गए थे और बारिश का मौसम था इसलिये वहां का नजारा देखते ही बनता था । वहां पर बारिश ऐसे होती है मानो पर्दा गिर रहा हो । एक समान बारिश होती रहती है । बारिश का कुछ कहा नही जा सकता है कभी झमाझम बारिश तो कभी चमचमाता सूरज निकल आता है कहने का मतलब है कि आपको वहां हमेशा छतरी लेकर चलना पड़ता है क्यूंकि पता नही कब इंद्र देव अपनी कृपा कर दे । पोर्ट ब्लेयेर मे समुन्द्र के साथ -साथ walking track बना है जिसे देख कर हमारा भी मन हो गया टहलने का। वहां सवेरा जल्दी हो जाता है यानी कि वहां का ६ दिल्ली के ८ बजे के बराबर...