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Showing posts from February, 2008

पुनर्जन्म का चक्कर अब टी.वी.सीरियल मे भी

टी.वी.सीरियल की एक बात बहुत अच्छी है कि इसमे दर्शक कुछ भी मिस नही करता है क्यूंकि आप जब भी देखना शुरू करें लगता है कहानी अभी वहीं की वहीं है हाँ बस खलनायक और खलनायिका के जुल्म जरुर बढ़ गए होते है। वो चाहे क्यूंकि ......हो या कहानी घर....हो सलोनी हो...या दुल्हन ...या फ़िर छूना है आस्मान ही क्यों ना हो। अभी कल ही हमने कई दिनों बाद जी टी.वी.देखा तो दुल्हन सीरियल मे कहानी तो कुछ ख़ास नही बढ़ी थी पर हाँ पुनर्जन्म का किस्सा देखने को मिला और हमे हमारी पोस्ट लिखने का विषय भी मिला। टी.वी.के सीरियल मे भी फिल्मी दांव-पेंच देखने को मिलते है। अब जब टी . वी . मे जब नाच - गाना सब कुछ फिल्मी स्टाइल का होने लगा है तो भला पुनर्जम का विषय कैसे छूट जाता। अभी तक तो फिल्मों मे ही पुनर्जन्म दिखाया जाता था पर अब तो टी . वी . के सीरियल मे भी पुनर्जन्म की कहानी दिखाने का चलन होने जा रहा है।पुनर्जन्म पर बनी फिल्में जैसे सुभाष घई की कर्ज और अभी हाल ही मे बनी फरहा खान की ओम शान्ति ओम काफी चली है। अभी तक एकता कपूर के सीरियल मे तथ

बेलिबास योगा ( गुरु और रूप अनेक )

योगा जिसे भारत मे सदियों से ऋषि मुनि और साधू संत लोग करते आए है आज देश विदेश मे मशहूर हो रहा है।माना जाता है कि आज कल की भाग दौड़ भरी जिंदगी मे योगा करने से लोग स्वस्थ रहते है।योगा करने के लिए खुले माहौल जैसे बगीचे मे ,नदी या समुन्दर किनारे को सबसे अच्छा माना जाता रहा है। आज कल योगा बहुत ही ज्यादा प्रचलित हो रहा है । हर कोई योग गुरु बन रहा है। २०-२५ साल पहले दूरदर्शन पर भी योगा दिखाया जाता था जिसमे गुरु (सरदारी लाल सहगल) के दो शिष्य एक महिला और एक पुरूष उनके बताये हुए आसान करते थे। और गुरु बताते थे कि किस तरह से आसन करना है और किस आसन से कौन से रोग ठीक होते है वगैरा - वगैरा । कुछ समय बाद धीरेन्द्र ब्रह्मचारी और डॉली जी का कार्यक्रम दूरदर्शन पर आना शुरू हुआ जिसमे डॉली जी लोगों की समस्याएँ पढ़ती थी और धीरेन्द्र ब्रह्मचारी उनका जवाब देते थे और योग के विभिन्न आसान बताते थे। श्री श्री रवि शंकर जी भी योगा और मेडिटेशन और सुदर्शन क्रिया पर जोर देते है। ना केवल देशी बल्कि विदेशी लोग भी बड़ी संख्या मे इनके भक्त है।इनके एक-एक शिविर मे २५ से ३० हजार लोग आत

सुनामी से हुई बर्बादी और हम

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सुनामी के दिन करीब चार-पांच घंटे बाद जब पानी उतर गया तो बाक़ी दूसरे लोगों की तरह हम लोग भी अपने घर की ओर गए ।घर जाते हुए मन मे एक अजीब सा डर था की पता नही घर का क्या हाल होगा। और जब हम लोग अपने घर पहुंचे तो घर की हालत देख कर सकते मे आ गए , कलेजा मुँह को आ गया।घर का सारा सामान तितर-बितर हो गया था। किचन का सामान जैसे मिक्सी,जूसर का एक पार्ट गार्डन मे तो दूसरा पार्ट दरवाजे पर। और डाइनिंग टेबल का सामान जैसे मैट्स ,स्पून ,अचार और जैम की बोत्तले सब बाहर बगीचे मे ।फ्रिज तो पूरा अप साईड डाउन माने उल्टा पड़ा हुआ था। लौंदरी बैग कपडों के साथ बाहर कीचड मे। ड्राइंग रूम का समान जैसे सोफा सेट वगैरा तो उलट - पलट गए थे । छोटे-छोटे सजावटी सामान इधर-उधर बिखरे पड़े थे।पतिदेव का ऑफिस का बैग बहकर दूर चला गया था । हमारे एक गणेश जी की मूर्ति ड्राइंग रूम से बहकर हमारे घर की सीढियों पर आ गयी थी।जिन्हें हमने उठाकर गाड़ी मे रख लिया था। पूरा घर काले रंग के कीचड और पत्तियों से भरा पड़ा था । चूँकि हमारे पैर मे चोट थी इसलिए हम तो अन्दर नही गए हमारे पतिदेव और बेटे ने घर मे जाकर ऊपर की मंजिल से धी

बजट लो जी फ़िर आ गया

ये फरवरी के आखिरी दिन बजट के लिए ही बने है। हर साल १५ फरवरी बीतते -बीतते हर तरफ़ सिर्फ़ बजट का ही शोर रह जाता है कि इस साल शायद बजट मे जनता के लिए कुछ जबरदस्त होगा पर बजट पेश होने के बाद वही ढाक के तीन पात ।यानी ना तो आम आदमी और ना ही ख़ास आदमी खुश हो पाता है।आम आदमी ताउम्र सिर्फ़ इसी आस मे बिता देता है कि इस बार ना सही अगले साल का बजट जरुर कुछ अच्छा होगा। वो कहते है ना उम्मीद पर दुनिया कायम है । पहले यानी जब पढ़ते थे तब बजट से कोई ख़ास वास्ता नही रहा , हाँ हमेशा ये जरुर सुनते रहे कि इस साल इन्कम टैक्स मे छूट बढेगी या नही।शादी के बाद भी कुछ ऐसा ही सुनने को मिलता रहा कि इस साल इन्कम टैक्स मे छूट बढेगी या नही। एक्स्साइज ड्यूटी घटेगी या बढेगी। घरेलू चीजों, दवाओं के दामों मे कटौती या बढौती।रेल किराया और हवाई जहाज का किराया बढेगा या वही रहेगा।कौन -कौन सी चीजों पर सबसिडी मिलेगी। घर खर्च पर बजट से क्या असर होगा। लोक सभा मे बजट आने के बाद घर का बजट जरुर गड़बड़ा जाता है। उफ़ बाबा हर साल यही होता है जहाँ फरवरी आई हर कोई अपने हिसाब से सोचने लगता है । पर वित्त मंत्

जब चोट लगती है तभी साइकिल चलानी आती है.

बात उन दिनों की है जब हम सातवीं क्लास मे पढ़ते थे ।उन दिनों इलाहबाद मे तो यूं भी साइकिल से स्कूल जाने का बड़ा रिवाज था ।(वैसे तो आज भी बच्चे साइकिल से स्कूल से जाते है ) लड़का हो या लड़की ज्यादातर बच्चे साइकिल से ही स्कूल जाते थे। हमारे घर मे भी दीदी लोग साइकिल से स्कूल जाती थी पर चूँकि हम सबसे छोटे थे इसलिए हमने साइकिल चलाना जरा देर मे सीखा। अब सीखने के लिए साइकिल तो हमे शाम को ही मिलती थे दीदी लोगों के स्कूल से आने के बाद।शुरू मे कुछ दिन तो भइया और हमारी दीदी ने हमे साइकिल चलाना सिखाया की कैसे पैडल पर पैर रखकर कैंची चलते है और किस तरह सीट पर बैठते है और साइकिल का हैंडल हमेशा सीधा रखना चाहिए और सबसे ख़ास हिदायत कि कभी भी दोनों ब्रेक एक् साथ मत लगाना । शुरू मे दो-तीन दिन जब हम साइकिल चलाते तो भइया या दीदी पीछे से कैरियर पकड़े रहते और हम पीछे देखते रहते की उन लोगों ने साइकिल पकड़ रखी है।और हमे चलाते हुए ये विश्वास रहता की अगर हमारी साइकिल गिरेगी तो भैया या दीदी हमे गिरने से बचा लेंगे।दीदी हमेशा कहती कि सामने देखा करो पीछे नही। खैर पाँच-छः दिन बाद हम जब साइकिल

बन्दर का नाच

आज रविवार है ना तो सोचा क्यों ना बचपन की कुछ याद ही ताजा कर ली जाए। जी हाँ आज हम आप सबको अपने सबके बचपन के उन दिनों मे ले जाने की कोशिश कर रहे है जब मनोरंजन के लिए यही सब कुछ होता था। अक्सर रविवार के दिन साँप,भालू,बन्दर वाले आते थे । जहाँ भालू और बन्दर वाले भालू और बन्दर का नाच दिखाते थे वहीं साँप वाले साँप और नेवले की लड़ाई दिखाते थे और पता नही कितने तरह के साँप दिखाते थे। इसे देख कर लगा कि आज भी इतने सालों बाद कुछ भी नही बदला है। बदला तो बस इतना कि बन्दर वाला अब ५-१० रूपये की जगह सौ रूपये मांगता है। हमने १०० तो नही ५० रूपये दिए थे।और साथ मे केले और बिस्कुट दिए थे। नोट -- और हाँ कुछ खा - पीकर देखियेगा क्यूंकि सुना है सुबह - सुबह बन्दर ( हनुमान जी का नही ) का नाम लेने से दिन भर कुछ खाने को नही मिलता है । :) यूं तो ये विडियो हमने पिछले साल आगरा से फतेहपुर सीकरी जाते हुए हाईवे पर बनाया था।आप विडियो देखिये । नोट -- हम भी इस बात को ठीक नही समझते है । पर सिर्फ़ ये दिखाने के लिए ये विडियो लगाया है कि पचास साल बाद भी हम वहीं के वह

दो सौवी पोस्ट जरा एक नजर

आज ये हमारी दो सौवी पोस्ट है ।यकीन नही हो रहा है । इतनी सारी पोस्ट लिखने की हिम्मत और हौसला आप लोगों से ही मिला है।जब हमने ब्लॉगिंग शुरू की थी तो रोमन हिन्दी मे लिखते थे। और इसीलिए शुरू की चार पोस्ट रोमन मे है और उसके बाद हमे हिन्दी राईटिंग टूल के बारे मे पता चला था।और तब पांचवी पोस्ट से हमने हिन्दी मे लिखना शुरू किया था। पहले हम कुछ तरह से लिखते थे जरा गौर फरमाये। Friday, February 23, 2007 Sony ki Durgesh nandini kya kamal ka serial banaya hai , ichcha hoti hai ki director se ye poonchne ki ,ki aise bachche kahan hote hai. serial ne to ma aur bete ke rishte ki dhajjiyian hi uda di hai. mana ki aaj kal bachche paise ke peeche bhagte hai par jo launguage use ki gayi hai wo to meri samajh ke bahar hai. bete apne father ko buddha aur mother ko budhiya bolte hai.aur jaisa atyachar bete aur beti apni ma ke saath kar rahe hai wo to hamein aurangjeb ki yaad dilata hai.saare log overacting karte lagte hai. is serial ne to beti ko bhi nahin baksha, usse bhi property ka lalachi di

क्रिकेटर बिकते है बोलो खरीदोगे...

क्या ज़माना आ गया है की अब क्रिकेट खिलाडियों की बोली लगाई जा रही है।पहले कहानियो मे और इतिहास मे पढने को मिलता था की इंसानों की बोली लगाई जाती थी।जानवरों की बोली तो आज भी लगती है।समय बदला और अब क्रिकेट खिलाडियों की बोली लगाने का सिस्टम शुरू हुआ है। पहले लोग हाट - बाजार और सड़क चौराहे पर बोली लगाते थे अब बाकायदा बड़े होटल मे बढ़िया टेबल और पूरी शान-शौकत और खाने-पीने के बीच बोली लगाने (नीलामी की तरह) का सिलसिला शुरू हुआ है। आई.पी.एल.ने ये नया फंडा शुरू किया है बोली लगाने का। पहले तो टीम के लिए बोली लगाई गई और अब खिलाडियों के लिए बोली लगाई गई।एक-एक टीम सौ साढ़े तीन सौ करोड़ मे बिकी है। और अब खिलाडी भी करोड़ों मे बिक रहे है। बिकने वाले खिलाडी और खरीद दार दोनों हाथों से दौलत समेटने मे लगे है।हर खिलाडी की कीमत करोडों मे मापी जा रही है।पर तब भी दादा यानी सौरभ गांगुली खुश नही नजर आ रहे है क्यूंकि उनकी कीमत धोनी से कम जो है। अब खिलाडी की कीमत आलू -प्याज के जैसी हो गई . जैसे आलू - प्याज १० रूपये किलो बिकता है तो क्रिकेटर २ - ४ -6 करोड़ मे । पर इन दो-चार करोड़ से

पहला जन्मदिन यानी ३६५ दिन ब्लॉगिंग के

आज यानी २१ फरवरी के दिन ही हमने ब्लॉगिंग की दुनिया मे जन्म लिया था ,अरे मतलब आज ही के दिन इसी समय हमने अपनी पहली पोस्ट लिखी थी।आज पूरा एक साल हो गया हमे ब्लॉगिंग करते हुए। जिस तरह से एक बच्चा अपने पैदा होने के साथ ही सीखना शुरू करता है ठीक उसी तरह हमने भी इस ब्लॉगिंग की दुनिया मे आकर बहुत कुछ सीखा है। हमारी शुरूआती दिनों की पोस्ट कुछ ऐसी ही थी जैसे जब बच्चा चलना सीखता है तो उसके कदम डगमगाते है पर धीरे-धीरे चलना सीख ही जाता है और इसी तरहडगमगाते हुए हमने भी ब्लॉगिंग के तीन महीने पूरे किए थे। अपने इस एक साल की ब्लॉगिंग का सबसे ज्यादा श्रेय हमारे दोनों बेटों को है जिन्होंने हमे एक तरह से जबरदस्ती ठोक-ठोक कर ब्लॉगिंग करना सिखाया।और अभी भी जब भी कोई गड़बड़ होती है तो हम बेटों से ही पूछ कर ठीक करते है।पतिदेव तो हमसे कहते-कहते थक गए थे कि हम भी कंप्यूटर सीख ले। खैर अब सभी खुश है । इस एक साल मे आप सबने अपनी टिप्पणियों से जिस तरह से हमारी हौसला अफजाई की है उसके लिए आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया। क्यूंकि जिस तरह इंसान को जिंदा रहने के लिए साँस लेने की जरुरत होती है उसी तरह ब

अनचाहे मेहमान और हम

दिल्ली मे रहते हुए मेहमानों से दूर रहना मुश्किल ही होता है। गाहे-बगाहे लोग आ ही जाते और फ़िर अपनी खातिरदारी भी करवाते है आप चाहे या ना चाहे।अब अपने भारत मे तो मेहमान को भगवान का रूप ही माना जाता है मेजबान माने या ना माने ।कई बार तो ऐसे मेहमान आते कि लगता ओह बाबा ये कब जायेंगे।दिल्ली मे रहते हुए ऐसे लोगों मतलब मेहमानों से बहुत वास्ता पड़ता था। ये तो हम सभी जानते है कि दिल्ली मे जितनी गर्मी पड़ती है उतनी ही ठंड भी पड़ती है।दिल्ली मे सर्दियों मे नल का पानी इतना बर्फीला ठंडा होता है कि पानी छूने पर लगता कि हाथ ही गल जायेगा।अब अगर ऐसी गलन भरी सर्दी मे जहाँ रजाई से बाहर निकलना मुश्किल हो वहां अगर अनचाहे मेहमान आ जाए तो ना चाहते हुए भी खुले दिल से मेजबानी करनी ही पड़ती थी।आज का वाकया ऐसे ही मेहमान के नाम है। ऐसी ही एक जाड़े की गलन भरी सर्दी की शाम को फलाने जी फ़ोन आया और उन्होंने हाल-चाल पूछा की भाई आजकल तुम लोग रहते कहाँ हो।और दुनिया भर की बातचीत के बाद उन्होंने पूछा कि आज शाम को क्या घर पर हो । और जब पतिदेव ने कहा की हाँ घर पर ही है . तो इस पर उधर से फलाने जी ने कहा की अच्छा तो ह

अप्पू (घर)अब चला जायेगा

अप्पू घर इस नाम से ना केवल दिल्ली वाले अपितु दूसरे प्रदेश और शहरों के लोग भी वाकिफ है।अप्पू घर amusement park जो कि एक तरह से दिल्ली की पहचान सा बन गया था अब ना केवल अपनी पहचान बल्कि अपना अस्तित्व ही खोने जा रहा है।अप्पू घर जिसे बने २३ - २४ साल हो गए है पर अभी तक इतने सालों के बाद भी अप्पू घर घूमने वालों के जोश मे कोई कमी नही आई । किसी भी रविवार को अप्पू घर के बाहर लोगों की भारी भीड़ देखी जा सकती थी।यहां झुला झूलने के लिए लोग बिना सर्दी गर्मी कि परवाह किए घंटों लाइन मे खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करते देखे जा सकते थे। ( थे इसलिए क्यूंकि बीते रविवार यानी १७ फरवरी से अप्पू घर बंद हो रहा है ) अप्पू घर से तो हमारी भी बहुत सारी यादें जुड़ी हुई है। जब बेटे छोटे थे तो अक्सर ही अप्पू घर जाते थे।और घंटों बच्चे झुला झूलते थे जैसे मोनो रेल , स्माल कार , उड़न तश्तरी , बाईक्स , और ना जाने क्या - क्या। और पिछले २३ - २४

ब्लौग्वाणी मे पोस्ट गायब पर चिट्ठजगत और नारद मे मौजूद

आम तौर पर हम ब्लौग्वाणी ही इस्तेमाल करते है और इससे काफ़ी संतुष्ट भी है। पर आज एक अजीब सी बात देखने को मिली। और इसीलिए हम ये पोस्ट लिख रहे है।अभी दूसरे लोगों के ब्लॉग पढ़ते-पढ़ते हमने अचानक नोटिस किया कि हमारी आज सुबह वाली पोस्ट अब ब्लॉगर मे भी चिट्ठे समय निर्धारित कर सकते ह ै ब्लौग्वाणी पर कहीं नजर नही आ रही है ।हालांकि सुबह ये पोस्ट दिख रही थी पर अभी नही दिख रही है। अब चूँकि ब्लॉगिंग का चस्का लग गया है इसलिए दो-तीन बार पेज पर चेक भी किया पर हमारी पोस्ट कहीं नजर नही आई। तो कौतुहल वश हमने चिट्ठाजगत खोला तो वहां पर हमारी आज की पोस्ट दिख रही है। अब ऐसा क्यों है ये तो हम नही जानते है। हो सकता है कुछ तकनीकी मामला हो । अभी एक बार हमने फ़िर से देखा पर अभी भी ब्लौग्वाणी पर हमारी आज की पोस्ट गायब है पर चिट्ठाजगत और नारद मे मौजूद है। ऐसा क्यों है कोई बताये।

अब ब्लॉगर मे भी चिट्ठे समय निर्धारित कर सकते है.

एक या दो महीने पहले शास्त्री जी ने अपने ब्लॉग पर अपने चिट्ठे को कैसे समय निर्धारित करेँ , के बारे मे बताया था । और उसे पढ़कर लगा था कि काश ब्लॉगर मे भी ये सुविधा हो जाए क्यूंकि उस समय तक ब्लॉगर मे ये सुविधा उपलब्ध नही थी पर आज ये सुविधा ब्लॉगर मे भी उपलब्ध हो गई है। अब चिट्ठे लिख कर उन्हें समय और तारीख के अनुसार पब्लिश कर सकते है।कैसे तो इसके लिए यहां पढे। जरा और खुलासा करके बताते है। जैसे ये पोस्ट हम सत्रह तारीख की रात ग्यारह बजे लिख रहे है पर इसमे पोस्ट को पब्लिश करने की तारीख अट्ठारह और समय सुबह नौ बजे का निर्धारित कर रहे है।अब अगर ये सुबह नौ बजे पब्लिश हो गई तो मतलब ब्लॉगर मे चिट्ठे लिखने वाले भी अपनी पोस्ट को समय निर्धारित कर सकते है। इस सुविधा का एक सबसे बड़ा फायदा ये है कि अब कहीं बाहर जाने ( मसलन अपने शहर से दूर ) पर भी अपनी पोस्ट के जरिये चिट्ठाकार बलॉग जगत मे अपनी मौजूदगी बनाए रख सकता है।

द एसैसिनेशन ऑफ़ जेस्सी जेम्स बाय कावर्ड रॉबर्ट फोर्ड (the assassination of jesse james by the coward robert ford )

ये फ़िल्म ऑस्कर मे बेस्ट फ़िल्म के लिए तो नही पर बेस्ट ऐक्टर इन अ सपोर्टिंग रोल के लिए nominated है। हालांकि फ़िल्म मे brad pitt है जो jesse james के रोल मे है और casey affleck जो robert ford के रोल मे है ।फ़िल्म मुख्य रूप से इन्ही दो किरदारों पर है। फ़िल्म की कहानी कुछ ख़ास नही है ।jesse james जो की एक notorious robber है । robert ford बचपन से ही jesse james के जैसा बन कर मशहूर होना चाहता था और इसीलिए robert अपने भाई के साथ jesse james का ग्रुप भी ज्वाईन करना चाहता है । बाद मे किस तरह robert jesse james के काम करने के तरीके को देख कर बदल जाता है । यूं तो फ़िल्म मे brad pitt भी है पर इस फ़िल्म मे brad pitt की एक्टिंग कुछ ख़ास जमी नही। अपने लंबे नाम की तरह ही ये फ़िल्म भी लम्बी है । और फ़िल्म इतनी धीमी गति से आगे बढ़ती है की हमने इस फ़िल्म को टुकड़े-टुकड़े मे देखा अरे मतलब दो -तीन दिन मे। क्लाइमेक्स का सीन तो बिल्कुल ही बोरिंग है। एक बार मे झेलना इस फ़िल्म को हमारे बस की बात नही थी। क्यूंकि फ

कोर्ट कचहरी से दूरी भली ...

कुछ दिन पहले दिनेश जी ने अदालतों की संख्या बढाए जाने की बात की थी जिससे लोगों को जल्दी न्याय मिल सके।तो इस पर हमें अपने साथ हुई एक घटना की याद आ गई।बात अस्सी के दशक की है। उन दिनों हम लोग दिल्ली मे रहते थे। । उन दिनों हम लोगों की कालोनी मे कार गैराज नही थे इस लिए सभी लोग अपनी कार घर के बाहर खड़ी करते थे।तब इतना ज्यादा गार्ड वगैरा रखने का भी चलन नही था। हर सुबह कार साफ करने के लिए आदमी आता था और कार साफ करने के बाद चाभी देकर चला जाता था। ऐसी ही एक सुबह जब कार साफ करने वाले ने घर की घंटी बजाई तो हमने उसे कार की चाभी दी और वो कार साफ करने के लिए चला गया पर चंद सेकंड के बाद लौटकर आया और बोला की गाड़ी तो है ही नही। उसके ऐसा कहने पर हमने चौंककर कहा की गाड़ी नही है तो कहाँ गई। इस पर उसने फ़िर वही कहा की जी गाड़ी तो बाहर खड़ी ही नही है। इतना सुनकर तो हम लोगों के होश ही उड़ गए की चाभी घर मे और गाड़ी गायब। खैर इधर-उधर लोगों से पूछा पर कुछ पता नही चला तो पुलिस स्टेशन मे कार चोरी होने की रिपोर्ट लिखवाई गई। और उसके बाद पुलिस ने कार को ढूंढ़ना शुरू किया।और तकरीबन एक महीने बाद हम लोगों को प

वेलेन्टाईन डे यानी खतरे की घंटी

आज वेलेन्टाईन डे है यानी प्यार करने वालों के लिए खतरे की घंटी। पिछले तीन-चार दिनों से हर प्रदेश मे अलग -अलग तरह से लड़के-लड़कियों को आपस मे मिलने से रोकने के लिए नए-नए तरीके अपनाए जा रहे है। भोपाल मे जहाँ बजरंग दल के लोग कहते है कि वो आज के दिन जहाँ भी किसी प्रेमी जोड़े को देखेंगे तो उनके माता-पिता को बुलाकर उनकी वहीं शादी करा देंगे, तो उत्तर प्रदेश मे ये कहा जा रहा है कि अगर कोई भी लड़का-लड़की घूमते हुए दिखेंगे तो उनका मुंह काला करके घुमाया जायेगा । भोपाल मे जहाँ एक तरफ़ बजरंग दल लोगों को घर मे रहने की धमकी दे रहा है वहीं भोपाल मे महिलाओं ने एक गदा धारी सेना भी बनाई है प्यार को बचाने की । इस गदा धारी महिला सेना का कहना है की वो प्रेमी जोडों को बजरंग दल से बचाने और मुहब्बत को जिंदा रखने के लिए सारे शहर मे घूमेंगी । तकरीबन हर साल कोई ना कोई दल धमकी देता है ,दुकानों मे तोड़-फोड़ करता है ,लड़के-लड़कियों की पिटाई करते है पर आख़िर क्यों । जहाँ हर जगह आज के दिन रोक-टोक है वहीं गोवा के अखबार वेलेन्टाईन डे सेलिब्रेशन के

संजय की शादी (देश की सबसे बड़ी खबर)

सारे टी . वी चैनल के मुताबिक आज देश की सबसे बड़ी खबर संजय दत्त की शादी है। आज सुबह से सारे टी.वी.चैनल संजय दत्त की शादी की खबर से भरे पड़े है।कि संजय दत्त और मान्यता की शादी हिंदू रीति-रिवाज से आज हो रही है जबकि गोवा मे अभी हाल ही मे उनकी कोर्ट मैरेज हो चुकी है।सुबह से चैनल वाले लगे है कि क्या संजय कि बहनें शादी मे शामिल होंगी या नही ।कोई चैनल कहता कि संजय ने शादी का निमंत्रण अपनी बहनों को दिया है तो कोई कहता है कि निमंत्रण नही दिया है। कभी कहते है कि प्रिया दत्त ने इस शादी पर कुछ भी कहने से इनकार किया तो कभी कहते है कि संजय ने अपनी बहनों को शादी मे नही बुलाया है। बहनों को अपने भाई की शादी मे शिरकत करनी चाहिऐ क्यूंकि जब उसके बुरे वक्त मे साथ दिया है तो अच्छे वक्त मे भी साथ देना ही चाहिऐ । और ख़ुशी का हकदार तो हर कोई होता है। संजय दत्त की शादी हो रही है तो एक चैनल ने तो बनारस के एक पंडित जी से ही पूछना शुरू कर दिया की उसकी ये शादी सफल होगी या नही और पंडित जी बेचारे बार-बार यही कहते रहे की आज चूँकि बसंत पंचमी है तो आज का दिन शादी के लिए बहुत शुभ है।अब शादी चलती है या नही

क्या स्त्री-पुरुष एक-दुसरे के पूरक नही हो सकते है ?

स्त्री और पुरुष के बिना किसी भी समाज की कल्पना नही की जा सकती है । क्यूंकि ना तो केवल स्त्रियों और ना ही केवल पुरुषों से ही समाज या संसार चलता है । किसी भी इमारत की नींव हमेशा मजबूत होनी चाहिऐ क्यूंकि अगर नींव कमजोर होगी तो इमारत ढह जायेगी । और जिस समाज या संसार मे हम रहते है उसकी नींव स्त्री - पुरुष दोनो होते है । जिस तरह एक इमारत को खड़ा करने के लिए नींव और खम्भों की जरुरत होती है उसी तरह समाज और घर - परिवार रूपी इमारत को खड़ा करने मे स्त्री और पुरुष दोनो की बराबर की हिस्सेदारी होती है । जरा भी संतुलन बिगड़ता है तो इमारत के ढहने का खतरा हो जाता है । स्त्री को जहाँ जननी और अन्नपूर्णा कहा गया है वहीं पुरुष को पालनहार माना गया है । जननी इस शब्द से ही ज्ञात होता है कि एक नए जीवन को इस संसार मे लाना यानी जन्म देना । और जननी के साथ ही जन्मदाता को हम भूल नही सकते है क्यूंकि किसी भी नए जीवन को संसार मे लाने मे जननी और

मौनी अमावस्या (माघ का मुख्य स्नान)

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मौनी अमावस्या आज है ये तो हमे सुबह टी.वी. से पता चला। पता नही इस बार फरवरी मे कैसे पड़ रही है आमतौर पर तो जनवरी के आख़िर मे ही ये अमावस्या पड़ती थी।खैर चलिए आज थोडा मौनी अमावस्या के बारे मे बता दे। मौनी अमावास्या इसे इसलिए कहते है क्यूंकि ये अमावस्या माघ के महीने मे पड़ती है। और सूर्य और चन्द्रमा एक दूसरे की सीध मे आ जाते है या मिलते है।और ग्रहण भी लगता है।( टी.वी. मे बता रहे थे कि इस बार पंद्रह दिन मे दो ग्रहण लगेंगे।) मौनी अमावस्या जैसा की नाम से विदित हो रहा है की इस दिन मौन व्रत और उपवास भी रक्खा जाता है ।और त्रिवेणी यानी गंगा,यमुना सस्वती के संगम पर लोग नहाते है।और ये भी माना जाता है की इस दिन नहाने से सब पाप धुल जाते है। और आमतौर पर इसी दिन कुम्भ या महा कुम्भ पड़ता है और कुम्भ का नहान भी होता है।इन दिनों पूरा इलाहाबाद शहर श्रद्धालुओं से भरा रहता है। इस अमावस्या के साथ एक और कहानी भी है की जब देवताओं और असुरों के बीच जब अमृत मंथन हो रहा था उस समय कुछ अमृत इन चार स्थानों इलाहाबाद,हरिद्वार,नासिक,और उज्जैन मे गिर गया था। इन सभी स्थानों पर इस तरह के नहान होते है पर सबसे ज्यादा

Atonement (एक झलक )

अतोनेमेंट इस साल के ऑस्कर के लिए nominated हुई है । इस फिल्म को ऑस्कर अवार्ड के लिए सात श्रेणियों मे nominate किया गया है । कल हमने ये फिल्म देखी तो सोचा की आज इसके बारे मे ही लिखा जाये । यूं तो इस फिल्म की कहानी द्वितीय विश्व युद्ध के समय को दर्शाती है और साथ ही ये कहानी एक परिवार पर आधारित है और मुख्य रुप से cecilia,briony,roobie पर ही आधारित है। कि किस तरह एक छोटी सी गलती से सबकी जिंदगी बदल जाती है। cecilia और robbie एक -दुसरे से प्यार करते है पर एक ऐसी गलती जो की robbie ने की ही नही थी और जिसके लिए robbie को जेल जाना पड़ता है।यही सबकी जिंदगी बदल देता है। विश्व युद्ध के समय जेल मे गए लोगों को ये option होता था कि या तो वो जेल मे रहे या आर्मी मे भर्ती हो जाएँ ।और robbie आर्मी मे भर्ती हो जाता है।बाद मे briony ,robbie और cecilia का क्या होता है. ये ही तो सस्पेंस है. बाक़ी की कहानी हम नही बता रहे है। इस फिल्म मे कई flash backs है।फिल्म का संगीत तो ठीक था पर कुछ सीन मे फोटोग्राफी बहुत अच्छी है।पर एक्टिंग सबकी ठीक ही लगी।briony के किरदार को बचपन

कैरी (आम नही खास)

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आज की हमारी ये पोस्ट हमारे कैरी के नाम है। अभी कुछ दिन पहले ज्ञान जी ने और उसके बाद मुन्ने की माँ ने और अभी कुछ दिन पहले अनुराधा जी ने अपनी सैमी का जिक्र किया तो हमने सोचा की क्यों ना आज हम आप लोगों को कैरी से मिलवा दें। कहीं आप कैरी से आम तो नही समझ रहे है । नही जी ये आम नही कुछ खास ही है। कैरी को घर मे लाने के पीछे भी एक कहानी है। हमारे पतिदेव और दोनों बेटों को हमेशा से doggi पालने का शौक था पर हम इससे भागते थे । हमारे मायके मे हमेशा ही doggi पाले गए है।पर मायके मे हमारे भईया और एक बहन को छोड़कर हम तीन बहनों को ऐसा कोई शौक नही था। जब हम लोग दिल्ली मे थे तो फ्लैट्स मे रहने थे इसलिए वहां कभी doggi पालने का ख़्याल भी मन मे नही आया। सिर्फ doggi को छोड़कर कभी ना कभी हमने हर तरह के pet पाले थे जैसे बिल्ली , खरगोश , चिडिया , मछली , तोता पर doggi पालने से हम हमेशा ही दूर रहे । हम जितना कुत्ते से दूर रहने वाले हमारे बेटे उतने ही कुत्ते के दीवाने। हमारे बेटे doggi के इतने दीवाने कि दिल्ली मे हम लोगों की कॉलोनी मे जो भी कुत्ते के बच्चे होते थे उन्हें ये लो

ठाकरे का राज या ....?

आज कल राज ठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना कुछ अधिक जोश मे नजर आ रही है। पिछले कुछ दिनों से रोज ही किसी ना किसी वजह से समाचारों मे रहती है कहीं तोड़-फोड़,तो कहीं धरना, क्यूंकि अगर ऐसा नही करे तो कहीं लोग उनकी पार्टी को भूल ही ना जाये। राज ठाकरे जब तक बाल ठाकरे के साथ थे तब तक तो काफी ठीक थे पर अब तो उनका और उनकी पार्टी का नाम किसी ना किसी विवाद मे ही आता है। ऐसा लगता है महाराष्ट्र को अगर इन्होने नही बचाया तो महाराष्ट्र तो ख़त्म ही हो जाएगा। जब अमर सिंह ने मुम्बई मे यू.पी.दिवस मनाने की घोषणा की तो ठाकरे ने कहा की वो अमर सिंह को मुम्बई मे घुसने नही देंगे और राज ठाकरे का कहना है की मुम्बई मे उत्तर भारत के लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जिससे महाराष्ट्र को खतरा है।और राज ठाकरे का गुस्सा इस बात पर भी है की अमिताभ बच्चन जो की यू.पी. के है वो यू.पी. के विकास के लिए तो काम कर रहे है पर महाराष्ट्र के लिए नही। लो भाई एक महा विद्यालय की घोषणा से ही पूरे उत्तर प्रदेश का विकास हो जाये तो क्या बात है । ठाकरे शायद मुम्बई से उन सभी लोगों यानी माइग्रेंट को मुम्बई से बाह