राम का नाम बदनाम ना करो
ये पंक्तियाँ देव आनंद की फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा के गाने की है जो उस समय उस फिल्म मे तो हिप्पियों के संदर्भ मे गाया गया था पर आज राम सेतु विवाद को पढ़-सुनकर भी यही कहने को मन कहता है। राम का अस्तित्त्व था या नही ये बहस अभी और ना जाने कितने दिन चलेगी। पर क्या ऐसा कह देने भर से राम का अस्तित्व ख़त्म हो जाएगा। और बहस चले भी क्यों ना आख़िर राजनीति मे तो हर कुछ जायज है।क्यूंकि सरकार और विरोधी पक्ष का यही तो काम है लोगों की भावनाओं से खेलना। जब देखो तब एक शगूफा छोड़ देती है। अगर सरकार चाहेगी तो राम सेतु की जगह सेतुसमुन्द्रम शुरू होकर ही रहेगा चाहे कोई कुछ भी कहता रहे। आजकल तो हर कोई राम के अस्तित्व को नकार सा रहा है। कल करूणानिधि और शरद यादव भी ऐसी ही कुछ बातें कर रहे थे।पर आख़िर राम के अस्तित्व पर इतना ज्यादा विवाद होना कहां तक तर्क संगत है। क्या लोगों की भावनाओं की कोई कीमत नही है। राम थे या नही ये कौन निर्धारित करेगा ? ये नेता जिनमे से आधे से ज्यादा लोगों के नाम मे कहीँ ना कहीँ राम शब्द आता है।और नवरात्रि हो या दशहरा हो ये नेता राम की पूजा करते हुए ही दिखते है। क्यों? जब राम ही नही तो...