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क्या आपने कभी चलती ट्रेन या कार से गंगा जी मे सिक्का डाला है .... :)

अरे क्या आपने कभी भी ऐसा नही किया है ? आश्चर्य ! पर हमने तो बचपन मे ऐसा खूब किया है । हम लोग जब भी इलाहाबाद से बनारस ,लखनऊ ,कानपुर वगैरा जाते तो गंगा जी मे खासकर सिक्के जरुर फेंकते थे । क्यों फेंकते थे इसका कुछ ख़ास कारण था या नही पर गंगा जी मे सिक्के डालने का मतलब कुछ-कुछ दान करने से ही रहा होगा । कार से ज्यादा ट्रेन से सिक्का फेंकने मे मजा आता था ।चलती कार से सिक्का फेंकने पर कई बार सिक्का सड़क पर ही गिर जाता था इसलिए कभी-कभी जब गंगा जी के पुल से जा रहे होते तो पापा कार को धीमी करवा देते थे जिससे गंगा जी मे सिक्का डाला जा सके । पर इसमे उतना मजा नही आता था । पर फ़िर भी सिक्का डाले बिना नही रहते थे । :) चलती ट्रेन से सिक्के फेंकने मे बड़ा मजा आता था । उसमे हम लोग आपस मे competition भी करते थे कि किसका सिक्का बिना टकराए एक बार मे ही गंगा जी मे चला गया ।जैसे इलाहाबाद के नजदीक पहुँचने पर जब फाफामऊ आने वाला होता था तो हम मम्मी से जल्दी-जल्दी सिक्के लेकर खिड़की पर बैठ जाते (अब उस जमाने मे a.c. मे नही चलते थे :) )और जैसे ही ट्रेन पुल पर से ...

चंदौली का घर

अब तो खैर जमाना हो गया है अपने गाँव के घर मे गए हुए पर जब हमारे बाबा थे तो हम लोग जब छुट्टियों मे बनारस जाते तो चंदौली भी जरुर जाते थे।बनारस और चंदौली का सफर मुश्किल से आधे घंटे का होता था और जैसे ही मुख्य सड़क से कार गाँव की गली मे मुडती थी कि एक पल मे ही सब कुछ बदल जाता था। अब ४० साल पहले तो बनारस शहर और चंदौली जैसी छोटी सी तहसील मे बड़ा फर्क होता था। वैसे सुना है की अब चंदौली बहुत ही बदल गया है। पर देखा नही है। वहां पर हम लोगों का चार मंजिला घर था । घर का मेन गेट खूब बड़ा सा होता था और जितना बड़ा गेट उतनी ही बड़ी उसकी सांकल (latch) होती थी।और तब तो घंटी का सिस्टम था नही इसी सांकल को जोर-जोर से खट खटाया जाता था। लकड़ी के गेट से जैसे ही अन्दर जाते तो कुआँ होता था उस ज़माने मे वहां नल नही था।कुएँ का पानी ही नहाने और खाना बनाने और पीने के लिए इस्तेमाल होता था।और फ़िर एक बड़ा सा बरामदा और उसके बाद शुरू होते थे कमरे। गर्मी मे कमरों को ठंडा रखने के लिए खस की पट्टी का इस्तेमाल होता था जिसे हर थोडी देर मे पानी से भिगोना पड़ता था। उस समय खूब बड़े-बड़े पंखे होते थे जो कमरे मे ऊपर की त...

रीटा आइस क्रीम

ये ice creem शब्द सुनकर ही बहुत कुछ याद आ जाता है । अब जैसे हमे rita ice cream की याद आ गई । भाई हमने तो अपने बचपन मे ये आइस क्रीम बहुत खाई है। इलाहाबाद मे ये अब मिलती है या नही पता नही पर जब हम छोटे थे तब जहाँ शाम के ५ बजे नही कि एक आदमी छोटी सी हाथ गाड़ी जिस पर चारों और rita ice cream लिखा होता था आता rita ice cream की आवाज आती और झट से हम घर के बाहर. हम क्या मोहल्ले के जितने बच्चे सभी घर के बाहर निकल पड़ते थे. और चूँकि हम लोगों के मोहल्ले मे हर घर मे खूब सारे बच्चे थे और गर्मी की छुट्टियों मे तो हर किसी के घर मे ननिहाल या ददिहाल के लोग आए हुए होते थे अरे मतलब ज्यादा बच्चे ,तो ice-cream वाले की भी खूब बिक्री होती थी। और हर किसी को सबसे पहले ice-cream चाहिए होती और हर कोई चिल्ला रहा होता कोई चिल्लाता orange तो कोई mango तो कोई chocolate bar। किसी को vanila का cup चाहिए होता था। और ice-cream वाला हम सभी को एक-एक करके अपनी ही धीमी स्पीड से ice-cream बांटता ।हमे तो orange ice-cream हमेशा से ही कुछ ज्यादा ही प्रिय रही है। हमारी और हमारी दीदी ...

रबर की सड़क

क्या आप रबर की सड़क के बारे मे जानते है। नही तो चलिए हम बता देते है। आजकल की बढ़िया सड़क के बारे मे तो हम लोग जान गए है बकौल लालू यादव हेमा मालिनी के गाल की तरह चिकनी , पर जब हम छोटे थे तब रबर की सड़क होती थी ।क्यों ये सुनकर आश्चर्य हुआ ना ।हमारे दादा खूब किस्से सुनाते थे। तब तो उनकी बातें सुनकर हम सब बच्चे आश्चर्य मे पड़ जाते थे ।ये रबर की सड़क का किस्सा उनमे से ही एक है। अब ६५-७० के दशक मे तो इलाहाबाद की सड़कें तो फ़िर भी ठीक होती थी पर बनारस की सड़क कुछ अजीब सी तरह की होती थी कुछ उबड़-खाबड़ सी और खुरदरी सी और दिखने मे सफ़ेद। और गोदौलिया के चौराहे के पास तो गड्ढे भी होते थे ।सड़क ऐसी की अगर रिक्शे पर जाए तो पूरे शरीर का अंजर-पंजर ढीला हो जाए। इलाहाबाद और बनारस का क्या तब हर हाई वे बस लाजवाब ही होता था। इतनी पतली सड़क की दो गाड़ी आराम से निकल जाए तो गनीमत और उस पर सड़क के दोनों और मिटटी । बारिश मे तो और भी बुरा हाल हो जाता था इन सड़कों का।और बारिश मे जब भी सफर पर जाते तो लगता था की कहीं गाड़ी मिटटी के दलदल मे ना फंस जाए। (इलाहाबाद,बनारस,लखनाऊ ,कानपुर तो ...

क्या कभी आपने सड़क पर पड़ा रुपया उठाया है ?

आजकल टी.वी. मे किसी pain relief cream शायद iodex का विज्ञापन आता है जिसमे एक आदमी सड़क पर पड़े ५०० के नोट को झुक कर उठा नही पाता है क्यूंकि उसकी कमर मे दर्द है। इसी विज्ञापन को देख कर हमे एक वाकया याद आया है।उस समय दिल्ली के जिस ऑफिस मे हम काम करते थे ये वाकया ऑफिस मे साथ मे काम करने वाली हमारी एक बहुत अच्छी दोस्त के साथ हुआ था।इस घटना को अब ७ साल तो हो ही चुके है।दिल्ली का एम.ब्लाक मार्केट मंगलवार को बंद रहता है बस खाने-पीने की दुकाने खुली रहती है।और इसलिए वहां मंगलवार को ज्यादा भीड़-भाड़ नही होती थी। एक ऐसे ही मंगलवार को हमारी दोस्त अपनी बेटी के साथ एम.ब्लाक मार्केट के pizza hut मे pizza खाने गई थी।जैसे ही वो कार से उतरकर pizza hut की ओर चली कि उनकी निगाह सड़क पर पड़े ५०० रूपये के नोट पर पड़ी और उन्होंने वो रुपया उठा लिया और अपनी बेटी से हँसते हुए कहा की चलो आज तो अपने पैसे बच गए। आज का pizza तो फ्री मे खाया जायेगा क्यूंकि ये ५०० रूपये का नोट जो मिल गया है। खैर दोनों माँ-बेटी ने pizza खाया और बिल उसी ५०० रूपये से दिया और खुश होकर बाहर अपनी कार की तरफ़ जैसे ही वो बढ़ी की उ...

पेट टोंनवा आएगा

अब बचपन की बातें घूम - फिर कर याद आ ही जाती है।उस समय हम छोटे थे पर खाने के बड़े चोर थे। शाम को खेल कर घर आते तो कई बार खाना खाकर और कई बार बिना खाना खाए ही सो जाते। और जाड़े मे तो ऐसा हम अक्सर करते थे.जहाँ रजाई मे घुसे कि बस पुट से सो गए। मम्मी उठाती तो उठने का नाम ही नही लेते बिल्कुल कुम्भकरण की तरह गहरी नींद मे सो जाते थे।हम तो मजे से सो जाते और मम्मी बेचारी हमे उठाने मे लगी रहती और परेशान भी होती रहती थी। तो एक दिन शाम को खेल कर आने के बाद हम जैसे ही आंगन मे पडी चारपाई पर सोने के लिए लेटे कि मम्मी आई और प्यार से हमारा सिर पर अपना हाथ फिराते हुए बोली कि कल तुम जब सो गई थी तो पापा ने बताया कि रात मे एक पेट टोंनवा आया था । पेट टोंनवा वो क्या होता है।हमने पूछा। तो मम्मी ने बताया कि ये पेट टोंनवा रात मे आता है और सबके पेट छूकर देखता है कि किसने खाना खाया है और किसने खाना नही खाया है। और जिसने खाना नही खाया होता है उसे वो अपने साथ ले जाता है । और कल तुमने खाना नही खाया था । इसलिए उसने जब तुम्हारा पेट छुआ तो ये उसे पता चल गया था । मम्मी के ऐसा कहने पर हमन...

बचपन की कुछ पुरानी कविताएं

आज बस यूं ही मौसम को देख कर हमे भी एक बचपन की कुछ कविताएं याद आ गई।थोडी बेसिर पैर की है पर बचपन मे इन्हे जोर-जोर से बोलने मे बड़ा मजा आता था। वैसे ये पहली लाला जी वाली कविता तो हिन्दी की किताब मे सचित्र पढी थी। लालाजी ने केला खाया केला खाकर मुंह बिचकाया। मुंह बिचकाकर तोंद फुलाई तोंद फुलाकर छड़ी उठाई। छड़ी उठाकर कदम बढ़ाया कदम के नीचे छिलका आया । लालाजी गिरे धड़ाम से बच्चों ने बजाई ताली। चलिए एक और ऐसी ही छोटी सी मस्ती भरी कविता पढिये। मोटू सेठ सड़क पर लेट गाड़ी आई फट गया पेट गाड़ी का नम्बर ट्वेन्टी एट (२८) गाडी पहुँची इंडिया गेट इंडिया गेट पर दो सिपाही मोटू मल की करी पिटाई। लगे हाथ इसे भी पढ़ लीजिये। मोटे लाला पिलपिले धम्म कुंयें मे गिर पडे लुटिया हाथ से छूट गई रस्सी खट से टूट गई।

टेसू के फूलों की होली

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होली इस शब्द का जितना मजा बचपन मे लिया वो तो भुलाए नही भूलता है।होली का इंतजार होली के अगले दिन से ही शुरू हो जाता था ।अरे जिसने रंग ज्यादा लगाया या जिसको रंग कम लगा पाते थे उससे अगली होली मे निपटना जो होता था। :) होली के आगमन का एहसास चिप्स की तैयारी से होता था। होली के हफ्तों पहले से मम्मी घर मे तरह-तरह की चिप्स बनाने लगती थी।अब उस ज़माने मे तो लोग घर की ही बनी स्वादिष्ट चिप्स खाते थे।होलिका दहन के दिन घर मे उपटन बनता और लगाया जाता और फ़िर होलिका मे डाला जाता इस विश्वास के साथ की सब बुराइयों का अंत हो। हमेशा होली के एक दिन पहले दोपहर मे २ बजे से गुझिया बनने का कार्यक्रम शुरू होता था जो रात तक चलता था। साथ मे मठरी ,खुरमा भी बनाया जाता था।घर मे मम्मी के साथ हम सभी भाई-बहन मिल कर गुझिया बनवात े थे और भइया कई बार गुझिया तलने का काम करते थे।(क्यूंकि पापा को नौकरों के हाथ की बनी गुझिया पसंद नही आती थी। )क्या जोश और उत्साह होता था। अगले दिन होली की सुबह मालपुआ बनता और उसके बाद खाना बनाने का काम शुरू होता जिसमे मम्मी कबाब और मीट बनाती और बाकी खाना नौकर बनाते जिसमे पूड़ी,कुम्ह्डे की सब...

बड़ा नही मैं तो छोटा हूँ

हम माँ-बाप अपने बच्चों को बहुत जल्दी बड़ा बना देते है। और ऐसा अक्सर तब होता है जब दूसरा बच्चा जन्म लेता है। तब जाने-अनजाने हम अपने पहले बच्चे को बड़ा बच्चा बना देते है।और इस बात का एहसास हमे हमारे बेटे ने कराया था कि वो बड़ा नही छोटा है। और इसीलिए छोटा बच्चा आने के पहले से ही हमने भी अपने बड़े बच्चे को उसके बड़े होने का एहसास तरह-तरह से कराने की कोशिश की . और जैसा कि दूसरे लोग करते थे हमने भी वही किया क्यूंकि हम समझते थे कि ऐसा करने से दोनों बच्चों मे प्यार रहेगा और बड़ा बच्चा छोटे बच्चे को अपना प्रतिद्वंदी नही मानेगा । जब तब बेटे को कहते कि तुम बड़े हो रहे हो और अब तुम्हे भइया कहने वाला आ रहा है। वगैरा-वगैरा और उस समय हमे लगता कि हम ऐसा करके बहुत अच्छा कर रहे है। पर वो हमारा भ्रम था जिसे हमारे बेटे ने तोडा था। बात उस समय की है जब हमारा बड़ा बेटा तीन साल का था और हमारा छोटा बेटा पैदा हुआ था । हॉस्पिटल और घर मे हर जगह हम लोग उससे यही कहते की अब तुम बड़े हो गए हो देखो ये तुम्हारा छोटा भाई है। तुम्हे इसका ख़्याल रखना होगा। और इसी तरह की ढेर सारी बातें। और हमा...

जब चोट लगती है तभी साइकिल चलानी आती है.

बात उन दिनों की है जब हम सातवीं क्लास मे पढ़ते थे ।उन दिनों इलाहबाद मे तो यूं भी साइकिल से स्कूल जाने का बड़ा रिवाज था ।(वैसे तो आज भी बच्चे साइकिल से स्कूल से जाते है ) लड़का हो या लड़की ज्यादातर बच्चे साइकिल से ही स्कूल जाते थे। हमारे घर मे भी दीदी लोग साइकिल से स्कूल जाती थी पर चूँकि हम सबसे छोटे थे इसलिए हमने साइकिल चलाना जरा देर मे सीखा। अब सीखने के लिए साइकिल तो हमे शाम को ही मिलती थे दीदी लोगों के स्कूल से आने के बाद।शुरू मे कुछ दिन तो भइया और हमारी दीदी ने हमे साइकिल चलाना सिखाया की कैसे पैडल पर पैर रखकर कैंची चलते है और किस तरह सीट पर बैठते है और साइकिल का हैंडल हमेशा सीधा रखना चाहिए और सबसे ख़ास हिदायत कि कभी भी दोनों ब्रेक एक् साथ मत लगाना । शुरू मे दो-तीन दिन जब हम साइकिल चलाते तो भइया या दीदी पीछे से कैरियर पकड़े रहते और हम पीछे देखते रहते की उन लोगों ने साइकिल पकड़ रखी है।और हमे चलाते हुए ये विश्वास रहता की अगर हमारी साइकिल गिरेगी तो भैया या दीदी हमे गिरने से बचा लेंगे।दीदी हमेशा कहती कि सामने देखा करो पीछे नही। खैर पाँच-छः दिन बाद हम जब साइकिल चल...

बन्दर का नाच

आज रविवार है ना तो सोचा क्यों ना बचपन की कुछ याद ही ताजा कर ली जाए। जी हाँ आज हम आप सबको अपने सबके बचपन के उन दिनों मे ले जाने की कोशिश कर रहे है जब मनोरंजन के लिए यही सब कुछ होता था। अक्सर रविवार के दिन साँप,भालू,बन्दर वाले आते थे । जहाँ भालू और बन्दर वाले भालू और बन्दर का नाच दिखाते थे वहीं साँप वाले साँप और नेवले की लड़ाई दिखाते थे और पता नही कितने तरह के साँप दिखाते थे। इसे देख कर लगा कि आज भी इतने सालों बाद कुछ भी नही बदला है। बदला तो बस इतना कि बन्दर वाला अब ५-१० रूपये की जगह सौ रूपये मांगता है। हमने १०० तो नही ५० रूपये दिए थे।और साथ मे केले और बिस्कुट दिए थे। नोट -- और हाँ कुछ खा - पीकर देखियेगा क्यूंकि सुना है सुबह - सुबह बन्दर ( हनुमान जी का नही ) का नाम लेने से दिन भर कुछ खाने को नही मिलता है । :) यूं तो ये विडियो हमने पिछले साल आगरा से फतेहपुर सीकरी जाते हुए हाईवे पर बनाया था।आप विडियो देखिये । नोट -- हम भी इस बात को ठीक नही समझते है । पर सिर्फ़ ये दिखाने के लिए ये विडियो लगाया है कि पचास साल बाद भी हम वहीं के वहीं ...

अनचाहे मेहमान और हम

दिल्ली मे रहते हुए मेहमानों से दूर रहना मुश्किल ही होता है। गाहे-बगाहे लोग आ ही जाते और फ़िर अपनी खातिरदारी भी करवाते है आप चाहे या ना चाहे।अब अपने भारत मे तो मेहमान को भगवान का रूप ही माना जाता है मेजबान माने या ना माने ।कई बार तो ऐसे मेहमान आते कि लगता ओह बाबा ये कब जायेंगे।दिल्ली मे रहते हुए ऐसे लोगों मतलब मेहमानों से बहुत वास्ता पड़ता था। ये तो हम सभी जानते है कि दिल्ली मे जितनी गर्मी पड़ती है उतनी ही ठंड भी पड़ती है।दिल्ली मे सर्दियों मे नल का पानी इतना बर्फीला ठंडा होता है कि पानी छूने पर लगता कि हाथ ही गल जायेगा।अब अगर ऐसी गलन भरी सर्दी मे जहाँ रजाई से बाहर निकलना मुश्किल हो वहां अगर अनचाहे मेहमान आ जाए तो ना चाहते हुए भी खुले दिल से मेजबानी करनी ही पड़ती थी।आज का वाकया ऐसे ही मेहमान के नाम है। ऐसी ही एक जाड़े की गलन भरी सर्दी की शाम को फलाने जी फ़ोन आया और उन्होंने हाल-चाल पूछा की भाई आजकल तुम लोग रहते कहाँ हो।और दुनिया भर की बातचीत के बाद उन्होंने पूछा कि आज शाम को क्या घर पर हो । और जब पतिदेव ने कहा की हाँ घर पर ही है . तो इस पर उधर से फलाने जी ने कहा की अच्छा तो हम लो...

कोर्ट कचहरी से दूरी भली ...

कुछ दिन पहले दिनेश जी ने अदालतों की संख्या बढाए जाने की बात की थी जिससे लोगों को जल्दी न्याय मिल सके।तो इस पर हमें अपने साथ हुई एक घटना की याद आ गई।बात अस्सी के दशक की है। उन दिनों हम लोग दिल्ली मे रहते थे। । उन दिनों हम लोगों की कालोनी मे कार गैराज नही थे इस लिए सभी लोग अपनी कार घर के बाहर खड़ी करते थे।तब इतना ज्यादा गार्ड वगैरा रखने का भी चलन नही था। हर सुबह कार साफ करने के लिए आदमी आता था और कार साफ करने के बाद चाभी देकर चला जाता था। ऐसी ही एक सुबह जब कार साफ करने वाले ने घर की घंटी बजाई तो हमने उसे कार की चाभी दी और वो कार साफ करने के लिए चला गया पर चंद सेकंड के बाद लौटकर आया और बोला की गाड़ी तो है ही नही। उसके ऐसा कहने पर हमने चौंककर कहा की गाड़ी नही है तो कहाँ गई। इस पर उसने फ़िर वही कहा की जी गाड़ी तो बाहर खड़ी ही नही है। इतना सुनकर तो हम लोगों के होश ही उड़ गए की चाभी घर मे और गाड़ी गायब। खैर इधर-उधर लोगों से पूछा पर कुछ पता नही चला तो पुलिस स्टेशन मे कार चोरी होने की रिपोर्ट लिखवाई गई। और उसके बाद पुलिस ने कार को ढूंढ़ना शुरू किया।और तकरीबन एक महीने बाद हम लोगों को पु...

करैला खाओ और .....?

सत्तर के दशक मे गर्मी के के समय मे सिर्फ लौकी,परवल, टिंडा , करैला,नेनुआ,(तोरी)जैसी हरी सब्जियां ही मिला करती थी । आज के समय की तरह नही कि बारह मास गोभी,गाजर जैसी सब्जियां मिलती रही हों । और ये बात वैसी ही गर्मी के दिनों की है । हमारे घर मे सभी को करैला पसंद था सिवा हमारे और भईया के।और घर मे हर दूसरे - तीसरे रोज बाक़ी दाल,सब्जी के साथ करैला भी बनता था। और जहाँ करैला देखा कि मुँह बन जाता था हमारा और भईया का। ऐसी ही एक गर्मी के दिनों का ये किस्सा है। उन दिनों आई.ए.एस के इम्तिहान का बहुत चलन था (वो तो आज भी है)पर क्यूंकि तब ज्यादातर लोग सिविल सर्विस मे जाना पसंद करते थे या इंजीनियर या डाक्टर बनते थे। खैर तो चलन के मुताबिक ही भईया और उनके एक दोस्त मिलकर आई.ए.एस.के इम्तिहान की तैयारी कर रहे थे। और भईया का दोस्त हम लोगों के घर मे ही रहता था। तो जाहिर सी बात है कि जब दोनो लोग साथ-साथ पढ़ते थे तो खाना भी घर मे ही खाते थे।भईया के उस दोस्त को करैला पसंद था या नही ये कोई भी नही जानता था क्यूंकि जब भी मम्मी पूछती कि तुम करैला खाते हो या नही ,तो वो फौरन जवाब देते थे कि आंटी ...

बकरियों कच्चे-पक्के सब खा जाओ

बात उन दिनों की है जब हम लोग इलाहाबाद के म्योराबाद मोहल्ले मे रहते थे यही कोई चालीस -बयालीस साल पहले । तब का म्योराबाद आज के म्योराबाद जैसा नही था । उन दिनों वहां इतनी ज्यादा घनी आबादी नही थी। ज्यादातर ईसाइयों के घर थे और कुछ घर दूसरे लोगों के थे। अब चूँकि उन दिनों आबादी कम थी इसलिए पेड़-पौधे ज्यादा हुआ करते थे।और म्योराबाद मोहल्ला बहुत ही छोटा हुआ करता था बस जहाँ मुम्फोर्ड गंज ख़त्म वहां से सड़क पार करते ही म्योराबाद शुरू हो जाता था।हर घर के आगे बड़ा सा दालान होता था। सारे घर लाइन से बने थे और आगे की लाइन के पीछे एक औए लाइन मे घर बने होते थे। जिनमे खेलने मे बड़ा मजा आता था। हम लोगों के घर से कोई दस कदम की दूरी पर एक परिवार रहता था जिसमे दक्कू , टेरी ,टेरी कि पत्नी बीना आंटी उनके माता - पिता और और दक्कू की दादी रहती थी । दादी यूं तो बहुत अच्छी थी पर हम बच्चों से जरा गुस्सा रहती थी क्यूंकि हम सब उन्हें बहुत तंग जो करते थे । कभी आईस - पाईस खेलते तो उनके घर के बरामदे मे छिप जाते तो कभी उनके दालान से कूद कर भागते थे । अगर...

रक्षा -बन्धन -भाई-बहन का प्यार

आज रक्षा -बन्धन या राखी है ।आज के दिन का सभी भाई और बहनों को इंतज़ार रहता है क्यूंकि ये दिन खास जो है।राखी का त्यौहार मतलब भाई-बहन का प्यार। समय वो चाहे कोई भी जमाना रहा हो राखी का महत्त्व कभी भी कम नही हुआ और ना ही होगा।पहले तो जो बहने दूर होती थी उन्हें भाई को राखी भेजने का एक ही जरिया था और वो था पोस्ट के जरिये राखी भेजना।जिसमे कई बार देर से राखी पहुंचती थी पर अब समय के साथ इन चीजों मे सुधार और बदलाव आ गया है। पिछले कुछ सालों से कोरियर और अब इन्टरनेट के जरिये राखी भेजना आसान हो गया है और सबसे बड़ी बात अब राखी समय पर पहुंच जाती है। आजकल की भागती-दौड़ती जिंदगी मे जहाँ लोगों के पास समय की कमी हो रही है पर इस राखी के दिन ऐसा बिल्कुल भी नही लगता है। हर छोटे-बडे शहर मे सुबह से शाम तक लोग रंग-बिरंगे कपड़ों मे सजे-धजे सड़कों पर नजर आते है। कहीँ कोई बहन भाई के यहां जा रही होती है तो कहीँ भाई अपनी बहन के घर जा रहे होते है राखी बंधवाने के लिए। दिल्ली मे तो कई बार ट्रैफिक जाम भी हो जाता है क्यूंकि हर किसी को पहुँचने की जल्दी होती है पर कोई भी रुकना नही चाहता है। आप ये तो नही सोच रहे की भला...

ससुराल

ये ससुराल शब्द बहुत सारे संबंध अपने अन्दर समाये हुए है ठीक उसी तरह जैसे मायका शब्द अपने अन्दर संबंधों को सहेज कर रखता है।मायके मे माँ,पिता,भाई, भाभी और बहन होते है तो ससुराल मे सास,ससुर,ननद,देवर,जेठ,जेठानी होते है। और शायद इन्हीं सबसे एक भरा-पूरा घर बनता है।वो चाहे मायका हो या चाहे ससुराल हो। ससुराल नाम से ही लोगों को एक अजीब सी भावना महसूस होती है और इस भावना को और कुछ नही इसे बस मन मे चल रहे मिले-जुले भाव या शायद डर ही कहना चाहिऐ। हर लडकी जिसकी शादी होती है वो इन भावनाओं से जरुर गुजरती है कि पता नही उसके ससुराल वाले कैसे होंगे। वो वहां एडजस्ट कर पाएगी या नही। सास और ननद से उसकी निभेगी या नही और ऐसे ही तमाम सवाल मन मे उठते रहते है। और ऐसे मे शादी के समय जो रिश्तेदार आते है वो कई बार लडकी को बहुत सारी हिदायतें देते है कि बिटिया ठीक से रहना । बडों का आदर करना । कभी पलट कर जवाब मत देना वगैरा - वगैरा । पर कई बार तो कुछ लोग ससुराल के नाम पर बहुत डराते भी है कि देखों फलानी की लडकी के साथ ऐसा हो गया तो ढमाकी की लडकी के...

कसाई है हम कसाई

इस शीर्षक से ये बिल्कुल भी मत समझिए कि हम कोई बकरा या मुर्गा काटने जा रहे है। ये तो हमारे गिटार सिखाने वाले मास्साब के शब्द है जो अब इस दुनिया मे नही है।दुलाल मजुमदार नाम था उनका ।मास्साब बंगाली थे। पर उनके इन्ही शब्दों ने हमे गिटार सीखने की प्रेरणा दी थी। यूं तो वो ज्यादा ग़ुस्सा नही करते थे पर अगर उनके कई बार समझाने पर भी कोई गलत बजाता था तो उन्हें बहुत ग़ुस्सा आ जाता था और तब वो जो डांटना शुरू करते थे तो वो बिल्कुल भी कुछ नही सोचते थे की सामने बैठा हुआ शिष्य रो रहा है या दुःखी हो रहा है।कई बार तो उनके डांटने पर आंटी (मास्साब की पत्नी)भी वहां आ जाती थी और कहती थी कि इतना मत डांटा करो। बच्चे है सीख जायेंगे। और इसी तरह जब कोई अच्छा बजाता था तो वो बड़ी जोर से बाह (वाह)कहते थे और पूरी क्लास मे क्या हर ग्रुप मे उसकी तारीफ भी ख़ूब करते थे। वैसे वो छोटे -छोटे ग्रुप मे क्लास लेते थे पर तब भी उनकी तारीफ और डांट की खबर हर क्लास मे पहुंच जाती थी। ये बात तब की है जब हम नवीं क्लास मे पढते थे और हमने गिटार सीखने का मन बना लिया था।इन्ही मास्साब से हमारे भईया ने गिटार सीखा था...

एक पोस्ट दोस्तो के नाम

आज ही सुबह जब हम अनुगूंज के लिए अपनी पोस्ट लीजिये हम भी हाजिर है लिख रहे थे तभी फ़ोन की घंटी की घन घना कर बजी।फ़ोन उठाया तो हमारी दोस्त मिसेज दास ने बड़ी ही गर्मजोशी से हैप्पी फ्रेंडशिप डे की शुभकामनायें दी ।अभी फ़ोन रख कर फिर लिखना शुरू ही कर रहे थे कि शीला जी का फ़ोन आ गया और उनसे भी ख़ूब बातें हुई (और इसी चक्कर मे पोस्ट आधे शीर्षक के साथ ही पोस्ट हो गयी।) तो बहुत सारी पुरानी बातें याद आ गयी । वे बातें जब हम दिल्ली मे काम करते थे । और जिस ऑफिस मे हम काम करते थे वहीं मिसेज दास और शीला जी हमसे कई साल पहले से काम कर रही थी। और उन दोनो मे दोस्ती भी बहुत अच्छी थी। यहां हम एक बात और बता दे हमारी मिसेज दास और शीला जी दोनो यूं तो हमसे उम्र मे बड़ी है पर हम तीनो के बीच उम्र कभी भी आड़े नही आयी। वो कहते है ना की दोस्ती मे उम्र नही दिल देखे जाते है । शुरू मे थोडा समय लगा हम तीनो को एक-दूसरे को समझने मे पर जब दोस्ती हो गयी तब तो हम तीनो अपने ऑफिस मे गंगा (मिसेज दास)यमुना(शीला जी)और सरस्वती (हम)के नाम से मशहूर हो गए थे।चलिये आपको इन नामों का राज भी बता देते है वो क्य...

बिना टिकट यात्रा

आज सुबह - सुबह ज्ञानदत्त जी की पोस्ट पढ़कर हमे अपनी जिंदगी की पहली और आख़िरी बिना टिकट यात्रा याद आ गयी। पहली और आख़िरी इस लिए लिख रहे है क्यूंकि हम लोगों ने कभी भी बिना टिकट यात्रा नही की थी । ना तो उससे पहले और ना ही कभी उसके बाद । यूं तो रेलगाडी के सफ़र के साथ ढेरों यादें है। पर बिना टिकट यात्रा का अपना ही मजा है अगर पकड़े ना जाएँ तो।वरना ...... ये बात तो काफी पुरानी है।गरमी की छुट्टियाँ हुई थी और हम सब भाई- बहन बच्चों सहित इलाहाबाद मे इकट्ठा थे बस हमारी मिर्जापुर वाली दीदी इलाहाबाद नही पहुंची थी क्यूंकि वो कुछ बीमार थी । तो हम सब ने की चलो अगर वो बीमार है और इलाहाबाद नही आ पा रही है तो क्या हम लोग ही मिर्जापुर हो आते है।अब इलाहाबाद से मिर्जापुर है ही कितनी दूर। बस इतना सोचना था कि फ़टाफ़ट मम्मी-पापा को हम लोगों ने अपना मिर्जापुर जाने का प्रोग्राम बताया और इससे पहले कोई कुछ कहे हम बहने और भाभी ं मय बच्चों के चल दिए मिर्जापुर। हम सब छोटे-बडे मिलाकर दस लोग थे. बस भईया अपने किसी काम की वजह से नही जा पाए थे। शायद एक -डेढ़ घंटे मे हम लोग मिर्जापुर पहुंच गए...