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पुरानी कविता का मज़ा

अभी दो-तीन दिन पहले हमारी एक दोस्त ने कुछ पुरानी कवितायें जिन्हें हम लोगों ने स्कूल में पढ़ा था उन्हें वहाटसऐप पर शेयर किया था जिसे पढ़कर हम वापस स्कूल के समय में चले गये । हो सकता है कुछ लोगों ने ये कवितायें पढ़ी होगी और कुछ ने नहीं भी पढ़ी होगी। क्योंकि समय समय पर कविता के रूप भी बदलते रहे है। हमें पक्का यक़ीन है कि आप सबको सुमित्रानंदन पंत, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा ,मैथिलीशरण गुप्त, मलिक मोहम्मद जायसी ,सूर्य कान्त निराला रामधारी सिंह दिनकर जैसे अनेक कवि ज़रूर याद होगे । समय के साथ स्कूल का सिलेबस , पाठ्यक्रम सब बदल जाता है। अब जो हिन्दी की कवितायें हमने पढ़ी थी जैसे --उठो लाल अब आँखें खोलो जिसमें माँ का प्यार और दुलार झलकता है तो वही चाँद का अपनी माँ से ज़िद करना कि सिलवा दो माँ मुझे ऊन का एक झिंगोला । चाहे जितनी बार भी पढ़े हर बार एक अजीब सा रोमांच और ख़ुशी होती है इन कविताओं को पढ़कर । अब जो कवितायें हमने पढ़ी थी वो हमारे बेटों ने नहीं पढ़ी । यहाँ तक की जो बड़े बेटे ने पढ़ी थी ,छोटे के समय उनमें कुछ बदलाव आ गया था । दोनों बेटों के समय में ये कवितायें नहीं थी। उनके समय ...

रविवार कहो या इतवार कहो या कहो संडे

मतलब तो एक ही है छुट्टी ,आराम और फनडे । :) पहले तो हफ़्ते में छ दिन का स्कूल और ऑफ़िस हुआ करता था। और रविवार का इन्तज़ार बड़ी बेसब्री से होता था क्योंकि रविवार को आराम से सोकर उठो और मंद मंद गति से सब काम करो। ना स्कूल जाने की जल्दी और ना ही सुबह सुबह उठने की जल्दी । हांलाकि मममी कभी कभी टोका करती थी पर उनकी बात उस एक छुट्टी के दिन अनसुनी कर देते थे ये कहकर कि सिर्फ़ एक दिन ही तो मिलता है । 🙂 हमने तो ख़ूब रविवार का मज़ा लिया है पर जब हमारे बेटे स्कूल जाने लगे थे तो संडे फनडे कम स्टडी डे हो गया था क्योंकि बेटों के हर सोमवार किसी ना किसी विषय का टेस्ट होता था । और चूँकि हर टेस्ट के नम्बर जोड़े जाते थे तो ज़ाहिर है कि संडे का वो मज़ा नहीं रह गया था । ख़ैर जब राजीव गांधी सत्ता में आये थे तो उन्होंने दिलली में हफ़्ते के पाँच दिन काम का चलन शुरू किया था जिससे शनिवार और रविवार सकूल और ऑफ़िस बंद होने लगे थे । इस तरह दो दिन की छुट्टी मिलने से एक बार फिर से छुट्टी का मज़ा आने लगा था क्योंकि शनिवार का दिन देर से सोकर उठने और आराम फ़रमाने में जाता था। अब तो सब बड़े हो गये है और अब टेस्ट क...

गूगल बाबा की जय

अब गूगल बाबा को कौन नहीं जानता है। जब से आये है तब से छा गये है । कुछ भी जानना हो या कुछ भी ढूँढना हो बस गूगल पर सवाल लिखो या पूछो और पलो या यूँ कहे सेकेण्डस में जवाब मिल जाता है। पहले ज्ञानवर्धक जानकारी के लिये लोग ब्रिटानिका इनसाकलोपीडिया मँगाते और पढ़ते थे पूरी २४ बड़ी बड़ी किताबें (वॉलयूम ) होती थी और हर एक किताब में उस विषय से सम्बन्धित बातें बाक़ायदा फ़ोटो के साथ पूरे विस्तार से लिखी होती थी ।और जिसे पढ़ने और देखने में बहुत मज़ा आता था ।पर अब विकीपीडिया है जहाँ से हर तरह की जानकारी हमें मिल जाती है। और इसमें जानकारी को लोग अपडेट भी करते रहते है। दिल्ली में तो आइशर मैप नाम की एक किताब होती थी जिसमे दिल्ली की हर सड़क ,स्कूल ,कॉलोनी ,अस्पताल और कॉलेज का नक़्शा होता था और अगर कोई नई जगह जा रहे होते थे तो उस किताब को साथ लेकर जाते थे और उसमें दिखाये गये नक़्शे के हिसाब से जाते थे । पर अब फोन के गूगल मैप में जगह का नाम डालने पर गूगल ना केवल वहां का रास्ता बल्कि वहां पहुँचने में कितना समय लगेगा या कैसा ट्रैफ़िक है और कितने कि.मी. की दूरी है ये भी बता देता है। 🙂 अब गूगल के आने क...

फ़िल्मी गीतो की किताब

हिन्दी फ़िल्मे देखना अगर यूँ कहे कि बचपन से ही हमें इसका शौक़ रहा है तो ग़लत नहीं होगा क्योंकि कभी भी मममी पापा ने फ़िल्म देखने पर कोई रोक टोक नहीं की। और अकसर हम लोग मममी पापा के साथ ही फ़िल्म देखने जाते थे। वैसे हमारे बाबा भी फ़िल्मों के बहुत शौक़ीन थे और सपनों का सौदागर फ़िल्म देखने के बाद तो वो हेमा मालिनी के बहुत बड़े फ़ैन बन गये थे और हेमा मालिनी की कोई भी पिकचर देखे बिना नहीं रहते थे । 🙂 वैसे उस समय पिकचर देखना मनोरंजन का एकमात्र साधन होता था और शायद इसीलिये लोग सपरिवार फ़िल्म देखने जाते थे। शादी के पहले भी और शादी के बाद भी फ़िल्मे देखने का सिलसिला जारी रहा और अभी तक ये शौक़ बरक़रार है। पहले तो एक स्क्रीन वाले सिनेमा हॉल होते थे और वहाँ पिकचर देख कर जब निकलते थे तो हॉल के बाहर फ़िल्मी गीतों की किताब बिक रही होती थी जिसमें कम से कम दो तीन फ़िल्मों के पूरे पूरे गाने ,गायक का नाम और गीतकार और संगीतकार का नाम भी लिखा होता था । बिना ये किताब ख़रीदे पिकचर देखना पूरा नहीं माना जाता था । शाम को छत पर बैठकर इस गाने की किताब का पूरा इस्तेमाल होता था अरे मतलब गाने गाये जाते थे । व...

हरी और बोलने वाली छिपकली

हाँ कुछ अजीब सा विषय है लिखने के लिए । चूँकि आजकल गरमियों के दिन है तो छिपकलियॉ भी निकलने लगी है। हमें तो इनसे बहुत डर लगता है हालाँकि हमारे पतिदेव का कहना है कि उससे डरने की क्या बात है क्योंकि उसका इतना छोटा सा मुँह है वो भला क्या काटेगी। पर हम पर ऐसी दलील का कोई असर नहीं होता है। जहाँ गरमी आई नहीं कि ना जाने कहां से ये अवतरित हो जाती है। अंडमान में पहली बार हमने इसे बोलते सुना । एक अजीब तरह की किट किट करती सी आवाज़ । पहले तो हम समझ ही नहीं पाये कि ये आवाज़ किस जीव जन्तु की है। पर बाद में पता चला कि ये तो छिपकली आवाज़ करती है। अब दिल्ली में तो हमने कभी नहीं सुना ना देखा था। और वहाँ पर ही पहली बार हमने हरे रंग की छिपकली भी देखी थी। अरे देखी क्या हमारे कुर्ते पर बैठी थी। अंडमान में एक द्वीप है हटबे नाम का ,हम लोग वहाँ घूमने गये थे और बालकनी में बैठकर चाय पी रहे थे। हमने हलके हरे रंग का लखनवी सूट पहना था और दुपटटा आगे की तरफ़ रकखा था। और तभी चाय पीते पीते लगा कि दुपट्टे पर कुछ चल रहा है । अब चूँकि उस दिन हमने हरा सूट पहना था तो पहले पहल तो हम समझे कि कोई कीड़ा होगा । पर जब समझे तो ...

मोबाइल फोन के फ़ायदे और नुक़सान

अरे अरे हम जानते है कि आप सोच रहे है कि मोबाइल फोन के फ़ायदे भी कोई बताने वाली बात है वो तो हम सब जानते है । और ये सच भी है कि मोबाइल ने हम सबकी ज़िन्दगी बहुत आसान कर दी है। अब तो मोबाइल पर ही हम सबकी दुनिया टिक सी गई है। पहले तो सिर्फ़ इसे एक चलते फिरते फोन की तरह इस्तेमाल किया जाता था। और घर से दूर रहने वाले से कभी भी किसी भी समय बात की जा सकती थी। हालाँकि नब्बे के दशक में मोबाइल पर कॉल करना बहुत महँगा होता था क्योंकि इसमे कॉल करने वाले और कॉल रिसीव करने वाले को भी पैसा देना पड़ता था। और मोबाइल रखना बड़ी शान और स्टेटस की बात मानी जाती थी । पर धीरे धीरे समय बदला और मोबाइल फोन लोगों की ज़रूरत बनता गया। और कॉल रेट भी कम होते गये । पहले जहाँ सिर्फ़ एयरटेल होता था वहाँ धीरे धीरे डॉल्फ़िन ( एम टी एन एल का ) वोडाफ़ोन ,आइडिया,जैसे नेटवर्क होने लगे। पहले के मुक़ाबले अब हर किसी के पास मोबाइल होने लगा। हर कोई मोबाइल पर बात करते हुये चलता दिखता है। अब तो मोबाइल फोन की इतनी आदत सी हो गई है कि अगर थोड़ी देर फोन ना देखो तो लगता कि हम कही पीछे तो नहीं रह गये। क्योंकि हर थोड़ी देर में पिंग की आव...

बदलते हम और हमारी फ़ोटो

दो- तीन दिन पहले हमारे पतिदेव ने हमारी एक कुछ साल पुरानी फ़ोटो को फ़ेसबुक पर शेयर किया था और जिस पर हमारी एक दोस्त ने कमेंट किया कि हम पतले और प्यारे लग रहे है । जिसे पढ़कर हमने भी लिखा कि पर हम तब भी मोटे ही कहे जाते थे। 😀 जब भी हम पुरानी फ़ोटो देखते है ,भले ही वो एक या दो साल पुरानी हो या चाहे चार साल पुरानी हो तो ऐसा लगता है कि अरे तब तो हम कुछ पतले थे पर उस समय भी हम मोटे वाली कैटेगरी में ही आते थे। खाते पीते घर की । 😃 वैसे फ़ोटो बहुत ही प्यारी होती है। हर फ़ोटो के साथ कितनी यादें जुड़ी होती है। पहले के समय में ब्लैक एंड व्हाइट फ़ोटो होती थी। क्लिक कैमरा होता था जिसमें रील भरी जाती थी और फ़ोटो खींचने के बाद फिर फ़ोटोग्राफ़र से उसे बनवाया जाता था। हम लोग जहाँ कही भी घूमने जाते थे कैमरा साथ होता था। चाहे नैनीताल हो या चाहे आगरा या बनारस या फ़ैज़ाबाद या कही और। गरमी की छुट्टियों में जब सब कज़िन लोग इकट्ठा होते थे तो हम सब मममी की साड़ी पहनकर घर के आँगन में फ़ोटो खिंचवाते थे। पहले पापा और भइया फ़ोटो खींचा करते थे । बाद में धीरे धीरे सबने फ़ोटो खींचनी शुरू की। हमसे बड़ी दीदी तो...