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आरम्भ है प्रचंड ......from गुलाल

गुलाल फ़िल्म जिसे अनुराग कश्यप ने बनाया है ये गीत आरम्भ है उसी का है । वैसे अभी हमने फ़िल्म तो नही देखी ( सन्डे को देखेंगे ) पर इस फ़िल्म के २-३ गाने हमें बहुत पसंद आए है । एक-एक करके आपको सुनवायेंगे । इन गानों की सबसे अच्छी बात हमें ये लगी कि गाने के सारे बोल बहुत साफ़ है मतलब एक बार मे ही समझ आ जाते है । :) पियूष मिश्रा इसके गीतकार ओर संगीतकार है । राहुल राम ने गाया भी बहुत अच्छा है । पियूष मिश्रा का संगीत भी बहुत अच्छा है । Powered by eSnips.com

कौन नही बनना चाहता है इस देश का प्रधान मंत्री.......

चुनावों की घोषणा के साथ ही देश मे एक अजीब से सरगरमी सी आ गई लगती है । अखबार पढिये या चाहे न्यूज़ देखिये हर जगह बस जोड़ तोड़ की राजनीति ही दिखाई दे रही है । कोई एक राजनैतिक दल छोड़कर दूसरे राजनैतिक दल मे जा रहा है तो कोई नई party ही बना रहा है । हर बार जब लोक सभा चुनाव आने वाले होते है तो एक नया (पर अब पुराना ) third front बनता है जिसमे हर वो राजनैतिक दल शामिल होता है जिसे सरकार या opposition से कोई न कोई प्रॉब्लम होती है । पर पिछले दो बार के चुनावों मे ये भी देखा कि जैसे ही चुनावों का नतीजा आता है तो third front पता नही कहाँ चला जाता है । और कुछ - कुछ शोले के असरानी वाले style मे आधे इधर जाओ आधे उधर जाओ और बाकी मेरे पीछे आओ , जैसा हाल हो जाता है । :) खैर एक बार फ़िर third front की आवाज पूरे जोर-शोर से सुनाई दे रही है । और इस third front मे left party जो साढ़े चार साल तो यू.पी.ए.सरकार के साथ रही वो भी शामिल है । लेफ्ट साढ़े चार साल तक लेफ्ट - राईट - सेंटर करती रही पर फ़िर अचानक उनके अन्दर का ओरिजनल लेफ्ट जाग गया और वो यू . पी . ऐ . से...

क्या ऐसे बाल या केश रखने का कोई ख़ास कारण होता है ....

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हमारा ये सवाल पूछने का ख़ास कारण है । एक तो जिज्ञासा भी है कि इस तरह के बाल रखने का क्या कोई धार्मिक महत्त्व है जैसे साधू लोग जटा रखते है , या बस यूँ ही । वो क्या है कि पिछले हफ्ते जब हम सब्जी मंडी गए थे तो वहां पर हमने इस महिला को देखा । और हमने फोटो खींच ली वैसे सब्जी बेचने वालों को थोड़ा आश्चर्य हुआ था जब हमने इसकी फोटो खींची थी । फोटो हमने इसीलिए खींची थी ताकि आप लोगों से पूछ सकें क्योंकि ऐसी ही एक महिला को हमने बंगालारु के bull temple मे भी देखा था । bull temple के बारे मे फ़िर कभी बाद मे बताएँगे । इन दोनों फोटो मे बाल रखने का एक ही style है । और दोनों ने ऊपर लाल रंग का रिबन भी लगाया हुआ है । पता नही कैसे इस तरह से मैनेज करती होगी । पहली फोटो bull temp le की है । जो हमने नवम्बर २००७ मे अपनी बंगालारु ट्रिप के दौरान खींची थी । उस समय ये महिला मन्दिर की तरफ़ जा रही थी और हम मन्दिर की सीढियों ...

नेताओं के मंचों का टूटना ,गिरना और बच जाना ...... :)

कल ज्ञान जी कि पोस्ट पर टूट मचान शीर्षक देख कर हमने समझा था कि उन्होंने मंच टूटने वाली घटनाओं पर लिखा है । खैर उन्होंने तो नही लिखा तो हमने सोचा कि हम ही इस पर लिख दे । अब वो क्या है कि आजकल चुनावों का मौसम है तो रोज ही नए और पुराने नेता और अभिनेता बड़ी-बड़ी रैली करते है । अब रैली होगी तो स्टेज या मंच भी बनेगा जहाँ से नेता भाषण बाजी करते है । पर आजकल या तो मंच बनाने वाले मंच ठीक से नही बना रहे है या फ़िर ये मंच इन नेताओं को इनकी सही जगह दिखा रहा है । :) कल ही किसी न्यूज़ चैनल पर दिखा रहे थे कि बंगाल मे कहीं भाषण देने पहुँची कोई फ़िल्म अभिनेत्री जो इस बार शायद चुनाव लड़ रही है , वो बाकी मंच पर खड़े कार्यकर्ताओं के साथ हाथ उठाकर शायद जनता का अभिवादन कर रही थी तभी अचानक मंच समेत वो और बाकी लोग नीचे गिर पड़े । इससे कुछ दिन पहले अमर सिंह भाषण देते-देते अचानक नीचे चले गए । अब जब तक लोग समझे तब तक अमर सिंह नीचे गिर गए । ये अलग बात है कि वो फटाफट उठा कर खड़े भी हो गए । अमर सिंह ही नही उमा भारती भी अपनी किसी रैली के दौरान बड़े शान से...

जब फिल्मी गीतों की किताब ने खोली पोल .... :)

सिनेमा या फ़िल्म इस शब्द का ऐसा नशा था क्या अभी भी है कि कुछ पूछिए मत ।वैसे भी ६०-७० के दशक मे film देखने के अलावा मनोरंजन का कोई और ख़ास साधन भी तो नही था । बचपन मे भी कभी पापा या मम्मी ने film देखने पर रोका नही मतलब हम लोगों के घर मे फ़िल्म देखने पर कभी भी कोई भी रोक- टोक नही थी ।बल्कि अच्छी इंग्लिश फ़िल्म तो पापा हम लोगों को ख़ुद ही दिखाने ले जाते थे . और हम लोग अक्सर सपरिवार film देखने जाया करते थे ।और वो भी शाम यानी ६-९ का शो ।और फ़िल्म देखने के लिए स्कूल से आते ही फटाफट पढ़ाई करके बस तैयार होने लग जाते थे । पर हाँ पापा इस बात का जरुर ध्यान रखते थे कि film अच्छे हॉल मे लगी हो । इलाहाबाद मे उस ज़माने में सिविल लाईन्स का पैलेस और प्लाजा और चौक मे निरंजन सिनेमा हॉल हम लोगों का प्रिय हॉल था । वैसे अगर पिक्चर अच्छी हो तो कभी-कभी चौक मे बने विशम्भर और पुष्पराज हॉल मे भी देख लेते थे । उस समय film लगी नही कि film देखने का प्लान बनना शुरू हो जाता था । रेडियो पर बिनाका गीत सुन-सुनकर film देखने का तै होता था । और घर मे चूँकि हम ५ भाई-बहन थे तो उस ज़माने का कोई न कोई हीरो...

गोवा का शिग्मो

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होली के दिन शुरू होने वाले गोवा के इस वार्षिक शिग्मो फेस्टिवल का आयोजन १४ मार्च को किया गया था । ५ दिन तक ( यानी ११ -१५ मार्च ) चलने वाले इस फेस्टिवल मे गोवा के लोगों का एक अलग ही जोश देखने को मिलता है । इस बार शिग्मो के मुख्य अतिथि के रूप मे नाना पाटेकर आए थे । और पूरे साढ़े पाँच- छः घंटे मौजूद रहे । पहले ढाई घंटे शिग्मो परेड देखी और उसके बाद आजाद मैदान में भाषण दिया और करीब साढ़े ग्यारह -बारह बजे तक पुरस्कार वितरण समारोह होता रहा । वैसे हम तो शिग्मो परेड के बाद घर आ गए थे और पुरस्कार वितरण टी.वी पर live देखा । :) नाना पाटेकर को वहां बैठा देख कर पहले तो लोग चौकते और फ़िर लोग उनकी फोटो खींचते ।(क्योंकि पहले शायद नाना सिर्फ़ prize distribution मे ही पहुँचने वाले थे ) और बच्चे तो पूरे समय आ-आ कर उससे हाथ मिलाते रहे और ऑटोग्राफ लेते रहे । बीच मे तो वहां ऐसा नजारा था कि लोग शिग्मो परेड देखना छोड़ नाना को ही देख रहे थे । यहाँ तक की शिग्मो परेड मे जो लोग डांस करते चल रहे थे वो भी जब नाना पाटेकर को देखते तो कुछ चौंक जाते और उनका सारा ध्यान नाना को ही देखने मे रहता और साथ-साथ अ...

फिल्में डरावनी पर गीत मधुर .......

आज लता मंगेशकर के गाये कुछ अलग से गीत लाये है आपके लिए । वैसे तो ये सभी गाने फ़िल्म में बड़े ही डरावने लगते थे पर सुनने मे उतने डरावने नही है । :) वैसे गुमनाम है कोई और नैना बरसे फ़िल्म मे जरुर डरावने लगते थे क्योंकि फ़िल्म में जब भी ये गाने बजते थे तो कुछ न कुछ गड़बड़ होता था । याद है न आपको गुमनाम वाले गाने में तो गाना ख़त्म होते-होते किसी न किसी का मर्डर हो जाता था और नैना बरसे मे तो साधना भूत ही बनी थी । :) वैसे हम आएगा आएगा गीत जो फ़िल्म महल का है उसे भी आप लोगों को सुनवाना चाहते थे पर esnip पर कहीं मिला ही नही । क्योंकि इस महल फ़िल्म को देख कर हम बहुत ज्यादा डरे थे । :( :) Powered by eSnips.com