Thursday, April 19, 2007

सोनी के ....

लीजिये हम फिर से हाजिर है दुर्गेश नंदिनी को लेकर । पैसे के लिए बेटे और बहु किस हद तक जा सकते है और दुर्गेश कैसे हर मुसीबत को दूर करतीहै ये इसमे देखा जा सकता है। दुर्गेश हर जगह सही समय पर पहुंच जाती बिल्कुल spider वूमन की तरह एक पल मे ऑफिस तो एक पल मे घर पहुंच जाती है। कमाल की फुर्ती है और मजाल है जो चेहरे पर शिकन आ जाये। पर छोटे- छोटे बच्चों का अपने माँ-बाप पर निगरानी रखना कुछ अच्छा नही लगता है।

सोनी पर ही जीते हैं जिसके लिए आता है जो अभी तक बहुत अच्छा चल रहा है और अपनी कहानी से भटका नही है। यूं तो इसमे सब कुछ अच्छा है सिर्फ एक बुआ (अदिरा )को छोड़कर, पर कम से कम इसमे वो सास -बहु की खिट-खिट नही है। वैसे बुआ ने गड़बड़ करने मे कोई कसर नही छोडी है।

सबसे कमाल का तो एक लडकी अनजानी सी है जिसमे पिछले हफ्ते लगा की चलो अब तो हीरो -हिरोइन मिल गए और अब पूरा परिवार हंसी-ख़ुशी रहेगा पर नही फिर से एक नयी लडकी का किरदार इसमे जोड़ दिया , इसे आगे बढ़ाने के लिए।

सबकी बात हो और बाबूजी की ना हो ऐसा कैसे कर सकते है। हम बात थोड़ी ख़ुशी थोड़े गम की कर रहे है जिसमे एक गुजराती परिवार को दिखाया गया है और इसकी खासियत ये है कि इस सीरियल मे ना तो सास अपनी बहुयों को तंग करती है और ना ही बहुएं अपनी सास को खरी- खोटी सुनाती है बल्कि इसके उलट इसमे सास बहु मे बहुत अच्छा तालमेल और प्यार दिखाया है । वैसे इसमे बाबूजी से जरूर बहुओं की थोड़ी -बहुत तकरार चलती है पर सास हमेशा अपनी बहुओं का ही पक्ष लेती है। जो बालाजी के सीरियल से बिल्कुल उल्टा है ।

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