Friday, December 25, 2009

अंडमान के बारे मे तो हमने बहुत कुछ लिखा है पर निकोबार के बारे मे इससे पहले कभी नही लिखा । चूँकि निकोबार हम सिर्फ़ एक बार सुनामी के पहले गए थे और सुनामी के बाद कई बार सोचा पर दोबारा जाने की कभी हिम्मत ही नही हुई ।इससे पहले भी कई बार लिखने की सोची पर हर बार थोड़ा सा लिख कर छोड़ दिया था पर अब आज से हम निकोबार के बारे मे अपने अनुभव भी लिखना शुरू कर रहे है।

मई २००४ की बात है छोटे बेटे के दसवी बोर्ड के इम्तिहान ख़त्म हो चुके थे । घर मे जब भी निकोबार का कार्यक्रम बनता तो हम पीछे हट जाते थे क्यूंकि एक तो समुद्री यात्रा हमे बिल्कुल भी नही बहती है और हेलीकॉप्टर मे उड़ने मे भी डर लगता था। पर निकोबार जाना और घूमना भी था। अब अंडमान मे तो हमेशा ही बारिश होती है पर मार्च और अप्रेल और थोड़ा बहुत मई के शुरू के २ हफ्तों मे बारिश कम होती है. इसलिए मई के पहले हफ्ते मे प्रोग्राम बना की पूरा निकोबार एक हफ्ते मे घूम कर वापिस आयेंगे।

अब निकोबार के लिए हट बे से ही होकर जाना पड़ता था और निकोबार की समुद्री यात्रा २४ घंटे की थी। कुछ ज्यादा बड़े शिप जैसे स्वराज द्वीप और चौरा वगैरा १५ दिन मे चेन्नई से आने और जाने मे निकोबार को टच करते थे। उस समय येरवा नाम का एक शिप था जो हर दूसरे-तीसरे दिन निकोबार जाता था । तो हम लोगों ने भी येरवा मे एक केबिन बुक किया । येरवा पोर्ट ब्लेयर से सुबह ६ बजे निकोबार के लिए चला तो शुरू मे तो सब ठीक था। येरवा की स्पीड ज्यादा नही थी इसलिए शिप पर ही सुबह का नाश्ता भी हम लोगों ने शिप के कैप्टेन के साथ किया



पोर्ट ब्लेयर से हट बे की यात्रा मे करीब ८ घंटे लगते थे । एक दो घंटे बाद शिप ने अपना रंग दिखाना शुरू किया और हमे सी सिकनेस शुरू हो गई ।थोडी देर डेक पर भी जाकर बैठे पर सी सिकनेस मे अगर एक बार तबियत ख़राब हो जाती है तो फ़िर ठीक मुश्किल से ही होती है।शिप पर खाने और नाश्ते के लिए घंटी बजाई जाती थी। एक घंटी जिसमे यात्री लोग खाना खाने dinning hall मे जाते थे और दूसरी घंटी शिप के crew के लिए बजती थी।नाश्ते के बाद जब लंच की घंटी बजी तब तो हम इस लायक ही नही थे की लंच खा सकते . इसलिए हमने सिर्फ़ काफ़ी पी और खाया कुछ नही ।

करीब बजे शिप हट बे पहुँचा और यहां पर शिप - घंटे तक रुका रहाशिप मे सिर घूम गया था इसलिए हम लोग फ्रेश होने के लिए शिप से उतर कर हट बे के गेस्ट हाउस मे गएवहां नहाया और चाय वगैरा पीकर आराम करके निकोबार की यात्रा के लिए पूरी तरह से दिमागी तौर पर तैयार हो कर वापिस बजे तक शिप पर गए

हट बे से निकोबार का सफर १०-१२ घंटे का थाअगले हफ्ते तक इंतजार कीजिये

कुछ लिंक्स हम अपनी पुरानी पोस्ट के यहां दे रहे हैऔर आगे भी देते रहेंगे

दिल्ली से अंडमान तक का सफर

अंडमान निकोबार -२

घर की खोज

Friday, September 25, 2009

इतने समय से सुनते आ रहे थे की मार्केट मे नकली नोट चल रहे है पर पहली बार हमें नकली नोट मिला और पहली बार ही नकली नोट देखा भी । :)

तो सवाल ये की नकली नोट भला हमारे पास आया कहाँ से ?

१९ सितम्बर को हम दिल्ली के अंसल प्लाजा मे बने Mcdonalds मे गए थे ।(जानते है आप लोग सोच रहे है की पिछली पोस्ट तो गोवा से लिखी थी और अब दिल्ली से लिख रहे है . अचानक हम गोवा से दिल्ली आ गए है ) और वहां से हमने take away लिया । और जब हमने काउंटर पर ५०० रूपये का नोट दिया तो उस काउंटर वाले ने बाकायदा लाइट मे चेक किया की ५०० का नोट असली है या नही । और उसने हमें २०० रूपये वापिस किए और हमने बिना सोचे और बिना चेक किए दोनों १०० के नोट अपने पर्स मे रख लिए । (अब ये तो सपने मे भी नही सोचा था की १०० का नकली नोट मिलेगा ):)

खैर अगले दिन घर पर जब सब्जी वाले से सब्जी लेने के बाद उसे १०० का नोट दिया तो उसने ये कह कर की ये नोट ठीक नही है ,नोट वापिस कर दिया । तो हमने उससे पूछा की भला इस नोट को वो क्यूँ नही ले रहा है । तो इस पर वो सब्जी वाला बोला की जी ये नोट कुछ हल्का है । और रंग कुछ अलग है ।

ये सुनकर पहले तो सब्जी वाले पर गुस्सा आया (जो की ग़लत था )और फ़िर Mcdonalds वालों पर की अपना तो नोट देख कर लेते है और कस्टमर को नकली नोट देते है । अपने पर भी गुस्सा आया की नोट को देख कर क्यूँ नही लिया हालाँकि उस समय तो हमें फर्क भी नही पता चलता ।

उस दिन के बाद से अब तो हम हर नोट चेक करते है पर अब भी असली -नकली का फर्क समझना मुश्किल लग रहा है । क्यूंकि किसी मे रंग तो किसी मे १०० अलग तरह से लिखा है तो किसी मे साइन अलग बना है । अब तो हर नोट ही नकली लगता है ।

और कल जब gas वाला आया तो उसने ५०० के बदले मे जो १०० के नोट दिए उन्हें जब हम चेक कर रहे थे तो वो बोला की मैडम सब नोट ठीक है और हमारे ये कहने पर की एक बार हमें नकली नोट मिल चुका है और जब उसे वो नकली नोट दिखाया तो बोला की उसका दिया हुआ नोट असली है . और हमारे पूछने पर की अगर नकली निकला तो वो बोला की आप हमें वापिस कर देना। और उसने अपना नाम उस नोट पर लिखा दिया ।

चलिए कुछ असली और नकली नोट की फोटो लगा रहे है । देखे आप लोग फर्क कर पाते है या नही ।तो बताइये कौन सा असली है और कौन सा नकली नोट है । :)


Monday, September 14, 2009

अरे ये क्या , आप लोग तो कुछ अचरज मे लग रहे है ? अरे माना की गणेश चतुर्थी तकरीबन २० दिन पहले थी और हम आज गणपति की जय कर रहे है । अरे वो क्या है न की अभी १५-२० दिन के लिए हम गोवा आए हुए है और यहाँ पर गणेश चतुर्थी को गणेश उत्सव के रूप मे २१ दिन तक मनाया जाता है ।वैसे कुछ जगहों पर गणपति १ दिन (ज्यादातर वो लोग घर मे गणपति स्थापित करते है )तो कुछ ७ दिन तो कुछ ११ दिन और कुछ जगहों पर २१ दिन तक गणपति की प्रतिमा स्थापित रहती है . तो हमने सोचा की इतने दिनों बाद हम पोस्ट लिख रहे है तो इससे अच्छा विषय भला और क्या हो सकता है ।

गोवा मे अगर आप कभी गणेश चतुर्थी के आस-पास घूमने आए तो मार्शेल (marcel)मे जरुर गणपति की मूर्तियाँ देखने जाइयेगा क्यूंकि इस छोटे से गाँव मे हर दस कदम की दूरी पर गणपति की विबिन्न प्रकार की और विभिन्न वस्तुओं से बनी गणेश की प्रतिमा देखने को मिलती है ।और यहाँ पर २१ दिन तक गणेश उत्सव मनाया जाता है । इस बार भी यहाँ पर कोई गणेश रस्सी से तो कोई गणेश जूट से बने थे । तो कहीं अलमुनियम फोयल से गणेश बनाए गए थे । कहीं वंश पात्र गणेश थे तो कहीं floating गणेश थे जिसमे गणेश जी शेषनाग की शैय्या पर बैठे दिखाए गए है । तो कोई गणेश थर्माकोल के बनाए गए थे ।

वैसे इस बार हम ज्यादा तो नही बस कुछ ही देख पाये और फोटो त बस २-३ की ही खींच पाये क्यूंकि इस बार अधिकतर जैसे ही मूर्ति देखने के लिए प्रवेश करते है वही सामने बड़ा-बड़ा लिखा रहता है फोटो खींचने की सख्त मनाही है . अरे किसी डर या आतंक की वजह से नही बल्कि इसमे भी commercialisation हो गया है ।पंडाल मे फोटो नही खींच सकते है पर पंडाल से उस मूर्ति की फोटो खरीद सकते है ।(१० रूपये में) पर फ़िर भी कुछ जगहों पर फोटो खींचने की पूरी छूट थी और हमने उस छूट का पूरा फायदा उठाया । :)
अब मूर्ति को लोग इतनी मेहनत से बनाते है और हम जैसे लोग जाकर बस आराम से फोटो खींच लेते है । भला ये क्या बात हुई ।

खैर आप भी इन २-३ फोटो को देखिये और गणपति बनाने वाले की तारीफ करिए और जोर से बोलिए गणपति बप्पा मोरया ।

ये पहले गणेश जी ११ फ़ुट ऊँचे बनाए गए है ।

और ये वाले गणेश जी रस्सी से बने है और इस मूर्ति को नागेन्द्र कुमार ने बनाया है ।

और ये तीसरे गणेश जी floating गणेश (कुंभारजुवे गाँव मे )है और इन्हे विष्णु के अवतार रूप मे दिखाया गया है ।

Thursday, July 2, 2009

इससे पहले गोवा के beaches और मन्दिर के बारे मे तो कई बार हमने लिखा है पर आज गोवा के island के बारे मे हम लिखने जा रहे है ।गोवा मे islands है ये पढ़कर कहीं आपको आश्चर्य तो नही हो रहा है । गोवा मे न सिर्फ़ beaches और मन्दिर है बल्कि गोवा मे कुछ ५-island भी है जैसे chorao,divar,वगैरा panjim के पास है । वैसे chorao island नदी और सड़क दोनों रास्ते से जुड़ा है पर सड़क के रास्ते जाने मे ज्यादा समय लगता है इसलिए ज्यादातर लोग ferry से ही जाते है ।chorao island पर ही डॉक्टर सलीम अली bird सैंक्चुरी भी है जिसके लिए या तो सुबह या फ़िर शाम को जाना चाहिए क्यूंकि वो समय ही सबसे सही होता है विभिन्न प्रकार की चिडियों और पक्षियों को देखने का ।

चलिए तो आज आपको divar island की सैर करा दी जाए । divar island सिर्फ़ ferry के द्वारा ही जाया जा सकता है । और इसके लिए ferry रायबंदर मे बने गोवा इंस्टीटियुत ऑफ़ मैनजमेंट के ठीक सामने से मिलती है । अभी तक इस पर यात्रियों से कोई भी किराया नही लिया जाता था पर कार ट्रक वगैरा से बहुत ही (subsidised rate ) नोमिनल सा किराया या यूँ कह ले बस नाम के लिए लिया जाता था पर अब पहली जुलाई से divar पर रहने वाले लोगों को छोड़कर ( जिन्हें अपना कोई भी पहचान पत्र दिखाना पड़ेगा ) बाकी सभी यात्रियों से किराया लिया जाएगा पर बहुत ज्यादा नही ,बस ५० पैसे और एक रुपया

खैर रायबंदर panjim से बस ६-७ की.मी की दूरी पर है । यूँ तो इस island मे devaaya आयुर्वेदिक रिसॉर्ट (स्टार )भी बना हुआ है जहाँ पर आपको हर प्रकार की सुविधा मिल सकती है । यहाँ पर ज्यादातर कॉटेज बनी हुई है और साथ ही यहाँ पर स्पा वगैरा की सुविधा भी है । साथ ही इस island पर एक छोटा सा मार्केट भी है जहाँ पर वहां रहने वालों की जरुरत की सभी चीजें मिल जाती है । divar island से बच्चे ferry से panjim पढने के लिए आते है । और इन बच्चों के टाइम पर दोनों तरफ बस खड़ी रहती है । इस island पर तकरीबन पर ३-५ हजार लोग रहते है ।

इस island पर जाने के लिए २ जगह से ferry ली जा सकती है एक तो रायबंदर से और दूसरी old goa मे बनी jetty से ।और इस viceroy 's arch जो की आदिल शाह के किले का एक द्वार है और जिसे पुर्तगालियों ने फ़िर से बनवाया था और पुर्तगाली गवर्नर इसी रास्ते से goa मे आते थे , से होकर ही jetty पर आया - जाया जा सकता हैरायबंदर से ferry हर ५-१० मिनट के अन्तर पर मिल जाती है । जैसे ही ferry मुड़ कर चलती है तो गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनजमेंट की खूबसूरत पीली बिल्डिंग दिखती है और साथ ही हिल कटिंग का भी नजारा देखने को मिलता है । और बस ५-७ मिनट की ferry ride के बाद ही divar island पहुँच जाते है । ferry से उतरते ही जैसे ही चलते है तो दाहिनी ओर old goa के सभी सफ़ेद रंग के चर्च घने पेड़ों के बीच बहुत सुंदर दिखाई देते है । हमारे कैमरा से तो उतनी साफ़ फोटो नही आई है (वरना जरुर लगाते )पर अगर खूब अच्छा कैमरा हो तो फोटो zoom करके अच्छी आ सकती है । ferry से वापिस आते हुए अगर सूर्यास्त का समय हो जाता है तो ferry पर से ये बहुत ही मन मोहने वाला दृश्य लगता है ।

तकरीबन एक -डेढ़ की.मी .तक कुछ ख़ास नही बस धान के खेत जरुर दिखते है । पर हाँ सड़क के जो दोनों ओर पानी है उसमे लोग मछली पकड़ते हुए जरुर देखे जा सकते है । :)

पर ये एक की.मी की ड्राइव बहुत अच्छी लगती है । इस सड़क के ख़त्म होते ही चढाई शुरू हो जाती है और हर थोडी दूर पर २-३ सड़क मिलती है । वैसे आप किसी भी सड़क पर चले जाए खोने का डर नही है क्यूंकि एक तो island छोटा है और दूसरे खोकर आप जायेंगे कहाँ । :)

खैर इस island पर बना चर्च और मन्दिर दोनों ही देखने लायक है । एक पहाड़ पर मन्दिर बना है और दूसरे पहाड़ पर चर्च बना है । कार से जाने मे घूम कर जाना पड़ता है वरना मन्दिर से चर्च का बस २ मिनट का पैदल का रास्ता है ।


चर्च तो सुबह और शाम ही खुलता है ,ऐसा इसलिए कह रहे है क्यूंकि हम ३-४ बार पहले गए भी है दिन मे तो चर्च हमेशा बंद रहता था पर इस बार शाम को गए थे ४ बजे तो पहली बार इस चर्च को अन्दर से देखा । चर्च के पास ही बड़ा पुराना पेड़ है जिस की जड़ें कभी-कभी आपस मे इस तरह से गुंथ जाती है की उनपर बैठकर झूला भी झूला जा सकता है ।

वैसे इस मन्दिर मे ३ देवताओं के मन्दिर बने है मुख्य मन्दिर गणेश जी का साथ ही एक पहाड़ नीचे हनुमान जी का मन्दिर है जहाँ हनुमान जी की सफ़ेद मूर्ति है और यहाँ से पहले हनुमान जी की सफ़ेद मूर्ति हमने नही देखि थी । और एक पहाड़ ऊपर सत्तारी देवी का मन्दिर (लक्ष्मी ) है । और यहाँ से आप गोवा का खूबसूरत नजारा भी देख सकते है ।

इस island पर इतनी शान्ति रहती है की क्या कहें । बड़े और खूबसूरत घर दिखेंगे पर रहने वाले कम दीखते है । वैसे आबादी भी कम है :) हाँ यहाँ पर कुछ पुर्तगाली लोग भी रहते है जिनके घरों को बड़ी आसानी से पहचाना जा सकता है क्यूंकि पुर्तगालियों के घर के ऊपर मुर्गा (rooster) बना होता है जो की पुर्तगाल का राष्ट्रीय पक्षी है । और यहाँ के बाजार मे सुबह शाम ही थोडी भीड़-भाड़ दिखाई देती है वरना पूरे island का चक्कर लगा लीजिये बमुश्किल १० -२० लोग ही दिखेंगे ।












अरे एक बात तो बताना भूल ही गए यहाँ पर गरमा गरम पकौडे बहुत अच्छे मिलते है पर वो भी सिर्फ़ शाम को दिन मे नही । :)

Friday, June 26, 2009

अप्रैल मे जब दिल्ली गए थे तो शुरू मे तो कुछ सोचने समझने की सुध ही नही थी क्यूंकि पापा हॉस्पिटल मे थे पर जब कुछ दिन बाद उनकी तबियत कुछ संभली तो एक दिन हमने रचना को फ़ोन किया तो रचना ने सबसे पहले यही पूछा कि हम कब दिल्ली रहे है और ये बताने पर कि हम दिल्ली मे ही है रचना काफ़ी खुश हो गई कि इस बार तो हम लोग जरुर ही मिलेंगे पर जब हमने पापा के बारे मे बताया तो रचना ने कहा कि कभी भी कोई भी भी हो तो हम उन्हें जरुर बताये रचना का इतना कहना ही बहुत था

रचना से बात करने के बाद हमने रंजना जी को फ़ोन किया तो पता चला कि रंजना जी कुछ busy थी इसलिए उनसे बात नही हो पायी थी इस बीच मे - बार रचना से बात हुई और हर बार बात इस पर ख़तम होती की इस बार तो हम लोग जरुर मिलेंगेइलाहाबाद मे जब हम थे तब रचना ने बताया था कि अविनाश वाचस्पति जी जून को दिल्ली मे एक ब्लॉगर मीट रख रहे है और अविनाश जी से भी बात हुई थी पर बाद मे वो मीट कैंसिल हो गई थी और फ़िर सन्डे को हम कुछ ऐसे उलझे रहे की तो रचना और ही अविनाश जी से बात कर पायेदिल्ली से गोवा आने के पहले एक बार फ़िर रंजना और रचना से फ़ोन पर बात हुई पर मुलाकात नही हो पायी थी

और फ़िर जब पापा को हॉस्पिटल से छुट्टी मिली तो हम लोग इलाहाबाद चले गए- दिन बाद हमने सोचा की दिल्ली मे तो परेशानी की वजह से किसी से मुलाकात नही हुई और अब जब पापा ठीक है और हम इलाहाबाद मे है तो क्यूँ इस बार इलाहाबाद के bloggers से मिल लिया जाएअब ये सोचना तो बहुत आसान था पर मुश्किल ये थी की हमारे पास किसी का भी फ़ोन नंबर नही थाखैर तो हमने जिन लोगों को जानते थे की वो इलाहाबाद के है जैसे महाशक्ति ,हर्ष वर्धन और ज्ञानदत्त जी के ब्लॉग चेक किए और प्रोफाइल भी देखा की शायद वहां फ़ोन नंबर लिखा हो क्यूंकि अब बहुत से ब्लॉगर फ़ोन नंबर अपने ब्लॉग पर लिखते है

पर किसी का भी फ़ोन नंबर नही मिला तो फ़िर हमने किसी से भी मिलने का विचार छोड़ दिया था पर अगले दिन फ़िर सोचा की और तो किसी का नही पर ज्ञान जी का फ़ोन नंबर शायद डाइरेक्ट्री मे मिल जाए पर उसमे नंबर होने पर इनक्वरी से पता किया और जब ज्ञान जी को हमने कॉल किया तो वो शायद कुछ शॉक मे गए थे :) क्यूंकि उन्हें उम्मीद नही होगी की हम उन्हें कॉल करेंगे और वो भी यूँ अचानकऔर फ़ोन करने के बाद हमें भी समझ नही आया की क्या बात करेंतो हमने उनसे और दूसरे इलाहाबाद के bloggers का नंबर पूछा तो उन्होंने सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी का नंबर दिया

सिद्धार्थ जी को फ़ोन किया तो जैसे ही उनको हमने अपना परिचय दिया वो बड़े खुश हुए और साथ ही अफ़सोस भी जाहिर किया कि वो हमसे मिल नही पायेंगे क्यूंकि उन्होंने बताया की वो अपने गाँव जा रहे है अपने बेटे का मुंडन करवाने और कुछ दिन बाद लौटेंगेऔर सिद्धार्थ जी कहने लगे की अगर एक दिन पहले हमने फ़ोन किया होता तो शायद मुलाकात हो जाती पर खैर अगली बार सहीफ़िर उन्होंने महाशक्ति प्रमेन्द्र का नंबर दिया पर प्रमेन्द्र से बात नही हो पायी

अगले दिन शाम को हम सिविल लाईन्स जाने का कार्यक्रम बना रहे थे और दूसरे कमरे मे थे कि तभी एक फ़ोन आया तो भइया ने उठाया और उनकी बात हुईजब हम पापा के कमरे मे आए तो भइया ने बताया कि ज्ञानदत्त जी का फ़ोन आया था और वो घर का पता पूछ रहे थे तो भइया ने उन्हें घर का address बता दिया हैसाथ ही भइया और पापा ने पूछा कि ये कौन है तो हमने उन्हें बताया कि ज्ञान जी एक ब्लॉगर है और वो भी हिन्दी मे ब्लॉग लिखते है ।

खैर -१० मिनट बाद ज्ञान जी का फ़िर फ़ोन आया address पूछने के लिए और फ़िर थोडी देर मे ज्ञान जी और रीता भाभी हमारे घर आएऔर फ़िर थोडी formal बातचीत के बाद रीता भाभी से जो बात शुरू हुई तो ऐसा नही लगा कि हम दोनों पहली बार मिल रहे हैकाफ़ी बातें हुई ब्लॉग जगत की और bloggers की और घर बार की बातें भी हुईहाँ ज्ञान जी से बात कम हुई पर अब हमें उम्मीद है कि ज्ञान जी का हमारे बारे मे भ्रम टूट गया होगा (age का ) :)

खैर तो ये थी हमारी इलाहाबाद की पहली ब्लॉगर मीट

Wednesday, June 24, 2009

आज अखबार मे ये ख़बर पढ़ी थी जिसमे मुंबई की रेलवे कोर्ट ने एक मेडिकल रिप्रेजनटेटिव को रेलवे ट्रैक क्रॉस करने के कारण जेल भेज दिया था । पूरी ख़बर आप भी यहाँ पढ़ सकते है ।

वैसे रेलवे ट्रैक क्रॉस करने का नजारा हर शहर के प्लेटफोर्म पर देखा जा सकता है जहाँ न केवल लड़के और आदमी और आरतें बल्कि कई बार तो लोग सपरिवार बेधड़क रेलवे ट्रैक को एक प्लेटफोर्म से दूसरे प्लेटफोर्म पर जाने के लिए इस्तेमाल करते है । और कोई उन्हें ऐसा करने से रोक भी नही सकता था पर अब जब रेलवे पुलिस इस तरह लोगों को पकडेगी और कोर्ट उन्हें सबक सिखाने के लिए २-४ दिन के लिए जब जेल भेजेगी तब ही लोगों की इस तरह से रेलवे ट्रैक क्रॉस करने की आदत छूटेगी । ऐसी उम्मीद की जा सकती है ।

पता नही इस तरह के शोर्टकट से वो कितना समय बचा लेते है । बमुश्किल ५-१० मिनट ,पर उसके लिए अपनी जान जोखिम मे डालने से भी नही चूकते है ।

Friday, June 12, 2009

आज बड़े दिनों बाद जब मेल बॉक्स देखा तो अल्पना जी का मैसेज पढ़ा तो सोचा की आज एक छुटकी सी पोस्ट लिख ही दी जाए । अल्पना जी हमारे गायब होने पर हमारी खोज ख़बर लेने का शुक्रिया । दरअसल कुछ परेशानी के चलते अप्रैल से जून तक हम दिल्ली और इलाहाबाद मे थे और उस बीच मे नेट करने का बिल्कुल भी समय नही मिला था । पर अब हम वापिस गोवा आ गए है और अब २-४ दिन मे पूरी तरह से ब्लॉग पढने और लिखने का काम शुरू कर देंगे । :)

Sunday, April 12, 2009

पिछले काफ़ी समय से हमारे यहाँ इन्टरनेट की समस्या आ रही थी पर फ़िर भी हम किसी तरह काम चला रहे थे पर पिछले संडे से नेट जो बिगडा तो आज ठीक हुआ है ।मतलब पूरे एक हफ्ते के बाद आज नेट चला है । अब ये संडे के कारण है या .... :)

bsnl वालों को रोज फ़ोन कर-करके हम तो तंग ही आ गए । असल मे bsnl की helpline पर जब भी complaint करते थे तो वो लोग हमेशा कहते की अड़तालीस घंटे मे ठीक हो जायेगा पर ठीक हो नही रहा था । कल शाम को जब फ़िर फ़ोन किया तो पता चला की helpline के जिस नम्बर पर हम कॉल करते है वो यहाँ का नही बल्कि pune का है ।

और फ़िर हमें समझ मे आया की जब भी हम फ़ोन मिलाते है तो हमेशा bsnl गोवा -महाराष्ट्र मे आपका स्वागत है क्यों बोलते है । अब कल pune वाले ने कहा की आप गोवा मे जो भी nearest bsnl ऑफिस है उससे बात कीजिये ।

पर खैर फिलहाल आज तो नेट चल रहा है देखें कल क्या होता है ।

चलिए लगे हाथ ये भी बता दे की गोवा की १९७ सर्विस जिसकी जरुरत अभी हाल ही मे पड़ी थी और वो भी pune से ही मैनेज होती है इसलिए कभी-कभी गोवा मे किसी का नम्बर पूछने पर उन्हें समझ ही नही आता है ।

Sunday, April 5, 2009

हमारा छोटा बेटा जो की दिल्ली मे है ,अभी हाल ही में उस के collage मे फेस्ट था । और इस बार फेस्ट को औरगानाईज करने में बेटे ने काफ़ी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया । तीन दिन तक चले इस फेस्ट के आखिरी दिन बेटे ने भी अपने दोस्तों के साथ पहली बार perform किया । कल उसने अपना ये वीडियो हमें भेजा तो हमने सोचा की अपने इस ब्लॉगर परिवार को भी दिखाया जाए । तो आज उसी का वीडियो हम यहाँ पर लगा रहे है

हमारे सुपुत्र अभिनव नीले कुरते मे बेस गिटार बजा रहे है । सफ़ेद शर्ट में मैथयू जैकब है ,नीली शर्ट मे समीर फराज है काले कुरते मे aparna और लाल कुरते मे निखिल ड्रम बजा रहे है ।

Saturday, April 4, 2009

इससे पहले आपने आरम्भ है और दुनिया सुना था । वैसे बहुत सालों बाद गुरूवार को हमने दोबारा ये फ़िल्म देखी । :) और इस बार भी हमें ये फ़िल्म पसंद आई

तो सोचा कि आज शहर और यारा मौला भी आप लोगों को सुनवाया जाएअरे तो इंतजार कैसा । :)



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Friday, April 3, 2009


दो दिन पहले के नवहिंद टाईम्स में ये फोटो छपी थी सबसे पहले आप फोटो देखें और उसके नीचे लिखे शब्दों (सेंटेंस) को ध्यान से पढ़े

कुछ समझ में आया
नही आया :)

तो चलिए हम बता देते है ,वो क्या है कि आजकल चुनावों का समय है और सभी जगह नोमिनेशन की प्रक्रिया चल रही है (इस फोटो मे बी .जे.पी.के प्रत्याशी अपना नोमिनेशन फाइल करने के बाद बाहर आकार फोटो खिंचा रहे है )

साथ ही गोवा में इन्ही दिनों लेंट पीरियड (जिसमें क्रिशचन लोग ४० दिन तक नॉन-वेज नही खाते है और इस दौरान saints की मूर्ति (statues) के साथ procession निकलते है ) भी चल रहा है

और इस फोटो में इन दोनों बातों को मिला दिया गया है :)

मतलब फोटो election की और सेंटेंस लेंट का

Wednesday, April 1, 2009

अब आज तो सभी दिल्ली वासी गए होंगे अरुण जी के बुलाए गए ब्लौगर सम्मलेन मे तो पता नही लोग पोस्ट पढेंगे या नही और टिप्पणी करेंगे या नही । पर खैर उनके सम्मलेन की खबरें तो हम लोगों को मिल ही जायेगी । :)

आज पहली अप्रैल है और अब तो कम पर एक ज़माने मे इस दिन का बड़ी बेसब्री से इंतजार किया करते थे ।और कितना मजा आता था लोगों को अप्रैल फूल बनाने मे । घर मे तो बहुत ही आम सा तरीका था अप्रैल फूल बनाने का ,अरे वही फ़ोन उठा कर कहना कि पापा आपका फ़ोन है या जिज्जी तुम्हारा फ़ोन है । या दरवाजे की ओर इशारा कर कहना की भइया बाहर कोई मिलने आया है ।और स्कूल मे दोस्तों को कहना कि तुम्हे टीचर ने बुलाया है और जैसे ही कोई लड़की उठ कर चलने लगती तो जोर से अप्रैल फूल चिल्लाते थे

वो भी क्या दिन थे । खैर छोडिये उन बीते दिनों को

आज सुबह अखबार मे ये ख़बर पढ़ी तो सोचा कि आप लोगों को भी बता दिया जाएवैसे भी आजकल हर तरफ़ चुनाव और उससे जुड़ी खबरें ही ज्यादा पढने और देखने को मिल रही है । तो ख़बर पढिये और बताइये कि क्या ऐसा हो सकता है ।


Tuesday, March 31, 2009

अब साइकिल और स्कूटर सीखने का किस्सा तो हम ने एक जमाने पहले ही आप लोगों को बता दिया था पर कार का किस्सा बताना रह गया था ।तो सोचा आज आप लोगों को अपने कार चलाने के सीखने का अनुभव भी बता दिया जाए । अब वो क्या है ना चूँकि मायके मे हम सबसे छोटे थे इसलिए कार सीखने का नंबर आते-आते हमारी शादी हो गई थी:)

आप यही सोच रहे है ना कि तीन दिन मे कार चलाना सीखा तो कौन सा बड़ा तीर मार लियाअरे भई हम जानते है कि आप लोगों ने एक घंटे या एक दिन मे कार चलाना सीखा होगा:)

दिसम्बर ८९ की बात है उस समय बेटे छोटे थे और हम इलाहाबाद गए हुए थे और हमारी बाकी जिज्जी भी इलाहाबाद आई हुई थी । एक दिन शाम को हम सब चाय पी रहे थे और बातें हो रही थी तभी हमें कार चलाना सीखने का भूत चढ़ गया ।तो भइया बोले की कार चलाना तो बहुत आसान है । बस गियर लगाना आना चाहिए । और कार चलाते समय बिल्कुल भी डरना नही चाहिए । फ़िर भइया ने घर मे खड़ी कार मे ही गियर लगाना सिखाया ।क्योंकि तब ambassador मे हैंड गियर होता था । ४-५ बार गियर लगाने की प्रैक्टिस करने के बाद ड्राईवर मुन्ना लाल को बुलाया गया और हम चल दिए कार सीखने के लिए ।

घर से तो मुन्ना लाल ही एमबैसडर कार लेकर चला और संगम के पहले बायीं ओर की सड़क जो आगे जाकर संगम पर ही मिलती थी (नाम भूल रहे है )और जिस पर उस ज़माने मे ट्रैफिक काफ़ी कम रहता था । वहां ले जाकर ड्राईवर ने एक बार फ़िर हमें गियर लगाना सिखाया और बताया कि कैसे क्लच को धीरे-धीरे छोड़ते हुए कार को आगे बढ़ाना है । पर जैसा की नौसिखिये चालक के साथ होता है वही हमारे साथ भी हुआ । जैसे ही first गियर लगाते और क्लच छोड़ते की बस कार वही घच करके झटके के साथ रुक जाती । :)

खैर २-४ बार के बाद समझ मे आया कि कैसे क्लच छोड़ते हुए एक्सीलेटर से स्पीड करते हुए कार आगे बढ़ाना है ।बस एक बार जब कार चल पड़ी तब तो कोई दिक्कत ही नही आई थी ।वैसे एम्बेसडर जैसी भारी-भरकम कार मे सीखने का ये फायदा हुआ कि एम्बेसडर चलाने के बाद सभी कार हल्की लगती थी । कार सीखने मे अगर एक बार first गियर मे कार चला ली बिना झटका दिए तो समझ लीजिये कि आपको कार चलाना आ गया । क्योंकि सबसे मुश्किल काम यही है । ग़लत तो नही कह रहे है ना । :)

उस दिन करीब एक घंटे तक कार चलाने के बाद घर लौटने मे फ़िर से ड्राइवर ने ही कार चलाई क्योंकि वहां पर जो चौराहा पड़ता है उस पर बड़ी भीड़ हुआ करती थी जिसमे रिक्शा ,साइकिल,कार,पैदल और गाय भैंस सभी होते थे । और पहले दिन तो डर भी लग रहा था । अगले दिन फ़िर से शाम को ड्राईवर के साथ हम कार लेकर संगम की ओर चल पड़े और इस बार हमारी भांजी भी कार मे हमारे साथ थी । और एक घंटे वहां कार चलाने के बाद जब लौटने लगे तो हमने ड्राईवर को बोला की अब घर चलना है इस लिए अब तुम चलाओ । तो ड्राईवर बोला दीदी आप ही चलाइये । बस धीरे-धीरे चलाइयेगा और चौराहे पर हार्न जरुर बजाइयेगा । खैर उस दिन डरते-डरते संगम से घर तक कार चलाकर जो आए तो धड़का खुल गया अरे मतलब डर निकल गया । :)

और घर मे घुसते ही भांजी ने सबको जोर-जोर से बताया कि आज तो मौसी ही कार चलाकर घर लायी है । तीसरे दिन जब चले तो पीछे बैठने वाली सवारी मे इजाफा हो गया माने हमारी भांजी के साथ-साथ हमारे बेटे भी चल दिए हमारे साथ । दो दिन चलाने के बाद तो इतना कार चलाना आगया था कि उस दिन घर से भी हम ही कार चलाकर ले गए फ़िर वहां एक घंटा कार चलाई और वापिस घर हम ही चला कर आए और बस सीख गए कार चलाना ।

और उसके बाद दिल्ली मे पतिदेव ने खूब कार चलाने की प्रैक्टिस करवाई । जहाँ भी जाना होता था वो हमसे ही कार चलवाते थे । उस समय हम लोगों के पास फिएट कार थी ।और हमारी एक ननद पश्चिम विहार मे रहती थी और तकरीबन हर हफ्ते एक बार हम लोग उनके यहां जाते थे तो g.k. से पश्चिम विहार तक हम कार चलाते थे जिसका नतीजा ये हुआ कि हम कार चलाने मे पक्के हो गए ।

बाद मे जब दोनों बेटे स्कूल जाने लगे थे तब ये कार चलाना असली मे काम आया था क्योंकि दोनों बेटों का स्कूल के भारी-भारी बैग के साथ पैदल चलना मुश्किल होता था ना (वैसे स्कूल बहुत पास था, E.O.K.मे ) । :)


Monday, March 30, 2009

आपको गिनती से जामुन खरीदने का अनुभव हुआ है कि नही हम नही जानते है पर हमें जरुर अनुभव हुआ हैगिनती से जामुन खरीदने का अनुभव हमें हुआ है और वो भी गोवा मेंकल की ही बात है हम सब्जी मंडी गए थे और वहां जामुन देख कर जब बेचने वाली से पूछा कैसे दिया ? तो बोली की ४० रूपये मे १००
तो हमने कहा कि किलो मे कैसे ?
तो वो बोली किलो नही ,४० रूपये मे १००
हमने कहा कि इतनी गिनती करोगी तो मुस्काराते हुए सर हिलाकर बोली हाँ

और जब हमने कहा कि गड़बड़ तो नही करोगी तो बोली नही
और हमारे कहने पर की ठीक है दे दो तो उसने जामुन गिनना शुरू किया और - मिनट मे जामुन से भरा पैकेट हमारे हाथ मे था :)
कहना पड़ेगा कि बड़े ही एक्सपर्ट अंदाज मे फटाफट गिनती करती है ये जामुन बेचने वाली

पहले जामुन कभी गिनती करके नही खरीदा बनारस ,इलाहाबाद और दिल्ली मे तो दरवाजे पर (घर )जामुन वाला सिर पर टोकरी लिए आता थाबनारस (६०-७० मे ) मे तो जामुन वाले एक स्टैंड सा भी साथ लेकर चलते थे जिसपर वो जामुन की टोकरी रखते थेऔर फ़िर जामुन को तौल कर मिटटी की हंडिया मे जामुन और नमक -मसाला मिलाकर झोरता (हिलाता ) था और दोने मे देता था और उस को खाने मे बड़ा ही मजा आता था और कोई -कोई जामुन वाले - अलग-अलग माप के लकड़ी का डिब्बा सा भी रखते थे और जितनी की जामुन लेनी हो उसी माप के डिब्बे मे जामुन डालकर नमक लगाकर झोरते थे और फ़िर दोने मे देते थे

और दिल्ली मे तो इंडिया गेट के आस-पास थोडी-थोडी दूर पर जामुन बेचते हुए लोग दिखाई देते है और कई बार तो पेड़ के नीचे चादर फैलाए हुए भी दिखाई देते है क्योंकि बारिश के मौसम मे जब हवा जोर से चलती है तो जामुन को ये लोग चादर पर catch करते है और फ़िर ढेर बना कर बेचते हैआपने तो देखा ही होगा

यहाँ तो जामुन मिलनी शुरू हो गई है और हमने खाना भी शुरू कर दिया है और आप लोगों के यहाँ जामुन मिलनी शुरू हुई या नही:)

Saturday, March 28, 2009

भई है तो ये गाना बहुत पुराना पर आज भी इसके एक-एक बोल बिल्कुल सोने के जैसे खरे हैउस समय की हिट चौकडी यानी राज कपूर ,मुकेश,शैलेन्द्र और शंकर जयकिशन का कोई मुकाबला नही हैतो लीजिये हम ज्यादा बक-बक नही करते है और आप लोगों को गीत सुनने देते है
वैसे आप को याद है कि आज रात साढ़े आठ बजे से साढ़े नौ बजे तक यानी एक घंटे earth hour के लिए लाइट बंद रखनी है

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Friday, March 27, 2009

इस साल मार्च मे जब से IPL के मैचों की घोषणा हुई है तब एक तरह का घमासान सा चल रहा है । पहले तो IPL की तारीखों के ले कर सरकार और B.C.C.i.और IPL के ललित मोदी के बीच खींच - तान चलती रही । क्योंकि देश मे लोक सभा चुनावों की घोषणा भी मार्च मे ही हुई और चुनाव देश के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है । ये तो सभी जानते है ।

और चूँकि अब चुनाव ५ फेज मे हो रहा है यानी १६ अप्रैल से १३ मई तक पोलिंग और १६ मई को counting यानी पूरा एक महीना । और IPL के मैच भी १० अप्रैल से शुरू होकर २४ मई तक होने थे । ऐसे मे जो तारीख ललित मोदी कहते उसमे गृह मंत्रालय राजी नही होता क्योंकि सुरक्षा की जरुरत चुनाव और IPL दोनों को है । अब ये दूसरी बात है कि मोदी और B.C.C.i.को शायद ऐसा नही लग रहा था ।और IPL होने पर इन लोगों को हजार करोड़ का नुक्सान उठाना पड़ता सो अलगवो भी आज के recession के समय मे

हालाँकि चुनावों के मद्दे-नजर कई बार मैच की तारीखें बदली गई पर हर बार गृह मंत्रालय जब राज्य सरकारोंसे सुरक्षा देने की बात पूछता तो राज्य सरकार जहाँ पर ये IPL मैच होने थे ,ने भी सुरक्षा देने से इनकार किया तो आख़िर मे ललित मोदी ने IPL को भारत के बाहर दक्षिण अफ्रीका मे करवाने का एलान किया । और अब १८ अप्रैल से मैच शुरू हो जायेंगे और मई तक चलेंगे ।

इस बार लगता है IPL और ललित मोदी के दिन कुछ ठीक नही चल रहे है । अभी कुछ दिन पहले ललित मोदी के ख़िलाफ़ एक scam की ख़बर भी आई थी और उसके कुछ दिन बाद ही ललित मोदी के राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन का चुनाव हारने की ख़बर भी आई ।

खैर , वैसे इस बार IPL की टीमों मे भी कुछ-कुछ गड़बड़ हो रही है । जैसे अब रॉयल चैलेंजर की टीम के कप्तान राहुल द्रविड़ नही बल्कि केविन पीटरसन होंगे । अभी तो एक ही कप्तान है पर कहीं नाईट राईडर्स टीम का असर न पड़ जाए । :)
क्योंकि कोलकता नाईट राईडर्स टीम मे इस बार एक नही दो नही बल्कि चार कप्तान होंगे ऐसा इस टीम के coach का कहना है । पर सौरभ दादा इस बात से ज्यादा खुश नही है ।

अब दादा को तो नाखुश होने की आदत सी हो गई है । माना कि अभी तक देश के वो सबसे सफल कप्तान रहे है पर धोनी की टीम इंडिया के जीतने पर भी वो खुश नही होते है । जैसे जब धोनी की टीम अपने देश मे जीतती है तो दादा कहते है कि विदेश मे जीत कर दिखाओ । और जब विदेश मे जीतती है तो कहते है कि टेस्ट मैच जीतकर दिखाओ । टेस्ट जीत जाए तो भी दादा ये मानने को तैयार नही कि इस समय जो टीम है वो बेस्ट टीम है बल्कि सौरभ का कहना है कि ये टीम best नही better है । खैर जाने दीजिये ।

और हाँ इस बार नाईट राईडर्स की ड्रेस भी बदली जा रही है । कैसी होगी वो तो १८ अप्रैल को पता चल ही जाएगा ।

IPL के देश के बाहर होने से हम ये सोच रहे है की कोलकता नाईट राईडर्स का NDTV IMAGINE पर चीयर लीडर्स ( जिन्हें ये लोग angel कह रहे है ) चुनने के लिए जो डांस शो हो रहा है उसमे दादा (सौरभ) और उनके साथ टीम का ही एक और क्रिकेटर और एक कोई फिल्मी हीरो या हेरोइन जज बन कर लड़कियों का डांस देख कर उन्हें select कर रहे थे जिससे की ये लड़कियां ग्राउंड मे मैच के दौरान खिलाड़ियों को चीयर करें और साथ ही साथ जनता को भी । पर अब जब IPL साउथ अफ्रीका चला गया है तो अब इन चीयर लीडर्स का क्या होगा ।

क्या शाह रुख इन चीयर लीडर्स को भी साउथ अफ्रीका ले जायेंगे टीम को चीयर करने के लिए ? :)

Thursday, March 26, 2009

अब जैसा की टाटा ने वादा किया था हिन्दुस्तान की जनता को लखटकिया कार देने का तो वो इंतजार ख़त्म हुआ और टाटा ने तीन दिन पहले अपना वादा पूरा किया । मुंबई मे पूरे शान-ओ- शौकत से nano को लॉन्च किया गया । और इस कार के एक नही बल्कि ३ नए मॉडल लॉन्च किए गए है । और हर मॉडल का दाम और सुविधाएं (फीचर्स)अलग -अलग है ।

वैसे टाटा ने एक लाख की कार का वादा किया था पर सबसे कम दाम वाली कार एक लाख बारह हजार की है (मतलब लाख से ऊपर) जिसमे न तो ए.सी.है और न ही स्टीरियो है पर हाँ इन सबके लिए कार मे स्पेस दिया हुआ है जिससे अगर कार लेने वाला चाहे तो बाद मे अपनी सुविधा से ए.सी.और स्टीरियो लगवा सकता है ।

बाकी के दूसरे मॉडल जैसे CX और LX मे जहाँ दाम ज्यादा है वहीं इन मॉडल मे ए.सी और स्टीरियो के साथ ही साथ कुछ और नए फीचर्स भी है । कार के रंग से भी जैसे अगर मेटलिक है तो कार का दाम ज्यादा हो गया है । इसके अलावा हर शहर मे भी nano का दाम अलग है । और सबसे महँगी एक लाख पचासी हजार (१.८५ )की होगी ।

जितना कुछ nano के बारे मे पढ़ा और देखा है उससे लगता है ये nano काफ़ी हलकी-फुलकी कार है पर sturdy हो सकती है क्योंकि टाटा ने जो इसे बनाया है । और आम तौर पर टाटा की सभी गाडियाँ काफ़ी sturdy है । इस nano मे ४ लोग आराम से और ५ लोग जरा कम आराम से बैठ सकते है । :)

अब ये देखने मे इतनी छोटी और हलकी लग रही है जिसे देख कर लगता है कि अगर कहीं दिल्ली जैसे शहर मे इसे किसी ने ठोंक दिया तो क्या होगा ।

वैसे nano के लिए कहा जा रहा है इसने head on test और roof test माने अगर nano की छत पर कुछ भारी-भरकम गिर जाए तो भी nano उसे झेल सकने मे सक्षम है । अब एक्चुअल मे nano कितनी sturdy होगी ये तो बाद मे ही पता चलेगा ।इसके माइलेज के लिए कहा गया है कि एक लीटर मे २३ कि. मी .चलेगी । पर इसकी पेट्रोल की टंकी काफ़ी छोटी है सिर्फ़ १५ लिटर की कैपसिटी है । और सबसे गड़बड़ इसकी डिक्की बहुत ही छोटी सी है ।(ना के बराबर) पर भाई जब कार ही इतनी छोटी और हल्की (इसका kerb weight ६०० किलोग्राम है ) और इसका इंजन ६२४ ccc का है । पर हाँ इसकी head light देखने मे बड़ी सुंदर लग रही है । (eye shaped)

nano के आने से हर शहर मे ट्रैफिक तो जरुर बढेगा और parking का तो भगवान ही मालिक है ।जब आज के समय मे क्या दिल्ली क्या लखनऊ,और क्या गोवा ,किसी भी शहर मे शाम के समय बाजार या सिनेमा हॉल मे parking मिलना और कार पार्क करना इतना मुश्किल है ये तो हम आप सभी जानते है । पर nano के आने के बाद क्या होगा ?

वैसे nano की बुकिंग ९ अप्रैल से २५ अप्रैल के बीच होगी तो आप बुक करा रहे है या नही । हम तो सोच रहे है कि बुक करा ही ले । भई लखटकिया न सही डेढ़ लखटकिया ही सही । :)




Wednesday, March 25, 2009

आप लोग भी सोच रहे होंगे कि हम भी कहाँ सुबह-सुबह चमगादड़ (bats)की बात ले बैठे है । पर क्या करें । यहाँ गोवा मे इन सब जीवों से फ़िर से मुलाकात जो हो गई है । :)

अब है तो ये सवाल थोड़ा बेतुका पर क्या करें । असल मे यहाँ हमारे घर मे जो पेड़ है जिसमे कु चमगादड़ भी रहते है । वैसे पेड़ मे लटके हुए ये काफ़ी अच्छे लग रहे है । ( वैसे भी फोटो तो दिन में खींची है और ये एक साल पुरानी फोटो हैअरे मतलब की अब ये चमगादड़ भी बड़े हो गए है) दिन भर तो नही पर हाँ शाम को जैसे ही अँधेरा होने लगता है कि ये पेड़ से निकल कर चारों ओर उड़ने लगते है । और कभी-कभी काफ़ी नीचे-नीचे उड़ते है । कई बार तो ऐसा लगता है कि सिर छूते हुए ही उड़ रहे है । तो इस डर से की कहीं ये सिर के बाल ना नोच ले ,हम झट से सिर को हाथ से ढक लेते है ।

हम लोग रोज शाम को बाहर बैठते है पर जैसे ही चमगादड़ उड़ने लगते है तो हम लोग घर के अन्दर आ जाते है । वो क्या है कि हमेशा से सुनते आ रहे है कि अगर चमगादड़ सिर पर बैठ जाए तो वहां से बाल नोच लेता है । इसीलिए चमगादड़ को देखते ही हम घर मे आ जाते है और नही तो सिर को ढक लेते है ।

हालाँकि हमारे पतिदेव का मानना है कि ऐसा कुछ नही होता है और ये सब बेकार की बातें है । अक्सर शाम के समय जब चमगादड़ निकलते है तो इस बात को लेकर हम दोनों मे बहस भी हो जाती है और आख़िर मे हम यही डाईलौग कि अगर चमगादड़ सिर पर बैठ जाए तो वहां से बाल नोच लेता है मारकर घर में जाते है:)

वैसे अगर कभी आप गोवा मे आए हुए हो और patto ब्रिज जो मांडवी नदी पर बना है ,उससे कभी गौधूली के समय आ या जा रहे हो तो जरा गौर से देखियेगा तो आप देखेंगे कि बाहर से झुंड के झुंड चमगादड़ शहर की ओर उड़ते चले आ रहे होते है ,
छोटे-बड़े हर साइज़ के । :)

Monday, March 23, 2009

जैसा कि हमने अपनी पिछली पोस्ट मे कहा था सो कल हमने गुलाल देख ली । फ़िल्म तो अच्छी है ,और फ़िल्म मे यूनिवर्सिटी और स्टेट लेवल की राजनीति दिखाई गई है पर गाली कुछ ज्यादा बोली गई है । हालाँकि इस फ़िल्म मे काफ़ी मार-पीट और खून-खराबा है पर फ़िर भी फ़िल्म देखने के बाद भी सिर मे कोई भारीपन नही महसूस होता है । ये शायद अनुराग कश्यप के डायरेक्शन का कमाल है । इस फ़िल्म मे भी राम लीला को बीच-बीच मे कहानी के साथ जोड़ा गया है बिल्कुल delhi 6 की तरह फ़िल्म के पहले सीन की शुरुआत के.के से होती है और आखिरी सीन की ...... से


फ़िल्म की शुरुआत मे एक सीधा सा लड़का दिलीप सिंह law करने के लिए जयपुर कॉलेज - यूनिवर्सिटी मे admission लेता है और वो रहने के लिए एक जगह कमरा किराये पर लेता है जहाँ उसकी मुलाकात रानाजय से होती है ।और जब दिलीप हॉस्टल मे वार्डन से मिलने जाता है तो हॉस्टल मे दादा टाइप लड़के कैसे पहले दिन ही उसकी रैगिंग करते है (बुरी तरह)और जब रानाजय को पता चलता है तो वो उसके साथ उन लड़कों की पिटाई करने जाता है पर .... । और फ़िर किस तरह चाहते हुए भी दिलीप राजनीति मे आता हैऔर जनरल सेक्रेटरी का इलेक्शन जीत जाता हैऔर फ़िर कैसे सारे हालात बदल जाते है किस तरह एक सीधे लड़के का जीवन फंस जाता है इस politics के चक्कर मे

यूँ student politics पर पहले भी फिल्में बनी है पर इसमे politics के साथ-साथ राजपूताना के अलग राज्य की मांग को भी दिखाया गया हैराजा और रजवाडों को दिखाया गया हैकिस तरह इलेक्शन जीतने के लिए क्या-क्या घपले किए जाते है और कैसे बाद मे अपने ही विरोधी के साथ लोग मिल जाते हैये अच्छा दिखाया गया हैपूरी फ़िल्म कहीं भी रुकती नही है

कुछ डाइलोग जैसे - जब कुछ नही है करने को तो law कर लोवैसे ७०-८० के दशक मे ऐसा कहा भी जाता था और होता भी था । :) और उस ज़माने मे यूनिवर्सिटी मे नेता टाइप लोग law ही किया करते थे जिससे वो लोग यूनिवर्सिटी मे भी रह सके और इलेक्शन भी लड़ सके
और दीवार के सीन मेरे पास माँ है का एक अलग ही नजारा देखने को मिलता हैऔर जो brain wash दिखाया गया उसके बारे मे पहली बार ८० मे हमने अपने कजिन जो कि उस समय मोती लाल इंजीनियरिंग कॉलेज इलाहाबाद मे पढता था ,सुना था

इस फ़िल्म मे एक्टिंग किसने सबसे अच्छी की है ,कहना मुश्किल है क्योंकि हर छोटे-बड़े कलाकार ने बेहतरीन अभिनय किया है फ़िर वो चाहे के.के.मेनन हो या आदित्य श्रीवास्तव हो या अभिमन्यु सिंह , या फ़िर नया हीरो राज सिंह चौधरी या फ़िर भाटी के रोल मे दीपक दोब्रियाल ही क्यों होयहाँ तक की जेसी रंधावा जो की एक मॉडल है उसने कम बोलते हुए सिर्फ़ आंखों से expreesion दिए हैमाही गिल और किरण के रोल मे आयेशा मोहन ने भी अच्छा अभिनय किया है . और सबसे अच्छे लगे पियूष मिश्रा जिन्होंने के.के.मेनन के बड़े भाई पृथ्वी का रोल किया हैफ़िल्म मे उनका किरदार भी बहुत अहम् हैमेनन और श्रीवास्तव राजपूत बनकर गजब के लगे है

सिर्फ़ शब्दों मे कहें तो गुलाल मतलब politics ,पॉवर ,और पैसा है

इस फ़िल्म के गानों के बोल बहुत असाधारण से लगे और आखिरी गीत वो दुनिया भी बहुत पसंद आयाइस गीत के एक-एक शब्द आज के समय मे बिल्कुल फिट बैठते हैऔर इस गीत की आखिरी लाइन और आखिरी सीन का फिल्माया जाना एक सवाल और जवाब छोड़ता हैतारीफ करनी होगी पियूष मिश्रा की जिन्हने इन गीतों को लिखा ,संगीतबद्ध किया और गाया भी हैवैसे ये गीत कुछ-कुछ प्यासा के गीत से इंस्पायर्ड है । तो आप भी सुनिए ये गीत ।

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