Friday, January 1, 2016

नव वर्ष २०१६ का आगाज हो चुका है इस अवसर पर आप सभी को हार्दिक बधाई । बहुत लोग हर साल जब नव वर्ष आता है तो बहुत सारे वादे अपने आप से करते है पर जैसे जैसे समय बीतता है वो अपने से किये गये वादे भूलने लगते है । बहुत कम या यूँ कहे कि विरले ही होते है जो अपने आप से किये कुछ वादे पूरे कर पाते है ।

हम भी पिछले दो सालो से हर नये साल मे यह सोचते थे कि हम वापिस अपने blog पर लिखना शुरू करेगे पर हर बार बस सोच-विचार कर ही रह जाते थे । इसलिये इस साल हमने कुछ भी प्लान नहीं किया है पर हाँ मन में ये विचार ज़रूर है कि इस बार हम blog लिखना नहीं छोड़ेंगे । अब देखना है कि हम इस पर कितना क़ायम रह पाते है । :)

तो इसी बात पर आप सबको नये साल की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें ।

Thursday, December 17, 2015

३ साल पहले १६ दिसमबर के दिन जो वीभतस घटना हुई थी जिसमें निरभया (जिसका असली नाम जयोती सिंह है ) की मृत्यु हो गई थी ,पर कया आज ३ साल बाद कुछ भी बदला है । ये लिखते हुये बेहद अफ़सोस हो रहा है कि आज भी हालात में बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं हुआ बल्कि हालात ख़राब ही हुये है ।

इस वीभतस घटना के बाद ऐसा लग रहा था कि जूवीनाईल क़ानून में कुछ बदलाव किया जायेगा पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ । ना तो सरकार ना ही उचच न्यायालय ना ही उच्चतम न्यायालय ने इस के लिये कुछ किया । जबकि देश का क़ानून ऐसा होना चाहिये कि अपराधी भले ही नाबालिग़ क्यों ना हो सजा तो उसे भी वही होनी चाहिये जो एक निर्मम अपराधी की होती है । जब वो अपराध करता है तो सजा का भी हक़दार है । हमारे देश का क़ानून कहता है कि भले ही गुनहगार छूट जाये पर किसी बेगुनाह को सजा नहीं होनी चाहिये पर इस केस में तो गुनहगार सामने था पर सिर्फ़ इसलिये कि वो नाबालिग़ था उसे सिर्फ़ ३ साल की सजा दी गई जो कि ठीक नहीं था । जब अपराध करते हुये उसने सबसे अधिक निर्ममता दिखाई तो फिर उसे जुवीनाईल कहकर कम सजा देना बहुत बड़ी ग़लती है ।

अब जब वो जेल से छूटने वाला है तो वो किसी की निगरानी में नहीं रहना चाहता है । अब वो अपने साथ हुये अत्याचार के बारे में बताकर कि बचपन से उसका शोषण हुआ है इसलिये वो ऐसा अपराधी बन गया । पर क्या उसका ये कहना उसके इस अपराध को कम कर देताहै ?

उस माँ- बाप और उस परिवार की पीड़ा जिसने अपनी बेटी इन लोगो के वहशीपन कारण खोई है जो आज भी सिर्फ़ न्याय के लिये लड़ रहे है । और उनका ये कहना बिलकुल ग़लत नहीं है कि इसकी क्या गारण्टी कि ये नाबालिग़ जो अब बालिग़ हो गया है वो अब दोबारा ऐसा अपराध नहीं करेगा ।इस तरह के अपराधी में मानसिकता और सोच विकृत और ख़राब होती है ।

आज भी दिल्ली में वही हाल है ,दिल्ली सरकार या केन्द्र सरकार या फिर पुलिस चाहे कितने दम भर ले कि अब महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के मामले कम हुये है पर ऐसा बिलकुल भी नहीं है हर रोज़ न्यूज़ चैनल हो या फिर अख़बार उनमें आज भी मासूम लड़कियों के साथ इस तरह के जघनय अपराध होने के समाचार होते है ।

जब तक देश का कानून सखत नही होगा , तब तक क़ानून का डर ऐसे लोगों के दिल में नहीं होगा क्योंकि उन्हे मालूम है कि वो ऐसा निर्मम अपराध करके भी बच सकते है । इसलिये क़ानून और सजा को सख़्त करने की ज़रूरत है ।










Friday, December 11, 2015

कुछ दिन पहले लिखी पोस्ट में जैसा कि हमने कहा था कि ३० नवम्बर के टाइम्स लिटफेस्ट के बारे में लिखेंगे तो लीजिये हम अपने वादे के मुताबिक ३० तारीख के सेशन के बारे में लिख रहे है । पर थोड़ी देर से लिख रहे है । :)

इस दिन बहुत जल्दी करने के बाद भी हम करीब १२ बजे के आस -पास पहुंचे जिसका हमें काफी अफ़सोस था क्यूंकि सुबह का सेशन जगदीश भगवती का था , और ये सेशन ११.३० बजे ख़त्म होना था और साढ़े ग्यारह बजे से रवीश कुमार और विनीत कुमार की दिल्ली की प्रेम कहानियाँ पर सेशन होना था जो हमें लग रहा था की हमसे छूट जायेगा पर खैर चूँकि शायद जगदीश भगवती जी का सेशन देर से ख़त्म हुआ तो रवीश जी का पूरा सेशन देखने को मिला।

इस किताब में रवीश जी और विनीत कुमार ने जो रोज के जीवन में बस और मेट्रो में लड़के-लड़की की बात चीत ,इश्क और प्यार को बखूबी और बहुत ही रोचक अंदाज़ में लिखा है। उन दोनों ने अपनी किताब से कुछ बहुत ही दिलचस्प और छोटी -छोटी सी प्रेम कहानियां पदक कर सुनाई. इस किताब में सभी कहानियों को बड़े ही रोचक कार्टून की मदद से दिखाया गया है।जिसे विक्रम ने बनाया है । संक्षेप में ये एक छोटी,अच्छी,रोचक और दिलचस्प किताब है जिसे पढ़ते हुए आप बोर नहीं होंगे. हालंकि इसकी कीमत बहुत कम है ।इस सेशन के अंत में भी सवाल जवाब हुए जिसमे एक लड़के ने पुछा की वो बिहार का है और चूँकि दिल्ली की लडकियां हाइट में लम्बी होती हैउससे उन्हें काम्प्लेक्स हो जाता है तो इसका जवाब उन्होंने दिया की दिल्ली में हर जगह से लडकियां आती है मतलब हर प्रदेश से पर यहाँ आकर सब उन्हें दिल्ली वाली लड़कियां कहते है.

सेशन ख़त्म होते ही हम फुल सर्कल यानी बुक शॉप पर गए तो वहां पर सिर्फ एक ही किताब बची थी खैर हमने रवीश जी
की किताब खरीदी और उस पर उनके हस्ताक्षर भी कराये और उसी समय हमने उन्हें अपना परिचय भी दिया पर वहां
इतनी भीड़ थी की ज्यादा बात नहीं हो पाई।


इसके बाद हम लोग गुरशरण दास और शुभाशीष गंगोपाध्या वाला सेशन देखा जिसमे उन्होंने एक माउस मर्चेंट की कहानी सुनाई कि कैसे एक लड़के ने अपने गाँव के सबसे अमीर आदमी से एक मरे हुए चूहे को माँगा और किस तरह उस मरे हुए चूहे को उसने एक औरत जिसके पास बिल्ली थी उसे बेचा और उस औरत ने उसे पैसे दिए जिससे उसने कुछ चना और पानी लिया और किस तरह उस चने और पानी बेचकर अपना बिसिनेस एम्पायर खड़ा किया और किस तरह वो सबसे अमीर आदमी बन गया और फिर एक दिन उसने एक सोने का चूहा बनवाया और उसे लेकर गाँव के उस सबसे अमीर आदमी के पास गया और उससे दिया तब उस अमीर आदमी ने उसे वो सोने का चूहा वापिस करते हुए उससे उसके अमीर बनने की सारी बातें सुनी और फिर उससे अपनी बेटी की शादी कर दी. किताब ख़रीदने के बाद देखा कि उसके लेखक गुरशरण दास नहीं बल्कि अरशिया सतार है। दास साब ने सिर्फ़ introduction लिखा था । :(

इसके बाद उर्दू लेखन पर सैफ महमूद का सेशन देखा जिसमे उन्होंने उर्दू के शायरों और शायरी के बारे में बहुत कुछ
बताया और किस तरह उर्दू भाषा ख़त्म हो रही है और सरकार को इस तरफ ध्यान देना चाहिए और किस तरह उर्दू भाषा में लिखने वालो की कमी होती जा रही है ,पर पूछने पर की उर्दू अकादमी को क्या कुछ नहीं करना चाहिए तो उन्होंनेजवाब दिया की उर्दू अकादमी से इस तरह की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए ।

इसके बाद शोभा डे ,पद्मा देसाई भगवती और नीलांजना रॉय का सेशन जो( modern women as public enemy no.1) पर था उसमे काफी रोचक बातचीत हुई और पद्मा देसाई ने अपनी पहली शादी और और फिर उसका टूटना और फिर किस तरह वो जगदीश भगवती से मिली और उनसे शादी हुई। उनका कहना था की मॉडर्न का मतलब आत्मनिर्भर होना है। ;शोभा डे ने बताया की हमारे यहाँ पहनावे से लोग स्त्री मॉडर्न मानते है उन्होंने ने कहा कि पहले दिन वो साड़ी पहनकर आई थी तो सबने उन्हें नमस्कार करके स्वागत किया था पर आज चूँकि वो वेस्टर्न कपड़ों में थी तो सबने उन्हें हैलो मैम और गुड इवनिंग मैम कहकर सम्बोधित किया । :)

इस सेशन के बाद ( cutting cancer down the size) में डॉ. माहेश्वरी , प्रिया दत्त , मनीषा कोइराला ,डा ़भावना सिरोही,और हरमाला गुप्ता की बातें जागरूक करने वाली थी । जैसे कि केयर गिवर (care giver) किस तरह कैंसर के मरीज़ को इमोशनल सपोर्ट दे सकते है । परिवार और दोस्त कितने अहम होते है़ । डा़ सिरोही ने बताया कि नियमित चेक अप कराते रहना चाहिये ।योगा ,व्यायाम और सही डाइट से शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और मज़बूत होते है । इसी सेशन में प्रिया दत्त ने बताया कि वो बोन मैरो बैक शुरू कर रही है जो कि बहुत अच्छा है । इस सेशन की सबसे मज़ेदार बात थी कि इस का आयोजन रजनीगंधा ने किया था । :)

इसके बाद का सेशन सलमान ख़ुर्शीद का था पर उसे हम पूरा देख नहीं पाये । इसके बाद भी एक और सेशन था पर चूँकि तब तक हम थक गये थे इसलिये हम घर लौट आये । :( :)




























Wednesday, December 2, 2015

टाईम्स ऑफ इंडिया  लिटफेस्ट  दिल्ली २८,२९,३० नवंम्बर को मेडन  होटल ,७ शाम नाथ मार्ग  में आयोजित  किया गया था  , २९ और ३० नवम्बर को हम भी गए थे , वहां पांच अलग -अलग  जगहों पर सुबह १० बजे से शाम ८बजे तक सेशन चलते रहते थे नौर हर सेशन के ख़त्म होने के १० मिनट पहले या यूँ कह  ले कि सेशन के आखिर में जनता  गेस्ट  पैनल से सवाल पूछ सकती थी.  आयोजकों की तारीफ़ करनी होगी की वो किसी भी  गेस्ट को निर्धारित समय से ज्यादा नहीं बोलने  थे  और अगर कोई जरा ज्यादा समय लेता था तो पहले तो वो एक स्लिप देते  तब भी सेशन ख़त्म नहीं होता था तो बजर  बजा देते थे।   :)

२९ को हमने ३-४ सेशन देखे।  सबसे पहले शोभा डे  और सुनील खिलनानी , पैट्रिक फ़्रेंच  और सिद्धार्थ वरदराजन  का सेशन देखा।
  उसके बाद देवदत्त पटनायक और  दिलीप  पडगाओंकर  के बीच का सेशन बहुत ही रोचक और अच्छा था जिसमे  देवदत्त ने माया के ऊपर एक बहुत ही रोचक किस्सा सुनाया  कि एक बार एक गुरु अपने शिष्यों के साथ जंगल से आ रहे थे तभी एक हाथी सामने आ  गया तो गुरु जी  दौड़े तो उनके पीछे उनके शिष्य भी दौड़ने लगे , गुरु जी दौड़कर  सुरक्षित स्थान पर पहुँच  कर रुक गए  तो उनके शिष्य भी रुक गए और उन्होंने गुरु जी से पुछा की आप हाथी देख कर भागे क्यों तो गुरु जी ने कहा कि  हाथी का आना भी माया था और हमारा वहां से भागना भी माया था।   :)

इसी तरह की और भी बहुत सारी दिलचस्प बातें बताई।
इसके बाद जयराम रमेश अरुण मायरा ,और स्वामीनाथन अइयर के बीच नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह के बारे में
कुछ बातें हुई जैसे कि  नरसिम्हा  राव की सरकार के समय जब रिफार्म  किये गए तब उन्होंने मनमोहन सिंह से कहा कि अगर  कुछ भी गड़बड़ हुई तो उसकी जिम्मेदारी मनमोहन सिंह की और अगर सफल हुआ तो उसका क्रेडिट नरसिम्हा राव को जाएगा  .

इसके बाद शाम को शेखर गुप्ता, रवीश कुमार  ,रेघा झा, और नलिन मेहता के बीच  (is mass media dying . पत्रकारिता का भविष्य ) बात भी काफी दिलचस्प थी , जिसमे रवीश जी ने बताया कि चूँकि वो खुद न्यूज़ कम  देखते है
और  सेशन में आने के लिए उन्होंने जब न्यूज़ कुछ चैनल देखे  तो  प्राइम टाइम  में उनमे से ज्यादातर भूत प्रेत वगैरा के बारे में ही दिखा रहे थे. और किस  तरह  न्यूज़ चैनल का  स्तर नीचे हो रहा है. इसके बाद सवाल जवाब शुरू हुए  और हमने भी एक सवाल पुछा कि  न्यूज़ चैनल  का स्तर गिर रहा है और ऐसी न्यूज़ से यंग जनरेशन पर खराब असर पड़ता है तो रवीश जी ने कहा  की आप न्यूज़ मत देखिये।   :) हालाँकि हमें उनसे  इस तरह के जवाब की उम्मीद नहीं थी  क्यूंकि न्यूज़ चैनल आजकल न्यूज़ कम दिखाते है.
इसी सेशन में ब्रेकिंग न्यूज़ के लिए रवीश जी ने बड़ी ही मजेदार बात कही की ब्रेकिंग न्यूज़ की जगह वीयूंग न्यूज़ होना चाहिए।

इसी सेशन में एक लड़के ने रवीश जी से पुछा कि  आपने   अपने ब्लॉग के आखिर में ये क्यों लिखा है कि सब कुछ बनना बस रवीश कुमार मत बनना. तो रवीश जी ने जवाब दिया कि  भले ही आप किसी को  फॉलो करो पर blindly फॉलो मत करो     जो सही भी है.
इसी तरह की बातों के बीच सेशन खत्म हुआ और हम भी वापिस घर को चल दिए :)

बड़े दिन बाद पोस्ट लिखी है और कुछ लम्बी भी हो गयी इसलिए ३० तारिख के सेशन के बारे में कल लिखेंगे।  :)




Wednesday, July 4, 2012

बात 2010-2011 की है उस समय लखनऊ में हमारा बेटा पढ़ रहा था और जब भी दिल्ली शताब्दी या दुरंतो से आता था तो वो अक्सर टिकट का प्रिंट आउट लिए बिना ही ट्रेन board करता था और ट्रेन में टी.टी.को प्रिंट आउट की जगह एस.एम.एस. में टिकट दिखाने पर हर बार 50 या 100 रूपये का फाईन  देना पड़ता था।. और हम हमेशा उससे कहते थे की पहले से टिकट क्यूँ नहीं निकाल कर रखते हो।. हर बार फ़ालतू में फाईन देते हो।.

और ऐसा ही एक बार हमारे साथ भी हुआ।. 2011 की बात है  हम लोग शताब्दी से भोपाल  से दिल्ली आ रहे थे और उस बार हम लोगों के पास  टिकट का प्रिंट आउट नहीं था जबकि फ़ोन में एस.एम.एस. में टिकट का पूरा डिटेल था यानी पी .एन.आर. नंबर वगैरा था पर उस समय टी.टी.उस पर यकीन नहीं कर रहा था और बार--बार टिकट प्रिंट आउट के लिए  ज्यादा जोर दे रहा था . जबकि  उसे अपना आई.डी वगैरा भी दिखाया  था।.और बस वो अपनी ही बात बार--बार दुहरा रहा था और ऐसा जता  रहा था मानो हम लोगों बिना टिकट यात्रा कर रहे हो।.   हम लोगों ने उससे कहा की ठीक है अगर आप इसे नहीं मान रहे  है  तो पेनेल्टी  ले लो . तब अचानक ही वो सुधर गया और कहने लगा की नहीं ठीक है।.

और अब आप लोगों ने भी देखा होगा की आजकल रेलवे की साईट (irctc )पर जब टिकट बुक करते है तो साइड में लिखा रहता है की paperless यात्रा कीजिये . टिकट के  प्रिंट आउट के बजाय फ़ोन में आये हुए एस.एम.एस को ट्रेन में टी.टी.को दिखाइए।.

समय कैसे और कितनी जल्दी बदल जाता है की  अब  रेलवे की वेब साईट पर ही लिख रहे है की paperless  travel कीजिये। जबकि पिछले साल तक paperless यात्रा पर फाईन देना पड़ता था। :(


Friday, June 29, 2012

नौ साल बाद हम  दिल्ली वापिस लौट आये है। नौ साल पहले जब दिल्ली से अंडमान गए थे तब कभी सोचा नहीं था कि इतने लम्बे अरसे तक हम बाहर रहेंगे।  पहले अंडमान फिर गोवा और उसके बाद अरुणाचल प्रदेश।

नौ साल दिल्ली बाद लौटने पर लगा की दिल्ली तो बदल ही गयी  है।  यूँ तो दिल्ली अब फ्लाई ओवर सिटी हो गयी है और मेट्रो चलने लगी है। और पहले जहाँ ज्यादातर छोटी कारे दिखती थी अब वहीँ बड़ी-बड़ी कारें दिखाई देने लगी है। पहले जहाँ एक एक-दो मॉल होते थे वहीँ अब हर जगह मॉल  खुल गए है। अब  ऐसा नहीं है की इन नौ सालों में हम दिल्ली न आये हो पर दिल्ली में भीड़-भाड़ पहले के मुकाबले बहुत ज्यादा बढ़ गयी है।

और दिल्ली का मौसम बाबा रे बाबा ! इतने सालों में इतनी जबरदस्त गर्मी झेलने की आदत ख़त्म हो गयी है क्यूंकि चाहे अंडमान  हो या गोवा या फिर अरुणाचल सभी जगह बहुत बारिश होती है जिसकी वजह से मौसम बहुत ही सुहावना रहता था। सच हम इन जगहों का मौसम बहुत मिस करेंगे।  

पर फिर भी दिल्ली दिल्ली है क्यूंकि यहाँ रहते हुए आप बाहर वाले नहीं  कहलाये  जाते है क्यूंकि अंडमान वाले  दिल्ली वालों को  mainland वाले  कहते थे तो गोवा वाले non -goan  और अरुणाचल में  non- tribal .
वैसे भी  हर जगह की अपनी ही खासियत होती है।


खैर अब चूँकि हम दिल्ली में पूरी तरह से सैटल हो गए है तो अब कोशिश रहेगी की हम वापिस जोर-शोर से ब्लॉग लिखना शुरू कर दे।  :)




Thursday, February 23, 2012

कुछ अजीब सी ख़ुशी महसूस हो रही है ये लिखते हुए कि हमें ब्लॉगिंग करते हुए पांच साल हो गए है जो कुछ अद्भुत सा लग रहा है क्यूंकि जब हमने ब्लॉगिंग शुरू की थी तो सोचा भी ना था की इतने दिन तक हम ब्लॉग लिखेंगे और उसे लोग पढेंगे भी। :) पर आप सभी के हमारे बलॉग पढ़ते रहने के कारण ही हम ये पांच साल पूरे कर पाए।

हालांकि पिछले २ साल से हम बहुत ही कम लिख रहे है पर फिर भी जब भी हम कुछ लिखते है तो आप लोग उसे पढ़ लेते है और टिप्पणी भी करते है और यही हमारे हौसले को बढाने के लिए काफी है।

वैसे २००९ मे जहाँ stats काउंटर ने २५ हजार दिखाया था वहीँ आज ७६ हजार से भी ज्यादा का आंकड़ा दिखा रहा है जो हमारे खुश होने के लिए काफी है क्यूंकि जितना कम हम आजकल ब्लॉग लिख रहे है उस हिसाब से ये आंकड़ा अद्भुत ही है ।

जहाँ २००७ मे १६० पोस्ट और २००८ मे १६७ पोस्ट लिखी थी वहीँ २००९ मे ६५ पोस्ट तो २०१० मे २४ पोस्ट और २०११ मे सिर्फ २ पोस्ट लिखी थी । वैसे २०१० और २०११ मे हमने अरुणाचल प्रदेश की वादियों से नाम का भी एक ब्लॉग बनाया था जिसपर हम ने कुछ पोस्ट लिखी थी ।

खैर हमने दोबारा से ब्लॉग लिखना शुरू तो उम्मीद करते है की आप लोग इसी तरह हमारी पोस्ट पढ़ते रहेंगे और हमारी हौसला अफजाई करते रहेंगे।

आप सभी bloggers का बहुत-बहुत शुक्रिया ।