क्या आप रबर की सड़क के बारे मे जानते है। नही तो चलिए हम बता देते है। आजकल की बढ़िया सड़क के बारे मे तो हम लोग जान गए है बकौल लालू यादव हेमा मालिनी के गाल की तरह चिकनी , पर जब हम छोटे थे तब रबर की सड़क होती थी ।क्यों ये सुनकर आश्चर्य हुआ ना ।हमारे दादा खूब किस्से सुनाते थे। तब तो उनकी बातें सुनकर हम सब बच्चे आश्चर्य मे पड़ जाते थे ।ये रबर की सड़क का किस्सा उनमे से ही एक है।
अब ६५-७० के दशक मे तो इलाहाबाद की सड़कें तो फ़िर भी ठीक होती थी पर बनारस की सड़क कुछ अजीब सी तरह की होती थी कुछ उबड़-खाबड़ सी और खुरदरी सी और दिखने मे सफ़ेद। और गोदौलिया के चौराहे के पास तो गड्ढे भी होते थे ।सड़क ऐसी की अगर रिक्शे पर जाए तो पूरे शरीर का अंजर-पंजर ढीला हो जाए। इलाहाबाद और बनारस का क्या तब हर हाई वे बस लाजवाब ही होता था। इतनी पतली सड़क की दो गाड़ी आराम से निकल जाए तो गनीमत और उस पर सड़क के दोनों और मिटटी । बारिश मे तो और भी बुरा हाल हो जाता था इन सड़कों का।और बारिश मे जब भी सफर पर जाते तो लगता था की कहीं गाड़ी मिटटी के दलदल मे ना फंस जाए। (इलाहाबाद,बनारस,लखनाऊ ,कानपुर तो हम लोग अक्सर ही कार से जाया करते थे।)
ये बात तब की है जब एशिया ७२ का आयोजन भारत मे दिल्ली मे किया गया था। और देखने के लिए हमारे दादा दिल्ली गए थे।अब उस समय तो दिल्ली जाना ही बहुत बड़ी बात होती थी। और जब दादा दिल्ली से लौट कर आए तो सब बच्चों को जानने की उत्सुकता थी कि दिल्ली कैसा शहर है। अपने इलाहाबाद -बनारस से कितना फर्क है। और भी ना जाने कितनी सारी बातें दादा से पूछनी थी। दादा ने भी खूब मजे ले-लेकर हम सबको दिल्ली के बारे मे बताना शुरू किया की जब वो लोग रेलवे स्टेशन से होटल के लिए निकले तो सड़क पर टैक्सी फर्राटे से दौड़ने लगी ।जब कहीं भी गाड़ी ने झटका नही दिया तो उनका ध्यान सड़क की ओर गया तो वो ये देख कर दंग रह गए कि दिल्ली की सड़क तो रबर की बनी हुई है । दिल्ली की सड़क यहां(इलाहाबाद-बनारस) की तरह नही है बल्कि दिल्ली की सड़क तो रबर की बनी हुई है।ना गढ्ढा और ना ही उबड़-खाबड़ सड़क। बिल्कुल साफ और चिकनी ।दिल्ली शहर इतना साफ-सुथरा बिल्कुल लंदन और पेरिस की तरह।
हम लोगों का मुंह खुल गया क्या रबर की सड़क !
तो कार चलने से रबर की सड़क ख़राब नही होती है।
तो दादा बोले की अरे नही कार या बस चलने से सड़क मे कुछ भी नही होता है।
अब उस समय हम बच्चों को कुछ समझ नही आया और दादा की बात सुनकर हम लोगों को यकीन हो गया था की वाकई दिल्ली की सड़कें रबर की बनी होती है। और कुछ साल बाद थोड़े बड़े होने पर जब हम दिल्ली गए तब दादा की बताई हुई रबर की सड़क देखी और तब रबर की सड़क का राज समझ मे आया। और दिल्ली की सड़क देख कर लगा की दादा ने दिल्ली के बारे मे कुछ ग़लत नही कहा था । :)
Wednesday, May 21, 2008
रबर की सड़क
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Tuesday, May 20, 2008
आई.पी.एल की कुछ बातें
आई.पी.एल शुरू हुए एक महीना हो गया है और अब धीरे-धीरे आई.पी.एल की कमियां दिखनी शुरू हो रही है।एक महीने बाद अब बी.सी.सी.आई. सभी टीम के मालिकों को आई.सी.सी.के नियम -कानून के तहत चलने की राय दे रही है। तो क्या पहले बी.सी.सी.आई सो रही थी।अब किसी भी टीम का मालिक या खरीददार अपने खिलाड़ी या टीम से ड्रेसिंग रूम या मैदान मे नही मिल सकता है। लो भाई पहले तो टीम के जीतने पर प्रीटी जिंटा हो या शाह रुख खान हो फटाक से मैदान मे अपनी टीम के पास पहुँच जाते थे। पर तब तो किसी ने कोई रोक-टोक नही लगाई। पर अब बी.सी.सी.आई जाग गई है।
जब १८ अप्रैल को आई. पी.एल. का पहला मैच शुरू हुआ था तब से अब तक शाह रुख खान अपनी टीम नाईट राईडर के मैच के दौरान मैदान मे नाचते और ताली बजाते हुए देखे जाते रहे है और अब अचानक से शाह रुख पर ये रोक लगाई जा रही है की वो अपनी टीम के साथ मैदान मे नही रह सकते है।अब अगर रोक लगानी थी तो पहले दिन से रोकना चाहिए था। तब तो ललित मोदी भी मैदान मे खड़े हुए दिखाए गए थे जो खुश होकर ताली बजा रहे थे और नाईट राईडर के कोच से हाथ भी मिला रहे थे और वहीं पर शाह रुख खड़े होकर ताली बजा रहे थे।अब शाह रुख तो ये काम शुरू से करते आ रहे है तो भला अब वो क्यों मानेंगे। आख़िर उन्होंने इतने करोड़ों रूपये मे बी.सी.सी.आई.से टीम खरीदी है।और शाह रुख तो कह भी रहे है की कोई उन्हें उनके खिलाड़ियों से मिलने से नही रोक सकता है।हालांकि पहले शाह रुख कहते थे कि वो ड्रेसिंग रूम मे नही जाते है।और अब तो ललित मोदी ने भी कह दिया है कि हर टीम को एक लाल बैज दिया जायेगा जिसे दिखाकर टीम के मालिक अपने खिलाडियों के साथ dug-out और ड्रेसिंग रूम मे बैठ सकेंगे।
आई.पी.एल.की टीम और इसके खिलाडियों को तो टीम के खरीदारों ने करोड़ों मे खरीदा पर अब ऑस्ट्रेलिया के खिलाडी अपने टीम के मालिकों पर उन्हें उनका पैसा नही देने का आरोप लगा रहे है। ऑस्ट्रेलिया के कुछ खिलाडी जो की शुरू के आई.पी.एल मैच खेलकर वापिस अपने देश जा चुके है उनका कहना है की उनके बार-बार कहने पर भी अभी तक उनका पैसा उन्हें नही मिला है।हर बार जब वो कहते है तो उन्हें कुछ दिन मे पैसा मिल जायेगा यही आश्वासन दिया जाता है।पर अभी तक उन खिलाडियों को उनका रुपया नही मिला है।एक तरफ़ तो वो ये कहते है और दूसरी और ये भी कहते है कि उन्हें विश्वास है कि उन्हें उनका रुपया मिल जायेगा। अरे जब यकीन है तो फ़िर क्यों शोर मचा रहे है। अब ऑस्ट्रेलिया का बोर्ड शायद अपने खिलाडियों को उनका मेहनताना दिलाने मे मदद करेगा।
एक बात और सुनी है की इन खरीदारों ने एक-एक टीम और इसके खिलाडियों को अगले ५-१० साल तक के लिए खरीदा है इसका मतलब की ये सारे सीनियर खिलाडी ४०-४५ साल की उम्र तक खेलते रहेंगे। तो भला नए लड़कों को खेलने का मौका कब मिलेगा। सीनियर खिलाड़ी जो बमुश्किल १०-२० रन बनाते है (कभी-कभी तुक्के मे ८०-९० रन भी बनाते है )उन्हें अगले १० साल तक देखना पड़ेगा। सचिन और सौरव कहते है कि उम्र से खेल पर या परफॉर्मेंस पर कोई फर्क नही पड़ता है। क्रिकेट मे उम्र नही खेल और फिटनेस मायने रखती है।वाह !क्या उच्च विचार है।
नए लड़के अगर दो बार ना खेले तो उन्हें टीम से निकाल दिया जाता है पर जो सीनियर खिलाडी है भला उन्हें कौन कुछ कह सकता है। सीनियर पर शोहैब अख्तर के पहले मैच की याद आ गई जिसमे शोहैब ने ४ विकेट लिए थे और उन्हें मैच मे उन्हें मैन ऑफ़ द मैच दिया गया था । शोहैब के साथ-साथ इस मैन ऑफ़ द मैच के हकदार लक्ष्मी शुक्ला भी थे क्यूंकि अगर आख़िर मे उसने तीन विकेट नही लिए होते तो उस मैच मे नाईट राईडर की हार हुई होती। क्यूंकि २०-२२ रन बनाना कई बार मुश्किल नही होता है।पर वही सीनियर खिलाड़ी ने जिताया तो उसे ही मैन ऑफ़ द मैच होना था।कम से कम शोहैब और लक्ष्मी दोनों को ही मन ऑफ़ द मैच बना सकते थे।
कोलकत्ता मे हुए मैच जिसमे चेन्नई के सुपर किंग जीत गए थे उस ईडन गार्डन मे एक बार फ़िर से बत्ती गुल हो गई थी। जब आंधी चलने लगी थी तो एक दर्शक को एस्बेस्टर शीट का एक टुकडा लग गया जिससे वो दर्शक घायल होगया था। क्रिकेट मैदान मे सारे इंतजाम की जिम्मेदारी किसकी है -- टीम के मालिक या टीम को बेचने वाले बी.सी.सी.आई .की है।
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Monday, May 19, 2008
ब्लॉग और बॉलीवुड
आजकल जिस धड़ल्ले से बॉलीवुड के सितारे ब्लॉगिंग मे उतरने लगे है कि ब्लॉगिंग या ब्लॉग जगत को अब ब्लौगीवुड कहा जा रहा है।हालांकि अभी तो कुछ ही फिल्मी सितारे ब्लॉग जगत मे आए है जैसे आमिर और अमिताभ बच्चन और अब तो सुना है कि जूही चावला भी अपना ब्लॉग बनाने जा रही है। पर लगता है कि अब जल्दी हो दूसरे सितारे भी इस मे कूदने को तैयार है।
अमिताभ बच्चन अपने दिल कि बात ब्लॉग पर लिख रहे है वो चाहे राज ठाकरे से संबंधित हो या शाह रुख से। और अब तो अमिताभ ने शाह रुख और उनके बीच की ग़लत फहमी को दूर करने की पहल भी कर दी है अपने ब्लॉग मे।
आमिर अपने ब्लॉग पर अपने कुत्ते जिसका नाम शाह रुख है उस के बारे मे लिख रहे है कि उनका doggi क्या-क्या करता है। और वो उसे कैसे बिस्कुट खिलाते है।कोई कहता है कि आमिर अपने भांजे की फ़िल्म को प्रमोट करने के लिए अपने ब्लॉग का इस्तेमाल कर रहे है ,तो कोई कहता है कि वो अपनी फ़िल्म गजनी को प्रमोट करने के लिए ब्लॉग का इस्तेमाल कर रहे है। पर लगता है कि आमिर अपने फिल्मी दुश्मनों को नीचा दिखाने के लिए ब्लॉग का इस्तेमाल कर रहे है। अब आमिर जैसे perfectionist को इतनी घटिया हरकत करने की क्या जरुरत है। ये तो आमिर ही बता सकते है।
सुना था कि शाह रुख खान ने भी अपनी आई.पी.एल टीम नाईट राईडर के लिए ब्लॉग बनाया था पर पता नही शाह रुख ने ब्लॉग लिखना शुरू किया या नही।
ये तो हम सभी जानते है कि ब्लॉग पर लोग अपने दिल की बातें लिख सकते है और इसके लिए कोई किसी को रोक नही सकता है। पर ब्लॉगिंग अब बॉलीवुड का अखाडा बनता नजर आ रहा है।इन फिल्मी सितारों के आने और इस तरह की उल-जलूल बातों को लिखने के कारण अब तो टी.वी.चैनल भी ब्लॉगिंग के बारे मे कार्यक्रम दिखाने लगे है।अभी कल रात ही जी न्यूज़ ने इस पर एक कार्यक्रम ब्लौगीवुड नाम से दिखाया था।
ऐसा लगता है कि बॉलीवुड मे ब्लॉग तो ओरकुट,फेसबुक वगैरा से ज्यादा प्रचलित होने वाला है। अरे भाई इससे अच्छा जरिया और क्या होगा दूसरों को भला -बुरा कहने का।
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Saturday, May 17, 2008
संतान हो या ना हो जुल्म करने वालों को कोई फर्क नही पड़ता है
जिंदगी इम्तिहान लेती है वाली पोस्ट पर अमर जी ने जो टिप्पणी छोडी थी इससे दो घटनाएं याद आ गई जिसमे से एक घटना का हम आज जिक्र कर रहे है और अगली घटना का जिक्र अगली पोस्ट मे। और ये घटना हमारे एक बहुत ही करीबी जानने वाले की भांजी के साथ हुई है।अब यही कोई १० साल पहले की घटना है बेबी उसको घर मे सब लोग इसी नाम से बुलाते है ।बेबी के पिता निहायत सीधे इंसान है । घर मे माँ का ही हुक्म चलता है। माँ जो कहें वही सही और वही घर के सब मानते है। उसकी माँ पढी-लिखी और एक हद तक समझदार भी मानी जाती है पर अपनी बेटी के मामले मे वो बहुत ही ग़लत साबित हुई।
पहले भी और आज भी भी यू.पी.मे परिवार बेटी की शादी करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना ज्यादा बेहतर समझते है।बेबी परिवार की बड़ी और अकेली बेटी।गोरी ,सुंदर । बहुत लाड-प्यार से माँ-बाप ने पाला । माँ को हमेशा ये लगता था की बेटी की जितनी जल्दी शादी हो जाए उतना ही अच्छा है।लोगों ने समझाया की अब ज़माना बदल गया है पहले उसे पढ़-लिख लेने दो फ़िर शादी करना पर उन्होंने इस मामले मे किसी की भी नही सुनी । और बेटी के लिए वर की तलाश करती रही और दिल्ली मे रहने वाले लड़के के साथ शादी तय कर दी। छोटा परिवार देख कर बेबी की माँ बहुत खुश थी. लड़का दो भाई थे बडे भाई की शादी हो चुकी थी और उसके दो बेटियाँ थी । सगाई की तारिख तय हुई और दिल्ली मे सगाई बडे धूम-धाम से की गई। खैर सगाई के बाद शादी की तारिख कुछ महीने बाद की तय हुई क्यूंकि बेबी के बी.ए के इम्तिहान थे।और सब दान-दहेज़ भी तय हुआ। चूँकि बेबी अकेली बेटी थी इसलिए माता-पिता को बेबी की ससुराल वालों की सभी शर्तें मंजूर थी। पर बेबी के मामा को ये सब पसंद नही आ रहा था। उसने जब ऐतराज किया तो उसे ये कहकर चुप कर दिया गया की शादी-ब्याह मे तो ये सब होता ही है।खैर इम्तिहान होने के बाद बेबी की शादी कर दी गई।
कुछ दिनों तक तो बेबी की ससुराल मे सब कुछ ठीक-ठाक रहा पर साल बीतते- बीतेते बेबी की ससुराल वालों ने फरमाइशें शुरू कर दी। क्यूंकि ससुराल वालों को ये महसूस हो गया था की बेबी की खुशी के लिए उसके माता-पिता कुछ भी कर सकते है। जब भी बेबी की माँ दिल्ली आती तो खूब सारा सामान लेकर बेबी के घर जाती पर अब ससुराल वालों को ये सामान कम लगने लगा था।और उनकी मांग दिन बा दिन बढ़ने लगी थी और जब उनकी मांग पूरी नही होती तो वो लोग बेबी को तंग करते। आख़िर एक दिन बेबी की सहनशक्ति ने जवाब दे दिया । उसने अपने मामा को फ़ोन किया क्यूंकि उसे पता था की मामा उसकी मदद जरूर करेंगे।माँ तो समाज और बिरादरी के डर से उसे वहीं ससुराल मे रहने को कहेंगी। और बेबी मामा के साथ बनारस चली गई और बनारस मे उसने अपने ससुराल वालों के ख़िलाफ़ court मे केस कर दिया। पर बेबी की माँ इस सबसे खुश नही थी बल्कि वो अपने भाई से ही नाराज हो गई बेबी की मदद करने के लिए। क्यूंकि माँ मानना था की बेटी का असली घर उसका ससुराल ही होता ही।
बेबी की माँ को हमेशा ये लगता था की लड़की को ससुराल मे ही रहना चाहिए और इसके लिए वो बेटी की ससुराल वालों की हर मांग मानने को तैयार थी पर बेबी इस बात के लिए तैयार नही थी। ऐसा सुना औरदेखा गया है की मुक़दमे की सुनवाई के दौरान कई बार कोर्ट माने जज साब पति-पत्नी को बुला कर अकेले मे बात करते है और अगर सुलह हो सके तो सुलह करवाने की कोशिश करते है । जब बेबी और उसके पति से जज साब ने बात की तो उसके पति ने भी बेबी को ठीक से रखने और तंग ना करने का भरोसा दिलाया और दहेज़ का केस ख़त्म करने की गुजारिश की। एक बार फ़िर वो लोग बेबी को दिल्ली ले आए। और फ़िर सब कुछ ठीक चलने लगा। २ साल बाद बेबी के एक बेटा हुआ पर बेटा होते ही उसकी ससुराल वालों ने एक बार फ़िर अपना रंग बदला और एक दिन उन्होंने धोखे से बेबी को बिल्कुल फिल्मी style मे घर से बाहर कर दिया ।
बेबी एक बार फ़िर अपने मामा के पास आई और सारा हाल सुनाया पर इस बार बेबी ने तय कर लिया था की वो ससुराल नही जायेगी पर अपना बेटा ससुराल वालों से वापिस ले कर रहेगी।पर इस बार बेबी कि माँ और परिवार ने भी उसका साथ दिया। बेबी कुछ दिन मामा के पास रहकर लोगों से सलाह -मशविरा करके बनारस आ गई और कोर्ट मे उसने तलाक और बेटे की कस्टडी के लिए केस किया। केस चला और फ़ैसला बेबी के हक़ मे हुआ ।
इतना सब कुछ होने के बाद बेबी के मामा ने बेबी और उसकी माँ को समझाया(माँ का तो ये कहना था की हमारे पास इतना सब कुछ है बेबी को पढने या नौकरी करने की क्या जरुरत है ) और बेबी को आगे पढने के लिए प्रेरित किया। बेबी ने बी.एड.किया और आज कल बनारस के एक स्कूल मे टीचर है। आज बेबी अपने बेटे के साथ माता-पिता के पास बनारस मे रहती है।
Thursday, May 15, 2008
क्या आप जानते है की गौरईया चिडिया (sparrow)खत्म हो रही है.
अभी तक तो हम लोग शेर और चीते की प्रजाति के ख़त्म होने की बात सुन रहे थे पर अब तो चिडियों के भी लुप्त होने की ख़बर आ रही है। अभी हाल मे जो नई आउटलुक मैगजीन आई है उसमे गौरईया चिडिया के बारे मे लिखा है की अब गौरईया भी धीरे-धीरे ख़त्म हो रही है। ये पढ़ कर बहुत ही अजीब सा लगा क्यूंकि गौरईया चिडिया का घर-आँगन मे फुदकना, उड़ना,चहकना क्या हम लोग भूल सकते है।पहले जहाँ सुबह हुई कि चिडिया चूं-चूं करती आँगन मे आ जाती थी.जब भी मम्मी आँगन या छत पर कुछ धुप मे सुखाने के लिए डालती तो एक नौकर बैठाया जाता की कहीं चिडिया-कौवा मुंह ना मार दे।कहने का मतलब की उस समय इतनी ज्यादा चिडिया हुआ करती थी। 
ये तो हम सभी जानते है कि गौरईया चिडिया को कमरे के पंखों मे घोसला बनाने मे बड़ा मजा आता था।बचपन से
गौरईया को कमरे के पंखों मे घोसला बनाते देखते हुए बड़े हुए है। जहाँ गर्मी आती थी की चिडिया कमरे मे घुसने की कोशिश करने लगती थी। मम्मी हम लोगों को कमरे का जाली का दरवाजा बंद करने के लिए कहती थी क्यूंकि उन्हें लगता था की अगर चिडिया अंदर आएगी तो पंखे से कट जायेगी।पर ना तो चिडिया मानती और ना ही हम लोग हर समय दरवाजा बंद रख पाते थे। और जब भी गौरिया कमरे मे घुसती तो पहला काम होता की पंखा बंद कर दिया जाता। और फ़िर शुरू होता चिडिया को बाहर उडाने और निकालने का काम। कोई उड़-उड़ तो कोई हुश-हुश करता और चिडिया रानी इधर से उधर उड़ती रहती। और तब हम लोगों को मम्मी की डांट पड़ती थी। पर गौरईया भी कम नही थी जहाँ मौका मिलता पंखे मे घोंसला बना लेती और अंडे भी दे देती थी।
अंडमान मे हम लोगों के घर मे बहुत सारी गौरईया आती थी। शुरू-शुरू मे एक-दो और फ़िर जब पतिदेव के कहने पर इन चिडियों के लिए दाना-पानी रखने लगे तो बहुत सारी चिडिया आने लगी थी। और बाद मे ये हाल हो गया था की सब चिडिया दरवाजे पर आकर बैठ जाती थी। और ची-ची-करके शोर मचाया करती थी। पर सारी चिडिया कैमरा कोंशस थी जैसे ही हम कैमरा ले कर आते की सब फुर्र से उड़ जाती थी। अंडमान मे एक दिन बारिश के बाद चिडिया दाना खाने आई थी पर जैसे ही हमारे हाथ मे कैमरा देखा कि खाना-पीना छोड़कर फुर्र से उड़कर तार पर जा बैठी । :)
यहां गोवा मे अभी तक तो ध्यान नही दिया था की गौरईया आती है या नही क्यूंकि यहां पर भी सुबह से चिडियां बोलने लग जाती है। और बहुत तरह की चिडियां दिखती है . पर अब इस लेख को पढने के बाद हम इस बात पर जरुर गौर करेंगे की यहां गौरईया चिडिया आती है या नही।
चलते-चलते एक छोटा सा चिडियों का विडियो भी देख लीजिये हालांकि इसमे बस २-३ गौरईया चिडियां और मैना ही है।
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Wednesday, May 14, 2008
निक नेम्स ( nick names )
निक नेम यानी कि घर मे प्यार से बुलाने वाला नाम। घरों मे बच्चों को बुलाने के लिए निक नेम्स रखना कोई नई बात नही है । हर माता-पिता या दादा-दादी,नाना -नानी अपने बच्चों के घर मे बुलाने का नाम अलग और बाहर(स्कूल ) बुलाने का नाम अलग रखते है।निक नेम कि सबसे बड़ी खासियत ये है कि बचपन मे तो ठीक है पर जब ये बच्चे बड़े हो जाते है और ख़ुद भी बच्चों के माँ-बाप बन जाते है पर तब भी इन्हे इनके निक नेम से ही बुलाया जाता है। क्यूंकि कोई और नाम बुलाने मे बड़ा ही पराया पन लगता है। पर चाहे जो हो ये निक नेम होते बड़े ही प्यारे है। क्या हमने कुछ ग़लत कहा।
पप्पू,मुन्नी,गुडिया,बेबी,बबली,गुड्डू,पिंकी,चिंकी, मिक्की,मुन्ना ,चिंटू,चीकू, नंदू,मुन्नू, और भी ना जाने कितने ही ऐसे निक नेम हम आम तौर पर घरों मे सुनते है। हमे यकीन है कि इनमे से कोई ना कोई निक नेम तो आपका भी होगा ही। :)
पर कभी-कभी कुछ अलग से नाम भी सुनने मे आते है।जिन्हें सुनकर अच्छा लगता है और साथ ही मजा भी आता है।तो आज कुछ ऐसे ही २-४ निक नेम की बात हो जाए। तो शुरुआत हम एक ऐसे अपने ही नाम से करते है।
ढोलक-- अब यूं तो इस नाम से बहुत बचपन मे पापा हमे बुलाते थे क्यूंकि हम बिल्कुल ही गोल मटोल थे। वैसे अब भी है पर अब ढोलक जितने नही है ना इसलिए अब हमे इस नाम से नही बुलाया जाता है।पर बाकी नामों से बुलाया जाना अब भी जारी है मसलन गुडिया।
चिया-- ये बच्ची दिल्ली मे हम लोगों की कालोनी मे रहती है।जब ये पैदा हुई तो बहुत ही छोटी सी थी बस इसीलिए चिया नाम पड़ा था खैर अब तो चिया बड़ी हो गई है कॉलेज जाती है पर अभी भी सब लोग उसे चिया ही कहते है। चिया का जुड़वाँ भाई है जिसका नाम है चुम्मु-- अब चुम्मु भी कॉलेज जाता है पर वही बात हर कोई इन्हे अब भी चिया -चुम्मु ही कहता है।
डिक्की --डिक्की इलाहाबाद मे एक जानने वाले के बड़े बेटे का नाम था और इस नाम को सुनकर हम सब भाई-बहन अक्सर मजाक करते थे की उनके बड़े बेटे का नाम बोनट होगा पर अफ़सोस उसका नाम बोनट नही कुछ और था। ।डिक्की तो खैर अब बहुत बड़ा हो गया है और उसका असली नाम तो हम आज भी नही जानते है।
डॉलर-- डॉलर दो भाई है । डॉलर आज कल चेन्नई मे नौकरी कर रहा है। पर जब पहली बार ये नाम सुना तो अनायास ही मुंह से निकला था की एक डॉलर है तो दूसरा पाउंड होगा पर ऐसा नही है दूसरे को घर मे मुन्ना ही बुलाते है।
लारा--ब्रायन लारा के बहुत पहले ये नाम सुना था। सत्तर के दशक मे । हमारी एक भाभी की बहन का नाम है। अपने नाम की कोई ख़ास अहमियत लारा बताती थी।
भइया --पहले ज्यादातर घरों मे बड़े बेटे को भइया नाम से बुलाने का बड़ा रिवाज था। अब ये रिवाज है या नही पता नही।
पोप --ये हमारे (दादा) ताउजी का नाम था। क्यूंकि वो बहुत गोरे और बहुत अच्छी इंग्लिश बोलते थे । शायद इसीलिए उन्हें पोप कहते रहे होंगे।
झुन्झुन--ये हमारे एक चच्चा का नाम था। और हम लोग बचपन मे उन्हें हमेशा झुनझुना चच्चा ही बुलाते थे।हम लोगों ने कभी भी उन्हें सिर्फ़ चच्चा नही कहा।
चक्कू बेबी--ये हमारी दिल्ली की एक बंगाली दोस्त की बेटी का नाम है। चक्कू आज एक ७ साल के बेटे की माँ है पर हम सब उसे चक्कू ही कहते है। वैसे चक्कू खूबसूरत भी बहुत है।
टुकटुकी -- ये टुक टुकी और कोई नही हमारी बंगाली दोस्त यानी चक्कू की माँ का नाम है। वो बताती थी की जब वो छोटी थी तो खूब घूरा करती थी ।इसलिए उनके माँ-बाबा ने ये नाम दिया था।
बच्चा--हमारे कजिन भइया है । अब इनकी उम्र साठ के आस-पास की हो रही है पर हम सभी इन्हे बच्चा भइया ही कहते है। है ना मजेदार बात।
कुंवर-- मामाजी के बेटे का नाम है। अब ये नाम उस समय रखा गया था जब जमींदारी का रौब था और घर का बड़ा बेटा होने के नाते सब उन्हें कुंवर जी कहते थे . पर आज भी सब उन्हें कुंवर जी ही कहते है।
इसी तरह बाबु,लाल्टू,टुल्लू,गुर्रन,(अरे वो फैंटम वाला ) आलम -डालम ,तितली,बच्ची, और भी ना जाने ऐसे कितने ही निक नेम होंगे । तो आप का क्या निक नेम है।
क्या आप शर्मा रहे है ।
अरे अरे शरमाइये मत बताने मे कोई हर्ज नही है। यहां सब अपने ही ब्लॉगर परिवार के है। :)
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Monday, May 12, 2008
गोवा मे परशुराम का मन्दिर

ऐसी मान्यता है की पहले गोवा कहीं exist ही नही करता था । चारों और सिर्फ़ पानी और बहुत दूर कहीं पर जमीन थी। sayadris (सयाद्री ) के पहाडों मे जमादाग्नी ऋषि (जो की एक ब्राह्मण ) अपनी पत्नी रेनुका (जो की एक क्षत्रिय थी ) और ४ पुत्रों के साथ रहते थे। परशुराम इन्ही ऋषि के सबसे छोटे पुत्र थे। एक दिन रेनुका जब नदी मे नहा रही थी तभी उन्हें एक क्षत्रिय राजा ने देख लिया था और वो राजा वहां रुक गया था और ऋषि ये सब देख कर क्रोधित हो गए थे और इसलिए उन्होंने अपने पुत्रों से अपनी माँ का वध करने को कहा पर उनके तीनो बड़े पुत्रों ने मना कर दिया पर परशुराम ने अपनी माँ का वध कर दिया। इस पर खुश होकर ऋषि ने परशुराम से वरदान मांगने को कहा तो उन्होंने अपनी माँ को जीवित करने का वरदान माँगा था।
एक दिन जब ऋषि ध्यान मग्न थे तभी क्षत्रियों ने ऋषि का वध कर दिया जिससे क्रोधित होकर परशुराम ने क्षत्रियों का अंत करने की ठानी और उन्होंने क्षत्रियों से युद्ध किया और विजय पाई पर इस विजय से वो खुश नही थे क्यूंकि बदले से उनके मृत पिता जीवित नही हो सकते थे।
इसलिए परशुराम ने वो जमीन एक ब्राह्मण को भेंट कर दी। एक दिन क्षत्रिय ( सारे क्षत्रिय मरे नही थे)उस ब्राहमण के पास आए और कहा की वो परशुराम को वहां से जाने के लिए कहे वरना परशुराम उन सबको मार देंगे।
ये सुनकर वो ब्राह्मण परशुराम के पास गए और कहा की वो इस भेंट की हुई भूमि पर नही रह सकते क्यूंकि दान करने के बाद भी परशुराम वहां रह रहे है अर्थात जमीन पर अब भी परशुराम का अधिकार है। इस पर परशुराम ने चारों ओर जमीन को घेरे हुए पानी या समुन्द्र को देखा और समुन्द्र को आदेश दिया की वो वहां से पीछे हट जाए क्यूंकि उन्हें जमीन चाहिए थी।पर समुन्द्र पीछे नही हटा इस पर उन्होंने फ़िर एक बार समुन्द्र को आदेश दिया और तब अचानक एक बड़ी लहर उठी और समुन्द्र देवता वरुण प्रकट हुए और उन्होंने परशुराम से कहा की वो पानी मे तीर चलाये और जहाँ पर उनका तीर पानी को छुएगा वहीं जमीन निकल आएगी।और इसके लिए तीर जितनी दूरी तय करेगा वो सारी जमीन उनकी होगी । ये सुनकर परशुराम भागकर सयाद्री के ऊँचे पहाड़ पर गए और वहां से तीर चलाया और उन