Posts

माघ मेला और कल्पवास और कुम्भ

Image
आजकल इलाहाबाद यानि प्रयागराज में कुम्भ की ज़ोर शोर से तैयारी चल रही है । ऐसी ख़बरें तो हम लोग अक्सर टी.वी. और अखबार में देख और पढ़ रहे है । पर हम तब के माघ मेले की बात कर रहें है जब टी.वी. नहीं था । माघ मेला मकर संक्रान्ति से शुरू होकर शिव रात्रि को आख़िरी नहान होता है । इस दौरान पूरे शहर में बस लोग ही लोग दिखाई देते है ।

जब से हमें याद है हर साल माघ मेले में खूब तैयारी होती थी । और जब कुम्भ या अर्ध कुम्भ होता था तब तो और भी अधिक तैयारी होती थी । चूँकि पूरा संगम का इलाक़ा रेतीला है तो वाहनों के चलने के लिये पूरे इलाक़े में बड़े बड़े लोहे की पट्टियों से एक तरह की सड़क बनाई जाती थी ताकि कार वग़ैरा बालू में धँस ना जाये । पूरे एरिया में खूब पानी का छिड़काव होता था और हर तरफ़ डी.डी.टी. का छिड़काव भी किया जाता था ताकि लोग बीमारी से बचे रहें ।

जब हम लोग छोटे थे तो हमारी दादी हर साल माघ मेले में एक महीने के लिये कल्पवास करती थी ।हम लोगों के पंडितजी श्याम सुंदर पाण्डे भी अपना टेंट लगवाते थे और हमारी दादी वहीं रहती थी । हम लोग बीच बीच में उनके पास जाते तो वो आलू की सब्ज़ी और पराँठा खिलाती थी …

ख़त्म होती सहनशीलता

आज सुबह पेपर में एक ख़बर पढ़कर हम ये सोचने लगे कि आख़िर अब लोगों में सहनशीलता ख़त्म क्यूँ होने लगी है । जरा सा कुछ हुआ नहीं कि बस धाँय से गोली चला दी ।

पालतू कुत्ते को पत्थर मारने की सज़ा मौत । क्योंकि कुत्ते को भौंकने से रोकने और दौड़ाने से रोकने के लिये उस आदमी ने कुत्ते को पत्थर मारा । ऐसा अखबार में लिखा है ।

माना कि उसे पत्थर नहीं मारना चाहिये था पर क्या पत्थर मारने की इतनी बड़ी सज़ा देना कि सीधे गोली मार कर इंसान की जान ही ले लेना , ठीक है ।

और सबसे अजीब बात इस ख़बर में ये लगी कि जिस कुत्ते के लिये आदमी की जान ली उसे ही छोड़कर गोली मारने वाला और उसका पूरा परिवार भाग गये । अरे भाई कम से कम उस बेज़ुबान जानवर को तो अपने साथ ले जाते ।

आजकल लोगों में बर्दाश्त की कमी होती जा रही है । जरा जरा सी बात पर लोग गोली चला देते है और सबसे आश्चर्य की बात ये है कि जिसे देखो उसके पास रिवाल्वर होती है । पहले तो रिवाल्वर रखने के लिये लाइसेंस की ज़रूरत होती थी पर लगता है अब तो कोई भी रिवाल्वर रख सकता है ।

इंसान की जान की कोई क़ीमत नहीं है जबकि ये कहा और माना जाता है कि अगर आप किसी को जीवन दे नही…

बिटिया को खाना बनाना नहीं आता है

कभी कभी पुरानी बातें सोचकर हँसी आती है । और अपनों पर प्यार ।

शादी से पहले रसोई की तरफ़ कभी रूख ही नहीं किया था । इसकी वजह थी कि घर में हमेशा सेवक रहे और चूँकि हम सबसे छोटे थे तो ऐसा मौका आता ही नहीं था । और अगर कभी आता भी तो बस सलाद वग़ैरा बनाना होता । जिसमें पाक कला में निपुणता की ज़रूरत नहीं थी । पर एक और वाक़या है जिसकी वजह से हमने दोबारा खाना बनाना नहीं सीखा कभी ।

दरअसल जब हम बहुत छोटे (चार या पॉच साल के ) थे तो एक बार मम्मी का कान का ऑपरेशन हुआ था और वो हॉस्पिटल में थी । एक दिन की बात है पापा और बड़ी दीदी लोग हॉस्पिटल से आये नहीं थे । शाम हो रही थी और घर में सिर्फ़ हम और हमसे दो साल बड़ी दीदी थी । हम लोगों को भूख लग रही थी तो सोचा कि खाना खाया जाये । ( ये उस समय की बात है जब फ्रिज और गैस का चूल्हा नहीं थे )

तो हम दोनों ने खाना बनाने की सोची । अब खाना बनाने के लिये चूल्हा जलाना था जो हम दोनों को ही नहीं आता था । अपनी बुद्धि लगाकर हम लोगों ने चूल्हा जलाने की कोशिश शुरू की । और चूल्हे मे अखबार मोड़ मोड़कर हम दोनों डालने लगे जिससे चूल्हा तो नहीं जला पर घर में धुआँ धुआँ हो गया ।

धुं…

नये साल का रिज़ोल्यूशन

वैसे हम ज़्यादा रिज़ोल्यूशन जैसी बात में विश्वास नहीं करते है । आम तौर पर हम ना तो कोई रिज़ोल्यूशन ना ही अपने आप से कोई ख़ास वादा या प्रॉमिस करते है । अब इसका एक कारण है ।

वो क्या है ना कि हमने पिछले साल यानि २०१८ में सोचा और अपने से वादा किया कि इस साल हम कुछ नहीं तो पाँच से सात किलो अपना वज़न घटायेगें ।

और हमने उस पर अमल भी करना शुरू कर दिया और पाँच सात तो नहीं पर हाँ दो किलो वज़न ज़रूर कम कर लिया था । और अपनी इस उपलब्धि पर हम ख़ुश भी बहुत थे ।

पर ये क्या जैसे ही जाड़े के मौसम की शुरूआत हुई तो बस सब गड़बड़ हो गया । अब हरी मटर से बनने वाले तरह तरह के व्यंजनों जैसे घुघरी , मटर का पराँठा या पूड़ी , मटर की कचौड़ी ,मटर की टिक्की मटर का निमोना ।😋

पढ़कर मुँह में पानी आ गया ना तो सोचिये जब घर में ये सब बने तो भला कौन वज़न कंट्रोल कर सकता है । और वैसे भी मटर का स्वाद तो इसी मौसम में भाता है ।

सिर्फ़ मटर ही क्यों गाजर का हलवा ,गोंद के लड्डू , गजक जैसी स्वादिष्ट खाने की चीज़ों के चलते कौन वज़न घटा सकता है । भई हम तो नहीं कर सकते है । 😊

तो फ़िलहाल इस साल नो रिज़ोल्यूशन ।
इस बार हम खाओ पी…

जाने वाले साल को सलाम ,आने वाले साल को सलाम

जी हाँ आज साल २०१८ का आख़िरी दिन है और इस पूरे साल का लेखा जोखा करें तो साल अच्छा ही गुज़रा बस दो चार बार बीमार पड़ने को छोड़ दें तो ।

यूँ तो हम २००७ से ब्लॉगिंग कर रहे थे पर इस साल फ़रवरी से हमने फेसबुक पर अपना ब्लॉग लिखना शुरू किया ।

२०१८ में स्कूल की सहेलियों से खूब मुलाक़ातें हुई ।

आने वाले साल यानि २०१९ के लिये उम्मीद है कि अच्छा ही गुज़रेगा ।

ज़्यादा लम्बी पोस्ट नहीं लिखेंगें क्योंकि जानते है हमारी तरह आप सब भी नये साल के स्वागत की तैयारी में होगें ।

तो चलिये आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें ।


छब्बीस दिसम्बर २००४ यानि सुनामी

हर साल छब्बीस दिसम्बर आने पर सुनामी याद आ ही जाती है । और छब्बीस दिसम्बर की वो सुबह जब समुद्र की लहरों ने सब कुछ बदल दिया था । आज चौदह साल बाद भी सुनामी की बात करते हुये मेरे रोंगटे से खड़े हो जाते है क्योंकि उस दिन जो इतना तीव्र भूकम्प आया था और जब उसके बाद समुंदर ने अपना रौद्र रूप दिखाया था उसे भला कैसे भूल सकते है । आज भी जब उस दिन की बात करते है तो जैसे वो पूरा मंज़र आँखों के सामने घूम जाता है ।

रविवार की सुबह छ: बजे हम लोग सो रहे थे जब बहुत तेज़ भूकम्प आया तो पहले तो समझने में समय लगा कि फिर देखा कि अलमारी, दरवाज़े सब धड़ धड़ करके हिल रहे है तो झट से उठे और बेटे को आवाज़ लगाई कि जल्दी उठो भागो भूकम्प आया है ।

अंडमान के पोर्ट ब्लेयर में हम लोग दुमंज़िला ( डुप्लेक्स ) घर में रहते थे और चूँकि ऊपर की मंज़िल पर हम लोगों के कमरे थे तो सीढ़ी से नीचे भागते हुये सँभलना पड़ रहा था क्योंकि सीढ़ी इतनी ज़ोर ज़ोर से हिल रही थी कि जैसे राजधानी ट्रेन चल रही हो । और जैसे ही हम सीढ़ी से उतरे तो गिर पड़े क्योंकि ज़मीन तो और ज़ोर से हिल रही थी और हम सँभल ही नहीं पाये थे ।

घर से बाहर खड़े होकर हम …

क्रिसमस और बड़ा दिन

बचपन से लेकर आज तक हम क्रिसमस मनाते चले आ रहे है । और हर साल पूरे जोश के साथ क्रिसमस ट्री सजाना , गिफ़्ट ख़रीदना और केक और पार्टी मतलब स्पेशल खाना ।

वैसे पहले तो लोग क्रिसमस कम मनाते थे पर अब तो हर कोई क्रिसमस मनाता है जो कि एक तरह से अच्छी बात है । पहले सिर्फ़ चर्च या जो क्रिसचियन होते थे उन्हीं के घर वग़ैरा सजते थे पर अब तो हर मार्केट में क्रिसमस का जोश दिखाई देता है ।

बाक़ी त्योहारों की तरह हम क्रिसमस भी मनाते है । दरअसल इसका भी एक कारण है । जब हम छोटे थे तो हम लोग म्योराबाद जो कि एक ज़माने में ईसाई बस्ती भी कही जाती थी वहाँ रहते थे । जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है ईसाई बस्ती वो इसलिये कि वहाँ पर सारे घर ईसाइयों के थे बस दो चार घर ही हिन्दुओं के थे । बहुत ही छोटा सा मोहल्ला था और गिने चुने लोग होते थे । हर कोई सबको जानता था ।

हालाँकि आज का म्योराबाद बहुत बदल गया है अब तो ये काफ़ी बड़ी और विकसित कॉलोनी बन गई है ।

जब क्रिसचियन कॉलोनी मे रहते थे तो ज़ाहिर सी बात है हमारी दोस्तें भी क्रिसचियन थी पुतुल ,चीनू ,मीनू और रीना । खूब सबके घर आना जाना और खेलना तथा त्योहार संग संग मनाना होता…