Monday, March 31, 2008

सरकार ने पहले आई.आई.टी आंध्र प्रदेश,राजस्थान,बिहार,हिमाचल मे और एक आई.आई.एम.शिलोंग मे खोलने की बात कही थी। भारत के अलग -अलग शहरों मे अब और ४ नए आई.आई.टी. और ६ नए आई.आई.एम.खोले जायेंगे। ये ४ आई.आई.टी. --उड़ीसा,मध्य प्रदेश,गुजरात,और पंजाब मे और ६ आई.आई.एम.-- जम्मू-काश्मीर ,तमिल नाडू,झारखण्ड,छतीसगढ़ ,उत्तराखंड और हरियाणा है।

अभी लोग आई.आई.एम और आई.आई.टी. खुलने की खबर से खुश हो ही रहे थे कि कल शाम को आई.आई.एम.अहमदाबाद ने पी.जी.पी.के कोर्स की फीस भी बढ़ा दी। पहले जहाँ आई.आई.एम मे पढने वाले छात्र को दो साल की फीस साढ़े चार लाख देनी पड़ती थी वहीं अब ये फीस बढाकर ११.५ लाख कर दी गई है।पहले दोनों साल की फीस मे ज्यादा अन्तर नही था पहले साल दो लाख और दूसरे साल ढाई लाख होती थी। पर अब ११.५ लाख
की फीस मे पहले साल ५ लाख और दूसरे साल साढ़े ६ लाख फीस भरनी पड़ेगी।

अब आई.आई.एम.मे पढने के लिए तो आम तौर पर student लोन लेते ही है। और आई.आई.एम . से पास करने पर student को नौकरी भी खूब अच्छी यानी मोटी रकम वाली मिलती है। अब आजकल तो ५-१० लाख सालाना मिलना आम सी बात हो गई है। और कुछ लोगों को तो करोड़ की नौकरी मिलती है। इसीलिए आई.आई.एम को लगता है की जब उसके student को एक करोड़ और डेढ़ करोड़ की नौकरी मिल सकती है तब तो student आराम से अपनी फीस के लिए लिया हुआ लोन चुका ही सकता है तो फ़िर आई.आई.एम ही क्यों नुकसान मे रहे माने फीस क्यों ना बढ़ाई जाए।

अभी तो फिलहाल सिर्फ़ आई.आई.एम.अहमदाबाद ने ही फीस बढ़ाई है अब देखना है कि दूसरे आई.आई.एम.भी फीस बढ़ाते है या नही । और अगर बढ़ाते है तो कितनी ।

फीस बढ़ने से एक और खबर याद आ गई की दिल्ली के स्कूल भी फीस को ५० % बढ़ाने जा रहे है । अरे कमाल है पे कमीशन की रिपोर्ट आए और स्कूल वाले फीस ना बढायें।





Saturday, March 29, 2008

यूं तो अंडमान मे हमारा तीन साल का समय बहुत ही अच्छा बीता पर उन्ही तीन सालों मे हमारे मायके और ससुराल मे अच्छे काम भी हुए माने दीदी और ननद की लड़की की शादी हुई। और उन्ही तीन सालों मे हम लोगों के जीवन की सबसे बड़ी ट्रेजडी भी हुई ।

जून से नवम्बर का समय तो बस अंडमान घुमते हुए मजे मे निकल रहा था। नवम्बर मे दीदी बेटी की शादी मे दिल्ली आए और उसके बाद हम लोग करीब १० दिन दिल्ली रहकर वापिस अंडमान चले गए।अंडमान पहुँचने के एक हफ्ते बाद यानी २ दिसम्बर २००३ की शाम को दिल्ली से हमारी ननद का फ़ोन आया कि पापाजी (ससुरजी ) घर मे गिर गए है।और उनके पैर मे फ्रैक्चर हो गया है। वो लोग पापाजी की खूब देख भाल कर रहे थे।और चूँकि हमारी ननद और नन्दोई डॉक्टर है इसलिए हम लोगों को चिंता करने की कोई जरुरत नही थी। इसलिए हम लोग निश्चिंत थे ।

रोज हम लोग उनका हाल-चाल लेते थे और उनसे बात करते थे।पर अचानक १३ दिसम्बर को दिल्ली से फ़ोन आया कि पापाजी को हार्ट अटैक हुआ है । पापा की हालत काफ़ी ख़राब है और उन्हें हॉस्पिटल ले जा रहे है। उस समय पापाजी से बात की और ननद और नन्दोई से बात हुई ।और पतिदेव ने पापाजी से कहा कि वो कल दिल्ली पहुँच जायेंगे।पहले तय हुआ की हम सभी दिल्ली चले पर चूँकि बेटे का बोर्ड था इसलिए तय किया की पहले पतिदेव चले जाए बाद मे हम लोग जायेंगे।क्यूंकि उस समय हमे अंडमान गए हुए कुल छः महीने हुए थे और उस समय तक हम लोगों को घर नही मिला था इसलिए हम लोग सर्किट हाउस मे रह रहे थे।और बेटे के दसवीं के प्री -बोर्ड होने वाले थे।और ऐसे मे बेटे को बिल्कुल नई जगह पर अकेले छोड़ना ठीक नही लग रहा था।हालांकि बाद मे हमे उसे अकेले ही अंडमान छोड़कर दिल्ली आना पड़ा था

इसी ऊहापोह मे टिकट लेने की सोची गई क्यूंकि १३ दिसम्बर को एक तो शनिवार था और दूसरे उस समय अंडमान मे सिर्फ़ सुबह ही फ्लाईट चलती थी और शाम को ट्रेवल एजेंट का ऑफिस जल्दी बंद हो जाता था।खैर ट्रेवल एजेंट को फ़ोन किया और पतिदेव के लिए टिकट बुक किया गया । नई जगह और इम्तिहान की सोच कर हम बेटे के साथ वहीं अंडमान मे रुक गए। और पतिदेव अगली सुबह यानी रविवार को दिल्ली चले गए।

और अंडमान मे रहते हुए भी मन नही लग रहा था और हम चाहकर भी दिल्ली नही जा पा रहे थे ।उसी मे बेटे ने प्री-बोर्ड के इम्तिहान दिए पर रिजल्ट स्कूल के मन मुताबिक नही था (५८ %) और इसलिए बेटे के स्कूल से भी बुलावा आ गया और वहां की प्रिंसिपल ने हमे बड़े प्यार से बहुत कुछ कहा और उसी प्यार भरे लहजे मे ये तक कह दिया कि आपके बेटे को जनवरी मे होने वाले प्री-बोर्ड मे कम से कम ६०-६५ % लाना है वरना उसे बोर्ड मे नही बैठने देंगे। (उस स्कूल मे दो प्री -बोर्ड होते थे) क्यूंकि उस स्कूल को उस साल ट्रोफी मिलने की उम्मीद थी (क्यूंकि पिछले दो सालों मे उनके दसवीं के सभी बच्चों का ६५ % से ऊपर रिजल्ट गया था । )और उन्हें ये डर था की कहीं हमारे बेटे की वजह से उन्हें ये ट्रॉफी ना खोनी पड़े।इसलिए हम माँ-बेटा जी-जान से पढ़ाई मे जुट गए थे।

दिल्ली मे पापाजी आई.सी.यू.मे भरती थे। दिल्ली से कभी ख़बर आती कि पापाजी की हालत सुधर रही है तो कभी फ़ोन पर बात करने पर पता चलता की उनकी तबियत पहले से ख़राब है।उन्हें वेंटिलेटर पर भी रक्खा गया जिससे उनकी हालत मे थोड़ा सुधार हुआ पर फ़िर धीरे-धीरे उनकी हालत बिगड़ती चली गई। और २८ दिसम्बर को दोपहर मे पतिदेव ने फ़ोन करके बताया कि पापाजी की तबियत और भी ज्यादा ख़राब हो गई है ।

इस २५-२६ दिनों मे अंडमान मे रहते हुए एक हम लोगों की मानसिक हालत भी डांवाडोल होती रहती थी।और इन २५ दिनों मे हमारा बेटा बहुत समझदार हो गया था।बजाय इसके की हम उसे हौसला दे वो ही हमे हौसला देता था। इसलिए २८ दिसम्बर को जब पापाजी की तबियत के बारे मे पता चला तो हमने बेटे को बताया की हमे दिल्ली जाना है और क्या तुम यहां अकेले रह लोगे तो उसके हाँ कहने पर हमने दिल्ली के लिए अपना टिकट २९ तारीख का बुक कराया ।जाड़े मे कई बार फ्लाईट लेट हो जाती थी और उस दिन भी ऐसा ही हुआ।२९ की सुबह अंडमान से तो हम चेन्नई समय पर पहुंचे पर चेन्नई से दिल्ली की फ्लाईट जिसे ११ बजे जाना था वो दोपहर २.३० बजे चेन्नई से रवाना हुई।चेन्नई एअरपोर्ट पर ही हमे ख़बर मिली की पापाजी हम सबको छोड़कर जा चुके है। और वो ४-५ घंटे चेन्नई मे काटना ऐसा लग रहा था मानो साल बीत गए हो।

ये कुछ ऐसी ट्रेजडी है जिसकी इस जीवन मे भरपाई हो पाना मुश्किल है। ऐसे ही समय मे मन ये सोचने पर मजबूर हो जाता था कि शायद अंडमान को इसी लिए काला पानी कहा जाता था।क्यूंकि वहां से कभी भी इमरजेंसी मे निकल पाना बहुत मुश्किल होता था।



Friday, March 28, 2008

मुम्बई मायानगरी की एक बड़ी ही दिल मे हलचल मचाने वाली न्यूज़ देखीमुम्बई की एक ग्रुप हाऊसिंग सोसाईटी जहाँ सारे घरों मे हिंदू जैन परिवार रहते है उसी सोसाइटी मे एक मुस्लिम परिवार भी रहता है पर सोसाइटी के लोगों ने इस मुस्लिम परिवार के घर का पानी और बिजली बंद कर रक्खी है पिछले सालों से ये परिवार लालटेन और मोमबत्ती की रौशनी से अपने घर मे उजाला करता है और मुनिस्पल्टी के नल से जरी कैन मे पानी भर-भर कर अपने घर लाता हैवो भी सीढियों के रास्ते क्यूंकि लिफ्ट मे तो उनको चलने की मनाही है हफ्ते मे एक दिन वो अपने किसी दूसरे रिश्तेदार के घर जा कर परिवार के कपड़े धोते है

इस मुस्लिम परिवार का कहना है कि बिजली-पानी के लिए उन्होंने .२५ लाख का डिपॉजिट भी सोसाइटी को महीने पहले दे दिया था पर आज तक ना तो पानी और ना ही बिजली उनके घर मे आई

इस परिवार को सोसाइटी से बाहर करने के लिए भी बाकी दूसरे परिवार लगे हुए है और उन्हें उस सोसाइटी से चले जाने को कहते हैपर ये मुस्लिम परिवार सोसाइटी छोड़कर नही जाना चाहता है क्यूंकि आख़िर उसने मकान खरीदा ही है रहने के लिए

पिछले दो सालों से बर्दाश्त करते-करते अब इस परिवार की सहन शक्ति ख़त्म हो रही है इस लिए इस परिवार ने माईनोर्टी कमीशन मे जाने की सोची है जिससे उन्हें उनका हक़ मिल सके

क्या इस हाऊसिंग सोसाइटी मे रहने वालों की इंसानियत बिल्कुल ख़त्म हो गई है

Thursday, March 27, 2008

कई बार हमारे उच्चारण शब्द को बदल या तोड़ देते है और हमे पता ही नही चलता है। और उच्चारण का ये फर्क हमने यहां गोवा आकर ही जाना है। पहले तो सिर्फ़ सुनते थे की champagne को शैम्पेन कहा जाता है फ्रेंच मे । पर यहां आकर तो हम इस तरह के उच्चारण से रूबरू भी हुए ।जैसे यहां पर एम (M) ज्यादातर शब्दोंमे नाम के आख़िर मे होते है पर साथ ही M ज्यादातर शब्दों मे मूक होता है । टी (t) को त बोलते है ।यूं तो स को श और श को स तो बोलते सुना है च को स बोलते सुना है गोवा से पहले अंडमान मे जो हमारा कुक था वो को बोलता था मसलन शाय,शीनी वगैरापर यहां तो को और को बोलते है ना को ण आदि। हो सकता है इनके शब्दों के ऐसे उच्चारण का कारण शायद पुर्तगीज के यहां बहुत समय तक रहने की वजह हो



गोवा मे इंग्लिश मे अधिकतर शब्दों के अंत मे एम (M) लगता है पर एम साइलेंट होता है। जैसे panjim,,bicholim,siolim,morjim, इत्यादी। अब आम हिन्दी भाषी होने के नाते हम लोग इनका उच्चारण पंजिम,बिचोलिम,सिओलिम,मोरजिम ही करते थे पर जब किसी लोकल goan से कहते सिओलिम तो वो कहते अच्छा सिओली। sanguem इसे यहां सांगे कहते है। इसी तरह nuvem को नेवे,quepem को केपे,velim को वेली,thivim को थीवी और भी बहुत से ऐसे शब्द है।

ये तो रहते-रहते अब कुछ-कुछ समझ गया है पर अभी भी बहुत से ऐसे शब्द है जिन्हें इंग्लिश,हिन्दी और कोंकणी मे अलग-अलग तरह से बोला जाता हैउच्चारण के फ़र्क की वजह से कई बार लोगों को समझाने मे बड़ी दिक्कत होती है


पंजिम मे ही एक कालोनी है जिसका नाम fontainhas है । जब नए-नए थे तो ड्राईवर को कहा की फोंटेनास जाना है तो उसने पलट कर हमे पूछ ये कहाँ है ।
जब हमने कहा चलो रास्ता बताते है तो थोडी दूर जाने पर जैसे ही फोंटेनास के लिए मुड़े तो बोला ओह तो आप फोंतेना कह रही थी।
बड़ी जोर से गुस्सा भी आया और खीज भी हुई पर फ़िर समझते देर नही लगी कि उच्चारण का फर्क है।

गोवा मे ऊँची पहाड़ी जगह को altinho कहते है।शुरू मे हम लोग altinho को अल्टिनो बोलते तो यहां वाले फट से सुधार करके कहते अल्तीन । अब अल्तीन और अल्टिनो मे त और ट का फर्क है ना इसलिए तो लोगों को समझने मे दिक्कत होती थी बाद मे पता चला कि यहां टी शब्द तो है ही नही बल्कि टी को त बोलते है।

इसी तरह ना शब्द को कहीं-कहीं ण बोलते है। जैसे concona अब इसे हम जैसे लोग तो कनकोना बोलेंगे पर यहां कणकोण बोलते है।
फ्रेंच की तरह यहां भी चा को कुछ लोग चा तो कुछ शा बोलते है। अब यहां पर एक फोर्ट है chapora फोर्ट। अब इस फोर्ट तक जाने का जब रास्ता पूछने के लिए हम जिससे भी चपोरा बोलते वो हमे रास्ता दिखाते हुए कहते शपोरा बस थोडी दूर है।
चा को सा और सा को का एक और उदाहरण हमारे घर मे भी है इंदुमती जो खाना बनाती है वो भी उल्टा ही बोलती है यानी को बोलती है। ऐसे ही एक दिन हम अपनी पोस्ट लिख रहे थे कि वो आई और बोली कुर्ची आई है। उसे कहाँ रक्खे। तो हमे समझ ही नही आया कि कुर्ची क्या बला है।अब हमारा ध्यान तो अपनी पोस्ट लिखने मे था इस लिए २-३ बार पूछने पर जब हमे नही समझ आया तो हमने कहा कि क्या कहाँ रखने को कह रही दिखाओ तो उसने कुर्सी की ओर इशारा किया । और ये सुनकर हम समझ नही पाये की हँसे या क्या करें।वो तो बाद मे पता चला की वो चा को सा और सा को चा बोलती है। चावल वो सावल औए इंग्लिश के rice को राईच कहती है।

अभी तो फिलहाल इतने ही शब्दों का पता चला है आगे अगर कुछ और नए शब्द और उच्चारण पता चलेंगे तो जरुर लिखेंगे।

नोट-- और हाँ अब तो हम भी अल्तीनो ,फोंतेना,सांगे,थीवी,शापोरा, और सियोली बोलने लगे है।



Wednesday, March 26, 2008

आज बस यूं ही मौसम को देख कर हमे भी एक बचपन की कुछ कविताएं याद आ गई।थोडी बेसिर पैर की है पर बचपन मे इन्हे जोर-जोर से बोलने मे बड़ा मजा आता था। वैसे ये पहली लाला जी वाली कविता तो हिन्दी की किताब मे सचित्र पढी थी।

लालाजी ने केला खाया
केला खाकर मुंह बिचकाया।
मुंह बिचकाकर तोंद फुलाई
तोंद फुलाकर छड़ी उठाई।
छड़ी उठाकर कदम बढ़ाया
कदम के नीचे छिलका आया ।
लालाजी गिरे धड़ाम से
बच्चों ने बजाई ताली।

चलिए एक और ऐसी ही छोटी सी मस्ती भरी कविता पढिये।

मोटू सेठ सड़क पर लेट
गाड़ी आई फट गया पेट
गाड़ी का नम्बर ट्वेन्टी एट (२८)
गाडी पहुँची इंडिया गेट
इंडिया गेट पर दो सिपाही
मोटू मल की करी पिटाई।

लगे हाथ इसे भी पढ़ लीजिये।

मोटे लाला पिलपिले
धम्म कुंयें मे गिर पडे
लुटिया हाथ से छूट गई
रस्सी खट से टूट गई।

Tuesday, March 25, 2008

क्या आपको हमारी बात पर यकीन नही हो रहा है।लीजिये सारी जगह शोर मचा हुआ है। अरे अब ग्रेग के बाद गैरी जो आ गए है । बड़ी मुश्किल से तो टीम इंडिया गुरु ग्रेग के बताये हुए नुस्खों से बाहर निकल पायी और टीम इंडिया मे दुबारा भरोसा बनना शुरू हुआ पर लगता है बी.सी.सी.आई. से टीम इंडिया और भारतीय जनता की खुशी देखी नही जा रही है तभी तो एक नया कोच गैरी क्रिस्टन टीम के लिए रख लिया गया है।

एक ग्रेग को रख कर देखा और नतीजा जो हुआ वो सारा भारत क्या सारी दुनिया जानती है कि किस तरह टीम इंडिया विश्व कप मे हारी थी और वो भी बांगला देश के हाथों। पर शायद अभी भी बी.सी.सी.आई को कुछ और ही मंजूर है।तभी तो फ़िर एक बार नया विदेशी कोच लाया गया है। भाई जब भारतीय मैनेजर और कोच टीम इंडिया को सही राह दिखा रहे है तो फ़िर विदेशी कोच की क्या जरुरत है।पर बी.सी.सी.आई और पवार साब को कौन समझाए। पवार साब अपने मंत्रालय की बजाय क्रिकेट मे लगे रहते है।पर क्रिकेट की तरह अगर अपने मंत्रालय पर जरा ध्यान दे तो शायद ज्यादा बेहतर होगा। (क्या पता किसानों का कुछ भला ही हो जाएक्यूंकि लोन माफ़ी मे तो बहुत सारे गड़बड़ घोटाले है ऐसा सुनने मे रहा है। ) पर कहाँ बी.सी.सी.आई.मे जैसी पैसों की बारिश हो रही है उसके आगे मंत्रालय की भला क्या बिसात।

जब से टीम इंडिया बिना किसी विदेशी कोच के खेल रही है तब से कम से कम जीत तो रही है वरना तो टीम इंडिया और हार का साथ बिल्कुल फैविकोल के जोड़ जैसा हो गया था।छूटेगा नही जैसा ।इस बिना विदेशी कोच के दौर मे टीम इंडिया ने ना केवल बांगला देश बल्कि इंग्लैंड,पाकिस्तान,ऑस्ट्रेलिया जैसी टीमों को हराया बल्कि twenty-२० world कप भी जीता ।

पर बी.सी.सी.आई. उस कहावत पर अमल नही कर रही है कि दूध का जला छान्छ भी फूंक-फूंक कर पीता है विदेशी कोच का जलवा तो जल्दी ही दिखने लगेगा भाई टेस्ट मैच जो शुरू हो रहा हैपर गनीमत है कि रोबिन सिंह और वेंकटेश प्रसाद को नही हटाया है ।इसलिए थोडी उम्मीद है की शायद जिस तरह पिछली बार लुटिया डूबी थी पर इस बार नही डूबेगी।



Monday, March 24, 2008


आज हम कुछ ज्यादा लिखेंगे नही बस ये चंद फोटो लगा रहे है।कल शाम ५ बजे खूब जोरदार बारिश हुई थी और उस दौरान प्रकृति का ये नजारा देखने को मिला यानी की इन्द्र धनुष ।बारिश के पहले घने बादलों ने कुछ इस तरह से पंजिम को घेरना शुरू किया था





इसमे इन्द्र धनुष बारिश के बीच मे बनता हुआ दिख रहा है।



और इस फोटो मे बारिश के बाद खिली हुई धूप मे इन्द्र धनुष दिख रहा है।










बड़े सालों बाद इन्द्र धनुष देखने को मिला क्यूंकि दिल्ली की ऊँची-ऊँची इमारतों इन्द्र धनुष क्या आसमान भी ठीक तरह से नही दिखता है।



Sunday, March 23, 2008


कहिये आप लोगों की होली कैसी रही।आशा है की आप लोगों ने भी खूब होली खेली होगी और मस्ती की होगी। भाई हमारी होली तो बढ़िया रही। और इस बार गोवा की होली का भी भरपूर मजा हमने उठाया। इस बार गोवा मे होली के अवसर पर गुलालोत्सव मनाया गया।२१ तारिख को पेपर मे ख़बर छपी थी की पंजिम के आजाद मैदान मे गुलालोत्सव मनाया जायेगा ९.३० से १२.३० । इसके लिए एक यात्रा पंजिम के महा लक्ष्मी मन्दिर से परम्परा गत तरीके से ९.३० बजे ढोल और ताशे बजाते और नाचते हुए आजाद मैदान जायेगी जहाँ पर गुलाल से होली खेली जायेगी।और १२.३० बजे कारों की रैली पूरे पंजिम शहर मे निकाली जायेगी। दिल्ली मे इस तरह का सामुहिक आयोजन आम तौर पर कालोनी मे तो होता है पर शहर मे ऐसा आयोजन पहली बार सुना था। इसलिए सोचा की इस बार गोवा की होली का पूरा मजा लिया जाए। और हाँ इस आयोजन की ख़ास बात ये थी कि कोई भी किसी को जबरदस्ती रंग नही लगायेगा ।अगर कोई रंग लगवाना चाहता है तभी रंग लगाया जायेगा।और वहां पर औरकेस्त्रा पार्टी भी थी लोगों का मनोरंजन करने के लिए।
इस फोटो मे ये जो दो बच्चियां दिख रही है ये पूरी मस्ती मे ड्रम बजा रही थी।


वैसे गोवा मे पिछले साल भी हमने देखा था की यहां पर लोग ना तो गाड़ियों पर रंग या गुब्बारे मारते है और ना ही राह चलते आपको रंग लगाते है या कुछ उल-जुलूल हरकत करते है।पिछले साल पंजिम से कैलेंगुट की १३-१४ कि.मी.की ड्राइव मे आने-जाने मे कोई भी रंग डालने वाला नही दिखा था।

खैर इस साल सुबह साढ़े नौ बजे तो हम नही निकल पाये अरे इतना सारा खाना जो बनाना होता है। फ़िर ११ बजे सबसे पहले कुछ दोस्त हम लोगों के घर आए और फ़िर हम सभी अपने एक दोस्त के घर होली खेलने गए बिल्कुल यू.पी.बिहार स्टाइल मे होली खेली यानी सिर्फ़ गुलाल नही रंगों से और पानी से होली खेली। और फ़िर रंगे-पुते कार मे चल पड़े आजाद मैदान की ओर गुलालोत्सव देखने। ।हालंकि वहां बहुत ज्यादा भीड़-भाड़ नही थी पर फ़िर भी लोग नाचते-गाते दिखे । औरकेस्त्रा पार्टी के संगीत पर जनता पूरी मस्ती मे नाच रही थी।वहां जाने पर पता चला की मुख्य मंत्री भी वहां आने वाले है पर उन्हें देर हो रही थी और वहां औरकेस्त्रा पार्टी ने जो गाना गया वो था पिया तू अब तो जा ....। :) वहां थोडी देर रुक कर हम लोग dona paula गए। (ये वहीं जगह है जहाँ एक-दूजे के लिए फ़िल्म की शूटिंग हुई थी ) वैसे तो वहां पर आम दिनों की तरह टूरिस्ट की ही भीड़ थी बस कुछ लोग ही रंग मे रंगे हुए घूम रहे थे।और उन रंगे हुए लोगों मे हम लोग भी थे। :)


dona paula से लौटते-लौटते बारिश आ गई थी इसलिए बाकी और जगह घूमने और चक्कर लगाने का कार्यक्रम छोड़कर हम लोग घर आ गए और वैसे भी तब तक हम लोग थक भी चुके थे।और घर आकर नहाने और रंग छुड़ाने का बड़ा काम भी तो करना था।

Friday, March 21, 2008

होली इस शब्द का जितना मजा बचपन मे लिया वो तो भुलाए नही भूलता है।होली का इंतजार होली के अगले दिन से ही शुरू हो जाता था ।अरे जिसने रंग ज्यादा लगाया या जिसको रंग कम लगा पाते थे उससे अगली होली मे निपटना जो होता था। :)

होली के आगमन का एहसास चिप्स की तैयारी से होता था। होली के हफ्तों पहले से मम्मी घर मे तरह-तरह की चिप्स बनाने लगती थी।अब उस ज़माने मे तो लोग घर की ही बनी स्वादिष्ट चिप्स खाते थे।होलिका दहन के दिन घर मे उपटन बनता और लगाया जाता और फ़िर होलिका मे डाला जाता इस विश्वास के साथ की सब बुराइयों का अंत हो।
हमेशा होली के एक दिन पहले दोपहर मे २ बजे से गुझिया बनने का कार्यक्रम शुरू होता था जो रात तक चलता था। साथ मे मठरी ,खुरमा भी बनाया जाता था।घर मे मम्मी के साथ हम सभी भाई-बहन मिल कर गुझिया बनवात थे और भइया कई बार गुझिया तलने का काम करते थे।(क्यूंकि पापा को नौकरों के हाथ की बनी गुझिया पसंद नही आती थी। )क्या जोश और उत्साह होता था। अगले दिन होली की सुबह मालपुआ बनता और उसके बाद खाना बनाने का काम शुरू होता जिसमे मम्मी कबाब और मीट बनाती और बाकी खाना नौकर बनाते जिसमे पूड़ी,कुम्ह्डे की सब्जी, बैगन की कलौंजी ,कटहल की सब्जी चने की दाल की पूरी,उरद की दाल की कचोडी,और पुलाव बनता।(पहले मायके मे फ़िर ससुराल और अब हम भी ये सब बनाते है )

इलाहाबाद मे जिस मुहल्ले मे हम लोग रहते थे वहां हर घर मे कम से कम चार लड़कियां तो थी ही और किसी-किसी घर मे तो ५- ६ लड़कियां भी होती थी। (वो पहले लड़कियों को मारने का ज्यादा चलन जो नही था ) । घर मे सुबह नाश्ते के साथ ही होली शुरू हो जाती ।घर मे बड़े से ड्रम मे रंग और साथ ही रंग की अलग-अलग बाल्टियां ,सूखे मुंह मे लगाने वाले रंगों के अलग से पैकेट होते ,अबीर,गुलाल,पिचकारी । और घर के आँगन मे एक बड़े से हंडे मे गरम पानी मे टेसू के फूल भिगाये जाते। और चूँकि उस ज़माने मे होली मे हमेशा सफ़ेद कपड़े पहन कर खेलने का रिवाज था तो टेसू के फूल का पीला रंग बहुत ही अच्छा खिलता था। पापा और मम्मी की तो टेसू से ही होली होती थी।

नाश्ते के बाद तो हम लोग जो घर से निकलते तो २ बजे के पहले वापिस नही आते ।सबसे पहले हम लोग हर घर मे एक-एक करके जाते और चाची और चाचा (तब अंकल आंटी नही कहते थे)और बड़े-बुजुर्गों को शराफत से रंग लगाते और फ़िर सब बच्चा पार्टी जिसमे लड़के और लड़कियां होते थे खूब धूम कर होली खेलते।और उन्ही रंगे हाथों से किसी घर मे गुझिया,तो किसी मे दही बड़े,तो कहीं समोसे खाते घुमते । और धीरे-धीरे इसी तरह हर घर मे खेलने के बाद हम लोगों की टोली बड़ी होती जाती । आख़िर मे हमारे घर पूरी टोली आती और आँगन मे इतनी धमा-चौकडी होती की सारी रंग की बाल्टियां कम पड़ जाती। क्यूंकि बाल्टी का ज्यादा रंग तो एक-दूसरे पर डालने और बचने मे जमीन पर ही गिर जाता था।और सबकी शक्लें भूत जैसी कोई हरा तो कोई लाल तो कोई बैगनी और सबके सिर तो अलग-अलग रंग के अबीर-गुलाल से भरे होते।और एक काम हम लोग करते थे सबकी पीठ पर छापे मारने का । और ऐसे मे कई बार लोगों से बदला भी पूरा हो जाता था (अरे मारने का ) । :)

खेलने के बाद सबसे मजा रंग छुड़ाने मे आता। आँगन मे साबुन और शीशा लेकर लाइन से हम सभी भाई-बहन बैठ कर रंग छुड़ाने मे जूटते और तब होली खेलने का असली मजा मिलता था जब रंग छुटते नही थे ।फ़िर भी किसी तरह नहा धोकर (आधे रंगे हुए ) नए कपड़े पहनते और एक बार फ़िर से खाने की टेबल पर सभी एक -दूसरे को गुलाल से टीका करते और शाम को फ़िर से लोगों के घर मिलने-जुलने का कार्यक्रम शुरू हो जाता था जो रात तक चलता था।


आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं

नोट -- होली की एक और ख़ास बात होती थी पहले घर मे सबके कपड़े एक से होते थे। :)

क्यूं आपके यहां ऐसा नही था क्या

तो अगले तीन दिनों तक छुट्टी अरे भाई होली है भाई होली है



Thursday, March 20, 2008

मार्च का महीना यानी दसवीं और बारहवीं के बोर्ड के इम्तिहान का समय । हर साल फरवरी और मार्च के महीने मे छात्र -छात्राओं द्वारा आत्महत्या की खबरें पढने -देखने को मिलती है। बच्चों के कोमल दिमागमे पढ़ाई के साथ-साथ मे बोर्ड और फ़ेल और पास होने को लेकर इतना भय रहता है की कई बार बच्चे ऐसी परिस्थितियों से छुटकारा पाने के लिए आत्महत्या का सहारा ले लेते है। ऐसे कदम उठाने मे बच्चे का कोई दोष नही होता है बल्कि माँ-बाप और स्कूल वाले ही उन्हें एक तरह से ऐसा करने को उकसाते है।

आज के समय मे जहाँ हर कोई ९० %और १०० %की बात करता है वहां ६०-७०और ८० % वालों की कोई पूछ नही है। पर क्या हमारी शिक्षा प्रणाली इसके लिए जिम्मेदार है।अभी दो-तीन दिन पहले संसद मे भी इस विषय पर चर्चा हुई थी और ये कहा जा रहा है कि इम्तिहान का सिस्टम ही खत्म कर देना चाहिए।पर क्या इमिहान ख़त्म कर देने से सब समस्या हल जायेगी।
खैर अगर हम अपने समय की बात करें तब तो हम लोगों के पास(यू.पी.बोर्ड मे ) ओप्शन होता था आर्टस और साईंस का और अपनी पसंद के विषय पढने का।कोई भी पाँच विषय लिए जा सकते थे। उस समय ये नही होता था की सोशल साईंस मे चारों विषय पढो (his.geo.civ.eco.) और उस समय यानी सत्तर के दशक मे तो ६० % आना ही बहुत बड़ी बात मानी जाती थी और लोग ७५ %पर टॉप भी कर जाते थे। हमारे समय मे रिजल्ट फर्स्ट डिविजन,गुड सेकंड क्लास,सेकंड डिविजन,थर्ड डिविजन होता थाऔर उस समय डिविजन पूछी जाती थी % नहीपर अब तो बच्चों का रिजल्ट % से जाना जाता है


पर जब हमारा बेटा दसवीं मे पहुँचा तब समझ मे आया की दसवीं यानी सी.बी.एस.सी. बोर्ड क्या होता है। बेटे को १० विषय पढने पड़ते थे । सोशल साईंस के नाम पर चार अलग-अलग किताबें (his,geo,civ,eco)और साईंस के नाम पर तीन अलग-अलग किताबें (bio,chem,phy. )पढ़नी पड़ती थी। और हर किताब मे १५ से २० चैप्टर होते थे किसी किसी मे तो २५ चैप्टर होते थे । सभी को पढ़ना और याद रखना और फ़िर इम्तिहान देना कोई आसान नही था। history मे ७०-७० पन्ने के चैप्टर होते थे(ढेर सारी तारीखें और रेवोलुशन को याद रखना ) तो साईंस मे ढेरों दाइग्राम और maths तो लगता की जो कुछ बी.एस.सी.मे पढाया जाता था वही सब बेटा दसवीं मे पढ़ रहा था।साथ ही हिन्दी,इंग्लिश और एक और भाषा(second language) फ्रेंच,संस्कृत,या जर्मन भी पढ़नी पड़ती थी। बेटे की इतनी पढ़ाई देख कर लगता था की अगर हम बेटे की जगह होते तो शायद फ़ेल ही हो जाते। :)

और जब हमारा छोटा बेटा दसवीं क्लास मे पहुँचा (२००३-२००४ मे ) तो पढने तो उसे भी दस विषय थे पर second language का चक्कर नही था। पर छोटे बेटे का दसवीं का सिलेबस बड़े बेटे की तुलना मे बहुत कम हो गया था । छोटे की सोशल की चार किताबों की जगह अब एक किताब हो गई थी(सोशल मे चैप्टर छोटे हो गए थे। history मे बदलाव हो गया था , अब ढेर सारी तारीखों और रेवोलुशन की जगह आर्कियोलोजी पढ़ना पड़ता था)और साईंस की भी एक ही किताब हो गई थी।हिन्दी बहुत आसान हो गई थी।हाँ maths और इंग्लिश मे ज्यादा अन्तर नही आया था। पर मार्किंग स्कीम मे कुछ बदलाव आ गया था।

ऐसा नही था कि हम लोगों के समय मे बोर्ड का खौफ नही था पर तब माँ-बाप इतना ज्यादा बच्चों पर प्रेशर नही डालते थे।और ना ही % की इतनी मारा-मारी होती थी।जबकि उस समय छात्र-छात्राओं के पास बहुत ज्यादा ओप्शन नही होते थे की बारहवीं पास करने के बाद क्या करेंगे। ज्यादातर लोग इन्जीनिएरिंग या मेडिकल की परीक्षा देते थे और बी.ए -बी.एस.सी करते थे। पर आज वैसे हालत नही है आज बच्चों के पास बहुत सारे ओप्शन होते है। पर असली समस्या % की है क्यूंकि जब७०-८० % से बारहवीं मे पास होने वाले बच्चे को किसी अच्छे कोलेज (दिल्ली या मुम्बई )मे admission नही मिलता है तो जाहिर है कि बच्चे निराश होते है।( इसके लिए तो कोलेज की संख्या बढ़ानी चाहिए जिससे हर बच्चे को admission मिल सके। तो शायद कुछ सुधार हो)इतना अधिक कोम्पतीशन जो बढ़ गया है की बच्चे तो बच्चे माँ-बाप भी इस कोम्पतीशन की भाग-दौड़ मे शामिल हो जाते है ।

अगर सांसदों की बात मान ली जाए की दसवीं और बारहवीं के इम्तिहान नही होने चाहिए तो क्या बच्चे को आगे इम्तिहान देने मे कोई परेशानी नही होगी । दसवीं के इम्तिहान बच्चों के लिए नींव का काम करते है। जरुरत है तो स्कूल और घर मे बच्चों पर दबाव कम करने की। अगर माँ-बाप और स्कूल मे टीचर बच्चों की हौसला बढाये और बच्चों की परेशानी समझे क्यूंकि हर बच्चे की क्षमता अलग-अलग होती है।हर बच्चा ९० % नही ला सकता है।स्कूल मे बच्चे के मार्क्स जब कम आते है तो स्कूल की टीचर्स और प्रिंसिपल माता-पिता की क्लास लेती है और कई बार तो स्कूल धमकी भी देता है कि अगर बच्चा अच्छे नम्बर नही लाएगा तो उसे अगली क्लास मे नही भेजा जायेगा

और हाँ याद आया कि यहां गोवा मे बच्चों को फ़ेल करने का सिस्टम नही है। अगर बच्चा फ़ेल भी होता है तो उसे अगली क्लास मे प्रमोट कर दिया जाता है और इसी वजह से गोवा मे ड्राप-आउट रेट बहुत ज्यादा है।पर शायद ये भी ठीक नही है क्यूंकि बच्चे निश्चिंत रहते है कि उन्हें अगली क्लास मे तो प्रमोशन मिल ही जायेगा।

इसलिए हमारा तो यही मानना है की सिस्टम मे बदलाव से ज्यादा जरुरी है माँ-बाप को अपनी सोच बदलने की । स्कूल को अपने रिजल्ट की चिंता करने की बजाय उसमे पढने वाले छात्र-छात्राओं की ज्यादा चिंता करनी चाहिए। ये जरुरी नही है की सिर्फ़ ९० % लाने वाला बच्चा ही जिंदगी मे आगे बढ़ता है ५०% लाने वाला बच्चा भी आगे जिंदगी मे बहुत कुछ कर सकता हैअगर उसे मौका मिलेगा तो

Wednesday, March 19, 2008



कल पंकज जी की पोस्ट पढी थी जिसमे उन्होंने अशोक के पत्ते के बारे लिखा था।और उनकी उसी पोस्ट ने हमारे मन मे ये जिज्ञासा जगाई और आज इसलिए हम ये सवाल पूछ रहे है।असल मे हमारे इस गोवा वाले घर मे भी एक उल्लू महाराज रहते है , आम तौर पर तो ये रात मे ही बाहर निकलते है पर एक बार ये महाराज शाम को ही बाहर निकल आए थे इन्हे शायद कुछ समय का confusion हो गया था। :) पर जब तक हम कैमरा लाते ये महाशय वापस अपने घर मे चले गए थे। और फ़िर रात होने पर ही निकले थे। इस फोटो मे आप इन्हे देख सकते है हालांकि फोटो ज्यादा अच्छी नही आई है क्यूंकि एक तो रात हो गई थी और दूसरे एक -दो फोटो खींचवाने के बाद ये उड़ जाते है अब तो कभी-कभार हम इन उल्लू महाराज से (बिल्कुल सलीम अली की तरह)बात भी करते है :)



वैसे इस सवाल पर दो तरह की धारणाएं हम सुनते रहे है

) आज नही हमेशा लोगों को कहते सुना है की जिस घर मे उल्लू बसते है वहां लक्ष्मी का वास होता है आखिर लक्ष्मी जी का वाहन जो है।( तो क्या हमे छप्पर फटने का इंतजार करना चाहिए । ) :)
) पर साथ ही ये भी सुनते रहे है कि घर मे उल्लू का रहना अच्छा नही होता है।

तो कौन सी धारणा को मानना चाहिए।
या दोनों ही धारणाओं को नही मानना चाहिए
अरे तब तो हमारा बड़ा नुकसान हो जायेगा :)

Tuesday, March 18, 2008

ओह हो शीर्षक देख कर चौंकिए मत। यहां हम अपनी बात नही कर रहे है बल्कि अपने पापा-मम्मी के बारे मे बात कर रहे है। दरअसल मे कल हमारी पापा से फ़ोन पर बात हो रही थी और बातों ही बातों मे हमने उनसे पूछा कि आप ने किताब के लिए कुछ लिखना शुरू किया या नही

तो इस पर पापा बोले कि उन्होंने मम्मी के साथ हुए एक वाक़ये को कुछ लिखा तो है पर फ़िर आगे लिखने का मन नही हुआ
हमारे कहने पर कि आप थोड़ा -थोड़ा ही लिखिए पर लिखिए जरुरइसपर पापा ने हमे बताया कि उन्होंने क्या लिखा था

ये किस्सा उस समय का है जब पापा-मम्मी की नई-नई शादी हुई थी उस समय पापा यूनिवर्सिटी मे पढ़ते थे और होस्टल मे रहते थेऔर चूँकि उस ज़माने मे पढ़ते हुए शादी हो जाती थी इसलिए मम्मी अपनी ससुराल मे रहती थीससुराल मे बाबूजी,दादा(जेठ )बड़ी अम्मा (जेठानी) रहते थे

उस ज़माने मे ससुर जी और जेठ से बहुत ज्यादा बात करने का रिवाज नही था हालांकि बाबूजी हमेशा मम्मी से बात करते थे क्यूंकि हमारी दादी नही थीपापा हॉस्टल चले जाते और शनिवार और रविवार की छुट्टी मे घर आते थे और सोमवार को वापिस अपने हॉस्टल चले जाते थेबाबूजी और दादा अपने-अपने office चले जाते थे और बड़ी अम्मा का अपना मिलने-जुलने का कार्यक्रम रहता था और चूँकि मम्मी नई-नई थी इसलिए वो हर जगह नही जाती थी और घर मे रहती थी और घर मे उनका साथी रेडियो होता थामम्मी को संगीत का बहुत शौक था और वैसे भी अकेले मे रेडियो से अच्छा साथी तो कोई हो ही नही सकता था।(बड़ा सा भूरा और पीले रंग का। )

ऐसे ही एक शनिवार जब पापा हॉस्टल से घर आए तो मम्मी ने उन्हें बताया की रेडियो ख़राब हो गया है इसे बनवा दीजिये
पापा के पास रविवार का दिन था और रविवार को दूकान बंद रहती थी इसलिए पापा ने मम्मी से कहा की बाबूजी या दादा से वो कह देंगे रेडियो बनवाने के लिए
और पापा सोमवार को अपने हॉस्टल चले गए पर ना तो बाबूजी और ना ही दादा के पास इतना समय था की वो रेडियो बनवाते और ना ही बीच मे मम्मी ने बाबूजी या दादा से रेडियो बनवाने के लिए कहालिहाजा रेडियो जस का तस ख़राब ही पड़ा रहा और पूरा हफ्ता बीत गया अगले हफ्ते जब पापा फ़िर घर आए तो मम्मी ने उन्हें रेडियो बनवाने के लिए कहा

तो पापा ने कहा की अगले हफ्ते बनवा देंगे पापा का इतना कहना था कि मम्मी ने नाराज होकर कहा की हमार बियाह तो रेडियो से ही हुआ है ना और इस रेडियो बिना हमारा गुजारा नही है

मम्मी के ऐसा कहने पर पापा पहले तो खूब हँसे और फ़िर बाद मे उसी दिन रेडियो भी बनवाया

Friday, March 14, 2008

गोवा जो अभी कुछ दिन पहले तक तो अपने सुंदर beaches और बेफिक्र माहौल के लिए जाना जाता था वही गोवा आजकल scarlett मर्डर केस के लिए जाना जा रहा है। मुम्बई और दिल्ली जैसे शहरों मे तो ऐसी घटनाएं होती थी पर अब गोवा भी इस तरह की घटना से अछूता नही रह गया है। पिछले डेढ़ साल मे जब से हम यहां है पहले तो यदा-कदा ही मर्डर वगैरा सुनाई देते थे पर अब धीरे-धीरे यहां भी ये सब होने लगा है। दिल्ली,मुम्बई मे तो आए दिन सुनते थे पर गोवा जैसी जगह मे इस तरह का हादसा होना गोवा के लिए अच्छा नही है क्यूंकि गोवा एक ऐसी जगह है जहाँ हर कोई अपनी मर्जी से रह सकता है अपने मन मुताबिक कपड़े पहन सकता है और जहाँ देर रात मे भी घूमना बिल्कुल सुरक्षित माना जाता है।गोवा के लिए कहा जाता है की गोवा सबसे सेफ और फ्री प्लेस है। पर आजकल के हालात देखते हुए ये कहना ग़लत नही होगा की अब गोवा भी अब .....

scarlett जो की एक १५ साल की ब्रिटिश लड़की थी जिसका मृत शरीर अंजुना beach पर १८ फरवरी को मिला था और पुलिस ने इसे डूबने से हुई मौत बताकर एक तरह से केस खत्म सा कर दिया था।क्यूंकि डूबने से मौत होना ना तो असाधारण बात थी और ना ही कोई नामुमकिन सी बात थी क्यूंकि यहां पर अक्सर लोग डूब कर अपनी जान गवां बैठते है।पर scarlett की माँ ने इसे शुरू से डूबने से हुई मौत ना मानकर रेप और मर्डर की बात की जिसे शुरू मे पुलिस ने नही माना था और अगले१० -१५ दिन तक यही निश्चित नही हो रहा था की scarlett की मौत डूबने से हुई या उसकी हत्या हुई थी।और अंत मे इसे डूबने से हुई मौत बताया गयापर scarlett की माँ fiona का कहना था की scarlett डूबकर नही मर सकती क्यूंकि वो बहुत अच्छी तैराक थी।इसके अलावा scarlett के शरीर पर चोटों के निशान भी थे जिन्हें एक तरह से नजरअंदाज किया गया था। २३ की जगह ५ निशान बताये गए थे।


इस scarlett मर्डर मे शुरू से ही कुछ बातें अजीब सी थी जैसे scarlett अकेले अपने एक लोकल (goan) दोस्त के साथ रह रही थी। उसकी माँ fiona scarlett को यहां अकेले छोड़कर कर्नाटक घूमने गई थी।scarlett ने उस दिन पार्टी दी थी।शैक के लोगों से उसकी अच्छी दोस्ती थी।

इसके अलावा पुलिस और डॉक्टर की भूमिका भी संदिग्ध सी रही। अंजुना के आस-पास रहने वालों को भी पुलिस पर शक था की वो असली गुनाहगार को बचा रही है। करीब एक हफ्ते पहले यहां के लोकल अखबार मे छपा था की उस समय जो जूनियर पुलिस अफसर था उसने इसे रेप और हत्या का मामला बताया था परpsi ने बात अनसुनी कर दी और उस जूनियर अफसर को छुट्टी पर चले जाने को कहा और सारा केस ख़ुद हैंडल करने लगा।यहां तक की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट मे भी scarlett की मौत की वजह पानी मे डूबने को बताया गया। psi की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी किस तरह उसने इस पूरे केस को पलट दिया था .अब इस psi को सस्पेंड कर दिया गया है
ब्रिटिश मीडिया के आने और fiona के बार-बार कहने पर इसे डूबने से हुई मौत ना मानकर रेप और मर्डर माना गया। fiona ने हर सम्भव कोशिश करके दोबारा autopsy करवाई और इस autopsy की रिपोर्ट मे कहा गया की scarlett की हत्या के पहले उसका रेप किया गया था।बाद मे पुलिस , मुख्य मंत्री,गृह मंत्री ,पर्यटन मंत्री के हस्तक्षेप से इस केस की जांच नए सिरे से शुरू की गईऔर कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया गयाऔर आज पुलिस का कहना है की उसने ये केस सुलझा लिया हैपर fiona अब भी सीबीआई जांच की मांग कर रही है

कहीं इस हादसे से गोवा की sun.sand और sea की इमेज की जगह drug ,drink और death की इमेज ना बन जाए

इस घटना से कुछ सवाल उठते है जिनका जवाब मिलना नामुमकिन नही है

इस तरह के लोग क्या अंजाम के बारे मे बिल्कुल भी नही सोचते है
कुछ क्षणों के सुख के लिए किसी की इज्जत और जान ले लेना ,मानसिकता को दर्शाता है
जो लोग ऐसा काम करते है उन्हें क्या कानून का बिल्कुल भी डर नही हैशायद इसलिए क्यूंकि एक केस को ख़त्म होने मे कम से कम दस साल का समय लगता है




Tuesday, March 11, 2008

नब्बे के दशक मे कुछ मल्टी नेशनल बैंकों जैसे सिटी बैंक , एस.सी.बी.(stan chart bank) तथा कुछ अन्य बैंकों ने भारत मे जब .टी.एम की शुरुआत की थी तब लगता था कि क्या अपने हिन्दुस्तान मे ये क्रेडिट कार्ड और .टी.एम सेवा चल पाएगी क्यूंकि ना तो क्रेडिट कार्ड के बारे मे लोग जानते थे और ना ही .टी.एम जैसी मशीन के बारे मे भी लोगों ने सुना थाक्रेडिट कार्ड और एम.टी.एम का सबसे बड़ा फायदा था कि बिना बैंक जाए किसी भी समय वक्त-जरुरत पड़ने पर पैसा निकालाजा सकता थाउन दिनों तो ये बैंक एक तरह से लोगों को पकड़-पकड़ कर अपना ग्राहक बना रहे थेवैसे आज भी ये सिलसिला जारी है। :)

उस समय तक तो हर कोई बैंक से ही पैसा निकालने और जमा करने का आदी था।लोग बैंक मे सुबह दस बजे से ही पैसा निकालने के लिए लाइन मे लगते और कभी १०-१५ मिनट मे तो कभी आधा घंटा लगता पैसा निकालने और जमा करने मे। उस पर से अगर बैंक वाले चाय पीने चले जाते तो कभी पान खाने तो थोड़ा और इंतजार करना पड़ता था।

इंग्लिश फिल्मों मे तो बहुत बार देखा था मशीन से पैसा निकालते पर तब हमे लगता था कि भला मशीन कैसे पैसा देगी पर हमारा ये भ्रम कुछ सालों बाद टूटा जब इन बैंकों ने ए.टी.एम.दिल्ली मे लगाए। जब पहली बार हम लोगों ने एम.टी.एम.से पैसा निकाला तो बड़ा मजा आया था खूब खरे-खरे कड़क नोट मिले थे जबकि अपने बैंकों से लाइन मे लगकर पैसा निकालने पर कुछ अच्छे तो कुछ ख़राब कुछ गले नोट भी मिलते थे। क्यूंकि पहले सभी बैंक दोपहर दो बजे के बाद बंद(जनता के लिए) हो जाते थे। वैसे अब तो बैंक चार बजे तक खुले रहते है ।

.टी.एम ने भी भारत मे एक तरह की क्रांति कीपहले विदेशी बैंकों ने और फ़िर भारतीय बैंकों ने भी धीरे-धीरे एम.टी.एम.की शुरुआत की और अब तो हर छोटे-बड़े शहर मे हर बैंक का एम.टी.एम मिल जाता है।अब कहीं आने-जाने मे पैसा साथ ले जाने की जरुरत नही होती है।भारतीय बैंक डेबिट कार्ड तो देते है पर शायद क्रेडिट कार्ड नही देते है

एम.टी.एम तो हर जगह होते है पर कई बार जिस बैंक मे खाता होता है उसका एम.टी.एम नही मिलने पर लोग दूसरे बैंक के एम.टी.एम.से पैसा निकालते थे और इस ट्रांसिक्शन का बैंक चार्ज करता है ।वैसे हर बैंक का चार्ज रेट अलग-अलग होता है । पहले तो ७० रूपये एक ट्रांसिक्शन का लगता था पर अब शायद घट कर कुछ कम हो गया है।कहीं३० तो हैं ५७ रूपये लगते है। पर अब २००९ से कार्ड रखने वाले को किसी भी एम.टी.एम से पैसा निकालने और जमा करने पर कोई भी चार्ज नही देना पड़ेगा क्यों इसके लिए ये रिपोर्ट पढे

क्रेडिट कार्ड का फायदा है तो नुकसान भी हैफायदा ये है की आपके पास पैसा निकालने की लिमिट काफ़ी होती है पर नुकसान ये की उसपर ये मल्टी नेशनल बैंक इन्टरेस्ट तो लेते है साथ ही सर्विस चार्ज और ना जाने क्या-क्या चार्ज भी लगाते हैऔर अगर लेट पेमेंट है तो उसका भी चार्ज करते हैखुदा ना खास्ता अगर चेक वापिस हो जाए तो उसका जुर्माना भी देना पड़ता हैखैर अगर आपके पास कार्ड है तो २००९ के बाद आप किसी भी बैंक से बेधड़क पैसा निकाल सकते है बिना एक्स्ट्रा चार्ज की चिंता किए हुए

और भविष्य मे सभी भारतीय और मल्टी नेशनल बैंक .टी.एम.की सुविधा डेबिट कार्ड धारकों को भी मुफ्त मे देने लगेंगे

नोट-- क्रेडिट और डेबिट मे हमने भी १०,००० का आंकडा पार कर लिया।(अरे हिट्स मे) :)



Saturday, March 8, 2008

यहां गोवा मे लोग अखबार को माध्यम के तौर पर चुनते हैहर आम अखबार की तरह यहां के अखबार मे भी ना केवल बड़ी खबरें बल्कि छोटी खबरें भी छपती हैपर एक विशेष बात है की यहां के अखबार मे देश-विदेश की ख़बरों के साथ-साथ यहां बच्चों के जन्म की खबरें भी छपती है। जब भी किसी दंपत्ति को संतान होती है वो चाहे लड़का हो या लड़की उसकी ख़बर अखबार मे जरुर छपती है।

जहाँ हर रोज हर अखबार मे भ्रूण हत्या और पैदा होते ही लड़की को मारने की ख़बर छपती है वहीं यहां के अखबार मे बेटी पैदा होने की ख़बर छपती है।जो हमारे ख़्याल से बहुत ही अच्छी बात है।काश दूसरे लोग भी इनसे कुछ सबक सीखेंएक और बहुत अच्छा चलन है डॉक्टर को धन्यवाद देने का , जैसा की आप इन सभी विज्ञापनों मे देख सकते है

आज महिला दिवस है और इस अवसर पर हम गोवा के अखबार मे छपे कुछ विज्ञापनों को लगा रहे है। (माता-पिता और अन्य रिश्तेदारों के नाम हमने हटा दिए है। )


आप बस देखिये और अपनी राय दीजिये।
जब आप इन मे से किसी पर भी क्लिक करेंगे तो आप इन्हे आराम से देख और पढ़ सकेंगे

Friday, March 7, 2008

कल तीन महीने के दौरे के बाद टीम इंडिया कल भारत लौटी तो उसका जोरदार स्वागत हुआ और ढेर सारे इनाम भी दिए गए। अभी ये जश्न थमा भी नही था कि सारे न्यूज़ चैनल सभी नए और अविवाहित खिलाड़ियों की शादी और इश्क के चक्कर मे पड़ गए।कहीं धोनी को दिखाते की उनके लिए किस तरह लड़कियां शादी का प्रस्ताव रख रही है तो कहीं युवराज को दिखाते की उनकी शादी होते-होते रह जाती है। तो कहीं प्रवीण कुमार को दिखाते की उनके लिए कितने रिश्ते आ रहे है। तो कहीं इरफान पठन को दिखाते और उनके प्यार की कहानी बताते । अरे भइया अभी-अभी तो धोनी और युवराज का दीपिका के साथ नाम जुड़ने का अंजाम देख चुके है कि युवराज को उससे उबरने मे कितना समय लगा वो तो जैसे खेलना ही भूल गए थे।

अब इरफान पठन कल दिल्ली मे हुए जश्न मे शामिल नही थे तो उसका कारण भी इश्क बताया जा रहा है कि कल इरफान मुम्बई से सीधे अपनी गर्ल फ्रेंड से मिलने चले गए थे।अरे जरा कुछ दिन सब्र तो कर लो। अच्छे भले और सुधरे हुए खिलाड़ियों को क्यों बिगाड़ने मे लगे है ये सभी चैनल वाले। यूं तो प्यार करना कोई ग़लत बात नही है पर ये चैनल वाले जिस तरह से प्यार की रेड़ पीटते है कि बस.... ।

अरे प्यार और इश्क से करीना और उनके पूर्व और वर्तमान आशिकों की बात भी याद आ गई।जहाँ पूर्व आशिक शाहिद कपूर ने करीना के वियोग मे सिगरेट पीना छोड़ दिया है (कम से कम एक अच्छा काम तो किया )वहीं वर्तमान आशिक सैफ ने करीना के लिए एक चार्टर्ड प्लेन खरीदा है गोवा आने-जाने के लिए क्यूंकि वो क्या है ना की बेबो रानी को गोवा बहुत पसंद है और उन्हें यहां के beach पर घूमना और रहना बहुत भाता है।इसलिए सैफु भाई ने प्लेन खरीद लिया जिससे जब भी बेबो रानी का मन हो वो फट से उड़कर गोवा पहुँच जाएं । अब जब सैफ एक करोड़ की अंगूठी दे सकते है और हीरे के झुमके बनवा सकते है तो भला चार्टर्ड प्लेन खरीदना कौन सी बड़ी बात है। अब बेचारे शाहिद तो शायद ही बेबो रानी की ये ख्वाहिशें पूरी कर पाते। :)


Thursday, March 6, 2008


आज तो सारे देश मे शिवरात्री का पर्व मनाया जा रहा है। इलाहबाद मे आज से माघ मेला ख़त्म हो जाता है। आज माघ का आखिरी स्नान होता है। आज शिवरात्री के मौके पर सभी लोगों को जो व्रत -उपवास कर रहे है और जो व्रत नही कर रहे है उन सभी को शिवरात्री का खूब अच्छा फल मिलेतो चलिए ये गाना देखियेवैसे बताने की जरुरत तो नही है कि ये गीत फ़िल्म मुनीमजी का है और इसे हेमंत कुमार ने गाया है

Wednesday, March 5, 2008

हम माँ-बाप अपने बच्चों को बहुत जल्दी बड़ा बना देते है। और ऐसा अक्सर तब होता है जब दूसरा बच्चा जन्म लेता है। तब जाने-अनजाने हम अपने पहले बच्चे को बड़ा बच्चा बना देते है।और इस बात का एहसास हमे हमारे बेटे ने कराया था कि वो बड़ा नही छोटा है। और इसीलिए छोटा बच्चा आने के पहले से ही हमने भी अपने बड़े बच्चे को उसके बड़े होने का एहसास तरह-तरह से कराने की कोशिश की . और जैसा कि दूसरे लोग करते थे हमने भी वही किया क्यूंकि हम समझते थे कि ऐसा करने से दोनों बच्चों मे प्यार रहेगा और बड़ा बच्चा छोटे बच्चे को अपना प्रतिद्वंदी नही मानेगा जब तब बेटे को कहते कि तुम बड़े हो रहे हो और अब तुम्हे भइया कहने वाला आ रहा है। वगैरा-वगैरा और उस समय हमे लगता कि हम ऐसा करके बहुत अच्छा कर रहे है। पर वो हमारा भ्रम था जिसे हमारे बेटे ने तोडा था।

बात उस समय की है जब हमारा बड़ा बेटा तीन साल का था और हमारा छोटा बेटा पैदा हुआ था । हॉस्पिटल और घर मे हर जगह हम लोग उससे यही कहते की अब तुम बड़े हो गए हो देखो ये तुम्हारा छोटा भाई है। तुम्हे इसका ख़्याल रखना होगा। और इसी तरह की ढेर सारी बातें। और हमारा बेटा बिल्कुल बड़े भाई की तरह अपने छोटे भाई का ध्यान रखता।और इसी तरह दिन बीते और छोटा बेटा ढाई साल का हो गया, और बड़ा साढ़े पाँच का।

दिल्ली मे हमारी कालोनी मे ही एक और हम लोगों के दोस्त रहते थे उनके भी दो बेटे थे।उनका बड़ा बेटा सात साल का और छोटा बेटा साढ़े पाँच साल का (उनका छोटा बेटा रघु हमारे बड़े बेटे के साथ का है बस १० दिन के छोटे-बड़े है)अब चूँकि बच्चे बराबर की उम्र के थे तो साथ खेलते थे । और अगर कभी बच्चों मे झगडा-लड़ाई होता तो हम दोनों दोस्त अपने-अपने बड़े बेटो को रोकते। हम अपने बेटे को बोलते की तुम बड़े हो ऐसा मत करो और वो अपने बड़े बेटे(७ साल )को बोलती । पर दोनों छोटे बच्चे डांट से बच जाते।

ऐसे ही एक दिन घर मे दोनों भाई खेल रहे थे और आपस मे लड़ पड़े और आदतन हमने अपने बड़े बेटे को कहा की बेटा तुम तो बड़े हो तुम क्यों छोटे भाई से लड़ते हो।
तो इस पर उसने बड़ी ही मासूमियत से कहा की मैं कैसे बड़ा हूँ जब रघु छोटा है।क्यूंकि आंटी तो हमेशा कहती है कि रघु छोटा हैअगर रघु छोटा है तो मैं कैसे बड़ा हुआ। मैं भी तो छोटा हूँ।

उसकी ये बात सुनकर कुछ मिनट के लिए तो हम सोचने-समझने की शक्ति ही खो बैठे थे। औरउस दिन हमे अपनी गलती का एहसास भी हुआ कि हम अभिभावक अपने बच्चों को कितनी जल्दी बड़ा बना देते है।

Tuesday, March 4, 2008

अरे चौकने की कोई जरुरत नही है।वो क्या हैं ना की हमने अभी हाल ही मे ये दोनों फिल्में देखी तो सोचा की क्यों ना एक साथ ही इन दोनों फिल्मों के बारे मे लिख दिया जाए।मिथ्या और जोधा अकबर इन दोनों फिल्मों मे यूं तो कोई समानता नही है पर फ़िर भी हम दोनों की समीक्षा एक साथ कर रहे है। दोनों फिल्में बिल्कुल ही अलग है हर लिहाज से। वो चाहे कहानी हो या बड़े-बड़े सेट हो या कलाकार ही क्यों ना हो। मिथ्या एक बहुत ही आम सी कहानी पर बनी फ़िल्म है तो जोधा अकबर बहुत ही लैविश फ़िल्म है।

मिथ्या फ़िल्म की कहानी एक ऐसे लड़के की कहानी है जो मुम्बई हीरो बनने आता है और मुम्बई मे हुए एक मर्डर को देख लेता है और फ़िर किस तरह वो एक ऐसे डॉन के चक्कर मे पड़ता है कि उसकी सारी जिंदगी ही बदल जाती है।
इस फ़िल्म मे नेहा धूपिया भी है और नेहा को इससे पहले हमने किसी फ़िल्म मे नही देखा था सो वो कुछ ख़ास नही लगी । पर पूरी फ़िल्म का श्रेय रणवीर शोरी को जाता है।रणवीर शोरी जिसने इस फ़िल्म मे वी.के.और राजे दोनों की ही भूमिका निभाई है उसने कमाल की एक्टिंग की है। इस फ़िल्म मे रणवीर शोरी को जहाँ एक बहुत ही आम इंसान यानि स्ट्रुग्लिंग ऐक्टर दिखाया है वहीं उसे एक बहुत ही पोश डॉन के रूप मे भी दिखाया है।इस फ़िल्म को बनाने मे रजत कपूर को सात साल लगे जबकि ना ही कोई बड़ा सेट इस्तेमाल किया गया और ना ही कोई बड़ा कलाकार इस फ़िल्म मे थापर चूँकि कोई भी प्रोड्यूसर पैसा लगाने को जो तैयार नही था पर तब भी फ़िल्म अच्छी बनी


इस फ़िल्म के नाम के मुताबिक हम लोगों के साथ हादसा भी हुआ। जब हम लोग हॉल मे मिथ्या देखने पहुंचे तो मुश्किल से २०-२५ लोग ही रहे होंगे । खैर फ़िल्म शरू हुई तो शुरू के १५ मिनट तो आवाज ही नही आ रही थी किसी को कुछ समझ ही नही आ रहा था कि music और बंदूक वगैरा चलने की आवाज तो आती थी पर डायलोग सुनाई नही देते थे की आख़िर माजरा क्या है। अब अगर कोई और शहर होता तो लोग हल्ला या शोर मचाते पर गोवा के लोग(और हम भी ) चुपचाप फ़िल्म देखते रहे। और उन १५ मिनट मे लगा कि ये तो वाकई मे मिथ्या ही है कि बिना डायलोग के फ़िल्म देखो।खैर बाद मे आवाज आनी शुरू हुई और मिथ्या की मिथ्या टूटी। :)

शनिवार को हमने जोधा अकबर देखी । इस फ़िल्म को देखने के लिए हमने एडवांस बुकिंग भी कराई ये सोचकर की शनिवार को छुट्टी रहती है पर हाल मे जाने पर देखा की बस ५० -६० लोग ही रहे होंगे। हमे फ़िल्म ठीक लगी ना तो बहुत ही ज्यादा पसंद आई और ना ही बहुत ज्यादा ख़राब लगी ।इस फ़िल्म की शुरुआत बिल्कुल लगान स्टाइल मे हुई अरे मतलब अमिताभ बच्चन ने शुरू मे नरेटर की भूमिका निभाई।फ़िल्म की कहानी तो अब सभी जानते है एक मुग़ल बादशाह और राजपूत राजकुमारी के विवाह की है। ऐश्वर्या राय ने अभिनय ठीक-ठाक ही किया(कहीं-कहीं पर हम दिल दे चुके सनम और कजरारे वाली झलक मिली ) पर ऋतिक रोशन का अभिनय ज्यादा पसंद आया। यूं तो फ़िल्म ठीक थी पर फ़िर भी कुछ बातें जैसे फ़िल्म मे गाने अगर ना होते तो भी फ़िल्म मे कोई ख़ास फर्क नही पड़ता।फ़िल्म मे तो हमे गाने ज्यादा पसंद नही आए पर शायद चलते-फिरते (ऑडियो) सुनने मे ठीक लगेंगे।कहीं-कहीं पर कुछ पुराने गीत के मुखड़े भी बैक ग्राउंड मे सुनाई दिए थे। फ़िल्म का एक सीन मजेदार लगा जब अकबर आदम खान को मारने के लिए अपने सिपाहियों से आदम खान को सिर के बल ऊपर से नीचे फिकवाता है और सिपाहियों के ये कहने पर की वो जिंदा है उसे दोबारा ऊपर लाकर फ़िर से सिर के बल नीचे फेकने का हुक्म देता है।(अकबर को खून-खराबा पसंद नही था ना )

जोधा अकबर फ़िल्म को हर कोई ना जाने क्यों बैन करने पर लगा हुआ है पहले राजस्थान फ़िर महाराष्ट्र फ़िर मध्य प्रदेश और अब उत्तर प्रदेश ने भी जोधा अकबर को बैन करने का फ़ैसला लिया है जिससे राज्य मे कानून और व्यवस्था बनी रहे। पर सवाल ये है कि आख़िर इस फ़िल्म को बैन क्यों किया जा रहा है जबकि फ़िल्म की शुरुआत मे ही निर्माता ने डिस्क्लैमेर लगा रखा है ।

Monday, March 3, 2008

कल ऑस्ट्रेलिया के सिडनी के मैदान मे हुए रोमांचक मैच मे भारत ने ऑस्ट्रेलिया को ६ विकेट से हराकर फाईनल का पहला मैच जीत लिया। कल का मैच देखते हुए एक बार को तो लग रहा था कि कहीं फ़िर वही पुरानी कहानी भारत के खिलाड़ी ना दोहरा दे पर गनीमत कि कल भारत ने अच्छा और संभालकर खेला और मैच जीत लिया। अब अगले दो और फाइनल मे धोनी के धुरंधरों को अच्छा खेलना होगा वरना ये जीत बेकार हो जायेगी । तीन फाइनल का क्या तुक है ये समझ नही आता है।

पिछले कुछ मैच की तरह इस बार गनीमत रही की सचिन द ग्रेट ने अच्छा खेला और ना केवल अच्छा खेला बल्कि शतक भी ठोंका।कम से कम सीनियर खिलाड़ी होने का फर्ज तो निभाया वरना जब तक उनको याद ना दिलाया जाए की वो सीनियर खिलाड़ी है वो खेल पर ध्यान नही दे पाते है।धोनी को चाहिए की अगले मैच के लिए अभी से सचिन को उनके सीनियर होने की याद दिला दे वरना अगली बार वो अपने पुराने अंदाज मे आ जायेंगे। (आउट होने के)

इस पूरे दौरे मे भारतीय और ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी लड़ते-झगड़ते खेल रहे हैएक झगडा सुलझता है की दूसरा झगडा शुरू हो जाता हैहर बात को दोनों टीम एक इशू बनाकर खेल के मैदान मे और बाहर लड़ती हैकितनी एनर्जी तो दोनों तरफ़ के खिलाड़ी इसी बात मे खर्च कर देते है।कभी भज्जी साइमंड को बन्दर कहते है तो कभी साइमंड भज्जी को वीड कहते है। ऐसा लगता है कि ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी इस बात को बखूबी जानते है कि भारतीय खिलाड़ियों को उल-जलूल बातें बोलकर भड़काया जा सकता है। जिससे टीम इंडिया का ध्यान खेल से हटकर फालतू की बातों मे लग जाता है। पर इस बार टीम इंडिया के खिलाड़ियों ने बात का जवाब अपने खेल से दिया।

कल धोनी और उसके धुरंधरों ने कंगारूओं को हराकर फाईनल की पहली जीत तो अपने नाम की पर साथ ही साथ विवाद भी अपने नाम कर लिया।जब मैत्थु ने भज्जी को वीड कहा और ईशांत को बौकसिंग रिंग मे देखने की इच्छा जाहिर की तो भारतीय खिलाडियों ने भी अपने स्टाइल से ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों को जवाब दिया।और कल के मैच के दौरान जब हरभजन ने साइमंड और मैत्थु को आउट किया तो दोनों ही बार भज्जी ने कुछ इशारा किया जैसे साइमंड के लिए खुजली करने का और मैत्थु के आउट होने पर बौकसिंग करते हुए दिखाए गएजिसने भज्जी के ख़िलाफ़ एक और विवाद खड़ा कर दिया


इस तरह के झगडे और खेल के बावजूद भारतीयों ने आई.पी.एल. मे साइमंड के लिए करोडों की बोली लगाई और अपनी दरिया दिली का सबूत दिया।और ये साबित किया की भारत मे महात्मा गांधी जी की उस बात का पालन करने वाले लोग रहते है जो इसमे विश्वास करते है कि पाप से घृणा करो पापी से नही। :)



Saturday, March 1, 2008

वैसे तो गोवा मे कार्निवाल को बीते बहुत दिन हो गए है पर चूँकि उस समय हम विडियो नही लगा पाये थे(अपलोड करना था ना ) इसलिए आज लगा रहे है। असल मे पंजिम के कार्निवाल का विडियो ज्यादा अच्छा नही आया था । पर गोवा मे पंजिम के अलावा वास्को,मडगांव,मे भी कार्निवाल का जश्न मनाया जाता है। ये कार्निवाल वास्को मे हुआ था। पंजिम की तरह वास्को मे भी कार्निवाल की काफ़ी धूम रही थी।

तीन विडियो है इसलिए देखने मे थोड़ा धैर्य रखना पड़ सकता है। :)

इस विडियो मे किंग मोमो अपनी लोकल क्वीन और एक विलायती क्वीन के साथ दिखाई दे रहा है । वैसे ये विडियो थोड़ा डार्क आया है।

इस विडियो मे तोडी बनाई जा रही है। तोडी विनेगर यहां का ख़ास तरह का सिरका होता है।




इस विडियो मे लोकल डांस के साथ-साथ काजू फेनी कैसे बनाते है ये दिखाया जा रहा है।