Tuesday, August 28, 2007

आज रक्षा -बन्धन या राखी है ।आज के दिन का सभी भाई और बहनों को इंतज़ार रहता है क्यूंकि ये दिन खास जो है।राखी का त्यौहार मतलब भाई-बहन का प्यार। समय वो चाहे कोई भी जमाना रहा हो राखी का महत्त्व कभी भी कम नही हुआ और ना ही होगा।पहले तो जो बहने दूर होती थी उन्हें भाई को राखी भेजने का एक ही जरिया था और वो था पोस्ट के जरिये राखी भेजना।जिसमे कई बार देर से राखी पहुंचती थी पर अब समय के साथ इन चीजों मे सुधार और बदलाव आ गया है। पिछले कुछ सालों से कोरियर और अब इन्टरनेट के जरिये राखी भेजना आसान हो गया है और सबसे बड़ी बात अब राखी समय पर पहुंच जाती है।


आजकल की भागती-दौड़ती जिंदगी मे जहाँ लोगों के पास समय की कमी हो रही है पर इस राखी के दिन ऐसा बिल्कुल भी नही लगता है। हर छोटे-बडे शहर मे सुबह से शाम तक लोग रंग-बिरंगे कपड़ों मे सजे-धजे सड़कों पर नजर आते है। कहीँ कोई बहन भाई के यहां जा रही होती है तो कहीँ भाई अपनी बहन के घर जा रहे होते है राखी बंधवाने के लिए। दिल्ली मे तो कई बार ट्रैफिक जाम भी हो जाता है क्यूंकि हर किसी को पहुँचने की जल्दी होती है पर कोई भी रुकना नही चाहता है। आप ये तो नही सोच रहे की भला हमे कैसे पता तो भाई वो ऐसे की हमारे पतिदेव की बहन भी दिल्ली मे रहती है और हम जब दिल्ली मे रहते थे तो उनके घर राखी मे जाते थे तब ट्रैफिक जाम मे फंस जाते थे और दिल्ली के ट्रैफिक जाम का हाल तो हम सभी जानते है। वैसे अब तो मेट्रो रेल की वजह से लोगों को काफी आराम हो गया है। और आज के दिन तो मेट्रो रेल हर चार मिनट पर चलेगी जिससे लोगों को आने-जाने मे ज्यादा परेशानी ना हो।


राखी का त्यौहार और हमारा कोई किस्सा ना हो ऐसा कैसे हो सकता है। तो चलिए चूंकि आज राखी के दिन हम अपने भईया से दूर है तो कुछ पुराना किस्सा ही याद कर लेते है। वैसे पहले तो कई बार हम लोग घर मे भी राखी बनाते थे और हम बहनों मे एक होड़ सी होती थी कि किसकी राखी सबसे अच्छी बनेगी।तो ऐसी ही एक राखी की बात है। हम लोगों के यहां या यूं कहें कि शायद सभी के घरों मे जब तक बहने भाई को राखी नही बांधती है भाई और बहन दोनो ही कुछ नही खाते है।हम सभी बहने सुबह उठकर नहा-धोकर तैयार हो रहे थे भईया को राखी बाँधने के लिए पर भईया का कहीँ पता ही नही था। क्यूंकि भईया सुबह -सुबह कहीँ चले गए थे। हम चारों बहनों को पता नही था पर पापा-मम्मी को शायद पता था कि भईया कहॉ गए है। पर हम लोगों को बता नही रहे थे क्यूंकि भईया हम लोगों को सरप्राइज देना चाहते थे। और उन्होंने पापा मम्मी को मना किया था कुछ भी बताने से।

हमारे भईया हमेशा ही हम लोगों को राखी मे कुछ ना कुछ तोहफा दिया करते थे । आम तौर पर भईया पहले से ही गिफ्ट खरीद लेते थे और हम लोगों को कई बार गिफ्ट देने मे तंग भी करते थे अरे मतलब चिडाते थे। खैर हम सब तो राखी बाँधने को तैयार पर भैया जी गायब । १० बज गया भईया का कोई सीन नही ११ बज गया पर भईया गायब। अब हम सबको कुछ ग़ुस्सा और कुछ भूख लगने लगी थी । और हम लोग अपने-अपने दिमाग के घोड़े दौडा रहे थे कि आख़िर भईया कहॉ गए है ।पर भूख और ग़ुस्से की वजह से कुछ समझ नही पा रहे थे।

करीब साढे ग्यारह बजे भईया आये और उनके आते ही हम सबने तो जैसे हल्ला बोल दिया कि तुम इतनी देर तक कहां थे। हम लोग कब से इन्तजार कर रहे है वगैरा-वगैरा।उन्होने देर से आने का कोई बहाना बनाया और भईया बोले कि चलो अब तो राखी बाँधो।और भईया अपने पीछे कुछ छिपा कर बैठ गए । तो फिर हम सबने एक-एक कर के राखी बाँधी और भईया ने सबको शगुन के रूपये दिए।जब हम चारों ने राखी बाँध ली तो उन्होने हम सभी को बुलाया और मुकेश का डबल एल .पी.रेकॉर्ड जो मुकेश के लंदन के आख़िरी शो (कन्सर्ट ) का था वो हम चारों को एक combine गिफ्ट के तौर पर दिया । रेकॉर्ड देखते ही हम सभी ख़ुशी से उछाल पडे । और उनके इस सरप्राइज गिफ्ट से हम सबका ग़ुस्सा उड़न छू हो गया। और हम लोगों ने फ़टाफ़ट स्टीरियो पर रेकॉर्ड लगाया और नाश्ता करने बैठ गए



नाश्ता करते हुए हम लोगों ने भईया से पूछा की अगर तुम्हारे पास रेकॉर्ड था तो इतनी देर कहां थे. तो भईया बोले की वो चौक गए थे । और चूंकि दुकान १० बजे बाद खुलती है इसलिये देर हो गयी। और फिर उन्होंने रेकॉर्ड खरीदने की पूरी कहानी बताई की एक दिन पहले उन्होने सिविल लाइन मे रेकॉर्ड ढूँढा था पर उन्हें नही मिला था . चूंकि उस शो के बाद मुकेश की मृत्यु हो गयी थी। और चूंकि वो मुकेश का आख़िरी शो था इसीलिये उस रेकॉर्ड की बाजार मे ख़ूब बिक्री हो रही थी। और चौक मे जो रेकॉर्ड की बड़ी सी दुकान थी शायद कोई सरदार जी की दुकान थी , हमे उस दुकान का नाम नही याद आ रहा है,वहां ये रेकॉर्ड मिल रहा था इसीलिये भईया राखी के दिन सुबह-सुबह चौक गए थे उस दुकान से हम बहनों के लिए रेकॉर्ड खरीदने। उनके इतना कहते ही हम सभी के मुंह से निकला की भईया तुम भी कमाल हो।

तो ये तो था हमारा किस्सा। आज राखी के दिन आप सभी भाईयों और बहनो को रक्षा-बन्धन की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें।

Sunday, August 26, 2007

ये ससुराल शब्द बहुत सारे संबंध अपने अन्दर समाये हुए है ठीक उसी तरह जैसे मायका शब्द अपने अन्दर संबंधों को सहेज कर रखता है।मायके मे माँ,पिता,भाई, भाभी और बहन होते है तो ससुराल मे सास,ससुर,ननद,देवर,जेठ,जेठानी होते है। और शायद इन्हीं सबसे एक भरा-पूरा घर बनता है।वो चाहे मायका हो या चाहे ससुराल हो।

ससुराल नाम से ही लोगों को एक अजीब सी भावना महसूस होती है और इस भावना को और कुछ नही इसे बस मन मे चल रहे मिले-जुले भाव या शायद डर ही कहना चाहिऐ। हर लडकी जिसकी शादी होती है वो इन भावनाओं से जरुर गुजरती है कि पता नही उसके ससुराल वाले कैसे होंगे। वो वहां एडजस्ट कर पाएगी या नही। सास और ननद से उसकी निभेगी या नही और ऐसे ही तमाम सवाल मन मे उठते रहते है। और ऐसे मे शादी के समय जो रिश्तेदार आते है वो कई बार लडकी को बहुत सारी हिदायतें देते है कि बिटिया ठीक से रहनाबडों का आदर करनाकभी पलट कर जवाब मत देना वगैरा-वगैरापर कई बार तो कुछ लोग ससुराल के नाम पर बहुत डराते भी है कि देखों फलानी की लडकी के साथ ऐसा हो गया तो ढमाकी की लडकी के साथ ससुराल वालों ने बड़ा अत्याचार किया वगैरा-वगैरा । आज भी और पहले भी ससुराल मे होने वाले अत्याचारों के भी सैकडो उदाहरण मिल जायेंगे। पर साथ ही अच्छे उदाहरण भी मिलते है।

तो चलिए आज हम आपको अपनी ससुराल का एक किस्सा सुनाते है। ये किस्सा शादी के समय का ही है। वो क्या है ना हमने पहले भी अपनी एक पोस्ट मे लिखा था कि पहले हमे खाना बनाना नही आता था । पर जब शादी तै हुई तो हमने कुछ खास-खास व्यंजन मम्मी से बनाने सीखे ,अब खास इसलिये क्यूंकि इतने बडे होने पर सादा दाल-चावल कैसे बनाते है, ये हमे आ गया था।पर तब भी हर चीज बनाने मे expert नही थे।पर यहां हम ये बता दे कि अब हम काफी expert हो गए है।पापा को हमेशा रहता था की लडकियां किचन मे काम ना करें क्यूंकि बाद मे अपने घर मे तो हर लडकी को काम करना ही पड़ता है। जबकि मम्मी हम लोगों को यदा कदा खाना बनाना सीखने को कहती रहती थी।खैर हमे तो छोटे होने का भी फायदा था। पर शादी के समय मम्मी को लग रहा था की बिटिया को खाना -वाना तो ज्यादा बनाना आता नही है पता नही ससुराल मे कैसे करेगी। यहां हम ये भी बताना चाहते है कि हमारी ससुराल मे भी नौकर-चाकर थे तो इसलिये मम्मी कि चिन्ता निरर्थक थी। पर फिर भी माँ तो माँ ही होती है।

खैर शादी के बाद जब बिदाई हो रही थी तो हमारी मम्मी और मौसी ने सोचा कि हमारी सास को इस बारे मे बता देना चाहिऐ। तो मम्मी और मौसी ने हमारी सास से कहा कि उन्हें कुछ बात करनी है। तो अम्माजी (सास)ने सोचा कि पता नही क्या बात हो गयी है।

तो हमारी मौसी ने बात शुरू की कि वो ममता को खाना बनाना ठीक से नही आता है।

तो अम्माजी ने कहा कोई बात नही।

तब मम्मी ने कहा की वो दरअसल ममता चूंकि घर मे सबसे छोटी है और घर मे हमेशा नौकर-चाकर रहे है तो इसलिये ममता ने कभी काम नही किया है।

तो अम्माजी ने मुस्कराते हुए कहा (ये मम्मी ने बताया था) की आप चिन्ता ना करे उसे लखनऊ या दिल्ली मे भी काम नही करना पड़ेगा।

अम्माजी के इतना कहने पर हमारी मम्मी और मौसी आश्वस्त हो गयी । और हम बिदाई के बाद ससुराल पहुंच गए। सारी रस्मों के बाद बहु के खाना बनाने की रस्म आयी तो अम्माजी ने कहा कि बहुरानी (वो हमे इसी तरह बुलाती थी)तुम्हे गुलगुले बनाने है। अब थोडा संकोच और ज्यादा डर कि अगर हमने गुलगुले बनाए और गड़बड़ हो गए तो क्या होगा। पर अब बनाना तो था ही सो जैसे ही हम रसोई मे गए तो हम बिल्कुल चौंक गए क्यूंकि अम्माजी ने सारे गुलगुले बना रखे थे और हमसे बस एक गुलगुला बनवाया और फिर हमे सबको परोसने के लिए कहा। और ये देख कर हमारा मन अपनी अम्माजी के लिए आदर ,श्रद्धा ,और प्यार से भर गया। तो ऐसा था हमारा ससुराल की रसोई मे पहला दिन

अरे अभी किस्सा खत्म नही हुआ है । कुछ दिन ससुराल मे रहने के बाद जब हम दिल्ली के लिए चलने लगे क्यूंकि हमारे पतिदेव दिल्ली मे थे तो हमारे आश्चर्य की सीमा नही रही जब अम्माजी ने एक नौकर भी हमारे साथ भेजा क्यूंकि अम्माजी को हमारी मम्मी और मौसी की कही बात याद थी की ममता ने कभी किचन मे काम नही किया है। तो भला एकदम से दिल्ली मे जाते-जाते ही कैसे खाना बनाएगी।हमने बहुत कहा की हम थोडा बहुत खाना बना लेते है और बाक़ी सीख जायेंगे । पर उन्होंने हमारी नही सुनी और उस नौकर को हमारे साथ दिल्ली भेज दिया ये कह कर की घर का नौकर है तुम लोगों को कोई परेशानी नही होगी। हालांकि हमारे पतिदेव ने एक नेपाली नौकर रखा हुआ था (उन दिनों दिल्ली मे काम करने के लिए नेपाली बहुत मिलते थे) पर अम्माजी का ये कहना था कि दिन भर घर मे बहुरानी अकेले रहेगी तो अनजान नौकर घर मे रहना ठीक नही है। इसलिये उन्होंने घर के ही एक नौकर को हमारे साथ भेज दिया था जिसपर हम लोग विश्वास भी कर सकें क्यूंकि दिल्ली मे तब भी काम करने वालों का भरोसा नही किया जा सकता था। ऐसी थी हमारी अम्माजी (सास)।

धीरे-धीरे हमने खाना बनाना सीखा । कैसे वो फिर कभी !


Saturday, August 25, 2007

आज तो मुकेश का गाया हुआ गाना याद गया
गर्दिश मे हों तारे ,ना घबराना प्यारे

आजकल फिल्म इंडस्ट्री की हालत कुछ ऐसी ही हो रही है जिसके तारे और सितारे दोनो ही गर्दिश मे है।इंडस्ट्री के तारे इसलिये गर्दिश मे है क्यूंकि ज्यादातर फ़िल्में फ्लॉप हो जाती है और सितारे गर्दिश मे है ये तो हम सभी जानते है मतलब जहाँ कभी संजय दत्त जेल के अन्दर जाते है तो कभी सलमान खान । खैर संजय दत्त तो फिलहाल जेल से बाहर आ गए है पर सलमान खान कितने दिन जेल मे रहेंगे ,ये कहना मुश्किल है। संजय दत्त तो तेईस दिन मे जेल से बाहर आ गए पर सलमान खान का तो फिलहाल कोई सीन नजर नही आ रहा है।बाक़ी तो ऊपर वाला जाने।


सितारों के जेल जाने मे निर्माता का तो जो नुकसान होता है वो अब २-४ करोड़ नही बल्कि १००-२०० करोड़ का होता है। अब वो क्या है ना की आजकल लाखों मे तो कोई फिल्म बनती ही नही है।वो भी इतने बडे सितारों के साथ तो छोटी-मोती फिल्म बनना नामुमकिन है। मामूली से मामूली पिटे हुए निर्माता अतुल अग्निहोत्री जैसे जब २० करोड़ की फिल्म बना सकते है तो बडे निर्माताओं का क्या कहना। अब अगर संजय दत्त पर फिल्म वालों का ५०-६० करोड़ या कुछ कम ज्यादा रुपया लगा था तो सलमान पर १०० -२०० करोड़ लगा है। ऐसा कहा जा रहा है। अब देखना है कि कितने निर्माताओं की नैया पार होती है और कितने डूबते है।

अब संजय दत्त हों या सलमान खान जब गलती की है तो सजा तो मिलेगी ही। अब चाहे संजय ने गन रखी हो या सलमान ने चिंकारा का शिकार किया हो।भाई गलत तो गलत है। अब बाद मे भले ही समाज सेवा करें पर क्या उससे गलती गलती नही रहेगी।माना की परिवार की सुरक्षा के लिए ही संजय ने गन ली थी पर उसे नष्ट करना गलत था। और सलमान तो खैर अपने ही शिकार मे फंस गए है। अरे शिकार पर एक और की याद आ गयी । जी हाँ बिल्कुल ठीक समझे है आप ,जी हाँ बडे नवाब पटौदी ,उन्होंने भी तो शिकार किया था। पर जब सजा सुनाई जाती है तो हर तरफ हाय-तौबा मच जाती है। टी.वी.और सारे अखबार इन्ही ख़बरों से पाट दिए जाते है।


सितारों के जेल के अन्दर और बाहर होने मे घरवाले और सितारे तो परेशान होते है पर हमारे ख़्याल से सबसे ज्यादा परेशान इनको चाहने वाले इनके प्रशंसक होते है। इन सितारों के प्रशंसको को कितनी मुसीबत झेलनी पड़ती है ये तो बेचारे प्रशंशक भी नही जान पाते है। कभी पुलिस की लाठी खानी पड़ती है तो कभी ये प्रशंशक कोर्ट मे या जेल के बाहर या इनके घरों के बाहर घंटो इंतज़ार करते है।वैसे पुलिस वालों को भी इन प्रशंसको को रोकने मे कम मशक्कत नही करनी पड़ती है। धूप हो बारिश हो किसी की भी परवाह ना करते हुए ये प्रशंसक अपनी जगह डटे रहते है।


डटे रहने मे तो मीडिया भी इन प्रशंसको से पीछे नही है। जब संजय दत्त जेल गए तो भी मीडिया के लोग अपनी-अपनी गाड़ियों मे संजय दत्त को ले जा रही पुलिस वन के साथ-साथ अपनी कार दौडाते रहे और बीच-बीच मे दूसरी गाड़ियों जिनमे संजय के दोस्त वगैरा थे उन्हें भी दिखाते थे।मीडिया वाले खुद तो कहते कि संजय के दोस्त कितनी तेज गाड़ी चला रहे है पर शायद संजय की एक झलक देखने और दिखाने के लिए वो लोग अपनी - अपनी गाड़ी उतनी ही तेज चला रहे थे। इसी तरह जब संजय जेल से वापिस आये तो भी मीडिया वाले सारे रास्ते उसकी गाड़ी का पीछा करते हुए दिखाए गए। और आज सलमान खान के पीछे भागते नजर आये।


अब जब कोर्ट ने सजा सुना दी तब भी लोग परेशान है की क्या न्याय की नजर मे सब एक है। पर अगर कोर्ट उन्हें छोड़ देती तो भी लोग चुप नही रहते क्यूंकि तब ये सवाल उठता की कानून की नजर मे सब बराबर नही है। सारी फिल्म इंडस्ट्री सजा सुनाये जाने पर यकीन क्यों नही कर पाती है । ये समझना जरा मुश्किल है। हर कोई ये ही कहता नजर आता है कि इतनी ज्यादा कड़ी सजा नही मिलनी चाहिऐ थी। पर आख़िर क्यूँ। अरे भाई तो इसका सीधा सा जवाब है कि सबको अपने किये की सजा यहीं मिलती है।


संजू बाबा और सल्लू मियां को अगर छोड़ दिया जाए तो शायद उनके लिए अच्छा ही होगा। पर ऐसा कहॉ हो सकता है ।






Friday, August 24, 2007

पोस्ट के इस नाम की प्रेरणा हमे ज्ञानदत्त जी से मिली है।(हमने आपकी टिपण्णी का बुरा नही माना है । इसलिये आप इसे अन्यथा मत लीजियेगा। ये तो महज एक बहाना है. वरना हम आप लोगों को अपने घर के साँपों से कैसे मिलवाते. ) और कल हमने दीपक की एक कविता पढी थी जिससे भी हमारी ये पोस्ट कुछ प्रेरित है।

अब जब नाम ही ऐसा है तो पोस्ट मे भी कुछ होना चाहिऐ। तो चलिए हम आपको अपने अंडमान के घर के कुछ साँपों से मिलवाते है। पर उससे पहले हम कुछ कहना भी चाहते है। जब हम लोग अंडमान गए तो जैसा की आप सबको अब पता ही है कि वहां बहुत जंगल है तो जंगल मे कुछ जीव-जंतु भी होंगे ही।शुरू-शुरू मे जब हम लोग अंडमान गए तो साँपों के बहुत किस्से सुने और हम लोगों को वहां रहने वालों ने ने हिदायत दी कि कभी भी अलमारी मे से कपडे वगैरा बिना झाडे मत पहनना और दरवाजा हमेशा ठीक से बंद किया करना क्यूंकि अंडमान मे सांप बहुत है। क्या हुआ डर गए. अरे डरिये मत. ये मटमैले रंग का सांप कुछ नही करने वाला है ये बहुत सीधा है. कैसे गुडाई की हुई जमीन मे मजे से घूम रहे है.



लोगों ने तो ये तक बताया की कई बार सांप दरवाजे पर दस्तक (नॉक )भी करते है। क्यों आश्चर्य हुआ ,अरे बिल्कुल भी चौंकिए मत क्यूंकि ये मजाक नही हक़ीकत है। वो क्या है ना कि कई बार सांप जब दरवाजे पर आते थे और अगर दरवाजा बंद होता था तो वो जोर से अपना फ़न दरवाजे पर मारते थे और उसी आवाज को वहां के लोग सांप के द्वारा नॉक करना कहते थे। वैसे हमारे घर मे सांप तो जरुर निकले पर गनीमत कि किसी ने नॉक नही किया वरना तो पता नही हमारा क्या होता। :)

सांप के ऐसे किस्से सुनकर जबहम लोगों ने अंडमान के लोकल लोग जैसे कि अपने ड्राइवर से पूछा कि क्या यहां सांप बहुत होते है।
तो सब कहते कि हाँ सांप तो बहुत है पर यहां के सांप बडे सीधे है। किसी को काटते नही है। अपने रास्ते चले जाते है इसका उदाहरण ये देखिये की ये जनाब कैसे विचरते हुए जा रहे है

अब ऐसी बात सुनकर यकीन तो नही होता था पर यकीन करना पड़ता था।

अब जैसे ये भूरा सांप हम लोगों के घर के आस-पास ही रहता था। और जब भी ये बाहर निकलता था तो मैना ख़ूब जोर-जोर से चिल्लाने लगती थी ।और जैसे ही मैना चिल्लाती थी हम लोग अपना कमरा लेकर दौड़ते थे कि सांप आया।और ये महाशय मैना के चिल्लाने कि वजह से ही पेड़ मे जाकर चुप गए है और फोटो के लिए पोज दे रहे है। अब फोटो खीचने से ये मत समझिए कि हम बहुत बहादुर है और सांप से बिल्कुल नही डरते है। पर हम है ठीक इसके उलट। ये सारी फोटो तो हमारे बेटे ने खीची है।वैसे इनका एक विडियो भी है पर हम अभी लगा नही रहे है क्यूंकि सबको ज्यादा डराना ठीक नही है।

और ये काला सांप हमारे कार गैराज मे निकला था ।जिसकी यहां पर आप फोटो देख रहे है। और सांप को क्यों मारते है तो डर इसकी सबसे बड़ी वजह है।और इसे बाद मे मार दिया गया था. क्यूंकि इसकी तो कोई गारंटी नही थी की वो हम लोगों को काटेगा नही.

वैसे अंडमान मे हमारी दो दोस्त सांप से बिल्कुल भी नही डरती थी. एक तो अगर सांप निकल आए तो उसके पीछे-पीछे जाती थी ये देखने के लिए की आख़िर वो जा कहाँ रहा है. और हमारी दूसरी दोस्त का कहना था कि ये कितना सुंदर है. इसे इतना बड़ा होने मे कितने साल लगे है. और भगवान ने इसे बनाया है तो इसे मारना क्यूँ. बाप रे हम तो उनके ये ख्यालात सुनकर ही घबरा जाते थे.

और हम उनके इन विचारो से बिल्कुल भी सहमत नही थे और न है क्यूंकि सांप इस नाम मे ही डर है .और एक बात हम लोगों के यहाँ कहा जाता है की इन्सान का जन्म ८४ करोड़ योनियों मे जन्म लेने के बाद मिलता है. तो मारने का ये एक सकारात्मक पहलू ये भी हो सकता है. इसे ग़लत न समझें.

अंडमान क्या गोवा मे भी बहुत सांप है. अंदमान और गोवा मे फर्क बस इतना है कि अंडमान मे सिर्फ़ सांप थे पर गोवा के घर मे सांप,नेवला और बिच्छू भी है. और बरसात मे तो आप इन्हे टहल कदमी करते हुए देख सकते है. और छोटे नही भारी-भरकम कि देख कर ही डर लग जाए. चलिए अब और नही डराते है अपनी पोस्ट यही ख़त्म करते है. अंडमान के बाकी के जीव-जंतुओं की बात फ़िर कभी करेंगे।

Thursday, August 23, 2007

अभी तक तो यही खबर थी की नोकिया की बी.एल.-५सि.की जापानी बैटरी के फटने का खतरा है पर ये क्या अब तो बी.एल-४ बैटरी भी ओवर चार्जिंग से फट रही है और वो बैटरी जो हंगरी की बनी हुई है।

उत्तर-प्रदेश के आजमगढ़ जिले मे ये हादसा हुआ है। जब इसे चार्ज किया जा रहा था तभी ये बैटरी फट गयी और ये भी कहा जा रहा है की इसमे दो लोग घायल भी हो गए है।

अभी तक तो जनता बी.एल.-५सि से ही नही निपट आयी उसपर से ये एक और मुसीबत।

ये अचानक नोकिया मे क्या हो रहा है। अब तो लोगों को फ़ोन रिचार्ज करते हुए भी डर लगेगा की क्या पता कब
बैटरी मे विस्फोट हो जाये।

अब ये देखना है कि नोकिया किस तरह की चेतावनी निकालेगी ।

चलते-चलते आल द बेस्ट !!

Wednesday, August 22, 2007

इस शीर्षक से ये बिल्कुल भी मत समझिए कि हम कोई बकरा या मुर्गा काटने जा रहे है। ये तो हमारे गिटार सिखाने वाले मास्साब के शब्द है जो अब इस दुनिया मे नही है।दुलाल मजुमदार नाम था उनका ।मास्साब बंगाली थे। पर उनके इन्ही शब्दों ने हमे गिटार सीखने की प्रेरणा दी थी। यूं तो वो ज्यादा ग़ुस्सा नही करते थे पर अगर उनके कई बार समझाने पर भी कोई गलत बजाता था तो उन्हें बहुत ग़ुस्सा आ जाता था और तब वो जो डांटना शुरू करते थे तो वो बिल्कुल भी कुछ नही सोचते थे की सामने बैठा हुआ शिष्य रो रहा है या दुःखी हो रहा है।कई बार तो उनके डांटने पर आंटी (मास्साब की पत्नी)भी वहां आ जाती थी और कहती थी कि इतना मत डांटा करो। बच्चे है सीख जायेंगे। और इसी तरह जब कोई अच्छा बजाता था तो वो बड़ी जोर से बाह (वाह)कहते थे और पूरी क्लास मे क्या हर ग्रुप मे उसकी तारीफ भी ख़ूब करते थे। वैसे वो छोटे -छोटे ग्रुप मे क्लास लेते थे पर तब भी उनकी तारीफ और डांट की खबर हर क्लास मे पहुंच जाती थी।

ये बात तब की है जब हम नवीं क्लास मे पढते थे और हमने गिटार सीखने का मन बना लिया था।इन्ही मास्साब से हमारे भईया ने गिटार सीखा था और बाद मे हमारी बहन सीख रही थी। तो हमे भी लगा कि गिटार बजाना तो बहुत आसान है तो क्यों ना हम भी सीख लें ।अक्सर जब दीदी की क्लास ख़त्म होने वाली होती थी तो हम उन्हें लेने के लिए क्लास मे जाया करते थे । तो कई बार मास्साब हमसे पूछते भी थे की तुम नही सीखेगा।तो हम बस गरदन हिला कर मना कर देते थे। क्यूंकि हमे उनकी डांट से डर लगता था और आंसू बहाने मे तो हम तेज ही है।पर बाद मे दीदी को गाने बजाते सुनते -सुनते हमारा भी मन करने लगा सीखने का। तो बस जैसे ही गरमी की छुट्टियाँ आयी हमने ममी से कहा कि हमे भी गिटार सीखना है तो भला ममी को क्या ऐतराज हो सकता था उन्होंने अनुमति दे दी क्यूंकि हफ्ते मे तीन दिन ही क्लास होती थी। और हमने भी मास्साब की क्लास मे जाना शुरू कर दिया।

जब पहले दिन हम क्लास मे गए तो मास्साब ने हम सभी नए बच्चों को अपना -अपना परिचय देने को कहा । सभी ने डरते हुए अपना -अपना परिचय दिया। डरते हुए इसलिये क्यूंकि हम सभी के भैया या बहन मास्साब से या तो गिटार सीख चुके थे या सीख रहे थे और हम सब उनके ग़ुस्से से वाकिफ भी थे। खैर धीरे-धीरे वहां सीखते हुए हम लोगों को लगा की मास्साब तो बहुत अच्छे है और हम बच्चों को तो बिल्कुल भी नही डांटते थे। हमेशा और अच्छा बजाओ कह कर हम लोगों का हौसला बढ़ाते थे।

सब कुछ बढ़िया चल रहा था क्लास मे और हम भी खुश थे और मास्साब भी खुश थे क्यूंकि हमने बड़ी जल्दी सीख लिया था। क्लास से घर आकर भी हम प्रैक्टिस करते थे जिससे क्लास मे जो कुछ भी सिखाया गया होता वो अगली क्लास मे अच्छे से बजा सकें। पर एक दिन गड़बड़ हो ही गयी।उस समय हम याराना का गाना छूकर मेरे मन को सीख रहे थे । घर से ख़ूब प्रैक्टिस करके गए थे पर पता नही क्लास मे क्या हुआ कि जैसे ही बजाना शुरू किया तो मुखडा तो ठीक बजाया पर अंतरे मे अटक गए और जो अंतरे मे गलत बजाया तो पहले तो मास्साब ने कहा कोई बात नही फिर से बजाओ।और कहा कि रिदम पर ध्यान दो। हमने फिर से शुरू किया पर बार-बार एक ही जगह पर आकर गड़बड़ हो जाती थी और गिटार के तार की आवाज जोर से सुनाई देती । हमे भी पता था की हम गलत बजा रहे है क्यूंकि जब गिटार बजाते है तो उसके तार की खीच-खीच की आवाज नही आनी चाहिऐ।पर हमारे बजाने मे ये आवाज बार-बार आ जाती थी। बस हम डर गए कि अब तो पडी डांट और हुआ भी वही।


पांच-सात मिनट तक तो मास्साब ने कुछ नही कहा पर फिर वो बड़ी जोर से चिल्लाये तुम्हे पता नही है हम कसाई है कसाई।
उनका इतना कहना था कि हम जो सही बजा रहे थे वो भी गलत बजाने लगे।
तो उन्हें और ग़ुस्सा आ गया और ग़ुस्से मे वो बोले आज जब तक तुम सही नही बजाओगी हम तुम्हे घर नही जाने देंगे।
बस इतना सुनकर तो हमारे आंसू झरने लगे । और गिटार बजाते-बजाते हमने मन ही मन सोचा कि बस अब आज के बाद गिटार सीखना तो दूर हम गिटार को भी हाथ नही लगाएंगे। और उसी ग़ुस्से मे मास्साब ने अपने गिटार पर अंतरा बजाकर दिखाया और कहा कि ऐसे बजाओ। फिर बोले कि नही हमारे साथ-साथ बजाओ। और हमने रोते-रोते जब सही अंतरा बजाया तो उन्होने जोर से बाह (वाह)कहा जिसका मतलब कि वो खुश है।


अगले दिन हर क्लास मे यही चर्चा कि ममता को मास्साब ने बहुत डांटा। पर उसी दिन हमने भी निश्च्च्य किया कि अब हम ख़ूब प्रैक्टिस करेंगे और मास्साब को कभी भी ये मौका नही देंगे कि वो हमे फिर से इस तरह डांट सके। बस फिर क्या था कुछ दिन बाद हम मास्साब के चहेते शिष्यों मे से हो गए।और हमने एक साल गाने सीखने के बाद शास्त्रीय संगीत का छे साल का कोर्स किया। शादी के बाद भी हम जब भी इलाहाबाद जाते थे तो मास्साब और आंटी से मिलने जरुर जाते थे । आज मास्साब इस दुनिया मे नही है और आंटी भी अब इलाहाबाद मे नही रहती है। मास्साब का बड़ा बेटा गौरव जो उस समय वायलिन बजाता था अब सितार बजाता है और देश-विदेश मे अपने प्रोग्राम करता है।

आज यूं ही मास्साब की डांट याद आ गयी और हमे ये सोचकर ख़ुशी हो रही है कि अच्छा हुआ हो जो उस समय डांट के डर से हमने गिटार बजाना नही छोड़ा क्यूंकि अगर उस समय डांट के डर से हमने गिटार बजाना छोड़ दिया होता तो हम एक बहुत ही मधुर वाद्य को बजाने की कला को सीखने से वंचित रह जाते।

Tuesday, August 21, 2007

आज का दिन तो बहुत ही अच्छा है. आज से हिन्दी मे काम करना अरे लिखना इतना आसान जो हो गया है. अब कहीँ आप ये तो नही सोच रहे होंगे कि जब अभी तक हिन्दी लिख ही रही थी तो अब ये कहने का क्या मतलब है कि अब हिंदी मे लिखना आसान हो गया है। तो वो इसलिये की हम आज वाली पोस्ट सीधे गूगल के indictransliteration के जरिये लिख रहे है. वैसे इससे पहले भी ट्रांसलिटरेशन के जरिये हम ब्लॉगर पर लिखते थे. पर कई बार गड़बड़ भी हो जाती थी.इसीलिये कई बार जब हम आप लोगों के ब्लॉग पढते है तो हम टिप्पणी इंग्लिश मे या तो कर देते है या कई बार नही भी करते है. क्यूंकि हमे इंग्लिश मे टिपण्णी करने मे बिल्कुल भी अच्छा नही लगता है. अब वो क्या है न की इतने दिन मे तो आप लोग जान ही गए है की हम बहुत ज्यादा तकनीकी किस्म के इंसान नही है . बस इतना जानते है कि ब्लॉगिंग कर लेते है जो हमारे लिए बहुत है.

अभी दो दिन पहले ही श्रीश जी ने और जगदीश जी ने इस बारे मे अपने चिट्ठों पर लिखा था पर तब हम सोचते थे की अभी तो कुछ दिन और इंतजार करना पड़ेगा . पर आज सुबह-सुबह अखबार मे ख़बर पढ़कर हम बहुत खुश हुए और सोचा की चलो देखा जाए कि अब हिन्दी मे लिखना कितना आसान हुआ है. तो भाई हमारी खुशी का तो ठिकाना ही नही रहा ये सोचकर कि कंप्यूटर पर अब हिन्दी का भी बोलबाला हो रहा है.

यहाँ हम एक बात जरुर कहेंगे कि काश ये हिन्दी मे लिखने वाला सोफ्टवेयर कुछ साल पहले आया होता तो हमारी मम्मी जिन्हे कंप्यूटर सीखने और चलाने का बहुत शौक था वो भी इसका कुछ इस्तेमाल कर पाती। वैसे उन्हें कंप्यूटर आता था और वो इ.मैल वगैरा भी करती थी. पर फ़िर भी अपनी भाषा मे लिखने का मजा ही कुछ और होता है.


गूगल कि इस साईट http://www.google.com/transliterate/indic पर सीधे जाकर हिन्दी मे काम कर सकते है.
आपको कितना मजा आया ये तो हम नही जानते पर हमे तो बहुत अच्छा लगा. और हमारे ख़्याल से इससे हिन्दी को बढ़ावा भी मिलेगा . और हाँ इसमे आप http://local.google.co.in मे जाकर होटल,रेस्टोरेंट ,और शॉप (दुकानों)के बारे मे और www.google.co.in/local मे जाकर व्यापार यानी कि बिजनेस के बारे मे जानकारी ले सकते है।

तो कहिये कैसी रही ,अरे अच्छी रही और क्या।:)

Monday, August 20, 2007

रेडियो से तो हम सभी का बड़ा ही पुराना नाता है । ये रेडियो ही है जो उन गांवों और पहाड़ों मे पहुँचता है जहाँ हमारे टी.वी.के कार्यक्रम नही पहुंच पाते है। और ये रेडियो ही है जो हमारे फौजी भाईयों के मनोरंजन का एकमात्र साधन होता है। कई बार तो हम ये सोचते है कि अगर पिछले दशकों मे रेडियो नही होता तो भला लोग कैसे दुनिया भर मे होने वाली घटनाओं के बारे मे जान पाते। रेडियो से तो हम सभी की ढेरों यादें जुडी होंगी।७० के दशक की लडाई के दौरान रेडियो ही तो हर तरह की सूचना देता था कि कितने बजे ब्लैक-आउट होगा और उस ब्लैक-आउट मे सभी को इसी रेडियो का सहारा रहता था।एक रेडियो ही होता था जिससे हम ना केवल समाचार और गाने सुनते थे बल्कि क्रिकेट जैसे खेल को लोकप्रिय बनाने मे भी रेडियो का बहुत बड़ा योगदान रहा है ऐसा कहा जा सकता है


क्या हम कभी भूल सकेंगे सुशील दोषी और जसदेव सिंह की कमेंट्री। सुशील जिस तरह बाल के साथ भागते हुए कमेंट्री करते थे कि सुनने वाला भी ये महसूस करता था मानो वो भी क्रिकेट के मैदान मे मौजूद हो। और कोई कैच छोड़ने पर भी ऐसे बोलते थे मानो उन्ही के हाथ से कैच छूट गया हो। क्रिकेट के दिनों मे हर व्यक्ति के कानो के पास छोटा ट्रांजिस्टर सटा हुआ देखा जा सकता था।वैसे ये कान से ट्रांजिस्टर लगा कर कमेंट्री सुनने का मंजर तो आज भी देखा जा सकता है । पर अब हमारा रेडियो पर कमेंट्री सुनना तो छूट ही गया है।


अब तो पता नही कि रेडियो सिलोन पर बिनाका गीत माला आती है या नही पर कुछ सालों पहले सुनी थी पर वो मजा नही आया जो ६० और ७० के दशक मे आता था। अमीन सायानी के बिनाका गीत माला पेश करने का स्टाइल की बड़ा निराला था। बुधवार की रात ८ बजे बिनाका गीत माला छूट जाये तो बड़ा अखरता था । उस समय रेडियो सिलोन का भी बड़ा क्रेज था। हमारी सेकंड नम्बर वाली दीदी तो रेडियो चलाये बिना पढ़ाई ही नही करती थी क्यूंकि वो कहती थी कि बिना रेडियो के उनका पढाई का मूड ही नही बन पाता है।कई बार हम लोग उन्हें छेड़ते भी थे कि कहीँ इम्तहान मे तुम गाना लिख कर ना आ जाना।


वैसे विविध भारती तो आज भी कुछ पहले जैसा है पर अब इसमे भी थोडा-बहुत बदलाव आ गया है। हालांकि कार्यक्रम तो पहले वाले नाम के ही है जैसे पिटारा ,एक ही फिल्म से,हवा महल,चित्रलोक वगैरा।वैसे अब हम बहुत ज्यादा तो नही पर फिर भी रेडियो सुन लेते है। पर अब विविध भारती भी कुछ बदल सा गया है ।विज्ञापन तो पहले भी आते थे पर पहले तो दो गानों के बीच मे ही विज्ञापन आते थे वही टु न्न्न्न की आवाज वाले विज्ञापन। पर अब कई बार उदघोषक कहते है की अब आप फलां गाना सुनेगे पर उससे पहले ये विज्ञापन सुनिये। अभी एक विज्ञापन ख़त्म हुआ ही कि एक और विज्ञापन सुनिये ये कह देते है वैसे ये दूसरा वाला विज्ञापन वाद्य संगीत मतलब सितार,गिटार,बांसुरी या अन्य कोई वाद्य पर किसी फिल्म का मुखडा बजाते है। ये अलग बात है कि ये संगीत भी सुनने मे अच्छा लगता है पर दो-दो विज्ञापन का मतलब नही समझ नही आता है।

यूं तो अब पिछले दस सालों से रेडियो मे भी बहुत अधिक बदलाव आ गया है। बिल्कुल टी.वी.वाला हाल है
जैसे इतने सारे एफ.एम्.चैनल शुरू हो गए है और अब भी रोज नए-नए एफ.एम्.शुरू हो रहे है। पर इनमे कुछ से कुछ एफ.एम् पर गाना तो कम बातें ही ज्यादा सुनाई देती है. पर दूरदर्शन की ही तरह विविध भारती ने भी अपने मे बहुत ज्यादा बदलाव नही लाए है जो की बहुत ही अच्छी बात है। सबके बीच मे रहकर भी अलग रहना और लोकप्रिय रहना ही विविध भारती की खासियत है।

Saturday, August 18, 2007

कभी -कभी अपने ही रूपये-पैसे के लिए बैंक को इतना हिसाब देना पड़ता है कि लगता है आख़िर ये बैंक हमारी सुविधा के लिए है या परेशानी खड़े करने के लिए। आजकल तो अगर बैंक से किसी तरह की जानकारी अगर फ़ोन पर हासिल करना हो तो समझ लीजिये कि आप का कम से कम आधा घंटा तो गया और उसपर भी अगर पूरी जानकारी मिल जाये तब तो जरुर आपका दिन और समय अच्छा है।

कुछ सालों पहले तक तो ऐसा नही था हर जानकारी फ़ोन पर मिल जाती थी और ऐसा बैंक दावा भी करता था। और दावा सही भी था पर आजकल ऐसा दावा ग्राहक के लिए मुसीबत बन कर आता है। ये मल्टी - नेशनल बैंक तो इसकी जीती जागती तस्वीर है। अब आप ये भी कह सकते है कि भाई मल्टी नेशनल मे खाता ही क्यों खोला जब अपने नेशनल बैंक है। तो हम ये बता दे कि एम.एन .सी.मे खाता उस समय खोला था जब ये बैंक नए-नए थे और उस समय अपने नेशनल बैंकों मे ए.टी.एम.की सुविधा नही थी और हर बार पैसा लेने और जमा करने के लिए लाइन मे खड़ा होना पड़ता था जो इन एम.एन.सी.बैंकों मे नही था । और दूसरे ए.टी.एम.मे समय की पाबंदी नही होती है कि दो बजे के बाद पैसा ही नही निकाल सकते ,जब चाहे जहाँ चाहे पैसा निकाल सकते है।

हमे याद है पहले जब भी हम लोग कहीँ घूमने जाते थे तो ट्रैवलर चैक लेकर जाते थे क्यूंकि कैश लेकर सफ़र करना तो कभी भी सुरक्षित नही था।और फिर जहाँ घूमने जाओ वहां कैश कराओ पर कई बार इस सबमे बहुत समय लग जाता था और समय की पाबंदी तो रहती ही थी। पर इन एम.एन.सी.बैंकों की वजह से ये सारे चक्कर ख़त्म हो गए। और कहीँ भी आना-जाना बहुत ही आसान हो गया और चिन्ता रहित भी क्यूंकि कैश साथ जो नही ले जाना पड़ता था।

तो अब सवाल ये की जब हम इन सारी सुविधाओं का लाभ हम उठा रहे है तो फिर शिक़ायत कैसी। और ये भी की अब तो सभी नेशनल बैंक भी ये सारी सुविधातें देते है तो फिर एम.एन.सी.मे खाता क्यों रखना। अरे वरना ये पोस्ट कैसे लिखते :)


खैर हम वापिस आते है अपनी बात पर। तो हुआ यूं की हमे अपने बेटे का खाता खुलवाना था और चूंकि हमारा खाता इस बैंक मे है तो जाहिर है कि हम बेटे का खाता भी उसी बैंक मे खुलावायेंगे। तो बस हमने इसी बाबत बैंक मे फ़ोन किया तो बहुत सारी बातों जैसे कि आप अगर फलां जानकारी चाहते है तो जीरो डायल करें और अगर फलां जानकारी चाहते है तो एक डायल करें।और अगर किसी एक्जीक्यूटिव से बात करना हो तो नाईन डायल करें इसी तरह कि और भी कई बातें मसलन अपना नम्बर फीड करें इत्यादी। खैर कुछ देर music सुनने के बाद उनके एक एक्जीक्यूटिव जो की एक लडकी थी ने बड़ी ही गर्म जोशी से नमस्कार करके बात शुरू की और हमारे ये पूछने पर कि नए कार्ड के लिए कैसे अप्लाई करें। बस यहीं से शुरू हुआ सवालों का सिलसिला कि आपका नाम ,पता,नम्बर,जन्म तिथि,वगैरा-वगैरा। यहां तक तो ठीक था पर फिर उसने पूछना शुरू किया कि पिछली बार कब पैसा जमा किया ,कब पैसा निकाला,ये भी बता दिया पर इतने से उसे संतुष्टि नही हुईबिल्कुल वैसे ही जैसे पान-पराग के विज्ञापन मे कहता है कि इतने से मेरा क्या होगा :) और उसने हमे और बताने को कहा तो हमारा संयम जवाब दे गयाऔर हमने उससे कहा कि भाई हमने तो सिर्फ एक जानकारी के लिए फ़ोन किया और अगर वो जानकारी दे सकती हो तो बताओ तो उसने कहा कि पर आपको और डिटेल देने पडेगेंतभी हम कुछ बता सकते हैऔर हमने ग़ुस्से मे फ़ोन काट दिया

पर हमे भी ग़ुस्सा और जिद थी इसलिये दुबारा फ़ोन मिलाया तो अबकी किसी दूसरी लडकी ने फ़ोन उठाया (हर बार कोई नया ही फ़ोन उठाता है) तो फिर से वही सारे सवाल शुरू हुए और बात पहली बार कि तरह यहां भी आकर बात अटक गयी कि आपको और डिटेल देने पड़ेंगे

तो इस बार तो हम ने उससे कहा कि भाई पिछले दस बार का ट्रांजेक्शन तो कोई भी याद नही रख सकता हैऔर आपके पास तो कंप्यूटर पर सारी जानकारी है फिर कस्टमर को क्यों तंग करना

तो उसका जवाब था कि हम तो आपकी सुरक्षा के लिए ये सब कर रहे है

तो हमने भी जरा तल्खी भरे स्वर मे कहा क्यूंकि अबकी तो हम भी तैयार थे कि आप तो ऐसे सवाल कर रही है मानो हम कोई क्रिमिनल हो और इतने सवाल तो पुलिस भी नही पूछतीऔर अब हम आपसे नही बात करेंगेआप हमे अपने मैनेजर का नम्बर दीजिए अब हम उन्ही से बात करेंगे

तो वो कहने लगी कि हम आपको नम्बर भी नही दे सकतेआप हमे e-mail कर दीजिएहम सारी जानकारी भेज देंगे

इस पर हमने कहा कि आप लोग तो mail का जवाब नही देते हैऔर फ़ोन पर आप लोगों को हिदायत दी गयी है कि किसी भी कस्टमर को कुछ भी ना बताया जायेबस सवालों मे उलझा कर रखो

तब पता नही क्या सोचकर उसने बताया कि आपको चेन्नई से पता करना होगा

उसके ये कहने पर हमने उससे कहा कि इतनी जरा सी बात बताने के लिए उसने अपना और हमारा दोनो का इतना समय बरबाद कियायही एक लाइन पहले बोल देती तो क्या जाता

खैर अब चेन्नई से बात हो गयी है और हफ्ते-दस दिन मे कार्ड भी बन जाने की उम्मीद हैउम्मीद इसलिये कि कहीं फिर ये लोग कोई पंगा ना खड़ा कर दे

Friday, August 17, 2007

१४ अगस्त को जब नोकिया ने ये सूचना जारी की कि जिन मोबाइल फ़ोन मे bl-5c.बैटरी है उन्हें चार्ज करने पर फटने का खतरा है। तो जाहिर है नोकिया फ़ोन इस्तेमाल करने वाला हर व्यक्ति घबरा गया तो भला हम कैसे इस से बच सकते थे। टी.वी.पर शाम को ही ये खबर हर चैनल ब्रेकिंग न्यूज़ कह कर दिखा रहा था। हमने भी न्यूज़ देखी और फौरन अपने बेटे और पतिदेव को अपने-अपने मोबाइल की बैटरी चेक करने को कही। गनीमत है कि उन लोगों के नोकिया फ़ोन मे bl-5c.बैटरी नही थी। ऐसा सुनकर हम निश्चिंत हो गए की चलो बला टली।

कहीँ आप ये तो नही सोच रहे कि जब कुछ हुआ ही नही तब है तब हम भी बच गए का क्या मतलब। बताते है बताते है। वो क्या है ना की हमने सबसे तो कह दिया की अपने फ़ोन की बैटरी चेक करो पर खुद अपने ही फ़ोन क बैटरी चेक नही की थी। असल मे हम goa का नंबर इस्तेमाल कर रहे है और हमारे सिम कार्ड मे कुछ प्रॉब्लम आ गयी थी तो हमने अपना सिम कार्ड goa भेजा हुआ था ।अब ये मत कहिये कि भाई इतने से काम के लिए कार्ड को goa क्यूँ भेजा। तो वो इसलिये कि यहां पर सब कहते है कि जहाँ का कार्ड है वहीँ से ठीक कराइये। और चूंकि इधर पिछले एक हफ्ते से हम अपना फ़ोन इस्तेमाल नही कर रहे थे तो अपने फ़ोन की बैटरी चेक करने का ख़्याल ही नही आया था। पर कल जब हमे हमारा सिम कार्ड मिला और हम उसे फ़ोन मे लगा रहे थे तो देखा की फ़ोन की बैटरी बिल्कुल ही डिस्चार्ज हो गयी थी तो बिना कुछ ध्यान दिए जैसे ही बैटरी को चार्ज करने जा रहे थे तभी याद आ गया कि हमने तो अपने फ़ोन की बैटरी ही नही चेक की है।


बस फिर क्या था हमने फ़टाफ़ट बैटरी निकाली और जो देखा वो तो होश ही उड़ा देने वाला था । अरे भाई हमारे फ़ोन मे bl-5c.बैटरी थी। बस फिर हमने बैटरी निकाल कर अलग रख दी और सोचने लगे कि अब क्या करें कि तभी हमे याद आया कि सुबह ही तो हमने अखबार मे ये खबर (क्या विज्ञापन ) पढ़ी थी कि your nokia is safe to use .here is why.बस फिर हमने पहले अपने पतिदेव और बेटे को बैटरी के बारे मे बताया । और अखबार मे छपे नंबर पर फ़ोन मिलाना शुरू किया पर फ़ोन नही मिला। तो sms किया पर थोड़ी देर तक तो जवाब ही नही आया तो हमे लगा कि अब तो e-mail ही करना पड़ेगा पर करीब दस मिनट बाद हमे मैसेज मिला कि हमारे फ़ोन की बैटरी चार्ज करने मे कोई खतरा नही है । हम इसे आराम से बिना डरे इस्तेमाल कर सकते है। और इस तरह से हम भी बच गए बाल-बाल क्या पूरा ही बच गए। :)

लगे हाथ हम यहां पर हिंदुस्तान टाईम्स की कल की वो ख़बर यानी विज्ञापन भी लगा देते है।

Thursday, August 16, 2007

परसों यानी १४ अगस्त की रात को इंडिया टी.वी.ने एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट दिखाई जिसमे चैनल ने एन्काउंतर का सच दिखाया था।इस रिपोर्ट मे सितम्बर २००६ मे इलाहाबाद मे हुए एक एन्काउंतर का विडियो जिसमे एक आदमी जिसका नाम पिंटू था उसे दिखाया जा रहा था और रिपोर्टर ये बता रहा था की पिंटू हाथ ऊपर करके पुलिस के सामने सरेंडर करना चाह रहा था पर पुलिस ने बड़ी ही निर्ममता से उसे गालियाँ देते हुए मार गिराया था। करीब एक घंटे तक यही न्यूज़ दिखाई गयी कि किस तरह से पुलिस ने उस आदमी को मारा जबकि वो आदमी निहत्ता था और सरेंडर करना चाह रहा था।और कैसे डी.जी.पी.ने उस आदमी को सरेंडर करने का मौका नही दिया, जबकि वो आदमी लगातार सरेंडर की बात कह रहा था। और जब पुलिस ने गोलियाँ चलाई तो कैसे पिंटू अपनी जान बचाने के लिए वहां से भागा। और फिर यही न्यूज़ १५ अगस्त की दोपहर को भी दिखाई गयी ।


पर कल यानी १५ अगस्त की दोपहर को स्टार न्यूज़ ने भी एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट दिखाई ये कहते हुए कि आख़िर एन्काउंतर का सच क्या है।इसमे दिखाया गया की सितम्बर २००६ मे इलाहाबाद पुलिस और पिंटू नाम के शख्स के बीच मे भिड़ंत हुई जिसमे पिंटू ने पुलिस वाले पर गोली चलाई औए बम भी चलाये। और इसमे भी पिंटू को हाथ ऊपर करके दिखाया गया और पुलिस वालों को गाली देते हुए और फिर गोलियां चलाते हुए दिखाया गया। जब पुलिस ने गोली चलानी शुरू की तो पिंटू वहां से भागता है और पुलिस वाले उसके पीछे भागते है पर थोड़ी दूर जाने पर एक पुलिस वाला वापिस भाग कर आता है और उसके पीछे की तरफ एक धमाका (सुनाई नही देता है ) होता है और धुँआ उठता हुआ दिखता है।स्टार न्यूज़ ने कहा की उनके चैनल ने इस खबर की जांच पड़ताल की है और ये एक्सक्लूसिव रिपोर्ट दिखा रहा है कि पिंटू निहत्ता नही था और पुलिस ने ही नही अपितु उसने भी पुलिस पर गोली चलाई थी और बम भी चलाये थे। जिसमे एक पुलिस वाले की मृत्यु हो गयी और दुसरे को पैर मे चोट लगी (शायद गोली )। और किस तरह से ये खबर देखने के बाद मायावती ने जांच के आदेश दे दिए है।

कल यानी १५ अगस्त की रात इंडिया टी.वी.ने फिर से इसी एक्सक्लूसिव न्यूज़ को दिखाते हुआ कहा कि उनकी खबर देखने के बाद मायावती ने किस तरह जांच के आदेश दे दिए है। और डी जी.पी.ने भी अपना पहले का बयान बदल दिया है। उस एक लाइन के बयान को कई बार ये कहते हुए कि अब हम आपको डी.जी.पी.का वो बयान दिखायेंगे जिसमे उन्होंने माना है कि पुलिस वालों ने गलती की है दिखाया।और ये भी कहा कि पहले उनका बयान कुछ और था।पर इनकी न्यूज़ मे जब पिंटू पुलिस की गोलियों से बच कर भागता है तो उसमे ना तो वो बम का धुँआ दिखाया गया और ना ही कोई पुलिस वाले के जख्मी होने की खबर बतायी गयी ।


यहां सवाल ये उठता है की आख़िर कौन सा चैनल हमे सही खबर दिखा रहा है। और हम किस की बात का विश्वास करें।
क्या खबर को इस तरह दिखाना जरुरी है।

अगर एक चैनल मे पिंटू के पास बम होने की बात कही गयी है तो दूसरे मे क्यों नही बताई गयी।

पुलिस वाले जो गाली दे रहे थे वो तो दोनो चैनल पर ही सुनाई दे रही थी पर बम की बात उन लोगों ने क्यों नही सुनी।

पिंटू के एन्काउंतर की जांच तो होगी पर इन न्यूज़ चैनल वालों की कौन जांच करेगा की वो खबर को क्यों तोड़ -मरोड़ देते है।

कौन सच्चा और कौन झूठा है ये तो बाद मे पता चलेगा पर ....?

शायद यही स्वतंत्रता का अर्थ है कि जो जैसे चाहे ख़बर को दिखा सकता है।

Wednesday, August 15, 2007

जी हाँ आप बिल्कुल सही समझे है हम टीम इंडिया को इंग्लॅण्ड पर इक्कीस साल बाद हासिल जीत पर दिए जाने वाले इनाम की ही बात कर रहे है।इस बार तो वाकई इंडिया ने चक दे इंडिया जैसा कमाल कर ही दिया है। और जब टीम ने मैच जीता है तो यक़ीनन वो इनाम की हकदार भी है।बी.सी.सी.आई.की तो बांछे खिल गयी है।


इस जीत ने ये भी दर्शा दिया की अगर टीम इंडिया का कोई कोच नही है तब भी हल्पाते हुए (हमे तो यही शब्द याद आ रहा है) भी यानी की लुढ़कते-पुढकते भी जीत हासिल कर सकते है, तो भाई हम कोई टीम इंडिया की बुराई थोड़े ही कर रहे है। क्या कहा आपको हमारा ये लुढ़कते-पुढकते कहना बिल्कुल भी अच्छा नही लगा । तो भाई ये टीम इंडिया भी ना एक पारी मे तो ६०० रन बनाती है तो दूसरी पारी मे धड़धदा कर आउट हो जाती है।अच्छा खासा जीता हुआ मैच ड्रा हो गया वरना १-० की जगह २-० की जीत होती।इससे ये भी लगता है की शायद बिना कोच के टीम ज्यादा ही अच्छा खेल सकती है। वैसे पहले भी तो बिना कोच के ही खेलती थी। तो भला अब क्यों नही खेल सकती है। और उन सारी बातों को गलत सिद्ध करती है कि बिना कोच के टीम इंडिया का कोई भविष्य नही है।

चक दे इंडिया फिल्म के बाद तो सभी को लगता है कि टीम इंडिया के लिए बस यही गुरुमंत्र होना चाहिऐ कि जितने देर वो क्रीज पर है बस उसी घड़ी और समय के बारे मे सोचे कि वो अपने देश के लिए खेल रहे है ना कि कोई रेकॉर्ड बनाने के लिए। लो रेकॉर्ड से याद आया कि इस बार तो कुंबले ने भी सेंचुरी बनाई जो कि अपने आप मे ही एक रेकॉर्ड है।कम से कम टीम इंडिया के आख़िरी बल्लेबाज ने भी सेंचुरी तो बनाई और इसके लिए कुंबले बधाई के हकदार है।

चक दे हो चक दे इंडिया गाना भी क्या टाईम पर आया है कि जब भी कोई चैनल टीम इंडिया की जीत दिखाती है तो ये गाना जरुर बजाता है।और हम भी यही कहेंगे कि चक दे इंडिया



आज स्वतंत्रता दिवस की साठवीं वर्षगांठ पर आप सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनायें!!

इन दो गीतों के विडियो देखे जो आज के समय की भी हक़ीकत है। आशा करते है कि आप लोगों को ये पसंद आएगा।



Tuesday, August 14, 2007

स्वतंत्रता = आजादी(फ्रीडम)
दिवस = दिन
स्वतंत्रता दिवस अर्थात आजादी का दिन ।

इन दो शब्दों के महत्त्व को हर कोई जानता है और समझता है। पर हरेक के लिए आजादी का अर्थ शायद अलग -अलग हो सकता है। पर यहां हम कोई और नही अपने देश की आजादी की ही बात कर रहे है। कल देश को आजाद हुए पूरे साठ साल हो जायेंगे। पर इन पिछले साठ सालों मे देश ने कहीं विकास किया है तो कहीं पहले की तरह ही पिछड़ा हुआ है।पिछले साठ सालों मे बहुत कुछ बदला है और आजादी का अर्थ भी अब कुछ बदलता सा लग रहा है।

जब हम लोग छोटे थे तो स्वतंत्रता दिवस का मतलब होता था स्कूल मे पन्द्रह अगस्त को ध्वजारोहन ,परेड,देशभक्ति के गीत ,कई बार खेल प्रतियोगिताएं भी होती थी। और इस सब तैयारी के लिए सारा स्कूल जुटा रहता था। जहाँ देखो बस हर तरफ लोग प्रैक्टिस करते ही नजर आते थे ,पी.टी.टीचर खुले मैदान मे बच्चों को अभ्यास कराते तो music टीचर बच्चों को गाने की प्रैक्टिस कराती तो किसी और क्लास रूम मे टीचर डान्स की प्रैक्टिस कराती होती थी। कुछ बच्चे फैंसी ड्रेस की तैयारी करते थे। हर किसी को १५ अगस्त की सुबह का इन्तजार रहता और हर कोई समय से पहले ही (वो बच्चे भी जो देर से आते थे) स्कूल पहुंच जाता था। मुख्य अध्यापिका ध्वजारोहन करती और फिर उनका भाषण होता और उसके बाद रंगारंग देश भक्ती से ओत- प्रोत कार्यक्रम होते। ऐसे ही एक बार एक कार्यक्रम मे हमारी जिज्जी की एक दोस्त भारत माता बनी थी और करीब तीन मिनट के गाने मे उन्हें पलकें नही झपकानी थी और इसके लिए वो रोज घर मे प्रयास करती थी क्यूंकि शुरू मे थोड़ी ही देर मे आंखों से आंसू बहने लगते थे।और उन्होने अपनी पलकें नही झपकायी। खैर सब कार्यक्रम के बाद मिठाई सारे स्कूल के विद्यार्थियों मे बाँटी जाती थी।और सभी बच्चे मिठाई खाते हुए अपने-अपने घरों को जाते थे।

पर आजकल तो पन्द्रह अगस्त का मतलब स्कूल की छुट्टी। ना तो स्कूल वालों मे कोई उत्साह है इसे मानने का और ना ही बच्चों मे। वैसे बच्चों की इतनी गलती नही भी है क्यूंकि अगर स्कूल कुछ करेगा ही नही तो बच्चे क्या जानेगें। दिल्ली जैसे शहर मे पन्द्रह अगस्त एक दिन पहले ही स्कूलों मे मना लिया जाता है । इसके दो फ़ायदे है एक तो स्वतंत्रता दिवस भी मना लिया गया और दूसरे पन्द्रह को छुट्टी भी हो गयी। स्कूल भी खुश और बच्चे तथा उनके अभिभावक भी खुश।आख़िर स्वतंत्रता दिवस जो है।


हर चैनल वो चाहे रेडियो हो या चाहे टी.वी.देशभक्ति की भावना से भरा लग रहा है। अभी तक तो पन्द्रह अगस्त को सभी चैनल देशभक्ति की फ़िल्में दिखाते थे पर अब तो देशभक्ति के नाम पर कृश दिखाई जाने वाली है।भाई हमे भला इसमे क्या आपत्ति हो सकती है आख़िर स्वतंत्रता दिवस जो है।


अब तो देशभक्ति का पाठ नयी पीढ़ी को समझाने का काम मुन्ना भाई और रंग दे बसंती जैसी फिल्मे करती है। जो एक तरह से अच्छा भी है वरना तो आज के बच्चों को देश पर जान न्योछावर करने वाले वीरों शहीदों बारे मे पता ही नही चलता क्यूंकि अब की पढाई और कोर्स मे बदलाव जो आ गया है।

स्वतंत्रता दिवस इस बार एक और मायने मे अलग है वो ये कि इस बार साठ सालों मे पहली बार देश की पहली महिला राष्ट्रपति ने आज देश के नाम अपना संदेश दिया है।

चलिए हम सभी उन वीर जवानों को याद करें जिन्होंने अपने देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी । और स्वतंत्रतता दिवस को उसी भावना से मनाएं जैसे हम सभी को मनाना चाहिऐ।

हिंदी है हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा हमारा



रॉस एंड स्मिथ किन्ही दो लोगों के नाम नही है बल्कि अंडमान के उत्तर के आख़िरी कोने मे बसे दिगलीपुर के दो बहुत ही छोटे खूबसूरत और नायाब से द्वीपों के नाम है । दिगलीपुर को अंडमान का आख़िरी कोना इसलिये कहा है क्यूंकि इसके आगे सड़क ख़त्म हो जाती है और दूर तक अपार समुन्द्र ही दिखता है।रॉस एंड स्मिथ के बारे मे लिखने से पहले कुछ बातें दिगलीपुर की भी बता दे। दिगलीपुर पोर्ट ब्लेयर से अगर सड़क के रास्ते जाएँ तो २९० कि.मी.की दूरी पर है। पर अगर समुन्द्र के रास्ते जाएँ तो १८० या १९० की.मी. की दूरी पर है। चाहे किसी भी रास्ते जाएँ यहां पहुँचने मे समय बहुत लगता है। सड़क के रास्ते जाने मे करीब १४-से १५ घंटे लगते है। वैसे हम तो हमेशा ही कार से गए है क्यूंकि एक तो हमे sea sickness होती है और दूसरे ड्राइविंग का यहां अपना ही मजा है ।ये रास्ता अच्छा और बुरा दोनों है। अच्छा इसलिये क्यूंकि यहां के ऊँचे-नीचे रास्ते,जंगल और जंगल मे विभिन्न प्रकार की चिड़ियों की आवाजें और चारों ओर फैली हरियाली दूर-दूर तक खाली सड़क बस बीच-बीच मे अंडमान ट्रांसपोर्ट की बसें और प्राइवेट बसें दिखती है अरे कहने का मतलब है कि गाड़ी चलाने मे कोई टेंशन नही रहता है। पर रास्ता बुरा इसलिये है क्यूंकि बारिश मे सड़कें खराब हो जाती है और ये तो हम सभी जानते है की अंडमान मे कितनी अधिक बारिश होती है। पर बारिश मे भी इस रास्ते मे गाड़ी चलाने मजा आता है।


आम तौर पर जब भी दिगलीपुर जाते है तो या तो मायाबंदर या फिर रंगत मे रुकते हुए जाते है । वैसे इन दोनो जगहों पर रुकना जरूरी नही है। कई लोग रंगत मे भी रुकते थे। यूं तो रंगत मे कुछ खास देखने को नही है पर सीजन मे turtle nesting देखने के लिए भी लोग रंगत मे रुकते है। पर हम लोग हमेशा मायाबंदर रुकते थे क्यूंकि १२ घंटे की यात्रा के बाद हम तो थक जाते थे। इसलिये रात मे मायाबंदर रूक कर अगली सुबह सूर्योदय देख कर दिगलीपुर के लिए जाते थे।मायाबंदर से दिगलीपुर केवल सत्तर कि.मी. है। पर ये सत्तर की.मी. की दूरी तय करने मे दो-ढाई घंटे लग जाते थे। जैसे ही मायाबंदर से बाहर निकलते है की ऑस्टिन ब्रिज आ जाता है। ये वही ब्रिज है जो २६ दिसंबर २००४ के भूकंप मे क्रैक कर गया था और इसका एक पिलर थोडा अपनी जगह से हिल गया था , जिसकी वजह से काफी समय तक इस ब्रिज पर बसें और कार वगैरा नही जाती थी। जिससे लोगों को बहुत परेशानी होती थी।( चूंकि ब्रिज बनने मे थोडा समय लग गया था ) ऑस्टिन ब्रिज पार करते ही फॉरेस्ट की चेक पोस्ट पड़ती है। यहां पर एंट्री करवाने के बाद ही दिगलीपुर के लिए जाते है। यही ऑस्टिन ब्रिज है।



रास्ते मे बहुत ही छोटी-छोटी सी बस्तियां पड़ती है जहाँ पर हमेशा लोग आराम से बैठे नजर आते है । और जब भी हम लोगों की कार या कोई और कार निकलती , तो लोग देखने लगते , वो इसलिये क्यूंकि तब भी और आज भी लोकल लोग या तो बस से या फिर बोट से ही दिगलीपुर जाते है। रास्ते मे बेहद खूबसूरत मंजर दिखाई पड़ता रहता है।जैसे कभी कोई सांप सड़क पर नजर आता है तो कभी गोई (salt water crocodile ) ,कभी हाथी तो कभी कभार हिरन भी दिख जाते है। सड़क के किनारे लोग बस के इंतज़ार मे बैठे या खड़े दिखते है। और ऐसे ही हरियाली भरे रास्ते से होते हुए दिगलीपुर पहुंच जाते है।

यूं तो दिगलीपुर भी अंडमान के बाक़ी द्वीपों की तरह ही शांत है पर यहां की एक खास बात है वो ये कि क्यूंकि दिगलीपुर थोड़ी ऊंचाई पर स्थित है इसीलिये पूरे अंडमान और निकोबार मे सिर्फ दिगलीपुर मे ही ठंड पड़ती है। दिसम्बर और जनवरी मे यहां सुबह के समय इतनी ठंड होती है की शाल पहनने की जरूरत होती है।यहां ठंड पड़ने की वजह से सिर्फ दिगलीपुर मे ही फूल गोभी की खेती होती है। और हाँ यहां कोहरा भी पड़ता है। क्यूं अजीब लगा ना सुनकर ।

दिगलीपुर मे ठहरने के लिए दो गेस्ट हाउस है। एक तो सी.पी.डब्लू .डी.का और दूसरा अंडमान पर्यटन विभाग का turtle resort जो दिगलीपुर से आगे जाकर करीब १२ की.मी.की दूरी पर है। जैसा की इसके नाम से ही पता चलता है की यहां पर भी turtle देखने को मिलते है अरे गेस्ट हाउस मे नही समुन्द्र मे, बशर्ते आप दिसम्बर से फरवरी के महीने मे जायेंगे तो। ये resort भी थोडा ऊंचाई पर है और चूंकि यहां बहुत ज्यादा लोग नही जाते है इसलिये ये आम तौर पर खाली रहता है पर फिर भी पहले से बुकिंग करवा कर जाना चाहिऐ। इसी गेस्ट हाउस के रास्ते मे जाते हुए एरिअल बे पड़ता है जहाँ से डोंगी (नाव)मे बैठकर रॉस एंड स्मिथ जाना पड़ता है।रॉस एंड स्मिथ जाने के लिए सुबह-सुबह का समय अच्छा रहता है क्यूंकि बाद मे धूप बहुत तेज हो जाती है। और लहरें भी तेज हो जाती है।

तो हम लोगों ने भी एरिअल बे से एक डोंगी ली और वहां सीढ़ियों से नीचे उतरकर डोंगी मे जैसे ही बैठने लगे की डोंगी एक तरफ को झुक सी गयी हम तो बहुत डर गए पर डोंगी वाला बोला कि मैडम डरिये मत कुछ नही होगा । खैर एक-एक कर हम सभी डोंगी मे सवार होकर हल्पाते हुए (मतलब डोंगी उँची-उँची लहरों पर उछलती हुई)रॉस एंड स्मिथ की ओर बढने लगे। बीच-बीच मे डोंगी मे पानी भर जाता था तो डोंगीवाला तो बडे ही निश्चिंत भाव से डिब्बे से पानी भर-भर के बाहर फेंक देता था।और एरिअल बे से २०-२५ मिनट लगते है।द्वीप पर पहुंच कर डोंगी बिल्कुल किनारे नही लगती है क्यूंकि वरना डोंगी के बालू मे फ़सने का डर रहता है. इसलिये डोंगी से पानी मे कूदकर जाना पड़ता है और इसी तरह वापिस आने के लिए भी पानी मे जाकर ही डोंगी मे चढ़ना पड़ता है।

डोंगी मे जाते-जाते जैसे- जैसे हम इन द्वीपों के पास पहुँचने लगते है तो एक अदभूत सा नजारा दिखता है की कैसे दो बेहद छोटे से द्वीप सफ़ेद रेत से जुडे हुए है।चारों ओर समुन्द्र और बीच मे दो द्वीप और इन्हें जोड़ता हुआ सफ़ेद चाँदी सा चमकता रेत । और पानी इतना साफ कि क्या कहें। पानी और द्वीप दोनो ही बहुत साफ क्यूंकि एक तो वहां ज्यादा लोग जो नही जाते है। और दूसरे वहां कोई खाने-पीने की दुकान नही है।इसलिये जब भी जाएँ अपने साथ खाना पानी जरूर ले जाएँ पर खाने के बाद कूडा वहां नही फेकना चाहिऐ वरना इस द्वीप की सुन्दरता नष्ट होने मे जरा भी समय नही लगेगा। हाँ सीजन मे पर्यटन विभाग की ओर से कैम्पिंग की व्यवस्था होती है अगर कोई करना चाहे तो।

बीच की रेत से ही एक द्वीप से दूसरे द्वीप तक जा सकते है। इन दोनो द्वीपों पर फॉरेस्ट के लोग रहते है जिससे कोई जंगल को नुकसान ना पहुँचाये।जंगल मे आप घूम सकते है पर अनुमति लेनी पड़ती है।जंगल मे जाकर बहुत अच्छा लगता है क्यूंकि वहां धूप नही लगती है। और एक बात दोनो ओर से समुन्द्र से घिरे होने के कारण यहां दिन मे एक बार ऐसा समय आता है जब दोनो ओर से समुन्द्र का पानी ऊपर आ जाता है और ऐसा महसूस होता है मानो हम समुन्द्र के बीचों-बीच खड़े हो। और यहीं पर turtle nesting के लिए भी घेरा बनाया जाता है। जहाँ कछुए आते है और अंडे देते है। और ये जगह कछुओं के लिए बहुत अच्छी मानते है क्यूंकि दोनो ओर समुन्द्र जो है।

इन द्वीपों पर दो-चार घंटे बिता कर हम लोग वापिस हल्पाते हुए एरिअल बे लौट आये और गेस्ट हाउस जाकर खाना खाकर जो सोये की बस। वो क्या है ना की समुन्द्र के पानी से थकान बहुत होती है। लो भला ये भी कोई बताने की बात है ये तो आप सभी जानते है।

दिगलीपुर मे रॉस एंड स्मिथ के अलावा और भी दो-तीन बीच है जैसे राम नगर बीच ,कालीपुर .और लामिये बीच है। और एक और खास बात दिगलीपुर की यहां पर अंडमान की एकमात्र नदी कल्पोंग बहती है और इसी नदी पर अंडमान का पहला ह्य्द्रोएलेक्ट्रिक पॉवर प्रोजेक्ट भी है।यहां पर भी अनुमति लेकर ही जाया जा सकता है। इसके अलावा यहां पर saddle peak भी है जहाँ लोग ट्रेक्किंग के लिए जाते है। वैसे ट्रेक्किंग के लिए हम कभी नही गए क्यूंकि जंगल और जंगल मे सांप और अन्य जानवरों से हम डरते जो है।


अंडमान के बाद अब अगली बार से हम निकोबार के बारे मे लिखेंगे।

Thursday, August 9, 2007

पहले जब हम लोग छोटे थे और जब कभी पापा मम्मी या बाबूजी को हम लोग ये कहते सुनते थे की अरे आजकल महँगाई बहुत बढ गयी है।हम लोगों के ज़माने मे तो बहुत सस्ता था ।तो ये सुनकर कुछ समझ नही आता था की भला इतना भी क्या महंगा और सस्ता हो गया । तो कई बार हम लोग उनसे पूछते थे कि आख़िर आप लोगों के समय मे हर चीज इतनी सस्ती कैसे थी तो बाबूजी कहते की जैसे उस ज़माने मे देसी घी बहुत सस्ता होता था शायद एक- दो रूपये किलो तो हम लोगों को विश्वास नही होता था कि घी और वो भी देसी घी भला इतना सस्ता कैसे हो सकता है।पर अब जब हम सोचते है तो लगता है कि वाकई हमारे देखते-देखते महँगाई के तेवर कितने बदले-बदले से है आज।पहले जिन बातों पर विश्वास नही होता था अब उन पर यकीन आने लगा है कि हाँ फलां साल (अस्सी और नब्बे के दशक )मे सब चीजे कितनी सस्ती होती थी। और अब कैसे हर चीज के दाम आसमान छूने लगे है।।


बाबूजी तो अक्सर कहते थे कि तुम लोग तो नकली देसी घी खा कर बडे हो रहे हो हम लोगों ने तो खालिस देसी घी ही खाया है।वैसे पहले तो घरों मे सब्जी या मीट देसी घी मे ही बनाया जाता था । आज की तरह refind oil मे नही। पर कमाल की बात थी की उस समय देसी घी खाकर भी लोगों को कोई नुकसान नही होता था।

ऐसे ही एक बार हमारी अम्माजी (सास जी )बता रही थी कि जब हमारे पापाजी ( ससुरजी) ने नौकरी शुरू की थी तो उस समय उनकी तनख्वाह दो सौ रूपये थी जिसमे से कुछ पैसा वो अपने छोटे-भाई-बहनों को पढने के खर्चे के लिए भेजते थे और कुछ पैसा घर यानी दादी को भेजते थे और तब भी सब कुछ बड़ी ही आसानी से मतलब घर चलता था और जिसमे वो बचत भी करती थी। पर आज तो सौ रूपये की कीमत दस रूपये जितनी हो गयी है।

जब तक पढ़ते थे तब तक तो आटे-दाल का भाव पता नही था पर जब शादी के बाद अपनी घर-गृहस्थी शुरू की तो हर चीज का भाव पता चला की आटा कितने रूपये किलो है तो दाल कितने रूपये किलो है। अब जब भाव की बात चली है तो लगे हाथ हम ये भी बता देते है की अस्सी के दशक मे दाल कुछ पांच या सात रूपये किलो होती थी पर आज कुछ छियालीस रूपये किलो हो गयी है।बस-बस घबराइये मत हम सभी चीजों के भाव नही गिनाने जा रहे हैये तो बस एक मिसाल दी है। जिस तरह हर चीज के दाम मे इजाफा हुआ है तो उसी तरह लोगों की तनख्वाह मे भी इजाफा हुआ है।

पिक्चर देखना तो हमारा पुराना शौक़ है। अपने विद्यार्थी जीवन मे फ़िल्में देखने ख़ूब जाते थे और अब भी जाते है। पर तब कभी सोचा भी नही था कि पिक्चर का टिकट इतना महंगा भी हो सकता है।पहले जहाँ सौ रूपये मे पूरा परिवार पिक्चर देखने के साथ-साथ इंटरवल मे खा-पी भी लेताथा वो तो अब कल यानी भूतकाल की बात हो गयी है क्यूंकि हम सभी जानते है की पी.वी.आर मे एक टिकट ही कम से कम डेढ़ सौ रूपये का आता है। और फिर वहां का पॉप कॉर्न और पेप्सी उसके बिना तो पिक्चर देखने का मजा ही नही आता है। अब भला वैसा पेप्सी और पॉप कॉर्न किसी आम पिक्चर हॉल मे कहॉ मिलेगा।

महँगाई की बात कर रहे है तो भला स्कूल कॉलेज को कैसे छोड़ दे। जब हम पढ़ते थे तब तो एम्.ए की फ़ीस भी कुछ बीस-तीस रूपये थी जो की आज हम कह सकते है की हमारे ज़माने मे फ़ीस बहुत कम होती थी। फिर हमारे बच्चों ने जब स्कूल जाना शुरू किया तो उस समय के हिसाब से तो फ़ीस बहुत थी पर अगर आज हम स्कूल की फ़ीस देखते है तो लगता है की हमारे बच्चे तो बहुत सस्ते मे पढ़ कर निकल गए क्यूंकि अब तो सुना है की नर्सरी के बच्चे की फ़ीस भी दस से पन्द्रह हजार सालाना हो गयी है।

पैट्रोल के आज के दाम देख कर लगता है कि क्या तब सब लोग पानी से गाड़ी चलाते थे जो इतना सस्ता होता था। हालांकि ऐसा नही है की पैट्रोल की कीमत जो हर राज्य मे अलग -अलग है उससे गाड़ी चलाने वालों को कोई फर्क पड़ा हो। भाई जिसे गाड़ी चलानी है उसके लिए पैट्रोल चाहे दस रूपये लीटर हो चाहे पचास रूपये लीटर हो वो गाड़ी चलाना छोड़ थोड़े ही देगा।

पर कुछ चीजें जिन्हे पहले खरीदना हर आम आदमी के हाथ मे नही होता था जैसे टी.वी.,कंप्यूटर ,मोबाइल ,पर अब तो टी.वी. और मोबाइल इतने अधिक सस्ते हो गएँ है की आज मोबाइल के बिना तो कोई दिखाई ही नही देता है। जो कंप्यूटर नब्बे के दशक में खरीदना ही हर किसी के बस की बात नही थी वो अब लोगों की पहुंच मे आ गया है। और टी. वी .और मोबाइल के दामों में कितनी गिरावट आयी है ये तो हम सभी जानते है। पहले मोबाइल को लोग शौकिया तौर पर रखते थे पर अब यही मोबाइल सबकी जरुरत बन गया है वो चाहे कोई नेता हो या अभिनेता हो या सब्जी बेचने वाला हो याछात्र -छात्राएं ही क्यों ना हो ।

पिछले कुछ सालों मे हवाई यात्रा भी बहुत सस्ती हो गयी है। पहले तो हवाई यात्रा करना किसी सपने जैसा होता था पर अब ऐसा नही है। पहले ना तो इतनी कम्पनियाँ थी और नही टिकट इतने सस्ते होते थे। आजकल तो competition का जमाना है । पहले तो सिर्फ apex fare होता था जिसमे दो-तीन महीने पहले टिकट बुक करने पर काफीसस्ता मिल जाता था। पर जब से एयर डेकन आया है तब से हवाई जहाज के टिकट के दामों मे बहुत ही अधिक गिरावट आयी है। ये ठीक है की बाक़ी दूसरी एयर लाईन्स की तरह एयर डेकन मे खाने-पीने को कुछ नही मिलता है पर उसमे आप काफ़ी-या सैंडविच खरीद कर खा सकते है।और चाहे तो ट्रेन के सफ़र की तरह घर से खाना लेकर भी जा सकते है। और शायद एअर डेकन की वजह से ही एयर फेयर इतना सस्ता हो गया है। अब तो हर एयर लाईन्स कोई ना कोई ऑफर निकालते ही रहते है। जनता को भी आराम क्यूंकि जहाँ जाने मे घंटों लगते थे वहां हवाई जहाज से दो-तीन घंटे मे पहुंच जाते है।

और अब हमे ये समझ गया है कि पापा लोग क्यों कहते थे की उनके ज़माने मे सस्ता थाअब तो हम भी अगर कभी महँगाई की बात होती है तो कहते है कि हाँ भाई हमारे ज़माने मे (अस्सी-नब्बे के दशक) तो हर चीज बहुत सस्ते मे मिलती थी पर अब तो ..... ।

Tuesday, August 7, 2007

आम तौर पर गोवा अपने सुन्दर beaches के लिए जाना जाता है । गोवा मे इतने ज्यादा बीच है कि जिसका कोई हिसाब ही नही है।पर कुछ बीच जैसे कलेंग्गुत ,कोल्वा,मीरामार ,बागा,अन्जुना,वेगातोर तो हमेशा पर्यटकों या गोवा के रहने वालों से हमेशा भरे रहते है तो कुछ जैसे आरम्बोल,मोर्जिम ,बोग्मोलो ,पालोलिम और अनेकों ऐसे बीच भी है जहाँ लोग कम जाते है पर विदेशी पर्यटक आम तौर पर कम भीड़-भाड़ वाले बीच पर ज्यादा जाते है ।


यूं तो जब भी कोई समुद्र किनारे जाता है तो उसका मन पानी मे जाने का हो ही जाता है । कुछ तो इसलिये कि भाई अगर समुद्र मे नहाया ही नही तो फिर ऐसी जगह आने का क्या फायदा और दूसरे कई बार लोग शर्मा शर्मी मे भी पानी मे जाते है कि कहीँ वहां मौजूद लोग उन्हें डरपोंक ना समझ ले। पर कुछ लोग जैसे कि जवान बच्चे और लड़के-लडकियां तो पानी मे ना जाएँ ऐसा भला कैसे हो सकता है। ठीक भी है आख़िर समुन्द्र हर जगह तो है नही। पर कई बार यही समुन्द्र कितना जानलेवा हो सकता है इसका किसी को भी अंदाजा नही होता है।


सारी दुनिया मे गोवा के बीच फ़्रेंडली बीच के तौर पर जाने जाते है और ये भी माना जाता है कि वहां के बीच मे नहाने का जो मजा है वो कहीँ और नही है। तो हमने कब इनकार किया है । ये तो हम भी मानते है कि गोवा के बीच बहुत ही सुन्दर और साफ होते है पर क्या आप जानते है कि गोवा के समुन्द्र मे अंडर करंट बहुत है । क्यों आश्चर्य हुआ कि हम ये क्या कह रहे है अंडर करंट और वो भी गोवा के समुद्र मे। जी हाँ हम बिल्कुल सही कह रहे है।


गोवा मे अंडर करंट सुनने मे खराब लगता है पर यही हक़ीकत है पर लोग इस बात को ना तो जानते है और नही वहां जो चेतावनी लिखी होती है उस पर ध्यान देते है।वहां के जो लोकल अखबार है उनमे भी प्रशासन द्वारा लिखा रहता है कि समुद्र के अन्दर ज्यादाअन्दर मत जाएँ । आम तौर पर बारिश मे समुन्द्र बहुत ही रफ हो जाता है मतलब लहरें बहुत उँची-उँची उठती है और bo वगैरा भी लगाया जाता है कि स्विमिंग ना करें।पर तब भी लोग पानी मे जाते है और कई बार लहरें इतनी उँची होती है कि वो उसमे फंस जाते है और अगर किस्मत साथ नही देती है तो वापिस नही आ पाते है। हालांकि वहां लाइफ गार्ड (२-४)भी रहते है जो कि लोगों को पानी मे जाने से रोकने के लिए सीटी बजाते रहते है पर लोग भी उस गार्ड को चकमा दे कर पानी मे जाते रहते है।उन्हें लगता है की अभी तो पानी इतना कम है या अभी तो पानी बस क़मर तक ही है वगैरा -वगैरा।पर कई बार तो अच्छे तैराक भी डूब जाते है। रोज ही पेपर मे चार-छे लोगों (पर्यटकों) के डूबने की खबर निकलती है।


अक्सर कॉलेज के छात्र या किसी संस्थान से जो लोग ग्रुप मे आते है उनमे समुन्द्र मे नहाने और दूर तक जाने का ज्यादा ही जोश होता है।कई बार तो ऐसे लोग या छात्र -छात्राएं रात मे भी बीच पर नहाते है जो कि उनकी जिंदगी के लिए बहुत ही खतरनाक हो सकता है।पर कोई उन्हें रोक नही पाता है क्यूंकि अगर कोई रोकना चाहे तो भी वो नही रुकते है। अभी पिछले हफ्ते ही दिल्ली के एक छात्र की गोवा मे समुद्र मे डूबने से मृत्यु हुई है।


हमारा यहां लिखने का ये मतलब नही है कि अगर कोई गोवा जाये तो बीच पर ना नहाये। जरूर नहाइये और ख़ूब नहाइये पर थोड़ी सावधानी से । क्यूंकि वो कहते है ना सावधानी हटी और दुर्घटना घटीं




Sunday, August 5, 2007

आज ही सुबह जब हम अनुगूंज के लिए अपनी पोस्ट लीजिये हम भी हाजिर है लिख रहे थे तभी फ़ोन की घंटी की घन घना कर बजी।फ़ोन उठाया तो हमारी दोस्त मिसेज दास ने बड़ी ही गर्मजोशी से हैप्पी फ्रेंडशिप डे की शुभकामनायें दी ।अभी फ़ोन रख कर फिर लिखना शुरू ही कर रहे थे कि शीला जी का फ़ोन आ गया और उनसे भी ख़ूब बातें हुई (और इसी चक्कर मे पोस्ट आधे शीर्षक के साथ ही पोस्ट हो गयी।) तो बहुत सारी पुरानी बातें याद आ गयी । वे बातें जब हम दिल्ली मे काम करते थे । और जिस ऑफिस मे हम काम करते थे वहीं मिसेज दास और शीला जी हमसे कई साल पहले से काम कर रही थी। और उन दोनो मे दोस्ती भी बहुत अच्छी थी। यहां हम एक बात और बता दे हमारी मिसेज दास और शीला जी दोनो यूं तो हमसे उम्र मे बड़ी है पर हम तीनो के बीच उम्र कभी भी आड़े नही आयी। वो कहते है ना की दोस्ती मे उम्र नही दिल देखे जाते है


शुरू मे थोडा समय लगा हम तीनो को एक-दूसरे को समझने मे पर जब दोस्ती हो गयी तब तो हम तीनो अपने ऑफिस मे गंगा (मिसेज दास)यमुना(शीला जी)और सरस्वती (हम)के नाम से मशहूर हो गए थे।चलिये आपको इन नामों का राज भी बता देते है वो क्या है ना कि हम तीनो ही फ्री लान्सर के तौर पर काम करते थे। मिसेस दास चूंकि सबसे ज्यादा समय तक ऑफिस मे रहती थी इसलिये उन्हें गंगा कहते थे। तो शीला जी मिसेस दास से थोडा कम समय तक रहती थी इसलिये उन्हें यमुना कहते थे। और हम तो बस तीन-चार घंटे के लिए ही जाते थे और दो बजे के बाद हम लुप्त जो हो जाते थे । इसलिये हमे सरस्वती कहते थे। और चूंकि हम इलाहाबाद के है तो जब हम तीनो एक साथ होते तो संगम कहलाते थे। जब भी हम मे से कोई गायब होता तो हमारे नाम की बजाय ये पूछा जाता कि आज संगम पूरा क्यों नही है।


हम तीनों का तो ऑफिस मे ये हाल था कि अगर किसी एक को काम हो तो तीनो ही जाते थे भले ही ऑफिस वाले कुछ भी कहे पर हम लोगों कि सेहत पर बिल्कुल भी असर नही होता था। किसी का जन्मदिन हो या शादी की सालगिरह या कुछ भी बस हम तीनो को घूमने का बहाना चाहिऐ होता था और बस हम तीन ऑफिस से गायब।पिक्चर देखना ,लंच खाना और फूल,कार्ड,तोहफा देना । अभी सेलेब्रेशन खत्म भी नही होता था की अगले की तैयारी होने लगती थी । सरोजिनी और लाजपत नगर मे शॉपिंग करना हो या चाहे शौपेर्स स्टॉप जाना हो , तिकडी हमेशा तैयार

हम लोगों की दोस्ती सिर्फ घूमने,खाने की ही नही थी बल्कि हम एक-दूसरे के सुख-दुःख के भागी भी थे । और अगर हम लोगों मे से किसी को कोई भी परेशानी होती थी तो आपस मे बात कर के उसका हल निकालने की कोशिश करते थे। हम तीनो ही नही अपितु हमारे परिवार भी बहुत अच्छे दोस्त बन गए है।क्या बच्चे क्या मायका क्या ससुराल सभी हम तीनो की दोस्ती के बारे मे जानते है। यूँ तो आजकल हम दूर है पर फिर भी हम तीनो की दोस्ती मे कोई फर्क नही आया है। और भगवान से दुआ करते है कि हमारी दोस्ती ऐसे ही बनी रहे।




अगर हिंदुस्तान अमेरिका हो जाये तो क्या होगा
वही होगा जो मंजूर खुदा होगा


हम तो लिखने की थे सोच रहे
पर शब्द नही थे मिल रहे
क्यूंकि अगर हिंदुस्तान अमेरिका होगा
तब तो निश्चित ही बंटाधार होगा।

हर रोज देखते थे
कोई ना कोई लिख रहा है
फिर भला हम क्यूँ ना लिखे
इसी उधेड़बुन मे निकल
गए ये चार दिन फिर सोचा कि
जब ओखली मे सिर दिया
तो मूसल से क्या डरना
तो आज हमने भी है
लिखने की ठानी


अब रही बात पांच बातों की
तो चलिये इसी बहाने हम भी
कह देते है अपने मन की
कि अगर हिंदुस्तान अमेरिका बन जाये
तो कैसा होगा।

पहला हर तरफ ऊँची-ऊँची इमारतें होंगी

दूसरा तब शायद कोई गरीब नही होगा

तीसरा कपड़ों का खर्चा कम हो जाएगा

चौथा रिश्तों का मशीनीकरण होगा

पांचवां ब्लॉगिंग का अस्तित्त्व बना रहेगा

तो कहिये कैसा लगा हमारा
अमरीकी भारत

Thursday, August 2, 2007

आखिर कार दिल्ली वालों को उमस भरी गरमी से छुटकारा मिल ही गया। कल दोपहर से दिल्ली मे जो काले बादल छाए तो इस बार बरस भी गए वरना इससे पहले तो दिल्ली का हाल बिल्कुल लगान फिल्म के जैसा ही हो गया था बस बादल आते थे और बिना बरसे ही चले जाते थे। और लोग बस बादल को देखते ही रह जाते। हाँ इक्का दुक्का बार बारिश हुई भी है।

अब दिल्ली क्या पूरे देश की ही ऐसी हालत है कि बारिश हो तो मुसीबत और ना हो तो भी मुसीबत। जब तक बारिश नही होती है हर एक की जुबान पर बारिश बारिश रहता है और लोगों को ये कहते सुना जा सकता है उफ़ कितनी गरमी है पता नही कब बरसात शुरू होगी वगैरा-वगैरा. और जरा बारिश हुई नही कि हरेक की जुबान पर सरकार और प्रशासन का नाम शुरू हो जाता है। कोई भी प्रदेश हो चाहे महाराष्ट्र हो या चाहे उत्तर प्रदेश या बिहार हो या राजस्थान या गुजरात ही क्यों ना हो हर जगह बारिश होते ही पानी-पानी ही सुनाई पड़ने लगता है।


बारिश के साथ बाढ़ का बिल्कुल चोली-दामन का साथ है। और ये साथ आज से नही हमेशा से रहा है। हमे याद है जब हम लोग इलाहाबाद मे रहते थे तो हर दूसरे साल बारिश के बाद बाढ़ आ जाती थी और पूरा दारागंज,बघाडा, मुम्फोर्ड गंज और अल्लाह्पुर तो हमेशा ही डूब जाते थे। अल्लाह्पुर का तो इतना बुरा हाल होता था कि ना केवल सड़कों पर ही पानी भरता था बल्कि लोगों के घरों मे भी पानी भर जाता था और हमेशा इन सभी जगहों पर मदद पहुंचाने के लिए नाव चलानी पड़ती थी। यातायात जैसे रेलगाडी और सड़क यातायात पर असर पड़ता था। हवाई जहाज पर भी असर पड़ता रहा होगा पर तब चूंकि ज्यादातर लोग रेल या सड़क से चलते थे तो इन बातों का ज्यादा पता चलता था। इलाहाबाद मे तो गंगा और यमुना दोनो मे ही बाढ़ आ जाती थी और तब तो रडियो का जमाना था जिस पर न्यूज़ आती रहती थी दोनो नदियों का जलस्तर बढ रहा है।और पानी ख़तरे के निशान से ऊपर बह रहा है। कई बार माइक पर भी बोला जाता था की पानी बढ रहा और बाढ़ की हालत मे लोग घरों को छोड़ कर किसी उंचे स्थान पर चले जाये। बाढ़ आयी नही कि दारागंज के पुल पर लोग शाम को घूमने के लिए निकल पड़ते थे मानो वो भी कोई पिकनिक स्पॉट हो । तब भी प्रशासन की तरफ से और रेड क्रॉस की तरफ से कैंप लगाए जाते थे। लोगों को खाना ,कपड़ा दवाइयाँ वगैरा पहुंचाया जाता था। पर तब भी लोग प्रशासन को कहते थे। पर आज की तरह कोसते नही थे।


और जहाँ तक दिल्ली की बात है तो दिल्ली का बारिश मे बेहाल होना भी कोई नयी बात नही है। ये तो सिर्फ कहने की बात है की अब बारिश ज्यादा होने से दिल्ली मे पानी भर जाता है। दिल्ली का मिंटो ब्रिज ,सीरी फोर्ट रोड़, और जितने फ्लाई ओवर है ये सभी तथा और भी कई जगहें जहाँ जरा इंद्र देवता ने जरा जोर की बारिश की नही की बस दिल्ली डूबी। और इस भरी हुई दिल्ली से बचने का कोई उपाय नही है। ना तो पहले था और ना ही आज है।



खुदा-ना खस्ता जो अगर कहीँ दिल्ली मे अंडमान या किसी भी कोस्ताल एरिया के जहाँ लगातार हफ़्तों सिर्फ और सिर्फ धुँआधार बारिश ही होती रहती है।अगर वहां के जैसी बारिश एक महीने भी दिल्ली मे हो जाये तो दिल्ली का कोई भी कोना बिना पानी के दिखना मुश्किल हो जाएगाहम जानते है आप सोच रहे है कि अंडमान या किसी अन्य कोस्ताल एरिया की दिल्ली से तुलना करना ठीक नही है पर हम सिर्फ इतना ही कहना चाहते है कि बारिश से जन-जीवन पहले भी प्रभावित होता था और अब भी सारा जन-जीवन प्रभावित होता है. पर अब जितनी हाय-तौबा होने लगी है उससे स्थिति मे ना तो कभी कुछ ज्यादा फर्क पड़ा है और नाही ही कभी कुछ फर्क पड़ेगा



Wednesday, August 1, 2007

अब अस्सी का दशक तो है नही कि हर किसी को न्यूज़ के लिए सिर्फ दूरदर्शन का ही सहारा हो। जब इतने सारे न्यूज़ चैनल हो जिसमे देसी और विदेशी चैनल हो तो भला न्यूज़ की कमी क्यों होगी। हर चैनल बिल्कुल ही एक्सक्लूसिव न्यूज़ दिखाता है। और अगर देश मे कोई बड़ी घटना हो जाये तो जाहिर सी बात है कि उस घटना को सारे न्यूज़ चैनल दिखायेंगे । यहां तक तो ठीक पर फिर हर न्यूज़ चैनल ये कहता नजर आने लगता है कि ये खबर सबसे पहले उसी का चैनल दिखा रहा है।

आजकल न्यूज़ मे एक नया ट्रेंड शुरू हुआ है कि अगर किसी को किसी की वो चाहे आदमी हो या औरत पिटाई करनी होती है तो वो पूरे दल बल मतलब मीडिया वालों को साथ लेकर पहुँचते है।और मीडिया का भी ये हल है की हर जगह चली जाती है। मीडिया का काम सच को सच की तरह दिखाने का होना चाहिऐ ना की सच को तोड़-मरोड़ कर दिखाना।

शायद आप लोगों को याद हो कुछ दिन पहले इन्दौर मे लोगों ने एक चोर को पकडा था और उसे पेड़ से बांधकर पीटा जा रहा था। ठीक है चोर है तो पिटाई तो होगी ही पर जिस तरह कैमरा के सामने आते ही लोग लात-घूँसे चलाने लगते थे वो क्या सही है।

ऐसे ही एक बार एक औरत की पिटाई भी दिखाई थी जिसमे पिटने वाली भी औरत और पीटने वाली भी औरत। और ये सब कुछ बाकायदा मीडिया और पुलिस के सामने हो रहा था। ये बिल्कुल ही नया और अनोखा तरीका हो गया है।


आज एक न्यूज़ आ रही थी किसी कॉलेज के प्रोफेसर की लोग बडे प्यार से धुनाई कर रहे थे। और जैसे ही कैमरा उनकी तरफ घूमता तो कोई उसके मुँह पर चांटा मारता तो कोई चप्पल मारने के लिए उठाता था। ऐसे ही एक बार छात्रों द्वारा पिटाई किये जाने पर एक प्रोफेसर की मृत्यु भी हो चुकी है

इस तरह से कैमरे के सामने पिटाई करने मे लोग अपनी शान समझते है। कॉलेज मे छात्रों को तोड़-फोड़ करते हुए और मारपीट करते हुए दिखाते हुए ये सारे चैनल वाले हमे बीच-बीच मे याद दिलाते रहते है कि हम कौन सा न्यूज़ चैनल देख रहे है। ऐसा नही है कि पहले छात्र लोग दंगा या मार-पीट नही करते थे पर उसे इतने भयानक अंदाज मे पेश करना कहॉ कि इंसानियत है।इसे इंसानियत कहना भी शायद गलत होगा।


अरे भाई गलती की सजा तो मिलनी ही चाहिऐ।पर हर चीज को मीडिया का सहारा लेकर दिखाना कितना सही है। आख़िर दूरदर्शन भी तो देश-विदेश की खबरें दिखाता है पर कभी भी उनके चैनल पर इस तरह की पिटाई या कुछ और वीभत्स सा देखने को नही मिलता है।