Thursday, May 20, 2010

हमारे देश के सांसद और विधायक ऐसे है जो देश और जनता के लिए दावा तो कुछ भी करने का करते है पर उनकी जेब से कुछ जाए ये उन्हें मंजूर नहीं है। अरे आप को यकीन नहीं है पर ऐसा ही है। कल मंत्री मंडल की बैठक मे ये निर्णय लिया गया कि अब से सांसदों और विधायकों को टोल टैक्स नहीं देना पड़ेगा ।

अरे पर आखिर ऐसा फैसला लिया क्यूँ गया ?

क्या आम जनता के पास इफरात धन-दौलत है और ये सांसद और विधायक टोल टैक्स देना भी afford नहीं कर
सकते है। जबकि किसी भी राज्य या शहर मे देखे तो गाड़ियों पर अपनी पार्टी के झंडे लगाए ये फर्राटे से घूमते नजर आते है। जहाँ से भी जनता को लूटने का मौका मिल भर जाए ,बस

जहाँ नेताओं को अपने लिए कुछ भी फैसला लेना होता तो फटाफट सर्व सम्मति से निर्णय ले लिए जाता है।

पर सवाल ये है कि अगर ये सांसद और विधायक टोल टैक्स नहीं देंगे तो फिर आम जनता क्यूँ दे। क्या सारे तरह के टैक्स देने का जिम्मा सिर्फ आम जनता का ही है।

ऐसा भला ये देश के लिए क्या कर रहे है जो इन्हें टोल टैक्स ना देने की छूट दे दी गयी है।

Wednesday, May 19, 2010

आम तौर पर हम गौहाटी सिर्फ फ्लाईट से आने-जाने के लिए ही जाते है पर वहां रुकते नहीं थे। पर मई के शुरू मे हम ३-४ दिन के लिए गौहाटी गए थे तो जाहिर है कि जब ४ दिन रुकेंगे तो गौहाटी घूमेंगे भी। :) जब गेस्ट हाउस वाले से पूछा कि यहां क्या-क्या घूमने की जगह है तो एक सपाट सा उत्तर मिला कि कामख्या के अलावा तो ज्यादा कुछ नहीं है। मार्केट के बारे मे पूछने पर कहा कि बाजार बहुत दूर है । वो तो बाद मे पता चला कि बाजार सिर्फ १०-१२ कि.मी . दूर था जिसे वो लोग बहुत दूर कह रहे थे।
खैर हम लोग के साथ जो सज्जन गए थे उनसे हम लोगों ने एक टूरिस्ट गाइड मंगवाई और गाईड देख कर पता चला कि जैसा लोग कहते है कि यहां कुछ घूमने के लिए नहीं है वो गलत है। सो हम लोगों ने गौहाटी के मंदिरों के साथ-साथ गौहाटी का स्टेट म्यूजीयम ,आसाम ज़ू ,गौहाटी के मार्केट देखने का कार्यक्रम बनाया ।और गाईड मे एक तरफ पड़ने वाली जगहों को देखने का पूरे दिन का प्रोग्राम बना। तो सबसे पहले नबोग्रोह मंदिर देखने का निश्चित हुआ और अगले दिन सुबह-सुबह हम लोग नबोग्रोह मंदिर के लिए चल पड़े। (नबोग्रोह लिखने का ख़ास मकसद है क्यूंकि जब गेस्ट हाउस वाले से हमने नवग्रह मंदिर कहाँ है पूछा था तो उसने सुधारते हुए कहा था नबोग्रोह मंदिररास्ते मे भी जहाँ कहीं भी मंदिर का पता पूछना होता था तो नबोग्रोह कहने पर ही लोग समझते थे नवग्रह कहने पर नहीं )
नबोग्रोह मंदिर गौहाटी के पूर्व मे नवग्रह पहाड़ी पर स्थित है।और ये तकरीबन १०-१२ कि.मी.की दूरी पर है।१७५१ मे इस मंदिर की स्थापना हुई थी । यहां जाने के लिए गौहाटी हाई कोर्ट के पास से सिल्पुखारी मार्केट से होते हुए जाते है।सिल्पुखारी मार्केट मे थोडा आगे जाकर पहले बायीं ओर मुड़ते है और फिर थोड़ी दूर चलने पर दाहिनी ओर एक गेट सा बना है वहां से जैसे ही मंदिर कि ओर जाने के लिए मुड़ते है तो वहां से ढ़ाई शुरू हो जाती है।ये मंदिर भी काफी ऊंचाई पर है , वैसे गाडी यहां मंदिर तक जाती है
जैसा कि इसके नाम से पता चल रहा है कि इस नबोग्रोह मंदिर मे ९ ग्रह बने है। और ये ९ गृह है -- सूर्य,चन्द्रमा,मंगल,बुद्ध,गुरु,शुक्र,शनि,राहू और केतु है। इन ९ ग्रहों के बीचों बीच शिवलिंग बना है और हर ग्रह को दर्शाने के लिए ग्रह के रंग मुताबिक कपडा शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ है। पुराने समय मे इस मंदिर को ज्योतिष और अंतरिक्ष के अध्धयन के लिए महत्त्वपूर्ण माना गया था। इस नबोग्रोह मंदिर के कारण पहले गौहाटी को प्राग्ज्योतिश्पुरा या city of eastren astrology भी कहा जाता था ।

मंदिर के पास जैसे ही पहुंचे तो चारों ओर बहुत सारे बन्दर दिखाई दिए जो इधर-उधर कूद-फांद कर रहे थे।गनीमत थी कि वो लोगों को ज्यादा तंग नहीं कर रहे थे । खैर सीढियां चढ़कर जब मंदिर मे पहुंचे तो मुख्य मंदिर के द्वार पर दाहिनी ओर विष्णु-लक्ष्मी,राधा-कृष्ण और गणेश जी के साथ-साथ अन्य देवी देवताओं की मूर्ति भी थी। जहाँ हमने भगवान को हाथ जोड़ा और फिर मुख्य मंदिर की तरफ बढे तो अन्दर हुत अँधेरा था पर हर तरफ दिए जल रहे थे।अन्दर अँधेरा बहुत होने के कारण बहुत संभल-संभल कर चलना पड़ता है। फिर जब बहुत ध्यान से देखा तो एक ग्रह बीच मे और बाकी ८ ग्रह उसके चारों ओर बने हुए दिखे थे। हर ग्रह के बीच मे इतनी दूरी थी कि लोग आराम से बैठकर पूजा कर सकते है ।मंदिर के बाहर बहुत सारे पंडित रहते है पूजा करवाने के लिए। मंदिर मे हर ग्रह पर पूजा करते है और दिए जलाते है। यहां पर प्रसाद चढाने का सिस्टम नहीं है । पूजा करने के बाद बाहर आने
पर पंडित जी चना-हरी साबुत मूंग,नारियल के टुकड़े और फल वगैरा प्रसाद के रूप मे देते है।

बाहर निकल कर मंदिर की परिक्रमा करने पर देखा कि मंदिर की बाहरी दीवारों पर विष्णु के दस अवतार बने हुए है। और मंदिर मे बकरी और बन्दर एक साथ ही दाने खाते हुए भी नजर आये थे । :)

चूँकि मंदिर बहुत उंचाई पर है इसलिए यहां से भी गौहाटी का बहुत अच्छा नजारा दिखाई देता है।यहां से शहर और ब्रहमपुत्र नदी तो दिखाई देती ही है साथ ही गौहाटी स्टेडींयम जिसे नेहरु स्टेडीयम भी कहते है वो भी दिखाई देता है।

और इस नज़ारे को ना केवल भक्त गन बल्कि यहां के पंडित भी इस खूबसूरत नज़ारे का आनंद लेते रहते है। :)
अगली पोस्ट में गौहाटी की एक और जगह:)




Saturday, May 15, 2010

कितने अफ़सोस की बात है कि हर कुछ दिन पर एक हंगामा होना ब्लॉग जगत का एक नियम सा बन गया है हर बार हंगामा पिछले हंगामे से ज्यादा बड़ा होता हैकभी महिला ब्लॉगर तो कभी उनके द्वारा लिखे गए लेखों को लेकर हंगामा हो जाता है और कल तो हद ही हो गयी कल हमने कई दिन बाद जब ब्लॉग वाणी खोला तो हम कुछ चकरा से गए क्यूंकि कई पोस्टें समीर जी,ज्ञान जी और अनूप जी के नाम के साथ लिखी दिखी और उन्हें पढ़कर अफ़सोस तो हुआ साथ ही बहुत दुःख भी हुआकि आखिर हम लोग किस तरह कि ब्लॉगिंग कर रहे है जिसमे एक-दूसरे पर कीचड उछालना क्या सही है

जब हमने २००७ मे ब्लॉगिंग शुरू की थी तब आज की तुलना मे ब्लोगर जरुर बहुत कम थे (शायद ५००-६०० ) पर इस तरह का रवैया कभी एक-दूसरे के लिए नहीं देखा थाहाँ छोटी-मोटी नोक-झोक होती रहती थी जो ब्लॉगिंग और ब्लॉगर दोनों के लिए जरुरी और अच्छी होती थीपर अब इस नोक-झोक का स्वरुप बदलता ही जा रहा हैएक दम सीधे एक-दूसरे के लेखन पर, एक-दूसरे के व्यक्तित्व पर आक्षेप करना क्या हम ब्लॉगर को शोभा देता है

हम ये तो नहीं जानते कि इस सबके पीछे असली वजह क्या है और जानना भी नहीं चाहेंगे पर इतना जरुर कहेंगे कि समीर जी ,अनूप जी और ज्ञान जी तीनों की ही अपनी लेखन शैली है और अपना अलग अंदाज है लिखने का और जिसे हम सभी ब्लॉगर पसंद करते है और बड़े चाव से पढ़ते भी हैऔर इन लोगों की एक-दूसरे से तुलना करना ठीक नहीं है

इस तरह के विवाद से ब्लॉगिंग और ब्लॉगर दोनों का ही नुक्सान होता है

हम लोगों का इतने बड़े होकर (उम्र के लिहाज से )इस तरह आपस मे झगड़ना ,मन मुटाव करना क्या सही है ?

आम तौर पर हम कभी किसी विवाद पर नहीं लिखते है पर कल मन बहुत आहत हुआ इसलिए ये पोस्ट लिख दी:(

Wednesday, May 5, 2010

फरवरी मे हम कुछ दिनों के लिए इलाहाबाद गए थे और वहां से हमने लखनऊ अपनी दीदी के यहां जाने का कार्यक्रम बनाया था। अब इलाहाबाद से लखनऊ जाने के लिए गंगा गोमती ट्रेन ठीक होती है।हालाँकि इस ट्रेन को पकड़ने मे सुबह पूरी बर्बाद हो जाती है। क्यूंकि ६ बजे की ट्रेन के लिए ५ बजे ही उठाना जो पड़ता है। :) और इसमें एक और प्रोब्लम है कि ये ट्रेन प्रयाग स्टेशन पर बस २ मिनट रूकती है जबकि ज्यादा जनता प्रयाग से ही इस ट्रेन मे चढ़ती है
तो हम लोगों ने ए.सी.चेयर कार का टिकट बुक किया। और ट्रेन के समय स्टेशन पर पहुँच गए और इंतज़ार करने लगे।उस दिन अपनी किस्मत ही खराब थी अचानक ही ट्रेन आने से चंद मिनट पहले खूब आंधी और बारिश शुरू हो गयी और जब ट्रेन आई तो पता चला कि ए.सी. वाला कोच एकदम पीछे है। जबकि कुली ने कहा था कि ए.सी.कोच जहाँ हम लोग खड़े थे , वहीँ आता है।
खैर जब तक हम लोग कोच तक पहुंचे तो ट्रेन ने धीरे-धीरे चलना शुरू कर दिया था । एक तो बारिश ऊपर से चलती हुई ट्रेन और कुली उसी चलती ट्रेन मे सामान चढाने लगा और जो हम लोगों को बैठाने गया था वो बोला दीदी आप लोग चढ़ जाइए । तो हम लोगों ने कहा कि सामान मत चढाओ ट्रेन जाने दो। हम लोग इस तरह चलती ट्रेन मे नहीं चढ़ेंगे। पर उस ट्रेन मे यात्रा करना लिखा था सो ट्रेन १ मिनट बाद ही रुक गयी और फिर हम लोग ट्रेन मे सवार हो गए।
और जब थोड़ी देर बाद हम अपनी सीट पर settle हुए तो हमारा ध्यान अपनी कुर्सी के सामने बनी मेज की तरफ गया और उसकी हालत देख कर अफ़सोस भी हुआ कि किस तरह से उस फोल्डिंग मेज को एक लोहे की क्लिप से बंद किया हुआ था। यही नहीं बाथ रूम मे वाश बेसिन मे पानी तो था नहीं उस पर नल भी ठीक नहीं था।(साबुन तो कभी होता नहीं है )

जहाँ रोज ही रेलवे मिनिस्ट्री एक नई ट्रेन चलती है वहां ट्रेन की ऐसी हालत देख कर गुस्सा और दुःख हुआ । जब हम बाथरूम की ये वाली फोटो खींच रहे थे तो वहां खड़े कुछ लोग हमें आश्चर्य से देख रहे थे कि भला इसकी फोटो खींचने का क्या फायदा :)