Thursday, May 31, 2007

आजकल हम इलाहाबाद आये हुए है अपने मायके पापा के पास।और हां आप लोग बिल्कुल भी confuse मत होइये कि हम इलाहाबाद कैसे पहुंच गए दिल्ली से एक हफ्ते के लिए हम यहाँ पापा और भैया के पास आये हुए है और ये पोस्ट हम इलाहाबाद से ही लिख रहे है

हमारे पापा भी हमारी तरह ही बहुत ज्यादा कंप्यूटर सेवी नही है इसलिये उन्होने हमारे ब्लोग को पढा ही नही था तो कल सुबह हमने उन्हें अपना ब्लोग पढ़ाया और उन्हें पढ़कर अच्छा भी लगा और ये जो टाइटिल आप ने ऊपर पढा है वो उन्ही का दिया हुआ है।

तो अब इस के पीछे की कहानी भी बता देते है। दरअसल हम जब स्कूल मे पढ़ते थे तो हम पढने के सिवा हर काम करते थे वो चाहे बाटिक पेंटिंग सीखना हो या चाहे badminton खेलना हो या कुछ और कहने का मतलब पढाई से तो कोसों दूर रहते थे जिसकी वजह से सभी को लगता था कि अबकी तो ममता गयी पर हम पर हर बार भगवान् कुछ कृपा कर देते थे और हम पास भी हो जाते थे। और जब हम दसवी मे थे उस समय हमारे सिवा घर मे सभी को टेंशन था की हम पास होंगे या नही और सबसे बड़ी गड़बड़ ये थी की उन्ही दिनों हमारे मामाजी के बेटे की शादी पड़ी थी और सारे रिश्तेदार भी इलाहाबाद आये हुए थे और तभी सुबह के अखबार मे टेंथ का रिजल्ट भी निकल गया अब हर कोई हमारा रोल नम्बर मांगने लगा की लाओ तुम्हारा रिजल्ट देखे ,तब हमे भी डर लगने लगा था कि अगर लुढ़के तब तो बड़ी बदनामी होगी क्यूंकि हमारे घर मे कोई कभी फेल नही हुआ था और जब हमारा रोल नम्बर देखा जा रहा था तो पापा उठकर घर के बाहर वाले बरामदे मे चले गए क्यूंकि उन्हें डर था कि कहीं हम लुढ़क ही ना जाये पर हर बार की तरह इस बार भी भगवान् ने हम पर अपनी कृपा की और हम पास भी हो गए। फ़टाफ़ट बाहर जाकर हमने पापा और मम्मी के पाँव छुए और फिर सिविल लाइंस वाले हनुमान जी के दर्शन करने पहुंच गए । भाई भगवान् का शुक्रिया अदा करना तो बहुत ही जरुरी था।


पर हमारा ये ना पढने वाला सिलसिला बदस्तूर जारी रहा । दरअसल मे उस ज़माने मे लोग बहुत ज्यादा कैरियर के लिए सजग नही थे और खासकर के लडकियां ,और एम ए करते-करते तो हमारी शादी ही हो गयी थी। पर बाद मे भी कभी बहुत कुछ करने की इच्छा नही होती थी ,वो तो बहुत साल बाद हमने दिल्ली मे काम करना शुरू किया था।


और इतने साल बाद जो अब हमने ब्लॉग लिखना शुरू किया तो हमारे पापा को ब्लॉग पढ़कर ये ख़ुशी हुई की जो सबसे फिसड्डी थी वो अब कुछ लिखने लगी है। फिसड्डी इसलिये क्यूंकि बाक़ी सारे भाई-बहन पढने मे बहुत अच्छे थे। हमने आप लोगों के द्वारा भेजे गए कमेंट्स भी पापा को पढाये जिसे पढ़कर उन्हें और भी अच्छा लगा और उन्हें ये जानकार ख़ुशी हुई हम अब इस ब्लॉगर परिवार का हिस्सा बन गए है।

Saturday, May 26, 2007

ये कोई पिक्चर का टाइटिल नही है और ना ही अमिताभ बच्चन की पिक्चर से लिया गया है ,ये तो कल रात आज तक न्यूज़ चैनल पर एक खबर दिखाई गयी थी जो उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले की थी जिसमे दो दस और बारह साल के बच्चों के पेट पर मैं चोर हूँ लिखा गया और उनके कपडे उतार कर सड़कों पर घुमाया जा रहा थापर उन बच्चों को किसी ने भी बचाने की कोशिश नही कीहां कुछ लोग और शायद रिपोर्टर्स उन बच्चों की फोटो खीचते हुए दिख रहे थे पर क्या सिर्फ फोटो खींच कर अखबार या टी.वी.पर दिखाना ही उनका मकसद होता है?

क्या वो लोग उन बच्चों को इस तरह घुमाये जाने से रोक नही सकते थे?


कोई बी.एस.पी.के कोर्पोरेटर को दिखाया गया था ताम्बे के तार चोरी करने की ये सजा उन दो बच्चों को दी गयी थीजैसा की न्यूज़ मे दिखाया गया की पहले उन बच्चों को करंट लगाया गया और फिर उनके कपडे उतार कर उनके पेट पर मैं चोर हूँ ये लिख दिया गया और फिर उतनी तपती धूप मे उन्हें सड़कों पर घुमाया जा रहा थापर मजाल है की कोई उन्हें बचा लेताहां भीड़ ये तमाशा जरुर देख रही थी

वैसे उस कोर्पोरेटर को पुलिस ने गिरफ्तार तो कर लिया है पर वो तो यही कह रहे है की उस समय वो वहां मौजूद ही नही थेपर क्या उन्हें इसकी सजा मिलेगी
आज हम एक तरफ तो बच्चों को देश का भविष्य कहते है और दूसरी तरफ मासूम बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार करते है

अगर बच्चों ने चोरी की है तो उसकी सजा उन्हें जरुर मिलनी चाहिऐ पर क्या इस तरह ?

ये टेस्टिंग पोस्ट है।

Friday, May 25, 2007




जैसा की सभी जानते है की गोवा एक बहुत ही अच्छी जगह है और वहां हमेशा कुछ ना कुछ होता ही रहता है। ऐसा नही है की बाक़ी जगहों पर कुछ नही होता पर जैसे जब हम दिल्ली मे थे तो दूरी की वजह से कई बार हम लोग
इवेंट देखने नही जा पाते थे पर गोवा चुंकि छोटी जगह है और दूरियां ज्यादा नही है इसलिये आसानी होती है कहीं भी आने-जाने मे। अब दिल्ली मे भी विंटेज कार रैली होती थी पर हर बार जाना संभव नही होता था। शायद एक बार देखा है । रैली की शुरुआत मे पुलिस बैंड

हमारे लिए तो ये पहला अनुभव था किसी भी कार रैली को देखने का । इससे पहले तो सिर्फ टी.वी.मे ही कार रैली देखी थी। पर सामने देखने का रोमांच ही कुछ और होता है। वैसे ये कार रैली november २००६ मे हुई थी जहाँ पर भारत के हर प्रांत के
लोग इस कार रैली मे हिस्सा लेने आये थे।इस रैली का फ्लैग ऑफ़ गोवा के मुख्य सचिव किया था और इसमे करीब ४०-५० गाडियां जैसे मारुति एस्टीम,मारुति जिप्सी, फोर्ड फिएस्ता ,मित्सुबुशी लान्सर आदि गाडियां थी। सभी गाड़ियों अलग-अलग रंगों मे थी कोई एम.आर.एफ.के लाल रंग मे तो कोई जे.के.टायर के पीले रंग मे.तो कोई चेत्तिनाद के नीले रंग मे थी
रैली की शुरुआत नारियल फोड़ कर की गयी थी। रोहित उर्स prayer करते हुए



वैसे तो इसमे ज्यादातर आदमी ही हिस्सा ले रहे थे पर कुछ महिलाएं भी थी । जब गाडियां फ्लैग ऑफ़ के बाद ज़ूम-ज़ूम की आवाज के साथ निकलती थी तो मजा आ जाता था। चुंकि ये हमारा पहला अनुभव था और हम रैली मे भाग लेने वालों के नाम नही जानते है पर फोटो मे कुछ नामों को खीचने की कोशिश की है शायद आप लोग किसी को जानते हो।


और हां इस फोटो मे जो लडकी है वो स्पोर्ट्स चैनल की रिपोर्टर है नाम हमे मालूम नही है करनदीप से बात कर रही है







इस रैली मे मित्सुबिशी lancer के चालक नरेन कुमार विजेता हुए थे

ये फोटो मेरे बेटे ने खीची है

Thursday, May 24, 2007

अपडेट : हम माफ़ी चाहते है कि हमने पोस्ट लिखते हुए year नही लिखा थादर असल हम अंडमान मे २००३ से २००६ तक रहे थे


अंडमान मे रहते हुए भी हमे वही समस्या आयी की जब पतिदेव और बेटा स्कूल चले जाते थे तो हम क्या करें। और इसी लिए हमने वहां पता करना शुरू किया की हम किस तरह का जॉब ले सकते है क्यूंकि हम पार्ट टाइम् जॉब करना ही पसंद करते है। अब चाहे इसे हमारा आलसी पन कहिये या चाहे कुछ और। १५ अगस्त २००३ को वहां पर शाम को एल.जी अपने घर पर सबको चाय पर बुलाते है वही पर हमारी मुलाकात एक महिला से हुई जो की सोशल वर्क से जुडी थी और वही उनसे बात चीत मे पता चला की डी एडिक्शन कैंप शुरू हो रहा है और हम उसे ज्वाइन कर ले। पहले तो हमने सोचा कि हम ना करें क्यूंकि शराब पीने वालों से बात करना कोई आसान काम नही है और हमे डर भी लगता था और दुसरे अंडमान इतनी छोटी जगह है कि आपको लोग कहीं भी मिल सकते है और आपके घर तक भी आ सकते है । पर फिर ये भी ख़्याल आया कि अगर हमारी मदद से किसी का घर बन सकता है तो हमे इस challange को स्वीकार करना चाहिऐ। challange इसलिये क्यूंकि इससे पहले हमने ऐसा काम किया ही नही था।

शायद आप लोगों को मालूम ना हो पर अंडमान मे शराब पीने वालों की संख्या बहुत ही ज्यादा है और इस शराब की वजह से कितने ही घर बरबाद हो जाते है। रोज घरों मे झगडे -मार पीट होना आम है। ऐसा नही है की निम्न वर्ग के लोग ही शराब पीकर शोर गुल करते है वहां तो अच्छे -अच्छे पढे -लिखे लोग भी ऐसा ही करते है। उस समय के एल .जी प्रोफ.राम कापसे थे उन्होने पुलिस और सोशल वर्क से जुडे लोगों को लेकर वहां के गोविन्द बल्लभ पंत हॉस्पिटल मे डी एडिक्शन का एक ओ.पी.डी.खुलवाया । अब चुंकि अंडमान मे किसी को पता नही था कि लोगों को शराब की इस आदत से कैसे छुटकारा दिलाया जाये तो इसलिये उन्होने पुणे के मुक्तांगन से वहां के कुछ कोउन्स्लेर्स को बुलाया जिन्होंने करीब ४० लोगों को ट्रेनिंग दी जिसमे सभी कुछ सिखाया गया कि कैसे उनसे बात करनी है कैसे उन्हें इस शराब की लत से बाहर लाना है और कैसे उन्हें वापस सामान्य जीवन जीने के लिए प्रेरित करना है।

जब इस नशा मुक्ति अभियान की खबर अखबारों मे छपी तो बहुत सारे लोग कैंप मे शामिल होने के लिए रजिस्टर करवाने आने लगे। इसमे औरतें जो अपने पति की इस लत को ,मायें अपने बेटों को और बहुत सारे आदमी जो खुद इस शराब को छोड़ना चाहते थे। कुछ लोग तो ५ साल या ८ साल की उम्र से ही शराब पी रहे थे। दर असल मे वहां पर इतनी गरीबी नही है हर आदमी के पास या तो नारियल या सुपारी के बगीचे है ज़्यादातर लोग अपने मकानों मे रहते है और कुछ कोस्तल एरिया की वजह से भी और चुंकि वहां मनोरंजन के साधन भी सीमित थे और शराब सबसे आसान तरीका माना जाता है मनोरंजन का और गम को भुलाने का भी। पिछले कुछ सालों मे तो अंडमान बहुत ही बदल गया है वरना पहले तो वहां केबल टी.वी. भी नही था।


बहुत सारे लोगों मे से १५-२० लोगों को दस दिन के कैंप के लिए बुलाया गया और उनका सुबह से शाम तक का सारा कार्यक्रम बनाया गया कि कितने बजे उन्हें उठना है, कब खाना खाना है कब exercise करना है और बात-चीत का session भी जिसमे क्लाइंट जी हां हम लोग उन्हें पेशेंट नही क्लाइंट कहते थे अपनी इस आदत और अन्य बातों के बारे मे बात करते थे , आदि-आदि । दस दिन के कैंप के बाद एल.जी.और उनकी पत्नी सभी से मिले और उन्हें उज्जवल भविष्य कि शुभकामनायें दी। और इस तरह शुरुआत हुई नशा मुक्ति आंदोलन की ।

Wednesday, May 23, 2007

वैसे रीमिक्स का चलन कई साल पहले शुरू हो गया था पर आज कल तो कोई भी गाना हो चाहे नया या पुराना हर गाने का रीमिक्स सुनने और देखने को मिल जाएगा। पुराने गानों की तो ऐसी मटियामेट करते है की समझ नही आता की ऐसे रीमिक्स गाने बनाने वालों का करना चाहिऐ। एक से एक अच्छे गानों का जो बुरा हाल करते है की बस पूछिये मत। और उस पर डान्स ऐसा की जिसका कोई जवाब ही नही। आज कल तो कोई भी गाना हो डान्स एक ही स्टाइल का होता है। कई बार m.t.v.पर भी ऐसे गाने दिखाए जाते है।


सबसे पहले पर्दा है पर्दा से शुरुआत हुई या शायद उससे भी पहले क्यूंकि गुलशन कुमार के ज़माने से ये चल रहा है शुरू मे तो फिर भी थोडा बहुत गाने की इज्जत की जाती थी पर अब तो भगवन बचाए। मिसाल के तौर पर हम कुछ गानों का जिक्र यहाँ करना चाहेंगे -

१.एक लडकी को देखा तो ऐसा लगा।
२.बदन पे सितारे लपेटे हुए।
३.हम तो मुहब्बत करेगा।

और ऐसे ही अनेकों गाने जो गायकों के गाने के अंदाज से जाने जाते थे वो आज की पीढ़ी के लिए अब ऐसे बेद्गंगे डान्स की बदौलत जाने जाते है। अरे अगर डान्स विडियो बनाना ही है तो कुछ नया तो करो। आज के ये रीमिक्स गाने वाले मेहनत तो करना ही नही चाहते ।इनके लिए ये कितना आसान है की एक पुराना गाना लिया और डूम-डाम करके अपना गाना बना लिया । इनके सारे गाने एक से हो जाते है चाहे वो रोमांटिक गाना हो या sad song हो या फिर मस्ती भरा कोई गाना हो क्यूंकि डान्स मे हमेशा ८-१० लडकियां एक ही तरह के डान्स स्टेप करती दिखती है।



एक लडकी ...वाला गाना इतने सुन्दर तरीके से फिल्म मे दिखाया गया है और इस रीमिक्स विडियो मे एक लडकी की जगह १० लडकियां दिखा कर गा रहे है एक लडकी को देखा ...ये पता ही नही चलता है कि किस लडकी के लिए गा रहे है।


अब ऐसे रीमिक्स गायकों का क्या किया जाये?

Tuesday, May 22, 2007

आज पूरे तीन महीने हो गए है हमे ब्लोगिंग करते हुए ,हो सकता है आप लोगों को लगे कि भाई ये भी कोई इतनी बड़ी बात है की इस पर एक पोस्ट ही लिख दी जाये। तो जनाब हमारे जैसे इन्सान के लिए तो ये बहुत ही बड़ी बात है क्यूंकि ब्लोगिंग करने से पहले हमे कंप्यूटर पर काम करना बिल्कुल भी पसंद नही था या यूं कह लीजिये की हम बिल्कुल भी कंप्यूटर सेवी नही थे। हमारे घर मे बेटे और पतिदेव तो हमेशा ही कंप्यूटर पर काम करते थे। बेटे तो जब देखो तो कंप्यूटर पर और कुछ पूछो तो एक ही जवाब की नेट पर है कभी download चल रहा है तो कभी कोई पिक्चर देख रहे है । और तो और हमे भी कहते मम्मी आप भी नेट किया करिये इससे आप कोई भी जानकारी ले सकती है कुछ भी पढ़ सकती है।


१० साल पहले हमने ई.ग.न.उ। मे कंप्यूटर कोर्स भी ज्वाइन किया था पर कुछ दिन जाने के बाद छोड़ दिया क्यूंकि एक तो उसमे क्लास शनिवार और रविवार होती थी और वो दिन छुट्टी का होता था इसलिये ४-५ क्लास के बाद उसे छोड़ दिया था।और दुसरे हम बहुत देर तक कंप्यूटर पर काम नही कर पाते थे क्यूंकि आंखों पर जोर सा पड़ता था ,वैसे ये मात्र एक बहाना ही था ।

फिर कुछ साल बाद बेटों और पतिदेव के बहुत कहने पर हमने मेल करना सीखा और धीरे-धीरे लोगों को मेल भेजने लगे पर ये भी ज्यादा दिन नही चला और फिर हमने सबसे फ़ोन पर ही बात करना बेहतर समझा। क्यूंकि कई बार जब हम अपने आप कंप्यूटर पर कुछ भी सर्च करने की कोशिश करते तो हर बार कुछ ना कुछ गड़बड़ हो जाती मतलब हम कोई साईट खोलना चाहते तो कोई और साईट खुल जाती और हम खीज कर ग़ुस्से मे कंप्यूटर बंद कर देते थे।और ऐसा नही है की हम अब बिल्कुल expert हो गए है ,अभी भी कभी-कभी कुछ ना कुछ गड़बड़ हो ही जाती

गोवा मे भी पतिदेव और बेटे जब देखो नेट पर लगे रहते । और कई बार हमारे बेटे हमे बताते की फलां ब्लोग पर हमने ये पढा फलां ब्लोग पर ये देखा और कई बार हमे भी पढ़ाते थे। पर हम अपनी आदत से मजबूर थोडा सा ही पढ़कर कह देते की हां पढ़ लिया है।

एक दिन पतिदेव ने बताया की उन्हें एक महीने के लिए बाहर जाना है और वो चले भी गए। और फिर हम लोगों का बाहर घूमना -फिरना कम हो गया तो फिर हम बोरे होने लगे क्यूंकि बेटे तो हमेशा कि तरह कंप्यूटर पर ही व्यस्त रहते थे । ऐसे ही एक दिन हमने बेटों से पूछा कि हम क्या करें बडे बोर हो रहे है।

तो यूं ही हमारे बडे बेटे ने कहा की आप ब्लोग लिखना क्यों नही शुरू कर देती है।
हमने कहा कि हम और ब्लोग ?
तो बेटा बोला की इसमे क्या है । आप जो भी चाहे लिख सकती है। और आप तो टी.वी. बहुत देखती है उसी पर लिखना शुरू कर दीजिए।

फिर हमारे बेटों के कहने पर ही हमने ब्लोग लिखना शुरू किया। पर हमे लगता था कि ये भी हम कुछ दिन बाद छोड़ देंगे पर इस बार हम खुद ही गलत साबित हो गए. हालांकि शुरू के दिन बडे कठिन थे हम रोज कहते थे कि हम अब नही लिखेंगे तो बेटे कहते थे कि बस आप लिखती रहिए । फिर करीब बीस- पचीस दिन बाद पहली तिप्पडी उन्मुक्त जी की आयी जिससे कुछ हौसला बढ़ा फिर कुछ दिन बाद जीतू जी ने नारद पर और प्रतीक जी ने हिंदी ब्लोग पर रजिस्टर करवाने को कहा।

और धीरे-धीरे हम भी ब्लोगिंग के इस परिवार मे शामिल हो गए। हमे कभी भी नही लगता था कि हम इतना कुछ लिख पायेंगे पर आप सभी के कमेंट्स हमे लिखने के लिए प्रोत्साहित करते है।और हम तहेदिल से आप सबका शुक्रिया अदा करते है । ब्लोगिंग की बदौलत ही हम आप सब लोगों को और आप के विचारों को जान पाए है।

हमारे घर वालों और दोस्तो सबको आश्चर्य होता है कि ममता और ब्लोगिंग ? पर अब उन्हें कौन समझाए कि भाई ये तो एक नशा है या यूं कहे कि ये वो लड्डू है जो खाये वो भी खुश जो ना खाये वो भी खुशअब तो जब तक एक पोस्ट ना लिख ले तब तक लगता है कि कुछ मिस्सिंग है। और जब कुछ कमेंट्स आ जाते है तो सोने पर सुहागा वाली बात हो जाती है।

समीर लाल जी,नाहर जी , मनीश जी, घुघुती जी ,जीतू जी , प्रतीक जी ,रत्ना जी, रंजू जी ,संजीव जी , संजीत जी , ज्ञानदत जी, अमित जी, अरुण जी ,अतुल जी,अनुराग जी,उन्मुक्त जी , तरुण जी,रवि जी,पुनीत जी,संजय जी, पंकज जी,धुरविरोधी जी,सुरेश जी ,शिरीष जी,देबाशीष जी , चंद्र्भूष्ण जी,सुनील जी,महाशक्ति जी ,प्रभाकर जी,रिंकू जी,चितरंजन जी,परमजीत जी,यूनुस जी,हरिराम जी,राजीव जी,अभय जी,आलोक जी,अनूप जी,मोहिंदर जी,शुहैब जी,सूचक जी,divine india ,बेनाम जी, विशेष जी ,आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया हमारी हौसला अफजाई का

Monday, May 21, 2007

गोवा से दिल्ली आने के बाद गरमी से काफी हद तक राहत मिल गयी है। कल तो यहाँ पर बारिश भी हुई जिससे मौसम और भी सुहाना हो गया है। और फिर दिल्ली तो दिल्ली है। यहाँ पर भी गरमी तो है पर कम से कम उमस नही है जो गोवा मे बहुत ज्यादा थी ।

इस बार दिल्ली बहुत बदली हुई लग रही है। ना तो उतना पोलुशन और ना ही बहुत ज्यादा बसों की भागम भाग।ऐसा नही है कि बसें बिल्कुल ही गायब हो गयी है पर जैसे पहले हर सेकंड पर एक बस तेजी से जाती थी और ये लगता था की अब लड़ी की तब लड़ी।एअरपोर्ट से हमारे घर आने मे इससे पहले एक घंटा लगता था और अगर कहीँ ट्राफिक जाम मिल गया तो गए काम से। पर इस बार हम सिर्फ ४५ मिनट मे ही पहुंच गए । दिल्ली मे इतने ज्यादा फ्लाई ओवर बन जाने की वजह से भी अब समय कम लगता है वरना पहले हर रेड लाइट पर ३ मिनट तक रुकना पड़ता था जिससे बहुत समय लग जाता था।


और अब अगले कुछ दिनों तक हमारा डेरा यहीं दिल्ली मे रहेगा।

Sunday, May 20, 2007

जब ८२ मे हमारी शादी हुई और हम पहली बार अपने पतिदेव के साथ नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरे थे तो हमे लेने मिस्टर ।ऎंड।मिसेस c आये थे । स्टेशन पर उन्होने हमारा बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया था । स्टेशन से हम लोग सीधे घर गए थे जहाँ उनकी तीन बहुत ही प्यारी बेटियों ने हमारा स्वागत किया। धीरे-धीरे उनके साथ हमारा बिल्कुल घर जैसा हो गया और उस अनजान शहर दिल्ली मे उन्होने हमे छोटी बहन की तरह अपना लिया था। ऐसा लगता था की एक मायका छोड़कर दुसरे मायके मे आ गए थे। इधर पतिदेव ऑफिस गए और उधर हम पहुच गए मिसेस c के घर और अगर हम नही गए तो वो आ जाती थी हमारे घर। पूरा-पूरा दिन हम लोग गप्प मारने मे बिता देते थे। समय कैसे बीत जाता था कुछ पता नही चलता था।

मिसेस c हम सब लोग उन्हें इसी नाम से बुलाते थे ।वो बहुत ज्यादा पढी-लिखी नही थी पर उनमे कुछ खास था कि जो भी उनसे एक बार मिल लेता था वो उन्हें भूल नही पाता था। उन्हें हर कोई जानता था चाहे वो सीनियर हो या जूनियर। मिसेस c एक बहुत ही सीधी-साधी सुलझी हुई महिला थी। अपने घर बच्चों के बिना वो ४ दिन भी नही रह पाती थी । अगर कभी उन्हें बच्चों के बिना गाँव जाना पडता तो वो परेशान हो जाती थी की बच्चे कैसे अकेले रहेंगे ,क्या खायेंगे इत्यादी।

हम लोग चार मंजिला बिल्डिंग मे रहते थे और उनका घर ground floor पर था इसलिये उन्ही के यहाँ बैठक जमा करती थी। दो-दो बजे रात तक हम सारे बैच मेट उनके यहाँ बैठते थे और मजाल है की उनके मुँह पर शिकन आ जाये उल्टे वो बहुत खुश होती थी। हम और वो दोनो बहुत मस्ती करते थे । उनकी बड़ी बेटियाँ स्कूल जाती थी और छोटी छे महीने की थी तो बस छोटी को लिया और निकल जाते थे शॉपिंग करने और पिक्चर देखने ।

करीब छे साल पहले २ अगस्त की शाम हम घर मे बच्चों के साथ पतिदेव के आने का इन्तजार कर रहे थे ।काफी देर हो गयी थी पतिदेव लौटे नही थे सो चिन्ता भी हो रही थी तभी phone की घंटी बजी तो हमने सोचा की पतिदेव का फ़ोन होगा ,कह रहे होंगे की थोड़ी देर मे पहुंचेंगे पर फ़ोन पर हम लोगों के एक बैच मेट सिंह साब बोल रहे थे। उन्होने बस इतना कहा की मिसेस c की डेथ हो गयी है। पहले तो हमे अपने कानो पर यकीन ही नही हुआ इसलिये दूबारा हमने कांपती आवाज मे पूछा की क्या तो उन्होने फिर कहा की मिसेस c ने ख़ुदकुशी कर ली है। इतना सुनते ही हम बिल्कुल काँपने लगे और आंसू अपने आप आंखो से गिरने लगे । हमे कुछ समझ नही आ रहा था की क्या करें। हमारे बच्चे हमे इस हालत मे देख कर हमे समझाने लगे । फिर हमे अपने एक और बैच मेट जो की जी . के मे रहते है उनसे बात की और रात करीब साढ़े नौ बजे हम लोग निकलने ही वाले थे की पतिदेव भी आ उन्हें और जैसे ही हमने उन्हें बताया उन्हें भी यकीन नही आया । फिर हम सब उनके घर गए और वहां जो देखा वो आज तक नही भूल पाए है।

वो लेटी हुई थी चेहरे पर शांति थी। वहां हर एक की जुबान पर एक ही सवाल था की उन्होने ऐसा क्यों किया और कैसे किया। बच्चों ने बताया की २ बजे खाना खाने के बाद सब लोग कमरे मे सोने गए तो वो भी बच्चों के साथ उनके ही कमरे मे सोने गयी उसके बाद शाम को जब उनकी बेटी उठी तो उसने उन्हें चारों ओर ढूँढा और जब पूजा के कमरे मे देखा तो दौड़कर चिल्लाते हुए बाहर भागी फिर अगल-बगल वाले आ गए और सभी सकते मे आ गए की ये क्या हुआ। उन्हों ने अपने ही दुपट्टे से फांसी लगा ली थी। उनकी एक पडोसी ने बताया की सुबह वो उनके घर आयी थी और एक बजे तक गप्प मारती रही पर उसे कहीं से भी ये अहसास नही हुआ की वो कुछ ऐसा कर लेंगी । हर एक की जुबान पर एक ही सवाल था की इतना बड़ा कदम उन्होने क्यों उठाया। और उन्होने एक suicide नोट भी छोड़ा था । सभी को ये लग रहा था की किसी ने उन्हें देखा क्यों नही जबकि पूजा वाले कमरे की खिड़की खुली हुई थी बस पर्दा पड़ा था।

हम सभी को आज तक ये समझ नही आया की ऐसा उन्होने क्यों किया क्यूंकि वो उनमे से नही थी जो हार मान ले।
उस समय उन्हें अपनी बेटियों की शादी की चिन्ता रहती थी पर आज उनकी बेटियों की शादी हो चुकी है और भगवान की दया से बेटियाँ अपने घर मे खुश है पर ये सब देखने के लिए वो नही रही।

उस दिन घुघुती जी की कविता कायर पढ़ कर मन बहुत विचलित हो गया था क्यूंकि उन्होने जो वर्णन किया था ठीक उसी तरह मिसेस c ने किया था। इसी वजह से कई दिन तक कुछ लिखने का मन भी नही किया । हम तो आज भी ये समझ नही पाते है की जिस घर और बच्चों के बिना वो रह नही पाती थी उन्हें छोड़कर जाने का उनका दिल कैसे किया। आज सब कुछ है बस मिसेस c नही है।

Monday, May 14, 2007

ये बात उन दिनों की है जब हिंदुस्तान मे मोबाइल थोडा नया - नया सा था और बहुत महंगा भी होता था। ९६ -९७ मे मोबाइल से की गयी एक कॉल के १६ रूपये लगते थे और उस समय इनकमिंग और आउतगोइंग दोनो के लिए पैसा देना पड़ता था ।

उस समय हम लोग दिल्ली मे थे और हमारे बच्चे थोड़े बडे हो गए थे और हम टी।वी पर पिक्चर देख-देख उकता गए थे अरे उन दिनों हर पिक्चर मे हीरो तलवार लेकर विलन को मारने के लिए दौड़ता रहता था जिसे देख कर हम थक चुके थे। मिथुन और सनी देओल का जमाना था । तो हमने सोचा की बच्चे तो सुबह ही स्कूल चले जाते है और पतिदेव ऑफिस चले जाते है तो हम क्या करें घर मे पड़े-पड़े , इसलिये हमने एक फ्रीलान्सर के तौर पर एक कंपनी मे काम करना शुरू कर दिया ।हम भी रोज सुबह साढ़े नौ बजे जाते और दो बजे बच्चों के स्कूल से लौटने के समय तक वापस आ जाते थे। और अगर कुछ काम रह जाता था तो उसे घर ले आते थे।

धीरे-धीरे हम सभी का समय अच्छे से बीत रहा था और हमारा काम भी अच्छा चल रहा था । वैसे तो आमतौर पर हम दो बजे तक आ जाते थे पर जब बच्चों के स्कूल की छुट्टियाँ होती थी तो जरा मुश्किल होती थी क्यूंकि एक डर सा रहता था कि कहीँ कुछ हो ना जाये। उस समय बच्चे बडे तो थे पर इतने भी नही की हर चीज अपने आप संभाल ले। और गरमी की छुट्टियाँ हो तो और भी दिक्कत आ जाती थी तो हमने सोचा कि हमारे तो पैसे कहीं खर्च हो नही रहे है तो क्यों ना एक मोबाइल ही खरीद लिया जाये। सबने समझाया भी कि ये क्या बेवकूफी है पर हम भी कहां मानने वाले थे। हमने ये कहकर सबको चुप करा दिया कि जब बच्चे घर मे होते है तो हम काम मे ठीक से ध्यान नही दे पाते है। बस इसके बाद किसी ने भी कुछ नही कहा और हमने एक मोबाइल ले ही लिया।


वैसे ऑफिस मे फ़ोन तो था पर कई बार मिलता नही था। बच्चों को खास तौर पर कह रखा था कि अगर जरुरत हो तभी फ़ोन करना। एक दिन हम ऑफिस मे थे कि तभी हमारे बडे बेटे का फ़ोन आया कि "mom ड्राइंग रूम मे कोक की बोतल टूट गयी है ,हम लोग क्या करें। "
तो सबसे पहले हमने पूछा की तुम लोगों को चोट तो नही लगी।
और जब उसने कहा की नही तो हमने उसे समझाया की तुम लोग वहां से हट जाओ वरना कांच चुभ जाएगा । और ये भी कहा की जब महरी आएगी तो उससे साफ करवा लेना नहीं तो जब हम आएंगे तो साफ कर देंगे।

खैर जब हमारी बात यही ख़त्म हो गयी और हमने फ़ोन काटा तो सबने बच्चों के लिए चिन्ता जताई। पर तभी हम लोगों के साथ एक राम कुमार काम करते थे उन्होने हँसते हुए हमसे कहा कि मैडम जितने की कोक की बोतल नही आती उससे कहीँ ज्यादा पैसे तो आपने मोबाइल पर बात करने मे खर्च कर दिए। बस फिर क्या था जो होता वो यही कहता । पर उन्हें कौन समझाता कि बच्चों से बढ़कर तो कुछ नही है।


पर आज हालात इतने बदल गए है कि हर आदमी ही मोबाइल लिए हुए है और अगर कोई बिना मोबाइल के दिखता है तो कुछ अजीब लगता है।



Sunday, May 13, 2007

ये बात कॉंग्रेस के लिए बिल्कुल सही बैठती है क्यूंकि उन लोगों के सिर से अभी भी राहुल का भूत नही उतरा है। उत्तर प्रदेश मे इतना बड़ा झटका खाने के बाद भी उनका हाल वही है। एक ज़माने मे उत्तर प्रदेश कॉंग्रेस और जनसंघ जो अब बी.जे.पी है का गढ़ होता था। खैर हमे उससे क्या।

हाँ तो हम बात कॉंग्रेस की कर रहे थे । कल अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि राहुल हिंदुस्तान का भावी प्रधान मंत्री है। ये बात तो कई बार कई कॉंग्रेस के नेता बोल चुके है। अरे भाई क्या और कोई नेता नही रह गया है अपने देश मे और खास कर कॉंग्रेस मे । ये लोग आख़िर कब तक यही राग अलापते रहेंगे ।

राहुल जो अभी राजनीति की ए.बी.सी सीख रहे है उन्हें देश की बागडोर सौपने की बात करना सुनकर बहुत अखरता है। ये सारे के सारे नेता बस चमचागीरी ही कर सकते है । देश और देश की जनता जाये चूल्हे मे।

mothers day

आज समूचे विश्व मे मदर्स डे मनाया जा रहा है और मनाया भी क्यों ना जाये आख़िर माँ से बढ़कर दुनिया मे ना तो कोई है और ना ही होगा। माँ की महानता हम क्या हमारे देवी-देवता भी मानते थे वो चाहे कृष्ण है या राम हो या गणेश जी हो सभी मानते है। और तो और हमारी फिल्मों मे भी माँ का स्थान हमेशा ऊंचा ही दिखाया गया है और पुरानी फिल्मों मे एक गाना हमेशा माँ पर आधारित होता था , अनेकों गाने माँ के लिए बनाए गए है जैसे-

उसको नही देखा हमने कभी ,पर उसकी जरुरत क्या होगी
ए माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी.

माँ मुझे अपने आँचल मे छुपा ले गले से लगा ले
की और मेरे कोई नही


और ये माँ ही होती है जो अपने बच्चों को हर मुसीबत से बचाती है और बच्चों को मुसीबत से लड़ना भी सिखाती है। और हमे इस लायक बनाती है कि हम दुनिया और समाज मे रह सके। हम बच्चे चाहे जितनी गलती करे पर माँ हमेशा उन्हें माफ़ कर देती है। माँ को भगवान् ने इतना शक्तिशाली बनाया है कि अगर उसके बच्चे वो चाहे कहीँ भी हो अगर वो परेशान है तो उसे पता चल जाता है। ऐसा ही एक बार मेरे साथ भी हुआ और शायद बहुत लोगों के साथ भी ऐसा हुआ होगा । उन दिनों हम दिल्ली मे रहते थे हमारी और माँ की रोज ही फ़ोन पर बात होती थी । ऐसे ही एक दिन माँ ने फ़ोन किया और जैसे ही हमने हैलो बोला उन्होने झट से पूछा क्या हो गया हमने लाख कहा कि कुछ नही पर वो तब तक पूछती रही जब तक हमने उन्हें अपनी परेशानी का कारण नही बता दिया। कहने का मतलब है कि माँ तो बच्चों की आवाज भर से ही समझ जाती है कि बच्चे खुश है या दुःखी। और आज हम भी एक माँ है और इस बात को स्वीकारते है।


वो कहते है ना कि बच्चे को जन्म देना माँ का पुनर्जन्म होता है क्यूंकि अपने बच्चे मे उसे अपनी ही तस्वीर दिखती है। माँ और बच्चे का रिश्ता हर रिश्ते से ऊपर होता है वैसे आज के ज़माने मे ये परिभाषा कुछ बदल सी रही है।
जैसे बच्चे माँ के बिना अधूरे है ठीक उसी तरह माँ भी बच्चों के बिना अधूरी है। आज के दिन हमे दुःख भी हो रहा है क्यूंकि हमारी माँ हमे हमेशा के लिए छोड़ कर जा चुकी है।



आज मदर्स डे के दिन हम सभी माँओं को इस दिन कि बधाई देते है।

Saturday, May 12, 2007

कई दिन हो गए दुर्गेश नंदिनी के बारे मे बात किये हुए इसलिये हम हाजिर है। जी हां इस सीरियल मे एक नया मोड़ या यूं कहें की पुराना मोड़ आ गया है अरे वही तीसरा शख्स सिकंदर । पहले तो अमित साद जो क्षितिज बने थे कुछ ठीक लग रहे थे पर अब कोई और इस किरदार को निभायेगा जो कुछ खास अच्छा नही लग रहा है। और दुर्गेश के लिए तो कुछ ना कहें तो ही अच्छा है।

हमने पहले भी कहा था जीते है ....बहुत अच्छा चल रहा है और सबसे बड़ी बात इस सीरियल को अभी तक तो खीचने की कोशिश नही की गयी है। और एक्टिंग भी सब अच्छी कर रहें है। और कहानी काफी जल्दी -जल्दी आगे बढ़ रही है जो हम जैसे दर्शकों के लिए अच्छा है। एक माँ की अपने बच्चों को पाने की जंग इसमे दिखायी गयी है।


इसी हफ्ते विरूद्व भी देखना शुरू किया ये भी काफी अच्छा है । पहले हम इसलिये नही देखते थे क्यूंकि उसमे तुलसी रानी जो है पर देखने पर लगा कि चलो कुछ नयी कहानी तो है। कम से कम सास -बहू का ड्रामा तो नही है। बस तुलसी अपनी तुलसी वाली आदतों को जरा छोड़ दे तो अच्छा होगा। क्यूंकि उनका लोगों को देखने का स्टाइल वैसा ही है। और थोडा वजन भी और घटाना चाहिऐ क्यूंकि वो विक्रम गोखले कि बेटी कम पत्नी ज्यादा लगती है।


एक लडकी ....और अन्य सीरियल तो अपनी राह से भटक गए है इसलिये हमने उन्हें देखना छोड़ दिया है।

पाठशाला पढ़ कर घबराने की जरुरत नही है। ये तो मस्ती की पाठशाला है। हमने ये कुछ फोटो जो कल के टाइम्स ऑफ़ इंडिया मे छपी थी ,उन्हें हम यहाँ लगा रहे है। आज हमने बहुत कोशिश की कि यहाँ पर टाइम्स का लिंक लगा सके पर हम सफल नही हो पाए। इसलिये हम ऐसे ही लगा रहे है।


इस फोटो को देख कर ऐसा लग रहा है मानो खिलाडी को खेलते-खेलते अचानक बाबा रामदेव याद आगये और उसने शीर्षासन करना शुरू कर दिया।


धोनी बाल उछाल कर कह रहे है कि पकड़ सको तो पकड़ लो।




और इन्हें देख कर लगा मानो ये कह रहे हो कि बाल आ रिया है कि जा रिया है।

Friday, May 11, 2007

आज मायावती उत्तर प्रदेश मे चुनाव जीत गयी है और वो भी ऐसे-वैसे नही अकेले सबसे बड़ी पार्टी के रुप मे ब.स.प. को खड़ा कर दिया है। वो चाहे जैसी भी हो पर इस बार उसने सभी दलों की छुट्टी कर दी है क्या बी .जे.पी .क्या कॉंग्रेस और क्या स.प.सबके सब पीछे रह गए। हम कोई मायावती के बहुत बडे प्रशंशक नही है पर जिस तरह से उसने चुनाव जीता वो तारीफ़ के काबिल है। कोई सोच भी नही सकता था।

अमिताभ बच्चन कहते ही रह गए की यू .पी मे है दम क्यूंकि जुर्म है कम । पर क्या कह देने भर से जुर्म कम हो जाता है। अब अगर अमिताभ कुछ कहेंगे तो राहुल कैसे पीछे रहेंगे।और राहुल ने क्या कहा ये तो हम सभी जानते है।

चुनाव मे प्रचार के लिए एक नया style चला है roadshow का । कॉंग्रेस तो अब इसी roadshow के सहारे अपनी नईया पार करना चाहती थी अरे पर जब सहारा स.प को डूबने से नही बचा पाय तो फिर कोई किसी को क्या बचायेगा।

जनता देखने तो जाती थी राहुल और प्रियंका गाँधी अरे नही नही वढेरा को पर उनका जलवा रायबरेली और अमेठी के अलावा कहीं चलता नही दिखता है। चाहे वो अपने बच्चों को रिक्शा की सैर कराएँ या कुछ और।


इधर कई दिनों से टी.वी पर हाथियों द्वारा तबाही मचाने को दिखाया जाता रहा है कभी बनारस मे तो कभी केरल मे ,और इस चुनाव मे भी हाथी ने जो ब.स.प का चुनाव चिह्न है ने सबको रौंद डाला।

हर एक का हार मानने का अपना-अपना स्टाइल है जैसे कॉंग्रेस सुबह से ही कहने लगी कि वो मायावती को सपोर्ट करेगी अरे पर पहले उसे पूछने तो दो। सुषमा स्वराज ने कहा की बी .जे.पी ने अपना विचार जनता के सामने मे रखने मे देर कर दी अरे तो भईया तो चुनाव प्रचार कहे बात का कर रहे थे। स.प तो और चार हाथ आगे निकली उनके नेता तो हारते ही ऑफिस जाकर कागज़-और फाइलों को ही फाड़ने लगे (ऐसा टी.वी.मे दिखाया गया )और उनका कहना था कि अगले २-३ दिन मे नयी सरकार के लोगों को ऑफिस मे जो आना है।



अब भैया मायाराज पहले भी लोग देख चुके है और अब अगले ५ साल फिर देखेंगे। विकास कितना होगा अरे प्रदेश का और किसका ये तो समय ही बतायेगा।

इस साल चुंकि हम गोवा मे है इसलिये यहाँ की गरमी का ही हाल बता सकते है। यहाँ पर कोस्तेल एरिया होने की वजह से जबर्दस्त गरमी पड़ती है। ऐसा नही है की बाक़ी सारे देश मे मौसम बड़ा ही सुहाना है पर गोवा उफ़ ।

आजकल तो शायद सभी जगह मौसम मे कुछ बदलाव सा आने लगा है। दिल्ली मे तो जितनी ज्यादा ठंड पड़ती है उतनी ही गरमी भी पड़ती है। अभी ३-४ दिन पहले टी.वी. मे दिखा रहे थे की दिल्ली मे अभी से पारा ४२ डिग्री पहुंच रहा है। और भोपाल के बारे मे भी बताया जा रहा था की वहां करीब १० साल बाद इतनी ज्यादा गरमी पड़ रही है। सभी जगह गरमी का ऐसा ही हाल है।

पर यहाँ गोवा मे तो बुरा हाल है। अजी बुरा हाल इसलिये की इस गरमी की वजह से ना तो आप कहीँ बाहर निकल सकते है और ना ही कहीँ घूम-फिर सकते है।जो लोग इस गरमी और धूप मे घूमते है हम उनकी सहनशक्ति की दाद देते है। a.c.मे रहने से तो और भी मुसीबत है क्यूंकि अगर a.c.मे रहने के बाद धूप और गरमी मे घर से बाहर निकलते है तो बीमार भी पड़ जाते। अजी हम यूं ही नही कह रहे है भुक्तभोगी है । और गरमी मे खांसी-जुखाम हो जाये तो मुसीबत ही समझिये। और उमस इतनी कि कुछ मत पूछिये ।

वैसे यहाँ का तापमान २८-३० डिगरी ही है पर उमस की वजह से ही सारी परेशानी होती है। और उस पर रोज सुबह बादल भी आ जाते है ,पर बरसते नही है। अंडमान मे भी गरमी ज्यादा होती है पर वहां बारिश हो जाती है जिस से गरमी का असर कुछ कम हो जाता है।

गरमी से छुटकारा पाने के लिए अगर आप नीबू पानी पिए या तरबूज खाए या बेल ,फालसे , तरबूज का शरबत पीते है तब कहीँ जाकर गरमी से थोड़ी देर को राहत मिल जाती है।


पहले तो रात मे घर की छतों पर सोया जाता था। पर आजकल तो एक तो घरों मे छतें नही होती है और दूसरे a.c की वजह से और तीसरे डर की वजह से। पर वो भी क्या दिन थे। इलाहाबाद मे हम लोगों के घर की छत पर पहले पानी डाला जाता था छत को ठण्डा करने के लिए । फिर एक पंक्ति मे आठ खाटें बिछती थी और सब पर सफ़ेद चादर और सफ़ेद मच्छेर दानी ,भई मच्छरों से बचने के लिए और रात मे जो गप्प होती थी वो मजा आज कहां मिल सकता है।

Thursday, May 10, 2007

जी हाँ हम अपनी इंडियन क्रिकेट टीम के जीतने की ही बात कर रहे है। अरे भाई हमने मैच ज्यादा तो नही देखा पर समाचार मे तो आया कि इंडिया ने बांग्लादेश की टीम को ५ विकेट से हरा दिया। चलो शास्त्री जी कि नाक कटने से बच गयी वैसे खिलाड़ियों का बस चलता तो शायद वर्ल्ड-कप का replay हो सकता था।

जिस तरह से बांग्लादेश की टीम ने २५० रन बनाए और जैसे इंडियन टीम ने गिरते-पड़ते जीत हासिल की तो उसके लिए टीम बधाई की पात्र है। खैर इस बार तो वीरू भाई ने भी कुछ ३० रन बना लिए और गम्भीर ने भी कुछ रन बनाए पर इतने नही की टीम आसानी से जीत जाये। वो तो धोनी अपने पुराने अंदाज मे आ गए वरना कुछ भी हो सकता था क्यूंकि ओवर ही ख़त्म हो रहे थे। बस एक ही ओवर तो बचा था।


चलिये कम से कम जीत की शुरुआत तो हुई ,अब देखना है कि बाक़ी के दो मैच भी क्या ये लोग जीतेंगे। जीतना तो चाहिऐ और हम उम्मीद भी करते है। अब भाई आप लोग ये मत कह दीजियेगा कि मैच भी मत देखो।



ताम्ब्री सुर्ला १३ वी शताब्दी मे बना शिव जी का मंदिर गोवा मे स्थित है । ये जगह पंजिम से करीब ६०-६५ किलोमीटर दूर है। वैसे वहां ज्यादा पर्यटक नही जाते है। जी.टी.डी. सी की tourist बसें हफ्ते मे तीन दिन जाती है। पर चुंकि लोग सिर्फ ३-४ दिन को आते है और beach ही घूमते रह जाते है और ये तो सभी जानते है की गोवा अपने beaches के लिए ज्यादा मशहूर है। इन जगहों मे जाने मे पूरा एक दिन निकल जाता है। प बस वाले तो ताम्ब्री सुर्ला के साथ-साथ ३-४ और जगहें भी दिखा देते है।

ताम्ब्री सुर्ला का रास्ता ओल्ड गोवा से होकर जाता है और ये कर्नाटक बॉर्डर पर है। रास्ते मे बोदला फॉरेस्ट भी पड़ता है जहाँ वन-विभाग का गेस्ट हाउस है और जहाँ आप अगर किस्मत अच्छी हो तो कुछ जानवर भी देख सकते है ।मंदिर तक का रास्ता यूं तो अच्छा है पर बरसात के दिनों मे रास्ते मे फिसलन सी हो जाती है इसलिये जरा संभल कर चलना पड़ता है पर और दूसरे मौसम मे ऐसी कोई समस्या नही आती है। ये मंदिर चारों ओर से पहाड़ों से घिरा है और यहाँ की हरियाली देखते ही बनती है।


मंदिर मे हर समय पुजारी नही होता है क्यूंकि वो भी कहीँ दूर किसी गांव से आता है। इसलिये अपने आप ही दर्शन करने पड़ते है और अगर वहां चरनामृत रखा होता है तो खुद ही लेना पड़ता है। मंदिर के अन्दर बहुत अँधेरा होता है , सिर्फ दीपक जलता रहता है। और उसी दीपक के प्रकाश मे भगवान के दर्शन हो जाते है।और चुंकि पुजारी हर समय नही होता इसलिये मंदिर के द्वार भी कई बार बंद रहते है। पर दरवाजा सीखचों वाला है इसलिये दर्शन करने मे कोई दिक्कत नही आती है। मंदिर के पास ही पानी का एक झरना भी है जहाँ सीढ़ी से उतरकर जाया जा सकता है और बैठ कर वहां के वातावरण का आनंद उठाया जा सकता है। औ शांति तो इतनी की कुछ पूछिये मत।


मंदिर से दस कदम की दूरी पर एक resort भी है बिल्कुल eco फ़्रेंडली है जहाँ मिटटी की छोटी-छोटी cottages भी बनी हुई है । खाने की मेज और कुर्सियाँ पेड़ों की लकड़ी या कहें तो छोटे छोटे तने काट कर बनी है. और चारों ओर दूर- दूर तक फैला हुआ घना जंगल और हाँ वहां हाथी भी है जिस पर बैठ कर आप जंगल की सैर भी कर सकते है। पर ये resort सिर्फ सीज़न मे ही खुलता है मतलब अक्तूबर से मार्च तक।

इस फोटो मे हाथी के पीछे छोटी-छोटी cottages दिखायी दे रही है।

Wednesday, May 9, 2007

आज कल हर चैनल चाहे वो ज़ि हो चाहे सोनी हो और चाहे स्टार प्लस हो सभी चैनल उस एक आवाज को ढूँढ रहे है जो हिंदुस्तान की आवाज बन सके। हालांकि नाम अलग -अलग है। ज़ि पर संगीत का प्रथम विश्व युद्घ सा,रे,गा,मा,पा , २००७ है तो सोनी पर इंडियन आइडल है तो भला स्टार कैसे पीछे रहता उनके कार्यक्रम का नाम वॉइस ऑफ़ इंडिया है। इन तीनों कार्यक्रम के जज भी हिंदी फिल्मों जाने-माने संगीतकार लोग है जो भाग लेने आये हुए लोगों की धज्जियां उड़ाने मे जरा भी संकोच नही करते है।

अभी तो सिर्फ सोनी और ज़ि पर ही शुरू हुआ है स्टार वाला तो शायद १८ से शुरू होगा। सोनी पर अन्नू मलिक तो ऐसे लोगों की बेइज्जती करते है की क्या कहा जाये। और उदित नारायण तो बिल्कुल बेपेंदी का लोटा जैसे है,अरे हम यूं ही थोड़े ही कह रहे है। आप लोगों को तो पता ही है कि हम टी.वी देखते है तो पिछले हफ्ते हमने भी इंडियन आइडल देखा। एक असम कि सीढ़ी-साधी लडकी ने काफी अच्छा और सुर मे गाना गाया पर अन्नू मलिक जी को पसंद नही आया हालांकि जावेद अख़्तर और अलीशा को उसका गाना पसंद आया था पर चुंकि अन्नू मलिक नही चाहते थे कि वो लडकी आगे बढ़े इसलिये जैसे ही उदित नारायण कहने चले कि उन्हें उसकी आवाज अच्छी लगी अन्नू मलिक झट से बोले कि कुछ भी कहने से पहले ये सोचो कि हम इंडियन आइडल ढूँढ रहे है । वैसे जावेद अख़्तर ने तो कहा कि अगर वो लडकी जीन्स पहनकर गिटार लेकर गाना गाती तो अन्नू मलिक को पसंद आ जाता। अब समझ गए ना कि हम उदित नारायण को बेपेंदी का लोटा क्यों बोले । अरे भाई रोजी-रोटी का जो सवाल है।


ज़ि पर तो और भी ड्रामा चलता है। ये हिमेश रेशमिया नाटक करने का कोई भी मौका नही छोड़ता है। उन्हें ऐसा लगता है मानो उनसे बेहतर तो कोई है ही नही। दूसरे कि बखिया उधेड़ने के अलावा कुछ नही करते है। जरा दो-चार गाने क्या हिट हो गए (वैसे ज्यादातर गाने एक से ही लगते है)कि अपने को बहुत महान समझने लगे है। कुछ नया तो करके दिखाओ । पिछली बार के कार्यक्रम मे प्रतियोगियों के बीच मे भी गुट बाजी करवाने का कोई भी मौका उन्होने नही छोडा था। इस बार देखे क्या-क्या करते है।


स्टार प्लस का तो अभी शुरू होगा पर शायद उनके जज इतने खर- दिमाग नही है क्यूंकि इससे पहले भी वो लोग ज़ि के अलग-अलग संगीत कार्यक्रम मे आ चुके है और अन्नू मलिक और हिमेश कि तरह प्रतियोगीओं को complex नही देते है। अगर कोई खराब गाता है तो उसकी बेइज्जती करने कि बजाए थोड़े नरम लहजे मे भी उसे reject किया जा सकता है। मानते है कई बार बहुत ही बेसुरे और फालतू टाईप के लोग भी आ जाते है सिर्फ इसलिये कि वो टी.वी.पर आ जाएँ।

अंडमान मे रहते हुए घूमते -फिरते मस्ती मे दिन निकल रहे थे और हमारी सेहत भी काफी अच्छी- खासी हो रही थी। morning walk जरा मुश्किल होता था क्यूंकि एक तो वहां सूरज बहुत तेज होता है और दूसरा हमे सुबह की नींद बड़ी प्यारी है । यूं तो लोग कहते है और हम जानते भी है कि सुबह सुबह टहलना सेहत के लिया अच्छा होता है पर क्या करें आदत से मजबूर है।फिर पता चला की वहां एक जिम है ,वहां जाने पर पता चला की उन दिनों वहां कोई भी महिला जिम मे नही आती है। इसलिये हमने चाहकर भी जिम जाने का इरादा छोड दिया था।

पोर्ट ब्लैयेर मे दावतें ख़ूब खाते थे। ऐसे ही एक दिन वहां के उप राज्यपाल के यहाँ दावत मे कुछ नए लोगों से मुलाकात हुई और जिसमे तीन-चार महिलाओं से उतनी थोड़ी ही देर मे काफी अच्छी दोस्ती हो गयी। और हम सभी अपनी बढती सेहत और घर मे रहते-रहते बोर सी हो रही थी। इसलिये हम सबने सोचा कि जब पोर्ट ब्लैयेर मे जिम है तो उसका फायदा भी उठाना चाहिऐ । बस फिर क्या था वहीँ खाना खाते-खाते तय हुआ कि कल से जिम शुरू।

घर लौटते ही हमने घर मे घोषणा कर दी कि कल से हम जिम जायेंगे और वापस shape मे आकर दिखायेंगे। अगले दिन हम चारों तय समय पर जिम पहुंच गए। जिम मे यूं तो महिलाओं के लिए ३ बजे से ५ बजे तक का समय था पर चूंकि वहां कोई महिला जाती नही थी इसलिये उस समय पर भी लड़के ही वहां exercise करते थे । पहले दो -तीन दिन तो सभी लड़कों को लगा की ये लोग तो बस यूं ही आ गयी है । सो रोज वहां जाकर पहले लड़कों को बाहर निकलवाना पड़ता था फिर धीरे-धीरे उन्हें भी समझ मे आ गया की हम चारों वहां रोज आने वाली है।

दो दिन बाद इन्स्त्रक्टर ने हम लोगों को सारे stations कैसे करने है और कौन से नही करने है सब बताया और बहुत सारी exercise भी बताई और यूं शुरू हुआ जिम । तीन से चार तो हम exercise करते थे पर उसके बाद वहीँ बैठ कर दुनिया भर की गप्पे मारा करते थे हालांकि जिम मे हर तरफ शांत रहे लिखा था पर ये तो सभी जानते है की जहाँ औरतें हो वहां कोई शांत कैसे रह सकता है। वैसे आजकल तो आदमी लोग भी बात करने मे कहां पीछे है।

Tuesday, May 8, 2007

माँ

ये एक ऐसा शब्द है जिसकी महत्ता ना तो कभी कोई आंक सका है और ना ही कभी कोई आंक सकता है। इस शब्द मे जितना प्यार है उतना प्यार शायद ही किसी और शब्द मे होगा। माँ जो अपने बच्चों को प्यार और दुलार से बड़ा करती है। अपनी परवाह ना करते हुए बच्चों की खुशियों के लिए हमेशा प्रयत्न और प्रार्थना करती है और जिसके लिए अपने बच्चों की ख़ुशी से बढकर दुनिया मे और कोई चीज नही है। जब् हम छोटे थे और हमारी माँ हम को कुछ भी कहती थी तो कई बार हम उनसे उलझ पड़ते थे कि आप तो हमको यूँही कहती रहती है कई बार माँ कहती थी कि जब तुम माँ बनोगी तब समझोगी और ये सुनकर तो हम और भी नाराज हो जाते थे। हम लोग कभी भी माँ को पलट कर जवाब नही देते थे हाँ कई बार बहस जरूर हो जाती थी।


हमारी दीदियों की शादी के बाद तो माँ हमारी सबसे अच्छी दोस्त बन गयी थी और बाद मे कुछ सालों के लिए हमारे पापा दिल्ली आ गए थे जिसकी वजह से हमारी और माँ की आपस मे ख़ूब छनती थी। हम दोनो बहुत चाय पीते थे पापा अक्सर कहते थे की तुम लोगों को बस चाय पीने का बहाना चाहिऐ । घर मे है तो चाय चाहिऐ बाहर से घूम कर आये है तो चाय चाहिऐ , बोर हो रहे है तो भी चाय चाहिऐ। सच मे जब् भी कोई नौकर दिख जाता हम लोग चाय की फरमाइश कर देते ।क्या मस्ती भरे दिन थे । हमारे दोस्त तो ये भी कहने लगे थे की अब तो ममता सबको भूल जायेगी क्यूंकि इसके मम्मी-पापा जो दिल्ली आ गए है। और हुआ भी वही जब् भी छुट्टी होती बस बच्चों को गाड़ी मे डाला और पहुंच गए मम्मी के यहाँ।


पर कई बार हम बच्चे ना चाहते हुए भी माँ को दुःख दे जाते है कुछ बातें ऐसी होती है जिन्हे हम चाहकर भी नही भूल पाते है। जैसे यहाँ पर हम जो वाक़या लिख रहे है वो इतना समय बीत जाने पर भी हम भूल नही पाए है क्यूंकि हमे हमेशा ये लगता है कि हमने माँ से इस तरह क्यों बात की ? ये बात दिसम्बर २००४ की है उन दिनों माँ की तबियत कुछ खराब चल रही थी। हमे अंडमान लौटने मे कुछ दस दिन ही बचे थे और इसलिये माँ हमसे मिलने दिल्ली आयी हुई थी। दिल्ली मे हमारी भतीजी भी होस्टल मे रहती थी और चुंकि हम अंडमान मे थे इसलिये हमारा बेटा भी अपने collage के होस्टल मे रहता था । एक दिन की बात है घर मे mutton बना था ,हमारा बेटा और हमारी भतीजी दोनो ही होस्टल से घर आये थे । हमारे बेटे को माँसाहारी खाना बहुत पसंद है । हम सभी खाने का मजा ले रहे थे आख़िर माँ ने जो बनाया था वो कहते है ना की माँ के हाथ के बने खाने का स्वाद ही अलग होता है हम लोग लाख कोशिश करे वैसा नही बना सकते। आख़िर मे एक पीस बचा था तो एक पीस क्या रखा जाये ये सोच कर माँ ने बेटे को कहा की तुम ले लो और हमने भतीजी को बोला और बाद मे हमने अपनी भतीजी को वो चावल के साथ खाने के लिए serve किया ये कहते हुए की बेटा तो आजकल घर मे ही है आप फिर बना दीजियेगा पर शायद हमारे कहने का अंदाज कुछ गलत था जो माँ को अच्छा नही लगा और बाद मे वो उठकर अन्दर कमरे मे चली गयी थी । जब् हम अन्दर कमरे मे गए तो हम हैरान रह गए उनको इतना दुःखी देखकर और हमने उनसे माफ़ी मांगी कि आइन्दा हम ऐसा कुछ नही करेंगे जिससे उन्हें दुःख हो। पर आज भी हम इस बात को भुला नही पाते है ,आज भी ये सोच कर हमे अपने पर ग़ुस्सा आता है की हमने माँ से ऐसे क्यों बात की थी।

Thursday, May 3, 2007

पिछले ६-७ महीनों मे कई बच्चे गहरे गड्ढों मे गिर चुके है। जो किस्मत वाले थे उन्हें बचा लिया गया था पर कुछ बच्चों को नही बचाया जा सका। करीब ६-७ महीने पहले सबसे पहले प्रिन्स नाम के एक ३-४ साल के छोटे बच्चे के गड्ढे मे गिरने की खबर सभी न्यूज़ चैनलों पर दिखायी गयी थी ।

प्रिन्स नाम का ये बच्चा जहाँ बोरेवेल के लिए गड्ढा खोदा जा रहा था वही खेल रहा था और अचानक ही वो ५० फ़ीट गहरे गड्ढे मे गिर गया था। फिर शुरू हुआ उसे बचाने का काम।उस गड्ढे के बराबर मे एक और गड्ढा खोदा गया । प्रिन्स को गड्ढे से बहार निकलने के लिए सेना की मदद भी ली गयी और करीब ५० घंटे बाद उसे सही सलामत बाहर निकला गया। कुछ नेता लोग भी वहां पहुंच गए थे ,जैसे ही सेना के जवान प्रिन्स को बाहर लेकर आये उनमे जैसे होड़ सी लग गयी प्रिन्स को गोद मे उठाने की। हर आदमी उसे गोद मे उठाना चाहता था पर इस सबमे लोग प्रिन्स की माँ को ही भूल गए थे। आख़िर मे माँ की गोद मे प्रिन्स को दिया गया था।

इस घटना के बाद तो जैसे बच्चों का गड्ढे मे गिरना आम बात सी हो गयी । हर १०-१५ दिन मे कोई ना कोई बच्चा गहरे गड्ढे मे गिर जाता है । अभी हाल ही मे रायचूर मे एक बच्चा करीब ३५ फ़ीट गहरे गड्ढे मे गिर गया था पर वो प्रिन्स की तरह खुशकिस्मत नही था । करीब ५० घंटे की कोशिशों के बाद भी उसे बचाया नही जा सका था।

ये गड्ढे जिस विभाग के लोग खोदते है उन्हें इतने सारे हादसों के बाद कम से कम इन गड्ढों के चारों ओर कुछ घेरा डालना चाहिऐ और कुछ लिखकर या कोई खतरे का निशान बनाना चाहिऐ जिससे इस तरह के हादसों को रोका जा सके जिसमे नन्हे मासूमों की जान चली जाती है।

Tuesday, May 1, 2007

कितने डे शीर्षक हमने इसलिये दिया है क्यूंकि कल आज तक चैनल पर इंटरनेशनल डान्स डे दिखाया जा रहा था जो इससे पहले हमने कभी नही सुना था। इसी लिए हमने एक पोस्ट ही इस पर लिख दी है। हमने डे कोई क्रम मे नही लिखे है।

पहले तो independence डे और republic डे और childrens डे ही होता था और हाँ birth डे भी होता था जो आज भी होता है।
क्या देश क्या विदेश सभी जगह womens डे मनाया जाता है।

पर धीरे-धीरे mothers डे शुरू हुआ अच्छा भी है क्यूंकि इस दिन माँ को बच्चे बधाई देते है उनके माँ होने की।

उसके बाद fathers डे सुनाई दिया ,ये भी ठीक है क्यूंकि अगर माँ बधाई की पात्र है तो पिता भी बधाई के हकदार है।

फिर friendsship डे शुरू हुआ ,ठीक भी है क्यूंकि दुनिया मे दोस्ती से बढकर कोई चीज नही है।

जैसा की हम सभी जानते है कि आज labour डे है पर क्या सही मायने मे हम labour डे मनाते है।

आज कल तो slap डे , chocolate डे , rose डे भी मनाया जाता है।

aids awareness डे और disability डे मनाया जाता है जो की सामजिक दृष्टि से बहुत अच्छा है।

डे की बात हो और वैलेंटाइन डे की बात ना हो भला ऐसा कैसा हो सकता है।

आप लोग सोच रहे होंगे की बात तो शुरू हुई डांस डे से और इतने सारे डे लिख डाले। चलिये हम डान्स डे पर वापस आते है । जैसा की आज तक पर बताया गया कि उन्तीस अप्रैल को इंटरनेशनल डान्स डे था। विदेश का तो पता नही पर अपने देश मुम्बई मे काफी जोर-शोर से मनाया गया था। कोई संदीप सोपाकार नाम के करिओग्रफेर ने अलग -अलग हिरोइन (काजोल ,अदिति गवात्रिकर,किट्टू गिडवानी ) के साथ करीब १८ किस्म के डान्स करे थे। सारे नाम तो हमे याद नही है पर एक-दो याद है जैसे सालसा । ज्यादातर western डान्स ही थे पर डान्स के लिए हिंदी गाने ही बजा रहे थे।

इतनी डान्स कथा इसलिये लिख डाली क्यूंकि शायद कुछ समय बाद पूरे साल यानी ३६५ दिन ही कोई ना कोई डे मनाया जाएगा । हमारी जानकारी जरा कम है इसलिये हो सकता है कई डे रह भी गए होंगे तो उसके लिए हम माफ़ी चाहते है।

हट बे




अरे
-अरे गलत मत समझिये ,ये तो अंडमान के एक द्वीप का नाम है । ये अंडमान से करीब आठ घंटे की दूरी पर है । वहां जाने के लिए स्पीड बोट और शिप से जा सकते है। स्पीड बोट तो रोज सुबह साढे छे बजे जाती है ,वैसे तो बडे शिप जो निकोबार जाते है वो भी कई बार हट बे से होते हुए जाते है ।अगर sea sickness नही महसूस होती है तो बोट की यात्रा का आप भरपूर मजा उठा सकते है।कहते है की रास्ते मे dolphin भी दिखती है पर हमे कभी नही दिखी थी। अन्यथा हैलिकॉप्टर से भी वहां जाया जा सकता है । हैलिकॉप्टर से आधे घंटे मे पहुंच जाते है। हट बे भी अंडमान का एक छोट सा ही द्वीप है ये द्वीप सीधी सड़क जैसा है और सड़क के साथ-साथ समुन्द्र ।

यहाँ का butler beach गोल्डन sand beach है मतलब वहां की बालू का रंग सुनहरा सा है। beach तो हर जगह की तरह ये भी बहुत अच्छा है पर यहाँ के beach पर कभी-कभी मगरमच्छ भी आ जाते है। इसलिये वहां थोडा सचेत रहना चाहिऐ।

हट बे मे एक कुदरती झरना भी है बिल्कुल जंगल के अन्दर पर है खूबसूरत। हम तो वहां सुनामी के पहले ही गए थे क्यूंकि सुनामी के बाद तो हमे समुद्री यात्रा करने मे डर लगने लगा था क्यूंकि जब मौसम खराब होता है तो हल्पा की वजह से शिप या बोट बहुत जोर-जोर से हिचकोले लेते है। पर अगर अक्तूबर से मार्च के बीच मे जाये तो झरने का मजा उठाया जा सकता हैजहाँ पर हम लोग अपनी गाड़ी छोड़ते है वहां पर हाथी भी होता है जहाँ आप हाथी की सवारी भी कर सकते है ।एक छोटे और पतले से लकड़ी के पुल को पार करके झरने तक पहुँचते है। पर वहां बरसात के दिनों मे तो बिल्कुल ही नही जाना चाहिऐ क्यूंकि वहां जोंक बहुत होते है और वो चिपक जाते है और फिर उन्हें खीच-खीच कर निकलना पड़ता है जो काफी कष्ट्दायी होता है। और झरने का पानी बहुत मटमैला दिखता है। बरसात की वजह से झरने तक पहुंचना भी मुश्किल होता है क्यूंकि फिसलने का भी डर रहता है।

हट बे मे लाइट हाउस के ऊपर से चढ़कर देखने पर समुन्द्र का विस्तृत रुप देखने को मिलता है। पर लाइट हाउस की करीब सौ सीढियाँ चढ़ना पड़ता है वो भी नंगे पैर और टॉप पर पहुँचने के लिए लोहे की एकदम पतली सीढ़ी से चढ़ना पड़ता है वो भी अपने आप मे एक अनुभव है. पर उससे उतरना थोडा मुश्किल लगता है क्यूंकि उतरने के लिए घूम कर उतरना पड़ता है। पर ऊपर पहुंच कर जो नजारा दिखाता है वो सारी थकान मिटा देता है।

सुनामी से यहाँ पर काफी नुकसान हुआ था क्यूंकि एक तो ये फ़्लैट एरिया है और दूसरा समुन्द्र सड़क के साथ-साथ है और लोग उसी दीवार के साथ घर और दुकाने बना कर रहते थे। और आज तक वहां पर भूकंप के झटके आते रहते है।