डी एडिक्शन कैंप

अपडेट : हम माफ़ी चाहते है कि हमने पोस्ट लिखते हुए year नही लिखा थादर असल हम अंडमान मे २००३ से २००६ तक रहे थे


अंडमान मे रहते हुए भी हमे वही समस्या आयी की जब पतिदेव और बेटा स्कूल चले जाते थे तो हम क्या करें। और इसी लिए हमने वहां पता करना शुरू किया की हम किस तरह का जॉब ले सकते है क्यूंकि हम पार्ट टाइम् जॉब करना ही पसंद करते है। अब चाहे इसे हमारा आलसी पन कहिये या चाहे कुछ और। १५ अगस्त २००३ को वहां पर शाम को एल.जी अपने घर पर सबको चाय पर बुलाते है वही पर हमारी मुलाकात एक महिला से हुई जो की सोशल वर्क से जुडी थी और वही उनसे बात चीत मे पता चला की डी एडिक्शन कैंप शुरू हो रहा है और हम उसे ज्वाइन कर ले। पहले तो हमने सोचा कि हम ना करें क्यूंकि शराब पीने वालों से बात करना कोई आसान काम नही है और हमे डर भी लगता था और दुसरे अंडमान इतनी छोटी जगह है कि आपको लोग कहीं भी मिल सकते है और आपके घर तक भी आ सकते है । पर फिर ये भी ख़्याल आया कि अगर हमारी मदद से किसी का घर बन सकता है तो हमे इस challange को स्वीकार करना चाहिऐ। challange इसलिये क्यूंकि इससे पहले हमने ऐसा काम किया ही नही था।

शायद आप लोगों को मालूम ना हो पर अंडमान मे शराब पीने वालों की संख्या बहुत ही ज्यादा है और इस शराब की वजह से कितने ही घर बरबाद हो जाते है। रोज घरों मे झगडे -मार पीट होना आम है। ऐसा नही है की निम्न वर्ग के लोग ही शराब पीकर शोर गुल करते है वहां तो अच्छे -अच्छे पढे -लिखे लोग भी ऐसा ही करते है। उस समय के एल .जी प्रोफ.राम कापसे थे उन्होने पुलिस और सोशल वर्क से जुडे लोगों को लेकर वहां के गोविन्द बल्लभ पंत हॉस्पिटल मे डी एडिक्शन का एक ओ.पी.डी.खुलवाया । अब चुंकि अंडमान मे किसी को पता नही था कि लोगों को शराब की इस आदत से कैसे छुटकारा दिलाया जाये तो इसलिये उन्होने पुणे के मुक्तांगन से वहां के कुछ कोउन्स्लेर्स को बुलाया जिन्होंने करीब ४० लोगों को ट्रेनिंग दी जिसमे सभी कुछ सिखाया गया कि कैसे उनसे बात करनी है कैसे उन्हें इस शराब की लत से बाहर लाना है और कैसे उन्हें वापस सामान्य जीवन जीने के लिए प्रेरित करना है।

जब इस नशा मुक्ति अभियान की खबर अखबारों मे छपी तो बहुत सारे लोग कैंप मे शामिल होने के लिए रजिस्टर करवाने आने लगे। इसमे औरतें जो अपने पति की इस लत को ,मायें अपने बेटों को और बहुत सारे आदमी जो खुद इस शराब को छोड़ना चाहते थे। कुछ लोग तो ५ साल या ८ साल की उम्र से ही शराब पी रहे थे। दर असल मे वहां पर इतनी गरीबी नही है हर आदमी के पास या तो नारियल या सुपारी के बगीचे है ज़्यादातर लोग अपने मकानों मे रहते है और कुछ कोस्तल एरिया की वजह से भी और चुंकि वहां मनोरंजन के साधन भी सीमित थे और शराब सबसे आसान तरीका माना जाता है मनोरंजन का और गम को भुलाने का भी। पिछले कुछ सालों मे तो अंडमान बहुत ही बदल गया है वरना पहले तो वहां केबल टी.वी. भी नही था।


बहुत सारे लोगों मे से १५-२० लोगों को दस दिन के कैंप के लिए बुलाया गया और उनका सुबह से शाम तक का सारा कार्यक्रम बनाया गया कि कितने बजे उन्हें उठना है, कब खाना खाना है कब exercise करना है और बात-चीत का session भी जिसमे क्लाइंट जी हां हम लोग उन्हें पेशेंट नही क्लाइंट कहते थे अपनी इस आदत और अन्य बातों के बारे मे बात करते थे , आदि-आदि । दस दिन के कैंप के बाद एल.जी.और उनकी पत्नी सभी से मिले और उन्हें उज्जवल भविष्य कि शुभकामनायें दी। और इस तरह शुरुआत हुई नशा मुक्ति आंदोलन की ।

Comments

Raag said…
बहुत ही नेक काम कर रहीं हैं आप। बधाई।
ऐसे शिविर / शिक्षा हर नगर/पंचायत में आयोजित किए जाने की जरूरत है। यदि कैम्प की सम्पूर्ण क्रियाविधि का प्रशिक्षण भी ब्लॉग पर दे सकें तो बहुत लोग यथासंभव अपने नशेबाज मित्रों/परिजनों पर आजमा कर उपकृत होंगे।
dhurvirodhi said…
This comment has been removed by the author.
काकेश said…
अच्छा लगा आपके नये काम के बारे में जानकर ..इस कार्य के लिये हमारी ओर से शुभकामनाऎं.... अपने अनुभव भी बताती रहें....
विशेष said…
बहुत अच्‍छे. मेरी बधाई स्‍वीकारें.
संतोष said…
मुझे लगता है कि आपको डी एडिक्शन कैंप का एडिक्शन हो गया है.....
अच्छा है...
Udan Tashtari said…
साधुवाद इस नेक कार्य के लिये. हमें तो ग्लानि हो रही है हम तो स्पाईसी आईस पर अलग ही कैम्प लगा कर बैठे हैं. http://food.wanderer.in/2007/05/24/welcome-to-my-bar/


:(
mamta said…
सबसे पहले हम ये बता दे कि हम अंडमान मे २००३ मे थे । इसलिये फिलहाल हम अपने को इस बधाई का हकदार नही मानते है।

हरिराम जी मेरे ख़्याल से शायद सभी जगह इस तरह के काम एन जी ओ जैसी संस्था करती है । हम आगे इस बारे मे भी चर्चा करेंगे।
धुरविरोधी जी हम विडियो तो नही लगा सकते क्यूंकि एक तो उस समय हमारे पास डिजिटल कैमरा नही था और दुसरे उस समय के फोटो तो सुनामी मे बह गए ।

संतोष जी आप कह सकते है ।

समीर जी काहे की ग्लानि ।
Shrish said…
बहुत सार्थक प्रयास। जरा कैंप की कार्यप्रणाली के बारे में भी बताएँ।

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