Friday, February 27, 2009

आज बड़े दिनों बाद किसी t.v. सीरियल के बारे मे लिख रहे है । बालिका वधू कलर्स पर आने वाले इस सीरियल मे बुधवार के दिन दिखाए गए एपिसोड को देख कर दुख भी हुआ और अफ़सोस भी हुआ । अभी तक बालिका वधू सीरियल मे जो कुछ भी दिखाया जा रहा था उसे देख कर लग रहा था कि ये सीरियल समाज की एक ऐसी परम्परा की ओर सबका ध्यान खींच रहा है जिसे आजादी के इतने सालों बाद भी मिटाया नही जा सका है । आज भी गाँव और घरों मे इस तरह की शादियाँ होती रहती है । और हर एपिसोड के अंत मे लिखे जाने वाली लाइने समाज को जागरूक करने का काम करती है ।

इन दिनों सीरियल मे सुगना जो की घर की बेटी है उसके गौने को एक हफ्ते से दिखाया जा रहा था जिसमे जब आनंदी की बाल विधवा सहेली फूली शादी की रस्मों को चोरी-छिपे देख रही होती है और दादी सा उसे देख कर अपशगुन हो गया का शोर मचाती है ।और तूफान खड़ा कर देती है । और उस एपिसोड के ख़त्म होने पर जनता की ओपिनियन पूछी जाती है कि क्या फूली का शादी मे शामिल होना अपशगुन है । अब जवाब जनता ने क्या दिया वो तो हम नही जानते है पर बुधवार के एपिसोड मे सुगना के पति प्रताप की मौत हो जाती है । वैसे अब प्रताप को मारने का कोई तुक नही था पर शायद सीरियल मे सुगना को भी दुखी और लाचार दिखाना चाहते है ।इसीलिए उसे भी बाल विधवा बना दिया । जिसकी कोई जरुरत नही थी ।

अगर विधवा फूली के शादी मे शामिल होने से वो अपशगुन नही हुआ ये दिखाते तो शायद ज्यादा बेहतर होता ।तारीफ की बात तो तब होती जब सुगना का खुशी-खुशी गौना होता और सुगना अपने पति के साथ अपनी ससुराल चली जाती

पर नही चूँकि विधवा फूली शादी मे शामिल हुई थी इसलिए अपशगुन हुआ और सुगना विधवा हो गई ।

अफ़सोस इस बात का है कि इस सीरियल ने अपनी ही बात को contradict कर दिया जहाँ एक तरफ़ तो सीरियल समाज की कुरीतियों को बदलने और दरशाने की कोशिश कर रहा है वहीं दूसरी तरफ़ उन्ही कुरीतियों को सपोर्ट भी कर रहा है

Thursday, February 26, 2009

२१ फरवरी से गोवा मे ४ दिन के कार्निवाल का जश्न शुरू हुआ था जो २४ फरवरी तक चला । पंजिम ,मडगांव,वास्को और कैलंगूत मे कार्निवल खूब मौज-मस्ती के साथ मनाया जाता है । खैर हम सभी जगह तो नही जाते है क्योंकि floats करीब-करीब वही होते है और एक जगह का देखने के बाद दूसरी जगह का देखने उतना जोश भी नही रहता है हालाँकि इस बार का कार्निवाल उतना ज्यादा पसंद नही आया क्योंकि इस बार सभी कुछ बहुत ठंडा-ठंडा यानी कम जोशीला था


इसबार २१ फरवरी को बहुत तेज धूप और इतनी ज्यादा गरमी थी कि कार्निवाल देखने का आधा मजा तो यूँ ही खराब हो गया था । हर बार हर परेड के शुरू होने का समय चार बजे होता था पर इस साल साढ़े तीन बजे परेड के शुरू होने का समय था और इस आधे घंटे के फर्क ने सारा मजा किरकिरा कर दिया था और रही सही कसर floats ने पूरी कर दी थी ।

पंजिम के कार्निवाल मे पंजिम के मेयर टोनी रोद्रिजेज़ (लाल शर्ट ),पर्यटन मंत्री मिकी (पीछे सफ़ेद शर्ट ),गोवा के गवर्नर एस.एस.सिद्धू ,और गोवा के मुख्य मंत्री दिगंबर काम ने flag off कर के कार्निवल की शुरुआत की थी ।
कार्निवाल शुरू होने के पहले नाइजीरिया के इन कलाकारों ने अपने करतबों से जनता का मनोरंजन किया

हमेशा की तरह कार्निवल मे सबसे पहले float मे kingmomo अपनी २ क्वीन के साथ आए । २००७ और २००८ केking momo और इस बार के king momo मे बड़ा फर्क था।पहले जहाँ king momo को देख कर लगता था की हाँ वाकईमे वो कोई king है वहीं इस बार king momo और उसकीक्वीन पर recession का असर दिखा क्योंकि king momoऔर उसकी दोनों क्वीन के कपडों को देख कर ऐसा ही लगामानो तख्तो ताज ख़त्म हो गया हो ।और तो और इस बार kingmomo ने डिक्री भी नही पढ़ी जबकि इससे पहले तो वो मंच केपास आकर पढ़ता था । वैसे वहां लोग कह रहे थे की flag off के समय ही उसने डिक्री पढ़ी थी ।ऊपर गोवा की एक ट्रेडिशनल float और गोवा का पारंपरिक डांस और सामने जो बिल्डिंग दिख रही है वो गोवा का पुराना सचिवालय है



जितने भी लड़के-लडकियां floats के साथ डांस करते चलते है उनमे भी कुछ ख़ास उत्साह नही दिख रहा था । हो सकता है गरमी की वजह से वो लोग भी परेशान रहे होंगे । क्योंकि आम तौर पर float पर जो लोग होते है वो भी खूब डांस करते है पर इस बार वो सब धीरे-धीरे हाथ हिला कर बस wave ही करते रहे ।वैसे फोटो से आप उतना अंदाजा नही लगा सकते है


गोवा मे गारबेज डिस्पोजल एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है ऐसा ही इस float मे दिखाया है





वास्को डी गामा की बोट इस बार कुछ छोटी हो गई थी :)

चलता फिरता सैलून



कार्निवल मे जो float निकलती है उनमे कुछ तो ट्रेडिशनल होती है कुछ इंडिविजुअल होती है । इसमे कुछ लोग फैंसी dress मे भी दिखते है ।


खैर २ घंटे चली इस कार्निवल परेड मे २६ नवम्बर को मुंबई मे हुए हमलों की भी झलक देखने को मिली थी । ।

















फोटो तो बहुत है पर सभी नही लगा सकते हैखैर अंत मे चलते-चलते इस float के संदेश के साथ

इस लिए आज के लिए इतना ही बाकी फ़िर कभी

Saturday, February 21, 2009

आज इस ब्लॉग्गिंग परिवार मे हमारा दूसरा जन्मदिन है ।अरे मतलब आज ही के दिन हमने ब्लॉग्गिंग शुरू की थी । :) इस दो साल के सफर मे हमें एक ऐसे परिवार का साथ मिला जिसमे दूरियां कोई मायने नही रखती है । और इस परिवार से एक अटूट रिश्ता बन गया है । इस परिवार के सदस्य सुख -दुःख मे हमेशा साथ खड़े नजर आते है । और अब तो चाहे वो खुशी की बात हो या गम की बात हो जब तक यहाँ पर जिक्र न कर ले तब तक मन मानता ही नही है । वो क्या कहते है की पेट मे बात पचती नही है :)

हमारी ब्लॉग्गिंग के पहले और दूसरे साल मे वैसा ही फर्क है जैसे पहले साल मे बच्चे के क्रौल करने और दूसरे साल मे बच्चे के चलने का होता हैओह हो नही समझे अरे मतलब जहाँ पहले साल मे बस -१० रीडर थे वहीं अब ४०-४७ के आस-पास रीडर हो गए है जो हमें खुश करने के लिए काफ़ी हैऔर stats काउंटर मे २५ हजार से ज्यादा का आंकडा भी दिख रहा है :)

और हाँ हमारी क्या आपने चलती ट्रेन वाली पोस्ट ने तो अब तक हमारे पोस्ट पर आई टिप्पणियों का भी रिकॉर्ड तोड़ दिया यानी २५ टिप्पणी से ज्यादा (३३ जो कि अपने आप मे एक रिकॉर्ड है )। :)

पहले साल मे जहाँ रेडियोनामा से जुड़े थे वहीं दूसरे साल मे नारी,माँ,दाल,रोटी चावल,और हिन्दी टॉकीज से जुड़े ( हालाँकि अभी तक माँ और हिन्दी टॉकीज मे कोई पोस्ट नही लिखी है । )

mamtatv , सवा सेर शौपर के अलावा hamare pets नाम का एक और ब्लॉग भी हमने (मार्च २००८ ) बनायावैसे आजकल hamare pets पर लिखना बंद है पर जल्द ही उस पर फ़िर से लिखना भी शुरू करेंगे । :)

पहले साल मे तो नही पर हाँ दूसरे साल मे हमने भी ब्लॉगर मीट करी थी जैसे फ़ोन पर मीनाक्षी,रंजना और रचना से बात और फ़िल्म फेस्टिवल के दौरान अविनाश वाचस्पति जी से मुलाकात हुई थी और इन दोनों ही तरह की ब्लॉगर मीट का अनुभव बहुत अच्छा रहा था । पर इन सभी बातों का जिक्र हमारे चिट्ठे पर इसलिए नही हुआ क्योंकि उन दिनों हम लो फ़ेज मे चल रहे थे ना:)

बीच मे - महीने (जून -दिसम्बर) हम blogging से दूर थे पर उस दौरान यदा -कदा लिखी हमारी पोस्ट पर भी आप लोगों ने टिप्पणी करके हमारा मनोबल बढ़ाया

एक बार फ़िर तहे दिल से आपका सभी का शुक्रिया जिन्होंने अपनी मूल्यवान टिप्पणियों से हमारी हौसला अफजाई की और उनका भी जिन्होंने हमारी पोस्ट को पढ़ा पर टिप्पणी नही की:)


इसलिए आप सभी बधाई के पात्र है क्योंकि आपकी खट्टी-मीठी टिप्पणियों ने ही हमें यहाँ तक पहुंचाया है और इसके लिए आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया क्योंकि अगर आप लोगों का साथ होता तो हमारा ये सफर कब का खत्म हो गया होता

Thursday, February 19, 2009

यूँ तो आईडिया के विज्ञापन बहुत अच्छे होते है और आम जिंदगी से जुड़े हुए । आईडिया फ़ोन नए-नए विज्ञापन भी नए-नए आईडिया के साथ ही बनाता है । :)

वैसे आईडिया के पिछले ads जैसे स्कूल वाला और अभी हाल मे ही नेता जी वाला ad तो पसंद आया ही पर आजकल जो t.v.पर आईडिया का नया asli democracy वाला ad आ रहा है वो हमें खूब पसंद आया है । अगर आपने नही देखा है तो एक बार देखिये । और बताइये की आपको कैसा लगा । :)

Wednesday, February 18, 2009


पांडेचेरी में हमने ज्यादा कुछ नही घूमा था क्यूंकि पांडेचेरी शाम को पहुंचे थे और अगले दिन ११ बजे वापिस चेन्नई के लिए चल दिए थे । खैर महाबलिपुरम से चलकर जब हम लोग पांडेचेरी पहुंचे उस समय शाम हो रही थी ।पांडेचेरी मे जब प्रवेश करते है तो इस शहर की खूबसूरती देखते ही बनती है एक तरफ़ दूर-दूर तक फैला हुआ समुन्द्र और दूसरी तरफ़ खूबसूरत और बिल्कुल एक ही तरह और रंग की ज्यादातर ती मंजिला बिल्डिंग और एक सा ही architecture दिखाई देता है ।
इन बिल्डिंग को देखते हुए मन प्रसन्न हो जाता है । सड़कें और शहर काफ़ी साफ़-सुथरा है । यहाँ पर आज भी लोगों को french govt. से पेंशन मिलती है । ज्यादातर मुख्य ऑफिस इसी main road पर है । सड़क के दूसरी ओर जो walking track बना है वहां बिल्कुल बीच मे महात्मा गाँधी जी की काले रंग की मूर्ति बनी हुई है । और गांधी जी के ठीक सामने सड़क के दूसरी ओर जवाहर लाल नेहरू जी की सफ़ेद रंग की प्रतिमा बनी है । नेहरू जी की मूर्ति जहाँ है वहीं पर कार पार्किंग भी है । इस track पर सुबह और दोपहर को तो फ़िर भी कम भीड़ होती है पर जैसे- जैसे शाम होने लगती है लोगों की भीड़ बढती ही जाती है । और थोडी देर बाद तो बस हर तरफ़ सिर्फ़ लोग ही लोग दिखाई देते है ।

तो सबसे पहले हम लोग होटल गए और फ़िर नहा धोकर दोबारा पांडेचेरी घूमने के लिए निकले तो पहले तो हम लोग अरबिंदो आश्रम गए क्यूंकि उस दिन वो कुछ जल्दी बंद होने वाला था ।जैसे ही अन्दर दाखिल होते है तो एक बोर्ड पर लिखा दिखता है शांत रहिये . और चूँकि वहां कुछ रीपेयर का काम भी चल रहा था इसलिए बहुत जल्दी-जल्दी देखा । वहां श्री औरबिंदो और माँ की समाधि बनी है । समाधी के पास ज्यादा देर तक रुके नही थे बस प्रणाम करके हम लोग
बाहर आ गए थे और जहाँ संग्रहालय है उसे देखा । ।पर वैसे लोग समाधी के पास ध्यान लगा कर बैठे हुए थे । और वहां अन्दर समाधी के पास फोटो खींचना शायद मना था या नही ठीक से याद नही है पर हमने कोई फोटो नही खींची ।

अरबिंदो आश्रम के बिल्कुल पास ही ये गणेश मन्दिर है ।जैसे ही मन्दिर के पास पहुँचते है तो मन्दिर के द्वार के बिल्कुल पास ही एक सजे -धजे गजराज दिखाई दिए । और देखा कि जब मन्दिर मे दर्शन करने आए लोग गजराज के आगे अपना सिर झुकाते है तो गजराज अपनी सूँड उनके सिर पर रखकर आशीर्वाद देते और फ़िर उसी सीक्वेंस मे सूँड से घास ले कर खाते । ( मात्र १० रूपये की ) पर कई बार गजराज जैसे ही हाथ मे घास को देखते फट से अपनी लम्बी सी सूँड बढाकर घास ले लेते और खा जाते थे । :)

इस घास लेने ,खाने और खिलाने वाले के सिर पर सूँड रखने मे समय का कैलकुलेशन बहुत सही होना चाहिए वरना कई बार गजराज घास खा लेते है पर खिलाने वाले के सिर पर आशीर्वाद के लिए सूँड नही रखते थे । ये हम इस लिए कह रहे है क्योंकि हमें गजराज को २ बार घास खिलानी पड़ी क्योंकि पहली बार तो गजराज ने हमारे हाथ मे घास देखते ही एक तरह से लपक ली और दूसरी बार भी घास ले ली थी । पर दूसरी बार घास खाने के बाद गजराज ने अपनी सूँड से हमें भी आशीर्वाद दे ही दिया था।और जब गजराज अपनी सूँड सिर पर रखते है तो बड़ा भारी सा महसूस होता है ।फोटो नही आ पायी क्योंकि वही timing का चक्कर जब तक कैमरा क्लिक करें तब तक तो घास खाने और सूँड से आशीर्वाद देने का पूरा कार्यक्रम हो चुका होता था । :)

इस मन्दिर मे जैसे ही प्रवेश करते है तो यहाँ भी सामने लिखा दिखता है की मन्दिर मे फोटो खींचना मना है । वैसे ये फोटो हमने मन्दिर के बाहर से खींची है और वो भी पुजारी की इजाजत लेकर ।मन्दिर के बीचों बीच बने इस सोने के स्तम्भ की लोग परिक्रमा करते है । इस मन्दिर मे जब हम लोग पहुंचे तो वहां आरती हो रही थी तो हमने शाम की आरती देखी और चूँकि इस मन्दिर के अन्दर भी फोटो खींचना मना था इसलिए यहाँ पर भी फोटो नही खींची । आरती के बाद मन्दिर के अन्दर थोड़ा सा घूमने पर वहां सोने और चाँदी के रथ दिखे जिन्हें वहां यात्रा के दौरान निकाला जाता है ।

मन्दिर की आरती देखने के बाद वहां का मार्केट घूमा और वहां के काफ़ी हाउस मे काफ़ी पी ।काफ़ी हाउस कहीं का भी हो कॉफी का स्वाद बिल्कुल वही रहता है । पांडेचेरी टेक्सटाइल के लिए बहुत मशहूर है इस लिए वहां से हमने थोडी शॉपिंग भी की । :) मार्केट घूम कर हम लोग थक गए थे सो हम लोग वापिस होटल लौट गए और फ़िर रात मे एक फ्रेंच रेस्तौरेंट मे बहुत ही बढ़िया खाना खाया और होटल जाकर सो गए । (नाम मत पूछिए क्यूंकि याद नही है )

अगले दिन सुबह-सुबह हम लोग morning walk के लिए गए और पांडेचेरी की मुख्य सड़क के साथ ही जो walking track बना है वहां walk किया और कुछ फोटो भी खींची क्यूंकि शाम को इसी track पर इतनी भीड़ थी कि सिर्फ़ लोग ही लोग दिखाई दे रहे थे ।यहाँ walk करते हुए सड़क के दूसरी ओर बना हुआ लाईट हाउस भी दिखा ।इस track से बस दो सीढ़ी उतरकर बालू मे चलकर किनारे लगे पत्थरों के पास खड़े होकर आप समुन्द्र की लहरों का आन्नद ले सकते है । सुबह के समय जहाँ वहां शान्ति थी वहीं शाम को वहां पर उमड़ी भीड़ को देख कर लगता था मानो पूरा शहर ही उमड़ आया हो ।

और इस तरह एक दिन पांडेचेरी मे बिताकर हम लोग वापिस चेन्नई लौट आए ।

Tuesday, February 17, 2009

अरे क्या आपने कभी भी ऐसा नही किया है ? आश्चर्य ! पर हमने तो बचपन मे ऐसा खूब किया है । हम लोग जब भी इलाहाबाद से बनारस ,लखनऊ ,कानपुर वगैरा जाते तो गंगा जी मे खासकर सिक्के जरुर फेंकते थे । क्यों फेंकते थे इसका कुछ ख़ास कारण था या नही पर गंगा जी मे सिक्के डालने का मतलब कुछ-कुछ दान करने से ही रहा होगा ।

कार से ज्यादा ट्रेन से सिक्का फेंकने मे मजा आता था ।चलती कार से सिक्का फेंकने पर कई बार सिक्का सड़क पर ही गिर जाता था इसलिए कभी-कभी जब गंगा जी के पुल से जा रहे होते तो पापा कार को धीमी करवा देते थे जिससे गंगा जी मे सिक्का डाला जा सके । पर इसमे उतना मजा नही आता था । पर फ़िर भी सिक्का डाले बिना नही रहते थे:)


चलती ट्रेन से सिक्के फेंकने मे बड़ा मजा आता थाउसमे हम लोग आपस मे competition भी करते थे कि किसका सिक्का बिना टकराए एक बार मे ही गंगा जी मे चला गया ।जैसे इलाहाबाद के नजदीक पहुँचने पर जब फाफामऊ आने वाला होता था तो हम मम्मी से जल्दी-जल्दी सिक्के लेकर खिड़की पर बैठ जाते (अब उस जमाने मे a.c. मे नही चलते थे :) )और जैसे ही ट्रेन पुल पर से गुजरती होती तो सिक्के को गंगा जी मे डालते । अगर सिक्का पुल से टकराता तो ठन्न्न की आवाज होती और इससे पहले की पुल ख़त्म हो फटाफट दुबारा मम्मी से सिक्का लेकर गंगा जी मे डालते थे ।

उस जमाने मे तो ट्रेन के सेकंड और first क्लास कम्पार्टमेंट मे चलने मे जो मजा आता था वो आजकल के a.c कम्पार्टमेंट मे कहाँ :)


Monday, February 16, 2009

यूँ तो आजकल लोग फैशन के लिए खूब टैटू बनवाते है कभी हाथ पर तो कभी गले और पीठ और पेट पर ।पर क्या कभी सोचा है की हम टैटू से अपना ब्लड शुगर भी चेक कर सकते है । नही ना । पर शायद भविष्य मे ऐसा हो सकेगा ।

कल टाईम्स ऑफ़ इंडिया मे और आज सुबह यहाँ के ohearldo अखबार मे ये ख़बर पढ़ी कि अब टैटू से ब्लड शुगर लेवल को भी चेक किया जा सकेगा । ऐसा कहना है अमेरिका की Draper Laboratories Of Massachusetts का जो एक ख़ास तरह की टैटू इंक बना रही है । शरीर पर इस इंक से बने टैटू के रंग बदलने से ब्लड शुगर लेवल का पता चल सकेगा । पूरी ख़बर यहाँ पढिये

और ऐसा अगर हो गया तब तो हर कोई बिना किसी हिचकिचाहट के टैटू बनवा कर घूम फ़िर सकेगा । :)



Thursday, February 12, 2009

इसके पहले भी आपने लता जी के मेरी पसंद के कुछ गीत सुने थे और आज हम लता जी की आवाज मे कुछ भजन यहाँ पर लगा रहे है । लता जी की आवाज मे तो अनगिनत ऐसे गीत है जिन्हें हजारों बार सुनने पर भी मन नही भरता है । तो अब हम ज्यादा कुछ नही लिखेंगे बस आप ये भजन सुनिए ।


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Wednesday, February 11, 2009

आम तौर पर हम कभी किसी टिप्पणी पर कोई प्रतिक्रिया नही करते है भले ही कोई चाहे टिप्पणी मे प्रशंसा हो या बुराई .और न ही कभी कुछ ऐसा लिखते है जिसमे कहीं भी महिला या पुरूष के लिए कुछ अलग माप दंड होता है । हम जो भी लिखते है बस अपने मन के भाव लिखते है ।

आज अभी-अभी जैसे ही अपने ब्लॉग पर आई टिप्पणी देखी और उसमे अरविन्द जी की टिप्पणी पढ़कर मन बहुत दुखी हो गया । कल हमारी dev d यानी bold and beautiful पर लिखी समीक्षा पर अरविन्द जी की टिप्पणी जिसे हम नीचे वैसे ही लगा रहे है
क्या यह फिल्म महिलाओं को सिर्फ़ इसलिए अच्छी लग रही है की उनकी विभीषिकाओं को यह मुखर करती है और पुरूष को नकारा साबित करती है -केवल पुरूष ही इमोशनल अत्याचारी है ? यह नारी एंगल को उभारती एक चालाक कोशिश है -पर कुछ दृश्य सचमुच सौन्दर्यबोध का कबाडा कर देते हैं पोर्नो को भीमात करते हैं !


पढ़कर ये सोचने लगे कि हमने उसमे ऐसा क्या और कहाँ लिखा जिससे उन्हें ये पुरूष विरोधी लग गई ।

अगर एक महिला होने के नाते हमें फ़िल्म पसंद आई तो उसमे हमारी ऐसी भावना कहाँ से उजागर हो गई ।

क्या फ़िल्म को सिर्फ़ एक फ़िल्म के तौर पर नही देखा जा सकता है ।

Tuesday, February 10, 2009

कल blogvani पर dev d के बारे मे अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियां पढने को मिली तो हमने सोचा कि इससे पहले हमें फ़िल्म के बारे मे और ज्यादा पता चले उससे अच्छा है कि हम भी इस फ़िल्म को फटाफट देख ले क्योंकि हमारे बेटों का कहना था कि आप रिव्यू ज्यादा मत पढिये क्यूंकि यहाँ के अखबार मे भी dev d ही छाया हुआ है । हमारे बेटों ने भी इस फ़िल्म की तारीफ की थी । और साथ ही ये भी कहा था कि कि आप कोई mind set करके मत जाइयेगा मतलब open mind से देखियेगा । :)

तो बस कल शाम हम भी चले गए dev d देखने । हमें तो लगा था कि हॉल पूरा नही तो कम से कम आधा तो भरा होगा पर हॉल मे बमुश्किल २० लोग रहें होंगे (वैसे दोस्ताना जैसी फ़िल्म मे हॉल पूरा भरा होता है ) और फ़िल्म का शो inox के सबसे बड़े ऑडी १ मे लगाया था । वैसे इस फ़िल्म के कई शो चल रहे है तो हो सकता है इसीलिए रात मे भीड़ कम थी ।

खैर चलिए बात करते है dev d फ़िल्म की । इस फ़िल्म की सबसे बड़ी खासियत ये है कि ढाई घंटे की फ़िल्म देखने के बाद कोई hang over यानी सिर भारी नही होता है और शुरू मे तो पिक्चर बहुत तेजी से आगे बढती है पर हाँ इंटरवल के बाद थोड़ा सा धीमी होती है पर इतनी नही कि आप बोर हो जाए ।

इस फ़िल्म कि ख़ास बात जो हमें लगी वो ये कि इस फ़िल्म मे डाइलोग बहुत ज्यादा न होकर गीतों के माध्यम से सीन को दरशाया गया है जो मेरे ख़्याल से नया एक्सपेरिमेंट है और चूँकि सभी गाने background मे है तो अखरते नही है वरना १८ गाने अगर हीरो-हीरोइन गाते तब तो पिक्चर के लिए इमोशनल अत्याचार कहना सही होता । :)

इस फ़िल्म मे कुछ बातें ऐसी दिखाई है जिन्हें कोई सोच भी नही सकता जैसे dev d के पिता का ,पारो का ,चंदा का और dev d का जो करेक्टर दिखाया है वो बिल्कुल ही अलग है और इसलिए फ़िल्म अलग लगती है ।पर हाँ इस फ़िल्म मे कुछ बहुत ही bold सीन भी है

acting मे तो अभय देओल ,माही और काल्की सभी अच्छे लगे , अभय देओल के face मे कुछ ऐसा है कि वो हर तरह के किरदार मे फिट बैठते है फ़िर वो चाहे manorama का इंजिनियर हो या oye lucky का lucky हो या फ़िर dev d का dev ही क्यों न हो । इस फ़िल्म मे जो सरदार जी टैक्सी ड्राईवर बने थे credits मे उनका नाम (डॉक्टर अवतार सिंह )पढ़कर तो हम चौंक ही गए थे ।

इस फ़िल्म का अंत बहुत पसंद आया क्योंकि वो बड़ा ही unexpected था और इसी लिए तो फ़िल्म बहुत पसंद आई । अनुराग कश्यप ने एक बहुत ही हट के फ़िल्म बनाई है और हम तो आप से भी यही कहेंगे कि आप अगर फ़िल्म देखने जायें तो आप भी open mind से देखने जाए वरना आपकी marji । :)

Monday, February 9, 2009

इतने दिन से प्रोग्राम बनाते -बनाते और सोचते-सोचते आख़िर कल हमने ये फ़िल्म देख ही ली । और फ़िल्म देखने के बाद लगा की चलो देख ही ली यानी कि देखनी इसलिए थी क्योंकि इतना कुछ सुन जो रक्खा था इस फ़िल्म के बारे मे । वैसे फ़िल्म बहुत ही धांसूं टाइप नही है जितना कि इसको hype किया जा रहा है । हमें कुछ बहुत ख़ास पसंद नही आई बल्कि आख़िर मे लग रहा था कि फ़िल्म थोड़ा drag on कर रही है ।

वैसे कई लोगों ने कहा है कि तकनीकी दृष्टि से ये फ़िल्म बहुत अच्छी है अब इतना तो पता नही पर हाँ जिस तरह से वर्तमान और भूतकाल को मिलाकर दिखाया है वो जरूर अच्छा है ।हाँ इसका ये आईडिया कि शो मे पूछे जाने वाले हर सवाल का जवाब जिंदगी की किसी घटना से जोड़कर दिखाना अच्छा लगा । क्योंकि हीरो पढ़ा-लिखा नही था पर तब भी उसे हर बात की जानकारी थी जो उसके जीवन मे हुई किसी न किसी घटना से जुड़ी हुई थी । फ़िर वो चाहे बढ़िया इंग्लिश बोलना हो या फ़िर general knowledge ही क्यों न हो ।

पर इसमे कुछ बातें हमें पसंद नही आई ।चलिए यहाँ एक-दो बातों का जिक्र कर देते है । अब इस फ़िल्म मे मुम्बई को जैसा दिखाया है वो तो अब सभी लोग जानते है ।इसलिए उस पर बात न करके कुछ दूसरी चीजों की बात करते है जो हमें ज्यादा ख़राब लगी ।

जैसे कौन बनेगा करोड़पति शो के दौरान अनिल कपूर का बार-बार हीरो को चाय वाला कहना खराब लगा क्योंकि हिंदुस्तान मे बने कौन बनेगा करोड़पति के शो के दौरान न तो कभी अमिताभ बच्चन ने और न ही शाह रुख खान ने कभी भी अपने किसी कंटेस्टेंट को इस तरह से संबोधित किया था यानी की कभी भी किसी के काम ,नाम या भाषा को लेकर कभी भी मजाक नही बनाया था ।पर फ़िल्म मे अनिल कपूर ने कई बार हीरो को चाय वाला कहा । और अंत मे जिस तरह से अनिल कपूर हीरो को शो न जीतने देने के लिए (हराने के लिए ) जो कुछ करता है वो बड़ा घटिया लगा

जिस तरह के गुंडे दिखाए गए है उनमे कुछ नया नही है ।महेश मंजरेकर का किरदार बहुत ही घिसा-पिटा और बोर करने वाला था । कुछ सीन देख ऐसा लग रहा था मानो किसी पुरानी फ़िल्म से उस सीन को लिया गया है जैसे बच्चों को भिखारी बनाने वाले सीन पहले की पुरानी फिल्मों मे देखने को बहुत मिलता था ।रहमान का संगीत बहुत ही आम सा लगा । कई बार तो फ़िल्म music की वजह से धीमी लगी । गाने तो बस ठीक है रिंग रिंग रिंगा गीत तो खलनायक फ़िल्म के चोली के पीछे की ही कॉपी लगा (tune और सिंगर भी वही यानी इला अरुण और अलका याग्निक )। अब भला रहमान जैसे संगीतकार जब पुराने गाने की धुन पर नया गाने बनायेंगे तो उनमे और अन्नू मालिक मे फ़िर क्या अंतर रहा ।

over all इसमे कुछ नया नही है सिवाय इसके कि इस फ़िल्म ने mumbai के धारावी को विदेशियों के लिए एक tourist place बना दिया है

ऐसा लग रहा है कि इस साल के तो सारे अवार्ड वो चाहे ऑस्कर हो या बाफ्टा ये फ़िल्म लेगी क्योंकि ये देसी दर्शकों के लिए तो बनी नही है । वैसे आम तौर पर फ़िल्म फेस्टिवल (पिछले ३ साल से देख रहे है ) वो चाहे किसी भी देश मे हो उसमे अधिकतर फिल्में गरीबी दिखाने वाली ही होती है फ़िर वो चाहे अमेरिका की हो ,ईरान की हो या कजाकिस्तान की हो और फ़िर इस फ़िल्म मे तो हिंदुस्तान की गरीबी को दिखाया है और जो अवार्ड जीतने के लिए काफ़ी है ।

इस फ़िल्म के गीत जय हो जिसके लिए रहमान को ३ और गुलज़ार साब को एक नोमिनेशन मिला है उसे आप भी सुनिए ।
और साथ ही रिंग रिंग रिंगा भी सुन लीजिये जिससे आपको पता चल जाए की रहमान भी पुरानी धुन चुराते है । वो चाहे किसी भी वजह से ।

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Friday, February 6, 2009

नोट- यहाँ ये कहना जरुरी है कि हम किसी भी धर्म या संस्कृति का अपमान करने की मंशा से नही लिख रहे है

हम हमेशा से यू.पी और दिल्ली में रहे है जहाँ किसी का भी अभिवादन हाथ जोड़ कर किया जाता है वो चाहे घर में आए हुए मेहमान हो या कहीं किसी पार्टी या फंक्शन में मिलने वाले लोग हो ।पर यहाँ गोवा में शादी-ब्याह हो,जन्मदिन पार्टी हो,या कोई फंक्शन हो hand shake करने का ही चलन है ।(वैसे तो दिल्ली मे भी इसका काफ़ी चलन हो गया है । )पर गोवा आकर हमारी इस आदत मे कुछ बदलाव आ गया है माने अब हम नमस्कार भी करते है और साथ ही साथ हाथ भी मिला लेते है । स्त्री हो या पुरूष हर कोई हाथ ही मिलाता है । अब ये बदलाव अच्छा है या बुरा नही जानते है । पर कभी-कभी ऐसे हालात हो जाते है कि बस कुछ पूछिए मत ।

और ऐसा नही है कि ये चलन सिर्फ़ कैथोलिक्स मे है यहाँ के जो भी लोकल लोग है वो सभी यही करते है । आपको शायद यकीन न हो पर हमारी खाना बनाने वाली जो catholic नही है वो भी जब किसी मौके पर जैसे जन्मदिन या नया साल होता है तो shake hand करके ही बधाई देती है ।

वैसे इस पोस्ट को लिखने का मन तो बहुत दिन से हो रहा था पर लिख नही रहे थे । खैर कुछ दिन पहले outlook (१९ जनवरी मे छपे नंदिनी मेहता के एक लेख mouth ke saudagar ) मे इस आर्टिकल को पढने के बाद इसे लिखने का मन बना ही लिया ।(इस आर्टिकल का लिंक नही लगा पा रहे है क्योंकि शायद मैगजीन छपने के एक हफ्ता या १० दिन के बाद outlook के कोई भी आर्टिकल को सिर्फ़ रजिस्टर करके ही पढा जा सकता है ।) अब गोवा में तो आप सभी लोग जानते है कि यहाँ पर पाश्चात्य सभ्यता का काफ़ी असर है ।यहाँ आम आदमी हो या बड़ा नेता या फ़िर चर्च के पादरी ही क्यों न हो हाथ मिलाने ( handshake) का काफ़ी प्रचलन है । जब हम नए-नए गोवा में आए थे तो आने के ४-५ दिन बाद ही एक फंक्शन मे गए अब हमने तो हाथ जोड़कर नमस्कार किया पर सामने वाले ने हाथ मिलाने के लिए हाथ बढ़ा दिया । कुछ सेकंड तो समझ नही आया पर फ़िर न चाहते हुए भी हमने भी हाथ आगे बढ़ा दिया । ये था हमारा पहला अनुभव । और उसके बाद तो ऐसे अनगिनत मौके आते ही चले गए । कई बार तो ऐसा भी हो जाता है कि हम नमस्ते करते है तो सामने वाले नमस्ते करते हुए shake hand करने के लिए हाथ बढ़ा देते है ।

वैसे यहाँ पर shake hand करना और cheek kissing बहुत ही आम बात है बिल्कुल western countries की तरह । और ये हम सभी जानते है की ये एक gesture है ।फिल्मों मे, t.v.मे तो बहुत देखा है और जानते है इसके बारे में , पर मुश्किल तब आती है जब हमें ऐसे हालात से दोचार होना पड़ता है ।

अभी कुछ दिनों पहले ही मे हमें cheek kissing का भी अनुभव हुआ । हम किसी के घर शादी मे गए थे जहाँ जब परिवार की महिला सदस्यों से हमारा परिचय कराया गया तो उन्होंने बड़ी ही आत्मीयता से पहले तो shake hand किया और फ़िर cheek kissing की तो हमें बड़ा ही अजीब लगा क्योंकि ये हमारे लिए बिल्कुल अप्रत्याशित था । और हम समझ ही नही पाये कि हम क्या करें । :)

और सबसे मजेदार बात ये हुई कि चूँकि हम असमंजस मे थे और ऐसा कुछ होगा इसके लिए तैयार नही थे इसलिए जब उस महिला ने हमारे एक गाल पर किस कर लिया तो हम थोड़ा पीछे की तरफ़ हो गए ये समझकर कि मिलना हो गया पर तभी उस महिला ने हमारे दूसरे cheek की ओर जब अपना cheek बढाया तो हमने हडबडाहट मे अपना पहले वाला cheek आगे कर दिया पर शायद वो महिला समझ गई थी इसलिए उसने हमारे दूसरे cheek पर किस किया । और उसके बाद तो दूसरी और महिलाओं से भी shake hand और cheek kissing करके ही मिले क्योंकि हमारी नमस्ते के जवाब मेcheek kissing ही हुई ।अरे हंसने की कोई जरुरत नही है :)


और नई जेनरेशन मे तो ये फैशन नही आम होता जा रहा है । गोवा मे रहते हुए इतने दिन हो गए है पर अभी भी कई बार इस तरह कि परिस्थिति मे जब फंस जाते है तो सोच नही पाते है कि क्या करें । अब आप चाहे तो हमें देहाती समझे या कुछ और :)

Thursday, February 5, 2009

ओह हो कन्फुज मत होइए ये दोनों एक नही अलग-अलग गीत है जिन्हें लता मंगेशकर ने गाया है । लता मंगेशकर के अपने पसंदीदा गीतों की श्रंखला को आज थोड़ा और आगे बढाया है ।

इसमे जो आखिरी गीत मन डोले है ,उसे बरसात के दिनों मे या रात मे बजाने को मना किया जाता था क्योंकि ऐसा कहा जाता था कि इसमे बजने वाली बीन को सुनकर कहीं कोई नागिन या नाग न आ जाए । हालाँकि ऐसा कभी हुआ नही था । :)

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Wednesday, February 4, 2009

कल शाम टी.वी . पर एक न्यूज़ देख कर मन तड़प गया और सोचने पर मजबूर हो गए की ये कानून के रक्षक है या भक्षक । उत्तर प्रदेश के इटावा के एक पुलिस स्टेशन की ख़बर दिखाई जा रही थी जहाँ ७ साल की एक छोटी सी लड़की को २ पुलिस वाले (जो उमर मे काफ़ी बड़े लग रहे थे ) उसके सर के बाल को खींच-कर उससे सच उगलवाने की कोशिश कर रहे थे की उसने चोरी की है ।इन दो पुलिस वालों मे से एक ने तो बच्ची के बाल जोर-जोर से खींच कर छोड़ दिया था परन्तु दूसरे पुलिस वाले ने अपनी वरदी का पूरा जोर उस बच्ची पर ही निकलना ठीक समझा और इसके लिए उसने बच्ची के बालों को दोनों हाथों से पकड़ कर बच्ची को ऊपर उठा कर उससे सच उगलवा रहे थे । और वो बच्ची जोर-जोर से चीख रही थी पर उसकी चीखें उन लोगों के कान तक नही पहुँच रही थी क्यूंकि आख़िर उन्होंने एक चोर को जो पकड़ लिया था और सारी ताकत उस पर ही निकालनी थी ।क्या एक पल के लिए भी उन्हें ये एहसास नही हुआ की वो एक छोटी सी बच्ची है

काबिले तारीफ़ है इन पुलिस वालों की सच उगलवाने की तरकीब
हो सकता है की इस बच्ची ने चोरी की हो पर उसकी ऐसी निर्मम सजा ।


उस न्यूज़ मे कुछ और भी पुलिस वाले दिखे थे पर उनमे से कुछ एक ने तो वहां से हट जाना ही बेहतर समझा तो कुछ ने इस तमाशे का पूरा मजा लिया । हालाँकि इन दोनों पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया गया है पर अफ़सोस इस बात का है की ये पुलिस वाले लाचार या गरीब व्यक्ति पर ही अपने डंडे और ताकत का जोर दिखा पाते है । और कितनी ही बार हम इस तरह की ख़बर पढ़-देख चुके है ।

Tuesday, February 3, 2009

पिछले कुछ दिनों से देश मे लोक सभा चुनावों को लेकर सभी राजनैतिक पार्टियाँ सक्रिय हो गई है क्यूंकि ऐसी उम्मीद लग रही है कि चुनाव अप्रैल-मई तक हो जायेंगे । चुनाव मे टिकट के लिए हर नेता पूरी जद्दोजहद से जुट जाते है । चुनाव के लिए अगर टिकट न मिले तो या तो किसी दूसरी राजनैतिक पार्टी मे जा मिलते है या फ़िर अपनी ही नई पार्टी बना लेते है ।

हर कोई वो चाहे नेता हो या फ़िर जनता हो ,कहती है कि युवा पीढी को आगे आना चाहिए पर जब चुनाव मे टिकट देने की बात आती है तो वही सारे पुराने लोगों को टिकट दिया जाता है जो पिछले बीसियों साल से चुनाव लड़ते आ रहे है । वो चाहे भैरों सिंह शेखावत हो या चाहे प्रणब मुखर्जी हो या चाहे सोमनाथ चटर्जी हो या फ़िर अडवाणी जी या मन मोहन सिंह जी ही क्यों न हो । अर्जुन सिंह हो या करूणानिधि हो या बंसी लाल या फ़िर मोती लाल वोरा या मुरली मनोहर जोशी या अशोक सिंघल ही क्यूँ हो ।ऐसे नेताओं की लिस्ट बहुत लम्बी है । लिखने लगे तो अंत नही होगा । अभी हाल ही मे हम एक मैगजीन मे पढ़ रहे थे की भैरों सिंह शेखावत जो उप राष्ट्रपति रह चुके है वो एक बार फ़िर चुनाव लड़ने जा रहे हैऔर जो ८० साल के ऊपर हैआख़िर क्यों ?

आख़िर जब हर नौकरी मे रिटायरमेंट की एक एज होती है तो फ़िर क्या इन नेताओं को रिटायर नही होना चाहिए ?
जब हर जगह काम करने वाले को ६०-६५ साल बाद आराम करने को कहा जाता है यानी रिटायर कर दिया जाता है तो भला इन नेताओं को भी ६०-६५ साल बाद रिटायर कर देना चाहिए ।


और तो और अगर ये लोक सभा का चुनाव नही जीत पाते है तो राज्य सभा मे नोमिनेट होकर जाते हैनेताओं का भी अपने cricketers (सचिन वगैरा ) जैसा ही हाल है कि अपने आप तो राजनीति से अलग होते नही है और अगर कोई उन्हें अलग करना चाहे तो एक नया गठबंधन करके वापिस राजनीति मे आ जाते है क्योंकि राजसी ठाठ-बाट और सत्ता का मोह इनसे छूटता नही है ।

घूम-घूम कर यही नेता चुनाव लड़ते है जीतते है और मंत्री बनते हैकम से कम पिछले ५० साल से तो ऐसा ही होता रहा दीखता हैअब ये मत कह दीजियेगा old is gold . :)

Monday, February 2, 2009


चलिए अपनी पांडेचेरी ट्रिप को आगे बढाते है और snake and crocodile farm से आगे बढ़ते है और आज महाबलीपुरम चलते है । चेन्नई से करीब ५०-६० की.मी.की दूरी पर महाबलीपुरम स्थित है । और इसी रास्ते में karting track भी पड़ता है अगर आप karting का शौक रखते हो तो यहाँ पर भी थोडी देर रुक कर karting का मजा ले सकते है ।रास्ते मे खाने-पीने की बहुत अच्छी-अच्छी जगहें यानी होटल पड़ते है ।

पल्लव राजा ममल्ला के नाम पर इसका नाम ममाल्लापुरम पड़ा था जिसे आज हम सभी महाबलीपुरम के नाम से जानते है । इसके ज्यादातर मन्दिर का निर्माण सातवीं और नवीं शताब्दी के बीच में हुआ था । महाबलीपुरम में अधिकतर मन्दिर रॉक-कट और मोनोलेथिक type के है । पत्थरों को काटकर बनाई गई इन मूर्तियाँ मे न केवल पल्लव शासन की कला देखने को मिलती है बल्कि यहाँ पर द्रविण कालीन और बौद्ध धर्म कालीन कला भी देखने को मिलती है । हर मंदिर मे रेत मे छोटे-बड़े आकार के पत्थर देखे जा सकते है ।

पांडेचेरी जाते समय एक कट से थोडी दूर अन्दर (५-७ की.मी ) महाबलीपुरम के रास्ते जाने पर आपको सड़क के किनारे मूर्ति बनाते लोग भी नजर आयेंगे ।और लाइन से कुछ दुकानें भी नजर आती है जहाँ गणेश जी की मूर्ति दिखती है तो वहां भगवान बुद्ध की मूर्ति भी दिखती है और साथ ही टब भी दिखते है । यहाँ पर अलग-अलग कई मन्दिर बने है ।ये सभी मन्दिर थोडी-थोडी दूरी पर बने है इनमे कुछ मुख्य है जैसे पंच रथा मन्दिर ,थ्रिकदामाल्लाई मन्दिर, वराह केव मन्दिर ,शोर (shore )मन्दिर क्यूंकि ये समुन्द्र के किनारे है ।

जैसे ही महाबलीपुरम के पहले मन्दिर के सामने पहुँचते है तो आपका स्वागत यहाँ पर खड़े सामान बेचने वाले करते है जिनसे लौटने पर अगर आप चाहें तो कुछ सामान खरीद सकते है । जैसे पत्थर के बने हुए गणेश जी की अनेक रूपों मे बनी हुई छोटी-छोटी मूर्तियां और पत्थर के बने हुए १०-१२ हाथी के गिफ्ट पैक बेचते है जिसका दाम १०० रूपये बोलते है और मोलभाव करने पर २५ रूपये मे देते है ।मोलभाव की बात इसलिए कह रहें है क्योंकि हमने २५ रूपये मे खरीदा था । खैर इन बेचने वालों से जैसे ही आगे बढ़ते है तो कुछ भूरी सी लाल रंग की रेत नजर आती है और दो मन्दिर के बीच एक शेर की बड़ी से पत्थर की मूर्ति नजर आती है और जब इस शेर को देखते हुए आगे बढ़ते है तो दूसरी तरफ़ शेर के ठीक पीछे एक विशाल हाथी की मूर्ति नजर आती है । यहाँ पर चारों ओर बड़े-बड़े पत्थर के बीच मे से घूमते हुए ऊपर की तरफ़ थोड़ा बढ़ने पर नंदी बैठी दिखाई देती है ।

इसी में आगे five rathas मन्दिर पड़ता है जिन्हें ५ पांडवों यूधिष्ठिर ,भीम,अर्जुन,नकुल,सहदेव और द्रौपदी के नाम पर रक्खा गया है । इनकी खासियत ये है कि इन सभी रथों को एक साथ नही बल्कि अलग-अलग बनाया गया है और हर एक को बनाने के लिए एक बड़े पत्थर का इस्तेमाल किया गया है ।

इस मन्दिर से बाहर निकल कर जब दूसरे मन्दिर की ओर जाते है तो रास्ते मे सड़क के किनारे पत्थर पर बनी हुई कलाकृति दिखाई देती है जो की बहुत ही खूबसूरत लगती है क्यूंकि इनके आगे छोटा सा हरा भरा बगीचा दिखता है और उसके पीछे दीवार पर बहुत सुंदर कलाकृति बनी नजर आती है । जिसमे हाथी अपने परिवार के साथ चलता हुआ बनाया गया है ।(इसका नाम याद नही है )

इस मन्दिर से आगे जाने पर एक और मन्दिर पड़ता है जहाँ हरियाली के नजारे का आनंद लेते हुए आगे बढ़ा जा सकता है ।ज़ब हम लोग यहाँ पहुंचे तो इस मन्दिर मे पुजारी पूजा करके निकले ही थे ।और उन्होंने मन्दिर पर ताला लगा दिया था । इस मन्दिर के आगे थोडी सी चडाई पड़ती है जहाँ से ऊपर जाने पर लाईट हाउस दिखता है और वहीं पर बने मन्दिर के बाहर बंदिर भी दिखाई देते है । :)

इसी चडाई के रास्ते आगे जाने पर ये एक बड़ा सा गोल पत्थर दिखता है जिसे नीचे से देखने पर लगता है की कहीं ये लुढ़कना न शुरू कर दे । हालाँकि कुछ लोग धूप से बचने के लिए जैसे ये बकरी उसके नीचे बैठी है वैसे बैठते है और बाकी हमारे जैसे पर्यटक फोटो खींचते है । :)

इन सबको देखते हुए हम लोग पहुंचे मुख्य मन्दिर मे जहाँ कार से उतरने के बाद थोडी दूर पैदल चलना पड़ता है यहाँ से पैदल चलना बिल्कुल भी नही अखरता है क्यूंकि सामने खूबसूरत मन्दिर दिखाई देता है और जैसे-जैसे मन्दिर के पास पहुँचते जाते है तो मन्दिर के साथ-साथ समुन्द्र की ठंडी हवा स्वागत करती है । यहाँ पर एक बीच मे कुंड भी बना है और इस कुंड के ठीक पीछे मन्दिर बना हुआ है ।मन्दिर के पास ही एक बहुत बड़े सिंह की मूर्ति भी बनी हुई हैइसमे २ मन्दिर शिव जी और एक मन्दिर विष्णु जी का है । इस मन्दिर के अगर बिल्कुल किनारे जाए तो मन्दिर के चारों ओर तार लगे हुए है और तार के उस पार समुन्द्र है । और इन्ही तारों के पार औरतें कई तरह के शंख बेचती हुई मिलेंगी । और मोलभाव तो यहाँ भी करना पड़ता है । वैसे हमने कोई भी शंख नही खरीदा । :)
पर आप चाहें तो जरुर खरीद सकते है
और इस तरह सारे मन्दिर घूम कर हम लोग चल दिए पांडेचेरी की ओर ।