Friday, September 28, 2007

आज हम कुछ और गणेश चतुर्थी की फोटो लगा रहे है।जो गोवा मे अलग-अलग जगहों पर और कुछ अलग सी चीजों को इस्तेमाल करके बनाया गया है। इनमे गणेश जी के विभिन्न रुप दिखते हैऔर साथ ही हर मूर्ति मे कुछ नया सा हैयहां घरों मे रखे जाने वाले तथा पंडालों मे स्थापित गणेश की प्रतिमा और सजावट के लिए प्रतियोगिता रखी जाती हैभाई हमने तो इतने विविध रुपी गणेश पहले कभी नही देखे थे ,हो सकता है आप लोगों ने देखे हो पर फिर भी हम इन्हें आप लोगों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैऔर हाँ किसी भी फोटो को अगर आप बडे साइज मे देखना चाहते है तो उस फोटो पर क्लिक कर दीजियेगा


इस पहली फोटो मे गणेश जी के साथ ही अन्य भगवानों को भी दिखाया गया हैऔर इसे पंजिम के पुलिस स्टेशन मे रखा गया थायहां गोवा के सभी पुलिस स्टेशन के बीच सबसे सुन्दर मूर्ति की प्रतियोगिता भी होती हैये मूर्ति पंजिम के ही एक पंडाल की है जिसमे साई बाबा को दिखाया गया है



इस मूर्ति मे गणेश जी को दुर्गा रुपी दिखाया गया हैये मूर्ति पंजिम के मारुति मंदिर मे स्थापित की गयी थी


ये मूर्ति ऊन से बनाई गयी है



इस मूर्ति मे गणेश जी को विष्णु के मत्स्यरूपी अवतार मे दिखाया गया हैऔर मूर्ति के पीछे नाव मे जो लोग दिख रहे है वो इसलिये क्यूंकि मूर्ति की देखभाल भी जरुरी हैऔर ये मूर्ति विसर्जन के लिए कहीँ और ना लेजाकर यही इसी पानी मे विसर्जित कर दी गयीऔर हाथ मे जो चक्र है वो घूमता रहता है


और सबसे ज्यादा चर्चा मे रही गणेश जी की ये मूर्ति जिसे काजुओं से बनाया गया हैऔर इसे बनाने मे २८ दिन लगे थेऔर क्या आप अंदाजा लगा सकते है की कितने काजू लगे होंगेचलिए हम बता देते है वैसे हमे तो ये जानकार कुछ आश्चर्य हुआ था इसमे करीब ४१००० किलो काजू लगे हैऔर इस मूर्ति का वजन ४७ किलो हैऔर अंदाजा लगाइये की कितने मूल्य के काजू लगे होंगेयही कोई ९८०००क्यों चौंक गए ना

वैसे ये फोटो डार्क है क्यूंकि वहां काफी अँधेरा सा था

और हाँ पिछली गोवा वाली पोस्ट की फोटो भी उस पोस्ट मे अपलोड कर दी है जो गायब हो गयी थी

Tuesday, September 25, 2007

कल के twenty-२० मैच मे यंग टीम इंडिया ने चक दे इंडिया को सही अर्थों साबित कर दिया है और पुरे देश-विदेश मे सिर्फ चक दे इंडिया ही सुनाई दे रहा है। क्या जीत थी .उफ़ इतनी रोमांचक कि हर बॉल पर लगता की अब गए की तब गए।पर आख़िर मे टीम मे नए आये जोगिंदर ने विकेट लेकर भारत का विश्व चैम्पियन बनने का सपना साकार कर दिया।चौबीस साल लग गए विश्व चैम्पियन बनने मेइधर इंडिया बना विश्व चैम्पियन और उधर पूरा देश पटाखों की आवाज से गूँज गया।

बी.सी.सी.आई.ने इन खिलाड़ियों को १२ करोड़ का इनाम देने की घोषणा कर दी हैऔर ये टीम इनाम की हकदार भी हैयुवराज को स्पोर्ट्स कार और एक करोड़ का इनाम भी दिया जाएगाक्या बात हैबल्ले-बल्लेधोनी की कप्तानी मे टीम इंडिया ने तो कमाल ही कर दियापहली कप्तानी मे विश्व कप जीतना किसी कमाल से कम तो है ही नहीइस बार तो जितनी टीम की तारीफ की जाये वो कम हैऔर धोनी ने जीतने के बाद भी जैसा संतुलन बनाए रखा वो काबिले तारीफ हैऔर जैसा धोनी ने कहा की वो हमेशा इस जीत को याद रखेगातो इस जीत को धोनी क्या सारे हिन्दुस्तानी हमेशा याद रखेंगें



सच जीत की ख़ुशी हर हार को भुला देती है

अब तो ये देखना है की आने वाली वन डे श्रंखला के लिए इनमे से कितने लोगों को चुना जाता है या फिर वही पुरानी टीम ही खेलने जायेगी। ।क्यूंकि इस टीम को बिल्कुल अनदेखा भी नही किया जा सकता हैयूं हार-जीत तो खेल का हिस्सा है पर अगर नयी टीम एक बार को हारती भी है तो ये माना जा सकता है की उनमे अनुभव की कमी है पर पुराने मझे हुए खिलाड़ियों के खराब प्रदर्शन पर दुःख तो होता ही है

सारे चैनल तो मैच दिखा ही रहे थे पर आज तक पर तो मैच जीतते ही सभी ने वो चाहे कपिल हो या मदन लाल या उनके रिपोर्टर जैसे दीपक चौरसिया,रितुल,सोनिया सिंह ,वगैरा ने जो नाचना और शोर मचाना शुरू किया की उसका नशा आज भी दिख रहा था सुबह तो न्यूज़ रीडर का गला ही बैठा लग रहा था और वो न्यूज़ ऐसे पढ़ रही थी मानो सो रही होकल ही सारा josh दिखा दिया थापर क्या नशा था जीत काहर कोई इस नशे मे डूबा हुआ

ये सही है की हार को स्वीकार करना बहुत कठिन होता है पर कल जिस तरह शोहेब मलिक ने रवि शास्त्री से बात करते हुए कहा उसे सुनकर कुछ अजीब लगा था और इसका जिक्र यहां पर किया गया है


चक दे इंडिया फिल्म ऐसे समय मे आयी है की हर जगह चक दे इंडिया ही हो रहा हैवो चाहे फुटबाल हो या हॉकी हो या फिर क्रिकेटऔर आज कल तो हर समय इसके गाने और डाएलोग ही हर जगह कोट किये जा रहे हैऔर शायद ऐसा पहली बार हुआ है की इन तीनो खेलों मे हिंदुस्तान ने जीत हासिल की है

सभी यंग टीम इंडिया के खिलाड़ियों और हिंदुस्तानियों को टीम इंडिया की जीत की बहुत-बहुत बधाई

अंत मे एक बार फिर से जीत का जश्न देख लिया जाये






Monday, September 24, 2007

कल रात दार्जिलिंग के प्रशांत ने शिलोंग के अमित पाल को एस.एम.एस.के जरिये होने वाली वोटों की गिनती मे पीछे छोड़ दिया और सिपोय प्रशांत बन गए तीसरे इंडियन आइडल। सात करोड़ वोट बाप रे ऐसा लगता है की लोग सारे काम-धंधे छोड़ कर सिर्फ एस.एम.एस ही करने मे लगे थे। जहाँ तक हमे याद है इतने ज्यादा वोट तो हिंदुस्तान की जनता ने ताज महल के लिए भी नही किया था।यहां देश से बड़ा राज्य हो गया लगता है क्यूंकि जिस तरह से दार्जिलिंग और शिलोंग के लोगों ने वोट किया है ये सात करोड़ वोट यही सच्चाई बताते है। पर ज़ी के शो सा.रे.गा.मा.पा. के विश्व युद्ध से छत्तीसगढ़ की सुमेधा शो से बाहर हो गयी इसलिये नही की वो खराब गाती थी ( वो सबसे अच्छा गाती थी) बल्कि इसलिये बाहर हो गयी क्यूंकि उन्हें छत्तीसगढ़ से वोट नही मिले और जैसा की उनके पिता ने कहा की छत्तीसगढ़ मे ६५ जगहों पर ज़ी टी.वी.नही आता है और लोग नही जानते है की ज़ी पर ऐसा कोई शो हो रहा है। हारने या जीतने पर लोग देश की जनता का नही अपने प्रदेश की जनता को ही श्रेय देते है। पर कोई ये तो बताये की आख़िर वो टॉप फाइव तक कैसे पहुंची ?


वैसे एस.एम.एस करने की जैसी दीवानगी दार्जिलिंग के लोगों मे देखने को मिली थी उसके बारे मे तो सभी जानते है। किस तरह दार्जिलिंग मे लोगों ने एस.एम.एस बूथ बनाए थे प्रशांत को वोट करने के लिए, जहाँ चौबीस घंटे मे कोई भी कभी भी जाकर वोट कर सकता था।और लोग भी लगे थे स्कूल के बच्चे,लड़के,लडकियां ,बडे,छोटे हर कोई वोट ही कर रहा था। काश ऐसी दीवानगी किसी सार्थक कार्य के लिए भी लोग दिखाएँ। वैसे प्रशांत जीतता या अमित फायदा तो मोबाइल कंपनी और सोनी टी.वी.को ही होना था और हुआ भी है। अरे भाई सात करोड़ एस.एम.एस से होने वाली कमाई तो इन्ही लोगों की जेब मे जायेगी ना।

चले सोनी के इंडियन आइडल का तो फैसला हो गया अब ज़ी और स्टार के विजेता देखें कौन बनता है। पर क्या ये सारे विजेता बडे गायक या गायिका भी बनते है या वो इन प्लेटफार्म का इस्तेमाल सिर्फ लोगों मे पहचान बनाने के लिए करते है। जैसे ज़ी के एक मयूजिकल शो मे आयी लखनऊ की ट्विंकल जो आजकल ज़ी के ही एक सीरियल बेटियाँ मे एक्टिंग कर रही है। क्यूंकि शायद उन्हें लगा होगा की सिंगर बनने से ऐक्टर बनना ज्यादा आसान है। इसीलिये उसने संगीत छोड़ कर एक्टिंग करना शुरू कर दिया है।जितने भी विजेता हुए है वो कहॉ है उन्हें ढूंढ़ना पड़ता है । वैसे सोनी के पहले इंडियन आइडल अभिजीत सावंत तो फिर भी सुनाई देते है पर संदीप आचार्य कहॉ है पता नही।हो सकता है की हम गलत हो. और फ़ेम गुरुकुल वाले काजी तौकीर और रुप रेखा बनर्जी याद है या भूल गए। आज कहां है या उनका कौन सा एलबम आया था लोगों को शायद ही याद होगा। वैसे अभी चंद रोज पहले काजी का किसी अखबार मे interview छपा था जिसमे उसने बडे ही शान से कहा की फ़ेम गुरुकुल का प्लेटफार्म तो उसने इसी लिए चुना था जिससे लोग जिसमे जनता और फिल्म वाले दोनो आते है उसे पहचान ले क्यूंकि वो सिंगर से ज्यादा ऐक्टर बनना चाहता था और इससे अच्छा प्लेटफार्म उसे भला कहां मिल सकता है। और अब वो किसी फिल्म मे एक्टिंग भी कर रहा हैजब वो आख़िरी तीन मे आया था तो सबसे ज्यादा जावेद अख़्तर खुश हुए थे और कहा था की जीत हमेशा कछुए की ही होती हैपर क्या उन्हें ये पता है की आज वो काजी जो उस समय सिर्फ और सिर्फ एक सिंगर बनने की खाव्हिश जता रहे थे उसने सिंगिंग छोड़कर एक्टिंग कर कर दी है

वैसे ज़ी के कुछ कलाकार तो संगीत के क्षेत्र मे नाम कमा रहे है जैसे सुनिधि चौहान , कुनाल गान्जावाला और श्रेया घोषाल इसके उदहारण है। पर फिर भी कई बार जीत का असली हकदार वोटों की वजह से हार जाता है।


Friday, September 21, 2007

उत्तर भारत में तो हरतालिकातीज मनाई जाती है जिसका जिक्र ज्ञानदत्त जी ने अपनी पोस्ट मे किया था।और हम भी तीज करते है और इस दिन गुझिया ,मालपुआ वगैरा बनाते है और पतिदेव का खर्चा भी करवाते है। वैसे दिल्ली वगैरा मे खोया मिलने मे दिक्कत नही होती है पर यहां गणेश चतुर्थी की वजह से खोया मिलना जरा मुश्किल होता है। जहाँ उत्तर भारत मे महिलाएं तीज की खरीददारी मे व्यस्त थी वहीँ यहां गोवा मे लोग गणेश चतुर्थी की तैयारी मे लगे हुए थे।क्यूंकि गणेश चतुर्थी यहां का बड़ा त्यौहार माना जाता है।ज्यादातर लोग अपने घरों मे भी गणेश की स्थापना करते है। आप कहीँ भी जाएँ हर तरफ भीड़ क्या सब्जी मंडी क्या कपडे की दुकाने। बाजार मे हर तरफ रौनक दिख रही थी।और मिठाई की दुकानों मे तरह-तरह के लड्डू,मोदक बिक रहे थे

यहां पर गणेश चतुर्थी डेढ़ दिन से लेकर ग्यारह दिन तक मनाई जाती हैजो लोग घर मे गणपति की स्थापना करते है वो या तो डेढ़ दिन या पांच दिन मे मूर्ति का विसर्जन कर देते है। पर सार्वजनिक स्थलों पर होने वाली पूजा आम तौर पर नौ या ग्यारह दिन तक चलती है।वैसे margaon मे ज्यादा कैथोलिक रहते है पर फिर भी वहां भी गणेश चतुर्थी की ख़ूब धूम दिखाई देती है। ये दोनो फोटो margaon की ही है।








जहाँ भी गणेश जी की मूर्ति स्थापित करते है चाहे घर हो मंदिर हो या फिर कोई सार्वजनिक स्थल जैसे पार्क आदि मे हर जगह भगवान् की मूर्ति के ऊपर मातोली (maatollई) बाँधी जाती है। ये maatolli विभिन्न प्रकार के फल और सब्जियों से बनती है। । वैसे maatolli हमने पहली बार यहीं पर सुना और देखा है क्यूंकि दिल्ली वगैरा मे इतना ज्यादा देखने को नही मिलता है। इन फोटो मे आप maatolli मे बांधे जाने वाले फल वगैरा देख सकते है।
पंडालों मे तो पूरे समय गणेश स्तुति बजती रहती है साथ ही घुमत और तासों की आवाज माहौल को पूरी तरह से भक्तिमय कर देती है।

यहां पर तरह- तरह के गणेश देखने को मिलते है और हमे लगता है की ये शायद इको-फ़्रेंडली भी है।यूं तो गोवा मे हर जगह गणेश दिखते है पर यहां मार्सेल(marcel) नाम की जगह या यूं कहें की एक छोटे से गाँव मे आपको हर दस कदम की दूरी पर गणेश प्रतिमा के दर्शन होते है। marcel के लिए लोग कहते है की यहां हर घर मे गणेश स्थापित होते है और हर साल उनके नए-नए रुप देखने को मिलते है। ये नीचे जो फोटो आप देख रहे है ये marcel की ही है। तो चलिए कुछ अलग-अलग से गणेश जी की फोटो जो हमने यहां घूमते हुए खींची है आपके लिए प्रस्तुत है

जैसे ये वाले गणेश जी थर्माकोल से बने है। इनकी ऊंचाई करीब बीस फ़ीटहै
ये वाले स्पौंज से बने है। और इन्हें सब्जियों का आकर दिया गया है


ये
वाले गणेश जी बालू से बने हुए है



यहां तक की गणेश चतुर्थी मे पहले दो दिन तो अधिकतर दुकाने बंद ही रहती हैऔर कुछ तो पांच दिन तक बंद रहती हैआज के लिए बस इतना ही बाक़ी की कुछ और फोटो हम कल लगाएंगेक्यूंकि अब हम फिर से घूमने जो जा रहे है अरे मतलब गणेश उत्सव मनानेवो क्या है ना यहां बिल्कुल छुट्टी और उत्सव का माहौल रहता हैहर कोई छुट्टी के मूड मे रहता है वो चाहे कोई भी काम करता हो





Thursday, September 20, 2007

ये पंक्तियाँ देव आनंद की फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा के गाने की है जो उस समय उस फिल्म मे तो हिप्पियों के संदर्भ मे गाया गया था पर आज राम सेतु विवाद को पढ़-सुनकर भी यही कहने को मन कहता है।


राम का अस्तित्त्व था या नही ये बहस अभी और ना जाने कितने दिन चलेगी। पर क्या ऐसा कह देने भर से राम का अस्तित्व ख़त्म हो जाएगा। और बहस चले भी क्यों ना आख़िर राजनीति मे तो हर कुछ जायज है।क्यूंकि सरकार और विरोधी पक्ष का यही तो काम है लोगों की भावनाओं से खेलना। जब देखो तब एक शगूफा छोड़ देती है। अगर सरकार चाहेगी तो राम सेतु की जगह सेतुसमुन्द्रम शुरू होकर ही रहेगा चाहे कोई कुछ भी कहता रहे।

आजकल तो हर कोई राम के अस्तित्व को नकार सा रहा है। कल करूणानिधि और शरद यादव भी ऐसी ही कुछ बातें कर रहे थे।पर आख़िर राम के अस्तित्व पर इतना ज्यादा विवाद होना कहां तक तर्क संगत है। क्या लोगों की भावनाओं की कोई कीमत नही है। राम थे या नही ये कौन निर्धारित करेगा ?

ये नेता जिनमे से आधे से ज्यादा लोगों के नाम मे कहीँ ना कहीँ राम शब्द आता है।और नवरात्रि हो या दशहरा हो ये नेता राम की पूजा करते हुए ही दिखते है। क्यों? जब राम ही नही तो पूजा किसकी करते है।


किस आधार पर शहरों,गांवों,इत्यादी के नाम राम के नाम पर रक्खे गए है।अगर राम थे ही नही तो ये नाम कहां से आया सबसे बड़ा सवाल तो ये भी है।क्यूंकि यूं ही किसी आम आदमी के नाम के ऊपर तो जगहों के नाम नही रक्खे जाते है। हाँ अब तो ऐसा लगता है कि राम के अस्तित्व को लोग तभी मानेगे जब राम पर या तो कोई विदेशी आकर हम हिंदुस्तानियों को बतायेगा कि हाँ राम थे और उन्होने किस तरह रावण से युद्ध किया था और किस तरह से उन्होने तीर चलाकर समुन्द्र पर सेतु का निर्माण किया था। बिल्कुल उसी तरह जैसे रंग दे बसंती फिल्म ने लोगों मे देश भक्ती की भावना जगाई या फिर मुन्ना भाई ही राम का उद्धार कर सकते है।अब वो जमाना गया जब राम लोगों का उद्धार किया करते थे। और शायद कलयुग इसीको कहते है।

Thursday, September 13, 2007

हमने कुछ समय पहले डी-एडिक्शन के बारे मे लिखा था की हम किस तरह से इस डी-एडिक्शन कैंप से जुडे थे।जिस तरह हर संस्था का कोई नाम होता है ठीक उसी तरह इस संस्था का नाम साथी रक्खा गया था । और अंडमान मे पोर्ट ब्लेयर के जी.बी.पंत हॉस्पिटल के कमरा नम्बर ४७ मे ओ.पी.डी.शुरू की गयी थी ।

जिस तरह किसी भी काम को शुरू करने के लिए सबसे पहले उसकी तह तक पहुँचना बहुत जरुरी होता है ठीक उसी तरह डी-एडिक्शन मे सबसे पहले ये जानना होता है की आख़िर व्यक्ति को शराब के नशे की आदत कैसे पड़ी। यूं तो शराब पीने के लिए कोई बहाने के जरुरत नही होती है पर फिर भी कुछ ऐसे कारण होते है जिन्हे लोग समझते है कि उन कारणों की वजह से ही उन लोगों ने शराब पीना शुरू किया ।यूं तो पीने के लिए कोई भी कारण नही होता है पर फिर भी लोग ढेरों कारण ढूँढ लेते है। और ऐसे ही कुछ कारण यहां पर हम लिख रहे है जो हमे ओ.पी.डी.मे आये हुए लोगों ने बताये थे।

१ )ख़ुशी मनाने के लिए।
२ )दोस्तो का साथ देने के लिए
३)दुःख भुलाने के लिए।
४)बाप शराबी है।
५)बीबी से पटती नही है।
६)पारिवारिक कलह के कारण।
७)ऑफिस मे अधिक काम होना।
८ )थकान मिटाने के लिए। (ये अक्सर लेबर क्लास कहता है )
९ )मजे के लिए।
१० )शराब के बिना रह नही सकते है। (हर नशा करने वाला ऐसा ही कहता है )
११)और तो और सुनामी के बाद तो लोगों ने डर की वजह से भी पीना शुरू कर दिया था।


ऐसे ही और ना जाने कितने कारण लोग ढूँढ लेते है शराब पीने के लिए। वो एक गाना भी है ना कि
पीने वालों को पीने का बहाना चाहिऐ बिल्कुल सही है।

किसी भी नशे की शुरुआत वो चाहे सिगरेट का हो या शराब का हो उसका जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ उसका सेवन करने वाला या पीने वाला ही होता है। और इसके लिए किसी भी हालात या व्यक्ति को दोष देना बिल्कुल गलत है।क्यूंकि अगर व्यक्ति नशे का आदी होता है तो उसका कारण वो खुद ही होता है।और नशा करना किसी भी समस्या का हल नही है बल्कि नशा करने से समस्याएं बढ़ती है। जब तक व्यक्ति इस बात को नही समझता है तब तक ना तो वो नशे की आदत छोड़ सकता है और ना ही उसे कुछ समझाने का कोई फायदा होता है।

शराब पीने वालों को कुछ इस तरह से इन श्रेणियों मे बाँट कर रख सकते है।

१ ) वो लोग जो कभी-कभार किसी अवसर या किसी पार्टी मे पीते है।
२) पहले से ही पीने के लिए दिन सोच कर रखते है। (जैसे वो लोग जो हर शनिवार या रविवार को पीते है या इसी तरह कोई भी दिन )
३)रोज का कोटा निश्चित रखते है।
४)जिनका कुछ निश्चित नही है ।
५)लगातार पीने वाले।


पहले से पाँचवे नम्बर तक पहुँचना व्यक्ति पर निर्भर करता है क्यूंकि बहुत से लोग सिर्फ पहली श्रेणी मे ही रहते है जबकि बहुत से लोग पहली श्रेणी से पांचवी श्रेणी तक पहुँच जाते है। अक्सर देखा गया है कि लोग शुरुआत तो पहली श्रेणी से ही करते है मतलब कभी किसी पार्टी मे या कभी किसी दोस्त के कहने पर पीते है पर फिर धीरे-धीरे वो अपने लिए अपनी सहूलियत से दिन निश्चित करते है और फिर निश्चित दिन से आगे बढ़कर अपने लिए पीने का कोटा निर्धारित करते है।और इस तरह फिर वो कभी पीना छोड़ देते है तो कभी पीने लगते है।अर्थात चौथी श्रेणी मे आ जाते है जहाँ कुछ भी निश्चित नही है। और फिर शराब के इतने आधीन हो जाते है कि लगातार ही पीना शुरू कर देते है।क्यूंकि दोस्तो और मजे के लिए पी गयी शराब कब आदत बन जाती है ये पीने वाले को पता ही नही चलता है।


यूं तो पहली और दूसरी श्रेणी मे आने वाले लोगों को इलाज से ज्यादा समझने की जरुरत होती है पर फिर भी ये खतरा हमेशा रहता है कि वो पांचवी श्रेणी तक कभी भी पहुँच सकते है। तीसरी श्रेणी को counselling की जरुरत होती है तो चौथी और पांचवी श्रेणी को counselling के साथ-साथ इलाज की जरुरत होती है। क्यूंकि नशा करना दूसरी बीमारियों की तरह ही एक बीमारी है

Wednesday, September 12, 2007

कल ग्यारह सितंबर का दिन था। और इस दिन को तो पूरी दुनिया मे शायद ही कोई भूल सकता है। क्यूंकि ९/११ के नाम से अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर मे हुए हादसे की याद आ जाती है जिसमे देखते ही देखते ट्विन टावर को हवाई जहाज से गिरा दिया गया था और जिसमे सैकड़ों लोगों की जान चली गयी थी। हालांकि इस हादसे को छे साल हो गए है पर अमेरिका को ये दिन अभी भी दहशत भरी यादों की याद दिलाता है।यूं तो आजकल हादसे आम व्यक्ति की जिंदगी का हिस्सा बनते जा रहे है ।

पर ग्यारह सितंबर का दिन ना केवल अमेरिका बल्कि उत्तर प्रदेश के लिए भी कुछ ऐसा ही दिन रहा जहाँ मायावती की सरकार ने मुलायम सिंह की सरकार द्वारा भर्ती ६५०० पुलिस जवानों की नियुक्ति को रद्ध कर दिया और १२ आई.पी.एस अफसरों को सस्पेंड कर दिया क्यूंकि ये १२ आई.पी.एस अफसर उन boards मे थे जिन्होंने इन पुलिस वालों का चयन कर उन्हें नियुक्त किया था। अब देखना ये है कि क्या मायावती इन पुलिस वालों की जगह फिर से भरती है या नही ?और अगर भर्ती करती है तो किस आधार पर। निष्पक्ष या फिर जातिवाद पर आधारित। या वो भी वही करेंगी जो मुलायम सिंह ने किया था ?

आजकल हैदराबाद मे एक-के बाद एक हादसे हो रहे है। कभी bomb blast तो कभी flyover का गिरना । और कल यानी ग्यारह सितंबर को एक ट्रेनर aircraft किरन हादसे का शिकार हो गया जिसमे दोनो ही पायलट की मृत्यु हो गयी जो की बहुत ही दुखदायी है।

इसी तरह बंगलोर मे बच्चों के मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल पर रोक लगाई गयी है। जो बच्चे १६ साल से छोटे है अब उनके लिए जो मे मोबाइल फ़ोन इस्तेमाल करना मना हो गया है ।क्यूंकि उनका मानना है मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल बच्चों कि सेहत के लिए ठीक नही है और साथ ही साथ कक्षा मे इससे अवरोध उत्पन्न होता है।सोचने वाली ये बात है कि अब ऐसी रोक लगाने के लिए भी सरकार को ही निर्णय लेना पड़ता है। क्या स्कूल और माँ-बाप की कोई जिम्मेदारी नही है.स्कूल में बच्चों को भला मोबाइल की ऐसी क्या जरुरत है ।ये तो अभिभावकों को सोचना चाहिऐ।

और चलते-चलते कल से twenty-20 की शुरुआत हो गयी है । अब देखना है कि चक दे इंडिया होता है या नही






आप कहीँ ये तो नही सोच रहे है कि इस लैंड स्लाइड की वजह से हम इतने दिन से पोस्ट नही लिख रहे थे,तो ऐसा बिल्कुल नही है । अरे नही हम जरा छुट्टी के मूड मे थेवो क्या है ना कि दो-तीन महीने बाद हम गोवा लौटे है ना तो बस इसीलिये थोडा गोवा घूम फिर रहे थेक्यूंकि बारिश मे गोवा बहुत खूबसूरत लगता है चारों तरफ हरियाली ही हरियाली नजर आती हैपर बारिश की वजह से समुन्दर का रंग आजकल नीले -हरे की जगह भूरा या मटमैला सा दिखता हैवैसे हमे तो दिल्ली से आने के बाद यहां की बारिश बहुत अच्छी लग रही है क्यूंकि दिल्ली मे जितनी गरमी पड़ रही थी उसके मुक़ाबले यहां का मौसम तो बहुत ही खुशगवार हैइस फोटो पर क्लिक करके देखने से पता चलता है की किस तरह से इस पहाड़ ने सड़क को ब्लॉक कर रक्खा है


गोवा मे करीब दस दिन पहले पोर्वेरिम मे लैंड स्लाइड हुआ था और अभी तक पहाड़ गिर ही रहा है।पंजिम से पोर्वेरिम(porverim) या मापुसा(mapusa) जाने के लिए मान्डावी नदी पर बने पैटो (patto) ब्रिज को पार करना पड़ता है और ये ब्रिज पंजिम को नेशनल हाई वे १७ (N.H.17) से जोड़ता है। मांडवी नदी को पार करते ही मुश्किल से बीस कदम की दूरी पर ये बड़ा सा पहाड़ गिर गया है।और चूंकि ये मुख्य सड़क है इसलिये इस पर ट्रैफिक भी काफी रहता है। इसलिये ये ब्रिज यातायात के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है।पर इस लैंड स्लाइड की वजह से यातायात मे लोगों को बहुत परेशानी हो रही है।क्यूंकि एक तरफ की सड़क थोड़ी दूर तक तो पूरी तरह से बंद पडी है और दूसरी सड़क पर ही आने और जाने दोनो का ट्रैफिक चल रहा है।मतलब one way की जगह two way । हालांकि दिन रात लोग काम कर रहे है।पर अभी लगता है कि कुछ दिन और लगेंगे रास्ते को पूरी तरह से ठीक होंने मे।

वैसे गोवा के लोगों का कहना है कि इस बार गोवा मे कुछ ज्यादा ही बारिश हुई है जिसकी वजह से ये लैंड स्लाइड हुआ है।और इसी बारिश के चलते इतना बड़ा पहाड़ दो भागों मे बंट सा गया है करीब तीन फीट चौड़ा और दस फ़ीट गहरा गैप हो गया है जो की काफी खतरनाक है। और इसीलिये शायद धीरे-धीरे पूरे पहाड़ को गिराया जा रहा है।और इसीलिये दस मिनट का रास्ता पार करने मे समय ज्यादा लग रहा है।


ऐसी उम्मीद है कि अगले कुछ दिनों मे ये रास्ता पूरी तरह से खुल जाएगा और लोगों की परेशानी का अंत होगा।