Thursday, September 20, 2007

ये पंक्तियाँ देव आनंद की फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा के गाने की है जो उस समय उस फिल्म मे तो हिप्पियों के संदर्भ मे गाया गया था पर आज राम सेतु विवाद को पढ़-सुनकर भी यही कहने को मन कहता है।


राम का अस्तित्त्व था या नही ये बहस अभी और ना जाने कितने दिन चलेगी। पर क्या ऐसा कह देने भर से राम का अस्तित्व ख़त्म हो जाएगा। और बहस चले भी क्यों ना आख़िर राजनीति मे तो हर कुछ जायज है।क्यूंकि सरकार और विरोधी पक्ष का यही तो काम है लोगों की भावनाओं से खेलना। जब देखो तब एक शगूफा छोड़ देती है। अगर सरकार चाहेगी तो राम सेतु की जगह सेतुसमुन्द्रम शुरू होकर ही रहेगा चाहे कोई कुछ भी कहता रहे।

आजकल तो हर कोई राम के अस्तित्व को नकार सा रहा है। कल करूणानिधि और शरद यादव भी ऐसी ही कुछ बातें कर रहे थे।पर आख़िर राम के अस्तित्व पर इतना ज्यादा विवाद होना कहां तक तर्क संगत है। क्या लोगों की भावनाओं की कोई कीमत नही है। राम थे या नही ये कौन निर्धारित करेगा ?

ये नेता जिनमे से आधे से ज्यादा लोगों के नाम मे कहीँ ना कहीँ राम शब्द आता है।और नवरात्रि हो या दशहरा हो ये नेता राम की पूजा करते हुए ही दिखते है। क्यों? जब राम ही नही तो पूजा किसकी करते है।


किस आधार पर शहरों,गांवों,इत्यादी के नाम राम के नाम पर रक्खे गए है।अगर राम थे ही नही तो ये नाम कहां से आया सबसे बड़ा सवाल तो ये भी है।क्यूंकि यूं ही किसी आम आदमी के नाम के ऊपर तो जगहों के नाम नही रक्खे जाते है। हाँ अब तो ऐसा लगता है कि राम के अस्तित्व को लोग तभी मानेगे जब राम पर या तो कोई विदेशी आकर हम हिंदुस्तानियों को बतायेगा कि हाँ राम थे और उन्होने किस तरह रावण से युद्ध किया था और किस तरह से उन्होने तीर चलाकर समुन्द्र पर सेतु का निर्माण किया था। बिल्कुल उसी तरह जैसे रंग दे बसंती फिल्म ने लोगों मे देश भक्ती की भावना जगाई या फिर मुन्ना भाई ही राम का उद्धार कर सकते है।अब वो जमाना गया जब राम लोगों का उद्धार किया करते थे। और शायद कलयुग इसीको कहते है।

4 Comments:

  1. Isht Deo Sankrityaayan said...
    करूणानिधि और शरद जो कर रहे हैं आडवानी और तोगडिया भी उनसे अलग कहॉ हैं? असल में तो सब राम को बदनाम करने में ही लगे हैं.
    Udan Tashtari said...
    उनको रोक नहीं पा रहे हैं मगर खुद तो कह ही सकते हैं:

    जय श्री राम!!!
    दीपक भारतदीप said...
    ममता जी
    इस विषय पर लगातार लिखिये, आज अगर आपने अखबार देखा हो तो
    शायद उसमेंपड़ा होगा । बालमीकि रामायण का हवाला देकर जो टिप्पणी दी गयी हैं वह गलत है।
    मैं बचपन से प्रतिदिन उसका ही पाठ करता हूँ और उसमें वह कहीं नहीं है।चूंकि
    लोग रामचरित मानस को ज्यादा पड़ते हैं इसलिये उन्हें पता नहीं है।
    दीपक भारतदीप
    विकास परिहार said...
    ममता जी मेरी इस टिप्पणी का उद्देश्य किसी की धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं है परंतु मैं ये अवश्य कहुंगा कि यह विषय इतना तूल सिर्फ इसीलिये पकड़ रहा है क्यों कि ये हिंदुस्तान की सबसे बडे सामुदाय की धार्मिक आस्था का मुद्द है। परंतु हम अगर निष्पक्ष हो कर देखें तो हम ही लोग हैं जो क्राइस्ट और अल्लाह के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगते हैं। और आज जब हयेह बात हमारे ऊपर अ रही है तो हम ऐसी प्रक्रिया दे रहे हैं। मैं जैसा कि हमेशा कहता हुं कि सिर्फ हमारा दिःख ही दुःख क्यो? दूसरे का दुःख दुःख क्यों नहीं?

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