Thursday, January 31, 2008

इधर कई दिनों से हम यही सोच रहे है की बेटी होना आशीर्वाद है या अभिशापअक्सर हम ऐसी बातें पढ़ते और सुनते है जहाँ बेटी का होना अभिशाप माना जाता हैये आज से नही सदियों से चला रहा हैपुराने जमाने मे ज्यादा पीछे नही जाते है पर ५० साल पहले भी बेटियों के पैदा होने पर घरों मे ख़ुशी कम औए मातम ज्यादा मनाया जाता थाहर घर मे बेटे की चाहत होती क्यूंकि बडे-बुजर्गों का मानना था कि वंश तो बेटे से ही चलता है और बेटियाँ तो पराया धन होती है

हमेशा से बेटी के जन्म पर शोक मनाया जाता रहा है जबकि बेटी के पैदा होने पर हमेशा ही ये भी कहा जाता है कि लक्ष्मी आई हैपर बेटे के पैदा होने पर जश्न मनाया जाता हैऔर बेटे को हमेशा घी का लड्डू माना जाता रहा हैक्यों ये तो सभी जानते हैऐसा पहले सुनते थे कि राजस्थान मे बेटी पैदा होने पर मार दी जाती थीपर अब तो राजस्थान क्या सारे देश मे ही बेटियों की बड़ी ही निर्ममता से हत्या कर दी जाती हैकुछ की पैदा होने पर और कुछ की पैदा होने के पहले ही यानी गर्भ मे ही

पर क्या आज समय बदला है या वही घिसी-पिटी परंपरा चली रही हैकुछ तो बदलाव आया है पर अभी भी लोगों की बेटियों के प्रति धारणा पूरी तरह से बदलने मे बहुत वक्त लगेगाऔर इस बदलाव का एक बहुत ही अच्छा उदाहरण है अविनाश जी का बेटियों का ब्लॉग

अभी हाल ही मे अविनाश जी ने बेटियों का ब्लॉग बनाया है जहाँ लोग अपने-अपने अनुभव बाँटते हैजिनमे ज्यादातर सुखद अनुभव ही होते हैजो की एक सुखद शुरुआत हैइस ब्लॉग पर लोगों के अनुभव पढ़कर लगता है कि बेटी होना कोई गुनाह नही है

पर साथ ही इस बात से भी इनकार नही किया जा सकता कि आज भी लोग बेटी की हत्या करने मे जरा भी संकोच नही करते हैये सिर्फ इंसान की सोच है ऐसे लाखों उदाहरण देखने को मिल जायेंगेऔर शायद इसी वजह से आज अपने ही देश के कुछ राज्यों मे लड़कियां कम और लडके ज्यादा हो गए है

आख़िर बेटी को क्यों पैदा होने नही देना है ?

अगर बेटियाँ नही होंगी तो क्या ये सृष्टि का अपमान नही होगा

आख़िर हम कब बदलेंगे ?

हम चार बेटियाँ है अपने मम्मी-पापा की और हमें गर्व है कि हम बेटी है

हाँ और एक बात हम अंत मे कहना चाहेंगे कि यहां हमारा मकसद बेटों को नालायक घोषित करना नही है क्यूंकि हमारे भी दो बेटे हैपर बेटी और बेटे मे अंतर करना कहीं से भी तर्क संगत नही है

Wednesday, January 30, 2008

शाह रुख खान हिन्दी फिल्मी दुनिया के बादशाह है तो अमिताभ बच्चन इसी हिन्दी फिल्मी दुनिया के शहंशाह हैऔर शहंशाह तो वो पिछले १५-२० सालों से हैअब बेचारे शाह रुख खान आख़िर कब तक बादशाह बने रहेंगे और फिर शाह रुख करे तो क्या करें शहंशाह बनने के लिएअब शहंशाह बनने का नुस्खा तो उन्होने हाल ही मे हुए एन.डी.टी.वी.के इन्डियन ऑफ़ ईयर अवार्ड समारोह मे बॉस रजनी कान्त से पूछा थाऔर रजनीकांत ने उन्हें नुस्खा बताया भी था

अब जब आज तक ब्रिटेन के प्रिन्स चार्ल्स प्रिन्स ही है किंग नही बने :) अरे क्यूंकि क्वीन ने अभी तक गद्दी नही छोडी हैतो शाह रुख पता नही शहंशाह कभी बन भी पायेंगे या नही ये कहना मुश्किल है


अब शाह रुख पिछले - सालों से जाने-अन्जाने अमिताभ बच्चन के पदचिन्हों पर चल रहे हैवो चाहे फिल्में हो या फिर विज्ञापन ही क्यों ना होंअब डॉन फिल्म इसका जीता जागता सबूत हैआज कल तो कुछ विज्ञापन जिनमे पहले अमिताभ बच्चन आते थे अब उनमे शाह रुख खान नजर आते है

और अभी हाल ही मे शाह रुख खान को इस साल का फ्रांस का सर्वोच्च पुरस्कार दिया गया जबकि पिछले साल यही अवार्ड अमिताभ बच्चन को दिया गया था


अब चूँकि गाहे-बगाहे शाह रुख अमिताभ के रास्ते पर चल ही रहे है तो भविष्य मे वो भी कुछ स्कूल ,महाविद्यालय,या संस्थान खोलने पर विचार करेंगेअब उनकी बहु आने तो अभी बहुत समय है पर फिर भी ..... ।क्यूंकि शाह रुख की दोस्ती भी अमिताभ बच्चन की तरह राजनीति से जुडे कुछ लोगों से तो है ही

अब देखना है कि शाह रुख राजनीति और इस क्षेत्र मे कदम कब रखते है

Tuesday, January 29, 2008



अब गोवा जैसी जगह मे भी जब ठंड पड़ने लगे ,सर्द हवा चलने लगे , मौसम का मिजाज कुछ बदला-बदला सा हो तो गोवा मे रहने का मजा ही कुछ और है।आजकल गोवा का तापमान १५ डिग्री सेल्सियस चल रहा है गोवा के इस गुलाबी जाड़े की वजहसे दिल्ली मे ना रहने की कमी खल नही रही है क्यूंकि पिछले ४-५ सालों सेदिल्ली से बाहर ही रह रहे है।इसलिए ठंड से वास्ता जो नही पड़ रहा है।और ऐसे मौसम में वाईन फेस्टिवल का होना । :)

गोवा टूरिज्म द्वारा पिछले साल की तरह इस साल भी आइनोक्स जो की गोवा का मल्टीप्लेक्स है वहां ४ दिनों (२४-२७ जनवरी ) के लिए वाईन टेस्टिंग फेस्टिवल मनाया गया। इस फेस्टिवल मे विभिन्न प्रकार की वाईन के अलावा खाने का भी खूब बढिया इंतजाम होता है।और साथ ही साथ मनोरंजन का भी पूरा इंतजाम होता है। जिसमे शास्त्रीय संगीत,फियूज्न ,western और rock music, वगैरा का शो होता है। यहां बस खाओ-पीओ और मौज करो वाला माहौल रहता है।


वाईन टेस्टिंग के लिए एक अलग जगह पर इंतजाम रहता है जहाँ वाईन टेस्ट कराने के पहले वाईन के बारे मे भी जानकारी दी जाती है की वाईन कैसे बनाते है,वाईन कहाँ पर बनती है,और किस तरह के खाने के साथ ज्यादा अच्छी लगती है वगैरा -वगैरा। और हाँ ये भी बताया जाता है की वाईन की बोतल को हमेशा ५० डिग्री के एंगल पर लिटा कर रखना चाहिऐ।

यहां इस वाईन टेस्टिंग मे ३-४ तरह की वाईन जैसे वाईट वाईन,रेड वाईन,और स्ट्राबेरी से बनी वाईन(अब सबके नाम तो हमें याद नही है।) को टेस्ट कराया जाता है। वाईन टेस्ट करने के पहले चीज या बिस्कुट खिलाते है जिससे वाईन का सही टेस्ट मिल सके।और एक वाईन पीने के बाद और दूसरी वाईन पीने के पहले पानी पीने को कहते है जिससे दो वाईन का टेस्ट मिल ना जाये। और वाईन के टेस्ट का पूरा मजा लिया जा सके।

अब गोवा जैसी जगह मे इस तरह के आयोजन होना और ऐसे आयोजन देख पाना यहीं पर संभव है। इसके दो कारण है। एक तो यहां पर दूरियां कम है और हर जगह आसानी से पहुंचा जा सकता है। दूसरा छोटी जगह होने से हर चीज पता भी चल जाती है।


Monday, January 28, 2008

कल अमिताभ बच्चन ने अपनी बहु अब नाम तो हम सभी जानते है ऐश्वर्या के नाम से बाराबंकी के दौलतपुर मे ऐश्वर्या बच्चन कन्या महाविद्यालय खोलने की घोषणा की और इसके लिए पूरा बच्चन परिवार मुम्बई से बाराबंकी गया जहाँ बड़ी ही धूम-धाम से इस की घोषणा की गयी। अब बच्चन परिवार हो और अमर सिंह और मुलायम सिंह ना हो ऐसा भला कहाँ हो सकता है। और कल से बेहतर दिन तो शायद हो ही नही सकता था अरे भाई कल अमर सिंह का जन्मदिन जो था। :)

वैसे तो कन्या महाविद्यालय खोलने का उनका विचार बहुत ही नेक है। और इसमे कोई दो राय भी नही है। अभी हाल ही मे अमिताभ बच्चन ने पटना की दो छोटी बच्चियों को जिन्हें उनके माँ-बाप ने छोड़ दिया था उनकी पढाई वगैरा का खर्चा भी उठाने की घोषणा की थी।

क्या अच्छा हो अगर अमिताभ बच्चन अपने पिता हरिवंश राय बच्चन जी के नाम से भी कोई संस्थान शुरू करें क्यूंकि उत्तर प्रदेश मे अभी भी बहुत कुछ किया जा सकता है।

कल ऐश्वर्या के नाम से महाविद्यालय खुला और आज अमर सिंह ने भी अपने नए बंगले का नाम ऐश्वर्या रख लिया।

Sunday, January 27, 2008



यहां शूटिंग का मतलब गन शूटिंग नही है बल्कि फिल्म की शूटिंग है।वो क्या है ना कि हम जबसे गोवा आये है अक्सर हम अपने पतिदेव से कहते रहें है की यहां पर हमें किसी फिल्म की शूटिंग होती हुई नही दिखाई पड़ती है जबकि आज कल तो आधे से ज्यादा फिल्मों (और विज्ञापनों ) मे गोवा नजर आता है पर हमें कभी शूटिंग देखने को नही मिलती है।

ऐसा नही है कि हम ने पहले कभी शूटिंग नही देखी।पर क्या करें दिल है कि मानता नही। :) (शूटिंग देखे बिना) अरे भाई सत्तर के दशक मे जब पहली बार हम बम्बई घूमने गए थे तब बम्बई तो बहुत घूमे थे पर कोई शूटिंग नही देख पाए थे ।बस प्राण से मिले थे जो उस समय किसी घर मे आत्माराम नाम की फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। पर जब तक हम लोग वहां पहुंचे , शूटिंग ख़त्म हो गयी थी और उस समय प्राण ने कहा था की शूटिंग से ज्यादा बोरिंग कुछ नही होता है क्यूंकि एक shot के लिए कई-कई बार रीटेक होते है।उस समय तो चूँकि हमने शूटिंग देखी नही थी त उनकी बात समझ नही आई थी।

अब भला ये भी कोई बात हुई की हर फिल्म मे गोवा दिखाई दे और हम एक अदद शूटिंग भी ना देखें। वैसे एक-आध बार जब भी पंजिम मे शूटिंग होती दिखी तो हम देख ही नही पाए ।


कारण अरे ना तो पतिदेव को औए ना ही बेटों को इसमे जरा भी मजा आता है।क्यूंकि नब्बे के दशक मे जब हम लोग मनाली घूमने गए थे तो वहां शूटिंग देखी थी जिसमे हिरोइन को बचाने के लिए हीरो को ऊपर से कूदना था । पहले तो ढेर के ढेर गद्दे लगाए गए फिर गत्ते के डिब्बे लगाए गए जिससे की हीरो जब कूदे तो उसे चोट ना लगे। और ये सब होने मे काफी वक्त निकल गया। और जब सब तैयारी हो गयी तो उस हीरो ने ऊपर से कूदने मे इतना ज्यादा समय लगा दिया था कि हम सभी बोर हो गए थे।पर तब भी हमारा फिल्म शूटिंग देखने का जज़्बा कम नही हुआ था।


खैर वापिस आते है गोवा मे शूटिंग की बात पर।हम जब भी beach पर जाते तो सोचते की काश कोई फिल्म की शूटिंग देखने को मिल जाये। और पिछले शनिवार को हम लोगों ने मोरजिम beach घूमने का प्रोग्राम बनायाचलिए लग हाथ इस beach के बारे मे भी थोडा बता देते हैमोरजिम beach पंजिम से ३० की. मी. की दूरी पर हैइस beach पर और दूसरे beaches की तुलना मे ज्यादा शांति रहती हैयहां पर देसी कम विदेशी पर्यटक ही ज्यादा दिखाई देते है जो या तो सन बाथ या मड बाथ लेते दिखते हैbeach पर वहां उस एरिया के लड़के क्रिकेट खेलते हुए भी दिखते हैbeach तो अच्छा है पर थोडा खतरनाक भी हैएक तो पानी काफी पीछे और घुटनों तक ही रहता है जिसकी वजह से लोग बहुत अन्दर चले जाते है ये सोचकर की पानी ज्यादा गहरा नही हैऔर दूसरे पानी मे जगह-जगह गड्ढे भी है और जब हम मोरजिम beach पर पहुंचे तो वहां beach पर किसी फिल्म की शूटिंग चल रही थी और कोई गाना फिल्माया जा रहा था।शूटिंग होती देख हम खुश हो गए और उस ओर चल दिए जहाँ शूटिंग हो रही थीपर वहां जाकर पता चला की वहां किसी दक्षिण भारतीय गाने की शूटिंग चल रही थीऔरचूँकि उन कलाकारों को भी हम नही पहचानते थेइसलिए हमारा जोश कुछ ठंडा हो गयाअब चूँकि beach पर हम लोग थे ही तो शूटिंग होती भी देख ही रहे थे


पर बाप रे एक लाइन को शूट करने मे जिसमे सारे कलाकार एक जीप मे बैठ कर beach पर चक्कर लगाते है उस एक लाइन और एक shot को फिल्माने मे उन लोगों ने तीन घंटे लगा दिएजबकि मुश्किल से वो shot कोई एक-आधे मिनट का रहा होगा ।।हर दस मिनट पर जोर से गाने की वो लाइन बजती और जीप मे बैठे कलाकार हाथ हिलाते हुए एक चक्कर लगाते। और उस दिन के बाद शूटिंग देखने का हमारा हौसला कम क्या अब ना के बराबर हो गया है।

Saturday, January 26, 2008


आज २६ जनवरी है यानी गणतंत्र दिवस । आज सारा भारत वर्ष ५९ गणतंत्र दिवस मना रहा है।गोवा मे भी गणतंत्र दिवस जोर-शोर से मनाया जा रहा है।इस परेड को देखने के लिए गोवा के गवर्नर के अलावा के गोवा के मुख्यमंत्री,मुख्य सचिव,मंत्रिगन ,और आम जनता पंजी के कम्पाल मैदान मे एकत्रित हुई. गोवा के गवर्नर एस.सी. जमीर ने परेड का निरीक्षण किया।और उसके बाद परेड की सलामी ली जिसमे सेना के तीनों बल (थल,वायु,जल सेना ),पुलिस,एन.सी.सी.तथा स्कूल के बच्चेने भाग लिया। सलामी के बाद गवर्नर ने लोगों को पदक प्रदान किये। और उसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हुआ जिसमे करीब डेढ़ हजार से ज्यादा बच्चों ने भाग लिया


कार्यक्रम शुरू होने के पहले तिरंगे रंग के गुब्बारे भी उडाये गए।

इस कार्यक्रम का हमने विडियो बनाने की कोशिश तो की है पर विडियो ज्यादा साफ नही आया है। इसलिए हम यहां पर कुछ फोटो ही लगा रहे है।बाद मे विडियो अपलोड करेंगे।




इस फोटो मे बच्चों ने देश मे फ़ैल रहे आतंक को दिखाया गया है।




साढ़े पांच सौ स्पेशल चिल्ड्रेन ने इस कार्यक्रमको प्रस्तुत किया जिसमे इन बच्चों ने तीन गानों पर डांस किया था।


गोवा के बाल भवन के करीब छः सौ बच्चों ने पहले तीन रंगों के झंडे लेकर नन्हा-मुन्ना राही हूँ की धुन पर मार्च किया फिर विभिन्न राज्यों जैसे कश्मीर,पंजाब,राजस्थान ,गुजरात,आसाम,और गोवा के लोक नृत्य पारंपरिक वेश भूषा मे पेश किये। इस डांस की खासियत ये थी कि एक राज्य का नृत्य ख़त्म होने के साथ ही दूसरे राज्य का संगीत बजने लगता था और उस संगीत के साथ उस राज्य की पारंपरिक वेश भूषा मे बच्चे प्रवेश करते और उस राज्य का लोक नृत्य प्रस्तुत करते थे।आप इस दाहिने वाली फोटो मे देख सकते है जिसमे राजस्थान के बाद गुजरात का लोकनृत्य प्रस्तुत करने के लिए बच्चे रहे है

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं




Thursday, January 24, 2008

इधर कई दिनों से डी एडिक्शन पर लिखना छूट सा गया था पर आज अजित जी की पोस्ट ने हमे वापिस इस विषय पर लिखने के लिए प्रेरित किया।हमने पहले भी लिखा है कि कोई पीना क्यों शुरू करता है अंडमान मे जब हम लोग हॉस्पिटल मे लोगों की काउन्सेलिंग करते थे तो इस बात का ध्यान रखते थे कि जो भी क्लाइंट (मरीज ) है उसे हम लोगों से अपनी बात कहने मे कोई भी हिचकिचाहट नही होनी चाहिऐ क्यूंकि अगर वो शराब पीना छोड़ना चाहता है तभी हम लोग उसकी मदद कर सकते है और इसके लिए उसे हमे सही-सही जानकारी देनी होगी।इसके लिए हम सभी काउंसलर क्लाइंट के साथ कई सेशन करते थे । शुरुआत कुछ ऐसे होती थी।

काउन्सेलर सबसे पहली बात जो क्लाइंट से पूछते थे कि आपने पीना क्यों शुरू किया ?

जिसका जवाब हर कोई अलग-अलग देता था जैसे किसी ने दोस्तों के साथ तो किसी ने झगडे की वजह से वगैरा-वगैरा।

और दूसरी बात जो पूछते थे कि आपने पीना कब शुरू किया ?

इसका जवाब भी हर कोई अलग-अलग देता जैसे किसी ने ५ साल की उम्र से तो किसी ने ८ साल की उम्र से वगैरा-वगैरा ।

उसके बाद काउंसलर क्लाइंट के परिवार की जानकारी लेता जिससे उसके शराब पीने के कारण का सही-सही पता चल सके।

उसके बाद जो बात सबसे अहम होती है वो पूछी जाती थी कि तुमने शराब कैसे पी ?

और इसका बड़ा ही सीधा सा जवाब होता कि गिलास से पी।

और यही पर काउंसलर उससे एक और बात पूछता कि क्या किसी ने गिलास तुम्हारे मुँह से लगाया था या तुमने गिलास खुद उठाया था।

इस पर कई बार क्लाइंट कहते कि भला कोई क्यों गिलास मेरे मुँह से लगायेगा मैंने खुद ही गिलास उठाया और पिया था।

और यहीं से काउंसलर का काम शुरू होता था उसको ये अहसास दिलाने का कि अगर वो चाहे तो गिलास नही भी उठा सकता था ,शराब नही भी पी सकता था।

काउंसलर उससे एक और बात पूछता की क्या अगर शराब की जगह गिलास मे चाय या शरबत होता और उसका दोस्त उसे पीने के लिए कहेगा तो वो पिएगा या नही।

तो झट से उनका जवाब होता था की नही।

तब काउंसलर उससे कहता की जिस तरह आप चाय या और शरबत को पीने के लिए मना कर सकते हो उसी तरह शराब को भी ना कह सकते हो।

और यही पर सेशन ख़त्म हो जाता था और काउंसलर क्लाइंट को इस पर सोचने और ना कहना सीखने की आदत डालने को कहते थे ।

कुछ ज्यादा लम्बा सेशन हो गया है :)


Wednesday, January 23, 2008

क्या आपको यकीन नही आ रहा है की कुएं मे शेर भी हो सकता है तो लीजिये सबूत हाजिर है। :)

अब बताइये कुएं और शेर से कुछ याद आया की नही। जी हाँ आप ने बिल्कुल सही समझा हम चालाक खरगोश और शेर की कहानी की ही बात कर रहे है ।

बचपन मे तो केवल कहानी मे पढ़ा था और अपने बच्चों को भी ये कहानी कई बार सुनाई थी पर शेर को कुएं मे देखने का मौका पहली बार लगा।

कुछ पुलिस वाले दिखेंगे जो उस खरगोश को ढूंढ रहे है जिसने इस शेर को कुएं मे गिराया है। :)


नोट - इस शेर को कहाँ और किस खरगोश ने गिराया ये तो हम नही जानते है क्यूंकि इस की फोटो खींचने के लिए हम कैमरा लेने जो चले गए थे

Tuesday, January 22, 2008

बुल फाईट एक ऐसा खेल है जो इंसान और (जानवर)सांड के बीच मे खेला जाता हैया फिर दो सांडों की लड़ाई भी कराई जाती हैइस बुल फाईट के खेल को देख कर ये समझना मुश्किल हो जाता है की आदमी बड़ा जानवर है या सांडभारत मे तो इस खेल के दोनों रुप प्रचलित है

बुल फाईटका खेल स्पेन,फ़्रांस,लैटिन अमेरिका,पुर्तगाल मे तो बहुत ही जोर-शोर से होता है जहाँ कई लोग इस खेल मे भाग लेते हैइन जगहों पर स्टेडियम मे बाकायदा लोग अपने-अपने बुल लेकर भी आते हैकई बार लोग स्टेडियम मे बुल पर बैठकर प्रवेश करते है पर कई बार बुल उन्हें गिरा भी देता हैकई जगहों पर तो पारंपरिक वेश-भूषा मे लोग बुलफाईट करते हैजहाँ बुल को एक लाल कपड़ा दिखाकर उकसाया जाता है और उसका ध्यान कपडे की ओर खींचा जाता हैऔर जब यही बुल बिगड़ जाता है तो खेलने वाले के जान के लाले पड़ जाते हैजैसा की इस विडियो मे दिखाया गया है

अपने भारत देश मे भी बुल फाईट बहुत प्रचलित हैतमिल नाडू मे जल्ली कट्टू नाम से ये खेल जाना जाता हैइस जल्ली कट्टू मे सांड को लोगों के बीच मे खुला छोड़ दिया जाता है और वो लोगों यानी जनता के बीच मे भागता है और जनता उसे काबू मे करने की कोशिश करती हैइस खेल मे जान का ख़तरा होता है पर फिर भी लोग इसे खेलने से डरते नही है। ।कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस खेल पर प्रतिबंध लगाया था पर बाद मे सुप्रीम कोर्ट ने ये प्रतिबंध हटा लिया थाऔर प्रतिबंध हटाने के चंद रोज बाद ही इस जल्ली-कट्टू खेल के दौरान एक सत्तर साल के व्यक्ति की मृत्यु हो गयी थीहालांकि वो व्यक्ति जनता के बीच मे खड़ा होकर ये खेल देख रहा थाहो सकता है इस खेल मे जितना खेलने वाले को रोमांच होता है उतना ही रोमांच इसे देखने वाले को भी होता होगाइसीलिए लोग जान की परवाह ना करते हुए इस खेल को खेलते और देखते है

तमिल नाडू की तरह ही यहां गोवा मे भी बुल फाईट बहुत प्रचलित हैगोवा मे तो बिना किसी सुरक्षा के इंतजाम के बिल्कुल खुले मैदान मे ही बुल फाईट कराई जाती हैऔर अक्सर यहां के अखबारों मे ऐसी ही बुल फाईट की खबरें निकलती रहती हैपेटा (peta) और दूसरे एन.जी..इस खेल के खिलाफ आवाज उठाते है पर उससे बुल फाईट के खेल पर कोई असर नही पड़ता हैऔर तो और यहां गोवा मे तो सरकार बुल फाईट को लीगल ही करने की सोच रही है
अंत मे जल्ली कट्टू का ये विडियो देखिए जो हमें कुछ सोचने पर मजबूर करता है

Friday, January 18, 2008

ये खबर तो कल शाम को ही आज तक ने दिखाई थी और आज सुबह जी न्यूज़ और आज तक दोनों चैनल पर ये खबर आ रही थी।तो सोचा आप लोगों तक भी ये खबर पहुंचाई जाये। खबर ये है की दर्शील जिसने तारे जमीं पर मे ईशान की भूमिका निभाई थी उसे अभी हाल ही मे हुए स्टार स्क्रीन अवार्डस मे बेस्ट चाइल्ड ऐक्टर और स्पेशल ज्यूरी अवार्ड का खिताब दिया गया है पर दर्शील का कहना है कि चूँकि वो तारे जमीं पर फिल्म का हीरो है इसलिए उसे बेस्ट ऐक्टर अवार्ड दिया जाना चाहिऐ ना की बेस्ट चाइल्ड ऐक्टर का।

दर्शील ने तो यहां तक कह दिया है कि वो ऐसे किसी भी अवार्ड कार्यक्रम मे नही जाएगा जहाँ उसे बतौर चाइल्ड ऐक्टर अवार्ड दिया जाएगा।उसका कहना है कि अवार्ड देना है तो बेस्ट ऐक्टर का दो और नोमिनेशन भी बेस्ट ऐक्टर की श्रेणी मे होना चाहिऐ ना की एक अलग बाल कलाकार की श्रेणी मे ।अभी तक तो शाह रुख खान ही कहते थे आई एम द बेस्ट और अब दर्शील भी यही कह रहे है की वो ही बेस्ट है।

अवार्ड से एक और अवार्ड भारत रत्न भी आजकल बहुत चर्चा मे है। अडवानी जी ने अटल बिहारी बाजपेई के नाम की सिफारिश की तो मायावती ने कांशी राम के नाम की तो किसी ने ज्योति बासु तो किसी ने करुना निधि के लिए भारत रत्न दिए जाने की माँग की।मानो भारत रत्न ना हो कोई लड्डू हो कि भाई हमे दे दो ।भारत रत्न इससे पहले तो बस जब किसी को मिलता था तब खबरों से लोगों को पता चलता था कि फलां को भारत रत्न मिला है। पर अब तो बाकायदा लोग नाम सुझाते है और सुझाए हुए नाम की पैरवी भी करते है।

एक चैनल तो बाकायदा कुछ लोगों जैसे सचिन तेंदुलकर ,एम,एफ,हुसैन ,रतन टाटा,जैसे नामों को दिखा कर पूछ रहा है कि इनमे से आप किसे भारत रत्न चुनेंगे। एस,एम,एस के जरिये वोट देकर आप भारत रत्न चुन सकते है।

इतने सारे नाम तो सुझाए गए पर ये क्या सबसे तगडे सोनिया गांधी के नाम को लोग कैसे भूल गए।ये सारे नेता कहाँ सो गए है। आख़िर सोनिया गाँधी ने प्रधान मंत्री पद का त्याग किया था।और सबसे मजबूत और सही उम्मीदवार तो भारत रत्न की वही हो सकती है।


क्या हमने कुछ गलत कहा ?

Thursday, January 17, 2008

जब से ये नया साल शुरू हुआ है हर जगह कोई ना कोई हादसा हो रहा है तो भला गोवा कैसे इससे अछूता रहता। कल दोपहर गोवा मे भी pernem के पास एक सड़क दुर्घटना जिसमे एक टैंकर जो की रासायनिक तत्वों से भरा था और एक मिनी बस की टक्कर हो गयी थी। उस दुर्घटना मे एक ही परिवार के बारह लोगों की मृत्यु हो गयी और अन्य दस लोग घायल है।मिनी बस मे गुजरात के एक ही परिवार के २२ लोग थेजिसमे एक नव-विवाहित जोडा भी थाये पूरा परिवार गोवा घूमने आया था और गोवा से वापिस लौट रहा थाइस दुर्घटना मे मिनी बस वाले की शायद कोई गलती नही थी पर फिर भी टैंकर की तेज रफ़्तार और टैंकर ड्राइवर का एक मोड़ पर गाड़ी को कण्ट्रोल ना कर पाने की वजह से मिनी बस के यात्रियों को अपनी जान गंवानी पड़ी और टक्कर इतनी तेज थी की टैंकर का ड्राइवर भी बच नही पायाउसकी भी घटना स्थल पर मृत्यु हो गयी

गोवा मे आम तौर लोग बहुत तेज गाड़ी चलते है और यहां की अजीब बात ये है की यहां पर लोग हार्न बहुत कम बजाते है।हर कोई आपसी सूझ-बूझ से गाड़ी चलते है। यहां तक ही चौराहे पर या तीव्र मोड़ पर भी हार्न बजाने का ज्यादा प्रचलन यहां नही है।जबकि गोवा मे पहाड़ होने की वजह से रास्ता ऊँचा-नीचा है और कई जगह सड़कें पतली भी है।पर फिर भी लोग गाड़ी तो फुल स्पीड पर नेक टू नेक चलते है पर हार्न बजाने मे कोताही करते है वो चाहे लोकल गोवा के लोग हो या देसी-विदेशी पर्यटक ही क्यों ना हो। विदेशी पर्यटक भी यहां गाड़ी तेज चलाते हुए देखे जा सकते है। और अगर आप हार्न बजा दे तो लोग आपको घूर कर देखते है मानो आपने हार्न बजाकर कोई गुनाह कर दिया होशुरू-शुरू मे तो हम लोगों को बड़ा अजीब लगता था पर अब तो लोगों के घूर कर देखने की आदत सी हो गयी हैपर हाँ एक बात मे तारीफ करनी होगी इन लोगों की कि अगर ट्रैफिक जैम भी होता है तो भी ये लोग हार्न बजा-बजा कर शोर नही करते है बल्कि चुपचाप खडे ट्रैफिक चलने का इंतजार करते हैऔर इसी लिए यहां नोएज पोलुशन बहुत कम है। पर आजकल एक्सीडेंट होना एक आम सी बात होती जा रही है।



एक और बात यहां पर आपको ट्रैफिक सिगनल भी दिखाई नही देंगे । बहुत ही कम जगहों या शायद पूरे गोवा मे मुश्किल से २-३ ट्रैफिक सिगनल ही होंगे।जब यहां फिल्म फेस्टिवल होता है उन दिनों यहां पंजिम मे जो इकलौता ट्रैफिक सिगनल वो काम करता है और उसके बाद कभी-कभार क्यूंकि वही mutual understanding से लोग गाड़ी चलाते रहते है।


दुर्घटना से देर भली वाली बात लोगों को समझने की जरुरत है।



Wednesday, January 16, 2008

आख़िर कार हमने भी तारे जमीं पर कल देख ही ली।फिल्म की तारीफ तो हर देखने वाले ने की है और फिल्म है भी तारीफ के काबिल।सभी कलाकारों ने बहुत ही अच्छा अभिनय किया है खासकर दर्शील ने । हर एक किरदार को बहुत ही देख-परख कर सोच - समझ कर बनाया गया है ।टीचर और प्रिंसिपल तो ऐसे बहुत दिखते है।हर स्कूल मे ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे।माँ-बाप का बच्चों के लिए चिंतित होना भी लाजमी सी बात है। हालांकि फिल्म का अंत तो पहले ही समझ मे आ गया था पर फिर भी फिल्म देखने लायक है।

पूरी फिल्म को देखने के बाद हमे ये महसूस हुआ कि इस फिल्म को माँ-बाप से कहीं ज्यादा स्कूल के टीचरों और प्रिन्सिपलों को देखनी चाहिऐ क्यूंकि बच्चे को घर मे तो एक बार माँ-बाप भाई-बहन का साथ मिल भी जाता है पर स्कूल मे बच्चा बहुत ही अकेला हो जाता है।ऐसा सिर्फ दर्शील जैसे बच्चों के साथ ही नही जिसे फिल्म मे dyslexic जैसी बीमारी थी बल्कि वो सभी बच्चे जो पढ़ने-लिखने मे जरा कमजोर होते है।

तो चलिए हम इस पिक्चर से मिलते -जुलते अपने एक अनुभव को बताते है।जिन लोगों ने पिक्चर देखी है उन्हें वो सीन भी अच्छी तरह याद होगा (और जिन्होंने नही देखी है उनके लिए हम यहां थोडा सा बता देते है।) जहाँ स्कूल कि प्रिंसिपल और टीचर्स बच्चे के माता -पिता को उसके तीसरी क्लास मे फ़ेल होने पर उन्हें कहते है कि अगर उनका बच्चा इस साल इम्तिहान मे पास नही हुआ तो वो उसे स्कूल से निकाल देंगे।बिल्कुल ऐसा ही हमारे साथ हुआ है।हमारा बेटा बहुत अच्छे जाने-माने स्कूल मे पढ़ता था ।बेटा पढ़ाई मे बहुत तेज तो नही था पर ठीक था।

जब वो नवीं क्लास मे था उन दिनों वो कुछ बीमार सा रहता था इसलिए स्कूल भी रेगुलर नही जाता था पर स्कूल वालों को इससे कुछ खास फर्क नही पड़ता था कि बच्चा आया है या नही।और नवी के फाइनल इम्तिहान का रिजल्ट निकला तो जनाब मैथ्स और साइंस मे फ़ेल थे।अब जब बडे स्कूल मे बच्चे फ़ेल होते है तो माँ-बाप को प्रिंसिपल के सामने हाजिर होना पड़ता है। जब स्कूल से चिट्ठी आई तो हम लोग भी गए।

तो प्रिंसिपल ने बिल्कुल सीधे-सीधे शब्दों मे कहा कि चूँकि आपके बेटे ने इस बार स्कूल बहुत मिस किया है और आपका बेटा दो विषयों मे फ़ेल हुआ है इसलिए हम उसे दसवी क्लास मे नही भेज रहे है।क्यूंकि मैथ्स और साइंस दोनों मुख्य विषय है।

इस पर जो हालत उस पिक्चर मे माँ-बाप की थी कुछ वैसी ही हालत हम लोगों की भी थी।(बल्कि और खराब थी क्यूंकि हमने तो सच मे भोगा था ) और जब हमने कहा की इस बार बेटा बहुत बीमार रहा है इस वजह से नंबर खराब आये है।आप इसकी डायरी से चेक कर सकती है।

तो उन्होने कहा कि अगर बीमार है तो इलाज करवाइये। अगर आपका बच्चा इतना बर्डन नही ले सकता है तो उसे किसी दूसरे स्कूल मे जहाँ पढाई का बर्डन कम हों ऐसे किसे ऐसे स्कूल मे दाखिला दिलवा दीजिए। ।

इतना सुनकर गुस्सा तो बहुत आया पर बच्चे के साल न बर्बाद हो इसलिए उनसे री-टेस्ट के लिए कहा। खैर इसके लिए तो वो तैयार थी पर साथ मे धमकी भी दी कि अगर री-टेस्ट मे पास नही होगा तो हमे उसे स्कूल से निकालना होगा। क्यूंकि के स्कूल अच्छे सेंट-परसेंट रिजल्ट के लिए जाना जाता है।

ये सुनकर हमे अपने और बेटे के साथ-साथ उस प्रिंसिपल के ऊपर भी बहुत गुस्सा आया कि यूं तो अखबारों मे अपने interview मे वो हमेशा पढाई से ज्यादा बच्चों को अच्छा इंसान बनने को कहती थी।पर असलियत मे उन्हें अपने स्कूल के अच्छे रिजल्ट से ही मतलब था। उस समय उनका कुछ और ही रुप दिख रहा था।

हमे गुस्सा तो बहुत आ रहा था फिर भी कुछ साहस करके ( प्रिंसिपल के आगे तो हम लोग किसी अपराधी से कम नही थे)जब हमने उनकी कही हुई ये बात उन्हें याद दिलाई तो वो झट से बोली कि that is different.our school is known for its results।


जरुरी नही है की बच्चे को कोई बीमारी ही हो तभी उसे ऐसे हालत झेलने पड़ते है बल्कि हमारे ख्याल से जिस किसी के बच्चे पढ़ने मे कमजोर होते है उन्हें ऐसे हालातों से दो-चार होना ही पड़ता है । ऐसे समय मे स्कूल को सिर्फ अपनी रेपुटेशन की चिंता होती के बच्चे के भविष्य की नही। इसीलिए हमारा ये सोचना है कि ये पिक्चर हर स्कूल के टीचर्स और प्रिंसिपल को देखनी ही चाहिऐक्यूंकि आजकल टीचर्स बहुत असंवेदनशील होते जा रहे है(पहले भी होते ही थे )








Monday, January 14, 2008

१४ जनवरी से इलाहाबाद मे हर साल माघ मेले की शुरुआत होती है। १४ दिसम्बर से १४ जनवरी का समय खरवांस के नाम से जाना जाता है। और उत्तर भारत मे तो पहले इस एक महीने मे किसी भी अच्छे कार्य को अंजाम नही दिया जाता था।मसलन शादी-ब्याह नही किये जाते थे पर अब तो समय के साथ लोग काफी बदल गए है। १४ जनवरी यानी मकर संक्रान्ति से अच्छे दिनों की शुरुआत होती है । माघ मेला पहला नहान मकर संक्रान्ति से शुरू होकर शिवरात्री तक यानी आख़िरी नहान तक चलता है। संक्रान्ति के दिन नहान के बाद दान करने का भी चलन है। और आज के दिन बाक़ी जगह का तो पता नही पर हम लोगों के घर मे उरद की दाल की खिचड़ी जरुर बनती है।और इसी लिए कई जगह इस दिन को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है।इस त्यौहार मे सफ़ेद और काले तिल के लड्डू और मेवे की पट्टी का घर मे बनायी जाती है।

माघ मेले से कई यादें जुडी हुई है। अब पिछले पच्चीस सालों से तो माघ मेले मे हम नियमित रुप से नही जा पाते है पर जब तक इलाहाबाद मे रहे साल दर साल माघ मेले मे घूमने जाना ,वहां संगम पर स्नान करना,कलब्बासियों के टेंट मे रहना (क्यूंकि हमारी दादी जब तक जिंदा थी हर साल पूरे माघ मेले के दौरान कलब्बास करती थी।)।सोंधी-सोंधी रेत की खुशबू और चारों और डी.डी.टी.की महक पूरे वातवरण को शुद्ध करती हुई।अब तो बस महा कुम्भ जो हर बारह साल मे आता है उसी मे अगर संभव होता है तो ही नहाने जा पाते है।

गंगा किनारे एक अलग दुनिया और एक अलग ही शहर बसा हुआ लगता है।पंडितों और साधुओं के अलग -अलग अखाड़े और हर अखाड़े का झंडा अलग रंग का जिसे दूर से देख कर ही लोग पहचान लेते थे। और भीड़ तो इतनी की ७० और ८० के दशक मे अगर किसी ऊँचे स्थान पर खडे होकर देखें तो सिर्फ सिर ही सिर दिखाई देते है।हर साल मेले मे कितने ही लोग खो जाते थे।गांववाले पूरी एक टोली की तरह आते थे और हर कोई एक-दूसरे का हाथ थामे मेले मे घूमता थाजहाँ टोली मे किसी का हाथ छूटा की बस समझो कि वो व्यक्ति खो गया। चारों तरफ भक्ति पूर्ण माहौल ,कहीं भजन तो कहीं यज्ञ ,कहीं कोई साधू समाधि लगाए हुए तो कही कोई पूजा करता हुआ।दुकाने बाजार जहाँ से हर प्रकार की सामग्री खरीदी जा सकती थी


खैर अब तो भीड़ की संख्या बहुत ही ज्यादा बढ गयी है।अब तो पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है।पर फिर भी माघ मेले का अपना ही महत्त्व और आकर्षण है ।

Sunday, January 13, 2008

हमने ब्लॉगिंग शुरू की थी तो सिर्फ अपनी ख़ुशी के लिए न कि किसी पुरस्कार प्राप्ति के लिए।जिस दिन हमें इस पुरस्कार के बारे मे पता चला था उस दिन हमे ख़ुशी और आश्चर्य दोंनों हुआ था।और जहाँ ख़ुशी और आश्चर्य होता है वहां दुःख भी होता है । ख़ुशी हमें इस लिए हुई थी कि हमारे ब्लॉग को इस लायक समझा गया कि उसे पुरस्कार के लिए चुना गया और आश्चर्य इस बात का था कि हमारा ब्लॉग कैसे और क्यूँ चुना गया और दुःख इस बात का हुआ जिस तरह हमारा ब्लॉग चुना गया ।

ब्लॉगिंग की दुनिया को जहाँ तक हमने समझा है उसमे तो कोई स्त्री है पुरुष हर कोई सिर्फ एक ब्लॉगर होता हैजहाँ उसकी पहचान उसके ब्लॉग से होती है

इस पुरस्कार को हम स्वीकार नही कर सकते है।

निर्णायकों रवि भाई,बालेन्दु भाई,मानस भाई से हमे कोई शिक़ायत नही है

ये पुरस्कार लेने का हमारा व्यक्तिगत कारण है

इतना वाद-विवाद और कटुता का होना




Friday, January 11, 2008

आज सुबह जब हमने रोज की तरह चिट्ठे पढ़ने का काम शुरू किया तो जब हमने शब्दों का सफर की पोस्ट पढ़नी शुरू की जिसमे अजित जी ने उन्हें सृजन सम्मान मिलने की बात लिखी थी और पोस्ट के अंत मे उन्होने अनूप जी का और हमारा नाम लिख कर बधाई दी थी। उस समय हमने सोचा की उन्होने गलती से धन्यवाद की जगह बधाई लिख दिया है। इसलिए हमने भी उन्हें सम्मान मिलने की बधाई दी ।

उसके बाद हमने जब अपनी कल की पोस्ट और ई-मेल देखी तब तो हम चौंक ही गए क्यूंकि ई मेल मे मैथली जी ने हमें सृजन-सम्मान मिलने की बधाई और शुभकामनाएं दी थी तो हमारी कल की पोस्ट पर रवि जी ने टिप्पणी के रुप मे बधाई दी थी।

वैसे तो हम इस क्षेत्र मे बहुत नए हैपर इस पुरस्कार की खबर से हम कुछ खुश और कुछ चकित है।आज तो आप लोगों ने इस पुरस्कार की घोषणा करके हमे वाकई मे फिसड्डी से नंबर वन बना दिया । :)

हम इस ब्लॉगर परिवार का शुक्रिया करना चाहते है जिन्होंने हमेशा ही हमारी हौसला अफजाई की है।क्यूंकि अगर आप लोगों का साथ नही होता तो शायद हम यहां इतनी दूर तक नही आते।एक बार फिर से हम आप सबका तहेदिल से शुक्रिया।

Thursday, January 10, 2008

बेनजीर भुट्टो की मौत के बाद पाकिस्तान मे पी.पी.पी. की कमान कौन संभाले पहले तो ये ही निश्चित नही हो पा रहा था। खैर बेनजीर के बेटे बिलावल जरदारी जो कि मात्र उनीस साल के है मतलब अभी बालिग नही हुए है पर उन्हें पी.पी.पी.का अध्यक्ष बना दिया गया है। अध्यक्ष बनने के पहले बिलावल अपने नाम मे भुट्टो नही लगते थे पर अध्यक्ष बनने के बाद से वो अब अपना नाम बिलावल भुट्टो जरदारी लिखने लगे है ।


अभी हाल ही मे जरदारी ने अपने एक interview मे कहा है कि वो सोनिया गांधी से बहुत प्रभावित है और सोनिया गांधी की तरह ही जरदारी भी अपनी पार्टी को अपना समर्थन और सहयोग देते रहेंगे।मतलब त्याग और बलिदान :)। और अपनी पार्टी के लिए ही वो काम करेंगे पर वो किसी भी पद पर नही रहेंगे।चलिए बाक़ी का interview आप यहां पर क्लिक करके पढ़ सकते है।


अब जरदारी सोनिया जैसा बन पाते है या नही या पाकिस्तान मे उन्हें वैसा ही सहयोग मिलेगा जैसा भारत की जनता और नेता सोनिया गांधी को देते है।ये तो समय ही बतायेगा ।

आपको क्या लगता है ?

Wednesday, January 9, 2008

सत्तर के दशक मे गर्मी के के समय मे सिर्फ लौकी,परवल,टिंडा, करैला,नेनुआ,(तोरी)जैसी हरी सब्जियां ही मिला करती थी । आज के समय की तरह नही कि बारह मास गोभी,गाजर जैसी सब्जियां मिलती रही हों । और ये बात वैसी ही गर्मी के दिनों की है। हमारे घर मे सभी को करैला पसंद था सिवा हमारे और भईया के।और घर मे हर दूसरे - तीसरे रोज बाक़ी दाल,सब्जी के साथ करैला भी बनता था। और जहाँ करैला देखा कि मुँह बन जाता था हमारा और भईया का।

ऐसी ही एक गर्मी के दिनों का ये किस्सा है। उन दिनों आई.ए.एस के इम्तिहान का बहुत चलन था (वो तो आज भी है)पर क्यूंकि तब ज्यादातर लोग सिविल सर्विस मे जाना पसंद करते थे या इंजीनियर या डाक्टर बनते थे। खैर तो चलन के मुताबिक ही भईया और उनके एक दोस्त मिलकर आई.ए.एस.के इम्तिहान की तैयारी कर रहे थे। और भईया का दोस्त हम लोगों के घर मे ही रहता था। तो जाहिर सी बात है कि जब दोनो लोग साथ-साथ पढ़ते थे तो खाना भी घर मे ही खाते थे।भईया के उस दोस्त को करैला पसंद था या नही ये कोई भी नही जानता था क्यूंकि जब भी मम्मी पूछती कि तुम करैला खाते हो या नही ,तो वो फौरन जवाब देते थे कि आंटी आपके हाथ का बना करैला खाने मे बहुत स्वादिष्ट होता है।

भईया उससे कहते कि अगर तुम्हे पसंद नही है तो मत खाया खाओ। तुम करैला थाली मे छोड़ दिया करो।
पर वो जब भी करैला बनता तो खा लेते थे और बहुत तारीफ करते करैले की।और हमारे भईया तो करैला खाना तो क्या उसके नाम से भी भागते थे।

खैर दोनों ने इम्तिहान दिया और भईया के वो दोस्त आई.ऍफ़.एस.(फॉरेन )मे सेलेक्ट हुए तो वो घर आये मम्मी-पापा का पैर छूने ।
जब मम्मी-पापा ने उन्हें बधाई दी और कहा कि तुमने बहुत मेहनत की थी।

तो इसपर वो बोले की आंटी ये सब तो आपके करैले का कमाल है।

और तब उन्होने बताया की उन्हें करैला खाना पसंद नही था पर हमारी मम्मी के हाथ का बना करैला खाने मे उन्हें बहुत अच्छा लगता था और उसके बाद से उन्होंने करैला खाना शुरू कर दिया था।

Sunday, January 6, 2008

आज सिडनी मे खेले गए दूसरे टेस्ट मैच मे ऑस्ट्रेलिया ने टीम इंडिया को हरा कर २-० की बढ़त तो हासिल कर ली है पर क्या ये बढ़त ऑस्ट्रेलिया जैसी चैम्पियन टीम को उसके अच्छे खेल की बदौलत मिली ?शर्म आनी चाहिऐ इन कंगारूओं को जो ऐसी जीत पर खुश हो रहे है। पर अफ़सोस इस बात का है टीम इंडिया ने कोई खास अच्छा प्रदर्शन नही किया।

इस मैच को भारत से जीतने के लिए ऑस्ट्रेलिया की टीम ने साम,दाम,दंड,भेद, इन सभी का भरपूर सहारा लिया। फिर वो भले ही ग्यारह की बजाय तेरह खिलाडी ही क्यों न हो ११ खिलाडी +२ एम्पायर बकनर और बेन्सन । एम्पायर भी ऐसे जिन्हें पहले से ही कह दिया गया था की कुछ भी हो जाये बस ऑस्ट्रेलिया के खिलाडियों को आउट नही देना है और भारतीय खिलाडियों को जबरदस्ती ही आउट देना है।वरना symonds जो की ३५-३६ के आस-पास आउट हुए थे उन्हें एम्पायर ने आउट नही दिया और जिसका नतीजा ये हुआ की symonds ने शतक बना लिया था ,वहीं द्रविड़ और गांगुली को गलत आउट दे कर भारत को मैच ही हरवा दिया। तीसरे दिन के खेल के बाद लग रहा था कि भारत ये मैच ड्रा करवा लेगा पर भारत को हार ही मिली। और इसका सबूत तो हम सभी टी.वी.पर देख ही चुके है।

ऑस्ट्रेलिया की टीम ने तो २ दिन पहले से ही इसकी शुरुआत कर दी थी जब symonds और हरभजन के बीच कहा सुनी हुई थी ।अब भला कंगारूओं को ये कहाँ बर्दाश्त होता की हरभजन ६३ रन बना ले और भारत के खिलाडी शतक ठोंक लें।उनकी नाक नीची नही हो जाती कि अपने ही देश मे वो लोग हार गए।


पोंटिंग की टीम को स्टीव वॉ टेस्ट मैच जीतने के रेकॉर्ड की बराबरी करने की इतनी जल्दी थी कि पोंटिंग ने ही एम्पायर की तरह ऊँगली उठाकर गांगुली को आउट करार दिया और एम्पायर ने तो उसकी बात माननी ही थी सो उसने भी गर्दन हिला कर गांगुली को आउट करार दिया। इस तरह ऑस्ट्रेलिया की टीम लगातार १६ क्या ३२ मैच भी जीत सकती है।


वैसे ऑस्ट्रेलिया की टीम के लिए ये कोई नयी बात नही है । वो अक्सर इसी तरह के हथकंडे अपनाते है मैच को जीतने के लिए जब भी उन्हें लगता है की वो हारने वाले है तो दूसरी टीम पर तरह-तरह के आरोप लगा देते है ताकि दूसरी टीम का जोश कौर हौसला कम हो जाये। पर अपनी टीम इंडिया बहुत जल्दी हताश हो जाती है काश आज भी आख़िर के बल्लेबाज किसी तरह अपना विकेट बचा पाते। ( जानते है कि कहना आसान होता है पर उन हालात मे खेलना मुश्किल होता है ) मजा तो तब आता जब ऑस्ट्रेलिया की १३ खिलाडियों की टीम को टीम इंडिया हरा देती ।

Friday, January 4, 2008

दो दिन पहले हमने भी मुम्बई मे हुई घटना पर लिखा था और आज टिप्पणीकार ,महर्षि की पोस्ट पढ़कर हमने इस विषय पर फिर से लिखने की सोची है। ये जो घटना हुई है उसमे गलती किसकी है ऐसे कपडे पहनकर रात मे पार्टी करने वालों की या उन ७० लोगों की जिन्हों ने उन लड़कियों के साथ बदतमीजी की , इस बात का तो कभी फैसला ही नही हो सकता है।हाँ बहस जरुर हो सकती है।

पार्टी करना क्या इतना बड़ा गुनाह है की जिसकी इतनी बड़ी सजा मिले।

क्या इस घटना के पीछे सिर्फ लड़कियों के कपडे ही कारण थे ?

ऐसा हम नही मानते है क्यूंकि जहाँ तक कपडे की बात है तो जितनी भी फोटो इन लड़कियों की दिखाई गयी है उनमे उनके कपडे उतने भी खराब नही थे। अगर वो लड़कियां सलवार सूट या साडी पहनें होती तो क्या ये भीड़ उन्हें आदर पूर्वक जाने देती।(कुछ साल पहले दिल्ली मे भी ऐसी ही एक घटना नए साल के समय हुई थी जिसमे शायद महिला ने सलवार सूट पहना था ) अगर कपडे ही इस घटना की वजह थे तब फिर हमारे गावों मे इस तरह की घटनाएं तो कभी होनी ही नही चाहिऐ। पर वहां भी ऐसी घटनाएं क्यों होती है। जबकि वहां तो आम तौर पर लड़कियां और औरतें ज्यादातर साडी ही पहनती है।अगर कपडों की बात करें तो गोवा जैसी जगह पर तो लोगों का चलना ही मुश्किल हो जाये। जहाँ किसी भी तरह के कपडे पहन कर लोग घूमते रहते है. जहाँ आपको हर तरह के हर देश-प्रांत के लोग दिख जाते है।ना केवल नए साल के जश्न के समय बल्कि रोज मर्रा की जिंदगी मे भी।

रही बात मानसिकता की तो औरत को तो आज क्या सदियों से लोग भोग की वस्तु समझते आ रहे है।औरत चाहे जितना भी पढ़ लिख जाये ,आत्म निर्भर हो ,पर पुरुष की नजरों मे औरत की कोई वकत नही होती है। मुम्बई की घटना भी पुरुषों की इसी ओछी मानसिकता को ही दर्शाती है कि जहाँ औरत दिखी वहीं सारा पौरुष दिखाना चाहते है।इन लोगों ने तो इंसान क्या जानवर से भी बदतर काम किया है।इसे मानसिकता से ज्यादा वहशीपन ठीक होगा। मानसिकता की बात कर रहे है तो यहां हम ये भी कहना चाहते है कि इस तरह की मानसिकता वाले आदमी हर जगह होते है।

आख़िर मे हम एक बात कहना चाहते है की जब टी.वी.चैनल और अखबार इस खबर को सेंसर करके दिखा रहे है और हम सभी इस घटना को बुरा मान रहे है तो फिर हम लोग ब्लॉग पर इन्हें बिना सेंसर किये हुये क्यों दिखाते हैएक तरफ तो हम इसकी निंदा करते है और दूसरी तरफ खुद ही इसे प्रदर्शनी के तौर पर इस्तेमाल करते है


Wednesday, January 2, 2008

मुम्बई जहाँ नए साल का जश्न मना कर लौट रही लड़कियों के साथ जो कुछ भी हुआ वो तो हर कोई जान गया है।कि किस तरह से उन दो लड़कियों को ७०-८० लोगों की भीड़ ने परेशान किया।और मुम्बई पुलिस कितने हलके ढंग से इस मामले को ले रही है।हालांकि पिछले साल भी मुम्बई मे ऐसा ही हादसा हुआ था।कल ही कोची मे भी एक विदेशी पर्यटक (swedish) की बच्ची के साथ भी लोगों ने छेड़-छाड़ की थी।

मुम्बई मे नए साल के आगमन पर लोग बिल्कुल दीवानों के तरह घूमते है। शायद ऐसी घटनाएं पहली भी होती रही होंगी पर तब चूँकि मीडिया इतना ज्यादा नही था इसलिए किसी को पता नही चलता रहा होगा।

पर सबसे आश्चर्य जनक बात तो पुलिस चीफ ने कही है कि अगर आप अपनी बीबियों की सुरक्षा चाहते है तो उन्हें घर मे रखिये।अब अगर पुलिस ही ऐसा कहती है तो फिर जनता किससे शिक़ायत करेगी।

१९८६ दिसम्बर की बात है हम लोग मुम्बई तब की बम्बई घूमने गए थे।हम लोग और हम लोगों के एक दोस्त की फैमिली थी , बच्चे छोटे थे। और हम लोग जुहू पर ठहरे थे।गाड़ी और ड्राईवर था इसलिए घूमने मे कोई मुश्किल नही हो रही थी।३१ दिसम्बर की सुबह हम लोग एलिफ़नता केव्स देखने गए थे।हम लोगों की कार के ड्राईवर ने बोट पर हम लोगों को छोड़ते हुए कहा कि उसे शाम को छुट्टी चाहिऐ औए कल यानी पहली जनवरी को वो फिर आ जाएगा।तो बिना कुछ सोचे समझे हम लोगों ने उसे छुट्टी दे दी । चूँकि उस समय हम लोगों को जरा भी अंदाजा नही था कि शाम होते-होते बम्बई बिल्कुल बदल जायेगी यानी चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ भीड़ ही नजर आएगी और कोई भी टैक्सी गेट वे ऑफ़ इंडिया से जुहू जाने को तैयार ही नही होगी।

खैर किसी तरह घूमते-घूमते जब कोई टैक्सी जुहू जाने को नही मिली तो हम लोगों ने बस से ही जुहू जाने की सोची और एक डबल -डेकर बस मे चढ़ भी गए और फिर जो नजारा बम्बई का देखा की बस ये ही लगता रहा कि किसी तरह होटल पहुंच जाये।चारों और लड़के-आदमी और हर एक के हाथ मे बियर की बोतल। बस मे एक अच्छी बात ये थी की बस कंडक्टर फैमिली वालों को नीचे और जितने भी लड़के वगैरा चढ़ते थे उन्हें ऊपर भेज देता था। अब चूँकि बस का कोई आईडिया नही था इसलिए एक बार तो हम लोग जुहू के सामने से ही निकल गए क्यूंकि जब तक हम लोग उतरते उससे पहले ही बस मे भीड़ चढ़ने लगी और बस आगे चल दी। और हम लोगों ने फिर से दोबारा बम्बई का चक्कर लगाया।

इस घटना का यहां जिक्र सिर्फ इसलिए किया है क्यूंकि मुम्बई मे हमेशा से ही नए साल को पूरे जोश से मनाने का चलन रहा है।इसलिए नए साल मे भीड़ भाड़ होना, लोगों का सड़कों पर घूमना कोई नयी बात नही है।पर शायद अब पुलिस का इस सब को देखने का रवैया कुछ बदल सा गया है।

Tuesday, January 1, 2008




आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं !

नव वर्ष आपके और आपके परिवार के लिए मंगलमय हो !!