Saturday, June 30, 2007

आज के समय मे किसी कालेज मे एडमीशन लेना किसी जंग से कम नही है मतलब अब एडमीशन लेना कोई आसान काम नही रह गया है क्यूंकि अब बच्चों को इतने ज्यादा नम्बर मिलते है कि जिन बच्चों के कम नम्बर आते है उनके लिए कहीँ भी एडमीशन पाना मुश्किल हो जाता है। खास कर दिल्ली विश्वविद्यालय मे जहाँ अब सत्तर से नब्बे परसेंट नम्बर लाने वाले बच्चों को ही एडमिशन मिल सकता है। कई बार तो नब्बे परसेंट लाने पर भी बच्चों को ना तो अपने पसंद का कालेज मिलता है और ना ही अपनी पसंद का विषय मिलता है। अब वो जमाना नही रहा कि साठ परसेंट पाने वाले को इज्जत की नजर से देखा जाये । हमे तो लगता है कि जितने नम्बर हमारे आते थे उसमे तो किसी कालेज मे आज के समय मे एडमिशन मिलना मुमकिन ही नही होता।आज जबकि इतने ज्यादा कालेज हो गए है तब भी ।

आज कल अगर बच्चा किसी प्रोफेशनल कोर्स मे मसलन इन्जीनियेरिग या मेडिकल मे नही सेलेक्ट हो पाता है है तो ऐसा लगता है कि अब क्या करें क्यूंकि अब बिना प्रोफेशनल डिग्री के तो काम चल ही नही सकता है। पिछले कई दिनों से हम भी इसीलिये थोड़े परेशान थे क्यूंकि जब हमारे छोटे बेटे का इन्जीनिएरिंग मे नही हुआ तो लगा कि अब तो बड़ी समस्या खडी हो गयी क्यूंकि प्राइवेट कालेज एक तो बहुत ही मंहगे और दूसरा डोनेशन का चक्कर।

वैसे बेटे को इन्जीनिएरिंग के साथ-साथ एनीमेशन मे भी दिलचस्पी थी इसलिये उसने एनीमेशन के कोर्स के लिए भी फॉर्म भर रक्खा था पर पहली पसंद तो इन्जीनिएरिंग ही थी। और डी.यू .मे जाने का उसे मन ही नही था और हमे डर लग रहा था कि अगर खुदा ना खास्ता एनीमेशन मे नही हुआ तो क्या होगा क्यूंकि कम्पटीशन तो हर जगह ही है। पहले तो हमने कभी एनीमेशन के कोर्स के बारे मे सुना नही था तो ये भी लगता था कि पता नही ये किस तरह का कोर्स है और इस कोर्स की कोई मान्यता भी है या नही। पर बाद मे लोगों से पता चला कि ये एक अच्छा और upcoming कोर्स है और चूंकि ये अभी नया है तो इसमे आगे स्कोप भी है। और B.I.T मेसरा मे बेटे ने फॉर्म भर दिया था । इनका एक सेंटर नौएडा मे भी है । बिट्स मेसरा कि वजह से हम भी थोड़े सन्तुष्ट थे कि कम से कम institute तो अच्छा है पर अभी मुश्किलें ख़त्म नही हुई थी। फॉर्म भरने के बाद एक दिन वहां से लैटर आया कि 10th की marksheet और पास certificate नही लगाए है इसलिये फौरन फैक्स से भेजें वरना फॉर्म reject कर दिया जाएगा। फ़टाफ़ट बेटे ने marksheet वगैरा फैक्स से भेजी । अरे ये मत सोचिये की उसने पहले क्यों नही लगाई तो ऐसा बिल्कुल नही है। marksheet तो लगाई गयी थी पर पता नही उन्हें क्यों नही मिली । पर बाद मे जो फैक्स भेजा वो भी उन्हें नही मिला क्यूंकि साईट पर बेटे का नाम नही आ रहा था तो फिर बेटा नौएडा गया तो उन लोगों ने कहा कि अगर फैक्स भेज दिया है तो नाम आ जाएगा २५ जून तक इंतज़ार करो । जब पच्चीस को भी नाम नही आया तो फिर बेटा कालेज गया क्यूंकि २८ को टेस्ट और interview जो होना था। खैर जब बेटे ने कहा कि उसका नाम अभी भी साईट पर नही आ रहा है तो उन्होने कहा की marksheet और पास certificate की कापी दे दो और ये भी कहा की रजिस्ट्रेशन कार्ड भेज दिया है। एक दिन बाद रजिस्ट्रेशन कार्ड भी आ गया और २८ को टेस्ट और २९ को interview भी हो गया और २९ की रात मे रिजल्ट भी आ गया और हमारा पप्पू पास हो गया।

Thursday, June 28, 2007

आज कल हर न्यूज़ चैनल और अखबार मे बस यही खबर होती है कि कौन होगा भारत का अगला राष्ट्रपति ?पर क्या हमारे आपके या किसी के कहने से कुछ होता है। हर रोज नयी-नयी बातें सुनने को मिलती है या तो प्रतिभा पाटिल के खिलाफ या शेखावत के खिलाफ। हर राजनैतिक पार्टी इसी कोशिश मे है की किस उम्मीदवार को कितना नीचा दिखाया जा सकता है। इससे पहले तो कभी भी इतना ज्यादा विवाद सुनने को नही मिला था वो भी राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के खिलाफ।


क्या इस तरह से कुछ या बहुत कुछ कहने से या खबरों को दिखाने से राष्ट्रपति के चुनाव मे कोई फर्क पड़ेगा ?

ये वैसे तो हमारी सोच है कि इन सभी तरह की खबरों और खुलासों से कुछ भी होने वाला नही है क्यूंकि जिन्हे राष्ट्रपति चुनना है उन लोगों पर शायद ही ऐसी बातों का असर पडता है। और हमारे उम्मीदवारों की सेहत पर भी कोई असर नही पड़ता है। ये तो हम सभी जानते है।

अब जब भारत के प्रधानमंत्री ही कहे कि प्रतिभा पाटिल के खिलाफ कोई सीधा केस नही है तो दुनिया कुछ भी कहे क्या फर्क पड़ता है। वैसे भी भाई-भतीजा वाद भला कोई जुर्म है जिसके लिए हम या आप या कोई भी उन्हें राष्ट्रपति पद से वंचित कर सके।

बाबा लोगों का आर्शीवाद लेना कितना महत्वपूर्ण है इससे तो कोई इनकार ही नही कर सकता है क्यूंकि अगर शायद ये बाबा लोग नही होते तो इन राजनेताओं का क्या होता । कौन इनकी नैया पार लगाता ? और फिर अगर प्रतिभा पाटिल या शेखावत ने किसी बाबा द्वारा की जा रही किसी पूजा मे भाग ले लिया तो हम और आप क्यों परेशान होते है। परेशान तो तब होना चाहिऐ जब हमारे हाथ मे कुछ हो। जब सारा देश ही ऐसे ही चल रहा है तो फिर इसमे हम क्यों अपना दिल जलायें ।

हो सकता है कि आप कहें कि भाई हम एक जागरूक नागरिक है और कम से कम आवाज तो उठा ही सकते है तो ये तो सोलह आने सही है क्यूंकि आवाज उठाने के अलावा हम लोग कुछ नही कर सकते है ?

Wednesday, June 27, 2007

जब हमने ब्लॉगिंग के तीन महीने नाम की एक पोस्ट लिखी थी तब शिरीष जी अपने कमेंट मे हमसे पूछा था की हमने ब्लॉगिंग कैसे शुरू की और क्या हमारे बेटे और पतिदेव भी ब्लॉग लिखते है। और अगर नही लिखते है तो हमे ब्लॉगिंग के बारे मे कैसे पता चला ? कई दिनों से हम लिखने की सोच रहे थे तो सोचा आज इस बारे मे लिख ही दिया जाये। तो सबसे पहले हम ये बता दे की ना तो हमारे बेटे और ना ही हमारे पतिदेव ब्लॉग लिखते है हाँ वो लोग हिंदी और इंग्लिश के ब्लॉग पढ़ते जरूर है।

हमने ब्लॉगिंग कैसे शुरू की इसके बारे मे तो हमने अपनी पिछली पोस्ट मे भी लिखा था पर हमे इसके बारे मे कैसे पता चला तो हुआ यूं की अगस्त २००६ से हम गोवा मे है और गोवा मे थोड़ी भाषा की समस्या होने से हमने कुछ ज्वाइन नही किया था वैसे भी हम पार्ट टाइम ही काम करते है। एक तो वहां भी दिन बहुत बड़ा होता है और जब घर मे सब लोग अपने -अपने कामों मे व्यस्त हो तो दिन भर कोई क्या करे। और दुसरे चुंकि हम वहां ज्यादा लोगों को जानते नही है इसलिये किसी के घर ज्यादा आना-जाना भी नही होता था। ऐसे मे समय बिताने के लिए हम टी.वी.देखते थे या कुछ पढ़ लेते थे। घर मे बेटे और पतिदेव कंप्यूटर पर हमेशा कुछ ना कुछ करते रहते थे और हमको कहते की देखो दुनिया कहॉ पहुंच रही है आज कल हर चीज बस एक क्लिक की दूरी पर है । कोई भी जानकारी लेनी हो तो गूगल पर मिल सकती है। कहने का मतलब की हर तरह से वो लोग चाहते थे की हम भी कंप्यूटर करना शुरू कर दे।

एक दिन यूं ही कंप्यूटर पर काम करते हुए पतिदेव बोले की ये देखो इस साईट पर हिंदी मे लिखा जा सकता है और पैसा भी कमाया जा सकता है। साईट का नाम तो समझ ही गए होंगे नही तो चलिये हम बताए देते है अरे ibibo.तो हिंदी साईट सुनकर हम भी खुश हो गए वो क्या है ना की अपनी इंग्लिश जरा कमजोर है मतलब की जो बात हम हिंदी मे पूरे भाव के साथ लिख सकते है उतना इंग्लिश मे नही . आख़िर हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा हैखैर तो हमने सोचा की चलो अगर लिखने के साथ-साथ कुछ कमाई भी हो जाये तो क्या बुरा है पर हमारा बड़ा बेटा हमसे सहमत नही था उसका कहना था की अगर आप को लिखना है तो और भी कई हिंदी की साईट है आप वहां लिखिए आप क्यों पैसे के चक्कर मे पड़ रही हैपर हम भी कहॉ मानने वाले थे ,हमने कहा की ट्राई करने मे क्या जाता हैहमने बेटे के साथ ही बैठकर ibibo पर अपने को रजिस्टर करवाया और शायद एक या दो पोस्ट ही लिखी थीपर ना तो कुछ अच्छा लगा और ना ही मजा आया इसलिये दो दिन बाद ही हमने लिखना बंद कर दियातो फिर हमने अपने बेटों के साथ बैठकर कुछ हिंदी की साईट देखी जैसे देसी पंडित पर उस समय तक हम नारद के बारे मे ज्यादा नही जानते थेपर उस समय हमे लगता था की सब लोग बहुत ही शुद्ध हिंदी माने की साहित्यिक भाषा का प्रयोग करते है तो भला हमारी ब्लोग कौन पढ़ेगा ?

हिंदी मे लिखना अब बहुत आसान हो गया हैएक बार करीब पांच -छे साल पहले हमने हिंदी मे लिखने की कोशिश की थी जब हिंदी के अक्षर वाले font चले थे जिसमे key board पर हिंदी वर्णमाला के अक्षर लगाए जाते थे पर उस मे लिखना टेढ़ी खीर जैसा थाखैर शुरू मे जब हमने ibibo पर लिखा था तो जरा मुश्किल लगता था क्यूंकि उस मे मोनो टाईप पैड होता था जिसे देख-देख कर हम लिखते थे और कई बार तो किसी-किसी शब्द पर अटक ही जाते थेजब हमने ब्लॉगिंग शुरू की तो इसमे भी पहले लिखने मे दिक्कत आती थी इसलिये शुरू की एक-दो पोस्ट हिंग्लिश मे हैपर बाद मे हिंदी मे लिखना शुरू कर दिया और अब तक लिखना जारी है




Tuesday, June 26, 2007

जी बिल्कुल सही समझा है आपने आज हम कुछ ऐसी ही बात करने जा रहे है। आज भी हम अपने घर मे छोटे समझे जाते है क्यूंकि पांच भाई-बहनो मे हम सबसे छोटे जो है और वो कहते है ना कि छोटे कभी बडे होते ही नही है। वैसे छोटे होने के फ़ायदे होते है तो नुकसान भी होते है पर शायद नही यक़ीनन फ़ायदे ज्यादा होते है।

जब हम छोटे थे तो घर मे हर कोई हमे अलग नाम से पुकारता था और घर मे जितने ज्यादा nickname हमारे थे वो और किसी भाई-बहन के नही थे। चलिये कुछ नामों का हम यहां जिक्र कर ही देते है। अब चुंकि हम हमेशा से गोल-मटोल है तो हमारे बाबा जिन्हे हम प्यार से बाबूजी कहते थे वो हमे टुनटुन कह कर बुलाते थे तो हमारे पापा-ममी हमे मंतु कहते थे तो हमारे भईया बकतुनिया और जिज्जी लोग मुन्नी ,गुड़िया और सबसे मजेदार नाम तो परसादी लाल वो इसलिये क्यूंकि जब भी हमारी मम्मी पूजा करती थी तो हम सबको प्रसाद बाँटा करते थे
और ऐसा नही कि अब सबने हमे इन नामों से पुकारना बंद कर दिया है अभी भी हमे इन नामों से पुकारा जाता है।

अब चुंकि हम छोटे थे तो जाहिर है कि थोड़े जिद्दी भी थे और अगर कोई कहीं जा रहा हो और हमे साथ ना ले जाये तो बस रोना शुरू हो जाता था। किसी ने जरा सा कुछ कहा और हमारे आंसू शुरू ,वैसे ये आदत तो हमारी आज भी बरकरार है। घर मे सब कहते थे कि ममता कि आंख मे नल लगा है जब देखो तब बहने लगता है। आज भी अगर हमारी बच्चों से किसी बात मे बहस होती है तो भी हमारी आंखों मे लगा नल बहने लगता है। और ये आँसू ही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है।

ऐसे ही एक बार कि बात है उस समय हम पांच या छे साल के थे हमरे भईया जो हमसे दस साल बडे है वो कहीं कार (उस समय पापा के पास एम्बसदर थी ) से जा रहे थे और हमे नही ले जा रहे थे जो हमे बिल्कुल भी अच्छा नही लग रहा था तो बस हमने रोना शुरू कर दिया तो मम्मी ने भईया से कहा कि इसे भी लेते जाओ । अब तो भईया और भी ग़ुस्सा हो गए क्यूंकि उनका अपने दोस्तों के साथ कहीं जाने का कार्यक्रम था पर जब मम्मी ने कहा तो वो टाल नही पाए और हमे कार मे बैठने को कहा और हम उछल कर कार मे बैठ गए पर जैसे ही कार चली हमने ना जाने क्या सोचकर कार का गेट खोल दिया हमारा गेट खोलना था कि भईया ने जरा जोर से पूछा कि गेट क्यों खोला अब इस डर से कि कहीं भईया हमे कार से ना उतार दे हमने जोर-जोर से रोते हुए कहा कोले (तब हम खोलें को कोले बोलते थे ) भी नही थे इतना सुनते ही भईया को हंसी आ गयी और उन्होने कहा कि चलती गाड़ी मे दरवाजा मत खोला करो और फिर हमे मम्फोर्ड गंज का एक चक्कर लगवा कर घर छोड़ गए । आज भी जब हम सब इक्कट्ठा होते है तो कहीं ना कहीं से कोले भी नही थे की बात हो ही जाती है।

जब हम छोटे होते है जिसे हम बचपन कहते है वो दूबारा कभी नही आता है क्यूंकि उस समय ना तो हमे कोई चिन्ता होती है ना कोई फिक्र बस सिर्फ और सिर्फ मस्ती । सुजाता पिक्चर के इस गाने से शायद आप सहमत भी होंगे।

बचपन के दिन भी क्या दिन थे
उड़ते फिरते तितली बन

Monday, June 25, 2007

अब आप सोच रहे होंगे की अब दूरदर्शन की बात कहॉ से आ गयी तो बात दरअसल मे ये है की आज कल हम दूरदर्शन ही देख रहे है क्यूंकि दिल्ली मे अब cas जो शुरू हो चुका है और अब केबल आता नही है इसलिये आज कल हम दूरदर्शन ही देखते है ।चूंकि हम यहां सिर्फ दो महीने के लिए आये है इसलिये डिश टी.वी.नही लगवा रहे है । वैसे फ्री चैनल मे सारे न्यूज़ चैनल और कुछ music चैनल भी है।और आपको तो पता ही है कि हमारा टी.वी.देखे बिना गुजारा नही है

पिछले दस -बारह दिन तो कंप्यूटर भी नही चल रहा था और गरमी इतनी कि कोई घूमने भी कहां जाये और फिर टी.वी.देखने के अलावा कोई काम ही नही था। तो दूरदर्शन देख लेते थे क्यूंकि सारे समय न्यूज़ तो देखा नही जा सकता है ,और न्यूज़ चैनल भी आजकल ज्यादातर अंधविश्वास को बढ़ाने वाली बाते या फिर बहुत ही भयानक से कार्यक्रम जैसे वारदात ,सनसनी ,जुर्म,और भी ना जाने कौन-कौन से नाम है ऐसे कार्यक्रमों के जिन्हे दिन भर मे दो-चार बार तो दिखा ही देते है। आज कल तो ऐसा लगता है की स्टार प्लस और आजतक एक दुसरे का चैनल देख कर ही न्यूज़ दिखाते है मसलन अगर आजतक कोई फिल्मी कार्यक्रम दिखायेगा तो स्टार भी उसी समय फिल्मी कार्यक्रम दिखाता है और सहारा न्यूज़ भी और ऐसे मे हालत ये हो जाती है कि इधर देखूं या उधर देखूं या क्या देखूं ।

सारे चैनल एक-दूसरे से आगे निकलने की फिराक मे रहते है पर अपना दूरदर्शन चैनल इन सबसे अलग ही रहता है। दूरदर्शन पर आने वाली न्यूज़ का स्टाइल जरूर थोड़ा पुराना है पर कम से कम एक ही न्यूज़ के पीछे नही पड़ जाता है। हालांकि थोड़ा बहुत बदलाव दिखता है जो की अच्छी बात है। और न्यूज़ पढने का तरीका भी काफी अच्छा है मतलब अगर आप ibn7 और इंडिया टी.वी.की न्यूज़ सुने तो लगता है मानो न्यूज़ पढने वाली किसी क्लास मे पढा रही हो इतनी जोर-जोर से तीखी आवाज मे बोलती है कि चैनल बदलने के अलावा कोई चारा ही नही होता।

और दूरदर्शन पर आने वाले सीरियल तो आज भी वही है जहाँ शायद दस साल पहले थे। आज भी कृषि दर्शन और रंगोली जैसे कार्यक्रम आते है ।वैसे रंगोली मे या सरगम जैसे कार्यक्रम मे ना केवल नए बल्कि पुराने गाने भी सुनने को मिलते है जो बहुत अच्छा लगता है। हास्य कवि सम्मेलन फुलझरी एक्सप्रेस भी हमने काफी समय बाद देखा । और भी कई ऐसे कार्यक्रम है जो आज भी दूरदर्शन पर आते है। दूरदर्शन के कार्यक्रम देखने के बाद ये समझ नही आता है की जहां,स्टार,जीं,सहारा और सोनी इतने lavish सीरियल बनाते है वहां दूरदर्शन इतने आम से सीरियल कैसे बनाता है पर शायद इसलिये क्यूंकि दूरदर्शन दूरदर्शन है।

Sunday, June 24, 2007

जी हम ये अनुभव की बात बता रहे है और शायद आप लोग सहमत भी हो।आज हम करीब आठ -दस दिन बाद पोस्ट लिख रहे है वो इसलिये क्यूंकि हमारा कंप्यूटर कुछ बीमार या यूं कहे की कुछ खराब हो गया था ,पहले तो लगा था की शायद अब ये ठीक ही नही हो पायेगा क्यूंकि बेचारा काफी पुराना जो हो गया है। और आजकल तो हर पल नयी -नयी टेक्नोलॉजी आ रही है पर खैर नेहरू प्लेस जिंदाबाद।

नेहरू प्लेस एक ऐसी जगह है जहाँ कंप्यूटर की हर बीमारी का इलाज हो जाता है तो हम भी अपने बेटे के साथ कंप्यूटर को लेकर पहुंच गए और एक दुकान पर दिखाया तो दूकानदार बोला कि ठीक तो हो जाएगा पर चार सौ लगेगा और ढाई घंटे बाद मिलेगा। वो चार सौ ऐसे बोला मानो हम उससे फ्री मे ठीक करने को बोल रहे हो और ढाई घंटे सुनकर भी जरा अजीब लगा क्यूंकि आम तौर पर लोग दो या चार या शाम को कंप्यूटर मिलेगा कहते है। खैर हमने बेटे से कहा कि अब शाम को ही आया जाएगा क्यूंकि उन दिनों गरमी बहुत पड़ रही थी।इस पर बेटे ने कहा की आप क्यों बार-बार आएँगी ,मैं अपने दोस्तों के साथ चला जाऊंगा और कंप्यूटर ले आऊंगा । तो शाम को जब बेटा दुकान पर पहुँचा तो दूकानदार ने कहा कि अभी तो पता ही नही चल पाय है की प्रॉब्लम क्या है। इसलिये एक दिन बाद कंप्यूटर लेने आना। जब बेटा एक दिन बाद गया तो पता चला कि प्रॉब्लम तो पता ही नही चल रही है। फिर उसने कहा कि u.s.b.कार्ड लगा देते है जिससे शायद कंप्यूटर काम करना शुरू कर देगा। खैर बेटे ने फ़टाफ़ट वहीँ से कार्ड खरीद कर लगवाया और दुकान पर कंप्यूटर चल भी गया । घर पर भी चल गया तो हमने भी चेन कि सांस ली कि चलो अब तो कोई दिक्कत नही आएगी पर जो हम सोचते है वो होता नही है। अभी हम और बेटा खुश हो ही रहे थे कि चलो कंप्यूटर चल गया कि वापस फिर से कंप्यूटर उड़ गया। हम लोग समझ ही नही पाए कि अब क्या करें। इस बार तो लगा कि अब हमारा कंप्यूटर ठीक होने से रहा क्यूंकि इतनी जल्दी-जल्दी खराब जो हो रहा था। जरा सा चलाया नही कि reset हो जाता था ,बड़ी मुश्किल से reset होने की बीमारी ठीक हुई।

और जब सब कुछ ठीक हो गया तो पता चला की नेट ही नही चल रहा है क्यूंकि बकौल m.t.n.l के हमारा बिल नही भरा गया था तो पहले बेटा गया m.t.n.l.के ऑफिस तो वहां बैठे हुए आदमी ने उसको ये कहकर टाल दिया की बिल नही भरा है और जब उसने कहा की बिल तो नेट से सात जून को भर दिया गया है तो उस आदमी ने बेटे से कहा की प्रूफ़ लाओ। तो दुसरे दिन हम बेटे के साथ गए m.t.n.l.के ऑफिस और जब हमने पूछा की नेट नही चल रहा है जबकी बिल पहले ही दिया जा चुका है तो उसने हमसे भी कहा की प्रूफ़ क्या है? और कहा की प्रूफ़ लाइये। पर फिर कुछ सोच कर बोला की क्यूंकि आप लेडी है इसलिये हम आपको एक नंबर देते है वहां बात कर लीजिये। जब हमने वहां फ़ोन किया तो फ़ोन उठाने वाली महिला ने हमे एक और नम्बर दिया ये कहते हुए की बिल नेट से पे किये जाते है उन्हें उसके बारे मे पता होता है। हमने सोचा की अब आज तो काम होने से रहा पर चलते-चलते हमने उस आदमी से कहा की जो नम्बर उसने दिया था वहां से बात नही हो पायी है तो उसने जब फ़ोन मिलाया तो फ़ोन मिल गया और जिसे हमने पूरा डिटेल बताया और सब तारीख ,ट्रांसिक्शन नम्बर वगैरा तो उसने कन्फर्म किया की बिल तो भरा जा चुका है तब उस आदमी ने कहा कि २-३ घंटे बाद नेट चल जाएगा।

शाम को नेट चल गया तो हम भी पोस्ट लिखने बैठे पर ये क्या अभी कुछ लाइने लिखी ही थी की फिर कंप्यूटर बंद हो गया। अब तो हमे पक्का यकीन हो गया की अब ये कंप्यूटर चल ही नही पायेगा पर हमारा कंप्यूटर भी अपनी ही तरह का है कल रात मे अचानक फिर ठीक हो गया और अभी तक ठीक चल रहा है।

Sunday, June 10, 2007

यादों के झरोखों की शुरुआत हम इस बार की इलाहाबाद यात्रा से कर रहे है क्यूंकि इस बार हम इलाहाबाद मे अपने कुछ पुराने सहपाठियों से मिले थे । यूं तो हम जब भी इलाहाबाद जाते थे तो कभी कभार ही किसी से मिल पाते थे क्यूंकि ज्यादातर हम छुट्टियों मे जाते थे और उस समय दुसरे लोग भी बाहर गए हुए होते थे। वैसे इलाहाबाद मे अब तो बस दो चार ही लोग हमारे साथ के बचे है बाक़ी सब लोग अलग-अलग जगहों पर है।

अभी पिछले हफ्ते जब हम इलाहाबाद मे थे तो इस बार हमने सोचा कि चलो अपने कुछ दोस्तो का हाल-चाल लिया जाये लिहाजा हमने अपनी एक दोस्त अनामिका को फ़ोन किया क्यूंकि एक वही है जो इलाहाबाद मे रहती है असल मे वो युनिवर्सिटी मे ancient history पढाती है । और इस बार भी वही हुआ जो पहले भी होता आया है मतलब की फ़ोन पर पता चला की वो बाहर गयी हुई है और दो-तीन दिन मे आएगी ,खैर हमने अपना नाम बताकर
message छोड़ दिया और मन ही मन सोचा कि लगता है इस बार भी किसी से मिल नही पायेंगे। पर दिल्ली लौटने से दो दिन पहले एक शाम हमने और पापा ने सिविल लाइंस घूमने का कार्यक्रम बनाया था और शाम छे बजे हम लोग तैयार होने से पहले चाय पी ही रहे थे कि servant ने आकर बोला कि दीदीजी आपसे मिलने कोई आया है । हम थोडा आश्चर्य मे थे कि भला हमसे मिलने कौन आ गया क्यूंकि अनामिका तो आने वाली नही थी। पर बाहर जाकर देखा तो अनामिका खडी थी ।


हमे एक सेकेंड लगा उसे पहचानने मे क्यूंकि वो पहले से कुछ पतली हो गयी थी और उसका हेयर स्टाइल भी बदल गया था बस फिर हम दोनो एक-दुसरे के गले लग गए आख़िर १०-१५ साल बाद जो मिल रहे थे वैसे अनामिका से हम एक-दो बार पहले भी मिल चुके थे। फिर हम लोग ड्राइंग रूम मे बैठे तो पहले घर बार की और बच्चों की बातें और बस फिर शुरू हो गयी एम् ए के दिनों की बातें और इसी बातचीत के दौरान अनामिका ने बताया की उसने और हर्ष ने जो की हम लोगों का classmate था और जो अब युनिवर्सिटी मे पढाता है ने प्लान किया था की चुंकि इस बार हम लोगों की एम् ए की पढ़ाई के पच्चीस साल हो रहे है तो क्यों ना इस बार अपने सारे ग्रुप का पता किया जाये की कौन कहॉ है । तो हमने कहा की चलो यही से शुरुआत कर लेते है।

बस फिर क्या था हम लोगों ने हर्ष को फ़ोन किया और उसे वही घर पर बुला लिया और फिर तो जो बातें शुरू हुई की कुछ पूछिये मत ऐसा लगा मानो हम लोग वापस पच्चीस साल पीछे चले गए हो। हम लडकियां तो शादी के बाद अपने घर-परिवार मे व्यस्त हो जाती है पर लड़के तो अपनी दोस्ती बरकरार रखते है। ये हम इसलिये कह रहे है क्यूंकि शादी के बाद हम सब लडकियां भी एक दुसरे से बिल्कुल कट ऑफ़ हो गयी थी । बस अनामिका ही थोडा बहुत लोगों के बारे मे जानती थी क्यूंकि वो इलाहाबाद मे जो रहती है। हर्ष से ही पता चला की रवि जो अब बड़ोदा मे है वो किसी कंपनी मे सी इ.ओं बन गया है तो यशवंत लखनऊ के मेडिकल कालेज मे रजिस्ट्रार हो गया है और संतोष राय जो यू.पी.पुलिस मे है वो भी लखनऊ मे है । हम लोगों के साथ एक और ममता (जगाती )पढ़ती थी वो आजकल baroda मे है और सुधा लखनऊ मे है तो नीलिमा की शादी गाँव मे हुई है और वो वही रहती है। हर्ष के पास कुछ लोगों के फ़ोन नंबर थे सो हम लोगों ने सबसे फोन मिला कर बात की और पुराने दिनों को याद किया । पहले तो हर कोई आश्चर्य मे पड़ जाता था क्यूंकि पच्चीस साल कोई छोटा समय नही होता है और इतने साल मे तो आवाज और शक्ल दोनो ही थोड़ी बदल जाती है।खैर जो भी हो हम लोगों को सबसे बात करके ख़ूब मजा आया और जाते -जाते ये तय हुआ कि अब हम लोग एक दुसरे से आगे भी बात करते रहेंगेऔर इस तरह हम लोगों ने मनाई अपने एम्..की सिल्वर जुबली

और हमारा पापा के साथ सिविल लाईन्स जाने का कार्यक्रम धरा का धरा रह गया ।

Wednesday, June 6, 2007

आज कल रोज ही नए-नए किसानो के नाम सुनने और पढ़ने को मिल रहे है ,हालांकि इससे पहले शायद ही कभी किसी किसान का नाम टी.वी.या अखबार मे छपा होगा पर अब तो बडे ही उंचे दर्जे के किसान बिल्कुल फिल्मी स्टाइल के होने लगे है । अब वो चाहे लगान के भुवन हो या चाहे अदालत के अमिताभ बच्चन या फिर दिलवाले दुल्हनिया की काजोल या अजय देवगन हो या फिर बैराग की सायरा बानो हो ,हर कोई किसान है। अगर ये सब किसान हो सकते है तो भला धर्मेंद्र कैसे पीछे रहेंगे। अब आगे-आगे देखिए और पता नही कितने नए किसानो के नाम पता चलेंगे । लगता है कि सारे किसान पुणे मे ही खेती करते है

ऐसा लगता है की फिल्मी दुनिया मे होड़ लगी है की कौन नम्बर वन किसान है। हर कोई अपने को इस देश का किसान साबित करने मे लगा है। अमिताभ बच्चन जब अपने को पुणे का किसान नही कहला पाए तो उत्तर प्रदेश मे (ये तो सभी जानते है की वो इलाहाबाद के रहने वाले है ) वो ये साबित करने मे लग गए कि वो वहां यानी बाराबंकी के किसान है। अब अगर वो इतने सालों से किसान थे तो उसे साबित करने मे इतनी परेशानी क्यों हो रही है। भाई उस गाँव मे तो हर कोई जानता ही होगा कि ये खेत अमिताभ बच्चन का है । और अगर वो खेत अमिताभ बच्चन का है तो फिर उसमे कोई दूसरा किस हक से खेती कर रहा था ?और इतने दिनों तक चुप क्यों थे? बस भैया इतना ही तो बताना है ।

आमिर खान तो और दो हाथ आगे निकले उन्होने तो ये भी कह दिया कि किसान का बेटा किसान होता है। और वो राजस्थान के किसान है।इस हिसाब से तो डॉक्टर का बेटा डॉक्टर और वकील का बेटा वकील और लेखक का बेटा लेखक कहलाना चाहिऐ। धर्मेंद्र को तो शायद पंजाब का जाट होने का फायदा हो गया है।


अब देखना है कि शाह रुख खान और ऋतिक रोशन और अन्य बडे सितारे कब अपने आप को किसान घोषित करते है ?

Tuesday, June 5, 2007

आज समूचे विश्व मे पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है तो जाहिर है कि दिल्ली मे भी मनाया जा रहा है। तो इसके दो विपरीत रुप आप यहां पर देख सकते है। जहां एक तरफ सरकार पेड़ लगाने को कह रही है वही दूसरी ओर पेड़ काटने की बात कह रही है। ये दोनो फोटो आज के हिंदुस्तान टाइम्स के पेज दो और तीन से लिए गए है।

Monday, June 4, 2007

आज हम इलाहाबाद की कुछ तस्वीरें लगा रहे हैकुछ मायनों मे इलाहाबाद बिल्कुल भी नही बदला है पर कुछ मायनों मे हम कह सकते है कि इलाहाबाद कुछ बदल गया हैइसका अंदाजा आपको फोटो देख कर भी हो जाएगा
जैसे आज भी वहां इक्का,तांगा,चलता हैआज भी ऊंट पर तरबूज लेकर बाजार मे जाया जाता हैऔर इतने ज़माने बाद भी हनुमान मंदिर मे लडकी दिखाने का system चला रहा हैअरे ये हम आंखों देखा बता रहे है परसों हम अपनी भतीजी के साथ मंदिर गए थे तो वहां कोई लड़के वाले लडकी को देखने आये थेजिसे देख कर हमारी भतीजी ने सवाल पूछा कि बुआ हनुमान जी तो ब्रह्मचारी थे तो फिर उनके मंदिर मे लड़कियां देखने का system क्यों है ? और हां वो जैप्नीज पार्क मे जो ग्रे रंग का हाथी होता था वो अब काले रंग का हो गया है


इसमे इक्का दिख रहा है जो आज भी चलता है
ये इलाहाबाद का ट्रेडमार्क रिक्शा जो सिर्फ और सिर्फ इलाहाबाद मे ही दिखता है

ये सुबह साढे छे बजे मौरनिंग वाक् पर जाने से पहले ली गयी है, एक साथ करीब दस -बारह ऊंट एक के बाद एक चढाई चढ़ते हुए बहुत ही सुन्दर लगते थे।

ये कंपनी बाग़ मे स्थापित चंद्रशेखर आजाद की नयी मूर्ति है।



ये ग्रैंड होटल गजद्ज़ की जगह पर बना है अरे वही जहाँ किसी ज़माने मे बहुत ही अच्छी आइस-क्रीम मिला करती थी। अरे याद आया कि नही। (trafic delight)

इस पिक्चर हॉल को पहचाना ,ये पुराना प्लाजा पिक्चर हॉल है जो अब राज करन नाम से जाना जाता है।

अब इलाहाबाद मे भी मॉल system शुरू हो रहा है। जैसे आप इस फोटो मे बिग बाजार को देख सकते है। और इसके बेसमेंट मे बड़ी-बड़ी कम्पनियों के शोरूम है। साथ ही आप mcdonald भी देख सकते है।



ये इलाहाबाद का साइंस कालेज है ।
इसमे टाँगे मे सवार लोग देख सकते है। ये बसंती के टाँगे से कम नही है।

इस फोटो मे तो बीते हुए कल और आज को आप बखूबी देख सकते है मतलब पहले तो सिर्फ मिटटी के सादे घड़े और गुल्लक वगैरा बनती थी पर अब उन्हें रंग भी दिया जाता है।

Friday, June 1, 2007

अब चूंकि हम इलाहाबाद मे है और पापा रोज सुबह कंपनी बाग़ मे मोर्निंग वाक् के लिए जाते है तो हम भी उनके साथ सुबह टहलने चले जाते है। आज के कंपनी बाग़ और तीस साल पहले के कंपनी बाग़ मे जमीन आसमान का फर्क आ गया है। पहले तो लोग कंपनी बाग़ के नाम पर ही डर से जाया करते थे क्यूंकि उस समय उसे सेफ नही माना जाता था । कुछ तो हिंदू होस्टल के कारण और कुछ वहां के जंगल की वजह से। पर अब समय इतना बदल गया है कि क्या सुबह क्या शाम हर समय आपको वहां टहलने वालों की भीड़ दिख जायेगी। अब तो इतनी लाइट लग गयी है कि रात मे भी चारों ओर उजाला सा रहता है। और बीच मे जो पार्क है वो बहुत अच्छा है । वाकिंग ट्रैक के साथ-साथ थोड़ी-थोड़ी दूर पर लोगों के बैठने के लिए बेंच भी बनी है।

इसी कंपनी बाग़ को एल्फ्रेड पार्क के नाम से भी जाना जाता था पर आज इसका नाम चंद्रशेखर आजाद उद्यान हो गया है। ये वही पार्क है जहाँ अंग्रेजों से लड़ते हुए चंद्रशेखर आजाद ने बड़ी ही बहादुरी से अंग्रेजों का मुक़ाबला किया था और जब उन्हें लगा की वो गिरफ्तार हो जायेंगे तो उन्होने अपनी ही रिवाल्वर से अपने आप को गोली मार ली थी।और जिस स्थल पर वो शहीद हुए थे वहां पर उनकी एक मूर्ति लगायी गयी थी जिसमे वो अपनी मूंछों पर ताव देते हुए दिखाए गए थे ,पर इस बार हमने देखा की उनकी मूर्ति बदल गयी है । पहले उनकी आधी मतलब क़मर तक ही सफ़ेद मूर्ति बनी थी पर जो नयी मूर्ति है उसमे चंद्रशेखर आजाद खड़े है और ये मूर्ति काफी भव्य है और हां इस मूर्ति मे भी वो अपनी मूंछों पर ताव देते हुए दिखाए गए। और इस स्थल का नाम शहीदी स्थल रखा गया है।

पार्क मे सुबह जाकर टहलने का चलन तो काफी दिनों से है पर इस बार तो ऐसा लगा मानो पूरा इलाहाबाद शहर ही सुबह उठ जाता है ( उसमे हम भी शामिल है ) और सभी लोग कंपनी बाग़ मे आ जाते है। हर उम्र के लोग दिखते है चाहे वो बुजुर्ग हो या जवान ,औरत हो या आदमी ,लड़के लडकियां बच्चे और कुछ लोग तो अपने पालतू doggi के साथ भी टहलने आते है। कुछ लोग ग्रुप बनाकर चलते है तो कुछ लोग अकेले ही चलते है तो कोई अपने पूरे परिवार के साथ टहलता है। कोई दौड़ता है तो कोई बहुत तेज-तेज चलता है तो कुछ लोग जोर-जोर से ठहाके लगते हुए चलते है। हर कोई अपने स्वास्थ्य को ठीक रखना चाहता है। कुछ बच्चे साइकिल चलाते है तो कुछ क्रिकेट खेलते है तो कुछ झूला झूलते है। ऐसा नही है कि सिर्फ बडे और बच्चे ही वहां आते है लड़के -लडकियां भी टहलने आते है। बच्चों को सुबह उठ कर टहलते और खेलते हुए देख कर बहुत अच्छा लगा क्यूंकि कम से कम यहाँ अभी सुबह उठने का कुछ जोश लोगों मे दिखता है वरना आजकल तो लोगों ने सुबह उठना ही छोड़ दिया है खासकर बच्चों ने।

वैसे पूरे कंपनी बाग का एक चक्कर हम भी लगा लेते है और घर आकर दही जलेबी का आनंद उठाते है। जो मजा सुबह -सुबह गरमा- गरम जलेबी खाने मे आता है उसका कोई मुकाबला नही है।