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Showing posts from June, 2007

जंग -ए- एडमीशन

आज के समय मे किसी कालेज मे एडमीशन लेना किसी जंग से कम नही है मतलब अब एडमीशन लेना कोई आसान काम नही रह गया है क्यूंकि अब बच्चों को इतने ज्यादा नम्बर मिलते है कि जिन बच्चों के कम नम्बर आते है उनके लिए कहीँ भी एडमीशन पाना मुश्किल हो जाता है। खास कर दिल्ली विश्वविद्यालय मे जहाँ अब सत्तर से नब्बे परसेंट नम्बर लाने वाले बच्चों को ही एडमिशन मिल सकता है। कई बार तो नब्बे परसेंट लाने पर भी बच्चों को ना तो अपने पसंद का कालेज मिलता है और ना ही अपनी पसंद का विषय मिलता है। अब वो जमाना नही रहा कि साठ परसेंट पाने वाले को इज्जत की नजर से देखा जाये । हमे तो लगता है कि जितने नम्बर हमारे आते थे उसमे तो किसी कालेज मे आज के समय मे एडमिशन मिलना मुमकिन ही नही होता।आज जबकि इतने ज्यादा कालेज हो गए है तब भी ।

आज कल अगर बच्चा किसी प्रोफेशनल कोर्स मे मसलन इन्जीनियेरिग या मेडिकल मे नही सेलेक्ट हो पाता है है तो ऐसा लगता है कि अब क्या करें क्यूंकि अब बिना प्रोफेशनल डिग्री के तो काम चल ही नही सकता है। पिछले कई दिनों से हम भी इसीलिये थोड़े परेशान थे क्यूंकि जब हमारे छोटे बेटे का इन्जीनिएरिंग मे नही हुआ तो लगा कि अब…

क्या हम और आप चुन सकते है राष्ट्रपति ?

आज कल हर न्यूज़ चैनल और अखबार मे बस यही खबर होती है कि कौन होगा भारत का अगला राष्ट्रपति ?पर क्या हमारे आपके या किसी के कहने से कुछ होता है। हर रोज नयी-नयी बातें सुनने को मिलती है या तो प्रतिभा पाटिल के खिलाफ या शेखावत के खिलाफ। हर राजनैतिक पार्टी इसी कोशिश मे है की किस उम्मीदवार को कितना नीचा दिखाया जा सकता है। इससे पहले तो कभी भी इतना ज्यादा विवाद सुनने को नही मिला था वो भी राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के खिलाफ।


क्या इस तरह से कुछ या बहुत कुछ कहने से या खबरों को दिखाने से राष्ट्रपति के चुनाव मे कोई फर्क पड़ेगा ?

ये वैसे तो हमारी सोच है कि इन सभी तरह की खबरों और खुलासों से कुछ भी होने वाला नही है क्यूंकि जिन्हे राष्ट्रपति चुनना है उन लोगों पर शायद ही ऐसी बातों का असर पडता है। और हमारे उम्मीदवारों की सेहत पर भी कोई असर नही पड़ता है। ये तो हम सभी जानते है।

अब जब भारत के प्रधानमंत्री ही कहे कि प्रतिभा पाटिल के खिलाफ कोई सीधा केस नही है तो दुनिया कुछ भी कहे क्या फर्क पड़ता है। वैसे भी भाई-भतीजा वाद भला कोई जुर्म है जिसके लिए हम या आप या कोई भी उन्हें राष्ट्रपति पद से वंचित क…

हम ब्लॉगिंग की दुनिया मे कैसे पहुंचे ?

जब हमने ब्लॉगिंग के तीन महीने नाम की एक पोस्ट लिखी थी तब शिरीष जी अपने कमेंट मे हमसे पूछा था की हमने ब्लॉगिंग कैसे शुरू की और क्या हमारे बेटे और पतिदेव भी ब्लॉग लिखते है। और अगर नही लिखते है तो हमे ब्लॉगिंग के बारे मे कैसे पता चला ? कई दिनों से हम लिखने की सोच रहे थे तो सोचा आज इस बारे मे लिख ही दिया जाये। तो सबसे पहले हम ये बता दे की ना तो हमारे बेटे और ना ही हमारे पतिदेव ब्लॉग लिखते है हाँ वो लोग हिंदी और इंग्लिश के ब्लॉग पढ़ते जरूर है।

हमने ब्लॉगिंग कैसे शुरू की इसके बारे मे तो हमने अपनी पिछली पोस्ट मे भी लिखा था पर हमे इसके बारे मे कैसे पता चला तो हुआ यूं की अगस्त २००६ से हम गोवा मे है और गोवा मे थोड़ी भाषा की समस्या होने से हमने कुछ ज्वाइन नही किया था वैसे भी हम पार्ट टाइम ही काम करते है। एक तो वहां भी दिन बहुत बड़ा होता है और जब घर मे सब लोग अपने -अपने कामों मे व्यस्त हो तो दिन भर कोई क्या करे। और दुसरे चुंकि हम वहां ज्यादा लोगों को जानते नही है इसलिये किसी के घर ज्यादा आना-जाना भी नही होता था। ऐसे मे समय बिताने के लिए हम टी.वी.देखते थे या कुछ पढ़ लेते थे। घर मे बेटे और पतिदेव…

यादों के झरोखों से ...जब हम छोटे थे

जी बिल्कुल सही समझा है आपने आज हम कुछ ऐसी ही बात करने जा रहे है। आज भी हम अपने घर मे छोटे समझे जाते है क्यूंकि पांच भाई-बहनो मे हम सबसे छोटे जो है और वो कहते है ना कि छोटे कभी बडे होते ही नही है। वैसे छोटे होने के फ़ायदे होते है तो नुकसान भी होते है पर शायद नही यक़ीनन फ़ायदे ज्यादा होते है।

जब हम छोटे थे तो घर मे हर कोई हमे अलग नाम से पुकारता था और घर मे जितने ज्यादा nickname हमारे थे वो और किसी भाई-बहन के नही थे। चलिये कुछ नामों का हम यहां जिक्र कर ही देते है। अब चुंकि हम हमेशा से गोल-मटोल है तो हमारे बाबा जिन्हे हम प्यार से बाबूजी कहते थे वो हमे टुनटुन कह कर बुलाते थे तो हमारे पापा-ममी हमे मंतु कहते थे तो हमारे भईया बकतुनिया और जिज्जी लोग मुन्नी ,गुड़िया और सबसे मजेदार नाम तो परसादी लाल वो इसलिये क्यूंकि जब भी हमारी मम्मी पूजा करती थी तो हम सबको प्रसाद बाँटा करते थे
और ऐसा नही कि अब सबने हमे इन नामों से पुकारना बंद कर दिया है अभी भी हमे इन नामों से पुकारा जाता है।

अब चुंकि हम छोटे थे तो जाहिर है कि थोड़े जिद्दी भी थे और अगर कोई कहीं जा रहा हो और हमे साथ ना ले जाये तो बस रोना शुर…

दूरदर्शन ..आज भी वैसा ही है.

अब आप सोच रहे होंगे की अब दूरदर्शन की बात कहॉ से आ गयी तो बात दरअसल मे ये है की आज कल हम दूरदर्शन ही देख रहे है क्यूंकि दिल्ली मे अब cas जो शुरू हो चुका है और अब केबल आता नही है इसलिये आज कल हम दूरदर्शन ही देखते है ।चूंकि हम यहां सिर्फ दो महीने के लिए आये है इसलिये डिश टी.वी.नही लगवा रहे है । वैसे फ्री चैनल मे सारे न्यूज़ चैनल और कुछ music चैनल भी है।औरआपकोतोपताहीहैकिहमाराटी.वी.देखेबिनागुजारानहीहै।

पिछले दस -बारह दिन तो कंप्यूटर भी नही चल रहा था और गरमी इतनी कि कोई घूमने भी कहां जाये और फिर टी.वी.देखने के अलावा कोई काम ही नही था। तो दूरदर्शन देख लेते थे क्यूंकि सारे समय न्यूज़ तो देखा नही जा सकता है ,और न्यूज़ चैनल भी आजकल ज्यादातर अंधविश्वास को बढ़ाने वाली बाते या फिर बहुत ही भयानक से कार्यक्रम जैसे वारदात ,सनसनी ,जुर्म,और भी ना जाने कौन-कौन से नाम है ऐसे कार्यक्रमों के जिन्हे दिन भर मे दो-चार बार तो दिखा ही देते है। आज कल तो ऐसा लगता है की स्टार प्लस और आजतक एक दुसरे का चैनल देख कर ही न्यूज़ दिखाते है मसलन अगर आजतक कोई फिल्मी कार्यक्रम दिखायेगा तो स्टार भी उसी समय फिल्मी कार्यक…

कंप्यूटर की छुट्टी माने ब्लॉगिंग की छुट्टी

जी हम ये अनुभव की बात बता रहे है और शायद आप लोग सहमत भी हो।आज हम करीब आठ -दस दिन बाद पोस्ट लिख रहे है वो इसलिये क्यूंकि हमारा कंप्यूटर कुछ बीमार या यूं कहे की कुछ खराब हो गया था ,पहले तो लगा था की शायद अब ये ठीक ही नही हो पायेगा क्यूंकि बेचारा काफी पुराना जो हो गया है। और आजकल तो हर पल नयी -नयी टेक्नोलॉजी आ रही है पर खैर नेहरू प्लेस जिंदाबाद।

नेहरू प्लेस एक ऐसी जगह है जहाँ कंप्यूटर की हर बीमारी का इलाज हो जाता है तो हम भी अपने बेटे के साथ कंप्यूटर को लेकर पहुंच गए और एक दुकान पर दिखाया तो दूकानदार बोला कि ठीक तो हो जाएगा पर चार सौ लगेगा और ढाई घंटे बाद मिलेगा। वो चार सौ ऐसे बोला मानो हम उससे फ्री मे ठीक करने को बोल रहे हो और ढाई घंटे सुनकर भी जरा अजीब लगा क्यूंकि आम तौर पर लोग दो या चार या शाम को कंप्यूटर मिलेगा कहते है। खैर हमने बेटे से कहा कि अब शाम को ही आया जाएगा क्यूंकि उन दिनों गरमी बहुत पड़ रही थी।इस पर बेटे ने कहा की आप क्यों बार-बार आएँगी ,मैं अपने दोस्तों के साथ चला जाऊंगा और कंप्यूटर ले आऊंगा । तो शाम को जब बेटा दुकान पर पहुँचा तो दूकानदार ने कहा कि अभी तो पता ही नही च…

यादों के झरोखों से ...एम् ए की सिल्वर जुबली

यादों के झरोखों की शुरुआत हम इस बार की इलाहाबाद यात्रा से कर रहे है क्यूंकि इस बार हम इलाहाबाद मे अपने कुछ पुराने सहपाठियों से मिले थे । यूं तो हम जब भी इलाहाबाद जाते थे तो कभी कभार ही किसी से मिल पाते थे क्यूंकि ज्यादातर हम छुट्टियों मे जाते थे और उस समय दुसरे लोग भी बाहर गए हुए होते थे। वैसे इलाहाबाद मे अब तो बस दो चार ही लोग हमारे साथ के बचे है बाक़ी सब लोग अलग-अलग जगहों पर है।

अभी पिछले हफ्ते जब हम इलाहाबाद मे थे तो इस बार हमने सोचा कि चलो अपने कुछ दोस्तो का हाल-चाल लिया जाये लिहाजा हमने अपनी एक दोस्त अनामिका को फ़ोन किया क्यूंकि एक वही है जो इलाहाबाद मे रहती है असल मे वो युनिवर्सिटी मे ancient history पढाती है । और इस बार भी वही हुआ जो पहले भी होता आया है मतलब की फ़ोन पर पता चला की वो बाहर गयी हुई है और दो-तीन दिन मे आएगी ,खैर हमने अपना नाम बताकर
message छोड़ दिया और मन ही मन सोचा कि लगता है इस बार भी किसी से मिल नही पायेंगे। पर दिल्ली लौटने से दो दिन पहले एक शाम हमने और पापा ने सिविल लाइंस घूमने का कार्यक्रम बनाया था और शाम छे बजे हम लोग तैयार होने से पहले चाय पी ही रहे थे क…

नए-नए किसान

आज कल रोज ही नए-नए किसानो के नाम सुनने और पढ़ने को मिल रहे है ,हालांकि इससे पहले शायद ही कभी किसी किसान का नाम टी.वी.या अखबार मे छपा होगा पर अब तो बडे ही उंचे दर्जे के किसान बिल्कुल फिल्मी स्टाइल के होने लगे है । अब वो चाहे लगान के भुवन हो या चाहे अदालत के अमिताभ बच्चन या फिर दिलवाले दुल्हनिया की काजोल या अजय देवगन हो या फिर बैराग की सायरा बानो हो ,हर कोई किसान है। अगर ये सब किसान हो सकते है तो भला धर्मेंद्र कैसे पीछे रहेंगे। अब आगे-आगे देखिए और पता नही कितने नए किसानो के नाम पता चलेंगे । लगताहैकिसारेकिसानपुणेमेहीखेतीकरतेहै।

ऐसा लगता है की फिल्मी दुनिया मे होड़ लगी है की कौन नम्बर वन किसान है। हर कोई अपने को इस देश का किसान साबित करने मे लगा है। अमिताभ बच्चन जब अपने को पुणे का किसान नही कहला पाए तो उत्तर प्रदेश मे (ये तो सभी जानते है की वो इलाहाबाद के रहने वाले है ) वो ये साबित करने मे लग गए कि वो वहां यानी बाराबंकी के किसान है। अब अगर वो इतने सालों से किसान थे तो उसे साबित करने मे इतनी परेशानी क्यों हो रही है। भाई उस गाँव मे तो हर कोई जानता ही होगा कि ये खेत अमिताभ बच्चन …

विश्व पर्यावरण दिवस

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आज समूचे विश्व मे पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है तो जाहिर है कि दिल्ली मे भी मनाया जा रहा है। तो इसके दो विपरीत रुप आप यहां पर देख सकते है। जहां एक तरफ सरकार पेड़ लगाने को कह रही है वही दूसरी ओर पेड़ काटने की बात कह रही है। ये दोनो फोटो आज के हिंदुस्तानटाइम्सके पेज दो और तीन से लिए गए है।

इलाहाबाद की कुछ तसवीरें

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आजहमइलाहाबादकीकुछतस्वीरेंलगारहेहै। कुछमायनोंमेइलाहाबादबिल्कुलभीनहीबदलाहैपरकुछमायनोंमेहमकहसकतेहैकिइलाहाबादकुछबदलगयाहै। इसकाअंदाजाआपकोफोटोदेखकरभीहोजाएगा।
जैसेआजभीवहांइक्का,तांगा,चलताहै। आजभीऊंटपरतरबूजलेकरबाजारमेजायाजाताहै। औरइतनेज़मानेबादभीहनुमानमंदिरमेलडकीदिखानेकाsystemचलाआरहाहै। अरेयेहमआंखोंदेखाबतारहेहैपरसोंहमअपनीभतीजीकेसाथमंदिरगएथेतोवहांकोईलड़केवालेलडकीकोदेखनेआयेथे । जिसेदेखकरहमारीभतीजीनेसवालपूछाकिबुआहनुमानजीतोब्रह्मचारीथेतोफिरउनकेमंदिरमेलड़कियांदेखनेकाsystemक्योंहै ? औरहांवोजैप्नीजपार्कमेजोग्रेरंगकाहाथीहोताथावोअबकालेरंगकाहोगयाहै।


इसमेइक्कादिखरहाहैजोआजभीचलताहै।
ये इलाहाबाद काट्रेडमार्करिक्शाजोसिर्फऔरसिर्फइलाहाबादमेहीदिखताहै ।

ये सुबह साढे छे बजे मौरनिंग वाक् पर जाने से पहले ली गयी है, एक साथ करीब दस -बारह ऊंट एक के बाद एक चढाई चढ़ते हुए बहुत ही सुन्दर लगते थे।

ये कंपनी बाग़ मे स्थापित चंद्रशेखर आजाद की नयी मूर्ति है।



ये ग्रैंड होटल गजद्ज़ की जगह पर बना है अरे वही जहाँ किसी ज़माने मे बहुत ही अच्छी आइस-क्रीम मिला करती थी। अरे याद आया कि नही। (trafic delight)

इस पिक्चर हॉल को पहचाना ,ये…

कंपनी बाग़ मे मोर्निंग वाक्

अब चूंकि हम इलाहाबाद मे है और पापा रोज सुबह कंपनी बाग़ मे मोर्निंग वाक् के लिए जाते है तो हम भी उनके साथ सुबह टहलने चले जाते है। आज के कंपनी बाग़ और तीस साल पहले के कंपनी बाग़ मे जमीन आसमान का फर्क आ गया है। पहले तो लोग कंपनी बाग़ के नाम पर ही डर से जाया करते थे क्यूंकि उस समय उसे सेफ नही माना जाता था । कुछ तो हिंदू होस्टल के कारण और कुछ वहां के जंगल की वजह से। पर अब समय इतना बदल गया है कि क्या सुबह क्या शाम हर समय आपको वहां टहलने वालों की भीड़ दिख जायेगी। अब तो इतनी लाइट लग गयी है कि रात मे भी चारों ओर उजाला सा रहता है। और बीच मे जो पार्क है वो बहुत अच्छा है । वाकिंग ट्रैक के साथ-साथ थोड़ी-थोड़ी दूर पर लोगों के बैठने के लिए बेंच भी बनी है।

इसी कंपनी बाग़ को एल्फ्रेड पार्क के नाम से भी जाना जाता था पर आज इसका नाम चंद्रशेखर आजाद उद्यान हो गया है। ये वही पार्क है जहाँ अंग्रेजों से लड़ते हुए चंद्रशेखर आजाद ने बड़ी ही बहादुरी से अंग्रेजों का मुक़ाबला किया था और जब उन्हें लगा की वो गिरफ्तार हो जायेंगे तो उन्होने अपनी ही रिवाल्वर से अपने आप को गोली मार ली थी।और जिस स्थल पर वो शहीद हुए थ…