Friday, April 30, 2010


अब आजकल तो सभी जगह गर्मी की बहार सी आई हुई है और यहां भी जब कभी सूरज देवता नजर आते है तो अपने पूरे तेज के साथ नजर आते है यानी कड़क धूप । वैसे यहां पर बारिश मे तो लोग छाता लेकर चलते ही है पर अगर धूप निकली हो तब तो जरुर ही छाता लेकर चलते है। क्यूंकि धूप से बचना भी बहुत जरुरी होता है क्यूंकि यहां बिलकुल झुलसा देने वाली धूप होती है। और वो शायद इसलिए क्यूंकि यहां कोई प्रदुषण नहीं है । धूप के समय हर तरफ रंग-बिरंगी छतरी नजर आती है। :)
यहां पर बागीचे और पार्कों मे काम करने वाली महिलायें भी इस बात का पूरा ध्यान रखती है । यूँ तो ये लोग पूरे दिन काम नहीं करती है बस सुबह के २ घंटे काम करती है और उसके बाद चली जाती है। (अभी तक तो हमने इतनी देर ही इन्हें काम करते देखा है ) फिर भी ये ख्याल रखती है और अपना धूप से बचाव करती है और इसके लिए वो कैप,छाता,और सिर पर कपडा वगैरा बाँध करके ही काम करती है।ये बहुत अच्छी बात ये है ।

वैसे यहां जो औरतें मजदूरी करती है वो भी हमेशा अपना मुंह और सिर कपडे से बांधे रहती है धूप और धूल-मिटटी से बचने के लिए

Wednesday, April 28, 2010

अब बचपन के दिन तो हरेक के जीवन के सबसे सुखद और सुन्दर होते है ,इसमें तो कोई दो राय नहीं है। और बीते हुए दिन जब याद आते है तो कभी-कभी लगता है कि काश वो दिन फिर से दोबारा आ जाए। क्यूँ हम गलत तो नहीं कह रहे है ना। :)

आज अचानक हमे ये किस्सा याद आ गया । बात तो ७० के दशक की है । उस जमाने मे गर्मी की छुट्टियाँ बिताने के लिए कभी हम ननिहाल (फैजाबाद ) कभी ददिहाल (बनारस) या फिर अपनी छोटी मौसी के यहां (वो जहाँ भी रहती थी क्यूंकि मौसाजी का ट्रांसफर होता रहता था ) जाते थे , कभी ट्रेन से तो कभी कार से । और उस समय अक्सर ऐसा होता था कि अगर मौसी हम लोगों के यहां इलाहाबाद आती थी तो उनके वापिस लौटने पर हम लोग भी कुछ दिन के लिए उनके यहां चले जाते थे। या अगर हम लोग उनके यहां जाते थे तो हम लोगों के वापिस लौटने पर वो लोग हम लोगों के साथ इलाहाबाद आते थे । वैसे ये बड़ा ही रुटीन फीचर था। :)

ऐसी ही एक गर्मी की छुट्टी मे हम चारों बहने मौसी के यहां सीतापुर गए थे और जब कुछ दिन रहने के बाद वहां से इलाहाबाद वापिस लौटने लगे तो मौसी भी अपने पाँचों बच्चों के साथ हम लोगों के साथ चली। उस समय मौसी बहुत ज्यादा बड़ी नहीं थी । पर हाँ ५ बच्चे थे । अब उस ज़माने मे तो ४-५ बच्चे से कम होते भी तो नहीं थे। :)

सीतापुर से लखनऊ हम लोग मौसा जी की जीप से आये और फिर वहां से ट्रेन से इलाहाबाद के लिए चले।और सेकेंड क्लास के डिब्बे मे मौसी बच्चों समेत चढ़ गयी बच्चे और सामान जिसमे पानी की सुराही और खाने की टोकरी भी थी ,देख कर लोगों ने जगह देने मे जरा भी संकोच नहीं किया। तो हम बच्चों को शरारत सूझी और सबने तय किया कि सभी लोग मौसी को मम्मी कहेंगेबस फिर क्या था हम सबने मौसी को मम्मी कहना शुरू कर दिया । और मौसी भी मम्मी बन हम लोगों की बातें सुनती रही और फरमाइशें पूरी करती रही।कभी कोई पीने के लिए पानी मांगता तो कभी कोई पूरी खाने को मांगता । पर ट्रेन मे बैठे लोगों को मौसी की उम्र और ९ बच्चे देख कर कुछ अजीब लग रहा था (वैसे ९ बच्चे होना भी कोई अजीब बात नहीं थी तब :)और हम बच्चों की उम्र १६ से साल तक की थी:)

तो एक महिला ने जिससे ये बर्दाश्त नहीं हुआ तो उसने पहले मौसी से गाँव घर के बारे मे पूछा और फिर हम बच्चों की और इशारा करके उसने मौसी से पूछा बहनजी क्या ये सारे आपके बच्चे है ।

तो मौसी ने भी मुस्कारते हुए हाँ कहा।

तो वो महिला मौसी और हम बच्चों की उम्र का अंदाजा लगाने लगी और बोली बहनजी इतनी छोटी उम्र और इतने बड़े-बड़े बच्चे।

उस औरत के इतना कहते ही हम सभी हंसने लगे। और वो औरत हम लोगों को बस देखती रही।


Saturday, April 24, 2010

जी हाँ राजनीति के साथ-साथ राजीव प्रताप रूडी अब सह-पायलट भी बन गए है। आजकल वो सह-पायलट की हैसियत से इंडिगो एयर लाईन्स के हवाई जहाज उड़ा रहे है।है ना चौंकाने वाली बात। कल इंडियन एक्सप्रेस अखबार मे जब हमने ये खबर पढ़ी थी।तो हम भी कुछ चौंक गए थेखैर आप भी खबर पढ़िए और उनकी ये फोटो देखिये अब ई-पेपर मे तो फोटो नजर नहीं आ रही है इसलिए हम कैमरे से खींच कर यहां लगा दे रहे है। वैसे एक बात है राजीव रूडी पायलट की ड्रेस मे काफी स्मार्ट लग रहे है । क्यूँ ठीक कह रहे है ना। :)

Friday, April 23, 2010

कल भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली मे बढ़ती महंगाई के विरोध मे सरकार के खिलाफ रैली थी जिसमे एक दिन पहले से ही ५ लाख लोगों के जमा होने की आशंका जताई जा रही थी पर शायद ३ लाख लोग इस रैली मे शामिल हुए थे।ऐसा न्यूज़ मे सुनने को मिला

दिल्ली जहाँ आजकल गर्मी का काफी प्रकोप है ऐसे मे दिल्ली मे रैली का होना और फिर उसमे बी.जे.पी.के बड़े-बड़े नेताओं का होना और कार्यकर्ताओं या यूँ कहें की दूसरे शहरों से भर-भर कर बसों मे जो लोग लाये जाते है यानी भारी और अपार भीड़ का जुटना। ऐसा लग रहा था की यू.पी..सरकार की तो शामत ही आ जायेगी इस रैली के साथ ही।

पर जो सोचो वैसा होता कहाँ है । दिल्ली मे सूरज देवता कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो रहे थे जिसके फलस्वरूप बी.जे.पी.के अध्यक्ष गडकरी जी को चक्कर आया और वो बेहोश हो गए । बेचारे गडकरी जी जहाँ सूर्य देव की तपन को बर्दाश्त नहीं कर पाए जबकि वो खुली गाडी मे चल रहे थे पैदल नहींवहीँ आम जनता पैदल चल रही थी ,पूरे-जोश से नारे लगाती घूम रही थी।और बाद मे गडकरी जी को एयर कंडीशंड कार मे उनके घर ले जाया गया

लगता है जनता के नेता सिर्फ वातानुकूलित कमरों,गाड़ियों ,घरों और संसद सदन (चूँकि यहां भी .सी.) मे ही महंगाई के खिलाफ आवाज उठा सकते है

और दिल्ली की जनता को इस रैली से मिला घंटों का traffic jam और गर्मी का मजा

Wednesday, April 21, 2010

आजकल दिल्ली और उत्तर भारत मे बहुत ज्यादा गर्मी पड़ रही है । आज सुबह ही बेटे से बात हुई तो उसने कहा कि दिल्ली मे गर्मी के मारे बुरा हाल है ।और उसके ठीक उलट यहां ईटानगर मे बारिश के मारे बुरा हाल है ।यहां भी मार्च के दूसरे हफ्ते मे बहुत गर्मी पड़नी शुरू हो गयी थी पर मार्च के आखिरी हफ्ते से जो बारिश शुरू हुई है कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही है । कभी- कभी अचानक ही खूब जोर-जोर से बारिश शुरू हो जाती है तो कभी अचानक बादल या यूँ कहें कि बिलकुल ऐसा घना कोहरा घिर आता है कि सब कुछ उस बादल और कोहरे की धुंध के पीछे छिप जाता है और चंद क्षणों के बाद ही बादल एकदम छंटने लग जाता है और एक खूबसूरत नजारा दिखता है । :)


और ऐसा नजारा यहां अक्सर क्या रोज ही देखने को मिल रहा है।

इस खूबसूरत नज़ारे का हमने विडियो बनाया है ,आप भी देखिये।
video


आप लोग गर्मी से परेशान है और हम बारिश से । :)

Tuesday, April 20, 2010

कल न्यूज़ मे देखा कि किस तरह अहमदाबाद मे १५ कन्या भ्रूण कचरे मे मिले।जो बहुत ही शर्मनाक और दुखद है कि आखिर इतनी सारी अजन्मी बच्चियों को मारने से उन माँ-बाप और डॉक्टर को क्या मिला। कितने अफ़सोस कि बात है कि एक तरफ तो देश मे लड़कियों को आगे बढाने की बात की जाती है तो वहीँ दूसरी ओर इस निर्ममता से कन्याओं की हत्या की जाती है।

ऐसे डॉक्टर जो इस तरह के जघन्य अपराध करते है और जिनके लिए पैसा ही सब कुछ होता है उनसे तो उनकी मेडिकल की डिग्री वापिस ले लेनी चाहिए । डॉक्टर जिन्हें भगवान का रूप माना जाता है वही हत्यारे बन जाते है ।जबकि उन्हें डॉक्टर बनने पर शपथ भी दिलाई जाती है कि वो कभी भी कुछ गलत काम नहीं करेंगे । पर रुपया कमाने की लालच मे वो सब कुछ भूल जाते है ।

ऐसे डॉक्टर जिनकी अपनी बेटी भी होती होंगी क्या एक क्षण के लिए भी उनका दिल उन्हें धिक्कारता नहीं है ऐसा करने के लिए। इतनी अजन्मी बच्चियों को मारने से मिला रुपया-पैसा कैसे उन्हें फलता-फूलता है।

८० के दशक मे एक बंगाली फ़िल्म देखी थी कन्या भ्रूण पर आधारित ,और तब लगा था कि लोग किस तरह की मानसिकता के साथ जीते है जहाँ बेटी का जन्म अभिशाप माना जाता था। पर आज ३० साल बाद भी हालात बिलकुल वैसे नहीं बल्कि और भी खराब हो गए है।

दिन पर दिन लड़कियों की संख्या लड़कों से कम होती जा रही है पर दुःख और अफ़सोस की बात है कि ऐसे डॉक्टरों की संख्या दिन पर दिन बढती ही जा रही है।

Saturday, April 10, 2010

अरुणाचल प्रदेश मे ज्यादातर बैंक के ए. टी.एम. मे अलग लाईन जैसा कुछ system है शुरू मे ये हमें पता नहीं था। अब वैसे ए.टी.एम मे महिला और पुरुष की अलग लाईन का कोई तुक तो नहीं बनता है ।और कहीं ऐसा देखा भी नहीं था। यहां ए.टी.एम मे कोई भी गेट के बाहर नहीं इंतज़ार करता है बल्कि सभी लोग अन्दर लाईन लगा कर खड़े रहते है ।बिलकुल एक के पीछे एक इतना पास-पास खड़े रहते है कि एक दूसरे का पिन नंबर भी देख सकते है। ये जरुर हमारे पतिदेव ने बताया था। वैसे ए.टी.एम.के बाहर लिखा भी रहता है तो भी हर कोई अन्दर आ जाता है ।

खैर ये जनवरी की बात है जब हम नए-नए थे, एक दिन हम एक बैंक के ए.टी.एम. मे पैसे निकालने गए और चूँकि वहां ३-४ लड़के अन्दर खड़े थे इसलिए हम शराफत मे गेट पर खड़े होकर अपने नंबर का इंतज़ार करने लगे.टी.एम के अन्दर एक महिला भी थी जो कभी .टी.एम.मशीन के पास जाती और कभी वापिस गेट पर आतीहम समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर माजरा क्या हैफिर उसने हमसे पूछा कि क्या हम उसकी पैसे निकालने मे मदद कर देंगेतो हमने हाँ कह दिया । तब समझ मे आया कि वो पहली बार पैसे निकालने आई थी।

खैर हम वहीँ खड़े रहे और इंतज़ार करने लगे तभी एक सज्जन आये और अन्दर जाकर जहाँ लड़के लाईन लगाए खड़े थे वहां जाकर खड़े होने लगे तो हमने उन्हें रोकते हुए कहा कि आप लाईन मे लगिए तो बोले कि हम अपनी लाईन मे ही खड़े हो रहे है।

और जब हमने कहा कि हम भी इंतज़ार कर रहे है और लाईन मे है । इसलिए आप बाहर आकर लाईन मे लगिए। ये सुनकर वो बिगड़ कर बोले कि हम तो सही लाईन मे है आप ही गलत खड़ी है।

तो हमारे ये कहने पर कि ए.टी.एम.मे एक के बाद एक ही लाईन मे आते है तो वो बिफर कर बोले कि ये यू.पी. बिहार नहीं है ये अरुणाचल है

ये सुनकर हमे भी गुस्सा आ गया हमने कहा कि आप यू.पी.और बिहार को क्यूँ कह रहे है।इसमें यू.पी ,बिहार कहाँ से आ गया। ये तो दिल्ली और सारे देश के सभी .टी.एम. मे एक के बाद एक ही लोग पैसा निकालते है और कहीं भी महिला और पुरुष की लाईन अलग नहीं होती है

तो इस पर और चिड कर बोले कि होगा ,पर यहां यही चलता है।

और यहां का यही system है कि यहां महिला और पुरुष की अलग लाईन होती हैऔर दो पुरुष के पैसे निकालने के बाद ही एक महिला पैसे निकालती है

ये सुनकर बहुत गुस्सा आया और हमने भी कहा कि ऐसा कहीं भी system नहीं है।

और वहां मौजूद लोग जो पैसे निकाल चुके थे और हम लोगों की बहस सुन रहे थे वो लोग हमसे बोलने लगे कि आप शांत रहिये। यहां ऐसा ही होता है।

और हमने भी सोचा कि नयी जगह है फ़ालतू मे झगडे मे पड़ने से क्या फायदा

हमें गुस्सा तो बहुत आ रहा था , इसलिए हमने उससे कहा कि ठीक है ,आप पहले पैसे निकाल लो हम बाद मे पैसे निकालेंगे।
तो उनको ये भी मंजूर नहीं था वो बोले कि नहीं आप ही पैसे पहले निकालिए।

खैर हमने भी बात ख़त्म करके पैसे निकाले और वापिस आ गए।

और अब तो नियम बना लिया है कि जब ए.टी.एम. खाली हो तभी पैसे निकालते है।:)
ना लाईन मे लगो ना झंझट हो।