Wednesday, July 4, 2012

बात 2010-2011 की है उस समय लखनऊ में हमारा बेटा पढ़ रहा था और जब भी दिल्ली शताब्दी या दुरंतो से आता था तो वो अक्सर टिकट का प्रिंट आउट लिए बिना ही ट्रेन board करता था और ट्रेन में टी.टी.को प्रिंट आउट की जगह एस.एम.एस. में टिकट दिखाने पर हर बार 50 या 100 रूपये का फाईन  देना पड़ता था।. और हम हमेशा उससे कहते थे की पहले से टिकट क्यूँ नहीं निकाल कर रखते हो।. हर बार फ़ालतू में फाईन देते हो।.

और ऐसा ही एक बार हमारे साथ भी हुआ।. 2011 की बात है  हम लोग शताब्दी से भोपाल  से दिल्ली आ रहे थे और उस बार हम लोगों के पास  टिकट का प्रिंट आउट नहीं था जबकि फ़ोन में एस.एम.एस. में टिकट का पूरा डिटेल था यानी पी .एन.आर. नंबर वगैरा था पर उस समय टी.टी.उस पर यकीन नहीं कर रहा था और बार--बार टिकट प्रिंट आउट के लिए  ज्यादा जोर दे रहा था . जबकि  उसे अपना आई.डी वगैरा भी दिखाया  था।.और बस वो अपनी ही बात बार--बार दुहरा रहा था और ऐसा जता  रहा था मानो हम लोगों बिना टिकट यात्रा कर रहे हो।.   हम लोगों ने उससे कहा की ठीक है अगर आप इसे नहीं मान रहे  है  तो पेनेल्टी  ले लो . तब अचानक ही वो सुधर गया और कहने लगा की नहीं ठीक है।.

और अब आप लोगों ने भी देखा होगा की आजकल रेलवे की साईट (irctc )पर जब टिकट बुक करते है तो साइड में लिखा रहता है की paperless यात्रा कीजिये . टिकट के  प्रिंट आउट के बजाय फ़ोन में आये हुए एस.एम.एस को ट्रेन में टी.टी.को दिखाइए।.

समय कैसे और कितनी जल्दी बदल जाता है की  अब  रेलवे की वेब साईट पर ही लिख रहे है की paperless  travel कीजिये। जबकि पिछले साल तक paperless यात्रा पर फाईन देना पड़ता था। :(


Friday, June 29, 2012

नौ साल बाद हम  दिल्ली वापिस लौट आये है। नौ साल पहले जब दिल्ली से अंडमान गए थे तब कभी सोचा नहीं था कि इतने लम्बे अरसे तक हम बाहर रहेंगे।  पहले अंडमान फिर गोवा और उसके बाद अरुणाचल प्रदेश।

नौ साल दिल्ली बाद लौटने पर लगा की दिल्ली तो बदल ही गयी  है।  यूँ तो दिल्ली अब फ्लाई ओवर सिटी हो गयी है और मेट्रो चलने लगी है। और पहले जहाँ ज्यादातर छोटी कारे दिखती थी अब वहीँ बड़ी-बड़ी कारें दिखाई देने लगी है। पहले जहाँ एक एक-दो मॉल होते थे वहीँ अब हर जगह मॉल  खुल गए है। अब  ऐसा नहीं है की इन नौ सालों में हम दिल्ली न आये हो पर दिल्ली में भीड़-भाड़ पहले के मुकाबले बहुत ज्यादा बढ़ गयी है।

और दिल्ली का मौसम बाबा रे बाबा ! इतने सालों में इतनी जबरदस्त गर्मी झेलने की आदत ख़त्म हो गयी है क्यूंकि चाहे अंडमान  हो या गोवा या फिर अरुणाचल सभी जगह बहुत बारिश होती है जिसकी वजह से मौसम बहुत ही सुहावना रहता था। सच हम इन जगहों का मौसम बहुत मिस करेंगे।  

पर फिर भी दिल्ली दिल्ली है क्यूंकि यहाँ रहते हुए आप बाहर वाले नहीं  कहलाये  जाते है क्यूंकि अंडमान वाले  दिल्ली वालों को  mainland वाले  कहते थे तो गोवा वाले non -goan  और अरुणाचल में  non- tribal .
वैसे भी  हर जगह की अपनी ही खासियत होती है।


खैर अब चूँकि हम दिल्ली में पूरी तरह से सैटल हो गए है तो अब कोशिश रहेगी की हम वापिस जोर-शोर से ब्लॉग लिखना शुरू कर दे।  :)




Thursday, February 23, 2012

कुछ अजीब सी ख़ुशी महसूस हो रही है ये लिखते हुए कि हमें ब्लॉगिंग करते हुए पांच साल हो गए है जो कुछ अद्भुत सा लग रहा है क्यूंकि जब हमने ब्लॉगिंग शुरू की थी तो सोचा भी ना था की इतने दिन तक हम ब्लॉग लिखेंगे और उसे लोग पढेंगे भी। :) पर आप सभी के हमारे बलॉग पढ़ते रहने के कारण ही हम ये पांच साल पूरे कर पाए।

हालांकि पिछले २ साल से हम बहुत ही कम लिख रहे है पर फिर भी जब भी हम कुछ लिखते है तो आप लोग उसे पढ़ लेते है और टिप्पणी भी करते है और यही हमारे हौसले को बढाने के लिए काफी है।

वैसे २००९ मे जहाँ stats काउंटर ने २५ हजार दिखाया था वहीँ आज ७६ हजार से भी ज्यादा का आंकड़ा दिखा रहा है जो हमारे खुश होने के लिए काफी है क्यूंकि जितना कम हम आजकल ब्लॉग लिख रहे है उस हिसाब से ये आंकड़ा अद्भुत ही है ।

जहाँ २००७ मे १६० पोस्ट और २००८ मे १६७ पोस्ट लिखी थी वहीँ २००९ मे ६५ पोस्ट तो २०१० मे २४ पोस्ट और २०११ मे सिर्फ २ पोस्ट लिखी थी । वैसे २०१० और २०११ मे हमने अरुणाचल प्रदेश की वादियों से नाम का भी एक ब्लॉग बनाया था जिसपर हम ने कुछ पोस्ट लिखी थी ।

खैर हमने दोबारा से ब्लॉग लिखना शुरू तो उम्मीद करते है की आप लोग इसी तरह हमारी पोस्ट पढ़ते रहेंगे और हमारी हौसला अफजाई करते रहेंगे।

आप सभी bloggers का बहुत-बहुत शुक्रिया ।

Friday, February 17, 2012

अरे कहीं आप ये तो नहीं सोच रहे की हम आप लोगों को धमकाने जा रहे है। अरे नहीं इतने ज़माने बाद ब्लॉगिंग दोबारा शुरू की और उसपर आप लोगों को कुछ कहें भला ऐसा कैसे हो सकता है। अरे दरअसल पिछले साल हमारे बेटों ने मर्फी रिचर्ड का रूम हीटर खरीदा था जो कुछ दिन बाद यानी पिछले साल दिसंबर मे खराब हो गया था । बेटों ने कई बार कंपनी मे complaint की पर वहां से कोई भी नहीं आया।

खैर इस साल चूँकि हम यहां दिल्ली मे है और रूम हीटर वारंटी पीरियड मे है तो सोचा की complaint कर दी जाए और बस २६ दिसंबर को मर्फी रिचर्ड के कस्टमर केयर पर फ़ोन करके complaint की और अगले दिन ही उनका टेक्नीशियन आया और उसने रूम हीटर देखने के बाद कहा कि वो तो बजाज का टेक्नीशियन है और ये प्रोडक्ट मर्फी का है इसलिए हमें दोबारा कस्टमर केयर पर फ़ोन करके नई complaint करनी होगी ।

तो हमने अगले दिन यानी २८ दिसंबर को फिर से मर्फी रिचर्ड के कस्टमर केयर पर फ़ोन किया और बहुत जोर देकर और खास तौर पर ये कहा कि मर्फी का ही टेक्नीशियन भेजे । और कमाल कि बात उसी दिन शाम को उनका टेक्नीशियन आया और रूम हीटर देखकर बोला कि ये तो यहां पर ठीक नहीं हो सकता है। इसको कंपनी मे ले जाना होगा। हमारे पूछने पर कि कब तक बनाकर लाओगे वो बोला २-३ दिन तो लग जायेंगे। तो हमने उसका नाम और मोबाइल नंबर लेकर हीटर उससे दे दिया।

शाम को बड़ी शान से हमने अपने बेटे से कहा कि तुम लोग ठीक से complaint नहीं करते थे । हमने complaint किया और देखो आज उनका टेक्नीशियन आकर हीटर ले गया और २-३ दिन मे दे भी जाएगा। २-३ दिन क्या ४-५ दिन के बाद भी जब वो टेक्नीशियन नहीं आया तो हमारे पतिदेव बोले कि अब भूल जाओ उस हीटर को वो अब नहीं मिलने वाला। ये सुनकर हमें खराब लगा और हमने उस टेक्नीशियन को फ़ोन किया तो वो बोला कि मैडम वो हीटर बन नहीं सकता है और चूँकि ये वारंटी पीरियड मे है इसलिए कंपनी उसे बदलकर नया हीटर देगी जिसमे २-३ दिन लग जायेंगे।

बस तब से २-३ दिन का गाना उन लोगों का चलता रहा। और हम कभी कस्टमर केयर से मर्फी रिचर्ड कंपनी के दिल्ली के रीजनल हेड तो कभी उनके बॉस का फ़ोन नंबर लेकर फ़ोन करते रहे और कोई यही जवाब देते कि मैडम बस २-३ दिन मे आपके घर नया हीटर पहुंचा दिया जाएगा। हमने भी ठान लिया था कि हम इन लोगों से हीटर लेकर ही रहेंगे। और ऐसे ही अलग-अलग लोगों को फ़ोन करते करते हम तंग आ गए थे तो २३ जनवरी को हमने उनके बॉस को फ़ोन किया और जैसे ही हमने अपना नाम बताया तो वो बोला कि मैडम आज का दिन बस शाम तक रूम हीटर आपके घर पहुँच जायेगा । तो हमने भी उसे एक तरह से धमकाते हुए कहा कि अगर अब आपने रूम हीटर नहीं भेजा तो २८ जनवरी के बाद हम कंजूमर कोर्ट मे आपके खिलाफ केस कर देंगे। तो छूटते ही वो तुरंत बोला कि नहीं मैम बस आज का दिन।
खैर उस दिन शाम को तो नहीं अगले दिन उनका आदमी हमारा वाला रूम हीटर लेकर गया और हमारे पूछने पर कि भला इतने दिन लगते है एक रूम हीटर को repair करने मे तो वो बड़ी शराफत से बोला कि मैम sorry .कभी -कभी हो जाता है

Friday, January 27, 2012

कल सारे देश ने ६३ वां गणतंत्र दिवस मनाया । और हमने भी कल आठ साल बाद दिल्ली की गणतंत्र दिवस परेड देखी। अरे वहां जाकर नहीं बल्कि दूरदर्शन पर ही देखी। पर फिर भी काफी अच्छी लगी परेड। अब चूँकि पिछले आठ सालों से तो हम दिल्ली से बाहर है और जहाँ भी रहे वो चाहे अंडमान हो या गोवा या फिर अरुणाचल प्रदेश तो इन जगहों की परेड देखने हम लोग जाते थे और जब तक लौट कर आते तब तक दिल्ली की परेड भी खत्म होने वाली होती थी और हम राष्ट्रपति को बस वापिस जाते हुए देख पाते थे । :)

पर इस बार चूँकि हम दिल्ली मे है तो अरसे बाद परेड देखी और वैसे भी दिल्ली की परेड की अपनी ही ख़ास बात है। अब हो सकता है की आप लोग कहें कि भई इसमें नया तो कुछ नहीं है हर साल ही ऐसी परेड होती है ।हाँ आप लोगों का कहना भी सही है तो भला परेड मे हमें क्या अच्छा लगा। अब ऐसा नहीं है कि अंडमान ,गोवा और ईटानगर मे कंटिजेंट मार्च पास्ट नहीं करते थे पर वहां मार्च पास्ट छोटा होता था और झांकियां भी कम होती थी पर हाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम उन जगहों पर दिल्ली से ज्यादा होते थे।

कल जब परेड मे कंटिजेंट मार्च पास्ट करते हुए दिखाए गए तो वो काफी भव्य लगे। और जब दूरदर्शन इस मार्च पास्ट का ऊपर से शॉट दिखाता था तब तो क्या कहने। क्यूंकि हर कंटिजेंट मे कम से कम डेढ़ सौ लोग थे और सभी के हाथ मे सफ़ेद दस्ताने थे तो जब उनके हाथ एक साथ ऊपर और नीचे जाते थे तो देखने मे बहुत ही सुन्दर लगे। आर्मी के tanks और पुलिस के सजे धजे ऊंट और घोड़े भी कुछ कम नहीं थे।

और सभी झांकियां काफी सुन्दर लगी ।फिर वो चाहे गोवा के कार्निवाल की हो या फिर आसाम की हो या फिर चुनाव आयोग की हो या चाहे पंजाब मेल की हो । पर बिहार की झांकी की बात करना जरुरी है क्यूंकि इसमें ख़ास बात ये थी कि जहाँ हमारे समाज मे आज भी लड़की का जन्म लोग अभिशाप मानते है वहीँ बिहार के धरहरा गाँव मे जब भी कोई लड़की जन्म लेती है तो गाँव मे १० पेड़ लगाए जाते है। जो कि शायद अपने आप मे एक मिसाल है। अब हमने तो इससे पहले ऐसा कहीं नहीं सुना था। क्या आपने सुना था।

तो आप लोगों ने परेड देखी या फिर सिर्फ छुट्टी मनाई। :)

Thursday, January 26, 2012

आज सुबह जब अखबार उठाया तो सोचा भी ना था की ऐसी दर्दनाक खबर पढने को मिलेगी और जिसे पढ़कर रोंगटे खड़े हो गए।

क्या होता जा रहा है हमारे इस समाज को जहाँ इस तरह का बर्ताव बेटियों के साथ किया जाता है। इंसान दिन पर दिन नीचे ही गिरता जा रहा है ।

Thursday, January 19, 2012

dirty politics

यूँ तो राजनीति मे हमेशा ही सभी राजनैतिक पार्टियां एक-दूसरे के काम काज पर ,चुनाव प्रचार पर आरूप प्रत्यारोप लगाती रहती है पर इस बार तो उत्तर प्रदेश के होने वाले चुनाव मे सभी पार्टियों ने सभी सीमाएं तोड़ दी। यूँ तो चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश की सभी हाथियों की मूर्तियों को ढकने का आदेश दिया था और ये काम पूरे जोर-शोर से हो भी रहा था ।
पर शायद राज नेताओं को इतने से ही संतोष नहीं था। क्यूंकि उन्हें इलाहाबाद के चिल्ड्रेन पार्क जिसे सुमित्रा नंदन पन्त पार्क या जैपनीज पार्क या फिर हाथी पार्क के नाम से भी जाना जाता है वहां बच्चों के झूलने के लिए बने एक हाथी को इन नेताओं की नजर लग गयी। और इन नेताओं ने चुनाव आयोग को उस हाथी ढकने के लिए भी कहा। जो की बहुत ही शर्म की बात है।

चिल्ड्रेन पार्क का ये हाथी जिसे कुछ नहीं तो काम से काम ४० साल हो गए है बने हुए । हम लोग भी अपने बचपन मे उस पार्क मे बड़े चाव से जाते थे ,और ४० साल पहले तो हाथी पार्क का कुछ ऐसा क्रेज था (शायाद अभी भी है )की जब भी हमारे घर कोई मौसी,मामा या चाचा और उनका परिवार आता तो हाथी पार्क जाना तो लाजमी था. और हम ही क्या इलाहाबाद मे रहने वाले हर इलाहाबादी से ये पार्क किसी ना किसी रूप मे जरुर जुड़ा होगा। ना केवल हमने बल्कि हमारे बच्चों ने भी इस हाथी पार्क का काफी लुत्फ़ उठाया है


राजनीति और राज नेताओं की छोटी सोच और dirty politics के चलते इसी हाथी को ढकने की सोची जा रही है।


अफ़सोस कि नेताओं को अपने ऊपर विश्वास नहीं रहा की वो सिर्फ चुनाव प्रचार करके चुनाव जीत सकते है