Friday, February 29, 2008

टी.वी.सीरियल की एक बात बहुत अच्छी है कि इसमे दर्शक कुछ भी मिस नही करता है क्यूंकि आप जब भी देखना शुरू करें लगता है कहानी अभी वहीं की वहीं है हाँ बस खलनायक और खलनायिका के जुल्म जरुर बढ़ गए होते है। वो चाहे क्यूंकि ......हो या कहानी घर....हो सलोनी हो...या दुल्हन ...या फ़िर छूना है आस्मान ही क्यों ना हो। अभी कल ही हमने कई दिनों बाद जी टी.वी.देखा तो दुल्हन सीरियल मे कहानी तो कुछ ख़ास नही बढ़ी थी पर हाँ पुनर्जन्म का किस्सा देखने को मिला और हमे हमारी पोस्ट लिखने का विषय भी मिला।

टी.वी.के सीरियल मे भी फिल्मी दांव-पेंच देखने को मिलते है।
अब जब टी.वी.मे जब नाच-गाना सब कुछ फिल्मी स्टाइल का होने लगा है तो भला पुनर्जम का विषय कैसे छूट जाता। अभी तक तो फिल्मों मे ही पुनर्जन्म दिखाया जाता था पर अब तो टी.वी.के सीरियल मे भी पुनर्जन्म की कहानी दिखाने का चलन होने जा रहा है।पुनर्जन्म पर बनी फिल्में जैसे सुभाष घई की कर्ज और अभी हाल ही मे बनी फरहा खान की ओम शान्ति ओम काफी चली है।

अभी तक एकता कपूर के सीरियल मे तथा दूसरे सीरियल मे नायक या नायिका अपने दुश्मन( जो की आम तौर पर घर वाले ही होते है) से बदला लेने के लिए चेहरे बदल लेते थे ।कई बार तो एक्सीडेंट मे मर भी जाते है पर फ़िर चेहरे बदल कर बदला लेने जाते है। पर एक बात है कि हीरो या हेरोइन ही चेहरे बदलते है बदला लेने के लिए कभी खलनायक या खलनायिका नही।अब चेहरे बदलने का तरीका हुआ पुराना इसलिए अब पुनर्जन्म का चक्कर शुरू होने जा रहा है। जी टी.वी.पर आने वाले सीरियल बनूँ मैं तेरी दुल्हन मे सीरियल की खलनायिका (यानी हीरो की बहन) ने हीरो और हिरोइन दोनों को मार दिया है और अब वो दोनों पुनर्जन्म लेकर खलनायिका से बदला लेने गए है


दुल्हन से पहले एकता कपूर के एक सीरियल शायद काजल मे भी पुनर्जन्म को दिखाया गया था । और इस दुल्हन सीरियल की कहानी को भगवान कृष्ण के जन्म की तरह दिखाया है बस फर्क इतना है की एक तो बच्चा जेल मे नही पैदा होता है और दूसरा इसमे बच्चे को उसका पिता वासुदेव जी की तरह बारिश मे यशोदा जी के घर छोड़ने नही जाता है।बल्कि अस्पताल मे ही बच्चे बदल देता है।

नोट-- अब आजकल तो ब्लॉगिंग के नशे के बाद टी.वी.देखना बहुत कम हो गया है।पर फ़िर भी हम टी.वी.देखते तो रहते है ।


Thursday, February 28, 2008

योगा जिसे भारत मे सदियों से ऋषि मुनि और साधू संत लोग करते आए है आज देश विदेश मे मशहूर हो रहा है।माना जाता है कि आज कल की भाग दौड़ भरी जिंदगी मे योगा करने से लोग स्वस्थ रहते है।योगा करने के लिए खुले माहौल जैसे बगीचे मे ,नदी या समुन्दर किनारे को सबसे अच्छा माना जाता रहा है।

आज कल योगा बहुत ही ज्यादा प्रचलित हो रहा है । हर कोई योग गुरु बन रहा है। २०-२५ साल पहले दूरदर्शन पर भी योगा दिखाया जाता था जिसमे गुरु (सरदारी लाल सहगल) के दो शिष्य एक महिला और एक पुरूष उनके बताये हुए आसान करते थे।और गुरु बताते थे कि किस तरह से आसन करना है और किस आसन से कौन से रोग ठीक होते है वगैरा -वगैरा

कुछ समय बाद धीरेन्द्र ब्रह्मचारी और डॉली जी का कार्यक्रम दूरदर्शन पर आना शुरू हुआ जिसमे डॉली जी लोगों की समस्याएँ पढ़ती थी और धीरेन्द्र ब्रह्मचारी उनका जवाब देते थे और योग के विभिन्न आसान बताते थे।

श्री श्री रवि शंकर जी भी योगा और मेडिटेशन और सुदर्शन क्रिया पर जोर देते है। ना केवल देशी बल्कि विदेशी लोग भी बड़ी संख्या मे इनके भक्त है।इनके एक-एक शिविर मे २५ से ३० हजार लोग आते है।

और एक योग गुरु भरत ठाकुर ने भी योगा करने के अलग-अलग फायदे बताये। कुछ दिन तक आज तक या शायद किसी और चैनल पर दिन मे ३-४ बार भारत ठाकुर लोगों को योगा सिखाते हुए दिखाते थे।कभी-कभी भरत ठाकुर के साथ कोई शिष्य या शिष्या भी योग करते हुए दिखाई जाती थी

और आज के सबसे बड़े योग गुरु बाबा रामदेव जिन्होंने योगा को घर-घर पहुंचाया। बाबा राम देव ना केवल टी.वी.पर योगा सिखाते है बल्कि देश -विदेश मे भी अपने योगा शिविर लगाते है।बाबा रामदेव ख़ुद तो योग आसान करके दिखाते है और साथ मे उनके दो शिष्य भी योग आसन करते है और रामदेव के साथ-साथ हजारों कि संख्या मे जनता भी योग करती हैकुछ घर पर तो कुछ उनके द्वारा आयोजित शिविर मे

और आज कल शिल्पा शेट्टी भी योग गुरु बन गई है ।अब योग गुरु है तो शिल्पा ने योगा की डी.वी.डी.बाजार मे ला दी हैअब इस डी.वी.डी को निकालकर शिल्पा ने लोगों का भला किया या अपना ये तो पता नही।

योगा ना केवल अपने देश मे बल्कि विदेशों मे भी खूब प्रचलित हो रहा है।विदेशों मे भी नित्य नए गुरु पैदा हो रहे है जो अपने हिसाब से योगा मे modification करते रहते है।हाल ही मे अमेरिका के एक अमरीकी योग गुरु का कहना है कि बेलिबास योगा व्यक्ति को ज्यादा लाभ पहुंचाता है क्यूंकि बेलिबास योगा करने मे व्यक्ति का ध्यान पूरी तरह से योगा मे लगता है



Wednesday, February 27, 2008

सुनामी के दिन करीब चार-पांच घंटे बाद जब पानी उतर गया तो बाक़ी दूसरे लोगों की तरह हम लोग भी अपने घर की ओर गए ।घर जाते हुए मन मे एक अजीब सा डर था की पता नही घर का क्या हाल होगा। और जब हम लोग अपने घर पहुंचे तो घर की हालत देख कर सकते मे आ गए , कलेजा मुँह को आ गया।घर का सारा सामान तितर-बितर हो गया था। किचन का सामान जैसे मिक्सी,जूसर का एक पार्ट गार्डन मे तो दूसरा पार्ट दरवाजे पर। और डाइनिंग टेबल का सामान जैसे मैट्स ,स्पून ,अचार और जैम की बोत्तले सब बाहर बगीचे मे ।फ्रिज तो पूरा अप साईड डाउन माने उल्टा पड़ा हुआ था। लौंदरी बैग कपडों के साथ बाहर कीचड मे। ड्राइंग रूम का समान जैसेसोफा सेट वगैरा तो उलट-पलट गए थे। छोटे-छोटे सजावटी सामान इधर-उधर बिखरे पड़े थे।पतिदेव का ऑफिस का बैग बहकर दूर चला गया था । हमारे एक गणेश जी की मूर्ति ड्राइंग रूम से बहकर हमारे घर की सीढियों पर आ गयी थी।जिन्हें हमने उठाकर गाड़ी मे रख लिया था।

पूरा घर काले रंग के कीचड और पत्तियों से भरा पड़ा था । चूँकि हमारे पैर मे चोट थी इसलिए हम तो अन्दर नही गए हमारे पतिदेव और बेटे ने घर मे जाकर ऊपर की मंजिल से धीरे-धीरे जितना सामान अटैचियों मे भर सकते थे भर कर नीचे गाड़ी मे लाये।हमारे किचन का तो ऐसा हाल था कि लगा ही नही रहा था कि वहां कोई सामान भी था। अलमारी मे से डिब्बे गायब,बर्तन गायब। जो बर्तन अलमारी के ऊपर के खाने मे रहते थे वो किचन की जमीन मे काले रंग के कीचड मे लथपथ थे।कोई भी सामान अपनी जगह पर नही था।(ये हमारे घर की फोटो है इस फोटो मे जाली के दरवाजे के ऊपर की तरफ़ जो हरा-हरा दिखाई दे रहा है सुनामी का पानी उतने ऊपर तक आया था )और फ़िर अगले तीन-चार दिन घर की सफ़ाई करवाने और सामान खोजने मे लगे रहे थे।

सामान निकालने के बाद गाड़ी का ख़्याल आया और जब गैराज की तरफ़ गए तो देखा की सुनामी के पानी ने गैराज का दरवाजा तोड़ दिया था और गैराज मे खड़ी हमारी जिप्सी पानी मे पूरी डूब गई थी।और साईड मे जो किताबों की अलमारी थोडी सी दिख रही है किताबों से भरी थी और दीवार मे फिक्स थी पर पानी के तेज बहाव के कारण पड़ोसी के घर से बहकर हमारे घर गई थी


सुनामी के छः दिन पहले ही हम इलाहबाद और दिल्ली जाकर वापिस अंडमान लौटे थे।हमेशा हम नेतराम की दूकान की एक किलो इमारती ले जाते थे पर उस बार हम दो किलो इमारती ले गए थे .(हमारी सेहत का राज ही ये है ) हरी की दुकान के समोसे ,इलाहबाद की सेंवई और मम्मी के हाथ की बनी बढियां और अचार (सिर्फ़ हमारे खाने पीने के बैग का वजन १७-१८ किलो था )। पर वो कहते है ना की नसीब से ज्यादा इंसान के हिस्से कुछ नही आता। और हमारे साथ भी वही हुआ। चूँकि हमने सारा सामान किचन मे रक्खा था इसलिए सुनामी मे सब बरबाद हो गया।उसके अगले तीन-चार दिनों मे हम लोगों ने धीरे-धीरे सारा सामान घर से बाहर निकाला और बाद मे सारा सामान दिल्ली भेजा। क्यूंकि एक तो हम लोग अपने दोस्त के घर रह रहे थे और दूसरे की अगर कभी अंडमान से भागना पड़े तो ,क्यूंकि वहां भूकंप के बहुत झटके आते रहते थे और अंडमान मे ये ख़बर उड़ती रहती थी की अंडमान डूब जायेगा।क्यूंकि वहां के जो हालात थे शुरू के दिनों मे उन्हें देख कर तो यही लगता था। भूकंप के झटकों से सड़कें ऊपर-नीचे हो गई थी। हर जगह समुन्दर को रोकने वाली दीवार ढह गई थी। हर तरफ पानी घरों और सड़कों पर नजर आता था। और ये हालात और हालत सुधरते -सुधरते महीनों लग गए थे।
(ये फोटो मरीना पार्क की है )
अपने घर से निकल कर हम लोगों ने गाड़ी से एक चक्कर पोर्ट ब्लेयर का लगाया और चारों ओर हुई तबाही को देख कर दिल एक अजीब सी भावना से भर गया।बस गनीमत ये थी की पोर्ट ब्लेयर मे माल का नुकसान हुआ था जान का नही. कहीं मारुति कार नारियल के पेड़ पर तो कहीं कार पार्क की रेलिंग पर। हम लोगों की कालोनी रहने वाले एक साहब की कार तो पानी के साथ बहकर sea bed तक पहुँच गई थी।मरीना पार्क की रेलिंग टूट गई थी और स्पीड बोट ,पैडल बोट सब सड़क पर आ गई थी।(ये सिप्पी घाट के एक घर की फोटो है जो सुनामी के महीनों बाद भी इसी हालत मे था । )

कोर्बईन् कोव जो की एकलौता beach है पोर्ट ब्लेयर मे उसका तो ये हाल था की वहां समुन्दर का पानी सड़क पर ही आ गया था। पूरी सड़क पर रेत ही रेत थी।और सुनामी के बाद भी पानी का लेवल बढ़ गया थ। हाई टाईद मे कोर्बईन् कोव पर पानी सड़क पर आ जाना बड़ी आम बात हो गई थी।

खैर भागने की नौबत तो नही आई और कुछ दिन बाद हम लोगों को घर भी मिल गया तो दिल्ली से सारा सामान वापस मंगाया गया।घर मिलने पर मम्मी को सबसे ज्यादा चिंता थी कि समुन्दर तो वहां नही है तो हमने कहा कि अब समुन्दर के सामने रहने का हमारा शौक पूरा हो गया है। इस बार हमारा घर पोर्ट ब्लेयर की सबसे ऊँची जगह पर है।जहाँ से समुन्दर दिखता तो है पर कोई खतरा नही है।

हमारी सुनामी का अंत दिसम्बर जनवरी मे नही हुआ बल्कि मई मे जाकर हमारी सुनामी ख़त्म हुई।

ये सभी फोटो एक हफ्ते बाद ली गई थी

सुनामी से जुड़े पिछले लेख।
२६ दिसम्बर की वो सुबह
सुनामी ना पहले कभी सुना और ना देखा




Tuesday, February 26, 2008

ये फरवरी के आखिरी दिन बजट के लिए ही बने है। हर साल १५ फरवरी बीतते -बीतते हर तरफ़ सिर्फ़ बजट का ही शोर रह जाता है कि इस साल शायद बजट मे जनता के लिए कुछ जबरदस्त होगा पर बजट पेश होने के बाद वही ढाक के तीन पात।यानी ना तो आम आदमी और ना ही ख़ास आदमी खुश हो पाता है।आम आदमी ताउम्र सिर्फ़ इसी आस मे बिता देता है कि इस बार ना सही अगले साल का बजट जरुर कुछ अच्छा होगा।वो कहते है ना उम्मीद पर दुनिया कायम है

पहले यानी जब पढ़ते थे तब बजट से कोई ख़ास वास्ता नही रहा , हाँ हमेशा ये जरुर सुनते रहे कि इस साल इन्कम टैक्स मे छूट बढेगी या नही।शादी के बाद भी कुछ ऐसा ही सुनने को मिलता रहा कि इस साल इन्कम टैक्स मे छूट बढेगी या नही। एक्स्साइज ड्यूटी घटेगी या बढेगी। घरेलू चीजों, दवाओं के दामों मे कटौती या बढौती।रेल किराया और हवाई जहाज का किराया बढेगा या वही रहेगा।कौन -कौन सी चीजों पर सबसिडी मिलेगी। घर खर्च पर बजट से क्या असर होगा। लोक सभा मे बजट आने के बाद घर का बजट जरुर गड़बड़ा जाता है।

उफ़ बाबा हर साल यही होता है जहाँ फरवरी आई हर कोई अपने हिसाब से सोचने लगता है । पर वित्त मंत्री वो चाहे मनमोहन सिंह रहे हो या विश्वनाथ प्रताप सिंह रहे हो या यशवंत सिंह रहे हो या फ़िर पिछले चार साल पुराने वित्त मंत्री चिदंबरम ही क्यों ना हो, उन्हें आम आदमी की कोई ख़ास चिंता रहती है,ऐसा कुछ नजर नही आता है। हर बजट के पहले कहा जाता है कि ये आम आदमी के लिए बनाया गया है पर जब बजट लोक सभा मे पेश होता है तो पता चलता है कि आम आदमी तो बेचारा बजट के नीचे ही दब गया ।

होम लोन पर अगर ब्याज घटाते है तो इन्कम टैक्स बढ़ा देते है । कभी गैस सिलिंडर का दाम बढ़ाते है तो दो-चार रूपये घरेलू सामान पर घटा कर कहते है कि आम आदमी के हित मे बजट पेश हुआ है ।दिनों दिन बढ़ती महंगाई और आम आदमी जिसे भगवान ने कुछ ख़ास ही मिटटी का बनाया है कि वो सब कुछ झेल जाता है।चलिए इस बार देखें की २९ फरवरी को वित्त मंत्री चिदंबरम जी क्या करते है।जनता की उम्मीद पर पानी फेरते है या .....खरे उतरते है

पर जरा आम आदमी से तो पूछो कि क्या वाकई बजट से वो खुश है

अरे आज तो लालू जी रेल बजट पेश करने वाले है।

Monday, February 25, 2008

बात उन दिनों की है जब हम सातवीं क्लास मे पढ़ते थे ।उन दिनों इलाहबाद मे तो यूं भी साइकिल सेस्कूल जाने
का बड़ा रिवाज था ।(वैसे तो आज भी बच्चे साइकिल से स्कूल से जाते है ) लड़का हो या लड़की ज्यादातर बच्चे साइकिल से ही स्कूल जाते थे। हमारे घर मे भी दीदी लोग साइकिल से स्कूल जाती थी पर चूँकि हम सबसे छोटे थे इसलिए हमने साइकिल चलाना जरा देर मे सीखा।

अब सीखने के लिए साइकिल तो हमे शाम को ही मिलती थे दीदी लोगों के स्कूल से आने के बाद।शुरू मे कुछ दिन तो भइया और हमारी दीदी ने हमे साइकिल चलाना सिखाया की कैसे पैडल पर पैर रखकर कैंची चलते है और किस तरह सीट पर बैठते है और साइकिल का हैंडल हमेशा सीधा रखना चाहिए और सबसे ख़ास हिदायत कि कभी भी दोनों ब्रेक एक् साथ मत लगाना । शुरू मे दो-तीन दिन जब हम साइकिल चलाते तो भइया या दीदी पीछे से कैरियर पकड़े रहते और हम पीछे देखते रहते की उन लोगों ने साइकिल पकड़ रखी है।और हमे चलाते हुए ये विश्वास रहता की अगर हमारी साइकिल गिरेगी तो भैया या दीदी हमे गिरने से बचा लेंगे।दीदी हमेशा कहती कि सामने देखा करो पीछे नही। खैर पाँच-छः दिन बाद हम जब साइकिल चला रहे थे तो हमे पता ही नही चला की दीदी ने साइकिल का कैरियर कब छोड़ दिया और हमने बड़े आराम से अपने मोहल्ले मे साइकिल चलाई। और उस दिन हमे यकीन हो गया की अब तो हमे साइकिल चलानी आ गई है। और अब हम बिना किसी की मदद के चला सकते है।

घर मे सभी ने ये हिदायत दी कि साइकिल चलाते हुए कभी भी भीड़-भाड़ या गाय-बकरी देख कर घबडाना नही चाहिए। और ये भी कहा की साइकिल चलाते हुए हमेशा सामने देखना चाहिए पैडल या पीछे की ओर नही।(क्यूंकि जब साइकिल सीखते है तो ध्यान पैडल पर ज्यादा रहता है. )करीब एक हफ्ते या दस दिन तक हमारी साइकिल क्लास चली। उसके बाद जब हमे जरा विश्वास हो गया की अब तो हम साइकिल चलने मे निपुण हो गए है तो एक दिन शाम को हम बिना किसी को बताये चुपचाप साइकिल लेकर निकल गए पर अभी साइकिल चलाना शुरू ही किया था की अचानक हम अपना संतुलन खो बैठे और साइकिल समेत नीचे गिर पड़े। पहले तो झट से उठे और चारों ओर देखा की कोई देख तो नही रहा है। तभी हमारी नजर घुटने और कोहनी पर गई और बस हमारा रोना शुरू क्यूंकि हमारे घुटने और कोहनी से खून निकल रहा था।

खैर साइकिल को लेकर आंसू बहाते हुए हम घर आए । घर मे सबने हमे रोते हुए देख कर कहा कि ममता अब तुम पूरी तरह से साइकिल चलाना सीख गई हो। क्यूंकि जब तक चोट नही लगती है तब तक साइकिल चलानी नही आती है।और वाकई उसके बाद हमने बाकायदा साइकिल चलाना शुरू किया और फ़िर हमारे लिए हीरो साइकिल खरीदी गई और हम भी बड़ी शान से बारहवीं क्लास तक साइकिल से ही स्कूल जाते रहे।

साइकिल क्या जीवन मे भी जब चोट लगती है तब हम बहुत कुछ सीखते है

कुछ ज्यादा ही दार्शनिक बात हो गई। :)




Sunday, February 24, 2008

आज रविवार है ना तो सोचा क्यों ना बचपन की कुछ याद ही ताजा कर ली जाए। जी हाँ आज हम आप सबको अपने सबके बचपन के उन दिनों मे ले जाने की कोशिश कर रहे है जब मनोरंजन के लिए यही सब कुछ होता था। अक्सर रविवार के दिन साँप,भालू,बन्दर वाले आते थे । जहाँ भालू और बन्दर वाले भालू और बन्दर का नाच दिखाते थे वहीं साँप वाले साँप और नेवले की लड़ाई दिखाते थे और पता नही कितने तरह के साँप दिखाते थे।

इसे देख कर लगा कि आज भी इतने सालों बाद कुछ भी नही बदला है। बदला तो बस इतना कि बन्दर वाला अब ५-१० रूपये की जगह सौ रूपये मांगता है। हमने १०० तो नही ५० रूपये दिए थे।और साथ मे केले और बिस्कुट दिए थे।


नोट-- और हाँ कुछ खा-पीकर देखियेगा क्यूंकि सुना है सुबह-सुबह बन्दर (हनुमान जी का नही )का नाम लेने से दिन भर कुछ खाने को नही मिलता है। :)

यूं तो ये विडियो हमने पिछले साल आगरा से फतेहपुर सीकरी जाते हुए हाईवे पर बनाया था।आप विडियो देखिये
नोट-- हम भी इस बात को ठीक नही समझते हैपर सिर्फ़ ये दिखाने के लिए ये विडियो लगाया है कि पचास साल बाद भी हम वहीं के वहीं है


Saturday, February 23, 2008

आज ये हमारी दो सौवी पोस्ट है ।यकीन नही हो रहा है । इतनी सारी पोस्ट लिखने की हिम्मत और हौसला आप लोगों से ही मिला है।जब हमने ब्लॉगिंग शुरू की थी तो रोमन हिन्दी मे लिखते थे। और इसीलिए शुरू की चार पोस्ट रोमन मे है और उसके बाद हमे हिन्दी राईटिंग टूल के बारे मे पता चला था।और तब पांचवी पोस्ट से हमने हिन्दी मे लिखना शुरू किया था।

पहले हम कुछ तरह से लिखते थे जरा गौर फरमाये।

Friday, February 23, 2007

Sony ki Durgesh nandini

kya kamal ka serial banaya hai , ichcha hoti hai ki director se ye poonchne ki ,ki aise bachche kahan hote hai. serial ne to ma aur bete ke rishte ki dhajjiyian hi uda di hai. mana ki aaj kal bachche paise ke peeche bhagte hai par jo launguage use ki gayi hai wo to meri samajh ke bahar hai. bete apne father ko buddha aur mother ko budhiya bolte hai.aur jaisa atyachar bete aur beti apni ma ke saath kar rahe hai wo to hamein aurangjeb ki yaad dilata hai.saare log overacting karte lagte hai. is serial ne to beti ko bhi nahin baksha, usse bhi property ka lalachi dikhaya hai jabki normally beti apna hissa nahin leti hai. chalo ek baar ko maan bhi le ki subko poroperty ka lalch hai per usse itna vibhats na dikhakar thoda hulke andaaj main bhi dikha sakte hai.

jis tarah se bete apni ma ho almari main bane chor darwaze ke peeche bane kamre main band rakhte hai,wo sub dikhakar director aakhir kya dikhana chahate hai,aise serials chote bachchon ke dimag par galat asar karte haiaur jo log zara bhi aise bigde dimag wale hai ye serial unnhe uksa sakta hai aisa hi kuch galat kaam karne ko.(ma,papa ko satane ka)


और आज हम जो भी थोड़ा बहुत लिख रहे है उसमे इस ब्लॉगर परिवार का बहुत बड़ा हाथ है क्यूंकि अगर आप लोग समय-समय पर हमारा मार्गदर्शन नही करते तो शायद हम यहां तक नही पहुँच पाते मतलब कब का ब्लॉगिंग को छोड़ कर भाग चुके होते





Friday, February 22, 2008

क्या ज़माना आ गया है की अब क्रिकेट खिलाडियों की बोली लगाई जा रही है।पहले कहानियो मे और इतिहास मे पढने को मिलता था की इंसानों की बोली लगाई जाती थी।जानवरों की बोली तो आज भी लगती है।समय बदला और अब क्रिकेट खिलाडियों की बोली लगाने का सिस्टम शुरू हुआ है।पहले लोग हाट-बाजार और सड़क चौराहे पर बोली लगाते थेअब बाकायदा बड़े होटल मे बढ़िया टेबल और पूरी शान-शौकत और खाने-पीने के बीच बोली लगाने (नीलामी की तरह) का सिलसिला शुरू हुआ है।

आई.पी.एल.ने ये नया फंडा शुरू किया है बोली लगाने का। पहले तो टीम के लिए बोली लगाई गई और अब खिलाडियों के लिए बोली लगाई गई।एक-एक टीम सौ साढ़े तीन सौ करोड़ मे बिकी है। और अब खिलाडी भी करोड़ों मे बिक रहे है। बिकने वाले खिलाडी और खरीद दार दोनों हाथों से दौलत समेटने मे लगे है।हर खिलाडी की कीमत करोडों मे मापी जा रही है।पर तब भी दादा यानी सौरभ गांगुली खुश नही नजर आ रहे है क्यूंकि उनकी कीमत धोनी से कम जो है।

अब खिलाडी की कीमत आलू -प्याज के जैसी हो गई . जैसे आलू-प्याज १० रूपये किलो बिकता है तो क्रिकेटर - -6करोड़ मे । पर इन दो-चार करोड़ से भी अपने यहां के खिलाडी संतुष्ट नही क्यूंकि अब उन्हें खेल की जगह पैसा जो दिखाई दे रहा है। अब सौरभ गांगुली को ही देख लीजिये उन्हें जितना मिल रहा है उससे संतुष्ट नही है क्यूंकि उन्हें भी ६ करोड़ की कीमत चाहिए क्यूंकि धोनी की कीमत ६ करोड़ जो लगाई गई है। और तो और शाह रुख खान जिनकी कोलकता टीम के दादा कप्तान है उन्होंने सौरभ को धोनी से ज्यादा कीमत देने का भरोसा भी दिया है।(अब शाह रुख खान तो अपने डिश के विज्ञापन मे भी कहते है की संतुष्ट मत रहो और विश् करोलगता है सौरभ ने ये विज्ञापन देखा है :) इसीलिए और विश् कर रहे है। अब जहाँ सौरभ को आइकोनिक प्लेयर बना दिया गया और उनकी कीमत फिक्स हो गई वहीँ धोनी अनमोल रहे क्यूंकि आईकोनिक प्लेयर जो नही थे । और इसीलिए चेन्नई के विजय माल्या ने उन्हें करोड़ मे खरीदा

अभी तो सिर्फ़ सौरभ ने कहा है अभी तेंदुलकर और द्रविड़ भी शायद अपनी कीमत धोनी से ज्यादा करने की मांग करेंगे। :)



Thursday, February 21, 2008

आज यानी २१ फरवरी के दिन ही हमने ब्लॉगिंग की दुनिया मे जन्म लिया था ,अरे मतलब आज ही के दिन इसी समय हमने अपनी पहली पोस्ट लिखी थी।आज पूरा एक साल हो गया हमे ब्लॉगिंग करते हुए। जिस तरह से एक बच्चा अपने पैदा होने के साथ ही सीखना शुरू करता है ठीक उसी तरह हमने भी इस ब्लॉगिंग की दुनिया मे आकर बहुत कुछ सीखा है। हमारी शुरूआती दिनों की पोस्ट कुछ ऐसी ही थी जैसे जब बच्चा चलना सीखता है तो उसके कदम डगमगाते है पर धीरे-धीरे चलना सीख ही जाता है और इसी तरहडगमगाते हुए हमने भी ब्लॉगिंग के तीन महीने पूरे किए थे।

अपने इस एक साल की ब्लॉगिंग का सबसे ज्यादा श्रेय हमारे दोनों बेटों को है जिन्होंने हमे एक तरह से जबरदस्ती ठोक-ठोक कर ब्लॉगिंग करना सिखाया।और अभी भी जब भी कोई गड़बड़ होती है तो हम बेटों से ही पूछ कर ठीक करते है।पतिदेव तो हमसे कहते-कहते थक गए थे कि हम भी कंप्यूटर सीख ले।खैर अब सभी खुश है

इस एक साल मे आप सबने अपनी टिप्पणियों से जिस तरह से हमारी हौसला अफजाई की है उसके लिए आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया। क्यूंकि जिस तरह इंसान को जिंदा रहने के लिए साँस लेने की जरुरत होती है उसी तरह ब्लॉगिंग मे ब्लॉगर को टिप्पणियों की जरुरत है। ये टिप्पणियां ना केवल हौसला बढाती है बल्कि गलतियों की ओर भी ध्यान दिलवाती है।

अभी हाल ही मे संजय जी ने अपनी एक टिप्पणी मे लिखा था की हमारे नाम के साथ tv क्यों लगा है।तो संजय जी वो इसलिए क्यूंकि जब हमने ब्लॉगिंग शुरू की थी तब हमने सिर्फ़ टी.वी सीरियल के बारे मे ही लिखने की सोची थी और इसीलिए हमारे ब्लॉग का नाम mamtatv है। पर धीरे -धीरे आप लोगों की टिप्पणियों की वजह से हमने भी ब्लॉगिंग करना कुछ सीख ही लिया है ।

इस एक साल के सफर मे हम रेडियोनामा से भी जुड़े और अपना एक और ब्लॉग सवा सेर शौपर भी शुरू किया। इसी एक साल के सफर के दौरान हमारे ब्लॉग को अवार्ड के लिए भी चुना गया।

आप सबके साथ और सहयोग के बिना इस एक साल के सफर को पूरा करना मुश्किल ही नही नामुमकिन भी थाएक बार फ़िर से आप सभी का तहे दिल से बहुत-बहुत धन्यवाद और शुक्रिया

Wednesday, February 20, 2008

दिल्ली मे रहते हुए मेहमानों से दूर रहना मुश्किल ही होता है। गाहे-बगाहे लोग आ ही जाते और फ़िर अपनी खातिरदारी भी करवाते है आप चाहे या ना चाहे।अब अपने भारत मे तो मेहमान को भगवान का रूप ही माना जाता है मेजबान माने या ना माने ।कई बार तो ऐसे मेहमान आते कि लगता ओह बाबा ये कब जायेंगे।दिल्ली मे रहते हुए ऐसे लोगों मतलब मेहमानों से बहुत वास्ता पड़ता था।

ये तो हम सभी जानते है कि दिल्ली मे जितनी गर्मी पड़ती है उतनी ही ठंड भी पड़ती है।दिल्ली मे सर्दियों मे नल का पानी इतना बर्फीला ठंडा होता है कि पानी छूने पर लगता कि हाथ ही गल जायेगा।अब अगर ऐसी गलन भरी सर्दी मे जहाँ रजाई से बाहर निकलना मुश्किल हो वहां अगर अनचाहे मेहमान आ जाए तो ना चाहते हुए भी खुले दिल से मेजबानी करनी ही पड़ती थी।आज का वाकया ऐसे ही मेहमान के नाम है।

ऐसी ही एक जाड़े की गलन भरी सर्दी की शाम को फलाने जी फ़ोन आया और उन्होंने हाल-चाल पूछा की भाई आजकल तुम लोग रहते कहाँ हो।और दुनिया भर की बातचीत के बाद उन्होंने पूछा कि आज शाम को क्या घर पर हो ।

और जब पतिदेव ने कहा की हाँ घर पर ही है . तो इस पर उधर से फलाने जी ने कहा की अच्छा तो हम लोग अभी थोडी देर मे तुम्हारे घर आ रहे है।
जब उन्होंने अपने आने की बात की तो रात के खाने का निमंत्रण देना ही पड़ा।
खैर फलाने जी सपरिवार रात को खाने पर आए। और हमने भी सब जाड़ा-वाड़ा भूल कर उन्हें मन ही मन कोसते हुए किचन मे जाकर खाना बनाना शुरू किया। और पतिदेव पर भी नाराज हुए की उन्हें मना कर देना चाहिए था, फालतू मे अब इतने जाड़े मे खाना बनाना पड़ रहा है।

खैर हमने खाना बनाया और फलाने जी के सपरिवार आने पर खूब खुशी जाहिर करते हुए उनसे मिले और बातचीत भी हुई। सब कुछ ठीक से निपट गया माने खाना हुआ स्वीट डिश खाई गई और काफ़ी भी पी गई।और काफ़ी पीते-पीते फलाने जी की पत्नी बोली ममता आज कितनी ज्यादा ठंड पड़ रही है ना।
अब हम हाँ के अलावा कह भी क्या सकते थे। :)
इस पर उन्होंने आगे कहा( जिसे सुनकर तो हम गुस्से से उबल ही पड़े ) की आज तो हमारा तो खाना बनाने का बिल्कुल भी दिल नही कर रहा था ।हम सोच रहे थे की खाना बनाए या क्या करें ।
और फ़िर तुम्हारे यहां आने का कार्यक्रम बन गया। तुमने इतना सारा खाना कैसे बनाया।
अन्दर ही अन्दर गुस्से से उबलते हुए हमने अपने चेहरे पर ३६ इंच की मुस्कान फैला दी।

इतना ही नही जब वो जाने लगे तो हम लोगों ने उन्हें फ़िर आने के लिए कहा । और उन्होंने हमारे इस निमंत्रण को खुले दिल से स्वीकारा और उनका आना चलता ही रहा।


कुछ और मेहमानों से आगे भी मिलवाएँगे।

Tuesday, February 19, 2008

अप्पू घर इस नाम से ना केवल दिल्ली वाले अपितु दूसरे प्रदेश और शहरों के लोग भी वाकिफ है।अप्पू घर amusement park जो कि एक तरह से दिल्ली की पहचान सा बन गया था अब ना केवल अपनी पहचान बल्कि अपना अस्तित्व ही खोने जा रहा है।अप्पू घर जिसे बने २३-२४ साल हो गए है पर अभी तक इतने सालों के बाद भी अप्पू घर घूमने वालों के जोश मे कोई कमी नही आई किसी भी रविवार को अप्पू घर के बाहर लोगों की भारी भीड़ देखी जा सकती थी।यहां झुला झूलने के लिए लोग बिना सर्दी गर्मी कि परवाह किए घंटों लाइन मे खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करते देखे जा सकते थे। (थे इसलिए क्यूंकि बीते रविवार यानी १७ फरवरी से अप्पू घर बंद हो रहा है)

अप्पू घर से तो हमारी भी बहुत सारी यादें जुड़ी हुई है। जब बेटे छोटे थे तो अक्सर ही अप्पू घर जाते थे।और घंटों बच्चे झुला झूलते थे जैसे मोनो रेल,स्माल कार,उड़न तश्तरी,बाईक्स ,और ना जाने क्या-क्या। और पिछले २३-२४ साल मे ना जाने कितने बदलाव भी अप्पू घर मे आए जैसे पहले तो सिर्फ़ झूले थे फ़िर भूत बंगला बना और फ़िर स्पलेश ट्रेन ,वाटर किंगडम ,आइस-स्केटिंग वगैरा-वगैरा कोई भी मेहमान दिल्ली आए और बिना अप्पू घर घूमे चला जाए ऐसा तो हो ही नही सकता थाअप्पू घर जहाँ जाकर बच्चे तो बच्चे माँ-बाप भी प्रसन्न हो जाते थे कुछ झूलों जैसे अप्पू कोलम्बस,स्पलेश ट्रेन पर झूलने मे हमे डर भी बहुत लगता था और मज़ा भी बहुत आता था


पिछले कुछ सालों से अप्पू घर बंद किए जाने की बात सुनाई देती थी पर अब तो पूरी तरह से तय ही है की अप्पू घर अब बंद होकर ही रहेगा क्यूंकि अप्पू घर की जमीन की लीज़ ख़त्म हो गई है और इसलिए अब इस पार्क की जमीन पर सुप्रीम कोर्ट का अधिकार होगा और सुप्रीम कोर्ट इस पार्क की जगह पर कार पार्किंग बनाएगा क्यूंकि सुप्रीम कोर्ट मे गाड़ियों की संख्या दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है। ( या हो सकता है की कुछ और बनाएगा।)

अब जब वकील होंगे तो कारें तो बढेगी ही।पर दिल्ली मे मेट्रो रेल भी तो है अब आधे से ज्यादा दिल्ली मे मेट्रो रेल चलती है। अगर दूसरे ऑफिस आने-जाने वाले मेट्रो रेल मे सफर करके अपने ऑफिस जा सकते है तो क्या सुप्रीम कोर्ट के वकील मेट्रो रेल मे नही चल सकते है।अगर नही तो मेट्रो रेल के होने का क्या फायदा चाँदनी चौक से लेकर द्वारका से चल कर अप्पू घर तक मेट्रो रेल चलती है। और अप्पू घर सुप्रीम कोर्ट के ठीक सामने है। क्या मेट्रो रेल सिर्फ़ आम जनता के लिए ही बनाई गई है।


पता नही दिल्ली मे इतनी सारी संस्थाएं है सरकारी और गैर सरकारी पर कोई भी अप्पू घर के बंद होने पर आवाज नही उठा रहा है।बच्चों के लिए दिल्ली जैसे शहर मे अप्पू घर जैसा amusement park होना निहायत जरुरी है।अप्पू घर बंद होना बच्चों के लिए अच्छा नही होगा। पर बच्चों के बारे मे सोचता ही कौन है

अब जब आमिर खान इस पर फ़िल्म बनायेंगे तब ही लोगों को समझ आएगा

अब अगली बार जब हम दिल्ली जायेंगे तब अप्पू घर की जगह बड़े-बड़े बुलडोज़र दिखाई पड़ेंगे झूलों को तोड़ते और गिराते हुए .और अब अप्पू घर भी इतिहास बन जायेगा। बस फर्क इतना ही है कि पहले ऐतिहासिक धरोहर को जनता और सरकार बचाती थी पर अब तोड़ती है।

Monday, February 18, 2008

आम तौर पर हम ब्लौग्वाणी ही इस्तेमाल करते है और इससे काफ़ी संतुष्ट भी है। पर आज एक अजीब सी बात देखने को मिली। और इसीलिए हम ये पोस्ट लिख रहे है।अभी दूसरे लोगों के ब्लॉग पढ़ते-पढ़ते हमने अचानक नोटिस किया कि हमारी आज सुबह वाली पोस्ट अब ब्लॉगर मे भी चिट्ठे समय निर्धारित कर सकते ब्लौग्वाणी पर कहीं नजर नही आ रही है ।हालांकि सुबह ये पोस्ट दिख रही थी पर अभी नही दिख रही है।


अब चूँकि ब्लॉगिंग का चस्का लग गया है इसलिए दो-तीन बार पेज पर चेक भी किया पर हमारी पोस्ट कहीं नजर नही आई। तो कौतुहल वश हमने चिट्ठाजगत खोला तो वहां पर हमारी आज की पोस्ट दिख रही है। अब ऐसा क्यों है ये तो हम नही जानते है। हो सकता है कुछ तकनीकी मामला हो ।

अभी एक बार हमने फ़िर से देखा पर अभी भी ब्लौग्वाणी पर हमारी आज की पोस्ट गायब है पर चिट्ठाजगत और नारद मे मौजूद है।

ऐसा क्यों है कोई बताये।

एक या दो महीने पहले शास्त्री जी ने अपने ब्लॉग पर अपने चिट्ठे को कैसे समय निर्धारित करेँ , के बारे मे बताया था । और उसे पढ़कर लगा था कि काश ब्लॉगर मे भी ये सुविधा हो जाए क्यूंकि उस समय तक ब्लॉगर मे ये सुविधा उपलब्ध नही थी पर आज ये सुविधा ब्लॉगर मे भी उपलब्ध हो गई है। अब चिट्ठे लिख कर उन्हें समय और तारीख के अनुसार पब्लिश कर सकते है।कैसे तो इसके लिए यहां पढे।

जरा और खुलासा करके बताते है। जैसे ये पोस्ट हम सत्रह तारीख की रात ग्यारह बजे लिख रहे है पर इसमे पोस्ट को पब्लिश करने की तारीख अट्ठारह और समय सुबह नौ बजे का निर्धारित कर रहे है।अब अगर ये सुबह नौ बजे पब्लिश हो गई तो मतलब ब्लॉगर मे चिट्ठे लिखने वाले भी अपनी पोस्ट को समय निर्धारित कर सकते है।

इस सुविधा का एक सबसे बड़ा फायदा ये है कि अब कहीं बाहर जाने ( मसलन अपने शहर से दूर ) पर भी अपनी पोस्ट के जरिये चिट्ठाकार बलॉग जगत मे अपनी मौजूदगी बनाए रख सकता है।

Sunday, February 17, 2008

ये फ़िल्म ऑस्कर मे बेस्ट फ़िल्म के लिए तो नही पर बेस्ट ऐक्टर इन अ सपोर्टिंग रोल के लिए nominated है। हालांकि फ़िल्म मे brad pitt है जो jesse james के रोल मे है और casey affleck जो robert ford के रोल मे है।फ़िल्म मुख्य रूप से इन्ही दो किरदारों पर है। फ़िल्म की कहानी कुछ ख़ास नही है।jesse james जो की एक notorious robber है । robert ford बचपन से ही jesse james के जैसा बन कर मशहूर होना चाहता था और इसीलिए robert अपने भाई के साथ jesse james का ग्रुप भी ज्वाईन करना चाहता हैबाद मे किस तरह robert jesse james के काम करने के तरीके को देख कर बदल जाता है


यूं तो फ़िल्म मे brad pitt भी है पर इस फ़िल्म मे brad pitt की एक्टिंग कुछ ख़ास जमी नही।अपने लंबे नाम की तरह ही ये फ़िल्म भी लम्बी है । और फ़िल्म इतनी धीमी गति से आगे बढ़ती है की हमने इस फ़िल्म को टुकड़े-टुकड़े मे देखा अरे मतलब दो -तीन दिन मे। क्लाइमेक्स का सीन तो बिल्कुल ही बोरिंग है। एक बार मे झेलना इस फ़िल्म को हमारे बस की बात नही थी। क्यूंकि फ़िल्म मे हमे तो कुछ भी interesting नही लगा।music और cinematography ठीक है।

casey affleck को बेस्ट ऐक्टर इन अ सपोर्टिंग रोल के लिए nominate किया गया है।casey ने कोई बहुत जबरदस्त एक्टिंग नही की है बस ठीक-ठीक ही एक्टिंग की है।

इस फ़िल्म की एक झलक देखिये।

Friday, February 15, 2008

कुछ दिन पहले दिनेश जी ने अदालतों की संख्या बढाए जाने की बात की थी जिससे लोगों को जल्दी न्याय मिल सके।तो इस पर हमें अपने साथ हुई एक घटना की याद आ गई।बात अस्सी के दशक की है। उन दिनों हम लोग दिल्ली मे रहते थे। । उन दिनों हम लोगों की कालोनी मे कार गैराज नही थे इस लिए सभी लोग अपनी कार घर के बाहर खड़ी करते थे।तब इतना ज्यादा गार्ड वगैरा रखने का भी चलन नही था। हर सुबह कार साफ करने के लिए आदमी आता था और कार साफ करने के बाद चाभी देकर चला जाता था।

ऐसी ही एक सुबह जब कार साफ करने वाले ने घर की घंटी बजाई तो हमने उसे कार की चाभी दी और वो कार साफ करने के लिए चला गया पर चंद सेकंड के बाद लौटकर आया और बोला की गाड़ी तो है ही नही।
उसके ऐसा कहने पर हमने चौंककर कहा की गाड़ी नही है तो कहाँ गई।
इस पर उसने फ़िर वही कहा की जी गाड़ी तो बाहर खड़ी ही नही है।
इतना सुनकर तो हम लोगों के होश ही उड़ गए की चाभी घर मे और गाड़ी गायब।
खैर इधर-उधर लोगों से पूछा पर कुछ पता नही चला तो पुलिस स्टेशन मे कार चोरी होने की रिपोर्ट लिखवाई गई। और उसके बाद पुलिस ने कार को ढूंढ़ना शुरू किया।और तकरीबन एक महीने बाद हम लोगों को पुलिस स्टेशन से फ़ोन आया की जी आपकी कार मिल गई है । इसलिए पुलिस स्टेशन आकर देख लीजियेऔर पहचान कर जाइएपुलिस स्टेशन पर जो कार दिखी वो कार क्या बस टिन का एक डिब्बा ही रह गई थी क्यूंकि बाकी सब कुछ उन चोरों ने निकाल कर बेच दिया था।

कार मिलने के दो -तीन दिन बाद पुलिस वाले एक १४-१५ साल के लड़के को लेकर आए और कहा की इसी ने आपकी कार चोरी की थी। उस लड़के जब हम लोगों ने पूछा की तुमने कार कैसे खोली तो बड़े ही इत्मिनान से उसने जवाब दिया मास्टर की से ।तब उस पुलिस वाले ने बताया जिस समय हम लोगों की कार चोरी हुई थी उस समय ४-५ कार और चोरी हुई थी और उन्हें १४-१५ साल के ६-७ लड़कों ने चुराया था। और ये लड़के सारीगाड़ियों की नंबर प्लेट बदल कर बेच रहे थे। वो सभी लड़के ड्रग एडिक्ट थे।

खैर उसके बाद केस रजिस्टर हुआ और तारिख पर तारिख का सिलसिला शुरू हुआ तो ख़त्म होने का नाम ही नही ले रहा था।दिन,महीने,साल बीतते गए और हम लोगों ने भी इस बात को ज्यादा तवज्जोह देना छोड़ दिया। और करीब दस साल बाद एक दिन हमारे घर की घंटी बजी दरवाजा खोला तो एक सज्जन अपने जवान बेटे के साथ खड़े थे।उन सज्जन ने हमारे पतिदेव के बारे मे पूछा । चूँकि उनको हम पहचानते नही थे इसलिए उन्हें रुकने को कहकर हम ने पतिदेव को बुलाया और उनके जाने पर पतिदेव ने जो बताया वो सुनकर तो हम बिल्कुल ही हक्का-बक्का रह गए थे।
दरअसल मे जो जवान लड़का उन सज्जन के साथ था ये वही लड़का था जिसने मास्टर की से हमारी गाड़ी खोली थी। और वो सज्जन उसके पिता थे और वो हमारे पतिदेव से उस लड़के की कहीं नौकरी लगवाने की बात करने आए थे।

ये जरुर है की इस बात को अब काफ़ी साल हो गए है पर आज भी समय नही बदला है। अदालतों का जो हाल है वो हम सभी जानते है। एक एक केस को निपटाने मे दस-दस साल लग जाते है । आज भी अगर एक आम आदमी कोर्ट के चक्कर मे पड़ जाता है तो उसके हिस्से सिर्फ़ तारिख ही आती है।

और इसीलिए पहले भी और आज भी लोग यही कहते है कि कोर्ट कचहरी के चक्कर से आदमी जितना दूर रहे उतना ही अच्छा है

Thursday, February 14, 2008

आज वेलेन्टाईन डे है यानी प्यार करने वालों के लिए खतरे की घंटी। पिछले तीन-चार दिनों से हर प्रदेश मे अलग -अलग तरह से लड़के-लड़कियों को आपस मे मिलने से रोकने के लिए नए-नए तरीके अपनाए जा रहे है। भोपाल मे जहाँ बजरंग दल के लोग कहते है कि वो आज के दिन जहाँ भी किसी प्रेमी जोड़े को देखेंगे तो उनके माता-पिता को बुलाकर उनकी वहीं शादी करा देंगे, तो उत्तर प्रदेश मे ये कहा जा रहा है कि अगर कोई भी लड़का-लड़की घूमते हुए दिखेंगे तो उनका मुंह काला करके घुमाया जायेगा

भोपाल मे जहाँ एक तरफ़ बजरंग दल लोगों को घर मे रहने की धमकी दे रहा है वहीं भोपाल मे महिलाओं ने एक गदा धारी सेना भी बनाई है प्यार को बचाने कीइस गदा धारी महिला सेना का कहना है की वो प्रेमी जोडों को बजरंग दल से बचाने और मुहब्बत को जिंदा रखने के लिए सारे शहर मे घूमेंगी


तकरीबन हर साल कोई ना कोई दल धमकी देता है ,दुकानों मे तोड़-फोड़ करता है ,लड़के-लड़कियों की पिटाई करते है पर आख़िर क्यों ।

जहाँ हर जगह आज के दिन रोक-टोक है वहीं गोवा के अखबार वेलेन्टाईन डे सेलिब्रेशन के लिए विभिन्न होटलों के आयोजनों से भरे है।तो हैदराबाद मे तो स्पेशल कार काफ़ी मग के आकार मे बनाई गई है आज के दिन को सेलिब्रेट करने के लिए। और गुलाब की कीमत तो आज के दिन आसमान छूती है।जैसे कल ही न्यूज़ मे दिखा रहे थे की गुलाब की कीमत उनतीस लाख रूपये।है ना चौकाने वाली बात।

Monday, February 11, 2008

सारे टी.वी चैनल के मुताबिक आज देश की सबसे बड़ी खबर संजय दत्त की शादी है। आज सुबह से सारे टी.वी.चैनल संजय दत्त की शादी की खबर से भरे पड़े है।कि संजय दत्त और मान्यता की शादी हिंदू रीति-रिवाज से आज हो रही है जबकि गोवा मे अभी हाल ही मे उनकी कोर्ट मैरेज हो चुकी है।सुबह से चैनल वाले लगे है कि क्या संजय कि बहनें शादी मे शामिल होंगी या नही ।कोई चैनल कहता कि संजय ने शादी का निमंत्रण अपनी बहनों को दिया है तो कोई कहता है कि निमंत्रण नही दिया है। कभी कहते है कि प्रिया दत्त ने इस शादी पर कुछ भी कहने से इनकार किया तो कभी कहते है कि संजय ने अपनी बहनों को शादी मे नही बुलाया है। बहनों को अपने भाई की शादी मे शिरकत करनी चाहिऐ क्यूंकि जब उसके बुरे वक्त मे साथ दिया है तो अच्छे वक्त मे भी साथ देना ही चाहिऐ । और ख़ुशी का हकदार तो हर कोई होता है।

संजय दत्त की शादी हो रही है तो एक चैनल ने तो बनारस के एक पंडित जी से ही पूछना शुरू कर दिया की उसकी ये शादी सफल होगी या नही और पंडित जी बेचारे बार-बार यही कहते रहे की आज चूँकि बसंत पंचमी है तो आज का दिन शादी के लिए बहुत शुभ है।अब शादी चलती है या नही इस के लिए भी सब परेशान है।

वैसे शादी के मामले मे संजय दत्त की किस्मत उन्हें धोखा देती रही है। पहले ऋचा शर्मा से शादी जिसका कि बहुत ही दुखदाई अंत रहा । फिर रेहा पिल्लै से शादी जो ज्यादा दिनों तक नही चली और अब मान्यता से शादी।चलो भाई हम तो यही कामना करते है कि संजय कि ये शादी सफल हो।

Friday, February 8, 2008

स्त्री और पुरुष के बिना किसी भी समाज की कल्पना नही की जा सकती हैक्यूंकि ना तो केवल स्त्रियों और ना ही केवल पुरुषों से ही समाज या संसार चलता हैकिसी भी इमारत की नींव हमेशा मजबूत होनी चाहिऐ क्यूंकि अगर नींव कमजोर होगी तो इमारत ढह जायेगीऔर जिस समाज या संसार मे हम रहते है उसकी नींव स्त्री-पुरुष दोनो होते हैजिस तरह एक इमारत को खड़ा करने के लिए नींव और खम्भों की जरुरत होती है उसी तरह समाजऔर घर-परिवार रूपी इमारत को खड़ा करने मे स्त्री और पुरुष दोनो की बराबर की हिस्सेदारी होती हैजरा भी संतुलन बिगड़ता हैतो इमारत के ढहने का खतरा हो जाता है

स्त्री को जहाँ जननी और अन्नपूर्णा कहा गया है वहीं पुरुष को पालनहार माना गया हैजननी इस शब्द से ही ज्ञात होता है कि एक नए जीवन को इस संसार मे लाना यानी जन्म देनाऔर जननी के साथ ही जन्मदाता को हम भूल नही सकते है क्यूंकि किसी भी नए जीवन को संसार मे लाने मे जननी और जन्मदाता दोनो की समान भूमिका होती है

प्राचीन समय मे भले ही स्त्रियों की दशा खराब थी पर आज के समय मे स्त्रियाँ पुरुषों के कंधे से कन्धा मिल कर चल रही हैऔर आज का समय अब वो नही रहा जहाँ सिर्फ स्त्रियाँ घर-बार ही संभालती हो और पुरुष बाहरी जगत यानी नौकरी करते होअब तो स्त्री और पुरुष दोनो नौकरी भी करते है और घर-परिवार की जिम्मेदारी भी बराबर से उठाते हैहम कुछ ऐसे परिवारों को जानते है जहाँ पति-पत्नी दोनो नौकरी करते है और दोनो को ही ऑफिस से आने मे देर होती है पर उन परिवारों मे एक बात बहुत अच्छी है वो है आपसी सामंजस्य क्यूंकि बिना इसके परिवार को चला पाना बड़ा मुश्किल होता हैऔर आपसी सामंजस्य और सूझबूझ ना केवल नौकरी करने वालो बल्कि घर मे रहने वाली गृहणियों (होम मेकर) के परिवारों के बीच मे भी होना नितांत आवश्यक है

आज किसी भी क्षेत्र मे वो चाहे शिक्षा ,खेल , राजनीति ,लेखन ,फिल्मी दुनिया,और चाहे अपना ब्लॉगिंग जगत ही क्यों ना हो आज पुरुषों की तरह स्त्रियाँ भी इन सभी जगहों पर बराबरी से भाग ले रही है (वैसे ब्लॉगिंग के लिए अभी ये कहना जल्दी है क्यूंकि यहां स्त्रियों की संख्या पुरुषों की तुलना मेबहुत कम है )।जहाँ लिज्जत पापड़ जो की महिलाओं की एक सहकारी संस्था है और जिसने बडे ही छोटे स्तर से शुरुआत करके आज अपना ये मुकाम बनाया हैतो वहीं राजस्थान मे भी महिलाओं ने सहकारी संस्था बनाकर डेरी प्रोडक्ट को बढावा दियाइससे ना केवल महिलायें आत्मनिर्भर हुई बल्कि अपने घर-परिवार को भी सहयोग प्रदान किया

इसलिए जहाँ तक हमारा मानना है वो ये है कि अब समय बदल रहा है इसलिए अब स्त्री-पुरुष को एक दूसरे का पूरक मानना चाहिऐआप क्या सोचते है

Thursday, February 7, 2008



मौनी अमावस्या आज है ये तो हमे सुबह टी.वी. से पता चला। पता नही इस बार फरवरी मे कैसे पड़ रही है आमतौर पर तो जनवरी के आख़िर मे ही ये अमावस्या पड़ती थी।खैर चलिए आज थोडा मौनी अमावस्या के बारे मे बता दे। मौनी अमावास्या इसे इसलिए कहते है क्यूंकि ये अमावस्या माघ के महीने मे पड़ती है। और सूर्य और चन्द्रमा एक दूसरे की सीध मे आ जाते है या मिलते है।और ग्रहण भी लगता है।( टी.वी. मे बता रहे थे कि इस बार पंद्रह दिन मे दो ग्रहण लगेंगे।) मौनी अमावस्या जैसा की नाम से विदित हो रहा है की इस दिन मौन व्रत और उपवास भी रक्खा जाता है ।और त्रिवेणी यानी गंगा,यमुना सस्वती के संगम पर लोग नहाते है।और ये भी माना जाता है की इस दिन नहाने से सब पाप धुल जाते है। और आमतौर पर इसी दिन कुम्भ या महा कुम्भ पड़ता है और कुम्भ का नहान भी होता है।इन दिनों पूरा इलाहाबाद शहर श्रद्धालुओं से भरा रहता है।

इस अमावस्या के साथ एक और कहानी भी है की जब देवताओं और असुरों के बीच जब अमृत मंथन हो रहा था उस समय कुछ अमृत इन चार स्थानों इलाहाबाद,हरिद्वार,नासिक,और उज्जैन मे गिर गया था। इन सभी स्थानों पर इस तरह के नहान होते है पर सबसे ज्यादा इलाहाबाद का महत्त्व माना जाता रहा है क्यूंकि इलाहाबाद मे संगम है।

जब हम लोग छोटे थे तब हर साल माघ मेला के समय संक्रान्ति,मौनी अमावस्या और बसंत के दिन जरुर ही संगम पर नहाने जाते थे। पहले तो अमावस्या के दिन जबरदस्त ठंड पड़ती थी और कई बार तो बारिश भी होती थी पर नहाने वालों के जोश मे कोई कमी नही होती थी। घाट से संगम की ओर जाते वक्त तो नाव मे खूब ठंड महसूस होती थी। खूब स्वेटर-शॉल पहने ओढे रहते और जैसे जैसे संगम की ओर पहुँचने लगते चारों ओर से गंगा मैया की जय की आवाजों से माहौल गूंजता और जैसे ही संगम के पानी मे नहाने के लिए उतरते तो ठंड ना जाने कहाँ गायब हो जाती। पता ही नही चलता था की पानी ठंडा भी है। और फिर तो दो-चार डुबकी लगाने मे पता ही नही चलता था । और जब नहाने के बाद वापिस नाव घाट की ओर चलने को मुड़ती तो हम लोग बिना स्वेटर-शॉल के तिल के लड्डू खाते हुए वापिस आते थे।क्या मस्ती भरे दिन थे।

डुबकी लगाने से एक और वाकया याद आ गया । चलिए पोस्ट थोडी बड़ी हो रही है पर फिर भी हम इसका जिक्र कर ही देते है. बात नब्बे के दशक की है उस साल महा कुम्भ पड़ा था और हमारे ऑफिस की हमारी एक दोस्त ने इलाहाबाद कभी देखा नही था और कुम्भ के नहान के बारे मे हम उन्हें बताते रहते थे।इसलिए उनका कुम्भ और इलाहाबाद देखने का मन था। तो जब उस साल महाकुम्भ पड़ा तो हम तीनों दोस्तों ने इलाहाबाद जाने का कार्यक्रम बनाया।ऑफिस के लोगों को जब पता चला की हम तीनों इलाहाबाद जा रहे है तो हर एक ने अपने नाम से डुबकी लगाने के लिए कहा, कुछ ने गंगाजल लाने को भी कहा। हमने अपने घर पर बता दिया की हम लोग आ रहे है और बस पहुंच गए इलाहाबाद । उस दिन हम लोग रात मे संगम पर ही टेंट मे रुके और खूब ठंड थी । चारों ओर खूब भजन-कीर्तन चल रहा था ।और रात मे भी संगम पर खूब उजाला था। खैर अमावस्या के दिन हम लोग सुबह नौ बजे नहाने गए और शुरू हो गया डुबकी लगाना।भाई इतने सारे लोगों के नाम की डुबकी जो लगानी थी। तो जुखाम भी होना ही था। :)

आज हम उसी महाकुंभ की फोटो लगा रहे है। महाकुंभ के दौरान जगह-जगह पर यज्ञ होते रहते है और ऐसे ही संगम के घाट पर हो रहे यज्ञ की फोटो है। उस समय की यही फोटो बची है क्यूंकि सुनामी मे हमारे कई एलबम खराब हो गए थे। इसीलिए ये फोटो भी थोडी खराब हो गयी है।

Wednesday, February 6, 2008

अतोनेमेंट इस साल के ऑस्कर के लिए nominated हुई है ।इस फिल्म को ऑस्कर अवार्ड के लिए सात श्रेणियों मे nominate किया गया हैकल हमने ये फिल्म देखी तो सोचा की आज इसके बारे मे ही लिखा जाये


यूं तो इस फिल्म की कहानी द्वितीय विश्व युद्ध के समय को दर्शाती है और साथ ही ये कहानी एक परिवार पर आधारित है और मुख्य रुप से cecilia,briony,roobie पर ही आधारित है। कि किस तरह एक छोटी सी गलती से सबकी जिंदगी बदल जाती है। cecilia और robbie एक -दुसरे से प्यार करते है पर एक ऐसी गलती जो की robbie ने की ही नही थी और जिसके लिए robbie को जेल जाना पड़ता है।यही सबकी जिंदगी बदल देता है। विश्व युद्ध के समय जेल मे गए लोगों को ये option होता था कि या तो वो जेल मे रहे या आर्मी मे भर्ती हो जाएँ ।और robbie आर्मी मे भर्ती हो जाता है।बाद मे briony ,robbie और cecilia का क्या होता है. ये ही तो सस्पेंस है. बाक़ी की कहानी हम नही बता रहे है।

इस फिल्म मे कई flash backs है।फिल्म का संगीत तो ठीक था पर कुछ सीन मे फोटोग्राफी बहुत अच्छी है।पर एक्टिंग सबकी ठीक ही लगी।briony के किरदार को बचपन से बुढापे तक दिखाया गया है। चलिए चलते-चलते इस film की एक झलक भी आपको दिखा देते है।

Tuesday, February 5, 2008

आज की हमारी ये पोस्ट हमारे कैरी के नाम है। अभी कुछ दिन पहले ज्ञान जी ने और उसके बाद मुन्ने की माँ ने और अभी कुछ दिन पहले अनुराधा जी ने अपनी सैमी का जिक्र किया तो हमने सोचा की क्यों ना आज हम आप लोगों को कैरी से मिलवा दें। कहीं आप कैरी से आम तो नही समझ रहे है । नही जी ये आम नही कुछ खास ही है।

कैरी को घर मे लाने के पीछे भी एक कहानी है। हमारे पतिदेव और दोनों बेटों को हमेशा से doggi पालने का शौक था पर हम इससे भागते थे । हमारे मायके मे हमेशा ही doggi पाले गए है।पर मायके मे हमारे भईया और एक बहन को छोड़कर हम तीन बहनों को ऐसा कोई शौक नही था। जब हम लोग दिल्ली मे थे तो फ्लैट्स मे रहने थे इसलिए वहां कभी doggi पालने का ख़्याल भी मन मे नही आया।सिर्फ doggi को छोड़कर कभी ना कभी हमने हर तरह के pet पाले थे जैसे बिल्ली,खरगोश,चिडिया,मछली,तोता पर doggi पालने से हम हमेशा ही दूर रहे। हम जितना कुत्ते से दूर रहने वाले हमारे बेटे उतने ही कुत्ते के दीवाने। हमारे बेटे doggi के इतने दीवाने कि दिल्ली मे हम लोगों की कॉलोनी मे जो भी कुत्ते के बच्चे होते थे उन्हें ये लोग घर ले आते थे. और गैराज मे उनके लिए घर बनाते थे ।हम doggi को खाना वगैरा तो देते थे पर घर मे कभी नही आने देते थे। हमनें बेटों को ये कहकर हमेशा मना किया कि यहां छोटे घर मे कैसे पालेंगे।और हमारा ये तर्क भी होता कि कुत्ते को घुमायेगा कौन ? क्यूंकि हमें कुत्ता घुमाने से सख्त नफरत थी।

खैर हमारे बेटे बडे हो गए और जब हम गोवा आये तो यहां पर खूब बड़ा घर और चारों और खूब खुली जगह और साथ मे हर तरह के जंगली जानवर। दिल्ली मे तो हमने कभी ध्यान ही नही दिया पर यहां के अखबार मे रोज ही pets के विज्ञापन निकलते है जिनमे हर breed के कुत्तों का विज्ञापन भी होता है ।यहां आकर ही इतनी सारीbreed के नाम भी पता चले। उन दिनों बेटे यही पर थे सो बेटे पीछे पड़ गए कि अभी तक तो आप हमेशा मना करती थी कि छोटे फ्लैट मे कुत्ता नही पालेंगे पर यहां तो इतना बड़ा घर है। अब आप क्यों नही पालती है।बेटे ये भी तर्क देते कि सुरक्षा की दृष्टि से भी इस घर मे कुत्ता होना ही चाहिऐ। खैर पतिदेव और बेटों के जोर देने पर विज्ञापन देखकर हमने कुछ एक लोगों को फ़ोन किया।

पर कुत्ता खरीदना भी कोई हंसी-खेल नही है ये हमने गोवा आकर ही जाना ।इतनी breed और इतने ज्यादा दाम हम तो बिल्कुल कन्फुज ही हो जाते थे।इसलिए हमने कुत्ता खरीदने का आईडिया ही छोड़ दिया। पर हमारे बेटे भी कहाँ मानने वाले थे हमें एमोशनली ब्लैकमेल किया और बस हम जाके कैरी जो कि boxer नस्ल का है को ले आये।इसका कैरी नाम इसलिए रक्खा क्यूंकि नब्बे के दशक मे the mask फिल्म आई थी और उसका हीरो जिम कैरी हम लोगों को बहुत पसंद था
हमारे मायके वालों और दूसरे सभी को ये सुनकर आश्चर्य हुआ कि ममता ने कैसे कुत्ता पाल लिया।वैसे हम तो कैरी को दुखीराम भी बुलाते है वो क्यों ये आप photo देख कर ही समझ जायेंगे।:)

और धीरे-धीरे कैरी घर का सबसे प्रिय सदस्य कब बन गया पता ही नही चला।अब तो रोज सुबह छे बजे कैरी हम लोगों को टहलने के लिए उठाता है। पहले तो हम टहलने इतने नियमित रुप से नही जाते थे क्यूंकि हमें अपनी सुबह की नींद बड़ी प्यारी है पर अब तो टहले बिना चैन ही नही है।या यूं कहें कि कैरी को हमे टहलाये बिना चैन नही है।

Monday, February 4, 2008

आज कल राज ठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना कुछ अधिक जोश मे नजर आ रही है। पिछले कुछ दिनों से रोज ही किसी ना किसी वजह से समाचारों मे रहती है कहीं तोड़-फोड़,तो कहीं धरना, क्यूंकि अगर ऐसा नही करे तो कहीं लोग उनकी पार्टी को भूल ही ना जाये। राज ठाकरे जब तक बाल ठाकरे के साथ थे तब तक तो काफी ठीक थे पर अब तो उनका और उनकी पार्टी का नाम किसी ना किसी विवाद मे ही आता है। ऐसा लगता है महाराष्ट्र को अगर इन्होने नही बचाया तो महाराष्ट्र तो ख़त्म ही हो जाएगा।

जब अमर सिंह ने मुम्बई मे यू.पी.दिवस मनाने की घोषणा की तो ठाकरे ने कहा की वो अमर सिंह को मुम्बई मे घुसने नही देंगे और राज ठाकरे का कहना है की मुम्बई मे उत्तर भारत के लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जिससे महाराष्ट्र को खतरा है।और राज ठाकरे का गुस्सा इस बात पर भी है की अमिताभ बच्चन जो की यू.पी. के है वो यू.पी. के विकास के लिए तो काम कर रहे है पर महाराष्ट्र के लिए नही।लो भाई एक महाविद्यालय की घोषणा से ही पूरे उत्तर प्रदेश का विकास हो जाये तो क्या बात है

ठाकरे शायद मुम्बई से उन सभी लोगों यानी माइग्रेंट को मुम्बई से बाहर निकालना चाहते है जो महाराष्ट के नही है पर तब सवाल ये है कि मुम्बई मे बचेगा कौन ?

राज ठाकरे की पार्टी के समर्थक यू.पी.के साथ-साथ भोजपुरी फिल्मों के खिलाफ भी है इसीलिए भोजपुरी फिल्म का शो रोक दिया और सिनेमा हॉल मे भी कुछ तोड़-फोड़ करी।पर क्या जनता से कभी पूछा की उन्हें भोजपुरी फिल्म देखनी भी है या नही।

क्या भारत मे कोई भी ऐसा प्रदेश है जहाँ सिर्फ उस प्रदेश या भाषा को बोलने वाले ही रहते हो ?

फिल्म इंडस्ट्री का क्या होगा जहाँ आधे से ज्यादा क्या करीब-करीब सभी बाहर के लोग यानी माइग्रेंट है।

मुम्बई जो इस तरह के भेद-भाव से अलग मानी जाती रही है वहां भी ये नेता लोग इस तरह की बातों को उठा कर एक बड़ा मुद्दा बना देते है।