Wednesday, February 20, 2008

दिल्ली मे रहते हुए मेहमानों से दूर रहना मुश्किल ही होता है। गाहे-बगाहे लोग आ ही जाते और फ़िर अपनी खातिरदारी भी करवाते है आप चाहे या ना चाहे।अब अपने भारत मे तो मेहमान को भगवान का रूप ही माना जाता है मेजबान माने या ना माने ।कई बार तो ऐसे मेहमान आते कि लगता ओह बाबा ये कब जायेंगे।दिल्ली मे रहते हुए ऐसे लोगों मतलब मेहमानों से बहुत वास्ता पड़ता था।

ये तो हम सभी जानते है कि दिल्ली मे जितनी गर्मी पड़ती है उतनी ही ठंड भी पड़ती है।दिल्ली मे सर्दियों मे नल का पानी इतना बर्फीला ठंडा होता है कि पानी छूने पर लगता कि हाथ ही गल जायेगा।अब अगर ऐसी गलन भरी सर्दी मे जहाँ रजाई से बाहर निकलना मुश्किल हो वहां अगर अनचाहे मेहमान आ जाए तो ना चाहते हुए भी खुले दिल से मेजबानी करनी ही पड़ती थी।आज का वाकया ऐसे ही मेहमान के नाम है।

ऐसी ही एक जाड़े की गलन भरी सर्दी की शाम को फलाने जी फ़ोन आया और उन्होंने हाल-चाल पूछा की भाई आजकल तुम लोग रहते कहाँ हो।और दुनिया भर की बातचीत के बाद उन्होंने पूछा कि आज शाम को क्या घर पर हो ।

और जब पतिदेव ने कहा की हाँ घर पर ही है . तो इस पर उधर से फलाने जी ने कहा की अच्छा तो हम लोग अभी थोडी देर मे तुम्हारे घर आ रहे है।
जब उन्होंने अपने आने की बात की तो रात के खाने का निमंत्रण देना ही पड़ा।
खैर फलाने जी सपरिवार रात को खाने पर आए। और हमने भी सब जाड़ा-वाड़ा भूल कर उन्हें मन ही मन कोसते हुए किचन मे जाकर खाना बनाना शुरू किया। और पतिदेव पर भी नाराज हुए की उन्हें मना कर देना चाहिए था, फालतू मे अब इतने जाड़े मे खाना बनाना पड़ रहा है।

खैर हमने खाना बनाया और फलाने जी के सपरिवार आने पर खूब खुशी जाहिर करते हुए उनसे मिले और बातचीत भी हुई। सब कुछ ठीक से निपट गया माने खाना हुआ स्वीट डिश खाई गई और काफ़ी भी पी गई।और काफ़ी पीते-पीते फलाने जी की पत्नी बोली ममता आज कितनी ज्यादा ठंड पड़ रही है ना।
अब हम हाँ के अलावा कह भी क्या सकते थे। :)
इस पर उन्होंने आगे कहा( जिसे सुनकर तो हम गुस्से से उबल ही पड़े ) की आज तो हमारा तो खाना बनाने का बिल्कुल भी दिल नही कर रहा था ।हम सोच रहे थे की खाना बनाए या क्या करें ।
और फ़िर तुम्हारे यहां आने का कार्यक्रम बन गया। तुमने इतना सारा खाना कैसे बनाया।
अन्दर ही अन्दर गुस्से से उबलते हुए हमने अपने चेहरे पर ३६ इंच की मुस्कान फैला दी।

इतना ही नही जब वो जाने लगे तो हम लोगों ने उन्हें फ़िर आने के लिए कहा । और उन्होंने हमारे इस निमंत्रण को खुले दिल से स्वीकारा और उनका आना चलता ही रहा।


कुछ और मेहमानों से आगे भी मिलवाएँगे।

15 Comments:

  1. अजित वडनेरकर said...
    भारतीय परंपराओं में जहां अतिथि को देवता बताते हुए आतिथ्य के उसूल बताएं गए तो मेहमान के लिए भी कई मर्यादाएं बांधी गई हैं । वो पालन नहीं होती है तभी मेहमान बुरा लगता है। सबसे बड़ी बात तो यह कि बिन बुलाए कहीं जाना नहीं चाहिए। पहली बार के बुलावे पर ही नहीं टपक पड़ना चाहिए। किसी पर भी आतिथ्य का भार डालना अपना परम अधिकार नहीं समझना चाहिए।
    हम दिल्ली में जब थे तब एक सर्दियों में ठीक आप जैसा वाकया हुआ । उसमें बदलाव सिर्फ इतना हुआ जाने से ऐन पहले मेहमान परिवार बड़े हक से खुद ही अपने घर जाना स्थगित कर रात्रि विश्राम के लिए साधिकार रुक गया। अगले दिन देर शाम ही उनकी वापसी हो सकी थी।
    काकेश said...
    इस बार दिल्ली आयें तो बता दीजियेगा. हम भी मेहमान बनके आयेंगे.
    Sanjeet Tripathi said...
    चलो जी अब आप दिल्ली मे रहे और हम आए तो हमें कम से कम खाने का टेंशन नई रहेगा, इत्ते अच्छे मेजबान के रूप में आप जो रहोगे वहां ;)
    annapurna said...
    सोच रही हूं मैं भी दिल्ली आने का प्रोग्राम बना ही लूं।
    मीनू पहले से भेजूं या तभी आर्डर कर सकते है ?
    राज भाटिय़ा said...
    अरे ममता जी आप मेहमान छाप अगरबती कयो नही जलाती,अगरबती जलो मेहमान भागो.
    **मेहमान अगरबती आप की ओर आप के परिबार की मेहमानो रक्षक**
    राज भाटिय़ा said...
    **मेहमान अगरबती आप की ओर आप के परिबार की मेहमानो से रक्षक करे**
    Shiv Kumar Mishra said...
    बताईये, दिल्ली में ठंड न पड़ती तो ये मेहमान थोड़े न आपके घर आते. ये अच्छी रही, खाने बनाने में परेशानी हो तो मेहमान बन लिए.पूछने पर शायद ये भी कह देते कि 'हम क्या करें, दिल्ली की ठंड की वजह से हमें मेहमान बनाना पड़ा .........:-)
    Manisha said...
    दिल्ली में रहने का सबसे वड़ा नकारात्मक और सकारात्मक प्रभाव यही है कि यहां आने वाले रिश्तेदारों का तांता लगा रहता है। नकारात्मक इसलिये क्योंकि अक्सर आने वालों के कारण जीवन चर्या बिगड़ जाती है और सकारात्मक इसलिये कि सब रिश्तेदारों से मिलना-जुलना बना रहता है।

    मनीषा
    hindibaat.blogspot.com
    Gyandutt Pandey said...
    मेरे बाबा ऐसे अतिथियों को "वज्राघाती महमान" कहते थे!
    पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...
    जो मन को रुचे वही करे। यदि ऐसे लोगो से दूर रहना सम्भव हो तो रहे। जबरद्स्ती रिश्तो को मेनटेन करने के पक्ष मे नही हूँ मै।
    मीनाक्षी said...
    ममता जी, मुझे तो लगता है जो मेहमान मन भाए वे बिन बुलाए भी आ जाएँ तो सर आँखों पर बिठाने को जी चाहता है. शायद आप मेरी बात से सहमत होंगी...
    ' said...
    बहुत बढ़िया अब मेहमान भगाओ मेट लगावे अवश्य सफलता अर्जित होगी
    Lavanyam - Antarman said...
    हमारी भारतीयता का और स्त्रीयों को इस तरह न जाने कितनी ही बार, बहुत सारा
    धैर्य रखना पड़ता है !
    हर्षवर्धन said...
    चलिए कभी गोवा आना हुआ तो, बताकर आउंगा। एकाध समय का खाना भी खाऊंगा। :)

    वैसे मेहमान नाम की ऐसी ही जोरदार कहानी यूपी बोर्ड के पाठ्यक्रम में भी थी।
    Vinay Singh said...
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