Tuesday, February 26, 2008

ये फरवरी के आखिरी दिन बजट के लिए ही बने है। हर साल १५ फरवरी बीतते -बीतते हर तरफ़ सिर्फ़ बजट का ही शोर रह जाता है कि इस साल शायद बजट मे जनता के लिए कुछ जबरदस्त होगा पर बजट पेश होने के बाद वही ढाक के तीन पात।यानी ना तो आम आदमी और ना ही ख़ास आदमी खुश हो पाता है।आम आदमी ताउम्र सिर्फ़ इसी आस मे बिता देता है कि इस बार ना सही अगले साल का बजट जरुर कुछ अच्छा होगा।वो कहते है ना उम्मीद पर दुनिया कायम है

पहले यानी जब पढ़ते थे तब बजट से कोई ख़ास वास्ता नही रहा , हाँ हमेशा ये जरुर सुनते रहे कि इस साल इन्कम टैक्स मे छूट बढेगी या नही।शादी के बाद भी कुछ ऐसा ही सुनने को मिलता रहा कि इस साल इन्कम टैक्स मे छूट बढेगी या नही। एक्स्साइज ड्यूटी घटेगी या बढेगी। घरेलू चीजों, दवाओं के दामों मे कटौती या बढौती।रेल किराया और हवाई जहाज का किराया बढेगा या वही रहेगा।कौन -कौन सी चीजों पर सबसिडी मिलेगी। घर खर्च पर बजट से क्या असर होगा। लोक सभा मे बजट आने के बाद घर का बजट जरुर गड़बड़ा जाता है।

उफ़ बाबा हर साल यही होता है जहाँ फरवरी आई हर कोई अपने हिसाब से सोचने लगता है । पर वित्त मंत्री वो चाहे मनमोहन सिंह रहे हो या विश्वनाथ प्रताप सिंह रहे हो या यशवंत सिंह रहे हो या फ़िर पिछले चार साल पुराने वित्त मंत्री चिदंबरम ही क्यों ना हो, उन्हें आम आदमी की कोई ख़ास चिंता रहती है,ऐसा कुछ नजर नही आता है। हर बजट के पहले कहा जाता है कि ये आम आदमी के लिए बनाया गया है पर जब बजट लोक सभा मे पेश होता है तो पता चलता है कि आम आदमी तो बेचारा बजट के नीचे ही दब गया ।

होम लोन पर अगर ब्याज घटाते है तो इन्कम टैक्स बढ़ा देते है । कभी गैस सिलिंडर का दाम बढ़ाते है तो दो-चार रूपये घरेलू सामान पर घटा कर कहते है कि आम आदमी के हित मे बजट पेश हुआ है ।दिनों दिन बढ़ती महंगाई और आम आदमी जिसे भगवान ने कुछ ख़ास ही मिटटी का बनाया है कि वो सब कुछ झेल जाता है।चलिए इस बार देखें की २९ फरवरी को वित्त मंत्री चिदंबरम जी क्या करते है।जनता की उम्मीद पर पानी फेरते है या .....खरे उतरते है

पर जरा आम आदमी से तो पूछो कि क्या वाकई बजट से वो खुश है

अरे आज तो लालू जी रेल बजट पेश करने वाले है।

5 Comments:

  1. Tarun said...
    bajat aam aadmi ke liye isliye kehte hain kyonki paisa unhi se kamaya jaata hai na....
    ajay kumar jha said...
    mamata jee,
    saadar abhivaadan. ajee budget kaa kyaa kahein waise hee aaj kar har taraf mehangaaee kee aag lagee huee hai. shukra hai ki pichhle kushh saalon se rail kiraayon mein to jyaadaa vriddhi nahin hee hue hai.
    Sanjeet Tripathi said...
    आम आदमी मिले तो पूछें न जी!!
    इधर उधर हर जगह आम आदमी का जिक्र होता जरुर है पर वह दिखता किधर है;)
    डा० अमर कुमार said...
    बज़ट से किस प्रजाति के आम आदमी खुश होते हैं ?
    मैंने तो आज एक से पूछ कर देखा, बस भावहीन
    चेहरे से मुझे बकर बकर देखता रहा फिर थोड़ी
    आज़िज़ी से बोला, " का भैय्या, पता नहीं ई बाजट-साजट आजु का बोल रहेयो हय, हम जनतै नहिं तव का बताई कि खुस हन कि नाखुस ? दुईनों टाइम पेट भरे की मजबूरी आय, हम तो इतनै जानित हय !"
    त्रिपाठी जी, दो पल को ध्यान लगाइये , आम आदमी तो आपके अंदर ही है । ज़रूरत देखने भर के चाह की है ।
    समाज विकास said...
    आप काफी संवेदनशील है

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