बेटियाँ -- अगर बेटों पर नाज कर सकते है तो बेटियों पर क्यों नही ?(२)

कल हमने बेटियों पर लिखा था और आज उसी को आगे बढ़ाते हुए लिख रहे है ।

क्या बेटे और बेटी का पालन-पोषण अलग तरह से होता है ?

ऐसा हम बिल्कुल नही मानते है।पुराने ज़माने को छोड़ दे जब ये माना जाता था कि बेटे को अच्छा खिलाओ-,अच्छा पढ़ाओ पर बेटी को नही क्यूंकि बेटी को तो पराये घर जाना है इसलिए पढाई से ज्यादा जरुरी है घर का काम आना जैसे सिलाई-बुनाई,खाना पकाना आदि। समय बदला ,लोगों की विचार धारा बदली , अब जहाँ तक हम जानते-समझते है लोग बेटे-बेटी मे अंतर नही करते है। बेटी जिसके पालन -पोषण मे माता-पिता को वही सब कुछ करना करना पड़ता है जितना एक बेटे के पालन-पोषण के लिए माता-पिता करते है।मसलन अच्छी परवरिश,अच्छा खान-पान,अच्छे संस्कार,अच्छी शिक्षा।

ये कहा जा सकता है कि पहले लोग बेटी और बेटे मे फर्क करते थे । जहाँ बेटे को स्कूल मे पढाते थे वहीं बेटियों को घर पर रहना पड़ता था ,पर अब हालात बदल रहे है। अब तो शहरों मे ही नही बल्कि गाँवों मे भी लोग बेटियों को स्कूल भेजने लगे है। हाँ पहले गाँव मे लोग ये जरुर समझते थे कि अगर बेटी स्कूल जायगी तो घर का काम कौन करेगा पर अब ये धारणा भी धीरे-धीरे बदल रही है।पर फिर भी अभी भी बहुत वक्त लगेगा । आज जब भी किसी इम्तिहान का रिजल्ट निकलता है उसमे अधिकतर लड़कियां ही अव्वल नंबर पर आती है।(लड़के बुरा ना माने )आज किसी भी क्षेत्र मे देख लीजिये लड़कियां ही आगे नजर आती है। आज जब बेटी इन्जीनिर ,डाक्टर ,एम.बी.ए,,पुलिस,सेना मे जाती है , सी.ए,वकील, बनती है तो क्या माता-पिता को कम ख़ुशी होती है ।
लड़कियां भला किस क्षेत्र मे लड़कों से पीछे हैपढाई हो या खेल कूद हर जगह लड़कों की तरह लड़कियां भी आगे रही हैसानिया मिर्जा (टेनिस),साईना नेहवाल(बेडमिन्टन ),इवाना (शतरंज)जैसे उदाहरण हमारे सामने मौजूद है


अगर हम बेटों पर नाज कर सकते है तो बेटियों पर क्यों नही ?


Comments

satyendra... said…
ये तो झूठ की बहस बनकर रह गई है। बेटियां बेटे। मानसिकता की बात है बेटे या बेटियों को कम या ज्यादा प्यार करना। इसके अलावा और क्या है?
Gyandutt Pandey said…
सब तरह के लोग हैं। पर अच्छे वे हैं जो बेटे-बेटी के आधार पर नहीं; अपने बच्चे के लिये सम भाव से सोचते हैं।
दरअसल बढ़ते भौतिकतावाद ने देश के संस्कारों में जो विष बोये हैं उसका परिणाम है कि सामान्य स्त्रियों की दशा को और दयनीय बना दिया है.आपका कहना सही है अनेक स्त्रियाँ बहुत अच्छा कर रहीं है पर अगर आप इस देश की आबादी को देखें तो उनकी संख्या नगण्य है. सच तो यह है कि जब मैं समाज की वर्तमान हालत देखता हूँ तो अभी भी स्त्रियों का शोषण हो रहा है और इसका कारण यह है कि बातें खूब होतीं है पर कोई विवाह आदि के मौके पर सब अपने बेटों के लिए दहेज़ की मांग करते हैं. समस्या केवल यही नहीं है बल्कि लडकी वालों को जिस तरह सिर झुकाने के लिए मजबूर होबा पड़ता है उससे तो हर कोई बचना चाहता है पर जब खुद लड़के वाला हो वह यह भूल जाता है. यह द्वंद है और इस पर विचार करना जरूरी है.
दीपक भारतदीप
Rachna Singh said…
hi mamta
if we stop thjinking about daughters as curse or boons and start accepting them as child/baby/human none os would be in any delimma . besides that its important to teach our daughters that they are born equals so that when these daughters become mothers they treat their daughters as equals . also its needed to give same importance and teachings ot son that we give to daughters
mamta said…
हम किसी बहस को बढावा नही दे रहे है बस अपना नजरिया सामने रख रहे है।और आपने सही कहा है कि ये मानसिकता ही है और कुछ नही।
ममता जी .हमारी नैरो मेंटालिटी ने ही ऐसा किया है ..आदि काल से ही इस समाज ने महिला को "अ -बला" का नाम दिया है...इससे इतर अगर देखा जाये तो आज महिलाएं पुरुषों को तुलना में काफी ज्यादा आगे हैं.....फिर भी हमारी सोच उन्हें "अ-बला " कि जगह "बला " मान रही है....आज भी हमारा पुरुष प्रधान समाज उनको हमेसा ये एहसास दिलाता रहता है कि तुम अबला हो.....
anil said…
दीपक भारतदीप के ब्लॉग से आपका लेख पढ़ा , बहुत अच्छा लगा / धन्यवाद /आपकी रचनाये बहुत सुंदर है
Vinay Singh said…
बहुत ज्ञान वर्धक है आपकी यह रचना है, मैं स्वास्थ्य से संबंधित कार्य करता हूं यदि आप देखना चाहे तो यहां पर click Health knowledge in hindi करें और इसे अधिक से अधिक लोग के पास share करें ताकि यह रचना अधिक से अधिक लोग पढ़ सकें और लाभ प्राप्त कर सके।

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