आज रविवार है ना तो सोचा क्यों ना बचपन की कुछ याद ही ताजा कर ली जाए। जी हाँ आज हम आप सबको अपने सबके बचपन के उन दिनों मे ले जाने की कोशिश कर रहे है जब मनोरंजन के लिए यही सब कुछ होता था। अक्सर रविवार के दिन साँप,भालू,बन्दर वाले आते थे । जहाँ भालू और बन्दर वाले भालू और बन्दर का नाच दिखाते थे वहीं साँप वाले साँप और नेवले की लड़ाई दिखाते थे और पता नही कितने तरह के साँप दिखाते थे।
इसे देख कर लगा कि आज भी इतने सालों बाद कुछ भी नही बदला है। बदला तो बस इतना कि बन्दर वाला अब ५-१० रूपये की जगह सौ रूपये मांगता है। हमने १०० तो नही ५० रूपये दिए थे।और साथ मे केले और बिस्कुट दिए थे।
नोट-- और हाँ कुछ खा-पीकर देखियेगा क्यूंकि सुना है सुबह-सुबह बन्दर (हनुमान जी का नही )का नाम लेने से दिन भर कुछ खाने को नही मिलता है। :)
यूं तो ये विडियो हमने पिछले साल आगरा से फतेहपुर सीकरी जाते हुए हाईवे पर बनाया था।आप विडियो देखिये ।
नोट-- हम भी इस बात को ठीक नही समझते है। पर सिर्फ़ ये दिखाने के लिए ये विडियो लगाया है कि पचास साल बाद भी हम वहीं के वहीं है।
Sunday, February 24, 2008
बन्दर का नाच
Posted by mamta at 9:19 AM
Labels: agra, bear, fatehpur seekri, monkey, snake, आगरा, फतेहपुर सीकरी, बन्दर, भालू, यादों के झरोखों से, साँप
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7 comments:
मैं लगता हूँ, की वो आचरण बन्दर के तरह बहुत अच्छा नहीं है। तरस रहिये।
हम भी इस बात को ठीक नही समझते है। पर सिर्फ़ ये दिखाने के लिए ये विडियो लगाया है कि पचास साल बाद भी हम वहीं के वहीं है।
विडियो तो दिखाई नही दे रहा है जी.
बहुत बढिया , बहुत सुंदर !
बाल किशन जी उस समय कुछ गड़बड़ हो गई थी।
बढिया और रुचिकर
दीपक भारतदीप
आज यह पोस्ट देखी,पता नहीं कैसे उस वक्त रह गई थी. :) मजा आया.
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