Monday, February 25, 2008

बात उन दिनों की है जब हम सातवीं क्लास मे पढ़ते थे ।उन दिनों इलाहबाद मे तो यूं भी साइकिल सेस्कूल जाने
का बड़ा रिवाज था ।(वैसे तो आज भी बच्चे साइकिल से स्कूल से जाते है ) लड़का हो या लड़की ज्यादातर बच्चे साइकिल से ही स्कूल जाते थे। हमारे घर मे भी दीदी लोग साइकिल से स्कूल जाती थी पर चूँकि हम सबसे छोटे थे इसलिए हमने साइकिल चलाना जरा देर मे सीखा।

अब सीखने के लिए साइकिल तो हमे शाम को ही मिलती थे दीदी लोगों के स्कूल से आने के बाद।शुरू मे कुछ दिन तो भइया और हमारी दीदी ने हमे साइकिल चलाना सिखाया की कैसे पैडल पर पैर रखकर कैंची चलते है और किस तरह सीट पर बैठते है और साइकिल का हैंडल हमेशा सीधा रखना चाहिए और सबसे ख़ास हिदायत कि कभी भी दोनों ब्रेक एक् साथ मत लगाना । शुरू मे दो-तीन दिन जब हम साइकिल चलाते तो भइया या दीदी पीछे से कैरियर पकड़े रहते और हम पीछे देखते रहते की उन लोगों ने साइकिल पकड़ रखी है।और हमे चलाते हुए ये विश्वास रहता की अगर हमारी साइकिल गिरेगी तो भैया या दीदी हमे गिरने से बचा लेंगे।दीदी हमेशा कहती कि सामने देखा करो पीछे नही। खैर पाँच-छः दिन बाद हम जब साइकिल चला रहे थे तो हमे पता ही नही चला की दीदी ने साइकिल का कैरियर कब छोड़ दिया और हमने बड़े आराम से अपने मोहल्ले मे साइकिल चलाई। और उस दिन हमे यकीन हो गया की अब तो हमे साइकिल चलानी आ गई है। और अब हम बिना किसी की मदद के चला सकते है।

घर मे सभी ने ये हिदायत दी कि साइकिल चलाते हुए कभी भी भीड़-भाड़ या गाय-बकरी देख कर घबडाना नही चाहिए। और ये भी कहा की साइकिल चलाते हुए हमेशा सामने देखना चाहिए पैडल या पीछे की ओर नही।(क्यूंकि जब साइकिल सीखते है तो ध्यान पैडल पर ज्यादा रहता है. )करीब एक हफ्ते या दस दिन तक हमारी साइकिल क्लास चली। उसके बाद जब हमे जरा विश्वास हो गया की अब तो हम साइकिल चलने मे निपुण हो गए है तो एक दिन शाम को हम बिना किसी को बताये चुपचाप साइकिल लेकर निकल गए पर अभी साइकिल चलाना शुरू ही किया था की अचानक हम अपना संतुलन खो बैठे और साइकिल समेत नीचे गिर पड़े। पहले तो झट से उठे और चारों ओर देखा की कोई देख तो नही रहा है। तभी हमारी नजर घुटने और कोहनी पर गई और बस हमारा रोना शुरू क्यूंकि हमारे घुटने और कोहनी से खून निकल रहा था।

खैर साइकिल को लेकर आंसू बहाते हुए हम घर आए । घर मे सबने हमे रोते हुए देख कर कहा कि ममता अब तुम पूरी तरह से साइकिल चलाना सीख गई हो। क्यूंकि जब तक चोट नही लगती है तब तक साइकिल चलानी नही आती है।और वाकई उसके बाद हमने बाकायदा साइकिल चलाना शुरू किया और फ़िर हमारे लिए हीरो साइकिल खरीदी गई और हम भी बड़ी शान से बारहवीं क्लास तक साइकिल से ही स्कूल जाते रहे।

साइकिल क्या जीवन मे भी जब चोट लगती है तब हम बहुत कुछ सीखते है

कुछ ज्यादा ही दार्शनिक बात हो गई। :)




12 Comments:

  1. हर्षवर्धन said...
    भले ही बात ज्यादा दार्शनिक हो गई हो। सही लगती है। मेरे भी दोनों घुटने साइकिल सीखने में छिल गए थे।
    yunus said...
    भई वाह । बचपन की याद आ गयी । सायकिल चलाते हुए हमने अपने घुटने बहुत छिलवाए । कोहनियां तुड़वाईं । गर्मियों की धूप में सायकिल चला चलाकर काले ढुस भी हो गये । सायकिल सीखने वाले दिन जिंदगी के सबसे अच्‍छे दिन थे ।
    मीनाक्षी said...
    दार्शनिक ही सही लेकिन पते की बात ... बचपन में हमने भी साइकिल सीखने की कोशिश की...फिर टू व्हीलर... फिर चोट खाकर कान पकड़े कि कार चलाना तो कतई नहीं सीखेंगे... लेकिन चालीसवें में कार सीखनी पड़ी... टैक्सियों पर पैसा जाते ही दिल को चोट लगी और अब ड्राइवर बने सड़को पर हैं.
    बाल किशन said...
    मेरे साथ तो और भी बुरा घटा हुआ है.
    ख़ुद भी गिरा और साथ मे छठ पूजा करने के लिए जाती हुई एक वृद्ध महिला को भी सायकिल से टक्कर देकर गिरा दिया. और फ़िर समजसेवाकों द्वारा जो पिटाई हुई की आज तक सायकिल को हाथ नहीं लगाया.
    अरविंद चतुर्वेदी said...
    मीनाक्छी जी, माफ कीजिएगा मुझे वो वाला छ बनाना नहीं आता है । सही कहा आपने लड़कियों को साइकिल सीखने के लिए मददगार की जरूरत पड़ती है इसके पीछे भी एक कारण है कि कहीं गिर गिरा गयी तो आफत आ जाएगी । पराये घर जाना होता है । जिंदगी भर के लिए कलंक हो जाएगा । लड़को के लिए परिवार के लोग इतना चिंतित नहीं होते हैं । उनका मानना होता है कि एक आध बार गिरकर फिर चलाने लग जाएगा । खैर छोटी उम्र में जो साइकिल चलाना नही सीख पाते उम्र ज्यादा होने पर उनको बहुत दिक्कत होती है । और फिर जिंदगी में साइकिल चलाना सीखने की गुंजाइश बहुत कम बच पाती है।
    आपको तो याद ही होगा मुंशी प्रेमचंद की साइकिल की सवारी । कितनी हील हुज्जत के बाद भी बेचारे साइकिल चलाना नहीं सीख पाए ।
    mahashakti said...
    साईकिल की सिखने में यदि गिरना न हो तो साईकिल चलाने का असली मजा नही मिला।
    mamta said...
    अरविंद जी मीनाक्षी नही हमारा नाम ममता है।
    और हाँ हर सीखने वाले को कुछ भी सीखने के लिए मददगार की जरुरत पड़ती है।
    हमने ना केवल साइकिल चलाना सीखा बल्कि स्कूटर और कार भी चलाना सीखा ।
    कार और स्कूटर का किस्सा फ़िर कभी।
    Gyandutt Pandey said...
    हर सीखना कष्टमय होता है और हर हुनर खुशी देता है।
    यह जिन्दगी सदा सीखने की प्रक्रिया से युक्त रहे!
    Parul said...
    सच्ची ममता, पहली बार जब साइकिल से स्कूल जाने को मिला तो मारे खुशी के एक रात नींद ही नही आयी ,लगा दुनिया मे हमसे ज़्यादा स्मार्ट कल की सुबह कोई नही लगेगा । lol
    दीपक भारतदीप said...
    आपकी इस पोस्ट से मुझे ऐसा लगा कि जिस दिन साइकिल चलाता हूँ उस दिन मेरे ख्याल दार्शनिक टाईप का हो जाता हूँ. ब्लोगिंग के चक्कर में नियमित साइकिल नहीं चलाता. सोच रहा हूँ कि कल से साइकिल चलाकर ही आऊँगा उसके बाद लिखूंगा. आज समझ में आया कि लिखने के नये-नये आइडिये क्यों नहीं आ रहे.जब नियमित साइकिल चलाता हूँ तब पैरों के साथ दिमाग भी घूमता है.
    दीपक भारतदीप
    anitakumar said...
    कुछ लोग ऐसे भी अभागे होते हैं जो चोट खा के भी कुछ नहीं सीखते, हम तो चोट खाके भी साइकिल चलाना नहीं सीख पाए …।:)
    anitakumar said...
    This comment has been removed by the author.

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