Wednesday, October 20, 2010

आज बड़े दिनों बाद अपना इ-मेल चेक किया तो पूजा जी और पाबला जी ने हमारे ब्लॉग सवा सेर शौपर पर जो कमेन्ट और लिंक छोड़ा था उसे पढकर तो हमारा दिल बाग़-बाग़ हो गया।और इसके लिए आप दोनों का शुक्रिया । अपने ब्लॉग का जिक्र अखबार मे पढ़कर हमारा खुश होना जायज है

रवीश जी आपका शुक्रिया जो आपने दैनिक हिन्दुस्तान के ब्लॉग वार्ता मे बड़े ही खूबसूरत अंदाज मे हमारे ब्लॉग के बारे मे लिखा । अपनी मसरूफियत की वजह से हमारा इस ब्लॉग पर लिखना कुछ कम हो गया था पर आज इस ब्लॉग वार्ता को पढ़कर दोबारा जोश आ गया है। :)

तो एक बार फिर से आप लोगों का धन्यवाद।

Wednesday, September 8, 2010

आज साक्षरता दिवस है । क्या साक्षरता का मतलब सिर्फ पढना लिखना ही आना है ।नहीं हमे ऐसा नहीं लगता है क्यूंकि हम सब पढ़े-लिखे जो अनपढ़ों की तरह व्यवहार करते है तो क्या हम लोगों को भी साक्षर होने की जरुरत नहीं है।

पूरे देश मे जोर-शोर से साक्षरता दिवस मनाया जा रहा है। पर क्या आप लोगों को नहीं लगता है कि ब्लॉग जगत मे भी हम सभी को साक्षर होने की आश्यकता है । अब आप लोग कहेंगे कि कमाल है आप कैसी बात कर रही है अगर हम ब्लॉगर पढ़े-लिखे नहीं होते यानी कि साक्षर नहीं होते तो ब्लॉगिंग कैसे करते।

अरे भाई साक्षर होने का मतलब ये तो नहीं होता है कि आप ने किसी को भी खासकर महिलाओं को कुछ भी कहने का अधिकार पा लिया है। ब्लॉगिंग का पिछले २ सालों का इतिहास देखा जाए तो जिस तरह से महिलाओं के लिए अपशब्द इस्तेमाल हुए है वो हमारे साक्षर होने का पुख्ता सबूत देते है ।

हिंदी ब्लॉगिंग के शुरूआती दिनों मे पुराने और जानकार लोग यही कोशिश कर रहे थे कि ज्यादा से ज्यादा लोग हिंदी मे ब्लॉगिंग शुरू करे और जिस तरह अंग्रेजी ब्लॉगिंग से लोग इतने बड़े पैमाने पर जुड़े है उसी तरह लोग हिंदी ब्लॉगिंग से भी जुड़े । और आज हिंदी ब्लॉगर की संख्या भी कुछ कम नहीं है ये ख़ुशी की बात है।

तो क्यूँ ना इस साक्षरता दिवस पर हम सभी ब्लॉगर अपने आप को साक्षर बनाने की कोशिश करें।



Friday, August 20, 2010

अब यूँ तो दिल्ली मे मिनाक्षी और रचना से मिले हुए तकरीबन एक महीना हो गया है पर इस पर पोस्ट देर से लिख रहे है क्यूंकि दिल्ली मे रहते हुए कुछ ज्यादा व्यस्त हो गए थे और अब चूँकि हम ईटानगर आ गए है तो सोचा कि इस मुलाकात पर पोस्ट लिखी जाए ।

पिछले ३ साल से हम जब भी दिल्ली जाते है रचना और रंजना से से जरुर बात होती थी और मिलने का भी कई बार कार्यक्रम बना पर हम लोग कभी मिल नहीं पाए । हर बार कि तरह इस बार भी जब हम दिल्ली मे थे तो रचना और रंजना से बात की तो पता चला की रंजना तो दिल्ली से बाहर गयी हुई थी पर रचना से बात हुई तो पता चला की मिनाक्षी भी उन दिनों दिल्ली आई हुई थी । तो मिनाक्षी से भी बात हुई और मिलने का कार्यक्रम बना । और मिलने की जगह हमारा घर रक्खा गया और दोपहर बाद यानी ३ -४ बजे का रक्खा गया। पहले इसे ब्लॉगर मीट की तरह रखने की सोची गयी पर जिनके नंबर थे वो या तो busy थे या दिल्ली से बाहर थे और बाकी लोगों से संपर्क नहीं हुआ। हाँ मनविंदर जी ने भी आने को कहा था पर उस दिन उन्हें कुछ काम आ गया था इसलिए वो नहीं आई थी।

खैर हम तीनो ही पहली बार मिल रहे थे ये अलग बात है कि ब्लॉग और फ़ोन से हम लोग एक-दूसरे को पहचानते थे। खैर मिनाक्षी और रचना दोनों ही पहली बार हमारे घर आ रही थी तो थोड़ी बहुत तैयारी हमने भी करी थी । अरे मतलब थोडा-बहुत नाश्ता बनाया था।
लंच के बाद बस उन दोनों का इंतज़ार शुरू हुआ । और ऐसा लग रहा था मानो समय बहुत धीरे-धीरे चल रहा हो। मिनाक्षी ने हमसे हमारे घर का रास्ता पूछा और ये कहा कि अगर रास्ता ढूँढने मे कुछ कुछ प्रोब्लम आएगी तो वो हमें फ़ोन करेंगी।और जब वो हमारी कालोनी मे पहुँच रही थी तभी उनका फ़ोन आया कि आपका घर किस तरफ पड़ेगा तो हमने कहा कि हम घर के बाहर आ जाते है और हम जैसे ही घर के बाहर गए कि सामने वो कार मे हरे रंग के सूट मे मुस्कराती हुई दिखाई पड़ी। और जब वो कार से बाहर आई तो ऐसा जान पड़ा मानो हम लोग ना जाने कितनी बार पहले भी मिल चुके हो बिलकुल एक पुराने और अजीज दोस्त की तरह।

घर मे आते ही उनका स्वागत हमारे कैरी (doggi) ने किया और फिर हम लोग बातों मे मशगूल हो गए की तभी घंटी बजी तो मिनाक्षी ने कहा की रचना आ गयी। और दरवाजा खोलने पर रचना गुलाबी रंग के सूट मे खूबसूरत सी मुस्कुराहट लिए खड़ी थी। रचना के आने के बाद तो हम तीनो ऐसा बातों मे मस्त हुए कि समय का पता ही नहीं चला । दुनिया जहान की बाते हुई और हाँ कुछ बाते ब्लॉग जगत की भी हुई।

उसके बाद हम लोगों ने खाया -पिया और और डाइनिंग टेबल पर भी खूब गप-शप हुई। और फिर हम लोगों ने कुछ फोटो भी खिंचाई। और देखते-देखते कब शाम बीत गयी इसका अहसास भी नहीं हुआ और फिर एक-दूसरे से हम लोग गले मिलकर विदा हुए। इस पोस्ट को लिखते हुए उस पूरी शाम का सुन्दर अहसास आज भी महसूस हो रहा है।
thanks rachna and meenakshi for a wonderful evening.

Thursday, August 19, 2010

अब चाहे जितने भी scam हो कॉमन वेल्थ गेम्स को लेकर पर जिस भी राज्य मे क्वींस बैटन आती है वो पूरा राज्य जोश मे भर जाता हैअब जैसे जुलाई मे जब क्वींस बैटन यहां आई तो ऐसा ही कुछ अरुणाचल मे भी हुआ था

जैसा
कि हम सभी को पता है कि इस साल अक्तूबर से दिल्ली मे कॉम वेल्थ गेम्स होने वाले है
और
इसके लिए लन्दन से क्वीन एलिजाबेथ 2 ने खिलाड़ियों के लिए न्देश इस बैट मे भेजा है और इस सन्देश को अक्तूबर को दिल्ली मे खेलों के उदघाटन समारोह मे पढ़ा जाएगा क्वीन के सन्देश के साथ इस बैटन ने २९ अक्टूबर २००९ मे बकिंघम पैलस से अपना सफ़र शुरू किया ये बैटन ७० देशों और पूरे भारत वर्ष मे घूमने के बाद अक्टूबर को दिल्ली पहुंचेगी

इस बैटन के साथ तकरीबन १०-१५ लोगों की टीम चलती है इस टीम को जनरल कदीयान लीड कर रहे थे इस बैटन की खासियत ये है कि जब इसमें लाईट जलती है तो भारत के झंडे का तिरंगा रंग इस बैटन पर नजर आता हैजो बहुत ही खूबसूरत लगता है दिन मे और रात मे बैटन बिलकुल अलग लगती है

और २२ जुलाई को कॉमन वेल्थ गेम्स की क्वींस बैटन अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर मे आई थी अरुणाचल प्रदेश दसवां राज्य है जहाँ ये बैटन अपना सफ़र करते हुए पहुंची थी अरुणाचल प्रदेश के दो डिस्ट्रिक्ट तवांग और ईटानगर मे इस बैटन को जाना था ,पहले इसे तवांग और फिर ईटानगर आना था और इसके लिए गौहाटी से इस बैटन को लेकर हेलीकाप्टर से तवांग के लिए लोग रवाना हुए पर भूटान के आगे मौसम खराब होने के कारण हेलिकॉप्टर वापिस गौहाटी लौट आया फि गौहाटी से हेलिकॉप्टर से ये बैटन ईटानगर गयीनाहारलागन हेलीपैड पर हेलीकाप्टर के पायलेट और पादी रिको इस बैटन के साथ
अब जब हम ईटानगर वापिस लौट आये है तो हम भी इस क्वींस बैटन रिले को देखने पहुँच गए सबसे पहले नाहर लागन हेलीपैड पर सवा दो बजे इस बैटन को पादी रिको जो की पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी है उन्होंने इसे रिसीव किया और बैटन का रिले शुरू हुआ जिसमे convoy और relay दोनों था बैटन के साथ शेरा जो की कॉमन वेल्थ गेम्स का मेस्कोट है वो भी आया था जैसा की आप इन कुछ फोटो मे देख सकते हैराजीव गाँधी स्टेडीयम मे बच्चों के बीच मे शेरा और नीचे वाली फोटो बैंक्वेट हाल की है जहाँ शेरा जब stage पर गए थे तो वापिस उतरने का नाम ही नहीं ले रहे थेपूरे stage पर घूम रहे थे :)और भाई जब हम relay देखने गए तो फिर शेरा से हाथ कैसे ना मिलाते :) चूँकि इस बैटन मे relay और convoy दोनों था इसलिए कुछ दूर खिलाडी दौड़ते थे तो कुछ दूर convoy इस बैटन को लेकर चलता थाये relay करीब घंटे की थीजिसमे नाहर लागन से होकर राजीव गाँधी स्टेडीयम,सांगो होटल,जेनरल हॉस्पिटल, लागुन ब्रिज,डी.सी. ऑफिस,राज भवन ,इटा फोर्ट,टी.जी.गुम्पा,लेजी काम्प्लेक्स,पंजाबी ढाबा,आई.जी.पार्क,बी.बी.प्लाज़ा,आकाशदीप मार्केट,निर्वाच वन,से होते हुए बैनक्वेट हॉल मे आनी थीयानी की पूरे ईटानगर मे इस बैटन को घुमाया गया
हेलीपैड से सबसे पहले एक काफिले के साथ इस बैटन को राजीव गाँधी स्टेडीयम ले जाया गया जहाँ इस बैटन को रक्खा या और फिर मुख्य अतिथि के छोटे से भाषण के बाद इस बैटन को gumpe rime जो की फूटबाल खिलाडी है ये बैटन उन्हें सौंपी गयी और gumpe rime ने पूरे स्टेडीयम का चक्कर लगाया
और वहां से ये बैटन अनेकों खिलाड़ियों और officials के हाथोंमे होती हुई शाम साढ़े बजे आई .जी. पार्क पहुंची और वहां से बैनक्वेट हॉल तक अलग-अलग खेलों जैसे फूटबाल,बैडमिनटन,और वेट लिफ्टिंग के खिलाड़ियों ने इस बैटन को लेकर रिले किया यानी इसे लेकर दौड़ेजब ये बैटन बैनक्वेट हॉल के गेट पर पहुंची तो वहां से अरुणाचल प्रदेश के स्पोर्ट्स सेक्रेटरी इस बैटन को लेकर दौड़े और पोर्टिको मे ये बैटन अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिव को सौंपी गयी और वहां से मुख्य सचिव इस बैटन को लेकर बैनक्वेट हाल के अन्दर गए और इस बैटन को पेडस्टल या इसके स्टैंड पर रख दिया गया और फिर फोटो खींचने और खिंचवाने का सिलसिला शुरू हुआ और उसके बाद अरुणाचल प्रदेश की विभिन्न tribes ने शानदार सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया
अगले दिन २३ जुलाई को ये बैटन अरुणाचल प्रदेश से निकल कर अपने आगे के सफ़र पर चल पड़ी यानी कि दूसरे राज्य

Monday, August 16, 2010

कल १५ अगस्त को सारे भारत वर्ष की तरह ईटानगर मे भी स्वतंत्रता दिवस काफी जोश से मनाया गया। हालाँकि यहां एक दिन पहले बारिश हुई थी जिसकी वजह से १५ अगस्त को मौसम काफी सुहावना था हाँ थोड़ी-थोड़ी बूंदा-बादी हो रही थी पर उससे लोगों के जोश और उत्साह मे कोई कमी नहीं थी।क्यूंकि लो छाता लगाकर परेड देख रहे थे सुबह -सुबह जब हम लोग उठे तो देखा सर्किट हाउस मे (हम अभी यही रह रहे है) बड़ी चहल-पहल दिखी और छोटे-छोटे बच्चे तैयार होकर इकठ्ठा हो रहे थे पूछने पर पता चला कि सभी बच्चे झंडा फहराने के लिए इकठ्ठा हो रहे है। तो सर्किट हाउस वालों से पूछने पर पता चला कि सात बजे झंडा फहराया जायेगा। बस फिर हम अपना कैमरा लेकर तैयार हो गए फोटो खींचने के लिए। और ठीक बजे सर्किट हाउस के जे..ने झंडा फहराया और सभी ने राष्ट्रीय गान भी गाया और उसके बाद जे..ने एक छोटा सा भाषण भी दिया और फिर बच्चों को लड्डू और रसगुल्ले बांटे गए ।इसके बाद साढ़े आठ बजे हम लोग तैयार होकर इंदिरा गाँधी पार्क गए जहाँ स्वतंत्रता दिवस समारोह के लिए लोग जमा हो रहे थे ठीक बजे यहां के मुख्य मंत्री दोरजी खंडू समारोह स्थल पर आये और उन्होंने तिरंगा झंडा फहराया।फिर उन्होंने परेड का निरीक्षण कीया।परेड के निरीक्षण के समय डी.आई.जी.देओल भी उनके साथ थी और उसके बाद उन्होंने एक लम्बा सा भाषण दिया जिसमे उनकी सरकार क्या-क्या कर रही है उसके बारे मे बताया ।उसके बाद यहां के मुख्य सचिव तबम बाम ने उन लोगों के नाम पढ़े जिन्हें इस साल गोल्ड और सिल्वर मेडल दिए जाने थे।इसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया
उसके बाद विभिन्न रेजिमेंट्स ने और स्कूल के बच्चों ने परेड की
जिसमे सबसे पहले यहां की tribes ने कुछ नृत्य प्रस्तुत किये और उसके बाद स्कूल के बच्चों ने कुछ बहुत ही खूबसूरत नृत्य प्रस्तुत किये जिसमे माँ तुझे सलाम ,मिले सुर मेरा तुम्हारा , मेरे वतन के लोगों और जोधा अकबर के गीत थेइस फोटो मे नीले कपडे वाले सैनिकों के बीच मे जो बैठे है वो अकबर है। :)
तकरीबन डेढ़ घंटे तक ये समारोह चला और उसके बाद सबसे अच्छी परेड और सबसे अच्छे नृत्य को पुरस्कार दिया गया और इस फोटो मे मिले सुर मेरा तुम्हारा प्रस्तुत करने वाले बच्चे प्रथम पुरस्कार की अपनी ट्राफी के साथ जीत की ख़ुशी मनाते हुए दिखाई दे रहे है ,वैसे इनका विडियो हम you tube पर अपलोड करने वाले है । और बाकी सभी को पार्टीसीपेशन प्राइज दिया गया।


और इस तरह ६३वाँ स्वतंत्रता दिवस समारोह समपन्न हुआ

Thursday, May 20, 2010

हमारे देश के सांसद और विधायक ऐसे है जो देश और जनता के लिए दावा तो कुछ भी करने का करते है पर उनकी जेब से कुछ जाए ये उन्हें मंजूर नहीं है। अरे आप को यकीन नहीं है पर ऐसा ही है। कल मंत्री मंडल की बैठक मे ये निर्णय लिया गया कि अब से सांसदों और विधायकों को टोल टैक्स नहीं देना पड़ेगा ।

अरे पर आखिर ऐसा फैसला लिया क्यूँ गया ?

क्या आम जनता के पास इफरात धन-दौलत है और ये सांसद और विधायक टोल टैक्स देना भी afford नहीं कर
सकते है। जबकि किसी भी राज्य या शहर मे देखे तो गाड़ियों पर अपनी पार्टी के झंडे लगाए ये फर्राटे से घूमते नजर आते है। जहाँ से भी जनता को लूटने का मौका मिल भर जाए ,बस

जहाँ नेताओं को अपने लिए कुछ भी फैसला लेना होता तो फटाफट सर्व सम्मति से निर्णय ले लिए जाता है।

पर सवाल ये है कि अगर ये सांसद और विधायक टोल टैक्स नहीं देंगे तो फिर आम जनता क्यूँ दे। क्या सारे तरह के टैक्स देने का जिम्मा सिर्फ आम जनता का ही है।

ऐसा भला ये देश के लिए क्या कर रहे है जो इन्हें टोल टैक्स ना देने की छूट दे दी गयी है।

Wednesday, May 19, 2010

आम तौर पर हम गौहाटी सिर्फ फ्लाईट से आने-जाने के लिए ही जाते है पर वहां रुकते नहीं थे। पर मई के शुरू मे हम ३-४ दिन के लिए गौहाटी गए थे तो जाहिर है कि जब ४ दिन रुकेंगे तो गौहाटी घूमेंगे भी। :) जब गेस्ट हाउस वाले से पूछा कि यहां क्या-क्या घूमने की जगह है तो एक सपाट सा उत्तर मिला कि कामख्या के अलावा तो ज्यादा कुछ नहीं है। मार्केट के बारे मे पूछने पर कहा कि बाजार बहुत दूर है । वो तो बाद मे पता चला कि बाजार सिर्फ १०-१२ कि.मी . दूर था जिसे वो लोग बहुत दूर कह रहे थे।
खैर हम लोग के साथ जो सज्जन गए थे उनसे हम लोगों ने एक टूरिस्ट गाइड मंगवाई और गाईड देख कर पता चला कि जैसा लोग कहते है कि यहां कुछ घूमने के लिए नहीं है वो गलत है। सो हम लोगों ने गौहाटी के मंदिरों के साथ-साथ गौहाटी का स्टेट म्यूजीयम ,आसाम ज़ू ,गौहाटी के मार्केट देखने का कार्यक्रम बनाया ।और गाईड मे एक तरफ पड़ने वाली जगहों को देखने का पूरे दिन का प्रोग्राम बना। तो सबसे पहले नबोग्रोह मंदिर देखने का निश्चित हुआ और अगले दिन सुबह-सुबह हम लोग नबोग्रोह मंदिर के लिए चल पड़े। (नबोग्रोह लिखने का ख़ास मकसद है क्यूंकि जब गेस्ट हाउस वाले से हमने नवग्रह मंदिर कहाँ है पूछा था तो उसने सुधारते हुए कहा था नबोग्रोह मंदिररास्ते मे भी जहाँ कहीं भी मंदिर का पता पूछना होता था तो नबोग्रोह कहने पर ही लोग समझते थे नवग्रह कहने पर नहीं )
नबोग्रोह मंदिर गौहाटी के पूर्व मे नवग्रह पहाड़ी पर स्थित है।और ये तकरीबन १०-१२ कि.मी.की दूरी पर है।१७५१ मे इस मंदिर की स्थापना हुई थी । यहां जाने के लिए गौहाटी हाई कोर्ट के पास से सिल्पुखारी मार्केट से होते हुए जाते है।सिल्पुखारी मार्केट मे थोडा आगे जाकर पहले बायीं ओर मुड़ते है और फिर थोड़ी दूर चलने पर दाहिनी ओर एक गेट सा बना है वहां से जैसे ही मंदिर कि ओर जाने के लिए मुड़ते है तो वहां से ढ़ाई शुरू हो जाती है।ये मंदिर भी काफी ऊंचाई पर है , वैसे गाडी यहां मंदिर तक जाती है
जैसा कि इसके नाम से पता चल रहा है कि इस नबोग्रोह मंदिर मे ९ ग्रह बने है। और ये ९ गृह है -- सूर्य,चन्द्रमा,मंगल,बुद्ध,गुरु,शुक्र,शनि,राहू और केतु है। इन ९ ग्रहों के बीचों बीच शिवलिंग बना है और हर ग्रह को दर्शाने के लिए ग्रह के रंग मुताबिक कपडा शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ है। पुराने समय मे इस मंदिर को ज्योतिष और अंतरिक्ष के अध्धयन के लिए महत्त्वपूर्ण माना गया था। इस नबोग्रोह मंदिर के कारण पहले गौहाटी को प्राग्ज्योतिश्पुरा या city of eastren astrology भी कहा जाता था ।

मंदिर के पास जैसे ही पहुंचे तो चारों ओर बहुत सारे बन्दर दिखाई दिए जो इधर-उधर कूद-फांद कर रहे थे।गनीमत थी कि वो लोगों को ज्यादा तंग नहीं कर रहे थे । खैर सीढियां चढ़कर जब मंदिर मे पहुंचे तो मुख्य मंदिर के द्वार पर दाहिनी ओर विष्णु-लक्ष्मी,राधा-कृष्ण और गणेश जी के साथ-साथ अन्य देवी देवताओं की मूर्ति भी थी। जहाँ हमने भगवान को हाथ जोड़ा और फिर मुख्य मंदिर की तरफ बढे तो अन्दर हुत अँधेरा था पर हर तरफ दिए जल रहे थे।अन्दर अँधेरा बहुत होने के कारण बहुत संभल-संभल कर चलना पड़ता है। फिर जब बहुत ध्यान से देखा तो एक ग्रह बीच मे और बाकी ८ ग्रह उसके चारों ओर बने हुए दिखे थे। हर ग्रह के बीच मे इतनी दूरी थी कि लोग आराम से बैठकर पूजा कर सकते है ।मंदिर के बाहर बहुत सारे पंडित रहते है पूजा करवाने के लिए। मंदिर मे हर ग्रह पर पूजा करते है और दिए जलाते है। यहां पर प्रसाद चढाने का सिस्टम नहीं है । पूजा करने के बाद बाहर आने
पर पंडित जी चना-हरी साबुत मूंग,नारियल के टुकड़े और फल वगैरा प्रसाद के रूप मे देते है।

बाहर निकल कर मंदिर की परिक्रमा करने पर देखा कि मंदिर की बाहरी दीवारों पर विष्णु के दस अवतार बने हुए है। और मंदिर मे बकरी और बन्दर एक साथ ही दाने खाते हुए भी नजर आये थे । :)

चूँकि मंदिर बहुत उंचाई पर है इसलिए यहां से भी गौहाटी का बहुत अच्छा नजारा दिखाई देता है।यहां से शहर और ब्रहमपुत्र नदी तो दिखाई देती ही है साथ ही गौहाटी स्टेडींयम जिसे नेहरु स्टेडीयम भी कहते है वो भी दिखाई देता है।

और इस नज़ारे को ना केवल भक्त गन बल्कि यहां के पंडित भी इस खूबसूरत नज़ारे का आनंद लेते रहते है। :)
अगली पोस्ट में गौहाटी की एक और जगह:)




Saturday, May 15, 2010

कितने अफ़सोस की बात है कि हर कुछ दिन पर एक हंगामा होना ब्लॉग जगत का एक नियम सा बन गया है हर बार हंगामा पिछले हंगामे से ज्यादा बड़ा होता हैकभी महिला ब्लॉगर तो कभी उनके द्वारा लिखे गए लेखों को लेकर हंगामा हो जाता है और कल तो हद ही हो गयी कल हमने कई दिन बाद जब ब्लॉग वाणी खोला तो हम कुछ चकरा से गए क्यूंकि कई पोस्टें समीर जी,ज्ञान जी और अनूप जी के नाम के साथ लिखी दिखी और उन्हें पढ़कर अफ़सोस तो हुआ साथ ही बहुत दुःख भी हुआकि आखिर हम लोग किस तरह कि ब्लॉगिंग कर रहे है जिसमे एक-दूसरे पर कीचड उछालना क्या सही है

जब हमने २००७ मे ब्लॉगिंग शुरू की थी तब आज की तुलना मे ब्लोगर जरुर बहुत कम थे (शायद ५००-६०० ) पर इस तरह का रवैया कभी एक-दूसरे के लिए नहीं देखा थाहाँ छोटी-मोटी नोक-झोक होती रहती थी जो ब्लॉगिंग और ब्लॉगर दोनों के लिए जरुरी और अच्छी होती थीपर अब इस नोक-झोक का स्वरुप बदलता ही जा रहा हैएक दम सीधे एक-दूसरे के लेखन पर, एक-दूसरे के व्यक्तित्व पर आक्षेप करना क्या हम ब्लॉगर को शोभा देता है

हम ये तो नहीं जानते कि इस सबके पीछे असली वजह क्या है और जानना भी नहीं चाहेंगे पर इतना जरुर कहेंगे कि समीर जी ,अनूप जी और ज्ञान जी तीनों की ही अपनी लेखन शैली है और अपना अलग अंदाज है लिखने का और जिसे हम सभी ब्लॉगर पसंद करते है और बड़े चाव से पढ़ते भी हैऔर इन लोगों की एक-दूसरे से तुलना करना ठीक नहीं है

इस तरह के विवाद से ब्लॉगिंग और ब्लॉगर दोनों का ही नुक्सान होता है

हम लोगों का इतने बड़े होकर (उम्र के लिहाज से )इस तरह आपस मे झगड़ना ,मन मुटाव करना क्या सही है ?

आम तौर पर हम कभी किसी विवाद पर नहीं लिखते है पर कल मन बहुत आहत हुआ इसलिए ये पोस्ट लिख दी:(

Wednesday, May 5, 2010

फरवरी मे हम कुछ दिनों के लिए इलाहाबाद गए थे और वहां से हमने लखनऊ अपनी दीदी के यहां जाने का कार्यक्रम बनाया था। अब इलाहाबाद से लखनऊ जाने के लिए गंगा गोमती ट्रेन ठीक होती है।हालाँकि इस ट्रेन को पकड़ने मे सुबह पूरी बर्बाद हो जाती है। क्यूंकि ६ बजे की ट्रेन के लिए ५ बजे ही उठाना जो पड़ता है। :) और इसमें एक और प्रोब्लम है कि ये ट्रेन प्रयाग स्टेशन पर बस २ मिनट रूकती है जबकि ज्यादा जनता प्रयाग से ही इस ट्रेन मे चढ़ती है
तो हम लोगों ने ए.सी.चेयर कार का टिकट बुक किया। और ट्रेन के समय स्टेशन पर पहुँच गए और इंतज़ार करने लगे।उस दिन अपनी किस्मत ही खराब थी अचानक ही ट्रेन आने से चंद मिनट पहले खूब आंधी और बारिश शुरू हो गयी और जब ट्रेन आई तो पता चला कि ए.सी. वाला कोच एकदम पीछे है। जबकि कुली ने कहा था कि ए.सी.कोच जहाँ हम लोग खड़े थे , वहीँ आता है।
खैर जब तक हम लोग कोच तक पहुंचे तो ट्रेन ने धीरे-धीरे चलना शुरू कर दिया था । एक तो बारिश ऊपर से चलती हुई ट्रेन और कुली उसी चलती ट्रेन मे सामान चढाने लगा और जो हम लोगों को बैठाने गया था वो बोला दीदी आप लोग चढ़ जाइए । तो हम लोगों ने कहा कि सामान मत चढाओ ट्रेन जाने दो। हम लोग इस तरह चलती ट्रेन मे नहीं चढ़ेंगे। पर उस ट्रेन मे यात्रा करना लिखा था सो ट्रेन १ मिनट बाद ही रुक गयी और फिर हम लोग ट्रेन मे सवार हो गए।
और जब थोड़ी देर बाद हम अपनी सीट पर settle हुए तो हमारा ध्यान अपनी कुर्सी के सामने बनी मेज की तरफ गया और उसकी हालत देख कर अफ़सोस भी हुआ कि किस तरह से उस फोल्डिंग मेज को एक लोहे की क्लिप से बंद किया हुआ था। यही नहीं बाथ रूम मे वाश बेसिन मे पानी तो था नहीं उस पर नल भी ठीक नहीं था।(साबुन तो कभी होता नहीं है )

जहाँ रोज ही रेलवे मिनिस्ट्री एक नई ट्रेन चलती है वहां ट्रेन की ऐसी हालत देख कर गुस्सा और दुःख हुआ । जब हम बाथरूम की ये वाली फोटो खींच रहे थे तो वहां खड़े कुछ लोग हमें आश्चर्य से देख रहे थे कि भला इसकी फोटो खींचने का क्या फायदा :)

Friday, April 30, 2010


अब आजकल तो सभी जगह गर्मी की बहार सी आई हुई है और यहां भी जब कभी सूरज देवता नजर आते है तो अपने पूरे तेज के साथ नजर आते है यानी कड़क धूप । वैसे यहां पर बारिश मे तो लोग छाता लेकर चलते ही है पर अगर धूप निकली हो तब तो जरुर ही छाता लेकर चलते है। क्यूंकि धूप से बचना भी बहुत जरुरी होता है क्यूंकि यहां बिलकुल झुलसा देने वाली धूप होती है। और वो शायद इसलिए क्यूंकि यहां कोई प्रदुषण नहीं है । धूप के समय हर तरफ रंग-बिरंगी छतरी नजर आती है। :)
यहां पर बागीचे और पार्कों मे काम करने वाली महिलायें भी इस बात का पूरा ध्यान रखती है । यूँ तो ये लोग पूरे दिन काम नहीं करती है बस सुबह के २ घंटे काम करती है और उसके बाद चली जाती है। (अभी तक तो हमने इतनी देर ही इन्हें काम करते देखा है ) फिर भी ये ख्याल रखती है और अपना धूप से बचाव करती है और इसके लिए वो कैप,छाता,और सिर पर कपडा वगैरा बाँध करके ही काम करती है।ये बहुत अच्छी बात ये है ।

वैसे यहां जो औरतें मजदूरी करती है वो भी हमेशा अपना मुंह और सिर कपडे से बांधे रहती है धूप और धूल-मिटटी से बचने के लिए

Wednesday, April 28, 2010

अब बचपन के दिन तो हरेक के जीवन के सबसे सुखद और सुन्दर होते है ,इसमें तो कोई दो राय नहीं है। और बीते हुए दिन जब याद आते है तो कभी-कभी लगता है कि काश वो दिन फिर से दोबारा आ जाए। क्यूँ हम गलत तो नहीं कह रहे है ना। :)

आज अचानक हमे ये किस्सा याद आ गया । बात तो ७० के दशक की है । उस जमाने मे गर्मी की छुट्टियाँ बिताने के लिए कभी हम ननिहाल (फैजाबाद ) कभी ददिहाल (बनारस) या फिर अपनी छोटी मौसी के यहां (वो जहाँ भी रहती थी क्यूंकि मौसाजी का ट्रांसफर होता रहता था ) जाते थे , कभी ट्रेन से तो कभी कार से । और उस समय अक्सर ऐसा होता था कि अगर मौसी हम लोगों के यहां इलाहाबाद आती थी तो उनके वापिस लौटने पर हम लोग भी कुछ दिन के लिए उनके यहां चले जाते थे। या अगर हम लोग उनके यहां जाते थे तो हम लोगों के वापिस लौटने पर वो लोग हम लोगों के साथ इलाहाबाद आते थे । वैसे ये बड़ा ही रुटीन फीचर था। :)

ऐसी ही एक गर्मी की छुट्टी मे हम चारों बहने मौसी के यहां सीतापुर गए थे और जब कुछ दिन रहने के बाद वहां से इलाहाबाद वापिस लौटने लगे तो मौसी भी अपने पाँचों बच्चों के साथ हम लोगों के साथ चली। उस समय मौसी बहुत ज्यादा बड़ी नहीं थी । पर हाँ ५ बच्चे थे । अब उस ज़माने मे तो ४-५ बच्चे से कम होते भी तो नहीं थे। :)

सीतापुर से लखनऊ हम लोग मौसा जी की जीप से आये और फिर वहां से ट्रेन से इलाहाबाद के लिए चले।और सेकेंड क्लास के डिब्बे मे मौसी बच्चों समेत चढ़ गयी बच्चे और सामान जिसमे पानी की सुराही और खाने की टोकरी भी थी ,देख कर लोगों ने जगह देने मे जरा भी संकोच नहीं किया। तो हम बच्चों को शरारत सूझी और सबने तय किया कि सभी लोग मौसी को मम्मी कहेंगेबस फिर क्या था हम सबने मौसी को मम्मी कहना शुरू कर दिया । और मौसी भी मम्मी बन हम लोगों की बातें सुनती रही और फरमाइशें पूरी करती रही।कभी कोई पीने के लिए पानी मांगता तो कभी कोई पूरी खाने को मांगता । पर ट्रेन मे बैठे लोगों को मौसी की उम्र और ९ बच्चे देख कर कुछ अजीब लग रहा था (वैसे ९ बच्चे होना भी कोई अजीब बात नहीं थी तब :)और हम बच्चों की उम्र १६ से साल तक की थी:)

तो एक महिला ने जिससे ये बर्दाश्त नहीं हुआ तो उसने पहले मौसी से गाँव घर के बारे मे पूछा और फिर हम बच्चों की और इशारा करके उसने मौसी से पूछा बहनजी क्या ये सारे आपके बच्चे है ।

तो मौसी ने भी मुस्कारते हुए हाँ कहा।

तो वो महिला मौसी और हम बच्चों की उम्र का अंदाजा लगाने लगी और बोली बहनजी इतनी छोटी उम्र और इतने बड़े-बड़े बच्चे।

उस औरत के इतना कहते ही हम सभी हंसने लगे। और वो औरत हम लोगों को बस देखती रही।


Saturday, April 24, 2010

जी हाँ राजनीति के साथ-साथ राजीव प्रताप रूडी अब सह-पायलट भी बन गए है। आजकल वो सह-पायलट की हैसियत से इंडिगो एयर लाईन्स के हवाई जहाज उड़ा रहे है।है ना चौंकाने वाली बात। कल इंडियन एक्सप्रेस अखबार मे जब हमने ये खबर पढ़ी थी।तो हम भी कुछ चौंक गए थेखैर आप भी खबर पढ़िए और उनकी ये फोटो देखिये अब ई-पेपर मे तो फोटो नजर नहीं आ रही है इसलिए हम कैमरे से खींच कर यहां लगा दे रहे है। वैसे एक बात है राजीव रूडी पायलट की ड्रेस मे काफी स्मार्ट लग रहे है । क्यूँ ठीक कह रहे है ना। :)

Friday, April 23, 2010

कल भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली मे बढ़ती महंगाई के विरोध मे सरकार के खिलाफ रैली थी जिसमे एक दिन पहले से ही ५ लाख लोगों के जमा होने की आशंका जताई जा रही थी पर शायद ३ लाख लोग इस रैली मे शामिल हुए थे।ऐसा न्यूज़ मे सुनने को मिला

दिल्ली जहाँ आजकल गर्मी का काफी प्रकोप है ऐसे मे दिल्ली मे रैली का होना और फिर उसमे बी.जे.पी.के बड़े-बड़े नेताओं का होना और कार्यकर्ताओं या यूँ कहें की दूसरे शहरों से भर-भर कर बसों मे जो लोग लाये जाते है यानी भारी और अपार भीड़ का जुटना। ऐसा लग रहा था की यू.पी..सरकार की तो शामत ही आ जायेगी इस रैली के साथ ही।

पर जो सोचो वैसा होता कहाँ है । दिल्ली मे सूरज देवता कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो रहे थे जिसके फलस्वरूप बी.जे.पी.के अध्यक्ष गडकरी जी को चक्कर आया और वो बेहोश हो गए । बेचारे गडकरी जी जहाँ सूर्य देव की तपन को बर्दाश्त नहीं कर पाए जबकि वो खुली गाडी मे चल रहे थे पैदल नहींवहीँ आम जनता पैदल चल रही थी ,पूरे-जोश से नारे लगाती घूम रही थी।और बाद मे गडकरी जी को एयर कंडीशंड कार मे उनके घर ले जाया गया

लगता है जनता के नेता सिर्फ वातानुकूलित कमरों,गाड़ियों ,घरों और संसद सदन (चूँकि यहां भी .सी.) मे ही महंगाई के खिलाफ आवाज उठा सकते है

और दिल्ली की जनता को इस रैली से मिला घंटों का traffic jam और गर्मी का मजा

Wednesday, April 21, 2010

आजकल दिल्ली और उत्तर भारत मे बहुत ज्यादा गर्मी पड़ रही है । आज सुबह ही बेटे से बात हुई तो उसने कहा कि दिल्ली मे गर्मी के मारे बुरा हाल है ।और उसके ठीक उलट यहां ईटानगर मे बारिश के मारे बुरा हाल है ।यहां भी मार्च के दूसरे हफ्ते मे बहुत गर्मी पड़नी शुरू हो गयी थी पर मार्च के आखिरी हफ्ते से जो बारिश शुरू हुई है कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही है । कभी- कभी अचानक ही खूब जोर-जोर से बारिश शुरू हो जाती है तो कभी अचानक बादल या यूँ कहें कि बिलकुल ऐसा घना कोहरा घिर आता है कि सब कुछ उस बादल और कोहरे की धुंध के पीछे छिप जाता है और चंद क्षणों के बाद ही बादल एकदम छंटने लग जाता है और एक खूबसूरत नजारा दिखता है । :)


और ऐसा नजारा यहां अक्सर क्या रोज ही देखने को मिल रहा है।

इस खूबसूरत नज़ारे का हमने विडियो बनाया है ,आप भी देखिये।
video


आप लोग गर्मी से परेशान है और हम बारिश से । :)

Tuesday, April 20, 2010

कल न्यूज़ मे देखा कि किस तरह अहमदाबाद मे १५ कन्या भ्रूण कचरे मे मिले।जो बहुत ही शर्मनाक और दुखद है कि आखिर इतनी सारी अजन्मी बच्चियों को मारने से उन माँ-बाप और डॉक्टर को क्या मिला। कितने अफ़सोस कि बात है कि एक तरफ तो देश मे लड़कियों को आगे बढाने की बात की जाती है तो वहीँ दूसरी ओर इस निर्ममता से कन्याओं की हत्या की जाती है।

ऐसे डॉक्टर जो इस तरह के जघन्य अपराध करते है और जिनके लिए पैसा ही सब कुछ होता है उनसे तो उनकी मेडिकल की डिग्री वापिस ले लेनी चाहिए । डॉक्टर जिन्हें भगवान का रूप माना जाता है वही हत्यारे बन जाते है ।जबकि उन्हें डॉक्टर बनने पर शपथ भी दिलाई जाती है कि वो कभी भी कुछ गलत काम नहीं करेंगे । पर रुपया कमाने की लालच मे वो सब कुछ भूल जाते है ।

ऐसे डॉक्टर जिनकी अपनी बेटी भी होती होंगी क्या एक क्षण के लिए भी उनका दिल उन्हें धिक्कारता नहीं है ऐसा करने के लिए। इतनी अजन्मी बच्चियों को मारने से मिला रुपया-पैसा कैसे उन्हें फलता-फूलता है।

८० के दशक मे एक बंगाली फ़िल्म देखी थी कन्या भ्रूण पर आधारित ,और तब लगा था कि लोग किस तरह की मानसिकता के साथ जीते है जहाँ बेटी का जन्म अभिशाप माना जाता था। पर आज ३० साल बाद भी हालात बिलकुल वैसे नहीं बल्कि और भी खराब हो गए है।

दिन पर दिन लड़कियों की संख्या लड़कों से कम होती जा रही है पर दुःख और अफ़सोस की बात है कि ऐसे डॉक्टरों की संख्या दिन पर दिन बढती ही जा रही है।

Saturday, April 10, 2010

अरुणाचल प्रदेश मे ज्यादातर बैंक के ए. टी.एम. मे अलग लाईन जैसा कुछ system है शुरू मे ये हमें पता नहीं था। अब वैसे ए.टी.एम मे महिला और पुरुष की अलग लाईन का कोई तुक तो नहीं बनता है ।और कहीं ऐसा देखा भी नहीं था। यहां ए.टी.एम मे कोई भी गेट के बाहर नहीं इंतज़ार करता है बल्कि सभी लोग अन्दर लाईन लगा कर खड़े रहते है ।बिलकुल एक के पीछे एक इतना पास-पास खड़े रहते है कि एक दूसरे का पिन नंबर भी देख सकते है। ये जरुर हमारे पतिदेव ने बताया था। वैसे ए.टी.एम.के बाहर लिखा भी रहता है तो भी हर कोई अन्दर आ जाता है ।

खैर ये जनवरी की बात है जब हम नए-नए थे, एक दिन हम एक बैंक के ए.टी.एम. मे पैसे निकालने गए और चूँकि वहां ३-४ लड़के अन्दर खड़े थे इसलिए हम शराफत मे गेट पर खड़े होकर अपने नंबर का इंतज़ार करने लगे.टी.एम के अन्दर एक महिला भी थी जो कभी .टी.एम.मशीन के पास जाती और कभी वापिस गेट पर आतीहम समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर माजरा क्या हैफिर उसने हमसे पूछा कि क्या हम उसकी पैसे निकालने मे मदद कर देंगेतो हमने हाँ कह दिया । तब समझ मे आया कि वो पहली बार पैसे निकालने आई थी।

खैर हम वहीँ खड़े रहे और इंतज़ार करने लगे तभी एक सज्जन आये और अन्दर जाकर जहाँ लड़के लाईन लगाए खड़े थे वहां जाकर खड़े होने लगे तो हमने उन्हें रोकते हुए कहा कि आप लाईन मे लगिए तो बोले कि हम अपनी लाईन मे ही खड़े हो रहे है।

और जब हमने कहा कि हम भी इंतज़ार कर रहे है और लाईन मे है । इसलिए आप बाहर आकर लाईन मे लगिए। ये सुनकर वो बिगड़ कर बोले कि हम तो सही लाईन मे है आप ही गलत खड़ी है।

तो हमारे ये कहने पर कि ए.टी.एम.मे एक के बाद एक ही लाईन मे आते है तो वो बिफर कर बोले कि ये यू.पी. बिहार नहीं है ये अरुणाचल है

ये सुनकर हमे भी गुस्सा आ गया हमने कहा कि आप यू.पी.और बिहार को क्यूँ कह रहे है।इसमें यू.पी ,बिहार कहाँ से आ गया। ये तो दिल्ली और सारे देश के सभी .टी.एम. मे एक के बाद एक ही लोग पैसा निकालते है और कहीं भी महिला और पुरुष की लाईन अलग नहीं होती है

तो इस पर और चिड कर बोले कि होगा ,पर यहां यही चलता है।

और यहां का यही system है कि यहां महिला और पुरुष की अलग लाईन होती हैऔर दो पुरुष के पैसे निकालने के बाद ही एक महिला पैसे निकालती है

ये सुनकर बहुत गुस्सा आया और हमने भी कहा कि ऐसा कहीं भी system नहीं है।

और वहां मौजूद लोग जो पैसे निकाल चुके थे और हम लोगों की बहस सुन रहे थे वो लोग हमसे बोलने लगे कि आप शांत रहिये। यहां ऐसा ही होता है।

और हमने भी सोचा कि नयी जगह है फ़ालतू मे झगडे मे पड़ने से क्या फायदा

हमें गुस्सा तो बहुत आ रहा था , इसलिए हमने उससे कहा कि ठीक है ,आप पहले पैसे निकाल लो हम बाद मे पैसे निकालेंगे।
तो उनको ये भी मंजूर नहीं था वो बोले कि नहीं आप ही पैसे पहले निकालिए।

खैर हमने भी बात ख़त्म करके पैसे निकाले और वापिस आ गए।

और अब तो नियम बना लिया है कि जब ए.टी.एम. खाली हो तभी पैसे निकालते है।:)
ना लाईन मे लगो ना झंझट हो।