Friday, August 20, 2010

अब यूँ तो दिल्ली मे मिनाक्षी और रचना से मिले हुए तकरीबन एक महीना हो गया है पर इस पर पोस्ट देर से लिख रहे है क्यूंकि दिल्ली मे रहते हुए कुछ ज्यादा व्यस्त हो गए थे और अब चूँकि हम ईटानगर आ गए है तो सोचा कि इस मुलाकात पर पोस्ट लिखी जाए ।

पिछले ३ साल से हम जब भी दिल्ली जाते है रचना और रंजना से से जरुर बात होती थी और मिलने का भी कई बार कार्यक्रम बना पर हम लोग कभी मिल नहीं पाए । हर बार कि तरह इस बार भी जब हम दिल्ली मे थे तो रचना और रंजना से बात की तो पता चला की रंजना तो दिल्ली से बाहर गयी हुई थी पर रचना से बात हुई तो पता चला की मिनाक्षी भी उन दिनों दिल्ली आई हुई थी । तो मिनाक्षी से भी बात हुई और मिलने का कार्यक्रम बना । और मिलने की जगह हमारा घर रक्खा गया और दोपहर बाद यानी ३ -४ बजे का रक्खा गया। पहले इसे ब्लॉगर मीट की तरह रखने की सोची गयी पर जिनके नंबर थे वो या तो busy थे या दिल्ली से बाहर थे और बाकी लोगों से संपर्क नहीं हुआ। हाँ मनविंदर जी ने भी आने को कहा था पर उस दिन उन्हें कुछ काम आ गया था इसलिए वो नहीं आई थी।

खैर हम तीनो ही पहली बार मिल रहे थे ये अलग बात है कि ब्लॉग और फ़ोन से हम लोग एक-दूसरे को पहचानते थे। खैर मिनाक्षी और रचना दोनों ही पहली बार हमारे घर आ रही थी तो थोड़ी बहुत तैयारी हमने भी करी थी । अरे मतलब थोडा-बहुत नाश्ता बनाया था।
लंच के बाद बस उन दोनों का इंतज़ार शुरू हुआ । और ऐसा लग रहा था मानो समय बहुत धीरे-धीरे चल रहा हो। मिनाक्षी ने हमसे हमारे घर का रास्ता पूछा और ये कहा कि अगर रास्ता ढूँढने मे कुछ कुछ प्रोब्लम आएगी तो वो हमें फ़ोन करेंगी।और जब वो हमारी कालोनी मे पहुँच रही थी तभी उनका फ़ोन आया कि आपका घर किस तरफ पड़ेगा तो हमने कहा कि हम घर के बाहर आ जाते है और हम जैसे ही घर के बाहर गए कि सामने वो कार मे हरे रंग के सूट मे मुस्कराती हुई दिखाई पड़ी। और जब वो कार से बाहर आई तो ऐसा जान पड़ा मानो हम लोग ना जाने कितनी बार पहले भी मिल चुके हो बिलकुल एक पुराने और अजीज दोस्त की तरह।

घर मे आते ही उनका स्वागत हमारे कैरी (doggi) ने किया और फिर हम लोग बातों मे मशगूल हो गए की तभी घंटी बजी तो मिनाक्षी ने कहा की रचना आ गयी। और दरवाजा खोलने पर रचना गुलाबी रंग के सूट मे खूबसूरत सी मुस्कुराहट लिए खड़ी थी। रचना के आने के बाद तो हम तीनो ऐसा बातों मे मस्त हुए कि समय का पता ही नहीं चला । दुनिया जहान की बाते हुई और हाँ कुछ बाते ब्लॉग जगत की भी हुई।

उसके बाद हम लोगों ने खाया -पिया और और डाइनिंग टेबल पर भी खूब गप-शप हुई। और फिर हम लोगों ने कुछ फोटो भी खिंचाई। और देखते-देखते कब शाम बीत गयी इसका अहसास भी नहीं हुआ और फिर एक-दूसरे से हम लोग गले मिलकर विदा हुए। इस पोस्ट को लिखते हुए उस पूरी शाम का सुन्दर अहसास आज भी महसूस हो रहा है।
thanks rachna and meenakshi for a wonderful evening.

7 Comments:

  1. संगीता पुरी said...
    और जब वो कार से बाहर आई तो ऐसा जान पड़ा मानो हम लोग ना जाने कितनी बार पहले भी मिल चुके हो बिलकुल एक पुराने और अजीज दोस्त की तरह।
    ब्‍लॉगिंग की दुनिया में सचमुच ऐसा ही होता है !!
    P.N. Subramanian said...
    यह मिलन समारोह कितना सुन्दर रहा होगा इसकी हम कल्पना कर सकते हैं. हमने भी मुंबई में घुघूती नामक पक्षी से मुलाक़ात कर ही ली थी.
    प्रवीण पाण्डेय said...
    खाना देख तो मुँह में पानी आ गया।
    Vijay Kumar Sappatti said...
    blogging ki duniya me yahi ek sabse bada sukh hai .. dosti bahut
    acchi hoti hai .. waah

    vijay
    आपसे निवेदन है की आप मेरी नयी कविता " मोरे सजनवा" जरुर पढ़े और अपनी अमूल्य राय देवे...
    http://poemsofvijay.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html
    अविनाश वाचस्पति said...
    मन प्रसन्‍न हुआ
    सबको प्रसन्‍न देखकर
    हमारे पड़ोस से गुजर लिए
    हमें आहट भी न हुई।
    मीनाक्षी said...
    आज ब्लॉगजगत की गलियों में टहलने निकले तो यहाँ कैसे न आते ....खूबसूरत मुलाकात की खूबसूरत पोस्ट पढकर मन प्रसन्न हो गया... फिर कब दिल्ली आ रही हैं...हम तो सोमवार फिर से दिल्ली आ रहे हैं...
    The Stairway to Heaven Manuscript / Subconscious Mind - 'Cure' your Depression NOW! said...
    http://danbrownstevemeyer.blogspot.com/

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