Sunday, April 29, 2007

इसमे हम जो भी लिख रहे है वो किसी का मजाक नही बना रहे है बस इतने सालों मे जो हमने महसूस किया है वो ही लिख रहे है।

बचपन से हमारी माँ ने सिखाया है कि कभी भी किसी को तू-तडाक करके बात नही करनी चाहिऐ हमेशा आप,हम और तुम करके बात करनी चाहिऐ और हमने भी अपने बच्चों को यही सिखाया है। पर हिंदी के ये शब्द यूं तो हर कोई बोलता है पर कौन बोल रहा है और किसको बोल रहा है इससे बहुत फर्क पड़ता है।जैसे बनारस मे हमारे बाबा के यहाँ हमेशा अयिली -गयिली , हमरा-तुम्हरा वाली मीठी भाषा का प्रयोग होता रहा है।

जब हम लोग छोटे थे और आज भी हम बातचीत मे हम -तुम शब्द ही इस्तेमाल करते है । शादी के बाद जब हम दिल्ली आये तो वहां पर हम-तुम कि बजाए लोग मै-तू बोलते थे पर हमसे मै-तू बोला ही नही जाता था। और हमारे इस हम-तुम की भाषा सुनकर लोग पूछते थे कि क्या आप u.p. से है। दिल्ली मे कई लोगों को ये कहते सुना है तू खाना खा ले ? हमारे बच्चे कई बार कहते थे कि इस तरह बोलने पर स्कूल मे लोग समझ नही पाते है इसलिये वो लोग स्कूल मे और अपने दोस्तो मे मै-तू करके ही बात करते है। पर घर मे नही बोलते है।

दिल्ली के बाद जब हम अंडमान पहुंचे तो भाषा बिल्कुल ही बदल गयी अरे -अरे हमारी नही वहां रहने वालो की। वहां पर हर कोई जाता है आता है या आएगा -जाएगा बोलते है। जैसे मैडम खाना खायेगा ? साब ऑफिस जाता ?जबकि हम लोग कहते है साब ऑफिस जा रहे है। पर अंडमान मे जब भी कोई कहीँ जा रहा होता है तो वो लोग एक बात हमेशा बोलते है जा के आना । पर हमारे दुर्योधन (कुक )बोलते थे मैडम जा के आयेगा।

और यहाँ गोवा मे तो और भी बदल गयी। यहाँ पर छोटे-बडे मे कोई फर्क नही है इसलिये हर कोई एक दुसरे को तू या तेरे को बोलता है। यूं तो इंग्लिश मे भी किसी दुसरे को संबोधित करने के लिए you शब्द का इस्तेमाल होता है।
शुरू मे तो कई बार हमे ग़ुस्सा भी आ जाता था ,जैसे जब हमारे इस घर मे काम हो रहा था तो एक दिन हमे
कोन्ट्रेक्टेर का आदमी tiles दिखने के लिए लाया जब हमने उससे कहा कि ये वो tile नही है तो वो बोला तेरे को दिखाने को लाया तुने जो पसंद किया था वो दुकान मे नही है। ये सुनकर बहुत ग़ुस्सा आया और अजीब भी लगा की यहाँ लोग कैसे बात करते है, क्यूंकि इस तरह से तो आज तक किसी ने बात नही की थी। पर अब हम अपने ग़ुस्से पर काबू कर लेते है। पर अब भी कभी-कभी ग़ुस्सा आ जाता है अब चाहे आप इसे कुछ भी समझे।

Saturday, April 28, 2007

दिसम्बर महीने मे इन्जीनरिंग के फॉर्म भरे जाते है और इसमे ये भी लिखा होता है कि फॉर्म को या तो स्पीड पोस्ट से भेजे या रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजे। चुंकि आज कल हम लोग गोवा मे है इसलिये हमारे छोटे बेटे ने भी यहाँ गोवा मे बैंक से फॉर्म लिया और भरा और उसे स्पीड पोस्ट से दिल्ली भेज दिया और हम लोग निश्चिंत हो गए क्यूंकि आख़िरी तारीख से करीब बीस दिन पहले फॉर्म जो भेज दिया था।

धीरे -धीरे समय बीतने लगा और मार्च आ गया पर उसका admit card नही आया तो हमने बेटे से पूछा कि उस पर पता तो सही लिखा था ना इस पर वो बोला कि पता तो उसमे पहले से ही लिखा होता है। जब अप्रैल भी आ गयी और उसका admit card नही आया तो हम लोगों ने दिल्ली मे पता लगवाने की कोशिश शुरू कि भाई आख़िर माजरा क्या है। और ये सुनकर कि हमारे बेटे का फॉर्म वहां पहुंचा ही नही है हम लोग थोडा सकते मे आ गए क्यूंकि समय बहुत कम बचा था ।

खैर दिल्ली मे सम्बंधित अधिकारियों ने कहा कि आप लोग फॉर्म की फोटो कापी हो तो वो दे दें तो दूसरा admit card बन जाएगा पर इसके लिए उन्हें स्पीड पोस्ट की ओरिजनल कापी चाहिऐ थी क्यूंकि जो फोटो कापी थी उसमे कुछ क्लियर नही था । खैर जैसे-तैसे हम लोगों ने उसे भेजा और बेटे का admit card लिया।

पर अब तक ये समझ नही आया कि आख़िर फॉर्म गया कहॉ ? क्यूंकि कॉलेज वाले कहते है कि उन्हें फॉर्म मिला ही नही और स्पीड पोस्ट वाले कहते है कि हमने तो फॉर्म भेज दिया है । गलती चाहे जिसकी हो पर इसमे परेशानी तो बच्चे और अभिभावक को ही होती है।

Friday, April 27, 2007




K.Gopinathan द्वारा खींची गयी यह फोटो आज के The Hindu मे छपी है। इस पर आप क्या कुछ कहना चाहेंगे?


(चित्र यहाँ से ली है)

पहले अंडमान और अब गोवा ,इन दोनो जगहों पर वैसे तो खाने की ज्यादातर चीजें मिल जाती है पर इलाहाबाद और दिल्ली की चाट और मिठाई और लखनऊ की कुलफी नही मिलती। अब ये मत पूछिये की हम इलाहाबाद कब पहुंचे अरे भाई इलाहाबाद हमारा मायका है और लखनऊ हमारी ससुराल और दिल्ली शादी के बाद हमारा घर ।


अंडमान मे जो तीन साल रहे तो चाट और कुलफी का स्वाद एक तरह से भूल ही जाते अगर बीच -बीच मे हम दिल्ली ,इलाहाबाद और लखनऊ ना आते -जाते रहते। इलाहाबाद के सिविल लाएईन की चाट का कोई जवाब नही क्यूंकि जैसी खालिस आलू की कुरकुरी टिक्की वहां बनती है वैसी तो दिल्ली मे भी नही बनती। दिल्ली की टिक्की मे दाल को भरते है जो वैसे तो खाने मे अच्छी होती है पर यहाँ पर तो ना सादी और ना दाल वाली अच्छी टिक्की मिलती है।

अंडमान मे गोलगप्पे जिसे वहां लोग पुच्का कहते है मिलते तो बहुत थे पर कभी खाने की इच्छा नही हुई क्यूंकि उनका गोलगप्पे का पानी देखकर ही कभी मन नही हुआ क्यूंकि पानी से ही सबसे ज्यादा इन्फेक्शन का खतरा होता है। दिल्ली के ऍम .ब्लॉक मार्केट मे तो गोलगप्पे का पानी भी मिनेरल वाटर से बनाते है। गोवा मे भी गोलगप्पे और टिक्की तो मिलती है पर वो बात नही है । गोवा मे मीरामार beach के पास ही सारे चाट वाले होते है। खानेवालों की भीड़ भी काफी होती है और हम भी कई बार वहां जाते है चाट खाने पर ...


मिठाई तो भाई इलाहाबाद के नेतराम की इमारती और सुलाकी की सोहन पपडी और बालुशाही का क्या कहना । मिठाई की बात मे हम लखनऊ का मलाई पान कैसे भूल सकते है जो की सिवाय लखनऊ के कहीँ और नही मिलता है।और बनारस का चमचम जो अब पहले जितना अच्छा नही रह गया है। वैसे दिल्ली मे तो अब हर तरह की मिठाई मिलती है और होती भी बहुत अच्छी है जैसे नाथू के यहाँ छेने से बनी मिठाई सीतारानी बहुत ही स्वादिष्ट होती है।

बहुत सालों तक तो लखनऊ के प्रकाश की कुलफी ही अच्छी होती थी और अभी भी है पर अब दिल्ली मे g.k..१.मे अनुपमा और नाथू की कुलफी भी कुछ कम नही होती है।

अब ये मत कहियेगा की अगर अंडमान और गोवा मे अच्छी चाट नही मिलती तो घर मे भी तो बना कर खा सकते है ,वो तो हम करते ही थे पर जो मजा सड़क पर खडे होकर चाट खाने का है वो घर मे थोड़े ही मिलता है।

Thursday, April 26, 2007

आज हम आपसे ज़ी पर आने वाले सीरियल सात फेरे की बात कर रहे है जिसमे कहानी घूम घूम कर एक ही जगह आ जाती है। ऐसा लगता है सलोनी बेचारी को सिर्फ मुसीबतों का सामना ही करना लिखा है। हर समय रोने के अलावा जैसे कुछ काम ही नही रहा है। कहानी को ख़त्म करने की बजाये इतना तगड़ा मोड़ देते है की दर्शक बेचारे समझ ही नही पाते है। कुछ दिन पहले चांदनी ने सलोनी के ससुराल वालों के घर और बिजनेस पर कब्जा कर लिया और उन्हें घर से बाहर निकाल दिया पर शायद अगर सलोनी ना होती तो उसके परिवार वाले इस मुसीबत का सामना नही कर पाते क्यूंकि सीरियल की हिरोइन सबसे अकलमंद है। कावेरी तो शायद बदलेगी ही नही क्यूंकि अगर वो सीधी हो जायेगी तो क्लेश कौन करेगा।

दुल्हन नाम के सीरियल मे विद्या जो एक अनपढ़ है जब शादी के बाद वो शहर आयी थी तो हमे लगा था की शायद कोई उसे पढने के लिए प्रेरित करेगा पर ऐसा कुछ नही हुआ । चले अब हम उम्मीद करते है की सागर ठीक होकर उसे पढने के लिए प्रेरित करेगा। पर अगर कहीँ ऑपरेशन के बाद सागर की याददाश्त चली गयी तो क्या होगा , ऐसा होने की अधिक उम्मीद है वरना सीरियल ख़त्म करना पड़ेगा।

क़सम से की बानी को अब नए अवतार मे दिखाया जा रहा है और लीजिये इसमे भी रोनित रॉय आ गए ,लगता है एकता को सीरियल के लिए लड़कियां तो नयी मिल जाती है पर आदमी नही तभी तो करीब-करीब हर सीरियल मे रोनित रॉय नजर आ जाते है। इस बार तो बानी बदला लेने आयी है देखते है क्या करती है। रोनित का इतना untidy लुक देखकर गन्दा लगा ।

ममता नाम से भी ज़ी पर एक सीरियल आता है जिसे हमने कभी -कभार ही देखा है पर जितना देखा उससे ये महसूस किया की आख़िर इसे कौन पसंद करता होगा क्यूंकि ना तो सीरियल मे कोई कहानी है (ये तो सभी सीरियल के लिए कह सकते है ) और ना ही कुछ नयापन है। बीच मे सुना था की ये ख़त्म हो रहा है पर अभी कल यूं ही जब ज़ी चलाया तो इस सीरियल को देखा । सारे कलाकार बिल्कुल पुराने -धुराने से लग रहे थे । ना आवाज मे कुछ दम ना acting मे कोई दम। ये सिर्फ ५ मिनेट ही देखा था उससे आगे देखने की ना तो हममे हिम्मत थी और ना ही चाहत थी।

हमने अपने ब्लोग की r.s.s. feed बदल दी है उसका नया (अंतर्जाल पता )address है http://feeds.feedburner.com/mamtatv

आप से अनुरोध है कृपया अपने रीडर मे इसे अपडेट कर ले।

Wednesday, April 25, 2007

दिल्ली मे पिछले २० सालों से रहते हुए कभी भी बाजार जाने और खरीदारी करने की आदत सी थी पर जब अंडमान गए तो अपनी इस आदत को बदलना पड़ा । वहां जाकर समझ आया कि अफ्तारनुन सिएस्टा क्या है। भाई हम ठहरे दिल्ली वाले जब मन हुआ बाजार चले गए .क्यूंकि दिल्ली मे अफ्तारनुन सिएस्ता जैसा कुछ नही है, सो हम आराम से तैयार होकर करीब १२ बजे जब खरीदारी करने बाजार पहुंचे तो चोंक गए क्यूंकि या तो दुकाने बंद हो गयी थी या बंद हो रही थी। जब हमने अपने ड्राइवर से इसका कारण पूछा तो वो बडे ही शान्त भाव से बोला कि मैडम यहाँ पर तो ऐसे ही है । १२ बजे सब दुकाने बंद हो जाती है और फिर ३ बजे दोपहर मे खुलती है। अब तो आप ३ बजे के बाद ही सामान ले पाएंगी । ये सुनकर ड्राइवर से जब हमने पूछा कि तुमने पहले क्यों नही बताया तो वो बोला कि मैंने समझा कि आप बस घूमने जा रही है।

चूंकि अंडमान मे सुबह जल्दी होती है और १२ बजे तक सूरज अपनी चरम सीमा पर होता है और कुछ कोस्तेल एरिया कि वजह से भी ,वहां सभी दुकाने साढे आठ सुबह खुल जाती है ,दोपहर मे १२ से ३ बंद रहती है और फिर ३ बजे के बाद रात ९ बजे तक खुली रहती है। वहां ऑफिस भी साढे आठ बजे से शुरू होता है जबकि दिल्ली और बाकी जगहों मे साढे नौ बजे ऑफिस शुरू होता है।

शुरू -शुरू मे बहुत दिक्कत आयी , एक -दो बार ऐसा भी हुआ कि दवा कि जरुरत है पर दुकाने बंद । पर फिर धीरे-धीरे हमने वहां के समय के साथ अपने को ढाल लिया। सुबह -सुबह बाजार जाना बाद मे अच्छा भी लगने लगा क्यूंकि इससे गरमी और धूप से बच जाते थे। पतिदेव का जल्दी ऑफिस जाना भी बाद मे ठीक लगने लगा क्यूंकि सारे ऑफिस साढे पांच बजे बंद भी हो जाते थे । हाँ अगर कोई मीटिंग है तो बात अलग है।

अंडमान जाकर हम लोगों की पारिवारिक जिंदगी बहुत बदल गयी थी । दिल्ली मे तो जो एक बार घर से निकले तो फिर आठ बजे शाम से पहले लौटना होता ही नही था , कुछ तो दूरियों की वजह से और कुछ ट्राफिक जाम की वजह से पर पोर्ट ब्लैयेर तो मुश्किल से पांच किलोमीटर मे पूरा शहर है। तो आप अंदाजा लगा ही सकते है कि वहां कहीँ भी आने-जाने मे अधिक से अधिक १०-१५ मिनेट लगते थे। हर चीज और हर जगह बस हाथ भर की दूरी पर थी चाहे वो एअरपोर्ट हो या फिर बाजार हो।


और अब गोवा मे भी अफ्तारनुन सिएस्टा का बहुत प्रचलन है।

Tuesday, April 24, 2007

आज के अखबार मे खबर थी कि अब से कक्षा १० के विद्यार्थियों को ये विकल्प दिया जाएगा कि यदि वो चाहे तो दसवी की परीक्षा दे या चाहे तो सीधे बारहवी की परीक्षा दे । दो साल के समय मे विद्यार्थी जब चाहे मतलब अपनी तैयारी के हिसाब से परीक्षा दे सकता है। ये कहा जा रहा है कि ऐसा इसलिये किया जा रहा है जिससे बच्चों पर ज्यादा बोझ ना पडे । पर हमारे ख़्याल से ऐसा करने से बच्चों मे पढने के प्रति रूचि कम भी हो सकती है क्यूंकि उन्हें ये लगेगा कि अभी तो दो साल का समय है बाद मे पढ़ लेंगे। जिन बच्चों को पढना होता है वो वैसे भी पढ़ लेते है।

बोर्ड का हौवा ख़त्म करने और बच्चों मे anxiety को कम करने के लिए ये किया जा रहा है। पर क्या ये ठीक है ?
हमे लगता है कि थोड़ी बहुत anxiety होना भी अच्छा होता है क्यूंकि anxiety एक ह्यूमन नेचेर है जिसका इन्सान मे होना बहुत जरूरी है। बच्चों मे anxiety को कम किया जा सकता है अगर अभिभावक चाहे तो क्यूंकि बच्चों से ज्यादा तो माँ-बाप मे anxiety होती है कि उनके बच्चे का कितना परसेंट आएगा। और देखा जाये तो एक तरह से माँ-बाप ही बच्चों पर ज्यादा दबाव बनाते है।

जब हमारा बड़ा बेटा १०वि का इम्तहान दे रहा था उस समय हिस्ट्री के एक-एक chaptar कम से कम ३०-४० पन्ने के होते थे साथ ही जिओग्रफी ,सिविक्स ,और इकॉनोमिक्स की अलग-अलग किताबें होती थी और वही छोटे बेटे के समय मे हिस्ट्री विषय को बिल्कुल ही बदल दिया गया मतलब आसान कर दिया गया। पहले हिस्ट्री मे indian ,modern ,medival सब पढ़ते थे वही बाद मे हिस्ट्री मे कुछ ८-१० chapter (१० पन्ने हर chapter के)और जिओग्रफी ,सिविक्स, इकॉनोमिक्स सब एक ही किताब मे था। कहने का मतलब है की अभी २-३- साल पहले से ही बोर्ड का हौवा ख़त्म करने का प्रयत्न किया जा रहा है ।

अगर इसी तरह बोर्ड धीरे -धीरे इतना आसान होता जाएगा तो इससे बच्चो मे प्रतिस्पर्धा की भावना भी ख़त्म हो सकती है। यूं तो अब ये भी फैसला किया जा रहा है कि किसी भी बच्चे को फेल नही किया जाएगा । पर ऐसा करके बच्चों को हम मेहनत ना करने का संदेश देंगे क्यूंकि जब बच्चे को ये डर ही नही होगा कि वो फेल भी हो सकता है तो उसे पढने के लिए कहना भी माँ-बाप के लिए मुश्किल हो जाएगा।

Sunday, April 22, 2007

भाई हम तो समझ ही नही पा रहे है की हम इन t.v.चैनल वालों का क्या करें।ना चाहते हुए भी हमे ये सब देखना पड़ा ,एक n.d.t.v.(जो कम से कम और ख़बरों को भी दिखा रहा था ) को छोड़कर सारे हिंदी चैनल अभी भी अभी-एश की खबर देने मे लगे है। अरे भाई अब तो बक्शो। कल बिदाई ऐसे दिखा रहे थे मानो कोई नेशनल इवेंट हो और तारीफ़ करनी होगी इन रिपोर्टर्स की जो पिछले ३-४ दिन से प्रतीक्षा, जलसा और ला मेर पर डटे हुए थे पर मजाल है जो उन्हें किसी की झलक भी मिल जाये। पर तब भी ना तो किसी के चेहरे पर शिकन और ना ही जोश मे कमी।यहाँ तक कि सुरक्षा गार्ड से धक्के भी खाए पर वही डटे रहे । हर बात का जिक्र ऐसे करते है मानो वही मौजूद हो। उन लोगों की गाड़ी के पीछे ऐसे भाग रहे थे की बस।सबसे कमाल कि बात कि ये चैनल पर बिदाई गीत भी बजाये जा रहे थे जैसे कि डोली वही से जा रही हो। पर ये सिलसिला यही ख़त्म नही हो गया । सहारा समय के प्रस्तुत कर्ता ने तो ये सवाल भी पूछ लिया की क्या मीडिया उनकी शादी मे ज्यादा हस्तक्षेप (interfere) कर रहा है ? अरे ये भी कोई पूछने की बात है।

कोई चैनल ये दिखा कर कि बिदाई के समय एश के चेहरे पर दुःख के भाव है ये बताने मे गर्व महसूस कर रहा था तो दूसरा चैनल ये बताने मे लगा था कि एश ने कौन सी साड़ी पहनी है। सम्वाददाता पूरे भाव विभोर होकर बताते है कि उन्होने अपनी माँ या नानी कि नही बल्कि शादी के लिए खास खरीदी गयी साड़ी पहनी है। भाई इसमे नई क्या बात है । हर दुल्हन शादी मे नयी साड़ी ही पहनती है।


सोचा था कि चलो शादी हो गयी अब तो अभी-एश का पीछा छोडेंगे पर नही जनाब अब वो तिरुपति जा रहे है तो उसी को दिखाने मे लग गए।और हाल ये है कि मीडिया को तिरुपति मंदिर से २१ किमी पहले ही रोका जा रहा है पर अभी भी इन्हें ये समझ नही आ रहा है । अब शाम से यही चर्चा शुरू कर देंगे कि क्या बच्चन परिवार का ऐसा करना ठीक था?

मंदिर मे उनके लिए सारे श्रधालुओं को दर्शन करने से रोक दिया जाना, कहॉ का इंसाफ़ है?

मीडिया यही रूक जाये तो गनीमत समझिये ,कहीँ ऐसा ना हो कि उनके honeymoon पर भी ये अपनी खबरें दिखाते रहे ।

Saturday, April 21, 2007

कल के वर्ल्ड कप मुक़ाबले मे ऑस्ट्रेलिया ने न्यूजीलैंड को २१५ रनों से हराकर एक बार फिर ये साबित कर दिया कि वो दुनिया की सबसे बेहतरीन टीम है और इसमे कोई शक भी नही है। जिस तरह से कल के मैच मे ऑस्ट्रलिया ने न्यूजीलैंड को हराया वो काबिले तारीफ है। इसे कहते है टीम और देश के लिए खेलना। जब भी खेलते है पूरी जान लड़ा देते है । हर मैच को जीतना ही उनका लक्ष्य होता है और इसमे बुराई भी क्या है आख़िर खेल तो हर कोई जीतने के लिए ही खेलता है। और इसे ही कहते है धो डाला ।

ऑस्ट्रेलियी खिलाडी चाहे जैसे भी हो (व्यवहार )पर जब वो खेलते है तो उनका जोश और होश देखने लायक होता है ,काश हमारी टीम मे भी ऐसा जोश होता तो शायद आज टीम इंडिया वर्ल्ड कप से बाहर नही होती। पर अपने यहाँ तो भगवान ही मालिक है।


टीम इंडिया से एक और बात याद आयी कल बांग्लादेश के लिए जो टीम चुनी गयी उसमे सचिन और सौरव नही है। इस खबर पर न्यूज़ चैनल वाले अब सबसे ये पूछने मे लगे है कि क्या सचिन और सौरव को टीम मे नही लेने का फैसला सही है । अभी दो दिन पहले तक सारे न्यूज़ चैनल पर यही चर्चा हो रही थी कि उन्हें टीम मे रखा जाये या नही। और अब जब टीम मे नही रखा गया है , तो भी यही चर्चा कर रहे है कि ये सही है या गलत। लगता है इन्हें किसी भी पल चैन नही है।

कल तक हर चैनल अपनी टीम बना रहा था और सभी ने सचिन को टीम मे नही रखा था तो फिर अब इतनी चर्चा क्यों ?

Friday, April 20, 2007

बारतांग भी पोर्ट ब्ल्येर से दो घंटे की दूरी पर है। वहां जाने के दो साधन है या तो आप बोट से जाये या फिर सड़क से। बोट से जाने मे ४से ५ घंटे लग जाते है जबकि अगर कार या बस से जाएँ तो २ घंटे मे पहुंच जाते है। सड़क का रास्ता इसलिये भी अच्छा है क्यूंकि इसमे जंगल पार करना पड़ता है और इसी जंगल के रास्ते मे जारवा भी मिलते है । जिरका टांग से काफिले की तरह जाना पड़ता है जिसमे सबसे आगे बस मे फॉरेस्ट गार्ड बैठता है और कारों मे भी गार्ड बैठता है जिससे जारवा कोई गाड़ी ना रोक सके। यूं तो अब जारवा पहले की तरह नही है कि देखते ही तीर मार दे पर अभी भी अगर वो गाड़ी रोक ले तो जरा मुश्किल हो जाती है । वैसे अब वो लोग कुछ-कुछ हिंदी भी समझ लेते है और कुछ छोटे-छोटे शब्द भी बोलते है जैसे पान ,बिस्किट , खाना , पैसा वगैरा। अब तो कई बार वो लोग जंगल से जड़ी-बूटी , सुपारी लाते है और दुकानों मे बेचते है और बिस्किट, पान वगैरा खरीदते है। जारवा लड़कियों को सजने का बहुत शौक़ होता है और उन्हें लाल,नीला रंग पसंद है कहने का मतलब है कि उन्हें bright colours पसंद आते है । ज्यादातर महिलाएं गले मे और सिर पर कुछ ना कुछ जरूर पहने रहती है। इनके बच्चे अलग-अलग तरह से अपने चेहरे को रंग कर रखते है।


पूरे एक घंटे लगते है जंगल ार करने मे और जैसे ही जंगल ख़त्म होता है क्रीक जाती है जिसे ferry के द्वारा पार करना होता है। पर कई बार यहाँ बहुत समय लग जाता है क्यूंकि वहां २ ferry ही चलती है। बारातांग भी बहुत ही छोटी सी जगह है । यहाँ पर p.w.d का एक छोटा सा गेस्ट हाउस है , वैसे पर्यटक लोग तो सुबह जाते है और शाम को पोर्ट ब्लैयेर वापस चले जाते है क्यूंकि वहां इतनी जगह ही नही है कि इतने लोग वहां ठहर सके।

सबसे पहले limestone caves देखने जाना चाहिऐ क्यूंकि दोपहर के बाद उसे बंद कर देते है। यूं तो केव छोटी सी है पर कई जगह उसमे कुछ प्रतिमाएँ सी बनी हुई नजर आती है। पहले बोट से करीब एक घंटे जाना पड़ता है फिर बोट से उतरकर पैदल जाना पड़ता है करीब बीस-तीस मिनट , हालांकि वहां तक जाने का रास्ता खेत -खलिहानों से होते हुए जाता है पर चुंकि वहां भी गरमी और बारिश दोनो होती है इसलिये छाता लेकर जाना चाहिऐ और पानी भी जरूर ले जाना चाहिऐ पीने के लिए।

mud volcano जो कि सुनामी के बाद फिर से जीवित हो गया था वो भी देखने लायक है। रास्ता तो ठीक -ठाक ही है पर ये थोडा ऊंचाई पर है क्यूंकि इससे पहले जब ये फटा था तो जमीन से काफी ऊपर हो गया है। एकदम किसी पहाड़ कि तरह ।


यहाँ पर बालुडेरा नाम का एक beach है जो सुनामी के पहले तो बहुत ही सुंदर था वहां पर cane से पानी के बीच मे जाने का रास्ता और बैठने के लिए कुर्सी बनी हुई थी और जहाँ बैठकर समुन्दर का मजा उठाया जा सकता था पर सुनामी मे वो सब बह गया । यहाँ पर हम सुनामी के बाद कि फोटो लगा रहे है क्यूंकि सुनामी के पहले वाली हमारी फोटो भी सुनामी मे बह गयी है। अब तो beach मे वो बात नही रही क्यूंकि बारातांग मे सुनामी ने इस beach को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया था ।





आज सुबह जब हमने न्यूज़ देखने के लिए आज तक चलाया तो उस पर और अन्य चेन्नलों पर ब्रेकिंग न्यूज़ मे यही खबर दिखायी जा रही है की जान्हवी ने अभिषेक पर क्या -क्या आरोप लगाए हैऔर आज तक तो जैसा वो दावा करता है कि वो सबसे आगे रहता है तो बस उस चैनल पर सिर्फ यही खबर पिछले एक घंटे से दिखायी जा रही हैअभी तक तो शादी की खबरें दिखा-दिखा कर परेशान किये हुए थे उस पर ये खबरऔर जान्हवी से बात करना और दुनिया भर के बकवास सवाल पूछना , आख़िर ये लोग ये क्यों नही समझते कि आज कल लोग कई बार मीडिया के द्वारा मशहूर होना चाहते है और ये जान्हवी प्रकरण उसी का सबूत हैआज का पूरा दिन तब तक सिर्फ इसी खबर को दिखायेंगे जब तक कि शादी ना शुरू है जाये

अभी तो अमर सिंह और अमिताभ से भी ये सवाल पूछेंगे कि जान्हवी के बयान मे कितनी सच्चाई है ?
क्या वाकई मे अभिषेक ने उससे शादी का वादा किया था ?

अरे भाई जब पुलिस ने ही उसकी रिपोर्ट लिखने से मना कर दिया तो फिर इतना बढावा किस लिए? आज तक ने तो जैसे एश्वर्या की तारीफ़ का ठेका ही उठा लिया है माना कि वो सुन्दर है , जिस दिन से शादी तै हुई है रोज कम से कम आधे घंटा तारीफ़ करने मे बिताते है

खैर हम कर भी क्या सकते है ज्यादा से ज्यादा न्यूज़ नही देखेंगे ,यही नाक्यूंकि आज का दिन तो सारे चैनल इसी शादी मे व्यस्त रहेंगे

Thursday, April 19, 2007

लीजिये हम फिर से हाजिर है दुर्गेश नंदिनी को लेकर । पैसे के लिए बेटे और बहु किस हद तक जा सकते है और दुर्गेश कैसे हर मुसीबत को दूर करतीहै ये इसमे देखा जा सकता है। दुर्गेश हर जगह सही समय पर पहुंच जाती बिल्कुल spider वूमन की तरह एक पल मे ऑफिस तो एक पल मे घर पहुंच जाती है। कमाल की फुर्ती है और मजाल है जो चेहरे पर शिकन आ जाये। पर छोटे- छोटे बच्चों का अपने माँ-बाप पर निगरानी रखना कुछ अच्छा नही लगता है।

सोनी पर ही जीते हैं जिसके लिए आता है जो अभी तक बहुत अच्छा चल रहा है और अपनी कहानी से भटका नही है। यूं तो इसमे सब कुछ अच्छा है सिर्फ एक बुआ (अदिरा )को छोड़कर, पर कम से कम इसमे वो सास -बहु की खिट-खिट नही है। वैसे बुआ ने गड़बड़ करने मे कोई कसर नही छोडी है।

सबसे कमाल का तो एक लडकी अनजानी सी है जिसमे पिछले हफ्ते लगा की चलो अब तो हीरो -हिरोइन मिल गए और अब पूरा परिवार हंसी-ख़ुशी रहेगा पर नही फिर से एक नयी लडकी का किरदार इसमे जोड़ दिया , इसे आगे बढ़ाने के लिए।

सबकी बात हो और बाबूजी की ना हो ऐसा कैसे कर सकते है। हम बात थोड़ी ख़ुशी थोड़े गम की कर रहे है जिसमे एक गुजराती परिवार को दिखाया गया है और इसकी खासियत ये है कि इस सीरियल मे ना तो सास अपनी बहुयों को तंग करती है और ना ही बहुएं अपनी सास को खरी- खोटी सुनाती है बल्कि इसके उलट इसमे सास बहु मे बहुत अच्छा तालमेल और प्यार दिखाया है । वैसे इसमे बाबूजी से जरूर बहुओं की थोड़ी -बहुत तकरार चलती है पर सास हमेशा अपनी बहुओं का ही पक्ष लेती है। जो बालाजी के सीरियल से बिल्कुल उल्टा है ।

नाम कुछ अजीब है पर गोवा मे इस नाम का एक रेस्तारेंट समुन्दर किनारे बना है जहाँ अगर शाम को जाया जाये तो बहुत अच्छा लगता है वो इसलिये क्यूंकि आजकल गोवा मे बहुत गरमी पड़ रही है वैसे तो पर्यटक घूमते ही है पर बेहतर है की दिन की बजाए शाम को जाये। यहाँ पर भी माँसाहारी खाना जैसे sea food platter (जिसमे क्रेब को prawn मे stuff करते है) और chicken platter काफी अच्छा होता है और साथ ही साथ शाकाहारी भोजन मे भरवा मशरूम बहुत अच्छा होता है ।

britto मे खाने के साथ साथ आप आतिश बाजी का भी मजा उठा सकते है क्यूंकि अक्सर समुन्दर के किनारे होटल वाले आतिश बाजी करते है । और खाने के बाद आप समुद्र तट पर टहलने का आनंद भी उठा सकते है जो सेहत के लिए भी अच्छा होता है । खाना ,समुन्दर का किनारा ,और आतिश बाजी आपकी शाम को हसीन बनाते है ।

Wednesday, April 18, 2007

हिट लेना हमारा मकसद नही था पर क्यूंकि उस समय हम अपनी ब्लोग पर कुछ बदलाव कर रहे थे और हमारे कंप्यूटर की स्क्रीन पर सब कुछ उल्टा पुल्टा दिख रहा था इसलिये ये देखने के लिए किया था कि कहीँ और लोगो को तो ब्लोग पढने मे दिक्कत नही आ रही है और आप सबकी बहुमूल्य टिप्पणियों की बदौलत हमे ये पता भी चल गया इसके लिए आप सबका धन्यवाद ।

Tuesday, April 17, 2007

क्या हुआ ये नाम सुनकर चौंक गए , घबराइये मत हम यहाँ कोई महाभारत नही सुनाने जा रहे है। ये नाम यूं तो आम तौर पर सुनाई नही देता है खासकर उत्तर भारत मे पर, अंडमान मे हम कह सकते है कि ये नाम बहुत आम है, वैसे ३ दुर्योधन नाम के व्यक्तियों से हमारा सामना हुआ। पहली बार ये नाम हमने p.w.d.मे काम करने वाले plumber का सुना तो सुनकर यकीन ही नही हुआ कि कोई दुर्योधन नाम भी रख सकता है।

पर जब हमने दूसरी बार ये नाम अपने पतिदेव के ऑफिस मे काम करने वाले एक आदमी का सुना तो लगा की लो एक और दुर्योधन मिल गया । उन दिनों हम घर मे काम करने के लिए आदमी खोज रहे थे वैसे आपको शायद यकीन नही होगा कि अंडमान मे servant मिलना किसी खजाने के मिलने से कम नही है क्यूंकि वहां ज़्यादातर लोगों के पास या तो नारियल के बाग़ है सुपारी के बाग़ और काफी लोग खेती भी करते है। चुंकि वहां के लोगों खाना बहुत सादा है चावल और मछली, मतलब ना तो उन्हें काम की जरुरत है और ना वो करना चाहते है। और अगर काम करते भी है तो उन्हें पक्की नौकरी चाहिऐ होती है अगर नौकरी दिला सकते है तो आपको काम करने वाले मिल सकते है। खैर करीब २ महीने की जद्दोजहद के बाद एक आदमी मिल ही गया, अब इसे इत्तेफाक कहिये या हमारी किस्मत की उसका नाम भी दुर्योधन था। पर ये दुर्योधन खाना बहुत अच्छा बनता था बिल्कुल उसी तरह जैसे वो दुर्योधन युद्घ करता था। अब ये मत पूछिये की खाने और युद्घ का क्या संबंध? है भाई खाना बनाना भी किसी युद्घ से कम नही होता है।

Monday, April 16, 2007

शिल्पा शेट्टी और रिचर्ड गेरे जो किसी एड्स जागरूकता कार्यक्रम के लिए दिल्ली गए थे, आज सुबह से हर न्यूज़ चैनल सिर्फ यही दिखा रहा है की गेरे ने शिल्पा के साथ क्या किया . हर कोई अपने हिसाब से न्यूज़ को बढ़ा - चढा कर दिखा रहा है की गेरे ने किस तरह शिल्पा के साथ बदतमीजी की या जोर जबरदस्ती की , ऐसा लगता है मानो और कोई न्यूज़ ही ना रह गयी हो। हर चैनल पर या तो ये सवाल पूछा जा रहा है की क्या गेरे को माफ़ी मांगनी चाहिऐ या क्या जो कुछ गेरे ने किया वो सही था या गलत ? मजाल है की आप कोई और न्यूज़ देख ले। इसमे सही या गलत का फैसला करना बड़ा मुश्किल है क्यूंकि २ संस्कृति के लोग है एक पश्चिमी सभ्यता जहाँ इसे बुरा नही माना जाता है.और हमारी हिंदुस्तानी सभ्यता जहाँ इसे बुरा मानते है। वैसे आजकल हमारे हिंदुस्तान मे भी लोग (फिल्मी लोग और hi-fi लोग )एक -दुसरे से मिलते है। क्यों कि वो ये दिखने की कोशिश कर रहे थे की छूने और किस करने से एड्स नही फैलता हैहांलाकि जैसा कि शिल्पा ने कहा कि जरा कुछ ज्यादा ही हो गया था

राहुल गाँधी ने अभी हाल ही मे उत्तर pradesh की एक चुनावी सभा मे कहा था की उनका खानदान जो कुछ करने की ठान लेता है उसे करके ही छोड़ता है चाहे वो आजादी हासिल करना हो या पाकिस्तान को २ भागों मे बाँटना हो या देश को २१वि सदी मे ले जाना हो पर वो ये भूल गए कि देश की इस हालत के जिम्मेदार भी उन्ही के खानदान वाले है। जोश मे होश खोना भी उनके खानदान की आदत सी है शायद आपको याद होगा एक बार राजीव गाँधी ने अपनी किसी चुनावी सभा मे विपक्षियों को उनकी नानी याद दिलाने की बात कही थी। अभी कुछ दिनों पहले तक तो वो जरा संभल -संभल कर बोलते थे पर शायद अब उनको ये लगता है कि अब वो अकेले अपने दम पर चुनाव जीत सकते है। पर भैया इस ग़लतफ़हमी मे मत रहना ।

Sunday, April 15, 2007

आज कल राजू श्रीवास्तव हर चैनल चाहे वो न्यूज़ चैनल जैसे स्टार न्यूज़ और आज तक हो या सोनी और स्टार वन हो सब जगह छाये है। उनकी कॉमेडी का ये हाल है कि आपने स्टार वन पर उनके जो चुटकुले देखे है वही या तो स्टार न्यूज़ या आज तक पर भी सुनने को मिल जायेंगे।


स्टार न्यूज़ ने सिर्फ कार्यक्रम का नाम नया रखा है पर बाकी सब कुछ पुराना है। उसमे कुछ clipping वो सहारा वन के सौजन्य से दिखाते है तो कुछ किसी और कार्यक्रम की। और सबसे कमाल की बात ये है की दोनो न्यूज़ चैनल एक ही समय पर राजू श्रीवास्तव का कार्यक्रम दिखाते है। भाई ठीक है आप कार्यक्रम दिखाइये पर कुछ नया तो दिखाइये।

आज तक पर आने वाला ऐसी की तैसी तो वाकई मे ही ऐसी की तैसी है कॉमेडी की।

सोनी का कार्यक्रम कॉमेडी का बादशाह है या ट्रेजेडी का शहंशाह ? और सोने पर सुहागा राखी सावंत भी है ।

कॉमेडी का जिक्र हो और सिद्धू की बात ना आये ये कुछ ठीक नही। सिद्धू तो जैसे हंसी का बटन लगाए हुए है। अभी चुटकुला ख़त्म भी नही हुआ की सिद्धू की हंसी चालू।

Saturday, April 14, 2007

जी हाँ ये नाम गोवा के एक रेस्टोरेंट का है ,ये जैसा की इसके नाम से पता चलता है कि ये पंजिम मे है। ये बहुत ही छोटा सा रेस्टोरेंट है पर goan खाना बहुत अच्छा और बहुत सस्ता होता है। अगर आप मांसाहारी है और sea food के शौक़ीन है तो आप इस रेस्टोरेंट मे खाना खा सकते है। बस इस तक पहुँचने का रास्ता jara खराब है वो क्या है कि ये एक गली के अन्दर है । गोवा मे ज्यादातर रेस्टोरेंट मे a.c . रेस्तारं अलग से होता है और सर्विस tax देना पड़ता है अब ये आप पर है कि आप a.c.मे खाना चाहते है या बग़ैर a.c.के।

sea food मे crab और prawn काफी अच्छा है। वैसे शाकाहारी खाना भी मिलता है और अच्छा भी होता है। यहाँ एक मैन डिश के साथ या तो चावल या goan ब्रैड देते है जो कि एक complete meal हो जाता है। यहाँ पर विदेशी लोग भी बहुत आते है ,और चूंकि ये रेस्टरां छोटा है इसलिये देर से जाने पर जगह नही मिलती है। इसलिये अगर कभी इच्छा हो तो जरा जल्दी ही जाइयेगा।

ज़ि t.v. पर आने वाले सीरियल क़सम से मे बहनों को इतना नीचे गिरा दिया कि यकीन नही होता। सीरियल मे जय की सगी बहन जिज्ञासा और मौसेरी बहन करुना और बानी की बहन पिया इन तीनो ने किस तरह मिल कर बानी की जिंदगी खराब की ये देख कर लगता है मानो दुनिया मे रिश्तों की कोई अहमियत नही रह गयी है। यथार्थ से तो दूर -दूर तक का नाता नही है। जिस तरह पिया ने अपनी ही बहन को पागल बनाया और अपने ही बहनोई को अपने से शादी के लिए मजबूर करना तथा छोटी बहन रानो को धमकाना ,ये सब क्यों ?

जिस dvd को दिखाकर पिया जय वालिया को ब्लैकमेल कर रही है अरे mr. वालिया उसे जरा ध्यान से देखो उसमे साहिल की आवाज तो है पर उसने dialogue ही नही बोले है क्यूंकि उसके होंठ तो हिल ही नही रहे थे।

बहनो से बुआ लोग भी याद आ गयी ,बुआ का किरदार हर सीरियल मे बस भाई का घर तोड़ने और भाई का पैसा लूटना इन्ही दो कामों मे लगा है। अब बुआ चाहे ज़ि t.v.की हो या स्टार प्लस की और भला हम सोनी को कैसे भूल सकते है । हर सीरियल मे होड़ लगी है की कौन कितना बुरा दिखा सकता है। भाई-भतीजों की बुद्धि तो घास चरने चली गयी है जो कुछ बुआ या बहन कह दे आंख मूँद कर उस पर भरोसा कर लेते है। कुछ अकल का भी तो इस्तेमाल करो । अरे भाई कुछ अच्छा भी तो दिखाया जा सकता है।

Friday, April 13, 2007

जी हाँ आज हम इसी बारे मे लिखने जा रहे है। सुबह के समय अगर आप अपना भविष्य जानना चाहते है तो आज तक और स्टार न्यूज़ देख सकते है । अगर आज तक पर मिनाक्षी रानी आती है तो स्टार न्यूज़ पर २-३ ज्योतिषी मसलन शैली और माया सभी राशियों का भविष्य बताती है अब ये तो आप पर है की आप किसकी बात मानते है। आप ये भी कर सकते है कि अगर मिनाक्षी रानी ने आपका भविष्य कुछ खास अच्छा नही बताया है और माया या शैली के मुताबिक आपका दिन अच्छा गुजरने वाला है तो आप उसे अपने लिए मान लीजिये। भाई ये तो अपने ऊपर है।

आजकल तो ज्योतिषी का धंधा भी काफी ग्लैमरस हो गया है । अब मिनाक्षी रानी को ही देखिए क्या स्टाइल है , इतने बडे -बडे earing पहनती है और make-up भी किसी हिरोइन से कम नही पर प्रस्तुतबोलने का स्टाइल जरूर बढ़िया है। इतना जोर दे-देकर बोलती है मानो सुनने वाला कही भाग ना जाये।

स्टार न्यूज़ वाली इसके बिल्कुल उलट ऐसे नीरस भाव से बोलती है कि बस !







ये द्वीप पोर्ट ब्लेयेर से २ घंटे की दूरी पर है। पहले वहां बोट सीधे नही जाती थी ,बोट या तो havelock जाते हुए या फिर havelock से वापस आते हुए नील island जाती थी। पर अब स्पीड बोट से सीधे २ घंटे मे पहुंच जाते है।बोट से उतरते ही आप jetty से दोनो तरफ रंग -बिरंगी मछलियाँ (कौवा फिश )देख सकते है। ये द्वीप बहुत ही छोटा है पर खूबसूरत है और शांति तो इतनी कि एक बार को मन ये सोचने को मजबूर हो जाता है कि क्या हम इसी दुनिया मे है ,क्यूंकि वहां गाडियां बहुत कम है इसलिये ना तो वहां गाड़ियों का शोर है और ना ही कोई भागम- भाग है। वहां जाकर सब कुछ भूलकर आप प्रकृति का लुत्फ़ उठा सकते है।

वहां २-३ beach है पर चूंकि वहां ज्यादा लोग नही जाते है इसलिये beach खाली रहते है। जो एक तरह से अच्छा भी है और खराब भी है क्यूंकि भगवन ना करे अगर कोई हादसा होता है तो वहाँ कोई बचाने वाला नही होगा । हम लोग जब वहां गए तो ऐसा ही कुछ हमारे साथ हुआ था। सीतापुर beach जहाँ चट्टानें है और काफी आगे जाकर एक गुफा सी है। वहां लहरों के साथ टहलते -टहलते हम लोग गुफा तक जा पहुंचे ,और फोटो खिचाने के लिए हम पानी मे खड़े हो गए हमारे पति देव ने कहा कि चट्टान का सहारा के लो पर हमने मना कर दिया क्यूंकि उसमे बहुत सारे छोटे -छोटे crabs और shell चिपके हुए थे पर तभी एक जोर की लहर आयी और उसने पीछे से धक्का मारा ऐसा लगा की गए ,वो तो गनीमत समझिये कि हमने चट्टान को पकड़ लिया वर्ना भगवान जाने क्या होता, क्यूंकि अगर पानी खीच ले तो बस ।जी हां ये वही चट्टान है।

नील island मे दो beach लक्षमन्पुर् नाम से है एक मे आप जीवित कोरल और star fish वगैरा देख सकते है। पर वहां बिल्कुल सुबह जाना पड़ता है क्यूंकि जैसे जैसे दिन चढ़ता है समुन्द्र कि लहरें तेज होती जाती हैऔर फिर वहां कुछ भी देखना मुश्किल हो जाता है। दुसरे लक्ष्मन्पुर् beach पर जाकर आप सूर्यास्त का मजा उठा सकते है और तरह तरह के shell देख सकते है और इकठ्ठा भी कर सकते है। यहाँ पर एक छोटा सा रीसोर्ट भी है जिसमे छोटी -छोटी cottages है और किराया भी कम होता है और जहाँ आप कुछ जीव -जंतु भी देख सकते है जैसे viper snake ,है ना खूबसूरत !

हम यहाँ पर कुछ फोटो लगा रहे है जिसमे सीतापुर beach की गुफा और वो चट्टान जिसे पकड़ कर हम बचे थे।

star fish और कोरल की फोटो ,viper snake , एक फोटो मे वहां का जन-जीवन


Wednesday, April 11, 2007

आज हमने the week मे एक लेख पढा जिसमे ये लिखा था

In Ghaziabad last year, two dogs had chased kidnappers on a bike and rescued an abducted child

हमारा कैरी बाइक तो नही चलाता है पर frisbee जरूर पकड़ लेता है।

idiot

कल हम pan कार्ड के लिए फॉर्म भर रहे थे तो उसमे एक जगह लिखा था कि वो कौन लोग है जिन्हें pan कार्ड फॉर्म भरने के लिए assessee की मदद लेनी होती है । वो लोग जो खुद फॉर्म नही भर सकते है। उस कॉलम मे बाकी तो सब ठीक था पर उसी मे idiot भी लिखा था जिसे पढ़कर हमे दुःख भी हुआ और अफ़सोस भी हुआ क्यूंकि ये फॉर्म एक सरकारी विभाग द्वारा जारी किया जाता है।


idiot पढ़ कर हमे ये समझ नही आया की आख़िर इस श्रेणी मे कौन लोग आते है क्यूंकि जहाँ तक हमे मालूम है idiot की कोई परिभाषा नही है। वैसे तो हर कोई दूसरे इन्सान को idiot ही समझता है । अगर idiot का मतलब बेवकूफ है तब तो सारा देश इस श्रेणी मे आ जाएगा क्यूंकि हम सब या तो किसी को बेवकूफ बनाते है या खुद बेवकूफ बनते है।

कमाल की सोच है आयकर विभाग की ।

Monday, April 9, 2007


कुछ
दिन गेस्ट हाउस मे रहने के बाद घर की खोज शुरू हुई ,घर तो कई थे पर हमारी इच्छा थी की हमारा घर समुन्द्र के सामने हो बिल्कुल फिल्मी स्टाइल मे । इस चक्कर मे कुछ समय निकल गया ,हमारा ये कहना था की अगर हम अंडमान मे समुन्द्र के सामने नही रहेंगे तो कहॉ रहेंगे। बस अब इसे हमारी जिद ही समझ लीजिये .खैर कुछ दिन बाद हमे एक घर जो की sea facing था मिल गया। और उस जगह का नाम था जंगली घाट ,चौन्किये मत अंडमान मे नाम जरा अलग तरह के होते है । जब हमने घर पसंद कर लिया तो हमारे ड्राइवर ने कहा कि मैडम ये घर ठीक नही है.क्यूंकि यहाँ से ही शमशान घाट का रास्ता है । ये सुनते ही हमने उस घर को लेने से मना कर दिया और हम गेस्ट हाउस वापस आ गए । पर वो कहते है ना कि जो किस्मत मे लिखा हो उसे आप बदल नहीं सकते।

गेस्ट हाउस मे रहते हुए समय अच्छे से बीत रहा था .रोज वहां से हम समुन्द्र का ,उसके पानी के अलग -अलग रंगों का मजा उठा रहे थे और जिंदगी मजे मे कट रही थी । यूं तो गेस्ट हाउस का खाना खाकर ज्यादा दिन नहीं रहा जा सकता था सो एक बार फिर से घर कि खोज शुरू हो गयी। और हमारी किस्मत कि इस बार भी हमे घर मिला तो वहीँ जंगली घाट मे पर हम किसी भी तरह तैयार नही थे.
एक दिन हमारे एक दोस्त ने बताया कि दिल्ली के एक लेफ्टिनेंट गवर्नर थे जो रोज आधे घंटे शमशान घाट मे जाकर बैठते थे तो ऐसी कोई बात नहीं है। हर कोई हमे समझाने मे लगा था ,आख़िर हमने भी हथियार डाल दिए और सोचा जो होगा देखा जाएगा। असल मे हम वहां रहने से डरते थे अब आप चाहे इसे हमारी कमजोरी समझे या कुछ और पर कुछ बातों मे हम अभी भी पुराने खयालात के है जैसे शमशान घाट इस नाम से ही मन मे कुछ अजीब सा डर आ जाता है। हमने अपनी माँ को ये बताया तो उन्होंने कहा कि जब रहना है तो डरो मत बस जब भी कोई जाये उसकी आत्म की शांति की प्रार्थना कर लेना ,सब कुछ ठीक रहेगा।

किसी तरह हमने अपने मन को समझाया और घर मे काम शुरू हुआ। इसमे कोई शक नहीं कि घर बहुत अच्छा ठाये ये duplex bunglow था जहाँ हर जगह से sea दिखता था जो कि मन मे एक ख़ुशी सी भर देता था।घर के सामने ही एक छोटा सा पार्क था जो कारगिल मे शहीद हुए कैप्टन की याद मे बनाया गया थाइस पार्क मे एक वाकिंग ट्रैक था जहाँ लोग सुबह और शाम टहला करते थेपार्क मे कई तरह के झूले थेसुबह से शाम तक बच्चे इस पार्क मे खेला करते थेपर सुनामी के बाद इस पार्क का नामों -निशान ही मिट गया
खैर मई मे हम उस घर मे शिफ़्ट हो गए। अभी घर मे गए दूसरा ही दिन था कि सुबह -सुबह गोविंदा -गोविंदा की आवाज आनी शुरू हुई और हमारी हालत तो आप सोच ही सकते है। पूरे घर मे अगरबत्ती की महक भर गयी ,हम फ़टाफ़ट छत पर निकल गए ऐसा लगा मानो हमे कुछ हो जाएगा । और हमने दिल से प्रार्थना की भगवान् इनकी आत्मा को शांति दे। बस फिर क्या जब भी ऐसी आवाज आती हम भगवान् से उसकी आत्म की शांति की प्रार्थना कर लेते थे। धीरे -धीरे हम भी इसके आदी हो गए । बाद मे हमे आवाज से पता चल जाता था कि कौन जा रहा है माने बंगाली लोग शंख बजाते है ,उत्तर भारतीय राम नाम .....और दक्षिण भारतीय गोविंदा -गोविंदा करते है और रास्ते मे नारियल फोड़ते ओर पटाखे चलते हुए चलते है।

हमारे घर और समुन्द्र मे सिर्फ एक सड़क थी। sea wall के साथ ही एक बच्चों का पार्क था जहाँ सुबह ६ बजे से शाम तक बच्चे खेलते थे,लोग भी उधर टहलने के लिए जाते थे क्यूंकि पार्क मे एक वाल्किंग ट्रैक भी बना था। हमारे घर मे नारियल के ७ पेड थे जिसकी वजह से हम और खुश थे क्यूंकि जो दिल्ली से आया हो उसके लिए ये सब किसी नियामत से कम नहीं था। और हमारे दिन हंसी ख़ुशी मे बीतने लगे।

Saturday, April 7, 2007



यूं तो गोवा मे खाने -पीने की ढेरों जगहें है और हर दो कदम पर एक रेस्टारेंट भी है पर कुछ ऐसी जगहों के बारे मे हम बात करने जा रहे है जहाँ आप खाने का भरपूर आन्नद उठा सकते है। आज हम शुरुआत एक ऐसे ही रेस्टारेंट से करने जा रहे है जिसका नाम o coqueiro है और जो पोरवरिम मे है। इस रेस्टारेंट की खास बात ये है कि यहां का खाना तो अच्छा होता ही है यहां का माहौल भी बहुत अच्छा है। एक इनका a.c. रेस्टारेंट है और एक बरामदे मे भी कुर्सी मेज लगा रखी है । सबसे अच्छा इनका ओपन एअर रेस्टारेंट है जहाँ आप खाने के साथ संगीत का भी आन्नद उठा सकते है। संगीत काफी अच्छा होता है और सबसे बड़ी बात कि बहुत तेज नही होता है। कानों को सुनने मे अच्छा लगता है। आप अपनी फरमाइश के गाने भी सुन सकते है। वही पर एक डान्स floor भी बना है अगर कोई चाहे तो वो डान्स भी कर सकता है।


और एक बहुत ही खास बात है कि यहां से ही चार्ल्स सोबराज को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। ये वही चार्ल्स सोबराज है जो दिल्ली पुलिस को बेवकूफ बनाकर चकमा देकर भाग गया था ।जिस समय उसे पकडा गया था उस समय वो यहीं बैठ कर किताब पढ़ रहा था।

Friday, April 6, 2007

स्टार प्लस पर आने वाले इस क़यामत नाम के सीरियल को देख कर ये समझ ही नही आता है कि हम कौन सा सीरियल देख रहे है क्यूंकि रोनित रॉय अरे वही अपने मिहिर या यूं कहें कि मि . बजाज उन्हें देख कर लगा कि शायद हम कसौटी देख रहे है पर तभी निम्मो रानी दिख गयी अभी हम असमंजस मे ही थे कि ऋषि वो कहीँ तो होगा वाले गेट अप मे नजर आ गए। बालाजी के सभी सीरियल मे कौन किसका बेटा है और कौन किसकी माँ या बाप ये पता ही नही चलता है। इनके सीरियल मे बेटे हमेशा अपनी माँ के दुश्मन होते है चाहे वो अंश हो या प्रेम हो ।

इससे पहले भी सीरियल बना करते थे जैसे हम लोग और बुनियाद ,उनमे हमे हक़ीकत दिखाई देती थी हालांकि नाटकीयता तो थोड़ी बहुत सभी मे होती है ,सास बहु के झगडे भी दिखाए जाते थे पर ऐसा नही जैसा आजकल के सीरियल दिखाते है । इनकी बहुएं चाहे वो कोमोलिका हो या मोहिनी हो या फिर अपर्णा और बहुओं की बात हो और हम पल्लवी को भूल जाये ऐसा कैसे हो सकता है इनकी परिवार से बदला लेने की नयी -नयी तरकीब देख कर कहना पड़ता है कि वाह क्या बहुंये है।

क्यूंकि .... मे फिर से मंदिरा को लाना तो कभी कहानी ....मे मरी हुई गायत्री को वापस लाना , ये बताता है कि एकता के पास जो थोड़े बहुत आईडिया बचे थे वो खत्म हो गए है। अब तो ये देखना है कि वो और किस-किसको वापस लाती है।

Thursday, April 5, 2007

तेन्दुलकर गुरू ग्रेग से क्यों नाराज है सिर्फ इसलिये कि उसने कुछ सीनियर खिलाड़ियों के बारे मे कहा है। तेन्दुलकर ही तो अकेले सीनियर खिलाडी नही है फिर इतना ग़ुस्सा क्यों है। जैसा कि तेन्दुलकर कह रहे है कि उन्होने क्रिकेट को अपनी जिंदगी के सत्रह साल दिए है तो इसी क्रिकेट ने उन्हें महान खिलाडी तेन्दुलकर भी बनाया है। और इसी क्रिकेट की बदौलत उनके पास इतने विज्ञापन और बड़ी -बड़ी कम्पनियों के करार भी है। ऐसा नही है की आप ने ही क्रिकेट को सब कुछ दिया है सचिन इस क्रिकेट ने उससे कहीँ ज्यादा आप को दिया है।

अगर खिलाडी अच्छा नही खेलेंगे तो उन्हें हर तरह की आलोचना तो सुननी ही पडेगी। ये तो कोई बात नही हुई । माना की आप क्रिकेट के लिए पूरी तरह समर्पित है तो वो समर्पण हमे विश्व कप मे क्यों नही दिखाई दिया। ये तो एक तरह से अपने आप को बचाने वाली बात हुई। अरे सचिन जब भी आप अच्छा नही खेले देश और क्रिकेट प्रेमी हमेशा आप के साथ रहे पर आख़िर कब तक?

और सचिन आप ने वो कहावत तो सुनी ही है - अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत।

Wednesday, April 4, 2007




अंडमान
पहुंच कर हम लोग बहुत खुश थेएअरपोर्ट से साऊथ प्वाइंट circuit house का रास्ता मिनट का है ओर circuit house थोडा ऊंचाई पर है और वहां से बहुत ही सुन्दर view दिखायी देता हैअगर आप अपनी बालकनी से या कमरे से बाहर देंखे तो सामने समुन्द्र और पहाड़ और बादलों का अदभुत नजारा देखने हो मिलता हैचुंकि हम लोग जून मे गए थे और बारिश का मौसम था इसलिये वहां का नजारा देखते ही बनता थावहां पर बारिश ऐसे होती है मानो पर्दा गिर रहा होएक समान बारिश होती रहती हैबारिश का कुछ कहा नही जा सकता है कभी झमाझम बारिश तो कभी चमचमाता सूरज निकल आता है कहने का मतलब है कि आपको वहां हमेशा छतरी लेकर चलना पड़ता है क्यूंकि पता नही कब इंद्र देव अपनी कृपा कर दे

पोर्ट ब्लेयेर मे समुन्द्र के साथ -साथ walking track बना है जिसे देख कर हमारा भी मन हो गया टहलने का। वहां सवेरा जल्दी हो जाता है यानी कि वहां का ६ दिल्ली के ८ बजे के बराबर होता है मतलब जितनी धूप दिल्ली या और जगह ८ बजे होती है उससे कही कड़ी धूप वहां सुबह ६ बजे होती है। हमको लोगो ने सलाह दी और कहा कि अगर टहलना है तो ४.३०य ५ बजे जाना चाहिए पर हम कहॉ ५ बजे उठने वाले थे । खैर अगले दिन हम सुबह ६ बजे टहलने निकले पर थोड़ी ही देर बाद धुप तेज हो गयी और गरमी बढ गयी और हमे ये अहसास हुआ कि कभी कभी दूसरों कि बात भी मान लेनी चाहिऐ क्यूंकि सूरज बहुत तेज हो गया था।

अंडमान मे यूं तो कह सकते है कि एक ही दिन मे घूमा जा सकता है पर सिर्फ संग्रहालय या zoo ही देखना काफी नही होता है। पोर्ट ब्लैयेर से २ घंटे कि दूरी पर havelock नाम का बेहद खूबसूरत द्वीप है। वहां जाने के २ साधन है एक तो स्पीड बोट जो phoenix bay jetty से रोज सुबह ७ बजे जाती है और दूसरा हैलिकॉप्टर से जिसमे २०-३० मिनट मे पहुंच जाते और ये काफी रोमांचक यात्रा होती है क्यूंकि हैलिकॉप्टर काफी नीचे उड़ता है। havelock मे बंगाली ज्यादा रहते है। और dolphin guest house के तो क्या कहने। जहाँ guest house कि चारदीवारी ख़त्म होती है वही से समुन्द्र शुरू होता है। और राधानगर beach तो पूरे asia मे दुसरे number पर है। यूं तो सूर्यास्त हर जगह ही अच्छा होता पर राधानगर कि बात ही कुछ और है।और हाँ कभी -कभी आप को हाथी भी beach पर टहलते हुए दिख सकते है।
guest house से ही बोट वाले एक और बहुत ही छोटे से द्वीप elephant island पर ले जाते है जहाँ कोरल ,सुंदर मछलियाँ देखी जा सकती है। बोट वाले ही स्नोर्क्लिंग का सब सामान साथ ले जाते है । देख कर यकीन करना पड़ता है कि पानी के अन्दर भी जीवन खुशहाल रह सकता है। अक्सर उस रास्ते मे dolphin भी दिखती है। dolphin बिल्कुल बोट के करीब आ कर बोट को छुते हुए निकल जाती है। इससे पहले कि फोटो ले वो बहुत दूर चली जाती है। इसलिये अगर आप कभी वहां जाये तो अपना कैमरा हमेशा तैयार रखे ।

Tuesday, April 3, 2007

zee के सुभाष चंद्र जिन्होंने आज ये घोषणा की कि वो इंडियन क्रिकेट लीग बना रहे है वो सुनकर कुछ अजीब सा लगा क्यूंकि सुभाष जी से पहले b. c.c. i ने भी दो टीम इंडिया ब्लू और इंडिया सीनियर बनाने की घोषणा की थी। सुभाष चंद्रा की i.l.c.मेरे ख़्याल से जल्दबाजी मे लिया गया निर्णय है इससे पहले उन्होने kbc के competition मे सवाल दस करोड़ का शुरू किया था जो बहुत बड़ा फ्लॉप रहा था। इस तरह से टीम बनाकर वो क्या साबित करना चाहते है ?

इसमे कोई शक नही है की टीम बहुत ही बुरा खेली है पर इसका मतलब ये नही है की हर कोई अपनी एक अलग टीम इंडिया के लिए बना ले । ये तो कोई हल नही हुआ ,अपने देश की टीम के आख़िर कितने हिस्से किये जायेंगे ?

सबसे बड़ी बात है की हमे नए खिलाड़ियों को मौका देना चाहिऐ और एक ऐसी टीम तैयार करें जो अपने देश का गौरव बढ़ा सके। i.l.c.मे ६ टीम बना रहे है , सुभाष जी ये कोई चैनल या सीरियल नहीं है की आप जनता को बेवकूफ बनाए। हिंदुस्तान एक है और जैसा कपिल देव कहते है क्रिकेट देशभक्ति से जुड़ा है तो क्या आप देश के टुकड़े करना चाहते है?

Monday, April 2, 2007


ये बात १२ जून २००३ की है हम लोगों का अंडमान तबादला हो गया था और हम बहुत खुश भी थे क्यूंकि पिछले २१ साल से हम दिल्ली मे रह रहे थे और वहां की भागदौड़ भरी जिंदगी से ऊब चुके थे । हम लोगों के लिए ये ट्रान्सफर आर्डर एक blessing की तरह था । हालांकि हमारे घरवालों और रिश्तेदारों के लिए ये थोडा मुश्किल था क्यूंकि अंडमान को काला पानी जो माना जाता है। कुछ लोग मजाक भी करते थे कि भी तुम लोगों ने ऐसा क्या किया जो तुम को काले पानी कि सजा मिल गयी। कुछ लोग कहते थे कि अपना तबादला रुकवा लो। और तो और कुछ ने ये भी कहा कि वहां पर मसाले नही मिलते है इसलिये आप मसाले जरूर ले जाइए। हर कोई अपने हिसाब से राय देने मे लगा था। पर हम लोगो को इन सब बातों से कोई फर्क नही पड़ता था ।

हमारे मम्मी -पापा और हमारे पापाजी (ससुरजी ) को थोडा दुःख तो था पर वो हमारे साथ थे और हमारी ख़ुशी मे खुश थे। हम लोगो को ऐसा लग रहा था मानो हम कहीँ विदेश जा रहे हो हर कोई मिलने आ रहा था और हम भी जाने से पहले अपने मायके और ससुराल दोनो जगह जाकर लोगों से मिल आये थे।

आख़िर हमारे जाने का दिन भी आ गया। पहले हम लोग दिल्ली से कोलकत्ता गए और वहां रात मे रुके थे .अगले दिन सुबह ५.५० कि flight थी ,उस समय सिर्फ सुबह ही flight जाती थी । हम सभी बहुत excited थे ,थोड़ी देर तो ठीक रहा पर उसके बाद प्लेन ने जो झटके देने शुरू किये कि बस पूछिये मत । अचानक ऐसा लगा मानो प्लेन ने उपर से उठा कर नीचे फ़ेंक दिया हो। और हमारे मुँह से बरबस ही निकल गया कि हम अंडमान जा रहे है या ऊपर (भगवान )हमारे पतिदेव ने हमे जोर से डांटा कि हल्ला क्या मचाती हो ,तो हमने कहा कि नीचे तो सिर्फ समुद्र ही दिख रहा है तो वो बोले कि डरती क्यों हो तुम्हे तैरना तो आता है। तो थोडा झुंझलाकर हम भी बोले कि नीच गिरने के बाद कहॉ याद रहेगा कि हमे तैरना आता है हमारी तो पहले ही जान निकल जायेगी. दरअसल मई-जून से वहां बारिश शुरू हो जाती और हम लोग उसी मौसम मे जा रहे थे पर इन सब झटकों के बाद जब अंडमान दिखना शुरू हुआ तो सारा डर गायब हो गया और हम प्रकृति की सुन्दर रचना को देखते ही रह गए।

प्लेन की खिड़की से नीला -हरा समुन्द्र और लहरों मे किनारे को छूने की होड़ सी लगी थी और हरियाली तो देखते ही बनती थी। इतना सुन्दर नजारा की हम बयां नही कर सकते है। चारों ओर अथाह समुन्दर और नारियल और सुपारी के हरे -हरे पेड किसी जन्नत से कम नही थे। और इस सुन्दरता पर हमने भी एक २ पंक्ति की कविता लिख दी थी कुछ इस प्रकार से।

अंडमान कहते है जिसे काला पानी ,हुई धारणा ये पुरानी।
कश्मीर के बाद अगर कहीँ स्वर्ग है तो वो यहीं है ,यहीं है,यहीं है।
हरे भरे नारियल और सुपारी के वृक्ष
नीला आसमां और नीला समुन्द्र
जिसे देख मन बरबस कह उठता है
की अगर कहीँ स्वर्ग है तो वो यहीं है, यहीं है, यहीं है।

Sunday, April 1, 2007


गोवा मे घूमने के साथ -साथ अगर कोई चाहे तो वो karting का मजा भी ले सकता है । यूं तो जो लोग घूमने आते आते है वो सिर्फ उन जगहों पर जाते है जो tourist गाइड मे लिखी होती है। पर अगर कोई karting का शौक़ीन है तो वो karting का मज़ा गोवा मे भी उठा सकता है। एक तो इन्गोस बाज़ार के पास karting ट्रैक है जहाँ शाम ४ बजे से रात १० बजे तक karting की जा सकती है और रेट भी ठीक है एक आदमी के लिए १३० रूपये और १३० रूपये मे १० चक्कर लगाते है। और अगर शनिवार का दिन है तो karting के साथ -साथ night बाज़ार का मजा भी ले सकते है।

दूसरा karting का ट्रैक मदगांव मे है। ये ट्रैक काफी ऊंचाई पर है और रास्ता भी बहुत संकरा है .karting ट्रैक तक जाते हुए भी आप ड्राइव का मजा ले सकते है। वहां पहुंच कर यकीन ही नही होअत है की इतनी ऊंचाई पर भी ट्रैक बनाया जा सकता है। ये ट्रैक ज्यादा अच्छा है क्यूंकि इसमे जो karting नही कर रहे है वो प्रकृति का आनंद ले सकते है। शाम के समय karting के साथ ही सूर्यास्त का आन्नद भी उठाया जा सकता है। सबसे बड़ी बात ये है कि ट्रैक बहुत अच्छा है । यहाँ १२० रूपये मे १० चक्कर लगा सकते है।
हम साथ मे कुछ फोटो भी लगा रहे है।

कल रात स्टार वन कि अन्ताक्षरी मे अन्नू कपूर और जुही परमार के बीच नई जेनेरेशन और पुरानी जेनरेशन के लोगो पर जो बहस शुरू हुई वो पहले तो नोक -झोक कि तरह लग रही थी पर बाद मे कार्यक्रम के अंत मे ये बहस बहुत बढ गयी थी ,हालांकि जुही ने बहस को ख़त्म करके कार्यक्रम को आगे बढाने की बात भी कही पर अन्नू कपूर थे कि रुकने का नाम ही नही ले रहे थे। यहाँ तक कि उन्होने कुछ अपशब्द भी कहे जो की सुनने मे बहुत खराब लग रहे थे। अन्नू कपूर को ये नही भूलना चाहिऐ की अन्ताक्षरी जिसे ये रिश्तों की अन्ताक्षरी कहते है उसे परिवार के लोग एक साथ बैठ कर देखते है और उनके इस तरह के व्यवहार को लोग पसंद नही करेंगे।

जैसा की अन्नू कपूर ने खुद कहा था की नई पीढ़ी के पास कुछ नही है पर अन्नुजी आप नई पीढ़ी को क्या दे और दिखा रहे है जब आप ही अपनी जबान पर काबू नही रख सकते है ? जुही ने कम से कम आपकी इज्जत का ख़्याल किया और वहां से चली गयी। वैसे ये भी आश्चर्य की बात है कि वहां जुही की गाड़ी तैयार खड़ी थी।

गजेन्द्र सिंह को भी अपने प्रस्तुतकर्ता पर कुछ कण्ट्रोल रखना चाहिऐ , वैसे ये लोग कई बार t.r.p.बढ़ाने के लिए भी ये सब ड्रामा करते है ,जैसे सा,रे ,गा, म,प, मे संगीत कार लोग आपस मे लड़ा करते थे । पर जो भी है अन्नू कपूर को ना तो अपशब्द (गाली ) बोलने का हक है और ना ही किसी भी पीढ़ी की बुराई करने का हक है क्यूंकि ये तो हमेशा होता है कि पुरानी पीढ़ी नयी पीढ़ी को बेवकूफ समझती है और नयी पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को old fashioned समझती है । ये कोई नयी बात नही है जब हम लोग उस उम्र मे थे तो हमे लगता था कि हमारे बाबा जिन्हे हम लोग प्यार से बाबूजी कहते थे वो जो भी बात कहते थे हमे लगता था कि वो गलत है और हम सही है पर आज जब हम अपने बच्चों को कुछ कहते है तो उन्हें भी वही लगता है कि हम गलत है और जो वो कह रहे है वो सही है ।

ये एक ऐसी बहस है जो ना तो पहले कभी ख़त्म हुई और ना ही आगे कभी ख़त्म होगी क्यूंकि इसे ही तो जेनरेशन गैप कहते है ।