Friday, April 27, 2007

पहले अंडमान और अब गोवा ,इन दोनो जगहों पर वैसे तो खाने की ज्यादातर चीजें मिल जाती है पर इलाहाबाद और दिल्ली की चाट और मिठाई और लखनऊ की कुलफी नही मिलती। अब ये मत पूछिये की हम इलाहाबाद कब पहुंचे अरे भाई इलाहाबाद हमारा मायका है और लखनऊ हमारी ससुराल और दिल्ली शादी के बाद हमारा घर ।


अंडमान मे जो तीन साल रहे तो चाट और कुलफी का स्वाद एक तरह से भूल ही जाते अगर बीच -बीच मे हम दिल्ली ,इलाहाबाद और लखनऊ ना आते -जाते रहते। इलाहाबाद के सिविल लाएईन की चाट का कोई जवाब नही क्यूंकि जैसी खालिस आलू की कुरकुरी टिक्की वहां बनती है वैसी तो दिल्ली मे भी नही बनती। दिल्ली की टिक्की मे दाल को भरते है जो वैसे तो खाने मे अच्छी होती है पर यहाँ पर तो ना सादी और ना दाल वाली अच्छी टिक्की मिलती है।

अंडमान मे गोलगप्पे जिसे वहां लोग पुच्का कहते है मिलते तो बहुत थे पर कभी खाने की इच्छा नही हुई क्यूंकि उनका गोलगप्पे का पानी देखकर ही कभी मन नही हुआ क्यूंकि पानी से ही सबसे ज्यादा इन्फेक्शन का खतरा होता है। दिल्ली के ऍम .ब्लॉक मार्केट मे तो गोलगप्पे का पानी भी मिनेरल वाटर से बनाते है। गोवा मे भी गोलगप्पे और टिक्की तो मिलती है पर वो बात नही है । गोवा मे मीरामार beach के पास ही सारे चाट वाले होते है। खानेवालों की भीड़ भी काफी होती है और हम भी कई बार वहां जाते है चाट खाने पर ...


मिठाई तो भाई इलाहाबाद के नेतराम की इमारती और सुलाकी की सोहन पपडी और बालुशाही का क्या कहना । मिठाई की बात मे हम लखनऊ का मलाई पान कैसे भूल सकते है जो की सिवाय लखनऊ के कहीँ और नही मिलता है।और बनारस का चमचम जो अब पहले जितना अच्छा नही रह गया है। वैसे दिल्ली मे तो अब हर तरह की मिठाई मिलती है और होती भी बहुत अच्छी है जैसे नाथू के यहाँ छेने से बनी मिठाई सीतारानी बहुत ही स्वादिष्ट होती है।

बहुत सालों तक तो लखनऊ के प्रकाश की कुलफी ही अच्छी होती थी और अभी भी है पर अब दिल्ली मे g.k..१.मे अनुपमा और नाथू की कुलफी भी कुछ कम नही होती है।

अब ये मत कहियेगा की अगर अंडमान और गोवा मे अच्छी चाट नही मिलती तो घर मे भी तो बना कर खा सकते है ,वो तो हम करते ही थे पर जो मजा सड़क पर खडे होकर चाट खाने का है वो घर मे थोड़े ही मिलता है।

3 Comments:

  1. rinku said...
    ममता जी कुलफी और चाट का नाम सुन कर मेरे मुहँ में पानी आ गया , और हा आप कुल्फी को कुल्फी ही लिखे कुलफी नही....:D
    mamta said...
    धन्यवाद रिंकू जी ,आगे से ध्यान रखेंगें ।
    अतुल श्रीवास्तव said...
    "हरी के चने" और सिर्फ इलाहाबाद में मिलने वाली "करेले की चाट" कैसे भूल गयीं? और, मलाई के पान सिर्फ लखनऊ के राम आसरे को ही बनाना आता है. अगली बार कभी लखनऊ जाने का मौका मिले तो गणेशगंज से शिव मिष्ठान भंडार की मिठाई जरूर मंगवाईयेगा. वैसे 'नेतराम' लखनऊ में भी है.

    दिल्ली में भी मेरे कुछ पसंदीदा चाट के अड्डे होते थे. पर जो मजा मुझे लखनऊ और इलाहाबाद में आता था, वो कभी दिल्ली में नहीं आया. शायद लखनऊ और इलाहाबाद के साथ बचपन की यादों की खटमिट्ठी चटनी घुली हुई है.

    http://lakhnawi.blogspot.com

Post a Comment