Tuesday, July 31, 2007

आज कई दिनों बाद हम टी.वी.पर आने वाले कुछ सीरियल की बात करने जा रहे है। अरे-अरे आप भागिये मत । इतना डरने की जरुरत भी नही है। असल मे वो क्या है ना कि आजकल न्यूज़ देखना भी उतना ही दुखदायी होता जा रहा है जितना कि टी.वी.सीरियल। अब टी.वी.सीरियल की बात हो और बालाजी का नाम ना आये तो ये तो संसार का आठवां आश्चर्य हो जाएगा आख़िर एकता कपूर टी.वी.जगत की पहली सोप क्वीन (अरे साबुन नही सीरियल की)जो मानी जाती है। पर आज हम एकता कपूर के सीरियल की बात नही करेंगे। वो क्या है ना कि बीच मे कुछ दिनों के लिए हमने सीरियल से ब्रेक ले लिया था पर आजकल फिर से हम सीरियल देखने लगे है।


ओह्हो आप बड़ी जल्दी घबरा जाते है कि अगर एकता की नही तो फिर आख़िर हम किसकी बात करने जा रहे है। तो जनाब जैसा की हमने एक बार पहले भी कहा था कि सोनी पर आने वाला सीरियल विरूद्व बहुत अच्छा है और एक बार फिर हम आपसे कहते है कि विरूद्व बहुत अच्छा सीरियल है। कम से कम सास -बहू की तरह उबाऊ और खीचाऊ सीरियल नही है। जितनी दमदार कहानी है उतनी ही दमदार सारे कलाकारों की एक्टिंग भी है। वो चाहे स्मृति इरानी हो या विक्रम गोखले हो या सुशांत सिंह या फिर दूसरे नए कलाकार। और संगीत भी कमाल का है। कहीँ से कुछ भी मिसिंग नही लगता है। अब देखना ना देखना तो आपके हाथ है।



अच्छे संगीत से एक और सीरियल जो कि सहारा वन पर आता है वो याद आ गया। घर एक सपना जिसे अजय सिन्हा ने बनाया है। और इस सीरियल की कहानी तो बिल्कुल ही नयी है। चलिये हम आपको थोड़ी सी कहानी बता देते है। इस मे हीरो और हिरोइन शादी मे मिलते है।और उन दोनो की शादी हो जाती है। कितनी बोरिंग सी कहानी है। पर नही जनाब यहीं तो कहानी मे ट्विस्ट है । दरअसल इसमे हीरो का दोस्त है जिसकी शादी पटना मे होती है और वहीँ शादी मे हीरो हिरोइन के साथ फ्लर्ट करता है।जैसा कि आम तौर पर शादियों मे होता है। इसमे हिरोइन के पिता बिहार के नेता है। और जीजा थोडा गुंडा टाईप है।बारात वापसी से पहले जीजा हीरो की हिरोइन के साथ जबरदस्ती शादी करवा देते है ये कहते हुए कि फ्लर्ट(प्यार)किया है तो शादी भी करनी पडेगी। और फिर परिस्थितियां कैसे-कैसे मोड़ लेती है।ये सब दिखाया गया है। इस सीरियल के भी सारे कलाकारों ने और खास कर के जो हिरोइन का जीजा बना है उसने गजब की एक्टिंग की है। डायलोग बहुत अच्छे है कुछ डायलोग तो ऐसे है जो हम आम घरों मे बोलते है।हिमानी शिवपुरी ने माँ के किरदार मे बहुत जान डाली है। बहुत शो बाजी नही है। पर फिर भी सीरियल देखते हुए कहीं भी बोरियत नही महसूस होती है।


उप्स ये तो काफी बड़ी पोस्ट हो गयी है ।तो बस अब यहीं पर हम खत्म करते है। अरे नौ बज रहे है तो अब हम जा रहे है अपने सीरियल देखने ।

आज सुबह -सुबह ज्ञानदत्त जी की पोस्ट पढ़कर हमे अपनी जिंदगी की पहली और आख़िरी बिना टिकट यात्रा याद आ गयी। पहली और आख़िरी इस लिए लिख रहे है क्यूंकि हम लोगों ने कभी भी बिना टिकट यात्रा नही की थी ।ना तो उससे पहले और ना ही कभी उसके बाद। यूं तो रेलगाडी के सफ़र के साथ ढेरों यादें है। पर बिना टिकट यात्रा का अपना ही मजा है अगर पकड़े ना जाएँ तो।वरना ......

ये बात तो काफी पुरानी है।गरमी की छुट्टियाँ हुई थी और हम सब भाई- बहन बच्चों सहित इलाहाबाद मे इकट्ठा थे बस हमारी मिर्जापुर वाली दीदी इलाहाबाद नही पहुंची थी क्यूंकि वो कुछ बीमार थी । तो हम सब ने की चलो अगर वो बीमार है और इलाहाबाद नही आ पा रही है तो क्या हम लोग ही मिर्जापुर हो आते है।अब इलाहाबाद से मिर्जापुर है ही कितनी दूर। बस इतना सोचना था कि फ़टाफ़ट मम्मी-पापा को हम लोगों ने अपना मिर्जापुर जाने का प्रोग्राम बताया और इससे पहले कोई कुछ कहे हम बहनेऔर भाभी मय बच्चों के चल दिए मिर्जापुर। हम सब छोटे-बडे मिलाकर दस लोग थे. बस भईया अपने किसी काम की वजह से नही जा पाए थे। शायद एक -डेढ़ घंटे मे हम लोग मिर्जापुर पहुंच गए।और दीदी के घर ख़ूब मस्ती हुई

जब हम लोग वापिस इलाहाबाद लौटने लगे तो हम लोगों ने अपनी बहन को भी साथ चलने को कहा। पहले तो वो तैयार नही हो रही थी पर फिर हम सबके जोर देने पर वो तैयार हो गयी। अब चुंकि वो अचानक तैयार हुई तो जाहिर है की पैकिंग मे थोडा समय तो लगेगा ही। तो पैकिंग करते-करते और घर से निकलते हुए हम लोगों को थोड़ी देर हो गयी। जैसे ही स्टेशन पहुंचे तो देखा की ट्रेन बिल्कुल जाने के लिए तैयार थी और चुंकि हम लोगों के साथ बच्चे भी थे तो ये सोचा गया की ट्रेन मे चढ़ जाते है । जब रास्ते मे कोई टी.टी.आयेगा तो उससे टिकट बनवा लेंगे। पर उस डेढ़ घंटे के सफ़र मे ना तो कोई टी.टी.आया और ना ही हम लोगों का टिकट बना। और सारा रास्ता यूं ही बीत गया और जब इलाहाबाद आने लगा तो हम लोगों को थोड़ी चिन्ता होने लगी की अगर टी.टी. ने पकडा तब तो बड़ी मुसीबत हो जायेगी और अगर घर मे पापा लोगों को पता चलेगा तो डांट पडेगी सो अलग।

पर उस समय सबसे बड़ा सवाल ये था की स्टेशन से कैसे बाहर निकला जायेट्रेन से उतर कर ये सोचा गया कि हम सभी अलग-अलग छोटे-छोटे ग्रुप मे स्टेशन से बाहर निकलेंगे और गेट पर टी. टी .को टिकट आगे है या टिकट पीछे है ये कहकर सब लोग बाहर निकलेंगेतो बस सबसे पहले हमारी मिर्जापुर वाली दीदी क्यूंकि वो बीमार थी एक बच्चे के साथ बाहर निकली ये कहकर की टिकट पीछे हैहम सभी धीरे-धीरे मन ही मन डरते हुए और बाहर से बिल्कुल निडर भाव से चलते हुए टिकट आगे है टिकट पीछे है ऐसा कहते हुए एक के बाद एक स्टेशन के गेट के बाहर निकलते गएऔर बाहर निकल कर पार्किंग मे जहाँ गाड़ी खडी थी वहां पहुंचकर पहले चैन की सांस लेते थे कि चलो बच गए और फिर जोरदार ठहाका लगते थे


पार्किंग मे खडे-खडे हम सब देख रहे थे कि जिज्जी को टी.टी.ने रोक लिया हैइसलिये ड्राइवर को हम लोगों ने कहा कि गाड़ी स्टार्ट कर के रखो और जैसे ही जिज्जी आएगी फौरन चल देनासबसे आख़िर मे हमारी जिज्जी थी पर जब उन्होने कहा कि टिकट तो आगे जो लोग गए है उनके पास थाऔर जैसे ही जिज्जी ने कहा की टिकट तो आगे वालों के पास थाये सुनते ही टी.टी.को थोडा शक हुआ कि जरूर कुछ गड़बड़ है

तो टी.टी.ने उनसे कहा की पहले वाले तो ये कहकर गए कि टिकट पीछे है और अब आप कह रही है की टिकट आगे है

तो जिज्जी ने बड़ी ही स्मार्टनेस से कहा कि अरे क्या उन लोगों ने टिकट नही दिया
तो टी.टी.ने कहा नही
इस पर जिज्जी बोली कि अच्छा मैं उन लोगों से टिकट लेकर आती हूँ
वो टी.टी.कुछ सीधा था इसलिये उसने जिज्जी को बाहर हम लोगों के पास टिकट लेने के लिए आने दिया

और उसके बाद क्या हुआ होगा ये तो आप अंदाजा ही लगा सकते हैअरे हम सभी सिर पर पैर रख कर भागे मतलब कार से भागेजैसे ही कार चली हम सभी ठहाका मार कर हंस पडेयूं तो हम लोग कार से भाग रहे थे पर फिर भी पीछे मुड़-मुड़ कर देखते जा रहे थे कि कहीं कोई पीछा तो नही कर रहा हैऔर घर पहुंच कर जब हम लोगों ने पापा-मम्मी और भैय्या को बिना टिकट यात्रा और स्टेशन से बाहर निकलने का किस्सा सुनाया तो वो डांट पडी कि कुछ पूछिये मतऔर पापा ने हम सबको ये ताकीद दी की आइन्दा ट्रेन भले ही छूट जाये पर बिना टिकट यात्रा कभी नही करना



Monday, July 30, 2007

अब इस शीर्षक देख कर तो हर हिन्दुस्तानी यही कहेगा कि लो जी ये भी कोई पूछने की बात है। अब हम भारत वासी हिंदी नही बोलेंगे तो और क्या बोलेंगे। भाई जब चीनी लोग चीनी भाषा बोलते है और रशिया के लोग रशियन तो भला हम लोग हिंदी क्यूं नही बोल सकते है। अब ये तो हम लोग सोचते है की हिंदी हमारी मातृभाषा है पर शायद दूसरे देश के लोग ऐसा नही सोचते है। वैसे इसमे उनकी गलती भी नही है क्यूंकि हमारे हिंदुस्तान मे आजकल क्या हमेशा से ही अंग्रेजी को ज्यादा महत्त्व दिया जाता रहा है।और अब तो इंग्लिश के बिना गुजारा ही नही होता है। चाहे वो कॉलेज हो या कोई दफ्तर या कोई बड़ा उत्सव हो या चाहे कोई पार्टी हर जगह सिर्फ इंग्लिश का ही बोलबाला है। हमारे बडे-बडे नेता हो या चाहे अभिनेता हो हिंदी बोलने मे उन्हें परेशानी लगती है की पता नही अगला व्यक्ति उनकी बात समझेगा या नही। यूं तो bollywood हिंदी फिल्मों के लिए जाना जाता है पर हमारे अभिनेता और अभिनेत्रियाँ हिंदी बोलने से कतराते है। दर्जनों उदाहरण मिल जायेंगे।

हम हिंदुस्तानियों की एक बहुत ही अच्छी आदत है की हम दूसरों का बहुत ख़्याल करते है मसलन अगर कोई हिन्दुस्तानी किसी दूसरे देश मे जाता है तो वो हमेशा इंग्लिश बोलता है क्यूंकि इंग्लिश आजकल युनिवर्सल लेंगुएज जो बन गयी है।कई बार कई जगहों पर तो अगर आप हिंदी मे कुछ पूछिये तो लोगों के चेहरे पर एक शुन्य ( blank) सा भाव दिखता है। पर इसके ठीक उलट जब भी कोई विदेशी चाहे वो किसी भी देश का हो फ़्रांस का हो या फिर चीन,जापान,रशिया ,थाईलैंड आदि का पर वो अपनी ही भाषा मे बात करता है चाहे वो बड़ा नेता हो या कोई आम नागरिक या कोई सुंदरी जो किसी सौंदर्य प्रतियोगिता मे ही क्यूं ना भाग ले रही हो।सब अपनी भाषा मे बोलते है भले ही उसे बात करने के लिए interpreter की मदद ही क्यूं ना लेनी पडे। पर हम भारतीय अपनी मातृभाषा हिंदी का प्रयोग दूसरे क्या अपने ही देश मे करने मे संकोच करते है।

कल के हिंदुस्तान टाइम्स अखबार मे एक ऐसी ही खबर छपी थी । जैसा की हम सभी जानते है कि आजकल भारतीय क्रिकेट टीम इंग्लैंड के दौरे पर गयी है। अब हर रोज मैच के बाद कुछ खिलाडी पत्रकारों से बात करते है वैसे ये कोई नई बात नही है।परसों के खेल मे चुंकि गेंदबाजों ने अच्छा प्रदर्शन किया था तो इसलिये पत्रकार लोग गेंदबाजों से बात करना चाहते थे । पर लक्ष्मण मुखातिब हुए मीडिया से जो शायद ब्रिटिश मीडिया को रास नही आया । भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाडी वी.वी.एस.लक्ष्मण पत्रकारों से बात कर रहे थे।जब लक्ष्मण किसी सवाल का जवाब हिंदी मे दे रहे थे तो उसे सुनने की बजाए ब्रिटिश पत्रकारो ने अपने-अपने माइक हटा लिए और एक-एक कर के बाहर चले गए। जो की बहुत ही बुरा और शर्मनाक है । इससे कुछ सवाल हमारे मन मे उठे है

क्या लक्ष्मण का हिंदी मे बात करना गलत था?
क्या हिंदी मे सवाल का जवाब देना कोई अपराध है ?
लक्ष्मण की जगह अगर कोई दूसरे देश का खिलाडी अपनी भाषा मे बोल रहा होता तो क्या तब भी ये ब्रिटिश पत्रकार ऐसा ही करते ?

Saturday, July 28, 2007

क्या आप ने कभी ताश के खेल जैसे कोट पीस या तीन-दो-पांच मे चीटिंग की है।
क्या कभी चीटिंग नही की है।
वैसे यकीन तो नही आता है पर मान लेते है। तो चलिये इसी बात पर हम आपको एक और अपने बचपन से जुडी बात बताते है। जब हम छोटे थे उस समय आज की तरह ढेरों मनोरंजन के साधन नही होते थे। एक रेडियो होता था जिस पर विविध भारती और सीलोन सुना जाता था । और या तो पिक्चर देखने या किसी होटल मे खाना खाने जाया जाता था। पर छुट्टियों मे या यूं भी कभी -कभी ताश भी खेला जाता था। आम तौर पर तो कोट पीस वगैरा ही खेला जाता था पर दिवाली मे फ्लश अरे वही तीन पत्ती या पपलू खेला जाता था।

हमारे बाबूजी (बाबा )को ताशखेलने का बहुत शौक़ था ,बाबूजी को क्या एक तरह से हम सभी को ताश खेलने मे बड़ा मजा आता था। कोट पीस मे चार लोग खेलते है ।दो-दो लोग पार्टनर बन कर एक टीम बन जाते थे। और हर टीम जीतने के सारे हथकंडे अपनाती थी।ताश के पत्तों मे spade (हुकुम )heart (पान ) diamond (ईट) club(चिड़ी) आप सब तो जानते ही होंगे ।जिसमे एक टीम पत्ते बांटती है तो दूसरी टीम trump बोलती हैजो टीम trump बोलती है उसे सात हाथ बनाने पड़ते थेजो टीम trump बोल कर लगातार पूरे सात हाथ बना ले और पत्ते बांटने वाली टीम कोई भी हाथ ना बना पाए तो फिर उस पत्ते बांटने वली (पीसने)टीम पर कोट हो जाता थापर अगर trump बोलने वाली टीम सात हाथ नही बना पाती थी तो फिर उसकी पीस हो जाती थीमतलब उसे पत्ते बांटने पड़ते थे

हम लोगों मे से जो भी बाबूजी का पार्टनर बनता था उसकी टीम जीत जाती थी क्यूंकि बाबूजी चाल चलते समय तरह-तरह के हिंट दिया करते थे।और सबसे मजेदार बात की हर बार हिंट को अलग -अलग अंदाज मे देते थे । जैसे अगर पान trump है और उनके पास हार्ट (पान) का सिर्फ एक पत्ता है तो चाल चलने के पहले वो अपने पार्टनर को हिंट देते तनहा टूटहूँ टूं कुछ ऐसा कह कर बताते थे जिसका मतलब होता था की अब उनके पास trump का दूसरा पत्ता नही है। अगर उन्हें क्लब (चिड़ी)की चाल चलवानी होती थी तो वो कहते थे की उड़-उड़ और उनका पार्टनर हम मे से जो भी होता वो समझ जाता था की क्लब की चाल चलनी है।इतना ही नही अगर बाबूजी को diamond (ईट ) की चाल चलवानी होती थी अपने पार्टनर से कहने लगते की घर बनाओ घरअगर उनके पास spade के अच्छे पत्ते होते तो कहते थे की डरो मत सब ठीक हैतो वही कई बार हार्ट (पान) के लिए कहने लगते की पान खाना अच्छी बात नही हैबस इतना सुनते ही उनका पार्टनर फौरन पान की चाल चाल देता थाकई बार तो चाल चलते हुए पत्ते ख़ूब जोर-जोर से पटकते थे जिसका मतलब होता था की फिर से उसी पत्ते की चाल चलो

पर खुदा ना खास्ता अगर उनका पार्टनर उनके दिए हुए हिंट से चाल नही चलता था तो वो अपने पार्टनर की ख़ूब खबर लेते थेपर कई बार ऐसा भी होता था की जैसे spade का उनके पास एक ही पत्ता है और उन्होने कहा तनहा टूटहूँ टूं पर फिर भी उनके पार्टनर ने दुबारा spade की चाल चाल दी तब तो पार्टनर की खैर नहीअगर जीत गए तो ठीक और अगर हार गए तो सारी गलती पार्टनर की

शुरू मे तो हम लोग कई बार समझ नही पाते थे पर बाद मे हम लोग उनके इस तरह से अपने पार्टनर को हिंट देने पर जब उन्हें कहते थे तो बाबूजी कहते की हमने कोई हिंट थोड़े ही दिया हैपर फिर भी हम लोगों को बाबूजी के साथ ताश खेलने मे ख़ूब मजा आता था


Wednesday, July 25, 2007

आज का दिन यानी की पच्चीस जुलाई को दो बिल्कुल विरोधी घटनाएं हुई है और दोनो घटनाएं हमारे देश की दो महिलाओं से जुडी है। एक मे महिला को उच्च सम्मान मिला तो दूसरे मे महिला को वो सम्मान नही मिला जिसकी वो हकदार है।

पहली महिला जिन्हे उच्च सम्मान मिला वो प्रतिभा पाटिल है जो शायद भारत की पहली महिला गवर्नर थी और वही प्रतिभा पाटिल आज भारत की पहली महिला राष्ट्रपति बनी और जिन्होंने आज राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण की है। ये हमारे देश के लिए गौरव की बात है।

और दूसरी महिला है किरण बेदी जो की देश की पहली महिला I.P.S.थी पर आज उन्हें दिल्ली का पुलिस कमिश्नर नही बनाया गया बल्कि उनकी जगह वाई .एस .ददवाल को दिल्ली का पुलिस कमिश्नर बनाया गया जबकि किरण बेदी ददवाल से दो साल सीनियर भी है। जो शायद शर्म की बात है।

इस तरह का दोहरा मापदंड रखने का क्या कारण है ?

Tuesday, July 24, 2007




ताज महल यूं तो हम सभी ताज महल के बारे मे जानते है। पर फिर भी आज हमने सोचा की क्यों ना ताज महल के बारे मे ही कुछ लिखा जाये । वो क्या है ना कि अभी हाल ही हम हमारी दीदी और बच्चे आगरा गए थे ताज महल देखने। ऐसा नही है कि हम पहली बार ताज महल देखने गए थे। इससे पहले भी कई बार हम ताज महल देख चुके है पर हर बार जब भी जाते है कुछ नया ही देखने को मिलता है। जैसे पहले तो कार बिल्कुल ताज महल के गेट तक जाती थी पर अबकी देखा कि सब कार ताज महल से करीब आधा कि.मी.पहले ही रोक दी जाती है और फिर वहां से बैटरी चालित बस से ताज महल के गेट तक जाना पड़ता है। क्यूंकि ये सुप्रीम कोर्ट का आर्डर है ताज महल को प्रदुषण से बचाने के लिए।बस गेट पर टिकट खरीदिये और चल दीजिए ताज महल देखने। तो हम लोगों ने भी अपनी कार पार्किंग मे छोडी और चल दिए बैटरी चालित बस से ताज महल के गेट पर ,वहां से टिकट लेकर जैसे ही सिक्यूरिटी चेक करा कर आगे बढ़े कि एक गाइड ने पूछा कि गाइड चाहिऐ क्या।

यूं तो हम सभी जानते है कि शाहजहाँ ने अपनी बेगम मुमताज महल के लिए ताज महल बनवाया था जो उनकी मुहब्बत की निशानी है। ताज महल सफ़ेद मार्बल से बनाया गया है पर क्या आप जानते है और अगर जानते भी है तो भी हम बता देते है कि ये सारा मार्बल शाहजहाँ ने खुद खरीदा नही था बल्कि राजस्थान के राजा ने उन्हें उपहार स्वरूप भेट किया था। खैर गाइड के पूछने पर हम लोगों ने सोचा की चलो इस बार गाइड के साथ-साथ ताज महल के बारे मे क्यों ना जान जाये। ऐसा सोचकर उस गाइड को साथ लिया और चल दिए चान्दिनी रात मे घूमने के लिए अरे मतलब चिलचिलाती धूप मे। हम लोग थोडा धीरे-धीरे चलते हुए फोटो ले रहे थे तभी गाइड ने कहा कि हम लोग थोडा तेज चले और वहां शेड मे खडे हो जाएँ तो वो हमे ताज महल के बारे मे बतायेगा। अब जब गाइड लिया था तो उसकी बात भी माननी थी सो हम लोग पेड़ कि छांव मे खडे मुख्य गए तो उसने बताना शुरू किया कि ताज महल के चार दरवाजे है। अकबरी गेट ,फतेहपुरी गेट,लेबर कॉलोनी गेट (जहाँ ताज महल बनाने वाले मजदूर रहते थे )और ईस्टर्न गेट । फिर उसने चारों ओर बनी एक सी ईमारत को दिखा कर बताया कि ये सराय की तरह है जहाँ बाहर से लोग आकर ठहरते थे।






मुख्य द्वार पर बने गुम्बद की ओर इशारा करते हुए कहा की ये देखने मे तो ग्यारह लग रहे है पर असल मे ये बाईस है क्यूंकि दरवाजे के दूसरी ओर भी ग्यारह बने हुए है।यहां से जैसे ही हम लोग मुख्य दरवाजे के अन्दर दाखिल हुए की गाइड ने हम लोगों को रोककर बताया की अगर सामने दिख रहे ताज महल को देखते हुए आगे की तरफ चलते है तो ऐसा लगता है की ताज महल पीछे जा रहा है। और अगर ताज महल को देखते हुए पीछे की तरफ चलते है तो ताज महल पास आता लगता है। अब जब गाइड ने ऐसा कहा तो जाहिर सी बात है की हम लोगों ने भी चलकर देखा और ये महसूस किया की ताज महल पास आता और दूर जाता लगा। ये कोई भ्रम था या कुछ और ये हम नही कह सकते है।ये फोटो मुख्य द्वार से खीची गयी है।



जब यहां से थोडा और आगे बढ़े तो गाइड ने एक बेंच दिखाई जहाँ बैठकर लोग फोटो खीचते और खीचाते है। और गाइड ने बताया की इस बेंच को प्रिंसेस डायना के नाम से जोडा गया है क्यूंकि जब वो भारत आयी थी तो उसने वहां दो घंटे तक फोटो खीचवायी थी। वहां से थोडा और आगे बढने पर उसने बताया की वहां पर सोलह बगीचे और चौव्वन फव्वारे है और ये सारे फव्वारे एक लाईन मे बने है।और जब हमने देखा तो पाया की वाकई मे सारे फव्वारे बिल्कुल एक सीध मे है।पर आश्चर्य की बात कि एक भी फव्वारा चल नही रहा था और जब गाइड से इसका कारण पूछा तो उसने कहा कि चूंकि अभी दो दिन पहले सफ़ाई हुई है इसीलिये नही चल रहा है। वैसे इससे पहले जब हम ताज महल देखने गए थे तो लोगों को फव्वारे के पानी मे पैर डालते देखा था जो ठीक नही था।

गाइड ने ताजमहल की बाउंड्री वाल को दिखाकर बताया की वो १३० फ़ीट उँची है । और ताज के ऊपर जो ब्रास लगा है उसकी ऊंचाई ३० फ़ीट है हालांकि वो देखने मे ज्यादा ऊंचा नही लगता है। फिर वहां से बाईस सीढियाँ (बिल्कुल खडी-खडी सीढियाँ )चढ़कर ऊपर पहुंचे तो वहां ताज के चारों ओर जो पिलर है उन्हें दिखाकर कर उसने बताया की ये पिलर थोड़े बाहर की ओर झुके हुए है जिससे अगर कभी कुछ हो जैसे भूकंप वगैरा तो ये पिलर बाहर की ओर गिरे जिससे ताज महल को कोई नुकसान ना हो। ताज महल के अन्दर अब तो सिर्फ शाहजहाँ और मुमताज महल की कब्र की रिप्लिका ही देखी जा सकती है क्यूंकि पहले जिन सीढ़ियों से नीचे जाकर उनकी कब्र देखी जाती थी वो सीढियाँ अब बंद कर दी गयी है। यूं तो बाहर बडे-बडे शब्दों मे लिखा है की ताज महल के अन्दर फोटो खीचना मना है पर लोग फोटो खीचने से कहॉ बाज आते है। अन्दर गाइड ने एक दीवार पर बने फूल को दिखाकर कहा ही बायीं ओर जहाँ उस फूल को सीधा बनाया गया है वहां तो ॐ लिखा लगता है और दाईं ओर जहाँ फूल को उल्टा बनाया है वहां अल्लाह लिखा हुआ लगता है।

ताज महल से बाहर निकल कर हम लोग पीछे की ओर गए जहाँ हम ऐसा कह सकते है की कभी यमुना बहती थी पर अब तो यमुना बस नाम की ही रह गयी है। यहां पर गाइड ने बताया की शाह जहाँ एक काला ताज महल भी बनवाना चाहता था पर औरंगजेब ने इसे रूपये की बर्बादी समझा । ताज महल के एक ओर मस्जिद है तो दूसरी ओर गेस्ट हाउस। ताज महल से जब बाहर के मुख्य द्वार की तरफ देखे तो बहुत ही सुन्दर नजारा दिखता है। जैसा की इस फोटो मे आप देख सकते है।

और हाँ उस गाइड का नाम राजू गाइड है और वो गाइड होने के साथ-साथ फोटो भी अच्छी खीचता है।

Friday, July 20, 2007

पापा

परिवार मे माता-पिता दोनो का समान स्थान होता है क्यूंकि अगर माँ घर बार संभालती है तो वो पिता ही है जिनकी वजह से हम बच्चों को सब सुख-आराम मिलते हैपिताजी,बाबूजी,पापा,ये सारे संबोधन हमे ये अहसास दिलाते है कि हमारे सिर के ऊपर उनका प्यार भरा हाथ है और हमे किसी भी बात की चिन्ता या फिक्र करने की कोई जरूरत नही है क्यूंकि जो भी चिन्ता या फिक्र है उसे पापा के पास से होकर गुजरना पड़ता है और हम बच्चों तक सिर्फ और सिर्फ खुशियाँ ही पहुंचती हैहमे अच्छी तरह से याद है कई बार लोग पापा से कहते थे कि भई तुम्हारे तो चार-चार लडकियां है कैसे करोगे तो पापा हमेशा हंस कर कहते थे कि जब भगवान् ने चार बेटियाँ दी है तो भगवान् ने कुछ सोचकर ही हमे चार बेटियाँ दी होंगीऔर उनका ऐसा जवाब सुनकर लोग चुप हो जाते थेक्यूंकि साठ के दशक मे चार-चार लडकियां का होना बहुत ख़ुशी की बात नही मानी जाती थीवैसे तो साठ के दशक मे क्या आज भी बेटियों को बोझ से ज्यादा कुछ नही समझा जाता हैआज भी लोग बेटियों की हत्या कर रहे है

बचपन से आज तक हम सभी भाई-बहन पापा से हमेशा ही ख़ूब बातेंकरते रहे है। हमे कभी याद नही है की पापा ने हम लोगों को कभी जोर से कुछ कहा हो। हाँ हम पाँचों मे से अगर कोई गलती करता था या है तो पापा उसे प्यार से समझा देते है। हमने कभी भी पापा को बहुत ग़ुस्से मे नही देखा है । हाँ मम्मी जब हम लोगों मे से कोई भी गलती करता था तो उसे समझाती थी और कभी-कभी डांटती भी थी। हम सभी भई-बहनों की आदत थी की जैसे ही पापा शाम को घर आते थे हम सब शाम की चाय पीने के बाद उनके कमरे मे एक साथ बैठकर गप्प मारा करते थे। जहाँ पापा अपने दिनभर के किस्सेसुनाते थे और हम सब अपनी स्कूल की बातें । ना तो पापा ने और ना ही मम्मी ने कभी ऐसा कहा की पापा थके हुए है अभी जाओ पापा को आराम करने दो बल्कि किसी दिन हम पाँचों मे से कोई उस बैठक मे ना हो तो पापा परेशान हो जाते थे की क्या बात है।और ये शाम की चाय और गप्प की आदत हम लोगों की अभी तक बनी हुई है। अपने घर मे भी हमने वही system रक्खा है जब हमारे पतिदेव घर आते है तो हम सब शाम की चाय एक साथ पीते है और गप्प मारते है.



पापा ने हम बच्चों से कभी भी दूरी बनाकर नही रक्खी और हम बच्चों ने भी कभी पापा को ऐसा मौका नही दिया जिससे उन्हें कोई दुःख हो। हम सभी भाई-बहनों को बिल्कुल छूट थी ,हम अपनी मर्जी से जो चाहे कर सकते थे ,जहाँ चाहे जा सकते थे । पापा को हम सभी पर पूरा विश्वास था और हम सबने का वो विश्वास कभी टूटने नही दिया। ऐसा ही एक किस्सा उस समय का है जब हमारी शादी तै की जा रही थी और हम मन ही मन थोडा डर रहे थे हालांकि ये डर बिल्कुल बेमानी था पर फिर भी एक दिन सुबह-सुबह जब पापा ऑफिस मे बैठे थे तो हम पहुंच गए उनके पास और उन्हें अपने मन का डर बताया जिसे सुनकर पापा ने हमे समझाया की इस तरह डरने वाली कोई बात नही है क्यूंकि लड़का मतलब हमारे पतिदेव और ससुराल वाले बहुत अच्छे है। और ये जरूरी नही है की अगर किसी के साथ बुरा हुआ है तो वहां शादी ही ना की जाये। और उन्होने प्यार से हमारे सिर पर हाथ फेरा और कहा की अब सब चिन्ता अपने दिमाग से निकाल दो। और आज हम अपने परिवार ,अपने पति और बच्चों के साथ बहुत खुश है।

आज मम्मी को गए हुए दो साल हो गए है पर अब पापा मम्मी की तरह ही हर तीज-त्यौहार पर हम सबको शगुन भेजते है। मई २००७ मे जब हम इलाहाबाद गए थे तो मम्मी की कमी तो बहुत थी पर पापा ने उस कमी को पूरा किया ।हम सबको अपने पापा पर गर्व है

Wednesday, July 18, 2007

ये चिठ्ठा जगत भी अजीब जगह है ये वो जगह है जहाँ हर कोई अपने मन की बात बेख़ौफ़ होकर लिख सकता है । जहाँ कोई भी अपना ब्लौग बना सकता है और उसपर हर रोज किसी भी विषय पर अपने विचार अपनी पोस्ट के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर सकता है। पर अपने विचार लिखकर पोस्ट कर देने मात्र से ही कुछ नही होता है। अगर कोई भी उसे पढ़ेगा नही तो फिर लिखने का क्या फायदा।और अगर किसे ने पोस्ट पढी और बस चुपचाप बिना कुछ कहे मतलब बिना टिप्पणी किये चला जाता है तो फिर उस पोस्ट को लिखने वाले को ये कैसे पता चलेगा की वो जो कुछ भी लिख रहा है वो लोगों को कैसा लग रहा है। लोग उसके लिखे को पसंद करते है या नही।क्यूंकि टिप्पणी ही एकमात्र ऐसा जरिया है जिसमे आप चिठ्ठा लिखने वाले की तारीफ (अगर मन हो तो ) कर सकते है और लिखने वाले की बुराई भी कर सकते हैपर यकीन मानिए ये टिप्पणियां ही लिखने वाले का हौसला बनाए रखती है इसका हमने अपनी ब्लॉगिंग के तीन महीने जिक्र भी किया था की उन शुरूआती दिनों मे उन्मुक्त जी की पहली टिप्पणी ने हमारी किस तरह से हौसला अफजाई करी थी



यूं जो भी इस चिठ्ठा जगत मे अपने चिठ्ठे लिखते है वो चाहे किसी भी साईट पर हो हमेशा ये जरूरदेखते है की किसी ने उसकी लिखी पोस्ट परटिप्पणी करी है या नही ,या कितने लोगों ने उसकी लिखी पोस्ट को पढा है । जो लोग पिछले कुछ सालों से चिठ्ठे लिख रहे है हो सकता भी एक इन बातों से कोई फर्क ना पड़ता हो ।पर अगर पोस्ट पर कोई टिप्पणी ना हो तो ये अफ़सोस होता है और ये भी लगता है की शायद हमने जो लिखा है वो इस लायक ही नही था की उस पर कोई टिप्पणी करें।ऐसा भी कई बार हमारे साथ हुआ है मतलब हमारी कुछ पोस्ट पर कोई टिप्पणी ही नही हैऔर अब जब आप लोगों द्वारा हमारी पोस्ट परटिप्पणी की जाती है तो ये हमारी खुशनसीबी है की हम जो कुछ भी लिखते है उसे आप लोग पढ़ते है और उस पर टिप्पणी भी करते हैआप सबकी जर्रानवाजी का शुक्रिया



हमारे जैसे नए चिट्ठाकारों को तो ऐसी टिप्पणियों का ही सहारा होता हैपर कई बार टिप्पणी पढ़कर दुःखी भी होते है जैसे एक बार हमने जब टेस्टिंग-टेस्टिंग की पोस्ट डाली थी क्यूंकि उस समय हमारे ब्लॉग मे कुछ प्रॉब्लम रही थी जिसे टेस्ट करने के लिए ही हमने वो टेस्टिंग वाली पोस्ट डाली थीतो कई लोगों ने टिप्पणी की थी ,काफी मजेदार टिप्पणियां थी पर एक टिप्पणी मे शायद दस बार हिट लेने का अच्छा तरीका हैये लिखा थाजिसे पढ़कर हमे बहुत दुःख हुआ था क्यूंकि एक तो हम बिल्कुल नए थे और दूसरे हमे इस सबके बारे ज्यादा पता नही थाक्यूंकि वो पोस्ट हमने हिट के लिए नही पोस्ट किया था बल्कि हमारे ब्लॉग मे कुछ प्रॉब्लम रही थीऔर इस प्रॉब्लम को चेक करने के लिए ही हमने टेस्टिंग-टेस्टिंग वाली पहली पोस्ट डाली थीऔर ये पढ़कर की हमने पोस्ट हिट के लिए लिखा है हमने कुछ ग़ुस्से और दुःख मे अपनी वो पोस्ट ही हटा दी और एक और पोस्ट सिर्फ एक लाईन टेस्टिंग-टेस्टिंग नाम की पोस्ट लिखीऔर इस एक लाईन की पोस्ट पर समीर जी की टिप्पणी थीउस समय तो हमने पोस्ट हटा दी पर बाद मे हमे इस पोस्ट को हटाने का बड़ा दुःख हुआ ,क्यूंकि ये तो बाद मे समझ आया की हर पोस्ट और उसपर की गयी टिप्पणी का कितना महत्त्व है



ओह्हो अभी भी नही समझे ,अरे भाई आप सबकी टिप्पणियों की बदौलत हमने भी सौ नम्बर पा लिए है

Sunday, July 15, 2007

अभी हमने जब नारद की साईट खोली तो लो भईया हम तो दंग ही रह गए की अभी तक हमारी तीन पोस्टों मे से एक भी पोस्ट आख़िर क्यों नही नजर आ रही है। पर खैर अब ये हमारे हाथ मे तो है नही। तो बाक़ी लोगों के ब्लॉग पढने के बाद हम यूं ही टहल कदमी करते हुए नारद रेटिंग पर देखने लगे की यहां पर क्या है तो पाया की वहां सभी चिट्ठाकार जो नारद पर रजिस्टर्ड है उन्हें रेटिंग दी गयी है । और चिट्ठों की अलग-अलग श्रेणी बनायी गयी है और उनको अलग-अलग नम्बर देकर रेटिंग की गयी है। जो की काबिले तारीफ है।

यूं तो ये बहुत ही अच्छा है पर यही पर आता है एक पेंच वो ये है कि और तो सारे चिट्ठाकारों के नाम काली इंक मे लिखे है पर कुछ चिट्ठाकारों जैसे घुघुती वासूती ,notepad ,और mamta t.v.कुछ नारंगी से लिखा है । पर बहुत सोचने पर भी हमारी समझ मे ये नही आया की आख़िर ऐसा क्यूं है।फिर लगा कि हो सकता है कि महिला होने के नाते हम लोगों को इस तरह से लिखा गया है । पर अगर ऐसा इसलिये है की हम तीनो महिला है तो फिर अन्य महिला चिट्ठाकार के नाम भी नारंगी रंग मे क्यूं नही लिखे गए है। और विनय पत्रिका को नारंगी रंग से क्यूं लिखा है ?

हो सकता है आपको ये वाहियात सवाल लगे पर चुंकि हम ब्लॉगिंग के क्षेत्र मे नए है इसलिये जिज्ञासावश ये सवाल पूछ रहे हैउम्मीद करते है कि किसी को हमारा ये सवाल पूछना खराब नही लगेगापर हम इसकी वजह जरूर जानना चाहेंगेअगर आप जानते है तो कृपया बताइये

आप यही सोच रहे है ना कि भाई हम पर आख़िर शनि महाराज का कैसे प्रभाव पड़ा है। अलग-अलग लोगों ने शनि के बारे मे ख़ूब लिखा है जैसे सुजाता जी ने कई बार शनि की दशा के बारे मे लिखा है तो कल की ब्लॉगर मीट मे हमारे ना पहुँचाने के पीछे कहीँ शनि का तो कुछ प्रभाव नही था। अब पिछले कई दिनों से सभी न्यूज़ चैनल शनि के प्रभाव के बारे मे बता रहे है कि कैसे शनि हमारी राशियों पर असर डाल रहा है। और हमे अपनी शनि की दशा ठीक रखने के लिए क्या-क्या करना चाहिऐ। कौन से stone पहनने चाहिऐ ,वगैरा-वगैरा। पर हमने इन बातों पर ध्यान ही नही दिया और उसका नतीजा की हम कल की ब्लौगर मीट का मीट चखने से रह गए।

अब देखिया ना कल हमने सुबह-सुबह अरे मतलब ब्लॉगर मीट मे जाने से पहले एक पोस्ट मायाबंदर नाम से लिखी थी ,अब इतने दिनों मे तो आप जान ही गए है की बिना पोस्ट लिखे तो चैन आता नही है तो सोचा जाने के पहले ही पोस्ट लिख दी जाये। पर हमे क्या पता था की हमारी तो शनि की दशा ही खराब है। क्यूंकि आज सुबह तक वो पोस्ट नारद पर दिखाई नही दे रही है इसलिये आज हमने उसे तारीख बदल कर दूबारा पोस्ट किया है। वैसे कल शायद नारद के ऊपर भी शनि भारी था क्यूंकि शाम तक तो नारद पर कोई अपडेट ही नही दिख रहा था। 14.july की सिर्फ एक पोस्ट जो कि आलोक ने लिखी थी वही सारे दिन दिख रही थी बाक़ी सारी पोस्ट 13.july की दिख रही थी।


उसके बाद जो हमारे साथ हुआ अरे वही जो हम सबसे मिल नही पाए वो भी शायद क्या यक़ीनन शनि का ही प्रभाव था। वैसे यहां हम एक बात और कहना चाहते है आम तौर शनि महाराज की हम पर कृपा ही रहती है पर कल ही गड़बड़ हो गयी। कैसे अरे धीरज रखिये हम बता रहे है । कल जब सी.पी.से हम वापिस आये तो जैसा की आप लोग कहते है ना की मन की भड़ास ब्लॉग पर निकाल देनी चाहिऐ तो हमने भी वही किया । अपनी सारी दास्ताँ अपने ब्लॉग पर लिख दी पर ये क्या जैसे ही हम पोस्ट करने चले कि हमारा कंप्यूटर ही बंद हो गया वो तो भला हो आटो सेविंग का जिसने हमारी पोस्ट लिखने की मेहनत पर पानी नही फेरा । तो अब समझ गए ना की शनि की हम पर कैसे कृपा रहती है।

पर शनि का प्रभाव यही पर नही ख़त्म हुआ आज सुबह जब अपना ब्लॉग देखा तो उसमे दस टिप्पणी दिख रही थी जो आप सबने की थी पर जब हमने नारद देखा तो हम फिर चौंक गए और ये भी समझ गए कि लगता है अभी शनि का प्रभाव हम पर चल रहा है । ओह्हो नही समझे भाई आज भी नारद पर हमारी क्या ख़ूब रही दिल्लीकीब्लौगर मीट वाली पोस्ट भी नारद से नदारद थी और बरबस हमारे मुहं से निकल गया नारायण-नारायण ।

इस पोस्ट को लिखने के पहले हमने अपनी पिछली दोनो पोस्ट क्या ख़ूब ....और मायाबंदर फिर से आज की तारीख यानी 15.july को इस उम्मीद मे ये सोचकर पोस्ट की है भाई आज तो सन्डे है तो शायद शनि का प्रभाव ख़त्म हो गया हो। लीजिये इस पर वो कहावत याद आ गयी की उम्मीद पर दुनिया कायम है

आज सुबह यानी 14.7.07 को दिल्ली मे ब्लॉगर मीट होनी थी और उसमे हमने भी जाने के लिए अपनी सहमति जताई थी और हम पूरी तरह से तैयार भी थे। और चुंकि मिलने की जगह जैसा की अमित ने लिखा था या तो पैट्रोल पम्प या mcdonald पर इकट्ठा होकर सभी लोग ग्यारह बजे सरवना पहुंचेंगे। हमने भी अपनी इस ब्लॉगर मीट का सबसे ख़ूब बखान किया था की इस बार हम दुसरे ब्लॉगर से मिलेंगे।ख़ूब ढिंढोरा पीट रखा था

आज सुबह जब हमने अपना ब्लोग देखा तो उसमे मसिजीवी जी ने टिपण्णी के साथ एक लिंक जो की ब्लॉगर मीट के संबंध मे था हमारी पोस्ट पर छोड़ा था। हमने लिंक खोलने की कोशिश की पर असफल रहे तो हमने मसिजीवी जी को मेल भेजा और उनसे कहा की चुंकि जो लिंक उन्होने पोस्ट पर लगाया था वो खुल नही रहा है इसलिये जो भी बात है वो हमे मेल कर दे क्यूंकि हमे लग रहा था की कहीँ मिलने की जगह ना बदल गयी हो। पर हमे कोई जवाब नही मिला तो हमने सोचा की venue तो वही होगा । आज हमारे छोटे बेटे का जन्मदिन भी है इसलिये हमने सोचा की जब हम सब ब्लॉगर मिल रहे है तो सबको केक खिलाया जाये क्यूंकि ऐसे मौक़े बार-बार कहॉ आते है।


तो भाई हम भी सुबह उठकर तैयार होकर सवा दस बजे निकले पर केक की दुकान पर थोडा समय लग गया और हमे जनपथ पहुँचते-पहुँचते ग्यारह बज रहे थे तो इसलिये हम सीधे सरवना पहुंच गए क्यूंकि सबको ग्यारह बजे सरवना जो पहुंचना था पर ये क्या वहां तो कोई भी नजर नही आया ।हम तीन-चार बार अन्दर भी देखने गए और बगल मे जो mcdonald है वहां भी दो-तीन बार देखा पर कोई भी नही दिखा। तो हम अपनी कार मे बैठे रहे इस इन्तजार मे की कोई तो सरवना मे आएगा । पर करीब पौने बारह बजे हमारा धैर्य जवाब दे गया और हमने वापस आने का सोचा । तब हमारे ड्राइवर ने कहा की मैडम एक और सरवना है वहां देख लीजिये तो हम वहां भी गए पर वहां भी कोई नही दिखा। तो फिर हमने घर लौटने मे ही भलाई समझी । हो सकता है बाक़ी लोग एक-दुसरे को पहचानते होपर हम ना तो किसी को पहचानते थे और ना ही किसी का मोबाइल नम्बर हमारे पास था

वो कहते है ना की हम जब कोई गलती करते है तो उससे कुछ सीखते है तो इससे हमे एक सबक मिला की अगर आगे कभी भी कोई ब्लॉगर मीट होगी तो कम से कम एक का नम्बर तो जरूर ले लेंगेवैसे जो भी ब्लॉगर मीट organise करता है उसे कम से कम अपना contact नम्बर जरूर देना चाहिएअब बाक़ी की मीट का हाल आपको और लोग बताएँगे

चुंकि हमारी ये पोस्ट १४..०७.मे नही दिख रही है इसलिये हम इसे दूबारा पोस्ट कर रहे है



नाम पर मत जाइए क्यूंकि यहां ना तो माया (शोर-शराबा )है और ना ही बन्दर ,ये अंडमान का एक छोटा द्वीप या आप इसे एक बहुत- बहुत ही छोटा सा शहर भी कह सकते है। मायाबंदर पोर्ट ब्लेयर से करीब २३० कि.मी.कि दूरी पर है और वहां सड़क के रास्ते और समुन्दर के रास्ते से जा सकते है सड़क के रास्ते जाने के लिए ए.टी.आर से जाना पड़ता है । यूं तो ढाई सौ किलोमीटर की दूरी आराम से तीन या ज्यादा से ज्यादा चार घंटे मे तै कर सकते है पर अंडमान मे ऐसा नही है । यहां पर हम अपनी मर्जी से बिल्कुल भी नही चल सकते है। ये ढाई सौ किलोमीटर की किलोमीटर की दूरी तै करने मे कम से कम नौ घंटे लगते है और कई बार तो ज्यादा भी लग सकते है। इतना समय इसलिये लगता है क्यूंकि एक तो पहले जंगल को पार करना होता है जैसा की हमने पहले भी बताया है की जंगल पार करने के लिए convoy के साथ चलना पड़ता है और दो क्रीक भी पार करनी पड़ती है। और रास्ता ऊंचा -नीचा माने चढ़ाई पड़ती है और कई बार बारिश मे सड़कें भी खराब होती है।

अगर पोर्ट ब्लेयेर से सुबह पांच बजे चले तो पहले convoy मे जा सकते है और फिर नाम कुछ भूल रहे है शायद सदर्न क्रीक पर vehicle ferry जल्दी मिल जाये । हम लोग तो हमेशा पांच या साढे पांच बजे घर से निकलते थे जिससे पहले convoy मे जंगल पार करें और ferry भी मिल जाये। पहली क्रीक पार करने के बाद करीब पच्चीस या तीस कि.मी.बाद दूसरी क्रीक शायद गाँधी घाट आती है और अगर वहां ferry जल्दी मिल जाती है तो मायाबंदर पहुँचने मे समय थोडा कम लगता है। एक jetty पर दो या तीन ferry ही होती है और चुंकि वहां पर लोकल लोग या तो बस से सफ़र करते है या बोट से। इसलिये वहां के प्रशासन का आदेश है कि ferry पर पहले बस जायेगी उसके बाद गाडियां । इसीलिये अक्सर क्रीक पार करने मे थोडा ज्यादा समय लगता है। हालांकि क्रीक पार करने मे मुश्किल से दस मिनट भी नही लगते है। पर फिर भी मजा आता है और सबसे मजा तब आता है जब दो ferry एक-दूसरे को क्रॉस करती है।

रंगत से जब मायाबंदर जाते है तो थोड़ी दूर तक समुन्दर भी साथ-साथ चलता है बीच-बीच मे पेड़ों के झुरमुट मे से चमकता हुआ पानी (अगर धुप तेज हो )और दूर जहाँ तक नजर जाती है बस समुन्दर ही दिखाई देता है। थोड़ी दूर पर एक काली माँ का मंदिर है और वहां के पुजारी इतने सीधे कि एक बार हम लोग वहां दर्शन के लिए गए तो मंदिर मे ताला लगा देखा । हम लोगों को देखकर पुजारी जी ने बड़ी ही सादगी से कहा कि आज आप लोग बाहर से ही दर्शन कर लीजिये क्यूंकि उन्हें कहीँ जाना था,इसलिये वो मंदिर मे ताला लगा कर जा रहे है। कहने का मतलब है कि वहां के लोग सीधे होते है और जो बात है उसे बिल्कुल बिना हिचक बता देते है।

रास्ते मे पंचवटी पड़ता है जहाँ एक बहुत ही छोटा सा waterfall पड़ता है । ये फोटो वहीँ की है। अंडमान की एक खासियत ये भी है की वहां कुछ नाम मिलते जुलते से होते है। जैसे जब दूसरी क्रीक पार करते है तो पहले कदमतला आता है फिर और ऐसे ही कई नाम जैसे निम्बुतला, फूलतला और फिर शुरू होते है डेरा जैसे निम्बुडेरा वगैरा। मायाबंदर पहुँचने से करीब दस -पन्द्रह कि.मी.पहले से बर्मीज लोग दिखने शुरू हो जाते है। और वहां से गुजरते हुए ये अहसास होता है कि मानो बर्मा का कोई छोटा सा गाँव हो। बर्मीज अभी भी वहां रहते है,उनके कपडे पहनने का ढंग ,बोलचाल बिल्कुल वैसा ही है।गेस्ट हाउस से ही कुछ सीढियाँ नीचे उतरकर ये जगह बनी है जहाँ बैठकर आप विभिन्न प्रकार की मछलियाँ देख सकते है क्यूंकि पानी बहुत ही साफ होता है

यूं तो मायाबंदर मे कुछ खास नही है सिवाय a.p.w.d.के गेस्ट हाउस के जो कि बहुत सुन्दर है और नजारा तो अंडमान मे आप जहाँ खडे हो जाएँ सुन्दर ही दिखता है।चुंकि यहां और कोई अच्छी जगह नही है ठहराने के लिए इसलिये गेस्ट हाउस मे पहले से बुकिंग करनी पड़ती है
वैसे आस-पास छोटे-छोटे island है अगर कोई चाहे तो जा सकता है तो सवाल ये उठता है की फिर हम क्यों नही गए तो वो इसलिये की वहां जो डोंगी (बोट)चलती है जैसी अपने इलाहाबाद मे संगम पर नाव चलती है तो हमे उसमे बहुत डर लगता है क्यूंकि वहां समुन्दर ज्यादातर रफ ही रहता है। यहां का karmateng bay तो कुछ खास नही है है पर वहां की ड्राइव जरूर बहुत अच्छी हैबस गेस्ट हाउस मे बैठे और प्रकृति को enjoy करें

Thursday, July 12, 2007

हँसना एक ऐसी अभिव्यक्ति है जिससे हम अपने मन के भावों को दर्शाते है। हर व्यक्ति का अपना हंसने का स्टाइल होता है और कई बार लोग अपने हंसने के स्टाइल से ही जाने जाते है। अब आप लोग ये तो जरूर सोच रहे होंगे की लगता है हमने हंसने पर रिसर्च तो नही की है तो अब ये तो आप पर निर्भर करता है ,वैसे अगर आप इसे हमारा शोध कार्य मानते है तो भी कोई बात नही। लो जी अभी तो हमने शुरू भी नही किया और आप हंसने लगे ,ये अच्छी बात नहीहै


वैसे आपको जानकार थोडा या शायद ज्यादा आश्चर्य होगा की अंडमान और गोवा मे लोग बहुत ज्यादा हँसते नही है मतलब जो लोकल लोग है। अब क्यूं ये तो वो लोग ही जाने।हम कोई बुराई नही कर रहे है पर ऐसा ही है। पर हम जैसे लोगों के लिए क्या गोवा और क्या अंडमान सब जगह हँसते हुए ही समय बिताते है । क्यूंकि कहते है ना की हँसना सेहत के लिए अच्छा होता है।आज की भाग-दौड़ की जिंदगी मे तो लोग जैसे हँसना भूलते ही जा रहे है वो क्या है ना समय नही हैसुबह से रात तक सिर्फ और सिर्फ काम और टेंशनजो लोग ऑफिस जाते है उन्हें दुनिया भर के टेंशन और जो घर मे रहते है हम जैसे लोग उन्हें भी टेंशनअरे हमे किस बात का टेंशन तो भाई एक नही हजार टेंशन होते है घर मे रहने वालों केअब कहॉ तक गिनाएबाक़ी आप लोग तो खुद ही समझदार है


जैसा की हमने कहा की हरेक का हंसने का अपना स्टाइल नही मेरे ख़्याल से ट्रेडमार्क होता है
कोई व्यक्ति ख़ूब जोर-जोर से ठहाके लगा कर हँसता है तो कोई हलके से । कुछ लोग बड़ी अजीब-अजीब आवाज निकाल कर हँसते है कुछ ऐसी आवाज की जिसको सुनकर दूसरों को और हंसी आ जाती है। कुछ लोग सिर्फ हलके से मुस्कराकर भी काम चला लेते है अरे भाई हंसने के कोई पैसे थोड़े ही देने है । मुफ़्त है दिल खोल कर हंसो।
पर नही

ठहाके लगाने वाले ऐसे ही एक व्यक्ति हम लोगों के दोस्त है जो अगर किसी पार्टी मे हो तो आप फौरन उनके हंसी के ठहाके से पहचान लेगे। और एक और है जो की हँसना शुरू करते है तो इतनी ईईईईइ लंबी सांस खीचकर हँसते है की तब तक बाक़ी लोग हंस कर चुप हो चुके होते है। पर ये उनका स्टाइल है ऐसे ही हमारे एक मामाजी है वो तो इतनी जोर से हँसते थे की पूरा घर ही हिल जाये। हमारे ताऊ जी जिन्हे हम लोग दादा कहते थे वो बहुत जोर -जोर से हँसते थे और चुंकि दादा थोड़े मोटे थे तो जब वो हँसते थे तो उनका पेट भी जोर-जोर से हिलता था और हम सब बच्चों को ये देख कर बड़ा मजा आता था की हंसने से भी पेट हिल सकता हैताऊ जी बनारस मे रहते थे और रोज सुबह संस्कृत युनिवर्सिटी टहलने जाते थे और जब हम लोग बनारस जाते थे तो हम बच्चे भी उनके साथ टहलने जाते थेवहां टहलने के बाद दादा अपने दोस्तो के साथ ख़ूब जोर-जोर से हँसते थेहा-हा-हा और हम बच्चों को लगता था की जब हम लोग घर मे यूं ही इतना हँसते है तो फिर यहां आकर हंसने की क्या जरूरत हैहा-हा-हा-करते थे औरचूंकि हम सब छोटे बच्चे थे तो हमने उनसे पूछा की हंसने के लिए पार्क मे आने की क्या जरूरत हैतो उन्होने कहा की ऐसे जोर-जोर से हंसने से blood circulation बढ़ता हैखैर उस समय तो हम लोगों को ये बात समझ नही आयी थीबाद मे जब हमने दिल्ली के लाजपत भवन मे योगा सीखा था तो वहां पर अंत मे सभी से हाथ ऊपर उठाकर जोर-जोर से हंसने को कहते थेहम लोगों को लगता था की ऐसे हंसने से भला क्या होगा पर उस teacher का कहना था की इससे blood circulation बढ़ता हैआप किसी भी पार्क मे सवेरे-सवेरे चले जाये लोग एक गोले मे खडे होकर हँसते हुए दिख जायेंगे वो चाहे बचपन का बनारस हो या चाहे आज का इलाहाबाद या फिर दिल्ली ही क्यों ना हो


आजकल तो हंसी मे भी मिलावट सी होने लगी हैअब सिद्धू और अर्चना पूर्ण सिंह को ही देख लीजियेअब आप कहेंगे की हंसने मे ये दोनो कहॉ से गए और अगर आये भी तो ये दोनो बहुत हँसते हैपर क्या उनकी हंसी कुछ बनावटी नही हैदोनो मे होड़ सी लगी है कि कौन ज्यादा जोर से हँसता हैतो ऐसा है अभी तक स्टार वन पर आने वाले कार्यक्रम लाफ्टर चैलेंज मे सिद्धू जो की बेतहाशा और फालतू मे ही बनावटी हंसी हँसते थे उनका एकछत्र राज्य था हंसने मे पर अब उनको अर्चना पूरण सिंह सोनी पर जो कॉमेडी सर्कस आता है उसमे हंसने का चैलेंज दे रही है अरे मतलब की कौन कितनी जोर से हँसता है और कितनी देर तक हंस सकता हैकमाल तो ये है की सिद्धू के साथ शेखर सुमन को जैसे कम हंसी आती है वैसे ही अर्चना के साथ सतीश शाह को भी कम हंसी आती हैपर दाद देनी पडेगी सिद्धू और अर्चना की

जो मासूमियत बच्चों की हंसी मे होती है वो बडों की हंसी मे क्यों नही होती है ?


हम सभी के अन्दर एक बच्चा छिपा रहता है बस उसे पहचानने की देर है और फिर देखिए हंसने के बहाने यूं ही मिल जायेंगे

Wednesday, July 11, 2007

अब मुगल-ए-आजम के बाद नया दौर को भी black and white से बदल कर रंगीन मतलब कलर कर दिया गया है। मुगल-ए-आजम को तो लोगों ने black and white मे जितना पसंद किया था उतना ही कलर मे भी पसंद किया । और आज की जेनरेशन को ऐसी क्लासिक फ़िल्में दिखाने के लिए b&w की बजाय उन्हें कलर मे दिखाना जरूरी है क्यूंकि black and white मे तो फिल्म देखना उनके लिए एवरेस्ट की चढ़ाई से कम नही होगा ।


नया दौर जो 1957 मे बनी थी वो उस ज़माने की बहुत बड़ी हिट फिल्म थी । हमने तो ये फिल्म काफी बाद मे देखी अरे भाई उस समय हम पैदा जो नही हुए थे। बी.आर.चोपडा की इस फिल्म ने जो संदेश उस समय दिया था वो आज के समय मे भी उतनी ही वकत रहता है। उस समय की ये एक क्रांतिकारी फिल्म मानी गयी थी जैसा की इसके नाम से ही जाहिर होता है नया दौर ।


फिल्म के कलाकारों की बात करें तो कोई भी किसी से कम नही ,वो चाहे दिलीप कुमार हो या वैजन्तिमाला या अजीत।दिलीप कुमार की तो यही खास बात थी की वो रोल मे बिल्कुल डूब जाते थे । वैजन्तिमाला की सुन्दरता और बड़ी-बड़ी ऑंखें मट्काना ही उनकी खासियत नही थी बल्कि वो एक्टिंग भी बहुत अच्छी करती थी। और गाँव का माहौल बिल्कुल सादगी भरा हाँ जीवन अपनी कारस्तानियों से (मतलब ख़ून चूसने वाले जमींदार ) बाज नही आते थे । जीवन जैसे लोग हर गाँव मे हमेशा मौजूद रहते है पहले भी थे और आज भी है। और शायद हमारे गांवों की हालत आज भी वैसी ही है।

गाने तो इस फिल्म के सदाबहार है। हरेक गीत के बोल सुनने मे जितने सरल है उनका अर्थ उतना ही गूढ़ है। हर गाना एक अलग ही अंदाज मे गाया गया है । ओ .पी .नय्यर का संगीत इस फिल्म मे चार चांद लगा देता है। कोई भी गाना जैसे साथी हाथ बढाना साथी हाथ बढ़ाना साथी रे, या फिर ये गाना ये देश है वीर जवानों का
एक क्या इस फिल्म के तो सारे गाने ही बहुत अधिक लोकप्रिय हुए थे । क्या इन गानों को हम भूल सकते है - उड़ जब-जब जुल्फें तेरी , या माँग के साथ तुम्हारा मैंने माँग लिया संसार । देश भक्ती , शरारत या छेड़-छाड़ या प्यार का इजहार इन गानों मे वो सभी कुछ है और सुनने मे इतने मीठे की बस। वैसे अभी एक दिन उड़े जब-जब जुल्फें का रीमिक्स देखा और देख कर बहुत अफ़सोस हुआ कहॉ दिलीप कुमार और वैजन्तिमाला पर फिल्माया हुआ गाना और कहॉ रीमिक्स।


पर बात वही है की आज की जेनरेशन को पुराना वाला उड़े जब -जब जुल्फें तो पता नही होगा पर ये रीमिक्स वाला उड़े जब-जब जुल्फें जरूर पता होगा। तो इसलिये पुरानी अच्छी क्लासिक फिल्मों को कलर मे करके नयी जेनरेशन को दिखाना बेहतरीन आईडिया है क्यूंकि वो कहते है ना की किसी भी चीज़ का प्रेजेंटेशन अच्छा होना चहिये। और प्रेजेंटेशन का मतलब आज के समय मे शो बाजी हो गया है।

Tuesday, July 10, 2007

गरमी की छुट्टियाँ जिंदगी मे एक अलग ही मायने रखती है। हम चाहे किसी भी उम्र के हो पर गरमी की छुट्टियों का बड़ी बेसब्री से इन्तजार करते है। जब हम छोटे थे तो गरमी की छुट्टियों का बहुत इन्तजार करते थे क्यूंकि इन्ही छुट्टियों मे हम नानी के घर फ़ैजाबाद जाते थे .और अगर नानी के घर नही गए तो या तो कोई ना कोई मौसी या मामा इलाहाबाद आ जाते थे या फिर हम लोग जाते थे। और जहाँ सारे मौसी-मामा के परिवार इकट्ठा हुए और सबके बच्चे तो किसी और की जरूरत ही नही रहती थी अरे मतलब कम से कम पांच बच्चे तो होते ही थे। और हमारी मम्मी सात भाई-बहन थे तो आप अंदाजा लगा ही सकते है। पर जो भी हो उतने सारे लोगों मे जो मौज-मस्ती और लड़ाई -झगडे होते थे की मम्मी और मौसी लोग कई बार परेशान हो जाती थी और कई बार हम लोग को कहा जाता था की अगर तुम लोग झगड़ा करा करोगे तो हम लोग एक साथ नही आया करेंगे। बस उन के इतना कहते ही हम सब बिल्कुल अच्छे बच्चों की तरह मिल जाते थे.पर ज्यादा देर नही। हमारी और छोटी मौसी की बेटी नंदा जो हमसे दो साल छोटी थी ,हम दोनो का आपस मे ख़ूब युद्घ होता था और दोस्ती भी बहुत रहती थी। अब युद्घ तो नही होता है पर दोस्ती आज भी है।


ऐसा नही था की तब गरमी कम पड़ती थी तब ना तो a.c.था और ना ही टी.वी.और कंप्यूटर पर तब हम लोग दिन मे ताश खेला करते थे और हम लड़कियों का तो मम्मी लोगों की साड़ी पहनना ही पसंदीदा काम होता था। जहाँ मम्मी की आंख लगी अरे मतलब की सोई , की चुपके से साड़ी निकाल कर हम सब तैयार।

ताश खेलना तो कई बार मुश्किल हो जाता था क्यूंकि हर कोई खेलना चाहता था पर कोट पीस मे तो सिर्फ चार लोग ही खेलते थे और अगर बडे खेल रहे हो और छोटों को ना खिलायें तो भी मुसीबत। नानी हम सब छोटे बच्चों को अपने पास बुलाकर कहानी सुनाया करती जिससे की और लोगों को हम लोग तंग ना करें। पर कहानी मे भी कई बार लफड़ा हो जाता था क्यूंकि अगर हम लोग नानी से दिन मे कहानी सुनाने को कहते तो नानी बडे प्यार से हम बच्चों को ये कहकर टाल देती कि अगर दिन मे कहानी सुनोगे तो मामा घर का रास्ता भूल जायेंगे ।

jeep मे अयोध्या घूमने जाना आज भी याद है उस समय अयोध्या मे आज की तरह के हालात नही थे आराम से जाओ घूमो और भगवान के दर्शन करो।नानी के यहां सत्तू पीने और खाने का भी बड़ा रिवाज था वो कहती थी की सत्तू ठंडक देता है और लू से भी बचाता हैगरमी मे खाने की बात हो और आम का जिक्र ना आये ऐसा तो हो ही नही सकताऔर आम भी बाजार के नही नाना के बगीचों के आम और बहुत बार तो हम लोग खुद बाग़ मे जाकर आम तोड़ते थेकई बार क्या बचपन मे तो अक्सर ही कच्चे आम खाने से दाने हो जाते थेपर कच्चे आम खाने से बाज नही आते थे


गरमी की रात मे सभी लोग छत पर अन्ताक्षरी खेला करते थे और अन्ताक्षरी एक ऐसा खेल है जिसे हर कोई चाहे वो बड़ा हो या बच्चा खेल सकता था। बहुत बार मौसी और मामी ,मामा भी खेलते थे पर वो लोग आपस मे बात करना ज्यादा पसंद करते थे तब हमे लगता था की आख़िर मम्मी लोग इतनी क्या बातें करते है पर बाद मे माने अब जब हम सब की शादी हो गयी है और अब हम सब भाई-बहन जब भी मिलते है तो बातें करना ज्यादा अच्छा लगता है।और गरमी की छुट्टियाँ किस तरह बीत जाती पता ही नही चलता था

कल दोपहर से शाम तक सारे न्यूज़ चैनल मे होड़ लगी थी की करनाल मे जो आसमान मे चमकती हुई चीज दिखी थी वो क्या है। करीब दो बजे दिन से स्टारन्यूज ब्रेकिंग न्यूज़ मे आसमान मे अनहोनी देखिए तीन बजे दिखा रहा था तो आज तक भी यही दिखा रहा था। तीन-चार घंटे तक यही नाटक चलता रहा। स्टार न्यूज़ वाले जहाँ करनाल के लोगों से जिन्होंने इस चमकती हुई चीज को देखा था उनसे बात कर रहे थे ,और हर इन्सान अपने-अपने हिसाब से उसका वर्णन कर रहा था साथ ही वैज्ञानिकों से भी बात कर रहे थे। और ये साबित करने मे लगे थे की आसमान मे अनहोनी घटना हुई है। पर वो लोग डी.एम्.की बात को उतना तवज्जोह नही दे रहे थे जो यह कह रहा था की ऐसा कुछ नही है। हालांकि आजतक ये कह जरूर रहा था की अफवाहों पर ध्यान ना दे ऐसा कुछ भी नही है। पर बीच-बीच मे ये कहने से भी नही चुकते थे कि आसमान मे कोई अनहोनी और अदभुत घटना हो गयी है। आज तक पर तो एक वैज्ञानिक ने ये तक कह दिया की मीडिया को ऐसी बातों को बढावा नही देना चाहिऐ पर मीडिया की सेहत पर कहॉ कोई फर्क पड़ता है। जब देखो तब ऐसी ही खबर दिखा देता है।


अभी चंद रोज पहले इंडिया टी.वी.ने एक बिना ड्राइवर के चलती हुई कार दिखाई थी उसमे भी ड्रामा शायद तीन-चार घंटे चला था।पहले तो हम ने देखा नही पर शाम को छे बजे जब टी.वी. चलाया तो फिर से यही न्यूज़ देख कर हम भी देखने लगे क्यूंकि जब टी.वी.चलाओ यही न्यूज़ दिखायी जा रही थी और तो और उन्होने लोगों से ये तक कहा की वो उन्हें फ़ोन करें और बतायें की कार कैसे चल रही है।टी.वी.मे कार के साथ दो आदमी भी दौड़ते हुए दिखाए जा रहे थे। बस फिर क्या था हर इन्सान अपनी समझ और सोच से बताने लगा । कोई बोला की ये रिमोट कण्ट्रोल से चल रही है तो किसी ने कहा की कोई सोफ्टवेयर डाला गया है और कई लोगों ने कहा की जो दो आदमी दौड़ रहे है वो इसे रिमोट से चला रहे है। जब लोगों ने ये कहा तो थोड़ी देर बाद उन दोनो को कार की छत पर बैठा दिखा दिया और न्यूज़ रीडर कहने लगे की अब जब ये दोनो छत पर है तो फिर कार कैसे चल रही है। वैसे कार की एक ही क्लिपिंग बार-बार दिखाते रहे थे।

पूरे समय दोनो न्यूज़ रीडर कहते रहे की अब थोड़ी देर मे खुलासा हो जाएगा की कार अपने आप कैसे चल रही है ।
इस तरह फ़ाइनल ड्रामा करीब एक घंटे तक चला और जैसी की मनुष्य की प्रकृति है हर चीज का अंजाम जानने की तो इसलिये हम भी टी.वी.देख रहे थे और अंत मे उन्होने ये खुलासा किया की जो आदमी कार के साथ दौड़ रहे थे वही दोनो कार चला रहे थे . और ये खुलासा हुआ उसे देखकर तो न्यूज़ चैनल वालों पर बहुत ग़ुस्सा आया की किस तरह ये अपनी टी.आर.पी.बढ़ाने के लिए लोगों को बेवकूफ बनाते है। ग़ुस्सा इसलिये आया की क्यूंकि वो लोग खबर को पूरी तरह से नही दिखा रहे थे मतलब जब वो दोनो आदमी गाड़ी के अन्दर जाकर गाड़ी चलाते थे या ब्रेक लगाते थे उसे वो लोग ना दिखकर जब गाड़ी दस या बीस सैकेंड अपने आप चलती थी उसे दिखाते थे। क्यूंकि अगर वो दिखा देते तो भला उनका सनसनी खेज खुलासा कौन देखता ।

आजकल न्यूज़ चैनल का मकसद खबरें दिखाना कम और सनसनी फैलाना ज्यादा हो गया है। कार वाली खबर दिखा कर भगवान जाने इंडिया.टी.वी.क्या साबित करना चाहता था । इस तरह की खबर दिखा कर वो और दूसरे लोगों को ऐसे काम करने के लिए प्रेरित करते है बल्कि उन्हें तो ऐसी ख़बरों को बढावा ही नही देना चाहिऐ।

Monday, July 9, 2007

ताज क्या वाकई मे नम्बर वन है ? हमारी इस पोस्ट पर आप लोगों के कमेंट्स पढ़कर हमे लगा कि शायद आप लोग ये सोच रहे है कि हम ताज के नम्बर वन आने पर खुश नही है। अजी ऐसा बिल्कुल नही है हम ताज के दुनिया के सात अजूबों मे नम्बर एक पर आने पर बेहद खुश है और हों भी क्यों ना आख़िर हमने भी तो ताज के लिए एस.एम्.एस किया था और नेट पर वोट भी किया था क्यूंकि हर हिंदुस्तानी की तरह हम भी ताज को दुनिया के सात अजूबों मे देखना चाहते थे।ताज के बारे मे ये सवाल उठा कर हम किसी को दुःख नही पहुँचाना चाहते थे पर अगर किसी को हमारा ये पूछना गलत लगा हो तो हम क्षमा चाहते है

जैसा कि divine india ने लिखा है कि ताज प्यार की एक बेमिसाल निशानी है। और ताज ताज है तो हम भी इस बात से इनकार नही करते है कि ताज ताज है और ताज जैसा ना तो पहले कभी कोई था और ना ही कभी कोई दूसरा होगा। इसके लिए यहां पढ


B.N.जी हमने ये सवाल यूं ही नही उठाया है । और कल तो कुछ न्यूज़ चैनल भी ऐसी ही कुछ बात कह रहे थे


समीर जी आपने बिल्कुल ठीक कहा है हमे ताज के चुने जाने पर नही बल्कि उसको चुनने की प्रक्रिया पर संशय हो रहा इसके लिए यहां पढ़ें.

अतुल जी आपने सही कहा है की ताज तो ताज ही है वो चाहे नम्बर एक हो या सौ। और इसी लिए ताज ना केवल भारत अपितु सारी दुनिया मे मशहूर है। ताज के बारे मे जितना भी कहा जाये या लिखा जाये वो कम है

अनूप जी हम क्या सारा भारत ख़ुशीमना रहा है।

इतना सब कुछ लिखते-लिखते तो ये पूरी एक पोस्ट ही बन गयी है इसलिये अब हम इसे पोस्ट ही कर देते है

Sunday, July 8, 2007

कल यानी सात जुलाई दो हजार सात को दुनिया के सात अजूबों का ऐलान होना था पर पिछले कुछ दिनों से हर कोई ताज के लिए अपने-अपने तरीके से वोट करने को कह रहा था जिसमे सबसे आगे सारे न्यूज़ चैनल थेयहां तक की दूरदर्शन भीऔर ये तो सभी जानते है की आज कल टी.वी.प्रचार का सबसे अच्छा साधन हैये तो हम आप सभी जानते है कि किस तरह वोट फ़ॉर ताज की मुहिम चलाई गयी थी

अखबारों मे भी कभी ताज महल मे लोगों की फोटो खीचने वाले फोटोग्राफ़र का तो कभी वहां के गाइड का interview छप रहा थाकई लोग जिन्हे -मेल करना नही आता था वो किसी दूसरे की मदद से ताज के लिए वोट कर रहे थेहर कोई एस.एम्.एस.कर रहा था क्यूंकि ताज को जिताना जो था आखिर देश की शान जो है ताज

और आख़िर कल ताज दुनिया का नम्बर वन अजूबा बन गयाऔर कल जब ये घोषणा होनी थी उस समय बिपाशा बासु भी लिस्बन मे मौजूद थी क्यूंकि उन्हें ही दुनिया के नम्बर वन अजूबे की घोषणा करनी थीबिपाशा ताज महल का नाम बोलते हुए बिल्कुल भी उत्साहित नही दिख रही थी ,बडे ही निर्विकार भाव से ताज महल बोला थाअब हमे तो ऐसा ही लगाऔर आज सुबह से टी.वी. पर सभी न्यूज़ पढने वालों की बदली -बदली सी सूरत नजर रही है अरे भाई आज सभी चैनल भारतीय रंग मे रंगे दिख रहे है मतलब आम तौर पर न्यूज़ पढने वाले वेस्टर्न ड्रेस मे दिखाई देते है पर आज लडकियां सलवार सूट और लड़के कुरता- पाजामा मे दिख रहे हैहर कोई ये दिखा रहा है कि वो सबसे बड़ा हिंदुस्तानी हैऔर ताज के नम्बर वन बनने से वो सबसे ज्यादा खुश है ,पूरे भावविभोर होकर बता रहे थे की जेनिफर लोपेज ने वहां कार्यक्रम पेश किया था और बिपाशा का जलवा चारों ओर था वगैरा-वगैरा

चलो भाई ताज जीत तो गया पर क्या सच मे ये दुनिया के असली सात अजूबों में हैं?यह एक बहुत बड़ा सवाल है.

Tuesday, July 3, 2007

यूं तो ये बहुत पुरानी बात है पर आज भी इस बात को याद कर हंसी आ जाती है।हम यही कोई छे-सात साल के रहे होंगे। घर मे हमेशा नौकर रहते थे तो इसलिये काम करने की कभी जरूरत ही नही पड़ती थी और जब नौकर छुट्टी जाता था (हर साल गरमी मे कम से कम एक महीने के लिए ) तो मम्मी और जिज्जी लोग किचन संभल लेती थी। देखा छोटे होने का फायदा है ना ,और वैसे भी हम इतने छोटे थे कि किचन मे जाने और खाना बनाने का सवाल ही नही उठता था। हालांकि पापा को हम मे से किसी का भी किचन मे जाना पसंद नही था। यहां तक की मम्मी का भी पर गरमी मे इससे बचने का कोई उपाय भी तो नही था।

उन दिनों मम्मी के कान मे बहुत तकलीफ रहती थी तो डाक्टर ने कहा था की ऑपरेशन करना जरूरी है और इसके लिए कुछ दिन मम्मी को हॉस्पिटल मे रहना पड़ेगा। अब जब डाक्टर ने कह दिया कि ऑपरेशन के बिना कान का दर्द ठीक होना मुश्किल है तो पापा भी तैयार हो गए। यूं तो उस समय मेडिकल कालेज के प्राइवेट वार्ड मे ख़ूब अच्छा और बड़ा कमरा जिसमे छोटा सा बरामदा और किचन भी होता था , पापा ने मम्मी के लिए ऐसा ही एक प्राइवेट वार्ड ले लिया था और वो प्राइवेट वार्ड हम लोगों का सेकेंड होम मतलब घर ही हो गया था। आधे से ज्यादा समय हम लोग वहीँ रहते थे।

ऑपरेशन हो गया तो ये हुआ कि अब तो कुछ दिन मे घर चले जायेंगे पर मम्मी को ऑपरेशन के बाद भी परेशानी हो रही थी तो डाक्टर ने कुछ और दिन हॉस्पिटल मे रुकने को कहा। ऐसे ही एक दिन की बात है सभी लोग हॉस्पिटल गए हुए थे और हमारा नौकर भी । आम तौर पर नौकर हॉस्पिटल से घर जल्दी आ जाता था पर उस दिन कोई भी घर नही लौटा था। घर मे हम और हमसे बड़ी दीदी गुड्डी जो की हमसे दो साल बड़ी है ही थे और शायद रात के सात-आठ बज रहे थे और हम लोगों को भूख भी लग रही थी तो हम दोनो ने सोचा की जब तक सब लोग आते है क्यों ना हम दोनो ही खाना बना ले। और हम दोनो ने ये तय किया कि चावल और दाल बना लेते है क्यूंकि हम दोनो को लगा कि सबसे आसान यही होता है।पर हमे क्या मालूम था कि खाना बनाना कोई बच्चों का खेल नही है। उन दिनों खाना चूल्हे पर ही बनता था सो हम दोनो बहने चूल्हा जलाने लगे पर हम लोग चूल्हा ही नही जला पा रहे थे,हम लोग चूल्हा जलाने के लिए चूल्हे मे अखबार पे अखबार डालते जा रहे थे । आख़िर मे किसी तरह चूल्हा तो जला पर ख़ूब धुँआ हो रहा था जिसकी वजह से हम दोनो कि आंखों से पानी गिर रहा था और हमे लग रहा था की खाना बनाना कोई बच्चों का खेल नही है और ये भी की खाना बनाना किसी मुसीबत से भी कम नही है। और ऐसे ही आँसू बहाते हुए हमने गुड्डी से कहा कि खाना बनाना इतना मुश्किल काम है तो मैं तो किसी ऐसे आदमी से शादी करूंगी जो मुझे रोज होटल मे खाना खिलाये और मुझे खाना ना बनाना पड़े। और गुड्डी सिर हिला-हिला कर मेरी बात का समर्थन कर रही थी।तभी बडे जोर से हंसने कि आवाज आयी तो पीछे मुड़ कर देखा तो पापा और जिज्जी लोग खडे थे। हम दोनो खाना बनाने और अपनी बातों मे इतने मशगूल थे कि हमे पता ही नही चला कि कब पापा लोग आ गए थे।

और उस समय की कही बात सच हो गयी है।

Sunday, July 1, 2007

आज सन्डे है तो सोचा की कुछ इस पर ही बात हो जाये। सन्डे मतलब देर से उठना देर से नाश्ता देर से नहाना और कई बार तो नहाना गोल ही कर देना और देर से खाना माने हर काम आराम-आराम से करना क्यूंकि पहले तो सिर्फ सन्डे की ही छुट्टी हुआ करती थी और हर कोई सन्डे का इंतज़ार करता था ।सन्डे यानी funday यानी घूमना ,पिकनिक,मौज-मस्ती । जैसे जब हम लोग छोटे थे और स्कूल जाते थे तो सन्डे का मतलब सिर्फ खेल-कूद होता था क्यूंकि उस दिन तो मम्मी भी नही रोकती थी और उस समय outdoor या घर के बाहर जाकर खेलना अच्छा माना जाता था। और सुबह देर तक सोना भी होता था( पर आठ या नौ बजे से ज्यादा नही ) क्यूंकि स्कूल के दिनों मे तो सुबह-सुबह उठना जो पड़ता था। सोकर उठो ,नाश्ता करो जिसमे हलवा तो जरूर ही होता था और बस पूरे दिन की छुट्टी। और आज के समय मे सन्डे का मतलब सुबह कम से कम ग्यारह बजे तक सोना बहुत से लोग तो दोपहर के दो बजे तक सोते है क्यूंकि शनिवार की रात को ज्यादा देर तक जागते जो है।बहुत् से लोग तो सन्डे को सिर्फ सोकर ही बिताना चाहते है क्यूंकि भाग-दौड़ की जिंदगी मे सोने का समय जो नही मिलता है और अब तो कंप्यूटर भी लोगों को रात मे जगाये रखने का काम करता है ।


सन्डे एक ऐसा दिन जिस दिन का लोग बेसब्री से इंतज़ार करते हे क्यूंकि पहले तो टी.वी.वगैरा होते नही थे तो लोग या तो किसी दोस्त या रिश्तेदार के घर जाते थे या पिक्चर देखने या फिर शॉपिंग करने क्यूंकि बाक़ी के छे दिन तो लोगों का समय ऑफिस -स्कूल वगैरा मे निकल जाता था । हालांकि उस समय ऐसा नही था की सिर्फ सन्डे को ही किसी के घर जाना होता था। हम लोग तो जब छोटे थे तो अक्सर शुक्रवार की शाम बनारस जाते थे क्यूंकि हमारे बाबा वहां रहते थे और सन्डे की शाम को वापस आ जाते थे । वैसे आज भी जहाँ शनिवार की छुट्टी नही होती है वहां आज भी लोग सन्डे का उतनी ही बेसब्री से इंतज़ार करते है पर अब चूंकि कई शहरों मे जैसे दिल्ली वगैरा मे शनिवार की भी छुट्टी होने लगी है तो इसलिये जरा सन्डे की महत्ता कम सी हो गयी लगती है। पर सन्डे तो सन्डे ही है।

सन्डे को आप कोई भी बाजार या पार्क जैसे दिल्ली मे इंडिया गेट चले जाएँ तो भीड़ ही भीड़ नजर आती है और ये भीड़ ही है जो आज तक नही बदली है चाहे कोई भी समय हो वो चाहे कोई भी दशक हो। अब तो शाम को इंडिया गेट पर इतनी अधिक भीड़ हो जाती है की ना तो गाड़ी पार्क करने की जगह मिलती है और ना ही बैठने की क्यूंकि अब तो पार्क मे जरा-जरा सी दूरी पर लोग चादर बिछा कर बैठते है और अगर जगह मिल भी जाती है तो कभी किसी बच्चे का गुब्बारा बिल्कुल जहाँ आप बैठें है वहीँ आकर गिरता है और बच्चा आकर सॉरी कहकर गुब्बारा ले जाता है और आप कर भी क्या सकते है सिवाय ये कहने के की कोई बात नही।बाजार मे भी वही हाल जिधर देखो बस भीड़ ही दिखती है । पार्किंग मिलना किसी नियामत से कम नही होता है। पार्किंग को देख कर लगता है सारा शहर ही बाजार मे आ गया हो ।

सन्डे का दिन मतलब घर की साफ-सफ़ाई का दिन का दिन भी होता है क्यूंकि एक तो कोई हडबडी नही होती है कि किसी को ऑफिस जाना है तो किसी को स्कूललीजिये सफ़ाई से ध्यान आया की हमे भी तो घर ठीक करना है तो इसलिये अब हम अपने सन्डे की शुरुआत सफ़ाई अभियान से करने जा रहे हैऔर आप ?