कौन ज्यादा जोर से हँसता है.

हँसना एक ऐसी अभिव्यक्ति है जिससे हम अपने मन के भावों को दर्शाते है। हर व्यक्ति का अपना हंसने का स्टाइल होता है और कई बार लोग अपने हंसने के स्टाइल से ही जाने जाते है। अब आप लोग ये तो जरूर सोच रहे होंगे की लगता है हमने हंसने पर रिसर्च तो नही की है तो अब ये तो आप पर निर्भर करता है ,वैसे अगर आप इसे हमारा शोध कार्य मानते है तो भी कोई बात नही। लो जी अभी तो हमने शुरू भी नही किया और आप हंसने लगे ,ये अच्छी बात नहीहै


वैसे आपको जानकार थोडा या शायद ज्यादा आश्चर्य होगा की अंडमान और गोवा मे लोग बहुत ज्यादा हँसते नही है मतलब जो लोकल लोग है। अब क्यूं ये तो वो लोग ही जाने।हम कोई बुराई नही कर रहे है पर ऐसा ही है। पर हम जैसे लोगों के लिए क्या गोवा और क्या अंडमान सब जगह हँसते हुए ही समय बिताते है । क्यूंकि कहते है ना की हँसना सेहत के लिए अच्छा होता है।आज की भाग-दौड़ की जिंदगी मे तो लोग जैसे हँसना भूलते ही जा रहे है वो क्या है ना समय नही हैसुबह से रात तक सिर्फ और सिर्फ काम और टेंशनजो लोग ऑफिस जाते है उन्हें दुनिया भर के टेंशन और जो घर मे रहते है हम जैसे लोग उन्हें भी टेंशनअरे हमे किस बात का टेंशन तो भाई एक नही हजार टेंशन होते है घर मे रहने वालों केअब कहॉ तक गिनाएबाक़ी आप लोग तो खुद ही समझदार है


जैसा की हमने कहा की हरेक का हंसने का अपना स्टाइल नही मेरे ख़्याल से ट्रेडमार्क होता है
कोई व्यक्ति ख़ूब जोर-जोर से ठहाके लगा कर हँसता है तो कोई हलके से । कुछ लोग बड़ी अजीब-अजीब आवाज निकाल कर हँसते है कुछ ऐसी आवाज की जिसको सुनकर दूसरों को और हंसी आ जाती है। कुछ लोग सिर्फ हलके से मुस्कराकर भी काम चला लेते है अरे भाई हंसने के कोई पैसे थोड़े ही देने है । मुफ़्त है दिल खोल कर हंसो।
पर नही

ठहाके लगाने वाले ऐसे ही एक व्यक्ति हम लोगों के दोस्त है जो अगर किसी पार्टी मे हो तो आप फौरन उनके हंसी के ठहाके से पहचान लेगे। और एक और है जो की हँसना शुरू करते है तो इतनी ईईईईइ लंबी सांस खीचकर हँसते है की तब तक बाक़ी लोग हंस कर चुप हो चुके होते है। पर ये उनका स्टाइल है ऐसे ही हमारे एक मामाजी है वो तो इतनी जोर से हँसते थे की पूरा घर ही हिल जाये। हमारे ताऊ जी जिन्हे हम लोग दादा कहते थे वो बहुत जोर -जोर से हँसते थे और चुंकि दादा थोड़े मोटे थे तो जब वो हँसते थे तो उनका पेट भी जोर-जोर से हिलता था और हम सब बच्चों को ये देख कर बड़ा मजा आता था की हंसने से भी पेट हिल सकता हैताऊ जी बनारस मे रहते थे और रोज सुबह संस्कृत युनिवर्सिटी टहलने जाते थे और जब हम लोग बनारस जाते थे तो हम बच्चे भी उनके साथ टहलने जाते थेवहां टहलने के बाद दादा अपने दोस्तो के साथ ख़ूब जोर-जोर से हँसते थेहा-हा-हा और हम बच्चों को लगता था की जब हम लोग घर मे यूं ही इतना हँसते है तो फिर यहां आकर हंसने की क्या जरूरत हैहा-हा-हा-करते थे औरचूंकि हम सब छोटे बच्चे थे तो हमने उनसे पूछा की हंसने के लिए पार्क मे आने की क्या जरूरत हैतो उन्होने कहा की ऐसे जोर-जोर से हंसने से blood circulation बढ़ता हैखैर उस समय तो हम लोगों को ये बात समझ नही आयी थीबाद मे जब हमने दिल्ली के लाजपत भवन मे योगा सीखा था तो वहां पर अंत मे सभी से हाथ ऊपर उठाकर जोर-जोर से हंसने को कहते थेहम लोगों को लगता था की ऐसे हंसने से भला क्या होगा पर उस teacher का कहना था की इससे blood circulation बढ़ता हैआप किसी भी पार्क मे सवेरे-सवेरे चले जाये लोग एक गोले मे खडे होकर हँसते हुए दिख जायेंगे वो चाहे बचपन का बनारस हो या चाहे आज का इलाहाबाद या फिर दिल्ली ही क्यों ना हो


आजकल तो हंसी मे भी मिलावट सी होने लगी हैअब सिद्धू और अर्चना पूर्ण सिंह को ही देख लीजियेअब आप कहेंगे की हंसने मे ये दोनो कहॉ से गए और अगर आये भी तो ये दोनो बहुत हँसते हैपर क्या उनकी हंसी कुछ बनावटी नही हैदोनो मे होड़ सी लगी है कि कौन ज्यादा जोर से हँसता हैतो ऐसा है अभी तक स्टार वन पर आने वाले कार्यक्रम लाफ्टर चैलेंज मे सिद्धू जो की बेतहाशा और फालतू मे ही बनावटी हंसी हँसते थे उनका एकछत्र राज्य था हंसने मे पर अब उनको अर्चना पूरण सिंह सोनी पर जो कॉमेडी सर्कस आता है उसमे हंसने का चैलेंज दे रही है अरे मतलब की कौन कितनी जोर से हँसता है और कितनी देर तक हंस सकता हैकमाल तो ये है की सिद्धू के साथ शेखर सुमन को जैसे कम हंसी आती है वैसे ही अर्चना के साथ सतीश शाह को भी कम हंसी आती हैपर दाद देनी पडेगी सिद्धू और अर्चना की

जो मासूमियत बच्चों की हंसी मे होती है वो बडों की हंसी मे क्यों नही होती है ?


हम सभी के अन्दर एक बच्चा छिपा रहता है बस उसे पहचानने की देर है और फिर देखिए हंसने के बहाने यूं ही मिल जायेंगे

Comments

अगर किसी को हँसी न आने की बीमारी है, तो उसका नुस्खा नीचे लिखा है:

नुक्कड़ की डी.वी.डी. की दुकान से इनमें से कोई एक (अधिक फायदे के लिये सभी) फिल्म ला कर यार दोस्तों और परिवार वालों के साथ बैठ कर देखें -

. हाफ टिकट
. पड़ोसन
. गोलमाल
. चुपके चुपके
. जाने भी दो यारों
. अंगूर
Shrish said…
हँसी का अच्छा विश्लेषण किया आपने। वैसे आपकी पोस्ट से हमें भी हँसी आ ही गई, धन्यवाद!
Udan Tashtari said…
:) बढ़िया-हंस ही दिये नान-मिलावटी.
mahashakti said…
अच्‍छा विश्‍लेषण किया है। मजा आया
Manish said…
सिद्धू की बनावटी और फालतू की हँसी देख मुझे तो बहुत कोफ्त होती है।
masijeevi said…
अच्‍छा लिखा।
आपको पुन: याद दिला दिया जाए कि कल 14.07.07 को दिल्‍ली में बड़ी वाली ब्‍लॉगर मीट है- आप भी चूंकि दिल्‍ली में ही हैं आजकल शायद इसलिए आपकी उपस्थिति आवश्‍यक है। जरूर पहुँचें- इस लिंक पर देखें

Popular posts from this blog

कार चलाना सीखा वो भी तीन दिन मे .....

क्या उल्लू के घर मे रहने से लक्ष्मी मिलती है ?

निक नेम्स ( nick names )