Friday, November 14, 2008

आज बाल दिवस के मौके पर कुछ ऐसे गीत सुनिए जो हमें बहुत पसंद है और इन्हे सुनकर एक बार फ़िर से उसी बचपन मे लौट जाइए क्यूंकि वो कहते है कि हर इंसान के अन्दर एक बच्चा रहता है :)

वैसे भी आज के भागते -दौड़ते समय मे इस तरह के गीत अब कम ही सुनाई देते है ।

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Wednesday, October 29, 2008

मुंबई जिसे महानगरी,मायानगरी ,सपनों की नगरी और जाने क्या-क्या कहा जाता रहा है जहाँ धर्म-जाति या प्रांत के लिए नही बल्कि व्यक्ति को उसके नाम और काम से जाना जाता रहा हैपर अब ऐसा नही है अब व्यक्ति को उसके नाम और गाँव के नाम से जाना जा रहा हैजनवरी २००८ की शुरुआत से ही मुंबई मे कुछ कुछ ऐसा घटता चला रहा है जिसे देख और पढ़ कर लगता है कि मुंबई को नजर लग गई है

अब इस प्रदेश की लड़ाई को ही देख लीजिये धीरे-धीरे कितना विकराल रूप लेती जा रही है मुंबई जहाँ के लिए कहा जाता रहा है कि वहां धर्म -जात-प्रदेश को महत्त्व नही दिया जाता है अब उसी मुंबई मे इन्ही सब बातों के लिए लोगों को मारा-पीटा जाता है

कुछ दिन पहले शुरू हुई प्रदेश की लड़ाई भी अब दिनों दिन बढती ही जा रही है ।चंद रोज पहले railways की परीक्षा देने गए छात्रों के साथ जो कुछ हुआ उस के बारे मे तो हम सभी जान गए है कि किस बुरी तरह से छात्रों की दौड़ा -दौड़ा कर पिटाई की गई बाद मे पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया पर कोई फर्क नही पड़ामुंबई मे हुई छात्रों की पिटाई का बदला , मुंबई से बिहार जानेवाली ट्रेन के .सी. कोच मे आग लगा कर लिया गया गनीमत थी की यात्रियों को उतार दिया गया थाअभी दो दिन पहले एक बिहारी छात्र राहुल राज को मारा गया (एनकाऊँटर ) तो कल मुंबई की एक लोकल ट्रेन मे एक लेबर को मार दिया गया आखिर इसका अंत क्या होगा ? कितने लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ेगी इस प्रदेश की लड़ाई मे

पर इस तरह का माहौल बना कर ये राजनीतिक पार्टियाँ क्या साबित करना चाहती है इस तरह से अगर सभी प्रदेश मे लोग व्यवहार करने लगेंगे तो क्या होगा
भविष्य मे ये सारे नेता तो लड़ कर आपस मे मिल जायेंगे पर आम जनता के दिल और दिमाग मे प्रदेश और भाषा को लेकर जो नफरत भर रही है उसे कैसे निकाल पायेंगे
कहीं ये प्रदेश की आग आज मुंबई कल गुजरात परसों दिल्ली तक न पहुँच जाए ।
इस मुंबई की नजर कौन उतरेगा ?

Tuesday, October 28, 2008

दीपक का प्रकाश हर पल
आपके और आपके परिवार के
जीवन मे एक नई रौशनी दे
बस यही कामना है हमारी

दीपावली की शुभकामनाओं के साथ आइये इस शुभ अवसर पर कुछ गीत भी सुनते चले ।

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Tuesday, October 21, 2008


काफ़ी दिन पहले न्यूज़ जरुर पढ़ी थी कि मोबाइल ATM उद्घाटन के बारे में पर सोचा नही था कि ऐसा हो भी सकता है . हमने तो इससे पहले चलता-फिरता ATM नही देखा था पर अभी ३-४ दिन पहले हम बेटे के साथ कहीं घूमने जा रहे थे तभी SBI की इस मोबाइल ATM वैन को देखा और बिना समय गवाएं हुए हमने फोटो खींच ली ।(अपने सैल फ़ोन से ) :)

और दूसरे बैंक के भी मोबाइल ATM चलते है या नही ये पता नही पर ऐसा लगता है की इसमें सबसे पहला नंबर SBI का ही है । और हो सकता है की SBI की देखा-देखी दूसरे बैंक भी मोबाइल ATM की शुरुआत करेंगे ।

अब ATM कार्ड तो हर बैंक अपने कस्टमर को देता ही है फ़िर वो चाहे शहर में रहने वाला हो या गाँव में रहने वाला हो । इस मोबाइल ATM के आने के बाद तो लोगों को और भी आराम हो जायेगा क्यूंकि जहाँ तक हमारा ख़्याल है की इस तरह की मोबाइल ATM वैन की शुरुआत इसी लिए की गई होगी । अब मोबाइल ATM की बदौलत गाँव वाले भी बैंक की लम्बी लाइन में लगने की बजाय ATM से पैसा निकाल कर अपना समय बचा सकते है ।

क्यूँ है न अच्छी बात ।

Monday, October 20, 2008

जब तक हम दिल्ली मे थे उस दौरान तो हमने बहुत ही कम लिखा था पर गोवा आने के बाद सोचा था कि अब पहले की तरह ही रोज लिखा करेंगे पर पता नही जब भी लिखने चलते है तो जैसे दिमाग बिल्कुल खाली सा लगता है (है या नही पता नही ) तो कुछ आधी-अधूरी पोस्ट लिख कर छोड़ देते है . तो कभी कुछ ब्लॉग पोस्ट पढ़कर या कभी-कभी बस ब्लौगवाणी को स्क्रोल करके देख लेते है और कम्पूटर बंद कर देते है ।

पिछले १०-१२ दिन बेटा आया हुआ था तो घूमने-फिरने मे लगे थे पर कल बेटा वापिस चला गया और कल शाम से भी कई बार पोस्ट लिखने की सोची पर फ़िर न जाने क्यूँ मन ही नही हुआ । ऐसा नही है कि विषयों की कमी हो गई है इतना कुछ है लिखने के लिए पर बस लिखते समय मन उचट जाता है ।

अब इस ८ लाइन की पोस्ट लिखने मे ही आधे घंटे से ज्यादा लगा दिया तो आप समझ ही सकते है । और आज से हम कोशिश करने वाले है कि पहले की तरह ही हम अपने ब्लॉग पर लिखना शुरू कर दे :)

Monday, October 13, 2008

वैसे हम ३- दिन पहले ये पोस्ट लिखने वाले थे पर लिख नही पाये क्यूंकि हमारा बेटा छुट्टियों मे घर आया हुआ है । और अब वैसे तो नवरात्र और दशहरा ख़त्म हो गया है पर फ़िर भी हमने सोचा कि इस मखरोत्सव आरती की बात कर ही ली जाए क्यूंकि ये आरती कुछ अलग तरह से होती है


गोवा के मंदिरों मे नवरात्रों के नौ दिन तक ये मखरोत्सव मनाया जाता है । और जगहों का तो पता नही पर हमने यहाँ पर ही इस तरह की आरती देखी है ।(पिछले ३ साल से ) मखर यानी की लकड़ी का बना हुआ मन्दिर जिसमे हर रोज एक नए देवी या देवता को बैठाया जाता है । इस मखर को खूब सजाया जाता है । और फ़िर उस देवी-देवता की आरती की जाती है

खैर अष्टमी के दिन हम लोग भी इस आरती को देखने के लिए महालसा मन्दिर गए थे । आरती रात मे नौ -साढ़े नौ के आस-पास शुरू होती है ।और ये आरती तकरीबन एक घंटे तक चलती है। और यहाँ पर एक तरफ महिलायें और दूसरी तरफ पुरूष बैठते है । आरती शुरू होने के पहले वहां पर प्रवचन होता है और फ़िर ढोल शहनाई और ताशे के साथ आरती शुरू होती है । मन्दिर मे तो लोग बहुत पहले पहुँच कर बैठ जाते है क्यूंकि बाद मे जगह नही मिलती है और एक बार आरती शुरू होने के बाद तो जगह मिलने का सवाल ही नही रहता है ।एक ख़ास बात है कि आरती सिर्फ़ सामने बैठे लोग ही नही बल्कि दोनों तरफ़ साइड मे बैठे लोग भी आरती ठीक से देख पाते है क्यूंकि देवी का झूला बारी-बारी से हर तरफ़ घुमाया जाता है और हर तरफ़ आरती की जाती है ।इसलिए कोई फर्क नही पड़ता है कि आप सामने बैठे है या साइड मे । पूरी आरती के दौरान लोग बैठे रहते है ।

खैर हम लोग वहां सवा नौ बजे पहुंचे और जैसा की होना ही था सामने की तरफ़ जगह नही मिली तो हम लोग साइड मे बैठ गए ।इस आरती के लिए देवी एक विशेष रूप से सज्जित झूले (मखर )पर बैठाई गई थी जिसे खूब सारे फूलों और लाईट से सजाया गया था। जब आरती शुरू हुई तो ताशे के आवाज के साथ ही देवी की जय कार हुई और देवी के झूले को झुलाना शुरू हुआ (देवी के झूले को मन्दिर के पुजारी और (यहाँ की भाषा मे कहें तो )महाजन लोग झुलाते है थोडी-थोडी देर के लिए ।)और फ़िर एक घंटे तक आरती होती रही , पहले धूप से फ़िर अलग-अलग तरह के दीपक से आरती की गई ।बाद मे पुष्प चढाये गए । एक और बात इसमे आरती करते समय पुजारी एक -एक आरती करने के बाद थाली को कुछ इस तरह से सरकाता है की वो देवी के झूले के नीचे से जाती है और वहां खड़े पुजारी या मन्दिर के लोग उसे उठाकर बाहर करते है । इसमे सबसे बड़ी बात समय, झूले की गति और बैलेंस की होती है जरा सी चूक होने पर कोई भी घटना हो सकती है ।


आरती पूरी ख़त्म होने के बाद भी यथा स्थान सभी लोग शान्ति पूर्वक बैठे रहते है और फ़िर प्रसाद वितरण होता है (नारियल और गुड का और फल का ) और जब तक प्रसाद बंटता होता है कोई भी उठाकर नही जाता है सब लोग बैठे रहते है ।इसी बीच मन्दिर का ही कोई व्यक्ति देवी पर चड़े हुए फूलों के एक गुलदस्ते (प्रसाद)की बोली लगाने को लोगों को कहता है और लोग अपनी अपनी बोली लगाते है और जिसकी बोली ज्यादा उसे देवी का वो प्रसाद मिल जाता है ।और अब
इस आरती का एक छोटा सा वीडियो भी देखिये


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Tuesday, October 7, 2008


नवरात्रों मे गरबा और डांडिया खेलने के बारे मे सुना तो बहुत था ( गुजरात का गरबा और डांडिया तो पूरी दुनिया मे मशहूर है )पर देखा यहाँ गोवा मे आकर ही दिल्ली मे तो जगहों की दूरी की वजह से डांडिया वगैरा देखने कभी गए ही नही पर यहाँ गोवा मे पहली बार गरबा और डांडिया देखा वरना इससे पहले तो सिर्फ़ टी.वी.और फिल्मों मे ही देखा था :)

गोवा मे मीरामार पर स्थित gasper dias club मे गुजराती समाज ने इसे आयोजित किया है.वहां पहुंचकर लगता है मानो गोवा मे नही बल्कि एक छोटे से गुजरात मे गए हो जहाँ कुछ लड़कियां और औरतें पारंपरिक वेश-भूषा मे (और पूरे श्रृंगार के साथ )तो कुछ सलवार -कुरता पहने तो कुछ साड़ी पहने दिखती हैलड़के भी कुछ तो पारंपरिक वेश-भूषा तो कुछ कुरता-पैजामा वगैरा मे सजे-धजे घूमते और डांडिया खेलते नजर आते हैवैसे रात बजे से गरबा और डांडिया शुरू होता है वैसे गरबा तो १० बजे के आस-पास ही शुरु होता है उससे पहले वहां पर संगीत की धुन बजती रहती है और माहौल तैयार होता रहता है इसी बीच वहां खाने की स्टाल से लोग खाने लेकर खाते रहते है और बीच-बीच मे बच्चे धुन पर नाचते रहते है



तो क्या आप तैयार है गरबा और डांडिया खेलने अरे नही-नही देखने के लिए । :)

तो देरी किस बात की है बस वीडियो को अपलोड होने दीजिये और फ़िर आप भी आनंद उठाइए इस का

इस पहले वीडियो मे आप देखेंगे की हर उम्र की लड़कियां,महिलायें और बच्चियां गरबा नृत्य कर रही हैमानो पीढियां एक साथ गरबा कर रही है

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और दूसरे वीडियो मे बड़े -छोटे हर उम्र के लोग पूरी मस्ती मे डांडिया खेल रहे है


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Monday, October 6, 2008

एक बार पहले भी हमने एक न्यूज़ के साथ लिंक लगाने की कोशिश की थी पर सबने टिप्पणी की कि न्यूज़ के लिए दिया गया लिंक नही खुल रहा है और आज भी हमने पोस्ट पर लिंक लगाया तो सीमा जी कि टिप्पणी मिली कि लिंक नही खुल रहा है तो हमने भी जब कई बार चेक किया तो देखा वो लिंक भी नही खुल रहा है ।तब से कई बार कोशिश कर चुके पर असफल रहे . आख़िर क्या वजह हो सकती है जबकि पहले तो जब भी गूगल के लिंक देते थे तो वो खुल जाते थे और न्यूज़ पढ़ी जाती थी। तो अब क्या हो गया है। वैसे अभी हाल मे ही ये प्रॉब्लम शुरू हुई है । कोई हल बताइये।

नोट -- ज्ञान जी और सीमा जी हमने अब पूरी न्यूज़ लिख दी है । :)

आपने अदनान सामी का वो गाना तो सुना ही है जिसमे वो मुझको भी तू लिफ्ट करा दे गाते थे । खैर अदनान के गाये गाने को अब बदले हुए अंदाज मे कहा जा सकता है । माने मुझको भी तू लिफ्ट करा दे की जगह घर को भी अब लिफ्ट करा ले कह सकते है । कैसे वो ऐसे कि २-३ दिन पहले न्यूज़ फ्लैश देखा था कि लिफ्ट हुआ बंगला पर न्यूज़ पूरी नही देखी थी । कल अखबार मे ये ख़बर देखी और बरबस अदनान सामी का गाना याद आ गया ।

तो ख़बर ये है कि सतन पाल जो कि हरियाणा पुलिस मे हेड कांस्टेबल है उनके दोमंजिला घर को ११.३ फीट जमीन से ऊपर लिफ्ट कर दिया गया है और ये काम सिर्फ़ ३५-४० दिन मे पूरा किया गया है । किसने और कैसे किया है इसके लिए
पढिये
सीमा जी और ज्ञान जी की टिप्पणी पढने के बाद हमने सोचा की जब लिंक नही खुल रहा है तो हम ही पूरी ख़बर लिख देते है । :)

गुडगाँव के सतन पाल जी ने अपना घर १० साल पहले बनवाया था और पिछले १० सालों मे सड़क निर्माण की वजह से उनके घर का लेवल नीचा होता गया जबकि सड़क का लेवल ऊपर उठता गया जिससे उनके घर मे जब तब पानी भर जाता थाऔर इसलिए सतन पाल जी ने एक बार उस घर को छोड़ कर जाने का मन भी बना लिया था पर तभी उन्हें मामचंद एंड संस के बारे मे पता चला जिन्होंने हरियाणा के कुछ और घरों को भी जमीन से - फीट ऊपर उठाया हैइस कंपनी को राजेश चौहान अपने पिता और भाईयों के साथ मिल कर चलाते हैऔर ये पहली बार है जब इस कंपनी ने किसी घर को ११. फीट ऊपर उठाया है

इस दोमंजिला घर को लिफ्ट करने के लिए २७५ screwjacks का इस्तेमाल किया गया है और सबसे अच्छी बात कि इस घर को लिफ्ट करने के बावजूद इसमे कोई भी दरार नही आई हैऔर पूरा घर रहने के लिए सुरक्षित है

और इसमे रहते हुए कुछ-कुछ हवा महल जैसा अनुभव होता होगा उनके परिवार वालों को


Friday, October 3, 2008

ये शब्द पढने और सुनने मे कुछ अजीब सा लग रहा है पर असल मे ऐसा कुछ नही है ।वैसे इसका सही उच्चारण भी अभी तक ठीक से क्या है हमें पता नही है क्यूंकि कोई तिअत्र तो कोई तिअतर तो कोई तियत्र कहता है । खैर नाम मे न उलझ कर कुछ इसके बारे मे बताते है ।

गोवा मे tiatr १०० साल से होता चला आ रहा है । tiatr के लिए कहा जाता है कि इसे बहुत अधिक loud होना चाहिए । इसकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसमे जो भी कहानी होती है वो गोवा के लोगों की जिंदगी पर आधारित होती है वो चाहे राजनीति हो या फ़िर कोई सोशल मुद्दा हो , पुलिस हो या चाहे आम आदमी की जिंदगी।हर दर्शक कहानी से अपने आप को identify कर सकता है । इसमे सटायर भी खूब होता है ।और इसमे संदेश भी होता है । यहाँ के लोगों का कहना है कि ये आम नाटकों (ड्रामा और थिएटर) से थोड़ा अलग है

हालाँकि अब इस tiatr मे हिंदू कलाकार भी भाग लेने लगे है पर ऐसा कहते है कि शुरूआती दौर मे ज्यादातर कैथोलिक ही इसमे भाग लेते थे क्यूंकि इसमे saxtti (कोंकणी )भाष का इस्तेमाल किया जाता है जिसे साउथ goa मे बोला जाता है और वहां कैथोलिक ज्यादा रहते है।

इस tiatr की एक और खासियत है वो ये कि इसमे 7 act,1 act 5 act होता है ।आम तौर पर 7 act play होता है (माने सात अंतराल )१० मिनट का act और १० मिनट का कन्तारा मतलब एक tiatr ७ भागों मे बँटा होता है और हर भाग तकरीबन १० मिनट का होता है और पहला act ख़त्म होने पर परदा गिरता है और कन्तारा ( songs ) शुरू होता है ।जिसमे लाइव ओर्केस्ट्रा होता है । और ये songs या कन्तारा tiatr का पार्ट नही होता है बल्कि बिल्कुल अलग ही होता है ।और जैसे ही कन्तारा ख़त्म होता है तो परदा उठता है और अगला सीन शुरू हो जाता है। यहाँ के लोगों का मानना है कि songs इसलिए गाये जाते है जिससे दर्शक tiatr के सीरियस मूड से बाहर निकल सके ।

जब से हम गोवा आए है तब से tiatr के बारे मे सुनते और अखबार मे पढ़ते चले रहे हैपंजिम की कला अकेडमी मे तो अक्सर ही इसके शो होते रहते है।पर हम किसी न किसी वजह से उन्हें देख नही पाये । खैर २ साल बाद कल हम पहली बार tiatr देखने गए ।इस कोंकणी tiatr का नाम था vont lagim kaliz pois जिसमे परिवार की इकलौती बहू का मर्डर हो जाता है और शक घर वालों पर जाता है क्यूंकि पुलिस की पूछ ताछ के दौरान हर कोई अलग-अलग बयान देता है ।और आखिरी act मे दिखाते है कि असल मे बहू का मर्डर नही हुआ था बल्कि सास सपना देख रही होती है कि उसकी बहु का मर्डर हो गया है ।अंत मे एक हैप्पी फॅमिली दिखाई गई । इसका अंत बिल्कुल ही निराला था जो बहुत पसंद आया । इस मे जब भी पुलिस परिवार के किसी सदस्य से पूछ-ताछ करती थी तो सीक्वेंस को flashback के जरिये दिखाया जाता था ।

यहाँ हम एक वीडियो लगा रहे है जिसे आप देखिये और तभी आपको कन्तारा और act के बारे मे पता चलेगा । अब वीडियो देखने के लिए ३-४ मिनट तो देने ही पड़ेंगे । :)

और हाँ जैसे ही song ख़त्म होगा तो (बंद मत कर दीजियेगा क्यूंकि )२-३ सेकंड के लिए डार्क दिखेगा क्यूंकि उस समय परदा उठा रहा था और फ़िर एक छोटा सा सीन दिखेगा । अब ये आपके ऊपर है कि आप देखते है या नही ।

(वैसे समझने के लिए सीधे-साधे शब्दों मे कहे तो इसे थिएटर का ही एक रूप कह सकते है )

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Thursday, October 2, 2008

अक्तूबर के दिन महान शख्सियत का जन्म हुआ था महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री जी का गाँधी जी ने अहिंसा का तो शास्त्री जी ने जय जवान जय किसान का नारा दिया

और इस बार अक्तूबर को ईद का मुबारक दिन भी है तो आप सभी को ईद मुबारक
तो कुछ गीत सुन लिए जाए



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Wednesday, October 1, 2008

हमारी ये पोस्ट कुछ-कुछ फुरसतिया जी से प्रेरित है । यहाँ गोवा मे चूँकि हरियाली बहुत है और हमारे घर मे भी पेड़-पौधे बहुत है तो यहाँ पर कौवे और कोयल दोनों ही बहुत दिखते है वैसे आम तौर पर माना जाता है कि कोयल दिखाई नही देती है और वो छुप कर बोलती है पर यहाँ पर कोयल अक्सर बोलती हुई दिखाई दे जाती है आज सुबह जब कोयल और कौवे की आवाज सुनी तो वीडियो बनाया और एक पोस्ट के रूप मे ये कुछ अलग सी जुगलबंदी आप लोगों के लिए पेश है

और कौवे तो गोवा मे इतने अधिक है कि अगर आप ढलती हुई शाम को किसी पेड़ के नीचे से गुजरे तो सिर का ध्यान रखना पड़ता है वरना कौवे जी का प्रसाद मिल जाता है :)

यहाँ तो हम रोज सुबह (करीब साढ़े आठ से नौ के बीच मे ) कौंवों को कुछ कुछ खाने को जरुर डालते है पहले तो - कौवे आते थे पर अब जैसे ही हम बालकनी मे जाते है और रोटी के टुकड़े डालना शुरू करते है कि हर तरफ़ से कौवे उड़-उड़ कर जाते है खाने के लिए

वैसे कौवों को खाना देने का एक कारण और भी है वो ये है कि अगर हम उन्हें खाना नही डालते है तो ये कौवे हमारे कैरी राम (doggi) के खाने पर हमला बोल देते है पर खाना देने से अब हर समय तो नही पर कभी-कभी कौवे कैरी का खाना खाते है और वैसे अब ये कौवे इतने निडर हो गए है कि अगर हम लोग बैठे रहते है तब भी वो आकर खाना खाते रहते है

दिल्ली मे तो कौवा और कोयल ज्यादा दिखाई देते ही नही है कि उनकी कांव-कांव या कुहू- कुहू सुनी जा सके

खैर गोवा मे ऐसी बहुत सी बातें जो कभी बचपन मे सुनते-देखते और महसूस करते थे उन सबका यहाँ पर मजा ले रहे है :) जैसे कोयल जब बोलती है तो अगर हम भी वैसे ही कुहू-कुहू बोले तो कोयल कुछ देर तक तो बोलती है पर फ़िर चुप हो जाती है बचपन मे तो खूब किया है और अभी कल यहाँ पर भी । :)

तो चलिए कोयल और कौवे की जुगलबंदी का आनंद उठाइए और बताइये कैसी लगी ये जुगलबंदी :)वीडियो अपलोड होने के लिए - मिनट लगता है
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Tuesday, September 30, 2008

कल ज्ञान जी ने अपनी पोस्ट मे जरदारी और पालिन का जिक्र किया और पी फैक्टर के बारे मे भी जिक्र किया था पर देखिए आज जरदारी के ख़िलाफ़ फतवा जारी हो गया । अब बेचारे जरदारी करें तो क्या करें ।

लाहौर की लाल मस्जिद के मौलाना अब्दुल गफ्फार ने जरदारी की इस तरह की बात को गैर इस्लामिक कहा है और साथ ही ये भी कहा है कि पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देश के लिए ये शर्मनाक बात है । जिसमे जरदारी ने पालिन को gorgeous तो कहा ही साथ ये भी कह दिया कि अब उन्हें समझ आया कि सारा अमेरिका पालिन का दीवाना क्यूँ है । अब यही पर जरदारी रुक गए होते तो कुछ गड़बड़ नही होती पर जरदारी पालिन से कुछ अधिक ही प्रभावित हो गए थे इसीलिए तो उन्होंने पालिन से हाथ मिलाते हुए ये भी कह दिया कि (If he's (the aide) insisting, I might hug. )

अब देखें जरदारी के ख़िलाफ़ जारी किया गया फतवा वापिस लिया जाता है या नही ।

कल पितृ पक्ष के समापन के साथ आज से नवरात्र की शुरुआत हो रही है तो इस पहले दिन की शुरुआत क्यूँ माँ की स्तुति से की जाए
नवरात्र के साथ कितनी बातें याद जाती है जैसे कहीं नौ दिन तक लोग व्रत करते है तो कहीं डांडिया रास (गुजरात)खेलते है तो कहीं नवरात्र मे चौकी निकालने का चलन है (इलाहाबाद मे ) कहीं घर मे कलश मे जाऊ के बीज डाले जाते है और नौवें दिन हवन किया जाता है तो कहीं नौवें दिन कन्या पूजी जाती है और कहीं दुर्गा पूजा के (कोलकता )बड़े-बड़े मंडप सजते हैतो आप भी इन नौ दिन यानी नवरात्रों का आनंद उठाइए व्रत करिए डांडिया रास करिए । :)

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Monday, September 29, 2008

कल हमने ये फ़िल्म देखी और हमे अच्छी भी बहुत लगी तो सोचा कि आज इसी के बारे मे बात कर ली जाए श्याम बेनेगल ने इस फ़िल्म को बनाया है अब श्याम बेनेगल को तो आम तौर पर लोग बहुत ही संजीदा सिनेमा के लिए जानते है जैसे मंथन ,अंकुर,भूमिका जैसी फिल्में उन्होंने बनाई है पर ये वेलकम टू सज्जनपुर उन सभी फिल्मों से अलग फ़िल्म है इस फ़िल्म को कॉमेडी फ़िल्म कहना ग़लत है बल्कि इस फ़िल्म को सटायर विथ कॉमेडी कहना ज्यादा उचित होगा

इस फ़िल्म की कहानी एक छोटे से गाँव सज्जनपुर की है और यहाँ रहने वाले लोगों जैसे महादेव कुशवाहा जो की एक पढालिखा नवजवान है और जो लेखक बनते-बनते गाँव वालों की चिट्ठी लिखने वाला बन जाता है तो वहीं कमला है जो अपने पति का इंतजार कर रही है और इसी गाँव की एक मौसी है जो अपनी बेटी की शादी के लिए परेशान है (किस तरह वो हम नही बता रहे है )तो इसी गाँव का गुंडा अपनी बीबी को चुनाव मे खड़ा करना चाहता है इसके अलावा भी बहुत कुछ है श्याम बेनेगल ने अपने देश मे हो रही कई ताजा घटनाओं को बड़े ही दिलचस्प अंदाज मे दिखाया है

इस फ़िल्म के सभी कलाकारों जैसे श्रेयस तलपदे अमृता राव ,इला अरुण,दिव्या दत्ता ,ने तो बहुत ही अच्छी एक्टिंग की है पर साथ ही हर एक छोटे से छोटे कलाकार ने भी बहुत ही अच्छी एक्टिंग की है वैसे आज के समय को देखते हुए श्याम बेनेगल ने इस फ़िल्म मे कुल गीत डाले है वैसे गानों की कोई ख़ास जरुरत नही है पर इसका सीताराम सीताराम गाना तो हमें बहुत ही अधिक अच्छा लगा ।और हाँ इस फ़िल्म मे बोली गई भाषा बहुत ही मीठी है

वैसे इस फ़िल्म के लिए हमारा तो ये कहना है की जो लोग फ़िल्म नही देखते है या फिल्मों देखना ज्यादा पसंद नही करते है वो भी ये फ़िल्म अवश्य देखे . वो इसलिए कि एक तो इस फ़िल्म को देखने के बाद मन ख़राब नही होता है और दूसरे ये एक बहुत अच्छी फ़िल्म है और सबसे बड़ी बात की फ़िल्म कही पर भी बोर नही करती है और फ़िल्म देखने के बाद सर मे कोई दर्द भी नही होता है :)

लो इतनी बड़ी समीक्षा लिख दी और अभी भी सोच रहे है कि फ़िल्म देखे या देखे :)

Friday, September 26, 2008

आजकल ऑस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीम भारत मे टेस्ट मैच खेलने के लिए आई हुई है और सबसे अजीब बात ये है की ऑस्ट्रेलिया की टीम के असिस्टेंट कोच और कोई नही गुरु ग्रेग ही है । गुरु ग्रेग ने टीम इंडिया का जो हाल किया था उससे तो हम सभी वाकिफ है पर इस बार ऑस्ट्रेलिया की टीम के साथ गुरु ग्रेग को देख कर बड़ा ही अजीब लगा और हमारी भारतीय संस्कृति भी कितनी दिलदार है कि जिस ग्रेग ने टीम इंडिया का बेडा गर्क किया उसी का तिलक लगा कर स्वागत कर रहे है । यूँ तो आई.पी.एल.के दौरान भी गुरु ग्रेग दिखाई दिए थेपर इस बार की बात कुछ अलग है

वैसे एक बात है जब भी ऑस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीम भारत दौरे पर आती है वहां का मीडिया कभी टीम इंडिया के खिलाडी तो कभी सेलेक्शन तो कभी सेलेक्टर्स को लेकर काफ़ी कुछ लिखना शुरू कर देता है।कुछ -कुछ divide and rule वाले formule पर आधारित । जैसे आज ही अखबार मे ख़बर छपी है कि कुंबले को धोनी को टेस्ट की कप्तानी सौंप देनी चाहिए ।क्यूंकि धोनी हर तरह के खेल की जिम्मेदारी उठाने मे सक्षम है ।अरे अभी तो टेस्ट मैच शुरू भी नही हुआ और उन लोगों ने अपनी पारी खेलनी शुरू भी कर दी। तो कभी तेंदुलकर और सौरव को लेकर की वो कितने महान खिलाडी है और अभी उन्हें और कितने सालों तक खेलना चाहिए वगैरा-वगैरा ।अरे भाई अपने देश और खिलाड़ियों की सोचो काहे को टीम इंडिया के पीछे पड़े रहते हो ।

अब गुरु ग्रेग ऑस्ट्रेलिया की टीम को टीम इंडिया की कमजोरियों से कितना फायदा करवाते है ये देखना है क्यूंकि गुरु ग्रेग को टीम इंडिया की वीकनेस और स्ट्रेंथ दोनों के बारे मे काफ़ी जानकारी तो होगी ही । अब तो अपनी टीम इंडिया को इस ऑस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीम को हराकर गुरु ग्रेग को करारा जवाब देना चाहिए ।

Thursday, September 25, 2008

जी हाँ १९८३ कि विश्व कप विजेता भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान कपिल देव अब territorial army के लेफ्टिनेंट कर्नल बन गए है । अगर आपने ये ख़बर नही पढ़ी है तो पूरी ख़बर यहाँ पर पढ़िये।

Monday, September 22, 2008

करीब ढाई महीने दिल्ली रहकर पिछले शनिवार वापिस गोवा आ गए । वैसे इस बार दिल्ली से गोवा का हवाई सफर भी जरा सफ्फरी मामला रहा । :) कैसे ? अरे बताते है ना ।

हर बार की तरह इस बार भी हमने jetlite की फ्लाईट बुक की थी पर इस बार का jetlite का अनुभव हर बार की तरह का नही था । एयर पोर्ट पर पहुँच कर जब चेक इन करने के लिए गए तो काउन्टर पर बैठी लड़की ने हमसे पूछा कि कौन सी सीट लेना पसंद करेंगे तो हमने विण्डो सीट कहा । और जब प्लेन मे पहुंचे तो विण्डो सीट को देख कर समझ नही आया कि आख़िर उसने प्लेन मे सीट का ऑप्शन पूछा ही क्यूँ था। असल मे हुआ ये थे कि हमे A 10 सीट मिली थी जहाँ पर खिड़की थी ही नही। वैसे वहां इमरजेंसी एग्जिट भी नही लिखा था । तो सबसे पहले तो एयर होस्टेस को बुलाकर सीट बदलने के लिए कहा तो उसने कहा कि जब फ्लाईट टेक ऑफ़ करने लगेगी माने जब बोर्डिंग बंद हो जायेगी तब वो हमारी सीट change कर देगी । और जैसे ही प्लेन का दरवाजा बंद हुआ तो उसने हमें आगे की लाइन जो की पूरी खाली थी उस सीट पर शिफ्ट होने को कहा । तो इस तरह सीट का मसला तो हल हो गया ।

अब जब जून मे हम गोवा से दिल्ली गए थे तब तो jetlite मे बैठते ही वेट टॉवेल दिया गया था फ़िर टॉफी फ़िर पानी,और खाना वगैरा सर्व किया गया था पर दिल्ली से वापसी मे jetlite मे फ्लाईट जब उड़ गई तब भी न तो टॉफी और न ही पानी वगैरा सर्व किया गया ।बल्कि एक अनौन्समेंट किया गया की कैफे काफ़ी डे की तरफ़ से खाने-पीने की चीजें उपलब्ध है आप उन्हें खरीद कर खा सकते है । और साथ ही एक scratch and win के बारे मे भी बताया । १५ मिनट बाद एयर होस्टेस ने scratch and win वाला card सभी यात्रियों को दिया । और हमने scratch किया तो उसमे लुईस क्वार्टज की एक घड़ी निकली जिसका दाम तो ३९९० लिखा था और जिसे एयर पोर्ट पर ५०० रूपये देकर लिया जा सकता था। (एक यही मन को सांत्वना देने के लिए था की चलो कम से कम ५०० रूपये मे घड़ी तो मिली । अब घड़ी कैसी है ये तो समय ही बतायेगा । ) :)

खैर जब एयर होस्टेस आई और हमसे ऑर्डर करने को कहा । तो ऑर्डर करने से पहले हमने उससे पूछा कि क्या अब इस फ्लाईट मे भी खाना वगैरा सर्व करना बंद कर दिया गया है। तो उसने हाँ कहा।

और जब हमने उससे पूछा कि ऐसा कब से हुआ तो उसने बताया कि ८ अगस्त से।

खैर हमने उससे सैंडविच और काफ़ी ली और काफ़ी पीते हुए सोचते रहे कि jetlite भी अब बाकी एयर लाईन्स (लो फेयर एयर लाईन्स ) की तरह ही हो गई है । हालाँकि अब तो कोई भी एयर लाईन्स लो फेयर की नही रह गई है । (वैसे अब कुछ लो फेयर एयर लाईन्स मे पानी फ्री मे देते है )

साढ़े पाँच हजार का टिकट है (जो अभी तक तो लो फेयर मे नही माना जाता था ) और एक छोटी बोतल पानी और चार टॉफी देने मे इनका भला कितना खरचा हो जायेगा । और हमने बैठे-बैठे एक मोटा सा हिसाब लगाया तो लगा की अधिक से अधिक २५-५० हजार का खरचा होगा अगर एक एयर लाईन्स की ५० फ्लाईट चल रही हो तो ।

पता नही हमारा हिसाब कितना ठीक है पर jetlite से यात्रा करने के बाद हम ये सोचने पर मजबूर हो गए कि जब हम दिल्ली से इलाहाबाद राजधानी से गए थे तो रेलवे ने १३०० रु के किराये मे पानी की बड़ी बोतल ,लंच(जिसमे सूप और ice-cream ),शाम की चाय -नाश्ता और डिनर भी सर्व किया था ।


तो ये तो था हमारी वापसी के सफर का वर्णन और वापसी मे प्लेन से ही २-४ फोटो खींची है जिन्हें यहाँ लगा रहे है . शुरू मे लौटकर २-४ दिन तो फुर्सत ही नही मिली कि ब्लॉग जगत खोला जाए और जब फुर्सत हुई तो कम्प्यूटर ने चलने से इनकार कर दिया । खैर अब आज से हमारे कम्पूटर जी का दिमाग भी ठीक हो गया है । :)

नोट -- हमारी इलाहाबाद यात्रा ()वाली पोस्ट पर ज्ञान जी ने पूछा था की हमने दो हफ्ते लिखने मे क्यूँ लगाए थे तो वो इसलिए क्यूंकि हम उस समय अपनी इलाहाबाद यात्रा का पूरा वृत्तांत जो लिख रहे थे । :)

और इसीलिए इस बार एक हफ्ते मे ही लिख दिया । :)

Friday, September 12, 2008

एक हफ्ते इलाहाबाद मे रहकर २९ अगस्त को हम इलाहाबाद से वापिस दिल्ली के लिए प्रयाग राज एक्सप्रेस जो रात ९.३० बजे चल कर सुबह ६.५० पर दिल्ली पहुँचती है उस से चले पर इस बार भी रास्ते मे कुछ न कुछ तो होना ही था । :) जब हम ट्रेन मे अपने कोच A-3 मे अपनी सीट पर पहुंचे तो देखा कि हमारी आधी से ज्यादा सीट पर खूब सारा सामान रखा है बैग और सूट केस वगैरा और नीचे जहाँ सामान रखते है वहां भी जगह खाली नही थी। गनीमत है कि हमारे पास एक छोटी सी अटैची और एक बैग ही था।तो सामने वाली बर्थ पर बैठी हुई महिला से पूछा कि क्या ये आपका सामान है तो उसने इनकार किया तभी एक और सज्जन ने लपक कर बताया कि ये उनका सामान है और चूँकि वो ५-६ लोग एक साथ है और सबकी सीट अलग-अलग है इसलिए यहाँ पर सबका सामान एक साथ रख दिया है । ये सुनकर खीज तो बहुत हुई पर फ़िर कुली से कहा कि इसे किसी तरह नीचे रख दो।

जैसे ही ट्रेन चलने को हुई कि उस ग्रुप मे से एक सज्जन खाने का एक पैकेट लेकर आए और उसे भी उसी सामान पर रख कर चला गए । ट्रेन ठीक समय ९.३० पर चल दी और ट्रेन चलने के १० मिनट बाद उस ग्रुप मे से एक सज्जन आए और खाने का पैकेट ले जाते हुए अपने ग्रुप के बाकी लोगों से बोले कि मैं खाना ला रहा हूँ। ये सुनकर तो हमे और भी खीज हुई कि खाना तो ले जा रहे है पर सामान हटाने की कोई जल्दी नही । तो हमने उन्हें रोक कर कहा कि जब आप खाना ले ही जा रहे है तो सामान भी लेते जाइए। तो बेचारे अचकचा कर बोले कि मैम अभी थोडी देर मे ले जाते है।तो हमने कहा कि ठीक है पर आप सामान को खिड़की से हटाकर रख दे क्यूंकि हम उधर बैठना चाहते है। खैर उन्होंने सामान शिफ्ट किया और खाना खाने चले गए।

पर जब १० बज गया और टी.टी. आकर टिकट चेक कर रहा था तब उनमे से एक सज्जन टी.टी.से कहने लगे कि सबकी सीट एक ही कोच मे कर दे।हम मन ही मन खुश हो रहे थे कि चलो अब तो ये सामान हटा लेंगे पर कहाँ ऐसी हमारी किस्मत। टी.टी. ये कह कर कि अभी थोडी देर बाद देखेंगे चला गया। सवा दस बजे फ़िर उनमे से एक को हमने बुलाया और उन्हें अपना सामान ले जाने को कहा तो उन्होंने बमुश्किल सामान तो हटाया पर एक बड़ा बैग और एक छोटा प्लास्टिक का पैकट हमारी सीट पर ये कहकर छोड़ दिया कि अभी १० मिनट मे ले जाते है।
इसी बीच मे ऊपर की बर्थ जिन सज्जन की थी उनकी जान-पहचान के लोग मिल गए और वो लोग हमारी और सामने वाली महिला की सीट पर बैठ कर गप्पे मारने लगे। और फ़िर हमारी और उस महिला की भी बात शुरू हुई आख़िर समय तो काटना ही था क्यूंकि एक तो सामान रक्खा था और उसपर से वो लोग सोने के मूड मे ही नही थे क्यूंकि सरकार और कोर्ट सबकी बातें जो उन्हें करनी थी। :)

१०.३० बजे हम दोनों महिलाओं के सब्र का बाँध टूट गया और चूँकि हम दोनों महिलाओं की नीचे की बर्थ थी इसलिए हम लोगों ने सीट पर चादर वगैरा बिछाना शुरू किया जिससे वो लोग गप्पें मारना बंद करके सोने जाएँ ।खैर एक बार फ़िर उन सज्जन को बैग ले जाने के लिए भी कहना पड़ा।और तब कहीं जाकर हम लोग सो पाये।

पर इस बार भगवान और रेलवे को हमारी यात्रा मे कुछ न कुछ गड़बड़ तो करनी ही थी। रात भर ट्रेन ठीक से चलती रही और गाजियाबाद जब क्रॉस किया तो लगा कि कहीं ट्रेन दिल्ली before time ना पहुँच जाए । पर ऐसे नसीब कहाँ थे गाजियाबाद से चली तो जैसे ही यमुना क्रॉस किया कि ट्रेन रुक ही गई ऐसा लग रहा था मानो दिल्ली कहीं दूर चली गई है। और ट्रेन मे बैठे-बैठे इतना कुढे कि बस पूछिए मत। खैर फ़िर २० मिनट का सफर ४० मिनट मे पूरा हुआ। माने झूलते-झूलते दिल्ली पहुंचे।

और इस तरह हमारी इलाहाबाद यात्रा पूरी हुई। :)

Thursday, September 11, 2008

ओफ हो पिछले एक हफ्ते से हर चैनल और यहाँ तक की अखबारें मे भी तरह-तरह की खबरें देखने और पढने को मिल रही थी । टी.वी.चैनल वालों ने तो प्रलय अरे नही- नही महाप्रलय ही ला दी थी।कि बुधवार को दुनिया मे प्रलय आ जायेगी और दुनिया नष्ट हो जायेगी । महाप्रलय की न्यूज़ के साथ-साथ यही न्यूज़ वाले ज्योतिषियों को भी लेकर आ गए थे कि कौन सी राशि वालों को क्या करना चाहिए ।कैसे अपना बचाव करे।क्या दान करें। और किस ग्रह -नक्षत्र का किस राशि का पर क्या असर पड़ेगा वगैरा-वगैरा।

पर परसों रात मे अचानक स्टार न्यूज़ ने इस संभावित महाप्रलय को महाप्रयोग कहना शुरू किया और दीपक चौरसिया वही आज तक वाले ने (अरे आपको पता नही कि दीपक अब आज तक पर नही बल्कि स्टार न्यूज़ पर दिखते है . :) ) लोगों को समझाना शुरू किया कि इससे घबराएं नही ये एक महा प्रयोग है वगैरा-वगैरा। और ये भी कि इस प्रयोग से जुड़ी खबरें वो और उनका चैनल लोगों तक पहुंचाते रहेंगे । अब सबसे तेज चैनल से आपको रक्खे आगे वाले चैनल मे जो आ गए है। :)

अरे भइया जब प्रलय आएगी तो न्यूज़ चैनल कौन देख रहा होगा। और जब प्रलय आनी होगी तो भला कौन उसे रोक सकता है।हम लोग तो छुटपन मे सुनते थे कि जब शिव जी अपनी तीसरी आँख खोलते है तभी प्रलय आती है और सृष्टि का विनाश होता है। एक आम और खासआदमी के जीवन मे तो रोज ही कोई कोई प्रलय आती ही रहती है

अब जैसे अमिताभ बच्चन ने एम.एन.एस.से माफ़ी मांगी पर एम.एन.एस.का कहना है कि जया सार्वजनिक रूप से टी.वी.पर माफ़ी मांगे।क्यूंकि मराठी भाषा का अपमान टी.वी.पर हुआ था जिसे सब लोगों ने देखा था। तो वहीं शाह रुख खान को ख़ुद को दिल्ली वाला कहने पर बाल ठाकरे नाराज है।ये तो बड़ी ही आम बात है कि हम जहाँ पले-बढे होते है अपने को वहीं का बताते है। तो अंसल बंधुओं को जेल जाना पड़ेगा ( उपहार सिनेमा वाले ) क्यूंकि उनकी bail रिजेक्ट हो गई है।वहीं आरुशी के केस मे सी.बी.आई .के पास अभी तक कोई प्रूफ़ नही है कि आरुशी को किसने मारा और क्यूँ माराऔर दिल्ली की सड़कों पर तो रोज ही ब्लू लाइन बस अपना प्रलय ढाती रहती है। और ब्लू लाइन की ये प्रलय कितने परिवारों के जीवन भर के लिए महा प्रलय बन जाती है। बिहार मे आई प्रलय क्या किसी इस महाप्रलय से कम है।

और आज ११ सितम्बर है . आज का दिन अमेरिका के लिए किसी महाप्रलय से कम नही था जब w.t.c. को प्लेन से गिराया गया थाऔर उन परिवारों के लिए आज भी ये दिन महाप्रलय से कम नही है

और अपने ब्लॉगिंग मे भी हर थोड़े दिन पर कोई कोई प्रलय ही जाती है

खैर टी.वी.generated महाप्रलय से हम सब बच गए । अब आशा करते है की ब्लॉगिंग मे आई प्रलय से भी हम जल्दी ही बच जायेंगे।