Friday, September 12, 2008

एक हफ्ते इलाहाबाद मे रहकर २९ अगस्त को हम इलाहाबाद से वापिस दिल्ली के लिए प्रयाग राज एक्सप्रेस जो रात ९.३० बजे चल कर सुबह ६.५० पर दिल्ली पहुँचती है उस से चले पर इस बार भी रास्ते मे कुछ न कुछ तो होना ही था । :) जब हम ट्रेन मे अपने कोच A-3 मे अपनी सीट पर पहुंचे तो देखा कि हमारी आधी से ज्यादा सीट पर खूब सारा सामान रखा है बैग और सूट केस वगैरा और नीचे जहाँ सामान रखते है वहां भी जगह खाली नही थी। गनीमत है कि हमारे पास एक छोटी सी अटैची और एक बैग ही था।तो सामने वाली बर्थ पर बैठी हुई महिला से पूछा कि क्या ये आपका सामान है तो उसने इनकार किया तभी एक और सज्जन ने लपक कर बताया कि ये उनका सामान है और चूँकि वो ५-६ लोग एक साथ है और सबकी सीट अलग-अलग है इसलिए यहाँ पर सबका सामान एक साथ रख दिया है । ये सुनकर खीज तो बहुत हुई पर फ़िर कुली से कहा कि इसे किसी तरह नीचे रख दो।

जैसे ही ट्रेन चलने को हुई कि उस ग्रुप मे से एक सज्जन खाने का एक पैकेट लेकर आए और उसे भी उसी सामान पर रख कर चला गए । ट्रेन ठीक समय ९.३० पर चल दी और ट्रेन चलने के १० मिनट बाद उस ग्रुप मे से एक सज्जन आए और खाने का पैकेट ले जाते हुए अपने ग्रुप के बाकी लोगों से बोले कि मैं खाना ला रहा हूँ। ये सुनकर तो हमे और भी खीज हुई कि खाना तो ले जा रहे है पर सामान हटाने की कोई जल्दी नही । तो हमने उन्हें रोक कर कहा कि जब आप खाना ले ही जा रहे है तो सामान भी लेते जाइए। तो बेचारे अचकचा कर बोले कि मैम अभी थोडी देर मे ले जाते है।तो हमने कहा कि ठीक है पर आप सामान को खिड़की से हटाकर रख दे क्यूंकि हम उधर बैठना चाहते है। खैर उन्होंने सामान शिफ्ट किया और खाना खाने चले गए।

पर जब १० बज गया और टी.टी. आकर टिकट चेक कर रहा था तब उनमे से एक सज्जन टी.टी.से कहने लगे कि सबकी सीट एक ही कोच मे कर दे।हम मन ही मन खुश हो रहे थे कि चलो अब तो ये सामान हटा लेंगे पर कहाँ ऐसी हमारी किस्मत। टी.टी. ये कह कर कि अभी थोडी देर बाद देखेंगे चला गया। सवा दस बजे फ़िर उनमे से एक को हमने बुलाया और उन्हें अपना सामान ले जाने को कहा तो उन्होंने बमुश्किल सामान तो हटाया पर एक बड़ा बैग और एक छोटा प्लास्टिक का पैकट हमारी सीट पर ये कहकर छोड़ दिया कि अभी १० मिनट मे ले जाते है।
इसी बीच मे ऊपर की बर्थ जिन सज्जन की थी उनकी जान-पहचान के लोग मिल गए और वो लोग हमारी और सामने वाली महिला की सीट पर बैठ कर गप्पे मारने लगे। और फ़िर हमारी और उस महिला की भी बात शुरू हुई आख़िर समय तो काटना ही था क्यूंकि एक तो सामान रक्खा था और उसपर से वो लोग सोने के मूड मे ही नही थे क्यूंकि सरकार और कोर्ट सबकी बातें जो उन्हें करनी थी। :)

१०.३० बजे हम दोनों महिलाओं के सब्र का बाँध टूट गया और चूँकि हम दोनों महिलाओं की नीचे की बर्थ थी इसलिए हम लोगों ने सीट पर चादर वगैरा बिछाना शुरू किया जिससे वो लोग गप्पें मारना बंद करके सोने जाएँ ।खैर एक बार फ़िर उन सज्जन को बैग ले जाने के लिए भी कहना पड़ा।और तब कहीं जाकर हम लोग सो पाये।

पर इस बार भगवान और रेलवे को हमारी यात्रा मे कुछ न कुछ गड़बड़ तो करनी ही थी। रात भर ट्रेन ठीक से चलती रही और गाजियाबाद जब क्रॉस किया तो लगा कि कहीं ट्रेन दिल्ली before time ना पहुँच जाए । पर ऐसे नसीब कहाँ थे गाजियाबाद से चली तो जैसे ही यमुना क्रॉस किया कि ट्रेन रुक ही गई ऐसा लग रहा था मानो दिल्ली कहीं दूर चली गई है। और ट्रेन मे बैठे-बैठे इतना कुढे कि बस पूछिए मत। खैर फ़िर २० मिनट का सफर ४० मिनट मे पूरा हुआ। माने झूलते-झूलते दिल्ली पहुंचे।

और इस तरह हमारी इलाहाबाद यात्रा पूरी हुई। :)

14 Comments:

  1. Anil Pusadkar said...
    rail ka safar chahe jaisa bhi yaad zarur rehta hai.achha raha aapka allahabad ka safar
    फ़िरदौस ख़ान said...
    बहुत ख़ूब...अच्छी तहरीर है...
    रंजना [रंजू भाटिया] said...
    चलिए खट्टी मिट्ठी यादे जुड़ गई इस यात्रा के साथ ...रोचक रहा यह सफर
    अभिषेक ओझा said...
    भारतीय रेल का सफर ... ऐसा ही तो होता है !
    Gyandutt Pandey said...
    चलिये, राम-राम कर पंहुंच गये! पर पोस्ट पोस्ट करने में बड़ी देर लगाई। दो हफ्ता?!
    Zakir Ali 'Rajneesh' said...
    Rochak yatra vrittant.
    मोहन वशिष्‍ठ said...
    कुछ भी कहो आपकी लेखनी में दम है अच्‍छी यात्रा का विवरण अच्‍छे ढंग से दिया है आपने बधाई हो
    Shastri said...
    कुछ महीनों के अंतराल से चिट्ठाजगत में वापस आ कर जाने पहचाने चिट्ठों को पढने का मौका फिर से मिला है.

    आपके लेखन में आज भी वही ताजगी है जो हमेशा होती थी!!



    -- शास्त्री जे सी फिलिप

    -- समय पर प्रोत्साहन मिले तो मिट्टी का घरोंदा भी आसमान छू सकता है. कृपया रोज कम से कम 10 हिन्दी चिट्ठों पर टिप्पणी कर उनको प्रोत्साहित करें!! (सारथी: http://www.Sarathi.info)
    अनूप शुक्ल said...
    अच्छा लिखा। लेकिन आप ज्ञानजी की बात कोई जबाब दे दीजिये। बाजिब सवाल है!
    लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...
    गँगा माई और तीर्थराज प्रयाग को नमन ! दूरसे ही .
    ऐसी यात्रा करवाती रहीये ममता जी ...
    Rohit Tripathi said...
    Bahut acha lekh... Aakhir aap bhi hamare ghar ghoom hi aayi.. Allahabad hamara ghar hai :-)


    New Post :
    I don’t want to love you… but I do....
    मीनाक्षी said...
    यात्रा संस्मरण बहुत रोचक...... रेल-यात्रा के खट्टे मीठे अनुभव जानकर तो हम भी सोच रहे है कि जल्दी हम भी अपने देश पहुँचे....
    bavaal said...
    Mamta jee, yatra vrtaant bahut achha hai jee aapka lekin jo khaane peene vaalaa blog hai na uske bare main please meri beebi ko na bataaiyega. Ek to aap itna achha explain kartee hain aur vo hain ke bahut hee achha cook kartee hain. Mere vajan ka kya hoga ab mujhe isee ki chinta hai. Aapke likhne ka tareeka bahut achha hai mamta jee, carry on with all of us. We are with you.
    राज भाटिय़ा said...
    बहुत ही सुंदर विवरण दे रही हे आप अपनी यात्रा का, धन्यवाद

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