Sunday, December 30, 2007

अभी कुछ दिन पहले शास्त्री जी की एक पोस्ट पढ़ी थी जिसे पढ़कर हमने खूब सोचा कि क्या वाकई एक और साल बेकार गया। बहुत सोचने पर लगा कि नही इतना भी बेकार नही गया हैयूं तो आम तौर पर हर साल जीवन मे कुछ अच्छा तो कुछ बुरा होता है२००७ मे और कुछ अच्छा भले ही हुआ हो पर एक बात बहुत अच्छी हुई कि हम ने ब्लॉगिंग करना शुरू कर दिया। :)
वैसे २००७ हमारे लिए बहुत मायने रखता है। हाँ ये जरुर है कि ये जो कुछ भी हुआ उसे लक्ष्य को पाना भले ही न कहें पर इन सबका हमारे जीवन मे महत्त्व जरुर है।यूं तो ये सब बहुत ही छोटी-छोटी बातें है पर फिर भी हम कुछ बातों का जिक्र यहां करना चाहेंगे।

१)इस २००७ मे ही हमने कंप्यूटर चलाना सीखा। इससे पहले भी कई बार सीखा था पर हर बार कुछ दिन करने के बाद छोड़ देते थे। पर इस साल फरवरी से हमने कंप्यूटर पर जो काम करना शुरू किया तो अभी तक कर रहे है। :)

२)आख़िर इसी २००७ मे हमने ब्लॉगिंग की दुनिया मे कदम रखा जहाँ शुरू मे तो सभी लोग अनजाने थे ,परिवार छोटा था पर धीरे-धीरे यही अनजाने लोग अपने होते गए और ये परिवार बड़ा होता गया। आज इस ब्लागिंग की बदौलत ही हम एक साथ इतने लोगों से जुडे हुए है , हम तो यही मानते है।

३)इसी साल हमारी शादी के पचीस साल पूरे हुए है। जो लक्ष्य पाना तो नही है पर खुशी का मौका जरुर है।

४)और आख़िर मे हम भी इस साल ब्लॉगिंग के लिए एक लक्ष्य को निर्धारित करते है कि हमने जो अपना एक नया ब्लॉग सवा सेर शोपर नाम से बनाया तो इसी साल है, उसमे लिखना नए साल से शुरू करेंगे

भाई हम तो ऐसी ही छोटी-छोटी बातों मे खुश होते हैचलिए बहुत हो गया अब अपना किस्सा यहीं खतम करते है






Friday, December 28, 2007

इस सवाल पूछने का एक कारण है वो ये कि ये सांप ( नाग का बच्चा जैसा कि हमारी झाडू लगाने वाली कह रही है )हमारे घर मे खाने के कमरे (dinning room )की बालकनी मे निकला था। क्यूंकि येसांप का बच्चा दरवाजे के पीछे छिपा हुआ था इसलिए झाडू वाली ने इसे पहले नही देखा और उसने जैसे ही दरवाजे के पीछे झाडू लगाई कि ये सांप का बच्चा बाहर आ गया ।झाडू वाली इसे देख कर डर कर जोर से चिल्लाई और जब हम वहां ये देखने को पहुंचे की झाडू वाली आख़िर चिल्लाई क्यूं तो हमारे भी होश उड़ गए इन छोटे मियां को देख कर। बिल्कुल काला ये बच्चा बार-बार अपना फन उठाता था और जीभ निकाल रहा था जिसे देखकर और भी डर लग रहा था

अब सवाल ये था कि इसे भगाया कैसे जाये क्यूंकि ये बच्चा अपने आप जा नही पा रहा था।बार-बार ये दीवार पर चढ़ता तो था पर दीवार ऊँची होने की वजह से बाहर नही जा पा रहा था।और नाली से बाहर शायद ये जाना नही चाहता था। इसलिए कभी ऊपर कभी नीचे ये इधर-उधर घूमता रहा और इसी बीच हमने इसकी फोटो खींच ली। :)

खैर हम लोगों की हिम्मत नही थी इसे भगाने या मारने की।चूँकि घर मे कुछ काम चल रहा था इसलिए कुछ मजदूर थे तो उन्हें ही बुलाया इसे बाहर निकलने के लिए।


हमारी झाडू वाली को ये डर था कि अगर इसे छोड़ दिया गया तो या तो ये या फिर( इसके माँ-बाप )कोई बड़ा सांप आकर उसे काट लेगा क्यूंकि उसकी झाडू इस बच्चे को लग गयी थी और सांप कभी भी उसे घायल करने वाले को नही छोड़ता है।क्यूंकि सांप की आँख मे उसकी फोटो गयी होगी।ऐसा उसका कहना था।

वैसे हम लोग बचपन से (गाँव मे ) भी ऐसा ही कुछ सुनते आ रहे है कि अगर सांप को मारो तो उसकी आँख को जरुर फोड़ देना चाहिऐ नही तो मारने वाले की तस्वीर सांप की आँख मे रह जाती है और फिर सांप बदला लेने जरुर आता है। अब इसमे कितनी सच्चाई है पता नही। वैसे फिल्मों मे तो ऐसा खूब दिखाते है।

आपका क्या कहना है ?
क्या वाकई मे ऐसा होता है ?




Thursday, December 27, 2007


२६ दिसम्बर२००४ को जब हम लोग अपनी गाड़ी मे भाग रहे थे (ये वही सफ़ेद क्वालिस है जिसने उस दिन हम लोगों को पार लगाया था। )तो सामने हर तरफ पानी नजर आ रहा था और जिस रास्ते से हम लोग हमेशा जाते थे वहां पानी भर रहा था । और सामने के सीधे रास्ते पर गाड़ी ले जाने का मतलब था पानी की चपेट मे आना ।गाड़ी चलाते हुए पतिदेव ने पूछा किधर से चलें तो हमने बिना कुछ सोचे समझे कहा कि बाएँ से वो जो चडाई वाला रास्ता है । इस पर वो बोले रास्ता पता है तो हमने कहा रास्ता तो पता नही है पर जब इतने सारे लोग जा रहें है तो कहीं ना कहीं तो सड़क निकलेगी ही। और जैसे ही हम लोगों ने गाड़ी बायीं ओर मोड़ी तो जो दृश्य देखा कि बयाँ करना मुश्किल है। हर आदमी के चेहरे पर बदहवासी और डर का भाव और हम लोग भी इस भाव से अछूते नही थे।जो जिस तरह था पानी आता देख उसी हालत मे जान बचाने के लिए भाग रहा था। उस चडाई पर चढ़ते हुए लोगों का हुजूम किसी पिक्चर के सीन से कम नही था।उस समय ये तो अंदाजा लग गया था की कुछ गड़बड़ है पर इतनी ज्यादा तबाही ,कभी सोचा भी नही था। हमने उस से कहा कि कैमरा दो । कुछ फोटो ले ली जाये । तो बेटे ने कहा कि कैमरा उसके पास नही है। कैमरा तो ड्राइंग रूम मे सोफे इस रक्खा था।आपने नही उठाया ।गुस्सा भी आया की कैमरा क्यों नही उठाया पर वहां जान बचाने के लाले पड़े थे कैमरा उठाने की भला किसे याद रहती। गाड़ी चडाई पर रेंगती हुई चल रही थी क्यूंकि पूरी सड़क पर लोग पैदल चल रहे थे । बस चडाई चढ़ते हुए पीछे देखा हम लोगों के घर मे पानी घुस चुका था।चढ़ाई वाला वो रास्ता जिस पर हम लोग कभी भी नही गए थे।क्यूंकि जब कभी भी हम ड्राईवर से पूछते थे की ये चडाई वाला रास्ता कहाँ जाता है तो वो कहता कि मैडम वो रास्ता ठीक नही है। पर २६ को हम लोगों को उसी रास्ते ने बचाया।


चढ़ाई से ऊपर आकर जब सड़क पर पहुंचे तो कुछ लोगों ने गाड़ी की और इशारा किया तो हम लोगों ने गाड़ी रोकी और उतर कर देखा कि आगे बोनट की जाली मे घास-फूस लग गयी थी जो उस समय समुन्दर के पानी के साथ बह कर आई थी। खैर वहां से हम लोगों को पहले तो समझ नही आया कि क्या करें फिर पतिदेव बोले कि ऑफिस चलते है।जैसे ही ऑफिस मे हम गाड़ी से उतरने लगे कि पैर मे बडे जोर का दर्द महसूस हुआ तब पैर देखा तो घुटने के नीचे पूरा काला पड़ गया था और चलने मे तकलीफ हो रही थी।
हम लोग असमंजस की स्थिति मे थे कि एक साहब आये और हमसे पूछने लगे कि मैडम आपने घर लॉक तो किया है ना।( चूँकि इन साहब ने पानी का आना देखा नही था। तब तक पानी का आना कोई बड़ी बात नही समझा जा रहा था। )


हमने कहा लॉक कहाँ करने का समय था । जान बचाकर बस भाग आये है।

तो वही सज्जन बोले कि ऐसे घर खुला होने पर तो कोई भी सामान उठाकर भाग जाएगा। ( मतलब कि उस समय तक किसी को भी ये अंदाजा नही था कि कुछ इतना वीभत्स हुआ है। )

उनके ऐसा कहने पर हमने उन्ही से कहा कि आप हमारे घर जाकर ताला लगा आइये। क्यूंकि एक तो हमारे पैर मे दर्द था और दूसरे पानी का खौफ था।

इसपर वो सज्जन बड़ी तेजी से अपने स्कूटर पर गए और पांच मिनट बाद ही लौट आये और बोले कि मैडम सड़क के मोड़ तक पानी आ गया है और चारों और पुलिस आ गयी है। पुलिस किसी को भी वहां घरों मे जाने नही दे रही है।
( यूं तो ये फोटो भी बाद मे ही ली गयी है पर इस फोटो मे पानी का स्तर जो उस समय ऊपर उठ गया था दिखाई दे रहा है। )

ये सुनकर हमे भी कुछ संतोष हुआ कि चलो कम से कम घर से सामान तो गायब नही होगा।

थोडी देर ऑफिस मे रूक कर हम लोग अपने एक दोस्त के घर आ गए।उनके घर पहुँचते ही सबसे पहले हमने मम्मी को इलाहाबाद फ़ोन किया और कहा कि अगर न्यूज़ मे कुछ देखें तो घबदाएं नही क्यूंकि अंडमान मे बहुत जोर का भूकंप आया है और हम लोग ठीक है।(इस समय तक भी हम लोगों को सुनामी के बारे मे कुछ भी पता नही था। ) बस उसके बाद तो फ़ोन लाइन ही खराब हो गयी। बिजली चली गयी। और अगले तीन दिनों तक हम लोग बाक़ी दुनिया से कट से गए थे। चूँकि मम्मी को फ़ोन कर दिया था इसलिए बाक़ी घरवालों को भी मम्मी से हम लोगों के सही-सलामत होने की खबर मिल गयी थी।


सुनामी ने अंडमान मे तो फिर भी कम पर निकोबार मे जबरदस्त तबाही मचाई थी।सुनामी से हुई बर्बादी के बारे मे आगे लिखेंगे।









आजादी एक्सप्रेस जो दिल्ली से सितम्बर मे चली थी और कई राज्यों से होती हुई २३ दिसम्बर को गोवा के वास्को-डी-गामा स्टेशन पर तीन दिन के लिए आई थी। तो चलिए हमारे साथ आजादी एक्सप्रेस देखने।इस ट्रेन मे १८५७ से लेकर २००७ तक का भारत दिखाया गया है।किस तरह भारत आजाद हुआ और किस तरह भारत ने हर क्षेत्र मे तरक्की की है।




आजादी एक्सप्रेस मे चढ़ने के पहले स्टेशन पर गोवा की आजादी की भी एक छोटी सी फोटो प्रदर्शनी लगाई गयी थी कि किस तरह गोवा १९६१ मे पुर्तगाल से मुक्त होकर भारत का हिस्सा बना था




अनिता जी और संजीत जी ने इसके बारे मे बहुत कुछ लिखा था। जिसने इस ट्रेन को देखने की चाहत जगा दी थी। सो जब ट्रेन गोवा आई तो हम पहुंच गए आजादी एक्सप्रेस देखने के लिए। अनिता जी की पोस्ट पढ़ने के बाद मन मे डर जरुर था की अगर कहीं मुम्बई की तरह यहां भी बहुत भीड़-भाड़ हुई तब तो देखना मुश्किल हो जाएगा। पर हमारी एक पोस्ट पर संजीत जी ने फाये जी का जिक्र किया था जिसके लिए हम संजीत जी का शुक्रिया करते है। खैर गोवा मे मुम्बई जैसी भीड़ नही थी और हमने बडे ही आराम से पूरी ट्रेन देखी और खूब सारी फोटो खींची । जिनमे से हम कुछ फोटो यहां लगा रहे है।(बाक़ी बाद मे हम फ्लीकर पर लगायेंगे। ) कोशिश की है कि फोटो के जरिये हम आजादी एक्सप्रेस आप लोगों तक पहुंचा सकें।



सबसे पहले डिब्बे मे घुसते ही अशोक स्तंभ दिखता है।( अशोक स्तंभ को हाथ से नही पकडा हुआ है बल्कि दरवाजे से आने वाले आदमी को रोकने के लिए हाथ दिखा रहा है । :) )





कहने की जरुरत नही है कि ये फोटो इस बात को दिखाती है की आजादी के लिए देश भक्तों ने कैसे कुर्बानी दी थी

















यहीं पर खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी की पंक्तियाँ भी लिखी हुई थी।




पहली संसद के मंत्री गण





आजादी के बाद १९४७ मे भारत के पहले प्रधान मंत्री और राष्ट्रपति से लेकर २००७ तक के राष्ट्रपति और प्रधान मंत्रियों की फोटो है।इस फोटो मे सभी राष्ट्रपति दिखाई दे रहे है।




ये आजादी एक्सप्रेस मई २००८ को मेरठ होती हुई वापिस दिल्ली जायेगी।







Wednesday, December 26, 2007

भला कैसे भूल सकते है अंडमान की २६ दिसम्बर २००४ की वो सुबह जिसने बहुतों की जिंदगी बदल दी।और कुछ हद तक हमारी भी। उस २६ दिसम्बर को हम लोग निकोबार जाने का प्रोग्राम बना रहे थे क्यूंकि निकोबार मे क्रिसमस और नया साल काफी जोश से मनाया जाता था। अब अंडमान मे थे तो सोचा कि निकोबार का क्रिसमस भीदेख लेना चाहिऐ।पर कहते है ना कि जो होता है अच्छे के लिए ही होता हैइसीलिए उस साल हम लोग क्रिसमस के लिए निकोबार जाकर दो दिन के लिए एक दुसरे छोटे से द्वीप बाराटांग चले गए थेक्यूंकि बेटा अपनी क्लास छोड़ना नही चाहता थाइसलिए २५ को ही घर वापिस गए थे। चूँकि हमारे बेटा जो कि उस समय दसवीं मे था उसने जाने से मना कर दिया था कि एक हफ्ते के लिए वो नहीं जाएगा ,इसलिए हम लोग निकोबार ना जाकर पोर्ट ब्लेयर मे ही थे। उन दिनों हम लोग पोर्ट ब्लेयर के जंगली घाट मे रहते थे।आज भी वो सारा मंजर बिल्कुल आंखों मे बसा हुआ है ,इतने सालों बाद भी कुछ भी नही भूले है। यूं तो उस दिन भी हम लोग सुबह ४.३० बजे उठे थे क्यूंकि हमारे बेटे को ५ बजे टियुशन के लिए जाना होता था (अंडमान मे सुबह चार बजे से ही बच्चों की टियुशन क्लास शुरू हो जाती है। ) एक घंटे की क्लास के बाद बेटाछे बजे लौटा और बोला कि उसे दोबारा आठ बजे फिर से क्लास के लिए जाना है।और ये कहकर की पौने आठ बजे उसे उठा दे , वो फिर से सोने चला गया। चूँकि २६ को रविवार था और दसवीं के बोर्ड के इम्तिहान पास जो आ रहे थे इसलिए एक्स्ट्रा क्लास चल रही थी। । रोज का दिन होता तो शायद पतिदेव घर पर न होते क्यूंकि वो सुबह-सुबह जिम जाया करते थे। पर रविवार को जिम बंद रहता था।अंडमान मे हम लोगों का डुप्लेक्स घर था। और हम लोगों का बेडरूम ऊपर था।सुबह ६ बजे हमारे servant क्वाटर मे रहने वाली काम करने आ जाती थी।क्यूंकि अंडमान मे सवेरा बहुत जल्दी हो जाता है। सबसे पहले वो घर की साफ-सफाई करती थी।फिर नाश्ता बनाती थी। और रोज की तरह उस दिन भी वो सुबह -सुबह नीचे की मंजिल पर पोंछा लगा रही थी।



और जब बेटा सोने गया तो हम लोग भी दुबारा सोने की कोशिश करने लगेपर तभी अचानक ऐसा महसूस हुआ कि बिस्तर हिल रहा हैपहले तो कुछ समझ मे नही आया फिर कुछ हिलने की आवाज सी आई तो आँख खोलकर देखने की कोशिश की तो देखा कि कमरे का दरवाजा ,टी.वी.,अलमारी का दरवाजा हिल रहा हैये देख कर तो होश ही उड़ गए जल्दी से बिस्तर से उठे और बेटे को आवाज लगाई जल्दी उठो बाहर भागो भूकंप आया हैचूँकि बेटा हलकी नींद मे था इसलिए उसे तुरंत समझ मे नही आया उसने बिस्तर पर से ही कहा की मैं तो अभी ही सोया हूँ। तो बड़ी जोर से हमने चिल्ला कर कहा कि बाहर भागो भूकंप है। जल्दी जल्दी हम लोग सीढ़ी उतरने लगे । सीढ़ी क्या थी मानो राजधानी एक्सप्रेस मे जैसे एक डिब्बे से दुसरे डिब्बे मे जाने के लिए बीच का रास्ता जोर-जोर से हिलता है बिल्कुल उसी तरह जोर-जोर से हिल रही थी। अगर सीढ़ी पकड़ के ना उतरे तो गिर ही जाये। नीचे उतरते हुए हम बेटे से कह रहे थे की ध्यान से उतरना नीचे इन्द्रा ने पोंछा लगाया है।बेटा तो उतर गया पर जैसे ही हमनेऔर जब बेटा सोने गया तो हम लोग भी दुबारा सोने की कोशिश करने लगे।पर तभी अचानक ऐसा महसूस हुआ कि बिस्तर हिल रहा है । पहले तो कुछ समझ मे नही आया फिर कुछ हिलने की आवाज सी आई तो आँख खोलकर देखने की कोशिश की तो देखा कि कमरे का दरवाजा ,टी.वी.,अलमारी का दरवाजा हिल रहा है । ये देख कर तो होश ही उड़ गए जल्दी से बिस्तर से उठे और बेटे को आवाज लगाई जल्दी उठो बाहर भागो भूकंप आया है। चूँकि बेटा आख़िरी सीढ़ी से अपना पैर नीचे रखा और सीढ़ी की रेलिंग छोडी कि हम अपने को संभल ही नही पाए और फिसल गए पतिदेव ने उठाया और फिर से हम बाहर भागे। बाहर हम पतिदेव और बेटे एक दुसरे का हाथ जोर से थामे घर को हिलता हुआ देखते रहे । घर तो ऐसे हिल रहा था मानो झूला हिल रहा हो। हम लोगों के घर के पीछे लकडी के घर थे जहाँ से सामान धड़ -धड़ करके गिर रहे थे।आम के पेड़ से आम झर रहे थे।बस गनीमत ये थी कि नारियल टूट-टूट कर नही गिरे । और जमीन इतनी जोर से हिल रही थी कि जमीन पर खड़े -खड़े सोच रहे थे कि अगर जमीन फट गयी तो हम लोगों का क्या होगा। ये सब कुछ तीन मिनट तक होता रहा और और उसके बाद धीरे-धीरे शांति सी हो गयी। सभी लोग अपने-अपने घरों मे वापिस जाने लगे भूकंप से हुए नुकसान को देखने के लिए। हम लोग भी डरते हुए घर के अन्दर गए तो देखा कि कुछ चींजें जमीन पर गिर कर टूट गयी थी।घर की दीवारों मे दरारें जरुर पड़ी थी पर हमारे घर नही गिरे थे।जैसा की आप इस फोटो मे देख रहे है। लकडी वाले घरों मे ज्यादा नुकसान हुआ था।

(वैसे पी.डब्लू.डी.की तारीफ करनी होगी कि उसने बहुत मजबूत घर बनाए है)अभी घर मे देख ही रहे थे कि बाहर से कुछ आवाजें सुनाई दी बाहर आकर देखा तो सामने की jetty टूट कर आधी पानी मे डूब गयी थी और बहुत सारे लोग वहां इकठ्ठा हो गए थे। हम लोगों के घर के गेट की जमीन क्रैक कर गयी थी और भूकंप ख़त्म होने के बाद भी धीरे-धीरे हिल रही थी।और टूटी आधी डूबी jetty देख कर उसकी फोटो लेने की सोची और फोटो खींची भी। हम लोग भी और सभी लोगों की तरह वहां इंतजार करने लगे की कब jetty पानी मे जायेगी । और जब पानी उछलेगा तो हम उसकी फोटो लेंगे। पोर्ट ब्लेयर मे भूकंप और सुनामी के बीच कुछ मिनटों का अंतर था शायद १५ मिनट का ।

हम लोग ये सब देख ही रहे थे की पतिदेव बोले भूकंप के पहले झटके के बाद अक्सर ऐसा होता है की एक-दो झटके और आते है।(गुजरात के भूकंप की याद आ गयी थी ) इसलिए कुछ जरुरी सामान एक बैग मे रख लिया जाये जिससे अगर घर गिर जाये तो कम से कम गाड़ी मे रह सकें।यही सोच कर हम ने सबसे पहले अपना नाईट गाउन बदल कर सलवार सूट पहना और फिर ऊपर बेडरूम मे जाकर तीनों के दो-दो जोड़ी कपडे और कुछ पैसे और जो थोडे बहुत जेवर थे उन्हें एक बैग मे रखना शुरू किया ।नीचे पतिदेव ने गेट खोल कर गाड़ी (कवालिस) मे चाभी लगा रखी थी कि अगर कहीं फिर से भूकंप आया तो इस बार हम लोग घर लगा कि कुछ ख़तरे वाली बात है। फटाफट बैग उठाकर हम लोग बाहर की तरह भागे। और जल्दी से गाड़ी मे बैठ गए । जब गाड़ी स्टार्ट करके गेट से बाहर निकल रहे थे कि सामने देखा तो लगा कि अब तो गए क्यूंकि समुन्दर का पानी पार्क की दीवार लाँघ कर बड़ी तेजी से सड़क पर आ गया था और हम लोगों के घरों की तरफ बढ़ रहा था। हम लोगों को कुछ समझ नही आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है।पलक झपकते ही पानी हम लोगों की गाड़ी के बोनट तक आ गया था और हम लोगों की इतनी हिम्मत नही हो रही थी की अपने साइड मे देखें बस हम तीनों की नजर छोड़कर भाग जायेंगे। हमने बेटे को भी आवाज लगाई की वो आकर हमारी मदद करें क्यूंकि अन्दर से हम डर और दहशत महसूस कर रहे थे की पता नही अब जब भूकंप आएगा तो हम लोगों का क्या होगा ? अभी हम बेटे को आवाज लगा ही रहे थे कि बेटा आकर बोला क्या mom आप इतना क्यों डर रही है। कुछ नही होगा । हमने सामान रखते हुए कहा कि तुम नीचे क्या कर रहे थे तो वो बोला कि सब लोग पार्क के पास खड़े होकर देख रहे थे कि पानी कहाँ चला गया। उसके ये कहने पर आश्चर्य के साथ हम लोग अपनी बालकोनी मे बाहर आये और देखा कि सामने समुन्दर का पानी कहीं दिखाई ही नही दे रहा था ।हम लोग बात कर ही रहे थे कि तभी अचानक दूर से बड़ी ही तेजी से पानी आता दिखाई दिया तब हम लोगों कोें सामने थी जहाँ पानी ही पानी दिख रहा था। और उस पानी मे हमारे पतिदेव ने बिना रोके गाड़ी चलाई और जो १०० मीटर की दूरी सेकेंड्स मे पूरी होती थी उसे पार करने मे लग रहा था कि रास्ता ख़त्म ही नही हो रहा है। माने हमारी गाड़ी कछुए की रफ़्तार से चल रही थी । वो तो भगवान ने बचाया वरना अगर कहीं गाड़ी पानी मे रूक जाती तब तो .... ।


आज के लिए इतना ही बाक़ी कल लिखेंगे क्यूंकि ये सब लिखते-लिखते कुछ अजीब सा महसूस हो रहा है।



ये फोटो एक हफ्ते बाद लिए थे। इसके दो कारण थे एक तो हमारा कैमरा पानी मे रह गया था और दूसरे शुरू मे घर जाने मे डर लगता था क्यों पानी का लेवल ऊपर हो गया था।इस फोटो मे शहीद पार्क की जाली दिख रही है।

Sunday, December 23, 2007

आजकल जिंदगी से सस्ती तो शायद ही कोई चीज है इस दुनिया मे।जब जो भी जिसकी भी चाहे जिंदगी ले सकता है। वजह कोई भी हो सकती है दोस्त से नही पटी तो मार दो ,तनाव है तो मार दो,छुट्टी न मिले तो मार दो,भाई से गुस्सा तो मार दो ,पत्नी से अनबन तो मार दो,बेटियों को तो लोग बेमोल ही मारते रहते है।मारना भी कितना आसान हो गया है। और सजा मिलते-मिलते तो सालों बीत जाते है।सजा मिली तो ठीक वरना .... । जीवन जो भगवान की दी हुई एक नियामत है पर जिसे छीनने मे मनुष्य ज़रा भी नही झिझकता है।हर दिन ऐसी बातें सुननें और पढ़ने को मिल जाती है। जहाँ मन के खिलाफ बात हुई वहीं झट से जान ले ली। अरे जान ना हुई मानो सब्जी भाजी हो गयी ।पर सब्जी भाजी भी अगर पसंद की नही होती है तो एक बार को लोग छोड़ देते है पर ..... ।

आज के अखबार मे भी ऐसी ही कुछ खबर छपी थी (जिसने हमे सोचने पर मजबूर किया )जिसमे एक पिता ने अपनी बेटी जो कि बोल सकती थी और नाही कुछ समझती थी उसे नदी मे डूबाकर मार डाला ।क्यूंकि पिता का कहना था कि उसके चार बच्चे है और उसके पास कोई नौकरी नही है।


ये तो हम सभी जानते है कि हाल ही मे गुडगाँव के स्कूल मे किस तरह से दो बच्चों ने अपने ही क्लास के एक बच्चे की जान ले ली थी। और वो भी सिर्फ इसलिए क्यूंकि वो लड़का सबको तंग करता था।

कल ही कोई न्यूज़ चैनल एक और ऐसी ही खबर दिखा रहा था जिसमे पति ने अपनी पत्नी को मार दिया था और जिस निर्विकार भाव से वो सारी घटना को बता रहा था कि बस उनका आपस मे झगडा हुआ और बात-बात मे झगडा बढ़ता गया और चूँकि पत्नी जोर-जोर से बोल रही थी इसलिए उसने उसका मुँह बंद कर दिया और फिर कैसे वो मर गयी। और कैसे उसने अपनी पत्नी के शरीर को एक अटैची मे रक्खा ।

दहेज़ के लिए तो ना जाने कितनी लड़कियों की बलि होती है और भ्रूण हत्या के बारे मे तो हम सभी जानते है। प्यार मे असफल हुए तो भी लोग या तो अपनी जान दे देते है या दुसरे की जान ले लेते है।

ऐसे न जाने कितने ही उदाहरण हमे आये दिन देखने को मिलते है जिन्हें सुन कर और पढ़कर तो यही लगता है कि जिंदगी से सस्ती तो कोई चीज ही नही है।

क्या इस तरह से जान लेने वालों को ज़रा भी डर नही होता कि इस तरह से किसी की जान लेने के बाद उनका क्या होगा ?
जिसे आप जिंदगी दे नही सकते उसकी जिंदगी लेने का क्या हक है ?

Saturday, December 22, 2007

कल यूं ही हम सहारा वन चैनल पर संगीत पर आधारित कार्यक्रम देख रहे थे जिसमे कार्यक्रम की शुरुआत मे राहुल जो प्रोग्राम के संचालक है वो कोई गाना गा रहे थे और जनता को ताली बजाने का इशारा कर रहे थे। आम तौर पर हर कार्यक्रम वो चाहे टी.वी.का हो या स्टेज पर होने वाले प्रोग्राम चाहे बड़े-बड़े फिल्मी प्रोग्राम हों या कोई और प्रोग्राम हों , होस्ट हमेशा लोगों को ताली बजाने के लिए कहते है कि अब फलां स्टेज पर आ रहें है और फलां का स्वागत जोरदार तालियों के साथ कीजिए।और जनता भी ऐसी होती है कि होस्ट के कहने पर ही ताली बजाती है। कभी-कभी बेमन से तो कभी बडे ही जोरदार ढंग से ।

जनता के ताली बजाने और न बजाने के दो उदाहरण हमे अभी हाल मे ही हुए दो बड़े समारोह मे देखने को मिले । पहला समारोह एड्स अवएरनेस पर आधारित कार्यक्रम था जिसकी होस्ट बार-बार जनता से मंच पर आने वाले लोगों का जोरदार तालियों से स्वागत करने को कहती थी तभी लोग ताली बजाते थे।यहां तक कि जो कलाकार प्रोग्राम मे भाग लेने आये हुए थे( मुम्बई और लोकल कलाकार) वो लोग़ भी हर थोड़ी देर मे जनता को ताली बजाने का इशारा करते थे।

दूसरा उदाहरण लिबरेशन डे के मौक़े पर देखने को मिला जहाँ परेड के दौरान तो फिर भी लोगों ने तालियाँ बजाई पर जब लोगों को अवार्ड दिए जा रहे थे तो किसी ने भी ताली नही बजाई , जो हमारे ख़्याल से गलत था। वो शायद इसलिए कि होस्ट ने ये नही कहा था कि फलां का जोरदार तालियों से स्वागत करिये।


ताली उत्साह बढ़ाने के लिए और ख़ुशी जाहिर करने के लिए या स्वागत के लिए बजाई जाती है तो फिर किसी के कहने की जरुरत ही नही पड़नी चाहिऐऐसा अक्सर देखा जाता है कि लोग ताली बजाने मे बड़ी ही कंजूसी करते है जबकि ये नही होना चाहिऐ ।

Tuesday, December 11, 2007

आज दोपहर डेढ़ बजे ज़ी न्यूज़ ने एक ताजा खबर दिखाई जिसमे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी बी.जे.पी.के द्वारा की गयी कल की घोषणा पर बोल रहे थे कि बी.जे.पी.को मोदी से खतरा है इसीलिए बी.जे.पी.ने कल लाल कृष्ण अडवानी को प्रधानमंत्री के पद का उम्मीदवार घोषित किया ।

ज़ी न्यूज़ मे कुछ इस तरह की ताजा खबर दिखाई जा रही थी। जरा गौर फरमाएं।

















अब बेचारे अडवानी जी प्रधानमंत्री बनते-बनते पीए बन गए। :)


चलिए लगे हाथ एक और हिन्दी का नमूना दिखा देते है। ये बोर्ड बंगलोर के टीपू सुलतान के महल के बाहर बने बगीचे मे लगा है। यहां पर अगर हिन्दी गलत है तो एक बार को समझा भी जा सकता है पर ज़ी न्यूज़ पर गलती होना वो अभी ऐसी। पता नही अडवानी जी और बी.जे.पी के लोगों के दिलों पर क्या बीत रही होगी। :)

Saturday, December 8, 2007


अब ये कुछ अजीब सा शीर्षक तो है पर बात ये है की अभी चंद रोज पहले हम बंगलोर गए थेअब चूँकि बंगलोर हम करीब तीस साल बाद गए थे तो सोचा कि क्यों बंगलोर घूम ही लिया जायेऔर वहां घुमते हुए अचानक ही हम लोग एक सात सितारा होटल जो की अभी बन रहा है उसके सामने से गुजरे तो हम लोगों की गाड़ी के ड्राईवर ने बड़ी ही गर्मजोशी से बताया कि साब ये होटल विजय मालया का हैये होटल भी शायद बीस मंजिल का हैऔर इसमे ऊपर हेलीपैड भी बना हुआ हैहमारे ड्राईवर ने ये बताया की चूँकि अब बंगलोर का नया एअरपोर्ट करीब ३०-३५ कि.मी .की दूरी पर बन रहा है और बंगलोर मे ट्रैफिक बहुत बढ़ रहा है तो होटल से एअरपोर्ट जाने के लिए हेलिकॉप्टर की सुविधा रहेगीजिससे कम समय मे एअरपोर्ट पहुँचा जा सकेजब तक उसने ये बताया और जब तक हम लोग होटल को देखते तब तक गाड़ी आगे बढ़ चुकी थीपर फिर भी हमने कोशिश की उसकी फोटो लेने की

हेलीपैड से एक और बात याद गयी कि अभी हाल ही मे मुकेश अम्बानी ने अपनी पत्नी नीता अम्बानी को एक एयरबस जन्मदिन के तोहफे मे दी हैजिसमे हर सुख-सुविधा हैयही नही खबर तो ये भी है कि मुकेश अम्बानी अपनी पत्नी को अगले साल जन्मदिन के तोहफे के रुप मे एक ऐसा घर देने वाले है जिसमे करीब २६-२७ मंजिलें होंगी और एक हेलीपैड भी होगाअब हेलीपैड बनेगा तो हेलिकॉप्टर तो होगा हीवैसे २७ मंजिल के इस घर मे छे मंजिलों पर तो कार पार्किंग बनायी जा रही हैचलो भाई मान लेते है कि इतनी कारें तो हो सकती है पर फिर भी बीस मंजिल रहने के लिए कुछ कम नही है। :)

अब जब २७ मंजिल का घर है तो उसी हिसाब से नौकर- चाकर भी होंगेअरे चौकिये मत कुछ ज्यादा नही बस छे सौ और सबसे मजेदार बात इस पूरे घर मे सिर्फ छे लोग रहेंगेमतलब हर एक के लिए सौ लोगवाह भाई वाह

क्या अच्छा होता कि अगर अम्बानी भारत के कुछ गांवों को एडोप्ट कर लेते तो शायद भारत के गाँव की कुछ तस्वीर ही बदल जाती

Thursday, December 6, 2007

तीन दिसम्बर को ईफ्फी २००७ ख़त्म हो गया।यूं तो हमने पहली ही सोचा था की हम ईफ्फी मे देखी हुई कुछ फिल्मों के बारे मे यहां लिखेंगे फिर सोचा कि नही लिखेंगे कि कहीं आप लोग बोर हो जाएँपर कल शास्त्री जी ने अपनी टिप्पणी मे हमे अच्छी फिल्मों के बारे मे लिखने के लिए कहा इसीलिए हम कुछ फिल्मों का जिक्र करेंगे। तेईस से तीन के बीच मे हमने करीब २०-२५ फिल्में देखी। ये तो जाहिर सी बात है कि इतनी फिल्मों मे से हर पिक्चर तो अच्छी हो नही सकती है पर फिर भी कुछ फिल्में बहुत पसंद आई(जिनका हम जिक्र करते रहेंगे) जिनमे से खुदा के लिए एक है । ये पिक्चर पाकिस्तान के डाइरेक्टर शोएब मंसूर ने बनाई है।इस फिल्म की खास बात ये है की इस फिल्म ने एक ऐसे विषय को उठाया है जिस पर आज तक किसी ने भी कुछ कहने की हिम्मत नही की है। की किस तरह एक साधारण लड़का संगीत और अपने परिवार को छोड़कर तालिबानी बन जाता है।

फिल्म एक छोटे और सुखी पाकिस्तानी परिवार की है । परिवार मे सबको आजादी है कि वो अपनी जिंदगी अपने ढंग से जियें। परिवार मे दो बेटे है और दोनो गायक है। माता-पिता को तो नही पर दादी को बेटों का गाना गाना पसंद नही आता क्यूंकि दादी का कहना था कि इस्लाम मे गाना गाना वर्जित है।फिर छोटा बेटा एक मौलवी के सम्पर्क मे आता है और धीरे-धीरे मौलवी साब उसे संगीत से दूर कर देते है।पर बड़ा बेटा अमेरिका के स्कूल मे आगे संगीत की शिक्षा के लिए जाता है । पर वहां ९/११ के हादसे के बाद उसे अमेरिका मे कितनी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है । इस सबको बहुत ही संजीदगी से फिल्माया गया है।

लड़कों के चाचा जो अमेरिका मे रहते है उन्हें यूं तो अमेरिका बहुत पसंद है । और खुद वो दो बार अमेरिकन औरत से शादी करते है पर उन्हें अपनी बेटी का किसी अमेरिकन लड़के से शादी करना पसंद नही क्यूंकि तब उन्हें अपने मुल्क और धर्म की याद आ जाती है।


फिल्म ने एक बहुत ही संवेदन शील विषय को लिया है कि धर्म (इस्लाम ) के नाम पर किस तरह से कट्टरपंथी और फंडा मेंतालिस्ट मौलवी युवा लड़कों का ऐसा ब्रेन वाश करते है कि उन्हें मौलवी साब के अलावा और किसी की बात ही समझ मे नही आती है। और जब तक बात समझ मे आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।


फिल्म मे जितने भी कलाकार है उन सभी ने बहुत अच्छी एक्टिंग की है।यूं तो इसमे सभी पाकिस्तानी कलाकार है पर इसमे एक भारतीय अभिनेता नसीरुद्दीन शाह भी है । फिल्म थोडी लंबी है करीब-करीब तीन घंटे की । पर फोटोग्राफी वगैरा काफी अच्छी है।

Wednesday, December 5, 2007

आजकल हर तरफ डॉक्टरों के चर्चे हो रहे है। दिल्ली मे डाक्टर A.I.I.M.S.के डाक्टर वेणुगोपाल को लेकर हड़ताल करते है तो कहीं गाँवों मे उनकी नियुक्ति न हो इसको लेकर हड़ताल करते है।पर ये हड़ताली डाक्टर कभी नही सोचते है कि उनके इस तरह बार-बार हड़ताल करने से अगर किसी का नुकसान होता है तो वो मरीजों का होता है ।A.I.I.M.s.मे तो अब आये दिन हड़ताल होने लगी है । जहाँ पर ना केवल दिल्ली अपितु दूर-दराज के शहरों -गाँवों से मरीज आते है।कुछ मरीज जिन्होंने महीनों पहले डाक्टर से समय लिया हुआ होता है तो कुछ जिन्हें इलाज कि सख्त जरुरत होती है उन्हें इस तरह की हड़ताल से कितनी परेशानी होती है इसका ख़याल क्या इन डॉक्टरों को कभी आता है। आजकल हर दो-चार महीने मे डाक्टर हड़ताल करते रहते है। कभी दिल्ली तो कभी तमिल नाडू तो कभी आन्ध्र प्रदेश मे तो कभी यू.पी. तो कभी बिहार मे। हड़ताल का कारण भले ही अलग हो पर भुगतना तो मरीज को ही पड़ता है।


ये डाक्टर जिन्हें पढाई खत्म होने पर शपथ दिलाई जाती है कि वो निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करेंगे। उसका तो कोई अर्थ ही नही रह गया है। यूं तो इस शपथ को डॉक्टरों ने आज क्या काफी सालों पहले से भुला दिया है । पहले भी डॉक्टरों को गाँव मे जाकर काम करना बिल्कुल पसंद नही था पर सरकारी डॉक्टरों को जब भी गाँव मे पोस्ट किया जाता था तो शायद महीने मे दो-चार दिन ही वो गाँव मे जाकर मरीजों का इलाज करते थे पर हाजिरी पूरे महीने की लगी होती थी ।गाँव मे भले ही नियुक्ति हो पर वो शहर के हस्पताल मे काम करते थे ।

पहले तो डाक्टर गाँव की नियुक्ति मे लुका-छिपा का खेल खेलते थे पर अब समय बदल गया है डाक्टर इस बात के लिए हड़ताल कर देते है कि उन्हें गाँव मे काम करने को ना भेजा जाये।पर अगर सरकार उन्हें गाँव की जगह विदेश भेजे तो भी क्या ये डाक्टर नही जायेंगे। और इन हड़ताली डॉक्टरों की माँग है कि अगर उन्हें गाँव मे काम करने जाना ही है तो साढ़े पांच साल की पढाई के समय मे छे महीने उन्हें गाँव मे भेज देना चाहिऐ जिससे जब वो अपनी मेडिकल की पढाई ख़त्म करें तो सीधे विदेश जाकर नौकरी कर सकें औए धूम कर पैसा कमा सकें। ठीक है पैसा कमाने मे कोई हर्ज नही है पर अपने देश मे क्या कुछ दिन भी काम नही कर सकते है।

करीब तीस-चालीस साल पहले के डाक्टर सरकारी हस्पताल मे भी काम करते थे और अपनी प्राइवेट प्रक्टिस भी करते थे।प्राइवेट प्रक्टिस तो बहुत साल बाद बंद हुई ।पहले मरीज को हस्पताल मे देखते थे और फिर शाम को या अगले दिन उसे घर पर या अपने नर्सिंग होम मे देखने को बुलाते थे। पहले तो कहा जा सकता था कि डॉक्टरों को कुछ काम पैसा मिलता था पर आज के समय मे तो डॉक्टरों को हिन्दुस्तान मे भी अच्छा-खासा पैसा मिलता हैहाँ विदेशों की तुलना मे शायद कम हो सकता है


अब मेडिकल प्रोफेशन नही बल्कि बिजनेस बन गया है


Saturday, November 24, 2007




जी हाँ कल से गोवा मे भारत का ३८ वां अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह शुरू हुआ है। जिसमे देश-विदेश से कुल मिला कर करीब २०० फिल्में दिखाई जायेंगी। गोवा मे पिछले चार सालों से ईफ्फी का आयोजन होता आ रहा है और आगे भी गोवा मे ही ईफ्फी होगा क्यूंकि गोवा को ईफ्फी का स्थाई आयोजक बना दिया गया है। ।कल गोवा के कला अकेडमी मे हुए इस उदघाटन समारोह के मुख्य अतिथि शाह रुख खान थे।दक्षिण की हिरोइन प्रिया मणि ,प्रिय रंजन दास मुंशी,गोवा के मुख्य मंत्री,गोवा के मुख्य सचिव ,गोवा के मेयर ,फिल्म फेडरेशन की डाइरेक्टर, आदि लोग इस उदघाटन समारोह मे मौजूद थे।

पिछले की तरह इस साल नाच-गाना तो नही हुआ पर भाषण पिछले साल की तरह ही हुए। इस समारोह की शुरुआत मे सभी ने भाषण दिए। भाषण पर हम यहां प्रिय रंजन दास मुंशी के भाषण का जिक्र करना चाहेंगे।( बस जरा चूक हो गयी कि हम रेकॉर्ड नही कर पाए) जिसमे उन्होंने शुरुआत मे तो फिल्म समारोह पर बोला और फिर उन्होने मुख्य अतिथि शाह-रुख खान के बारे मे जो बोलना शुरू किया की रुकने का नाम ही नही लिया कि शाह रुख खान एक महान हस्ती है किंग खान है । और इन्होंने अपना कैरियर फौजी से शुरू किया और फिर फिल्मों मे खूब अच्छा काम किया जिनमे चक दे फिल्म भी है। आज के यूथ आइकोन है । के .बी.सी.के होस्ट रह चुके है।और तो और उन्होंने ये तक कह दिया कि चक दे फिल्म के बाद से भारत मे खेल के प्रति लोगों का प्रेम जाग गया है।मुंशी ने गोवा के मुख्य मंत्री से गोवा मे बड़ा ऑडिटोरियम बनवाने की सिफारिश की और शाह रुख से कहा कि उस ऑडिटोरियम के उदघाटन के लिए शाह रुख खान को आना होगा।और भी ना जाने क्या-क्या। ओह-हो इतने बडे भाषण को बताने का अभिप्राय है कि उन्हों ने अपने नाम के अनुरूप भाषण दिया । :)


और उसके बाद दीप जलाकर समारोह का उदघाटन किया गया।

कल की ओपनिंग फिल्म फ़ोर मंथ्स थ्री वीक्स ऎंड टू डेज थी जो की एक रोमानियन फिल्म थी जिसमे सत्तर के दशक की पृष्ठभूमि है । इसकी कहानी दो लड़कियां के इर्द-गिर्द घूमती है। ये दोनो लड़कियां रूम मेट है और एक डोरमेट्री मे रहती है।इस फिल्म मे अबोर्शन जो की सत्तर के दशक मे रोमानिया मे एक अपराध माना जाता था उस पर आधारित है। कान फिल्म समारोह २००७ मे इस फिल्म को गोल्डेन पाम अवार्ड मिला था। वैसे फिल्म ठीक थी । इस विषय पर भारत मे भी पहले फिल्में बन चुकी है जैसे अस्सी के दशक मे कुछ ऐसी फिल्में आई थी जैसे भ्रूण हत्या ।इस फिल्म की हिरोइन और डाइरेक्टर इस फोटो मे आप देख सकते है।



अब चूँकि ईफ्फी चल रहा है तो आजकल हम फिल्में देखने मे लगे है। आज तीन फिल्में जों हमने देखी है उसके बारे मे कल बताएँगे।

Thursday, November 22, 2007

नच बलिये जो कि स्टार प्लस पर आता है उसमे जब शो शुरू हुआ था तो दस जोडियाँ थी पर हर हफ्ते एक-एक जोड़ी बाहर होती गयी। और अब आख़िर चार जोडियाँ बची है । इस बार के नच बलिये मे राखी सावंत भी भाग ले रही है तो कुछ न कुछ तमाशा तो होना ही था। अब राखी सावंत हो और कोई बात न हो ऐसा कहाँ हो सकता है।

राखी सावंत पहले दिन से लोगों का ध्यान अपनी और करने के लिए हर बार कुछ करती है। पहले दिन तो उसने कश्मीरा(वैसे हम न तो कश्मीरा और न ही राखी को पसंद करते है ) के लिए कहा था कि वो नही चाहती है कि राखी शो मे आगे बढे। फिर हर बार नाचने के बाद भी वो कोई न कोई बात जरुर कहती है। यहां तक की एक बार शो के होस्ट हुसैन ने भी कहा था कि आप हर बार कहती है कि ऐसा आपने पहले कभी नही किया है। जबकि सभी जानते है कि वो एक डांसर है और काफी समय से स्टेज शो ( डांस) करती आ रही है और कुछ फिल्मों मे भी डांस किया है । पर फिर भी और हर बार एक नयी बात कहती है।



राखी सावंत जो पहले दिन से ही कुछ कुछ नाटक करती रही है नच बलिये मे पहली बार ख़तरे मे आई हैअब राखी सावंत ख़तरे मे हो और वो कुछ करे ऐसा कहाँ हो सकता है।तो शो मे बने रहने और जीतने के लिए राखी पहुंच गयी नागमाता के पास पूजा करने के लिए। वैसे तो राखी खुद दावा करती है कि वो गणपति और जीजस की भक्त है पर इस बार वो नागमाता के पास गयी है। राखी कुछ करे और हमारे न्यूज़ चैनल उसे न दिखाए ऐसा भी नही हो सकता है। और आज तक तो सबसे तेज चैनल है सो उसने सबसे पहले ये खबर भी दिखा दी। :)


अब देखना है कि राखी शो मे रहती है या बाहर होती है।

Friday, November 16, 2007

बात उन दिनों की है जब हम लोग इलाहाबाद के म्योराबाद मोहल्ले मे रहते थे यही कोई चालीस -बयालीस साल पहले । तब का म्योराबाद आज के म्योराबाद जैसा नही था । उन दिनों वहां इतनी ज्यादा घनी आबादी नही थी। ज्यादातर ईसाइयों के घर थे और कुछ घर दूसरे लोगों के थे। अब चूँकि उन दिनों आबादी कम थी इसलिए पेड़-पौधे ज्यादा हुआ करते थे।और म्योराबाद मोहल्ला बहुत ही छोटा हुआ करता था बस जहाँ मुम्फोर्ड गंज ख़त्म वहां से सड़क पार करते ही म्योराबाद शुरू हो जाता था।हर घर के आगे बड़ा सा दालान होता था। सारे घर लाइन से बने थे और आगे की लाइन के पीछे एक औए लाइन मे घर बने होते थे। जिनमे खेलने मे बड़ा मजा आता था।

हम लोगों के घर से कोई दस कदम की दूरी पर एक परिवार रहता था जिसमे दक्कू ,टेरी ,टेरी कि पत्नी बीना आंटी उनके माता-पिता और और दक्कू की दादी रहती थीदादी यूं तो बहुत अच्छी थी पर हम बच्चों से जरा गुस्सा रहती थी क्यूंकि हम सब उन्हें बहुत तंग जो करते थेकभी आईस -पाईस खेलते तो उनके घर के बरामदे मे छिप जाते तो कभी उनके दालान से कूद कर भागते थेअगर कभी हम लोग दादी की नजर मे जाते तो शामत ही जाती थी। हर किसी की मम्मी से वो शिक़ायत करती थी की हम बच्चे उन्हें परेशान करते है और दिन मे उन्हें आराम नही करने देते है। मम्मी लोग हम लोगों को मना करती थी पर हम सब मानते कहाँ थे।


द्क्कू के घर मे बेर के पेड़ थे।जो मौसम मे खूब फलते थे। और जिन्हें तोड़ने मे हम सब को खूब मजा आता था। दिन मे जब सब लोग सो जाते थे तो हम बच्चों की टोली मतलब हम, पुतुल ,चीनू और रीना उनके घर मे लगे बेर चुराने जाते थे। हम सब पूरी सावधानी बरतते थे की दादी को हम लोगों की आहट न मिले पर चूँकि बेर के पेड़ बड़े-बड़े थे और हाथ से तो हम लोग तोड़ नही पाते थे तो छोटे-छोटे पत्थर मारते थे और उन पत्थरों से फल तो कम टूटते थे पर उन पत्थरों की आवाज से दादी जरुर उठ जाती थी और जो चिल्लाना शुरू करती थी कि बकरियों कच्चे-पक्के सब खा जाओ। और ये कहते हुए छड़ी लेकर बाहर आती थी हम लोगों की पिटाई करने के लिए पर हम सब भी कहाँ उनके हाथ आते थे। :)

बेर तोड़ने का सिलसिला चलता रहा और दादी का हम लोगों को बकरी कहना और छड़ी लेकर हम लोगों को दौडाना भी चलता रहा ।मम्मी कहती कि खरीद कर खाओ पर हम लोग बाज नही आते थे। क्यूंकि जो मजा पेड़ से तोड़ कर चुपके से खाने मे आता था वो भला खरीद कर खाने मे कहाँ।

Wednesday, November 14, 2007

कहीं आप लोग ये तो नही सोच रहे है कि ये हम अपने बारे मे कह रहे है , अरे नही ये हमारे नही ये तो राहुल गाँधी के शब्द है जो उन्होने हाल ही मे अपने उत्तर प्रदेश के दौरे मे कहे थे।जहाँ उन्होने अपनी पार्टी को कैसे मजबूत करे और किस तरह से दुबारा से उत्तर प्रदेश मे तथा अन्य राज्यों मे कैसे उनकी पार्टी अपनी पकड़ बना सके।अब राहुल गाँधी को बोलना आता है या नही उससे भला किसी को क्या फर्क पड़ता है ।

जब राहुल गाँधी को वाकई मे बोलना नही आता था तब भी लोग उनके बिना कुछ कहे ही सब कुछ समझ लेते थे तो भाई अब तो माशा अल्लाह बोलना भी आ गया है। और इसका तो वो अब दावा भी कर रहे है।

जब से राहुल गाँधी की पदोन्नति हुई है तब से तो उनके मिजाज भी कुछ बदल गए है। और बदले भी क्यों न आख़िर इतनी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी का भार जो उनके कन्धों पर डाल दिया गया है।


पर भाई बोलने से ये बेहतर नही है कि आपका काम बोले।

ये अभी हाल ही मे रिलीज हुई पिक्चर का नाम है।वैसे हमने इसे हॉल मे नही बल्कि घर पर देखी है।क्यूंकि इससे पहले की हम इसे देखते ये पिक्चर हॉल से चली गयी। आज कल जहाँ नाच-गाने से भरपूर फिल्में बन रही है वहीं ये फिल्म धरातल से जुडी लगती है। इसकी कहानी पूरी तो नही पर हाँ थोडी सी बता देते है । इस फिल्म मे कहानी अभय देओल जो की एक इंजीनियर है और साथ-ही साथ एक लेखक भी है और जासूसी का शौक भी रखते है, उनके ही इर्द-गिर्द घूमती है कि किस तरह वो एक हत्या के मामले मे फंस जाते है।और किस तरह वो उससे बाहर निकलते है।

अभय देओल और गुल पनाग दोनो ने ही अच्छी एक्टिंग की है।गुल पनाग जो वैसे तो ज्यादा फिल्मों मे दिखाई नही देती है पर इसमे अभय देओल की पत्नी के रोल मे अच्छा काम किया है। और अभय देओल ( जिसकी हमने इससे पहले कोई भी पिक्चर नही देखी थी )ने अपने मार-धाड़ वाले भाइयों (सनी और बॉबी ) के बिल्कुल विपरीत रोल किया है। और काफी नैचुरल एक्टिंग की है। और बाक़ी के कलाकारों जैसे सारिका विनय पाठक,कुलभूषण खरबंदा, आदि ने भी अच्छा अभिनय किया है।

वैसे ये पिक्चर ज्यादा नही चली है क्यूंकि ये ना तो पूरी तरह कमर्शियल पिक्चर है और ना ही आर्ट सिनेमा है। पर फिर भी देखने लायक है।क्यूंकि आज के दौर मे जहाँ बडे-बडे सेट लगाए बिना फिल्म ही नही बनती है वहां इस फिल्म मे एक भी सेट देखने को नही मिलता है। सारी शूटिंग राजस्थान की है। डायलॉग बहुत ही साधारण आम बोल-चाल वाली भाषा के है।

Tuesday, November 13, 2007


जरा इस ड्रेस पर गौर फरमाइए।कहिये कैसी लगी ये ड्रेस। :)

ये सारी ड्रेस चोकलेट से बनी है। और हाँ इन्हें देखने के लिए क्लिक करना न भूले।

Thursday, November 8, 2007


गोवा मे आज दिवाली मनाई जा रही है जबकि शायद बाक़ी सारे देश मे दिवाली कल यानी ९ नवम्बर को मनाई जायेगी। अब चूँकि हम यू.पी.के है तो जाहिर तौर पर आज हम छोटी दिवाली और कल यानी ९ को हम भी बड़ी दिवाली मनाएंगे। यहां गोवा मे दिवाली मनाने का अंदाज उत्तर भारत से बिल्कुल भिन्न है। जैसे उत्तर भारत मे दिवाली भगवान राम के वनवास से अयोध्या वापिस आने की ख़ुशी मे मनाई जाती है पर यहां भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर राक्षस के वध की ख़ुशी मे मनाई जाती है। हम लोग राम की पूजा करते है तो यहां पर कृष्ण की पूजा होती है।

जिस तरह दशहरे मे रावण को जलाया जाता है ठीक उसी तरह यहां गोवा मे दिवाली मे नरकासुर को जलाया जाता है।नरकासुर जलाने का चलन तो हमने यहीं पर देखा है। बडे-बडे नरकासुर बनाए जाते है और भोर मे यानी की सुबह ४ बजे इन्हें जलाया जाता है।नरकासुर जलाने का कारण है बुराई पर अच्छाई की जीत या अँधेरे पर रौशनी की जीत। चलिए थोडी इसकी कहानी भी बता देते है। जैसा की नाम से ही पता लग रहा है कि नरकासुर नरक के असुरों का राजा था।और इस नरकासुर ने १६ हजार गन्धर्व रानियों को कैद कर रखा था ।इन रानियों ने भगवान कृष्ण की पूजा की और उनसे प्रार्थना की कि नरकासुर की कैद से भगवान उन्हें मुक्ति दिलाएं। तब भगवान कृष्ण ने नरकासुर से युद्ध किया और युद्ध मे कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से नरकासुर का सिर धड़ से अलग करके औरतों को नरकासुर की कैद से मुक्ति दिलाई ।नरकासुर की कैद से मुक्त होने की ख़ुशी मे इन औरतों ने अपने घर के बाहर मिटटी के दिए जलाये जो ये दर्शाते है की किस तरह अँधेरे पर रौशनी की जीत होती है।और इसीलिए यहां गोवा मे नरकासुर को जलाते है। और जलाने के बाद घर मे प्रवेश करने से पहले एक जंगली फल कर्री (karrit)को आदमी पैरों से कुचलते है और फिर गुड खाते है तब घर मे प्रवेश करते है। और तो और यहां पर नरकासुर बनाने की प्रतियोगिता भी होती है। हर ताल्लुके मे ये प्रतियोगिता होती है। वैसे कल शाम यहां पर जबरदस्त बारिश होने से थोडा रंग मे भंग जरुर हो गया है पर लोगों के उत्साह मे कोई कमी नही आई है।



जैसे उत्तर भारत मे गणेश -लक्ष्मी दोनो की पूजा दिवाली के दिन की जाती है यहां पर सिर्फ लक्ष्मी की पूजा करते है। और इसीलिए यहां मिटटी के गणेश -लक्ष्मी एक तरह के नही मिलते है।और गणेश- लक्ष्मी ढूंढ़ना किसी खजाने को ढूंढ़ना से कम नही होता है और उस पर भी या तो लकडी के या फिर मैटल के मिलते है। अब ये मत कहिये कि चांदी के गणेश -लक्ष्मी की पूजा क्यों नही करते है। तो वो क्या है ना कि हमेशा से मिटटी के ही गणेश -लक्ष्मी की पूजा जो करते आये है।

और हाँ यहां पर बडे-बडे कंडील लगाने का भी खूब चलन है । सड़कों पर दुकानों के बाहर और घरों मे तरह-तरह के कंडील लगे हुए दिखते है।जो रात मे बडे ही खूबसूरत लगते है। कंडील से याद आया की हमे शॉपिंग करने जाना है । अच्छा तो अब हम जा रहे है अपनी बाक़ी बची हुई शॉपिंग करने अरे भाई कल दिवाली जो है

आप सभी को दीपावली की शुभकामनाएं







Wednesday, November 7, 2007

कल यहां गोवा के लोकल अखबार मे ये खबर छपी थी।पर कल हम इसे अपने ब्लोग पर नही लगा पाए थे इसलिए आज इसे पोस्ट कर रहे है। यूं तो ये बड़ी ही अजीबोगरीब खबर है पर फिर भी हमने सोचा की आप लोगों तक इस पहुंचाया जाये।

Sunday, November 4, 2007

कुछ अजीब सा विषय है ना पर ये जेनरेशन गैप हर पीढ़ी मे होता है।बस हमारा देखने का नजरिया अलग होता है।

आख़िर ये जेनरेशन गैप है क्या बला ?

आम तौर पर माना जाये तो ये दो पीढ़ी के बीच मे आने वाला फर्क है या यूं कहें की हर बात मे, सोच मे ,आचार -विचार मे ,बातचीत के तरीके मे ,व्यवहार मे अंतर होने को जेनरेशन गैप कह सकते है।हमेशा नयी पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को और पुरानी पीढ़ी नयी पीढ़ी को यही कहकर चुप करा देती है कि जेनरेशन गैप है।वो चाहे हम लोगों का जमाना रहा हो या फिर आज हमारे बच्चों का जमाना ही क्यों ना हो। ऐसा हम अपने अनुभव के आधार पर कह रहे है । पर हमेशा नयी पीढ़ी को ही क्यों दोष दिया जाता है कि नयी पीढ़ी या आजकल के बच्चे तमीज-तहजीब खो चुके है। उनमे छोटे-बडों का फर्क समझने की बुद्धि नही है। जबकि हम सभी उस नयी पीढ़ी वाले दौर से गुजर चुके है। पर क्या हम सबने अपने बडे-बुजुर्गों से कभी भी ऐसी बातें नही कही या करी है ? और क्या इन सबसे बडे-बुजुर्गों के साथ संबंधों या रिश्तों मे फर्क आ गया था।जब तब नही आया तो अब हम बच्चों को क्यों ये कहकर अहसास दिलाते है ।


ये तो सोचने वाली बात है की जो बात हम अपने दौर मे सही मानते थे अब हम उसे गलत क्यों मानते है सिर्फ इसलिए की हमारी नयी पीढ़ी हमारे बच्चे आज के ज़माने के है और उनका सोचने-समझने का नजरिया हमसे भिन्न है।

हमारे ख्याल से ये जेनरेशन गैप एक मिथ्या है ।किसी भी वार्तालाप को ख़त्म करने का ये अचूक अस्त्र है। क्यूंकि इसके बाद कुछ कहने-सुनने की गुंजाइश ही नही रहती है। हम सभी यानी कि नयी पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी दोनो ही सवालों का जवाब देने से बचने के लिए इस शब्द को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते है।

आपका क्या विचार है ?

Saturday, November 3, 2007


barren island जैसा की नाम से ही लग रहा है कि ये एक ऐसा द्वीप होगा जहाँ जनजीवन नही होगा। और बिल्कुल ऐसा ही है । barren island हिंदुस्तान का एकमात्र जीवित ज्वालामुखी है जो अंडमान मे है। ।ये द्वीप पोर्ट ब्लेयर से १३०-१३५ कि .मी.की दूरी पर है। और यहां भी जाने के लिए बोट से ही जाना पड़ता है। अब का तो पता नही कि ये ज्वालामुखी जीवित है या नही पर २००५ मे करीब ९-१० साल बाद ये जीवित हो गया था मतलब ज्वालामुखी फट गया था।

शुरू मे जब ये ज्वालामुखी ज्यादा तीव्र था तब तो कम पर बाद मे इसे भी एक पर्यटन स्थल बना दिया गया था क्यूंकि ये भी जिंदगी मे बार-बार कहॉ देखने को मिलता है। कभी-कभी तो वहां बडे शिप भी ले जाये जाते थे जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग इस ज्वालामुखी को देख सकें।और इसके अलावा छोटी बोट barren island जाने के लिए फीनिक्स बे jetty से रात नौ बजे जाती थी और बिल्कुल सुबह तीन बजे इस द्वीप के पास पहुंचती थी। रात मे बोट इसलिये जाती थी क्यूंकि सुबह यानी भोर मे सिर्फ तीन से पांच बजे तक ही लावा दिखता था क्यूंकि अँधेरे मे लाल-पीला लावा साफ तौर पर देखा जा सकता था। और जैसे ही उजाला हो जाता है सिर्फ धुँआ -धुँआ सा ही दिखता है ।

अब चुंकि हम लोग उन दिनों अंडमान मे थे और क्यूंकि धीरे-धीरे ये ज्वालामुखी शांत हो रहा था। तो एक दिन हम लोगों ने भी सोचा कि चलो भाई अब जब अंडमान मे है तो इस ज्वालामुखी को भी देख लिया जाये। वो क्या है ना की हमे समुद्री यात्रा रास नही आती है और सुनामी के बाद तो मन मे एक डर सा बैठ गया था पर फिर भी हिम्मत करके हम तैयार हो गए। बस फिर क्या था तय हुआ की शोंपेन बोट से चलने का तय हुआ ।सो हम लोग और कुछ हम लोगों के मित्र और उनके परिवार वाले पहुंच गए रात नौ बजे फ़िनिक्क्ष् बे jetty पर barren island जाने के लिए। बोट पर ही खाने का इंतजाम था । हमारे सिवा हर कोई बोट पर खुश था और हम बिचारे नौसिया और वोमितिंग से परेशान। खाना खाना तो दूर हम तो बस cabin मे लेटे रहे । हालांकि हम लोगों के साथ एक डाक्टर साब भी थे पर sea- sickness जब शुरू हो जाती है तो कोई भी दवा काम नही आती है।वैसे हम ने भी एवोमिन खाई हुई थी पर जैसे ही बोट चली कि सब दवा बेअसर हो गयी। खैर हम पर तो दवा बेअसर थी पर बाक़ी सभी लोगों ने डॉक्टर साब कि दवा खाई थी और मस्त थे।


करीब शायद बारह बजे के आस-पास सभी लोग सो गए और अचानक ही शिप के कैप्टन की आवाज आयी की गुड मोर्निंग ! हमारा शिप barren island के पास पहुंच रहा है।आप अपने बायें ओर की खिड़की से बाहर की ओर देखिए तो आप लोगों को ज्वालामुखी दिखाई देगा।हर होई हडबडा कर उठ गया और खिड़की के बाहर देखने लगा।बाहर देखा तो अदभुत सा नजर था , बाहर बिल्कुल अँधेरा था और लाल-लाल लावा जलता हुआ दिख रहा था। अभी खिड़की से हम लोग देख ही रहे थे कि कैप्टन की फिर से आवाज आई कि पूरी तरह से ज्वालामुखी देखने के लिए आप सभी लोगऊपर डेक पर पहुँचिये।


कैप्टन की आवाज सुनते ही हर कोई फ़टाफ़ट उठ गया और घडी देखी तो सुबह के तीन बज रहे थे। और सब अपने-अपने कैमरा संभाले ऊपर डेक पर पहुंच गए आख़िर फोटो जो खींचनी थी। पर डेक पर खड़ा होना आसान नही था क्यूंकि डेक पर हवा बहुत थी और लहरें भी बहुत तेज थी। और साथ ही हम लोगों की बोट छोटी होने के वजह से ख़ूब जोर-जोर से हिल रही थी।बडे शिप को द्वीप के और नजदीक ले जाया जाता था पर चूँकि हम लोगों की बोट छोटी थी इसलिए बोट को थोडा पहले ही रोक लिया गया था । इतनी हिलती हुई बोट मे हम लोगों को ये समझ नही आ रहा था कि ज्वालामुखी देखें कि फोटो खींचे कि अपने आप को संभाले। खैर हम महिलाएं तो बोट के बीच मे बने हुए सपोर्ट के साथ खड़ी हो गयी और बेटे ने कुछ फोटो खींचे। पर फोटो बहुत साफ नही आये क्यूंकि बोट बहुत ज्यादा हिल रही थी और संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो रहा था।

और वो दो घंटे तीन से पांच बजे का समय कैसे गुजर गया पता ही नही चला पर जैसे ही बोट ने पोर्ट ब्ल्येर के लिए वापसी का रुख किया कि बोट पर मौजूद हर किसी की तबियत खराब होना शुरू हो गयी क्यूंकि एक तो हल्पा और दुसरे बिल्कुल सुबह उठने से सब का बुरा हाल था । पर सबसे मजेदार की लौटने मे हमे कोई तकलीफ नही हुई क्यूंकि हम तो रात मे ही अपना कोटा जो पूरा कर चुके थे। :)







Wednesday, October 31, 2007



केक देखकर तो आप समझ ही गए होंगे की हम इतने दिनों तक क्यों गायब थे। वो क्या है ना कि इसी अक्तूबर को हमारी शादी के पच्चीस साल पूरे हुए है।

Thursday, October 4, 2007

खिलाड़ी किस लिए खेलते है देश के लिए ,अवार्ड के लिए,या अपने लिए ?

जब से भारत ने twenty-२० विश्व कप जीता है और जब से इस यंग टीम इंडिया पर इनामों की बौछार हुई है लगता है सारे देश के हर खिलाड़ी को वो चाहे कोई भी खेल खेलता हो उन्हें कुछ परेशानी सी होने लगी है। अब वो चाहे हॉकी की टीम हो या चाहे शतरंज के विश्व चैम्पियन हो या चाहे billiards के विश्व चैम्पियन हो और चाहे गोल्फ के चैम्पियन हो। हर किसी को लग रहा है कि उनके साथ राज्य सरकारों ने और लोगों ने वैसा व्यवहार नही किया जैसा कि टीम इंडिया के साथ किया है।वैसे एक तरह से उनका रोष सही भी है क्यूंकि भला कितने लोग जानते है कि जीव मिल्खा सिंह गोल्फ खेलते है या पंकज आडवाणी billiards खेलते है।

क्रिकेट एक ऐसा खेल है जिसे ना केवल लड़के और आदमी ही देखते -सुनते है बल्कि बच्चे महिलाएं और ये कहना अतिशयोक्ति नही होगी कि हर कोई देखता है और सुनता है। क्रिकेट के लिए लोगों मे एक जुनून सा है। जिससे हम सब बड़ी ही अच्छी तरह से वाकिफ है।ऐसा नही है कि क्रिकेट के प्रति लोगों का झुकाव अभी हुआ है बल्कि आज से क्या जब से याद है देश मे क्रिकेट के प्रति लोग पागल ही रहे है और ऐसा पागलपन और दीवानगी किसी और खेल के प्रति नही देखी गयी है। अब इसे क्रिकेट का भाग्य ही कहा जा सकता है। अगर टीम इंडिया अच्छा खेलती है तो लोग सर आंखों पर् बिठाते है पर् जब यही टीम इंडिया खराब खेलती है तो लोग एक मिनट भी नही लगाते है इनकी आलोचना करने मे।और हम भी इससे अछुते नही है। अभी हर दुसरे खेल को खेलने वाले खिलाड़ी को टीम इंडिया के इनाम दिख रहे है पर् हारने पर टीम इंडिया क्या उनके घरवालों को भी लोग नही छोड़ते है ।क्यूंकि क्रिकेट से हर कोई अपने को जुडा हुआ महसूस करता हैपर् क्या किसी और खेल के खिलाड़ियों के अच्छा ना खेलने पर् लोग उनके घरवालों को या खिलाड़ियों को परेशान करते है


जब टीम इंडिया के हर खिलाड़ी को बी.सी.सी.आई. ने और हर राज्य सरकार ने इनाम कि घोषणा की तो हॉकी की टीम ने भूख हड़ताल की बात करी। और क्रिकेट और हॉकी के साथ सौतेला व्यवहार करने की बात भी कही।



अभी दो-तीन दिन पहले ही शतरंज मे विश्वनाथन आनंद दूसरी बार world चैम्पियन बने है और उन्होने ये कहा है की अब जब वो भारत आएंगे तो वो ये देखना चाहते है की यहां भारत मे उनका किस तरह से स्वागत किया जाता है।पर् शायद आनंद ये भूल गए है की जब वो पहली बार world चैम्पियन बने थे तो सारे देश ने उनका स्वागत किया था ।



पंकज आडवाणी चार बार billiards के world champion रह चुके है। और अभी हाल ही मे कर्नाटक सरकार ने उन्हें एकलव्य पुरस्कार देने की घोषणा की थी पर् पंकज ने ये कहकर अवार्ड लेने से इनकार कर दिया की जब उन्हें राजीव गाँधी खेल रत्न अवार्ड और अर्जुन अवार्ड मिल चुका है और अब ये अवार्ड too little and too late।


गोल्फ खेलने वाले जीव मिल्खा सिंह को भी इस बात से शिक़ायत है की आख़िर टीम इंडिया को इतने इनाम क्यों दिए जा रहे है।यूं उनका कहना सही भी है कि हॉकी को बढावा दिया जाना चाहिऐ। क्यूंकि हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल है।


पर् यहां सबसे बड़ा सवाल ये है की क्या पैसा ही सब कुछ है। क्रिकेट जिसे शायद हर अमीर और गरीब व्यक्ति वो चाहे गली-मोहल्ले मे रहता हो या चाहे आलिशान महल मे रहता हो वो क्रिकेट खेल सकता है।अच्छे से अच्छे और महंगे से महंगे बल्ले से भी क्रिकेट खेला जा सकता है और सस्ते से बल्ले से भी। पर् क्या कोई आम आदमी गोल्फ या billiards खेल सकता है।

Tuesday, October 2, 2007

भाई इसे कहते है विज्ञान की तरक्की। क्या कभी किसी ने सपने मे भी सोचा था की कभी पारदर्शी मेढक भी होगा। हम तो हमेशा से मोटी खाल वाला भूरा -हरा सा मेढक देखते आये है। पर आज के समय मे कुछ भी असंभव नही है फिर भला पारदर्शी मेढक होना भी कहॉ असंभव है।जो दुनिया मे कोई सोच नही सकता उसे जापानियों ने कर दिखाया।

पारदर्शी मेढक बनाने जैसा अनूठा कारनामा जापान के शोध कर्ता मसयुकी सुमिदा (masayuki sumida) ने कर दिया है। और ऐसे पारदर्शी मेढक क्यों बनाए तो इसके लिए उनका कहना है की जो विद्यार्थी जीव विज्ञान पढते है और जिन्हे जीवों मे विभिन्न ओर्गंस को समझने के लिए मेढक का dissection करना पड़ता है क्यूंकि स्कूल मे dissection की शरुआत मेढक और केंचुए से ही कराई जाती है ।


अब कम से कम जापान मे मेढक को चीर-फाड़ करने की जरुरत नही है क्यूंकि अब उसकी ऊपर की खाल इतनी पतली है की अगर उसे लाइट के सामने रखे तो उसके शरीर के सारे ओर्गंस देखे जा सकते है। और ये भी देखा जा सकता है की किस तरह के बदलाव इन tadpoles मे आते है जब ये मेढक बनते है। जिससे मेढक के ओर्गंस को समझना भी आसान और शायद कुछ हद तक दिलचस्प भी होगा।

काश तीस साल पहले ऐसे मेढक होते तो हमारी दीदी को अपनी जीव विज्ञान की क्लास के लिए ब्रिजवासी (हम लोगों का सेवक)को हर समय मेढक पकड़ने के लिए दौड़ना ना पड़ता। :)

Friday, September 28, 2007

आज हम कुछ और गणेश चतुर्थी की फोटो लगा रहे है।जो गोवा मे अलग-अलग जगहों पर और कुछ अलग सी चीजों को इस्तेमाल करके बनाया गया है। इनमे गणेश जी के विभिन्न रुप दिखते हैऔर साथ ही हर मूर्ति मे कुछ नया सा हैयहां घरों मे रखे जाने वाले तथा पंडालों मे स्थापित गणेश की प्रतिमा और सजावट के लिए प्रतियोगिता रखी जाती हैभाई हमने तो इतने विविध रुपी गणेश पहले कभी नही देखे थे ,हो सकता है आप लोगों ने देखे हो पर फिर भी हम इन्हें आप लोगों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैऔर हाँ किसी भी फोटो को अगर आप बडे साइज मे देखना चाहते है तो उस फोटो पर क्लिक कर दीजियेगा


इस पहली फोटो मे गणेश जी के साथ ही अन्य भगवानों को भी दिखाया गया हैऔर इसे पंजिम के पुलिस स्टेशन मे रखा गया थायहां गोवा के सभी पुलिस स्टेशन के बीच सबसे सुन्दर मूर्ति की प्रतियोगिता भी होती हैये मूर्ति पंजिम के ही एक पंडाल की है जिसमे साई बाबा को दिखाया गया है



इस मूर्ति मे गणेश जी को दुर्गा रुपी दिखाया गया हैये मूर्ति पंजिम के मारुति मंदिर मे स्थापित की गयी थी


ये मूर्ति ऊन से बनाई गयी है



इस मूर्ति मे गणेश जी को विष्णु के मत्स्यरूपी अवतार मे दिखाया गया हैऔर मूर्ति के पीछे नाव मे जो लोग दिख रहे है वो इसलिये क्यूंकि मूर्ति की देखभाल भी जरुरी हैऔर ये मूर्ति विसर्जन के लिए कहीँ और ना लेजाकर यही इसी पानी मे विसर्जित कर दी गयीऔर हाथ मे जो चक्र है वो घूमता रहता है


और सबसे ज्यादा चर्चा मे रही गणेश जी की ये मूर्ति जिसे काजुओं से बनाया गया हैऔर इसे बनाने मे २८ दिन लगे थेऔर क्या आप अंदाजा लगा सकते है की कितने काजू लगे होंगेचलिए हम बता देते है वैसे हमे तो ये जानकार कुछ आश्चर्य हुआ था इसमे करीब ४१००० किलो काजू लगे हैऔर इस मूर्ति का वजन ४७ किलो हैऔर अंदाजा लगाइये की कितने मूल्य के काजू लगे होंगेयही कोई ९८०००क्यों चौंक गए ना

वैसे ये फोटो डार्क है क्यूंकि वहां काफी अँधेरा सा था

और हाँ पिछली गोवा वाली पोस्ट की फोटो भी उस पोस्ट मे अपलोड कर दी है जो गायब हो गयी थी

Tuesday, September 25, 2007

कल के twenty-२० मैच मे यंग टीम इंडिया ने चक दे इंडिया को सही अर्थों साबित कर दिया है और पुरे देश-विदेश मे सिर्फ चक दे इंडिया ही सुनाई दे रहा है। क्या जीत थी .उफ़ इतनी रोमांचक कि हर बॉल पर लगता की अब गए की तब गए।पर आख़िर मे टीम मे नए आये जोगिंदर ने विकेट लेकर भारत का विश्व चैम्पियन बनने का सपना साकार कर दिया।चौबीस साल लग गए विश्व चैम्पियन बनने मेइधर इंडिया बना विश्व चैम्पियन और उधर पूरा देश पटाखों की आवाज से गूँज गया।

बी.सी.सी.आई.ने इन खिलाड़ियों को १२ करोड़ का इनाम देने की घोषणा कर दी हैऔर ये टीम इनाम की हकदार भी हैयुवराज को स्पोर्ट्स कार और एक करोड़ का इनाम भी दिया जाएगाक्या बात हैबल्ले-बल्लेधोनी की कप्तानी मे टीम इंडिया ने तो कमाल ही कर दियापहली कप्तानी मे विश्व कप जीतना किसी कमाल से कम तो है ही नहीइस बार तो जितनी टीम की तारीफ की जाये वो कम हैऔर धोनी ने जीतने के बाद भी जैसा संतुलन बनाए रखा वो काबिले तारीफ हैऔर जैसा धोनी ने कहा की वो हमेशा इस जीत को याद रखेगातो इस जीत को धोनी क्या सारे हिन्दुस्तानी हमेशा याद रखेंगें



सच जीत की ख़ुशी हर हार को भुला देती है

अब तो ये देखना है की आने वाली वन डे श्रंखला के लिए इनमे से कितने लोगों को चुना जाता है या फिर वही पुरानी टीम ही खेलने जायेगी। ।क्यूंकि इस टीम को बिल्कुल अनदेखा भी नही किया जा सकता हैयूं हार-जीत तो खेल का हिस्सा है पर अगर नयी टीम एक बार को हारती भी है तो ये माना जा सकता है की उनमे अनुभव की कमी है पर पुराने मझे हुए खिलाड़ियों के खराब प्रदर्शन पर दुःख तो होता ही है

सारे चैनल तो मैच दिखा ही रहे थे पर आज तक पर तो मैच जीतते ही सभी ने वो चाहे कपिल हो या मदन लाल या उनके रिपोर्टर जैसे दीपक चौरसिया,रितुल,सोनिया सिंह ,वगैरा ने जो नाचना और शोर मचाना शुरू किया की उसका नशा आज भी दिख रहा था सुबह तो न्यूज़ रीडर का गला ही बैठा लग रहा था और वो न्यूज़ ऐसे पढ़ रही थी मानो सो रही होकल ही सारा josh दिखा दिया थापर क्या नशा था जीत काहर कोई इस नशे मे डूबा हुआ

ये सही है की हार को स्वीकार करना बहुत कठिन होता है पर कल जिस तरह शोहेब मलिक ने रवि शास्त्री से बात करते हुए कहा उसे सुनकर कुछ अजीब लगा था और इसका जिक्र यहां पर किया गया है


चक दे इंडिया फिल्म ऐसे समय मे आयी है की हर जगह चक दे इंडिया ही हो रहा हैवो चाहे फुटबाल हो या हॉकी हो या फिर क्रिकेटऔर आज कल तो हर समय इसके गाने और डाएलोग ही हर जगह कोट किये जा रहे हैऔर शायद ऐसा पहली बार हुआ है की इन तीनो खेलों मे हिंदुस्तान ने जीत हासिल की है

सभी यंग टीम इंडिया के खिलाड़ियों और हिंदुस्तानियों को टीम इंडिया की जीत की बहुत-बहुत बधाई

अंत मे एक बार फिर से जीत का जश्न देख लिया जाये






Monday, September 24, 2007

कल रात दार्जिलिंग के प्रशांत ने शिलोंग के अमित पाल को एस.एम.एस.के जरिये होने वाली वोटों की गिनती मे पीछे छोड़ दिया और सिपोय प्रशांत बन गए तीसरे इंडियन आइडल। सात करोड़ वोट बाप रे ऐसा लगता है की लोग सारे काम-धंधे छोड़ कर सिर्फ एस.एम.एस ही करने मे लगे थे। जहाँ तक हमे याद है इतने ज्यादा वोट तो हिंदुस्तान की जनता ने ताज महल के लिए भी नही किया था।यहां देश से बड़ा राज्य हो गया लगता है क्यूंकि जिस तरह से दार्जिलिंग और शिलोंग के लोगों ने वोट किया है ये सात करोड़ वोट यही सच्चाई बताते है। पर ज़ी के शो सा.रे.गा.मा.पा. के विश्व युद्ध से छत्तीसगढ़ की सुमेधा शो से बाहर हो गयी इसलिये नही की वो खराब गाती थी ( वो सबसे अच्छा गाती थी) बल्कि इसलिये बाहर हो गयी क्यूंकि उन्हें छत्तीसगढ़ से वोट नही मिले और जैसा की उनके पिता ने कहा की छत्तीसगढ़ मे ६५ जगहों पर ज़ी टी.वी.नही आता है और लोग नही जानते है की ज़ी पर ऐसा कोई शो हो रहा है। हारने या जीतने पर लोग देश की जनता का नही अपने प्रदेश की जनता को ही श्रेय देते है। पर कोई ये तो बताये की आख़िर वो टॉप फाइव तक कैसे पहुंची ?


वैसे एस.एम.एस करने की जैसी दीवानगी दार्जिलिंग के लोगों मे देखने को मिली थी उसके बारे मे तो सभी जानते है। किस तरह दार्जिलिंग मे लोगों ने एस.एम.एस बूथ बनाए थे प्रशांत को वोट करने के लिए, जहाँ चौबीस घंटे मे कोई भी कभी भी जाकर वोट कर सकता था।और लोग भी लगे थे स्कूल के बच्चे,लड़के,लडकियां ,बडे,छोटे हर कोई वोट ही कर रहा था। काश ऐसी दीवानगी किसी सार्थक कार्य के लिए भी लोग दिखाएँ। वैसे प्रशांत जीतता या अमित फायदा तो मोबाइल कंपनी और सोनी टी.वी.को ही होना था और हुआ भी है। अरे भाई सात करोड़ एस.एम.एस से होने वाली कमाई तो इन्ही लोगों की जेब मे जायेगी ना।

चले सोनी के इंडियन आइडल का तो फैसला हो गया अब ज़ी और स्टार के विजेता देखें कौन बनता है। पर क्या ये सारे विजेता बडे गायक या गायिका भी बनते है या वो इन प्लेटफार्म का इस्तेमाल सिर्फ लोगों मे पहचान बनाने के लिए करते है। जैसे ज़ी के एक मयूजिकल शो मे आयी लखनऊ की ट्विंकल जो आजकल ज़ी के ही एक सीरियल बेटियाँ मे एक्टिंग कर रही है। क्यूंकि शायद उन्हें लगा होगा की सिंगर बनने से ऐक्टर बनना ज्यादा आसान है। इसीलिये उसने संगीत छोड़ कर एक्टिंग करना शुरू कर दिया है।जितने भी विजेता हुए है वो कहॉ है उन्हें ढूंढ़ना पड़ता है । वैसे सोनी के पहले इंडियन आइडल अभिजीत सावंत तो फिर भी सुनाई देते है पर संदीप आचार्य कहॉ है पता नही।हो सकता है की हम गलत हो. और फ़ेम गुरुकुल वाले काजी तौकीर और रुप रेखा बनर्जी याद है या भूल गए। आज कहां है या उनका कौन सा एलबम आया था लोगों को शायद ही याद होगा। वैसे अभी चंद रोज पहले काजी का किसी अखबार मे interview छपा था जिसमे उसने बडे ही शान से कहा की फ़ेम गुरुकुल का प्लेटफार्म तो उसने इसी लिए चुना था जिससे लोग जिसमे जनता और फिल्म वाले दोनो आते है उसे पहचान ले क्यूंकि वो सिंगर से ज्यादा ऐक्टर बनना चाहता था और इससे अच्छा प्लेटफार्म उसे भला कहां मिल सकता है। और अब वो किसी फिल्म मे एक्टिंग भी कर रहा हैजब वो आख़िरी तीन मे आया था तो सबसे ज्यादा जावेद अख़्तर खुश हुए थे और कहा था की जीत हमेशा कछुए की ही होती हैपर क्या उन्हें ये पता है की आज वो काजी जो उस समय सिर्फ और सिर्फ एक सिंगर बनने की खाव्हिश जता रहे थे उसने सिंगिंग छोड़कर एक्टिंग कर कर दी है

वैसे ज़ी के कुछ कलाकार तो संगीत के क्षेत्र मे नाम कमा रहे है जैसे सुनिधि चौहान , कुनाल गान्जावाला और श्रेया घोषाल इसके उदहारण है। पर फिर भी कई बार जीत का असली हकदार वोटों की वजह से हार जाता है।