Saturday, December 22, 2007

कल यूं ही हम सहारा वन चैनल पर संगीत पर आधारित कार्यक्रम देख रहे थे जिसमे कार्यक्रम की शुरुआत मे राहुल जो प्रोग्राम के संचालक है वो कोई गाना गा रहे थे और जनता को ताली बजाने का इशारा कर रहे थे। आम तौर पर हर कार्यक्रम वो चाहे टी.वी.का हो या स्टेज पर होने वाले प्रोग्राम चाहे बड़े-बड़े फिल्मी प्रोग्राम हों या कोई और प्रोग्राम हों , होस्ट हमेशा लोगों को ताली बजाने के लिए कहते है कि अब फलां स्टेज पर आ रहें है और फलां का स्वागत जोरदार तालियों के साथ कीजिए।और जनता भी ऐसी होती है कि होस्ट के कहने पर ही ताली बजाती है। कभी-कभी बेमन से तो कभी बडे ही जोरदार ढंग से ।

जनता के ताली बजाने और न बजाने के दो उदाहरण हमे अभी हाल मे ही हुए दो बड़े समारोह मे देखने को मिले । पहला समारोह एड्स अवएरनेस पर आधारित कार्यक्रम था जिसकी होस्ट बार-बार जनता से मंच पर आने वाले लोगों का जोरदार तालियों से स्वागत करने को कहती थी तभी लोग ताली बजाते थे।यहां तक कि जो कलाकार प्रोग्राम मे भाग लेने आये हुए थे( मुम्बई और लोकल कलाकार) वो लोग़ भी हर थोड़ी देर मे जनता को ताली बजाने का इशारा करते थे।

दूसरा उदाहरण लिबरेशन डे के मौक़े पर देखने को मिला जहाँ परेड के दौरान तो फिर भी लोगों ने तालियाँ बजाई पर जब लोगों को अवार्ड दिए जा रहे थे तो किसी ने भी ताली नही बजाई , जो हमारे ख़्याल से गलत था। वो शायद इसलिए कि होस्ट ने ये नही कहा था कि फलां का जोरदार तालियों से स्वागत करिये।


ताली उत्साह बढ़ाने के लिए और ख़ुशी जाहिर करने के लिए या स्वागत के लिए बजाई जाती है तो फिर किसी के कहने की जरुरत ही नही पड़नी चाहिऐऐसा अक्सर देखा जाता है कि लोग ताली बजाने मे बड़ी ही कंजूसी करते है जबकि ये नही होना चाहिऐ ।

9 Comments:

  1. Sanjeet Tripathi said...
    सही कहा आपने, तालियां और शुभकामनाएं देने में तो संकोच नही करना चाहिए कम से कम।

    आज़ादी एक्स्प्रेस आज रात में मुंबई से गोवा रवाना हो जाएगी जहां शायद इसका स्टॉपेज मडगांव में है, अगर आप भीड़ की वजह से न देख सकें तो आप ट्रेन के इंजार्ज श्री फाये जी से मेरा नाम लेकर संपर्क कर सकती हैं ताकि आप आसानी से देख सकें।
    Aflatoon said...
    गुरुदेव रवीन्द्रनाथ तालियों और हारमोनियम को नापसंद करते थे। उसके विकल्प के रूप में एक हाथ हवा में ऊपर कर हथेली को नचाने की बात आई।गुजरात में इस दूसरी विधि को 'कमल करना' कहते हैं।हांलाकि जैसा आपने बताया वैसा गुजरात की उन पाठशालाओं में भी होता है : अक्सर गुरुजी , 'कमल करो' का आवाहन करते हैं ।
    anuradha srivastav said...
    ताली तो उत्साहवर्द्धन का तरीका है फिर इससे गुरेज़ क्यों? शायद ताली ना बजाना भी स्टेटस सिंबल बन चुका है अब तो।
    ज्ञानदत्त पाण्डेय । GD Pandey said...
    लोग स्वत: स्फूर्त ताली बजाना भूल रहे हैं - यह तो बड़ा महत्वपूर्ण ऑब्जर्वेशन है।
    दीपक भारतदीप said...
    तालियाँ बजाने के कार्यक्रम भी प्रायोजित हों तो ही लोग बजाते हैं. आजकल हर कार्यक्रम प्रायोजित है सिवाय ब्लोग पर लिखने और कमेन्ट लगाने के. इसलिए तो भाईचारा बना हुआ है. आपकी पोस्ट वाकई दिलचस्प और विचारणीय होती है.
    दीपक भारतदीप
    Shiv Kumar Mishra said...
    This comment has been removed by the author.
    Shiv Kumar Mishra said...
    तालियाँ बजाना चाहिए था लोगों को...

    वैसे गुजरात का जिक्र जो अभी तक राजनीति, हिंदुत्व, मोदी, अल्पसंख्यक वगैरह वगैरह तक सीमित था, आज ताली तक पहुँच गया....अच्छा है, अब तो मौका ढूढ़ने की भी जरूरत नहीं. लोग मौका बना लेते हैं.

    इसी बात पर दे ताली.
    mamta said...
    संजीत जी शुक्रिया फाये जी के बारे मे बताने के लिए।अगर जरुरत पड़ेगी तो हम उनसे बात कर लेंगे। वैसे ट्रेन वास्को मे रुकेगी ।
    मीनाक्षी said...
    ममता जी , अगर लोगों को जानकारी हो कि ताली बजाने से कई रोगों से मुक्ति पाई जा सकती है तो शायद हर समारोह पर खूब तालियाँ बजें... रोचक पोस्ट बन सकती है..

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