सुनामी ना पहले कभी सुना और ना देखा


२६ दिसम्बर२००४ को जब हम लोग अपनी गाड़ी मे भाग रहे थे (ये वही सफ़ेद क्वालिस है जिसने उस दिन हम लोगों को पार लगाया था। )तो सामने हर तरफ पानी नजर आ रहा था और जिस रास्ते से हम लोग हमेशा जाते थे वहां पानी भर रहा था । और सामने के सीधे रास्ते पर गाड़ी ले जाने का मतलब था पानी की चपेट मे आना ।गाड़ी चलाते हुए पतिदेव ने पूछा किधर से चलें तो हमने बिना कुछ सोचे समझे कहा कि बाएँ से वो जो चडाई वाला रास्ता है । इस पर वो बोले रास्ता पता है तो हमने कहा रास्ता तो पता नही है पर जब इतने सारे लोग जा रहें है तो कहीं ना कहीं तो सड़क निकलेगी ही। और जैसे ही हम लोगों ने गाड़ी बायीं ओर मोड़ी तो जो दृश्य देखा कि बयाँ करना मुश्किल है। हर आदमी के चेहरे पर बदहवासी और डर का भाव और हम लोग भी इस भाव से अछूते नही थे।जो जिस तरह था पानी आता देख उसी हालत मे जान बचाने के लिए भाग रहा था। उस चडाई पर चढ़ते हुए लोगों का हुजूम किसी पिक्चर के सीन से कम नही था।उस समय ये तो अंदाजा लग गया था की कुछ गड़बड़ है पर इतनी ज्यादा तबाही ,कभी सोचा भी नही था। हमने उस से कहा कि कैमरा दो । कुछ फोटो ले ली जाये । तो बेटे ने कहा कि कैमरा उसके पास नही है। कैमरा तो ड्राइंग रूम मे सोफे इस रक्खा था।आपने नही उठाया ।गुस्सा भी आया की कैमरा क्यों नही उठाया पर वहां जान बचाने के लाले पड़े थे कैमरा उठाने की भला किसे याद रहती। गाड़ी चडाई पर रेंगती हुई चल रही थी क्यूंकि पूरी सड़क पर लोग पैदल चल रहे थे । बस चडाई चढ़ते हुए पीछे देखा हम लोगों के घर मे पानी घुस चुका था।चढ़ाई वाला वो रास्ता जिस पर हम लोग कभी भी नही गए थे।क्यूंकि जब कभी भी हम ड्राईवर से पूछते थे की ये चडाई वाला रास्ता कहाँ जाता है तो वो कहता कि मैडम वो रास्ता ठीक नही है। पर २६ को हम लोगों को उसी रास्ते ने बचाया।


चढ़ाई से ऊपर आकर जब सड़क पर पहुंचे तो कुछ लोगों ने गाड़ी की और इशारा किया तो हम लोगों ने गाड़ी रोकी और उतर कर देखा कि आगे बोनट की जाली मे घास-फूस लग गयी थी जो उस समय समुन्दर के पानी के साथ बह कर आई थी। खैर वहां से हम लोगों को पहले तो समझ नही आया कि क्या करें फिर पतिदेव बोले कि ऑफिस चलते है।जैसे ही ऑफिस मे हम गाड़ी से उतरने लगे कि पैर मे बडे जोर का दर्द महसूस हुआ तब पैर देखा तो घुटने के नीचे पूरा काला पड़ गया था और चलने मे तकलीफ हो रही थी।
हम लोग असमंजस की स्थिति मे थे कि एक साहब आये और हमसे पूछने लगे कि मैडम आपने घर लॉक तो किया है ना।( चूँकि इन साहब ने पानी का आना देखा नही था। तब तक पानी का आना कोई बड़ी बात नही समझा जा रहा था। )


हमने कहा लॉक कहाँ करने का समय था । जान बचाकर बस भाग आये है।

तो वही सज्जन बोले कि ऐसे घर खुला होने पर तो कोई भी सामान उठाकर भाग जाएगा। ( मतलब कि उस समय तक किसी को भी ये अंदाजा नही था कि कुछ इतना वीभत्स हुआ है। )

उनके ऐसा कहने पर हमने उन्ही से कहा कि आप हमारे घर जाकर ताला लगा आइये। क्यूंकि एक तो हमारे पैर मे दर्द था और दूसरे पानी का खौफ था।

इसपर वो सज्जन बड़ी तेजी से अपने स्कूटर पर गए और पांच मिनट बाद ही लौट आये और बोले कि मैडम सड़क के मोड़ तक पानी आ गया है और चारों और पुलिस आ गयी है। पुलिस किसी को भी वहां घरों मे जाने नही दे रही है।
( यूं तो ये फोटो भी बाद मे ही ली गयी है पर इस फोटो मे पानी का स्तर जो उस समय ऊपर उठ गया था दिखाई दे रहा है। )

ये सुनकर हमे भी कुछ संतोष हुआ कि चलो कम से कम घर से सामान तो गायब नही होगा।

थोडी देर ऑफिस मे रूक कर हम लोग अपने एक दोस्त के घर आ गए।उनके घर पहुँचते ही सबसे पहले हमने मम्मी को इलाहाबाद फ़ोन किया और कहा कि अगर न्यूज़ मे कुछ देखें तो घबदाएं नही क्यूंकि अंडमान मे बहुत जोर का भूकंप आया है और हम लोग ठीक है।(इस समय तक भी हम लोगों को सुनामी के बारे मे कुछ भी पता नही था। ) बस उसके बाद तो फ़ोन लाइन ही खराब हो गयी। बिजली चली गयी। और अगले तीन दिनों तक हम लोग बाक़ी दुनिया से कट से गए थे। चूँकि मम्मी को फ़ोन कर दिया था इसलिए बाक़ी घरवालों को भी मम्मी से हम लोगों के सही-सलामत होने की खबर मिल गयी थी।


सुनामी ने अंडमान मे तो फिर भी कम पर निकोबार मे जबरदस्त तबाही मचाई थी।सुनामी से हुई बर्बादी के बारे मे आगे लिखेंगे।






Comments

सुनामी का विवरण, उस समय की प्रत्युत्पन्न मति और बदहवासी का चित्रण तो बहुत सजीव है! लेखन के लिये बधाई।
सुनामी की याद आते ही हम सिहर उठते हैं , आप तो आँखों देखा हाल कह रही हैं.. प्रकृति का क्रोध इस तरह निकलता देख कर भी हम नहीं समझते कि पर्यावरण की रक्षा ज़रूरी है.
Mired Mirage said…
आपने अपने अनुभव हमें बताए तो अलग ही किस्म का अनुभव हुआ । आमतौर पर ऐसी खबरें केवल दूसरों के साथ हुई सुनते हैं । परन्तु जब कोई अपना इनसे गुजरता है तो इनकी भयंकरता का ठीक ठीक पता चलता है ।
घुघूती बासूती

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