Tuesday, March 31, 2009

अब साइकिल और स्कूटर सीखने का किस्सा तो हम ने एक जमाने पहले ही आप लोगों को बता दिया था पर कार का किस्सा बताना रह गया था ।तो सोचा आज आप लोगों को अपने कार चलाने के सीखने का अनुभव भी बता दिया जाए । अब वो क्या है ना चूँकि मायके मे हम सबसे छोटे थे इसलिए कार सीखने का नंबर आते-आते हमारी शादी हो गई थी:)

आप यही सोच रहे है ना कि तीन दिन मे कार चलाना सीखा तो कौन सा बड़ा तीर मार लियाअरे भई हम जानते है कि आप लोगों ने एक घंटे या एक दिन मे कार चलाना सीखा होगा:)

दिसम्बर ८९ की बात है उस समय बेटे छोटे थे और हम इलाहाबाद गए हुए थे और हमारी बाकी जिज्जी भी इलाहाबाद आई हुई थी । एक दिन शाम को हम सब चाय पी रहे थे और बातें हो रही थी तभी हमें कार चलाना सीखने का भूत चढ़ गया ।तो भइया बोले की कार चलाना तो बहुत आसान है । बस गियर लगाना आना चाहिए । और कार चलाते समय बिल्कुल भी डरना नही चाहिए । फ़िर भइया ने घर मे खड़ी कार मे ही गियर लगाना सिखाया ।क्योंकि तब ambassador मे हैंड गियर होता था । ४-५ बार गियर लगाने की प्रैक्टिस करने के बाद ड्राईवर मुन्ना लाल को बुलाया गया और हम चल दिए कार सीखने के लिए ।

घर से तो मुन्ना लाल ही एमबैसडर कार लेकर चला और संगम के पहले बायीं ओर की सड़क जो आगे जाकर संगम पर ही मिलती थी (नाम भूल रहे है )और जिस पर उस ज़माने मे ट्रैफिक काफ़ी कम रहता था । वहां ले जाकर ड्राईवर ने एक बार फ़िर हमें गियर लगाना सिखाया और बताया कि कैसे क्लच को धीरे-धीरे छोड़ते हुए कार को आगे बढ़ाना है । पर जैसा की नौसिखिये चालक के साथ होता है वही हमारे साथ भी हुआ । जैसे ही first गियर लगाते और क्लच छोड़ते की बस कार वही घच करके झटके के साथ रुक जाती । :)

खैर २-४ बार के बाद समझ मे आया कि कैसे क्लच छोड़ते हुए एक्सीलेटर से स्पीड करते हुए कार आगे बढ़ाना है ।बस एक बार जब कार चल पड़ी तब तो कोई दिक्कत ही नही आई थी ।वैसे एम्बेसडर जैसी भारी-भरकम कार मे सीखने का ये फायदा हुआ कि एम्बेसडर चलाने के बाद सभी कार हल्की लगती थी । कार सीखने मे अगर एक बार first गियर मे कार चला ली बिना झटका दिए तो समझ लीजिये कि आपको कार चलाना आ गया । क्योंकि सबसे मुश्किल काम यही है । ग़लत तो नही कह रहे है ना । :)

उस दिन करीब एक घंटे तक कार चलाने के बाद घर लौटने मे फ़िर से ड्राइवर ने ही कार चलाई क्योंकि वहां पर जो चौराहा पड़ता है उस पर बड़ी भीड़ हुआ करती थी जिसमे रिक्शा ,साइकिल,कार,पैदल और गाय भैंस सभी होते थे । और पहले दिन तो डर भी लग रहा था । अगले दिन फ़िर से शाम को ड्राईवर के साथ हम कार लेकर संगम की ओर चल पड़े और इस बार हमारी भांजी भी कार मे हमारे साथ थी । और एक घंटे वहां कार चलाने के बाद जब लौटने लगे तो हमने ड्राईवर को बोला की अब घर चलना है इस लिए अब तुम चलाओ । तो ड्राईवर बोला दीदी आप ही चलाइये । बस धीरे-धीरे चलाइयेगा और चौराहे पर हार्न जरुर बजाइयेगा । खैर उस दिन डरते-डरते संगम से घर तक कार चलाकर जो आए तो धड़का खुल गया अरे मतलब डर निकल गया । :)

और घर मे घुसते ही भांजी ने सबको जोर-जोर से बताया कि आज तो मौसी ही कार चलाकर घर लायी है । तीसरे दिन जब चले तो पीछे बैठने वाली सवारी मे इजाफा हो गया माने हमारी भांजी के साथ-साथ हमारे बेटे भी चल दिए हमारे साथ । दो दिन चलाने के बाद तो इतना कार चलाना आगया था कि उस दिन घर से भी हम ही कार चलाकर ले गए फ़िर वहां एक घंटा कार चलाई और वापिस घर हम ही चला कर आए और बस सीख गए कार चलाना ।

और उसके बाद दिल्ली मे पतिदेव ने खूब कार चलाने की प्रैक्टिस करवाई । जहाँ भी जाना होता था वो हमसे ही कार चलवाते थे । उस समय हम लोगों के पास फिएट कार थी ।और हमारी एक ननद पश्चिम विहार मे रहती थी और तकरीबन हर हफ्ते एक बार हम लोग उनके यहां जाते थे तो g.k. से पश्चिम विहार तक हम कार चलाते थे जिसका नतीजा ये हुआ कि हम कार चलाने मे पक्के हो गए ।

बाद मे जब दोनों बेटे स्कूल जाने लगे थे तब ये कार चलाना असली मे काम आया था क्योंकि दोनों बेटों का स्कूल के भारी-भारी बैग के साथ पैदल चलना मुश्किल होता था ना (वैसे स्कूल बहुत पास था, E.O.K.मे ) । :)


Monday, March 30, 2009

आपको गिनती से जामुन खरीदने का अनुभव हुआ है कि नही हम नही जानते है पर हमें जरुर अनुभव हुआ हैगिनती से जामुन खरीदने का अनुभव हमें हुआ है और वो भी गोवा मेंकल की ही बात है हम सब्जी मंडी गए थे और वहां जामुन देख कर जब बेचने वाली से पूछा कैसे दिया ? तो बोली की ४० रूपये मे १००
तो हमने कहा कि किलो मे कैसे ?
तो वो बोली किलो नही ,४० रूपये मे १००
हमने कहा कि इतनी गिनती करोगी तो मुस्काराते हुए सर हिलाकर बोली हाँ

और जब हमने कहा कि गड़बड़ तो नही करोगी तो बोली नही
और हमारे कहने पर की ठीक है दे दो तो उसने जामुन गिनना शुरू किया और - मिनट मे जामुन से भरा पैकेट हमारे हाथ मे था :)
कहना पड़ेगा कि बड़े ही एक्सपर्ट अंदाज मे फटाफट गिनती करती है ये जामुन बेचने वाली

पहले जामुन कभी गिनती करके नही खरीदा बनारस ,इलाहाबाद और दिल्ली मे तो दरवाजे पर (घर )जामुन वाला सिर पर टोकरी लिए आता थाबनारस (६०-७० मे ) मे तो जामुन वाले एक स्टैंड सा भी साथ लेकर चलते थे जिसपर वो जामुन की टोकरी रखते थेऔर फ़िर जामुन को तौल कर मिटटी की हंडिया मे जामुन और नमक -मसाला मिलाकर झोरता (हिलाता ) था और दोने मे देता था और उस को खाने मे बड़ा ही मजा आता था और कोई -कोई जामुन वाले - अलग-अलग माप के लकड़ी का डिब्बा सा भी रखते थे और जितनी की जामुन लेनी हो उसी माप के डिब्बे मे जामुन डालकर नमक लगाकर झोरते थे और फ़िर दोने मे देते थे

और दिल्ली मे तो इंडिया गेट के आस-पास थोडी-थोडी दूर पर जामुन बेचते हुए लोग दिखाई देते है और कई बार तो पेड़ के नीचे चादर फैलाए हुए भी दिखाई देते है क्योंकि बारिश के मौसम मे जब हवा जोर से चलती है तो जामुन को ये लोग चादर पर catch करते है और फ़िर ढेर बना कर बेचते हैआपने तो देखा ही होगा

यहाँ तो जामुन मिलनी शुरू हो गई है और हमने खाना भी शुरू कर दिया है और आप लोगों के यहाँ जामुन मिलनी शुरू हुई या नही:)

Saturday, March 28, 2009

भई है तो ये गाना बहुत पुराना पर आज भी इसके एक-एक बोल बिल्कुल सोने के जैसे खरे हैउस समय की हिट चौकडी यानी राज कपूर ,मुकेश,शैलेन्द्र और शंकर जयकिशन का कोई मुकाबला नही हैतो लीजिये हम ज्यादा बक-बक नही करते है और आप लोगों को गीत सुनने देते है
वैसे आप को याद है कि आज रात साढ़े आठ बजे से साढ़े नौ बजे तक यानी एक घंटे earth hour के लिए लाइट बंद रखनी है

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Friday, March 27, 2009

इस साल मार्च मे जब से IPL के मैचों की घोषणा हुई है तब एक तरह का घमासान सा चल रहा है । पहले तो IPL की तारीखों के ले कर सरकार और B.C.C.i.और IPL के ललित मोदी के बीच खींच - तान चलती रही । क्योंकि देश मे लोक सभा चुनावों की घोषणा भी मार्च मे ही हुई और चुनाव देश के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है । ये तो सभी जानते है ।

और चूँकि अब चुनाव ५ फेज मे हो रहा है यानी १६ अप्रैल से १३ मई तक पोलिंग और १६ मई को counting यानी पूरा एक महीना । और IPL के मैच भी १० अप्रैल से शुरू होकर २४ मई तक होने थे । ऐसे मे जो तारीख ललित मोदी कहते उसमे गृह मंत्रालय राजी नही होता क्योंकि सुरक्षा की जरुरत चुनाव और IPL दोनों को है । अब ये दूसरी बात है कि मोदी और B.C.C.i.को शायद ऐसा नही लग रहा था ।और IPL होने पर इन लोगों को हजार करोड़ का नुक्सान उठाना पड़ता सो अलगवो भी आज के recession के समय मे

हालाँकि चुनावों के मद्दे-नजर कई बार मैच की तारीखें बदली गई पर हर बार गृह मंत्रालय जब राज्य सरकारोंसे सुरक्षा देने की बात पूछता तो राज्य सरकार जहाँ पर ये IPL मैच होने थे ,ने भी सुरक्षा देने से इनकार किया तो आख़िर मे ललित मोदी ने IPL को भारत के बाहर दक्षिण अफ्रीका मे करवाने का एलान किया । और अब १८ अप्रैल से मैच शुरू हो जायेंगे और मई तक चलेंगे ।

इस बार लगता है IPL और ललित मोदी के दिन कुछ ठीक नही चल रहे है । अभी कुछ दिन पहले ललित मोदी के ख़िलाफ़ एक scam की ख़बर भी आई थी और उसके कुछ दिन बाद ही ललित मोदी के राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन का चुनाव हारने की ख़बर भी आई ।

खैर , वैसे इस बार IPL की टीमों मे भी कुछ-कुछ गड़बड़ हो रही है । जैसे अब रॉयल चैलेंजर की टीम के कप्तान राहुल द्रविड़ नही बल्कि केविन पीटरसन होंगे । अभी तो एक ही कप्तान है पर कहीं नाईट राईडर्स टीम का असर न पड़ जाए । :)
क्योंकि कोलकता नाईट राईडर्स टीम मे इस बार एक नही दो नही बल्कि चार कप्तान होंगे ऐसा इस टीम के coach का कहना है । पर सौरभ दादा इस बात से ज्यादा खुश नही है ।

अब दादा को तो नाखुश होने की आदत सी हो गई है । माना कि अभी तक देश के वो सबसे सफल कप्तान रहे है पर धोनी की टीम इंडिया के जीतने पर भी वो खुश नही होते है । जैसे जब धोनी की टीम अपने देश मे जीतती है तो दादा कहते है कि विदेश मे जीत कर दिखाओ । और जब विदेश मे जीतती है तो कहते है कि टेस्ट मैच जीतकर दिखाओ । टेस्ट जीत जाए तो भी दादा ये मानने को तैयार नही कि इस समय जो टीम है वो बेस्ट टीम है बल्कि सौरभ का कहना है कि ये टीम best नही better है । खैर जाने दीजिये ।

और हाँ इस बार नाईट राईडर्स की ड्रेस भी बदली जा रही है । कैसी होगी वो तो १८ अप्रैल को पता चल ही जाएगा ।

IPL के देश के बाहर होने से हम ये सोच रहे है की कोलकता नाईट राईडर्स का NDTV IMAGINE पर चीयर लीडर्स ( जिन्हें ये लोग angel कह रहे है ) चुनने के लिए जो डांस शो हो रहा है उसमे दादा (सौरभ) और उनके साथ टीम का ही एक और क्रिकेटर और एक कोई फिल्मी हीरो या हेरोइन जज बन कर लड़कियों का डांस देख कर उन्हें select कर रहे थे जिससे की ये लड़कियां ग्राउंड मे मैच के दौरान खिलाड़ियों को चीयर करें और साथ ही साथ जनता को भी । पर अब जब IPL साउथ अफ्रीका चला गया है तो अब इन चीयर लीडर्स का क्या होगा ।

क्या शाह रुख इन चीयर लीडर्स को भी साउथ अफ्रीका ले जायेंगे टीम को चीयर करने के लिए ? :)

Thursday, March 26, 2009

अब जैसा की टाटा ने वादा किया था हिन्दुस्तान की जनता को लखटकिया कार देने का तो वो इंतजार ख़त्म हुआ और टाटा ने तीन दिन पहले अपना वादा पूरा किया । मुंबई मे पूरे शान-ओ- शौकत से nano को लॉन्च किया गया । और इस कार के एक नही बल्कि ३ नए मॉडल लॉन्च किए गए है । और हर मॉडल का दाम और सुविधाएं (फीचर्स)अलग -अलग है ।

वैसे टाटा ने एक लाख की कार का वादा किया था पर सबसे कम दाम वाली कार एक लाख बारह हजार की है (मतलब लाख से ऊपर) जिसमे न तो ए.सी.है और न ही स्टीरियो है पर हाँ इन सबके लिए कार मे स्पेस दिया हुआ है जिससे अगर कार लेने वाला चाहे तो बाद मे अपनी सुविधा से ए.सी.और स्टीरियो लगवा सकता है ।

बाकी के दूसरे मॉडल जैसे CX और LX मे जहाँ दाम ज्यादा है वहीं इन मॉडल मे ए.सी और स्टीरियो के साथ ही साथ कुछ और नए फीचर्स भी है । कार के रंग से भी जैसे अगर मेटलिक है तो कार का दाम ज्यादा हो गया है । इसके अलावा हर शहर मे भी nano का दाम अलग है । और सबसे महँगी एक लाख पचासी हजार (१.८५ )की होगी ।

जितना कुछ nano के बारे मे पढ़ा और देखा है उससे लगता है ये nano काफ़ी हलकी-फुलकी कार है पर sturdy हो सकती है क्योंकि टाटा ने जो इसे बनाया है । और आम तौर पर टाटा की सभी गाडियाँ काफ़ी sturdy है । इस nano मे ४ लोग आराम से और ५ लोग जरा कम आराम से बैठ सकते है । :)

अब ये देखने मे इतनी छोटी और हलकी लग रही है जिसे देख कर लगता है कि अगर कहीं दिल्ली जैसे शहर मे इसे किसी ने ठोंक दिया तो क्या होगा ।

वैसे nano के लिए कहा जा रहा है इसने head on test और roof test माने अगर nano की छत पर कुछ भारी-भरकम गिर जाए तो भी nano उसे झेल सकने मे सक्षम है । अब एक्चुअल मे nano कितनी sturdy होगी ये तो बाद मे ही पता चलेगा ।इसके माइलेज के लिए कहा गया है कि एक लीटर मे २३ कि. मी .चलेगी । पर इसकी पेट्रोल की टंकी काफ़ी छोटी है सिर्फ़ १५ लिटर की कैपसिटी है । और सबसे गड़बड़ इसकी डिक्की बहुत ही छोटी सी है ।(ना के बराबर) पर भाई जब कार ही इतनी छोटी और हल्की (इसका kerb weight ६०० किलोग्राम है ) और इसका इंजन ६२४ ccc का है । पर हाँ इसकी head light देखने मे बड़ी सुंदर लग रही है । (eye shaped)

nano के आने से हर शहर मे ट्रैफिक तो जरुर बढेगा और parking का तो भगवान ही मालिक है ।जब आज के समय मे क्या दिल्ली क्या लखनऊ,और क्या गोवा ,किसी भी शहर मे शाम के समय बाजार या सिनेमा हॉल मे parking मिलना और कार पार्क करना इतना मुश्किल है ये तो हम आप सभी जानते है । पर nano के आने के बाद क्या होगा ?

वैसे nano की बुकिंग ९ अप्रैल से २५ अप्रैल के बीच होगी तो आप बुक करा रहे है या नही । हम तो सोच रहे है कि बुक करा ही ले । भई लखटकिया न सही डेढ़ लखटकिया ही सही । :)




Wednesday, March 25, 2009

आप लोग भी सोच रहे होंगे कि हम भी कहाँ सुबह-सुबह चमगादड़ (bats)की बात ले बैठे है । पर क्या करें । यहाँ गोवा मे इन सब जीवों से फ़िर से मुलाकात जो हो गई है । :)

अब है तो ये सवाल थोड़ा बेतुका पर क्या करें । असल मे यहाँ हमारे घर मे जो पेड़ है जिसमे कु चमगादड़ भी रहते है । वैसे पेड़ मे लटके हुए ये काफ़ी अच्छे लग रहे है । ( वैसे भी फोटो तो दिन में खींची है और ये एक साल पुरानी फोटो हैअरे मतलब की अब ये चमगादड़ भी बड़े हो गए है) दिन भर तो नही पर हाँ शाम को जैसे ही अँधेरा होने लगता है कि ये पेड़ से निकल कर चारों ओर उड़ने लगते है । और कभी-कभी काफ़ी नीचे-नीचे उड़ते है । कई बार तो ऐसा लगता है कि सिर छूते हुए ही उड़ रहे है । तो इस डर से की कहीं ये सिर के बाल ना नोच ले ,हम झट से सिर को हाथ से ढक लेते है ।

हम लोग रोज शाम को बाहर बैठते है पर जैसे ही चमगादड़ उड़ने लगते है तो हम लोग घर के अन्दर आ जाते है । वो क्या है कि हमेशा से सुनते आ रहे है कि अगर चमगादड़ सिर पर बैठ जाए तो वहां से बाल नोच लेता है । इसीलिए चमगादड़ को देखते ही हम घर मे आ जाते है और नही तो सिर को ढक लेते है ।

हालाँकि हमारे पतिदेव का मानना है कि ऐसा कुछ नही होता है और ये सब बेकार की बातें है । अक्सर शाम के समय जब चमगादड़ निकलते है तो इस बात को लेकर हम दोनों मे बहस भी हो जाती है और आख़िर मे हम यही डाईलौग कि अगर चमगादड़ सिर पर बैठ जाए तो वहां से बाल नोच लेता है मारकर घर में जाते है:)

वैसे अगर कभी आप गोवा मे आए हुए हो और patto ब्रिज जो मांडवी नदी पर बना है ,उससे कभी गौधूली के समय आ या जा रहे हो तो जरा गौर से देखियेगा तो आप देखेंगे कि बाहर से झुंड के झुंड चमगादड़ शहर की ओर उड़ते चले आ रहे होते है ,
छोटे-बड़े हर साइज़ के । :)

Monday, March 23, 2009

जैसा कि हमने अपनी पिछली पोस्ट मे कहा था सो कल हमने गुलाल देख ली । फ़िल्म तो अच्छी है ,और फ़िल्म मे यूनिवर्सिटी और स्टेट लेवल की राजनीति दिखाई गई है पर गाली कुछ ज्यादा बोली गई है । हालाँकि इस फ़िल्म मे काफ़ी मार-पीट और खून-खराबा है पर फ़िर भी फ़िल्म देखने के बाद भी सिर मे कोई भारीपन नही महसूस होता है । ये शायद अनुराग कश्यप के डायरेक्शन का कमाल है । इस फ़िल्म मे भी राम लीला को बीच-बीच मे कहानी के साथ जोड़ा गया है बिल्कुल delhi 6 की तरह फ़िल्म के पहले सीन की शुरुआत के.के से होती है और आखिरी सीन की ...... से


फ़िल्म की शुरुआत मे एक सीधा सा लड़का दिलीप सिंह law करने के लिए जयपुर कॉलेज - यूनिवर्सिटी मे admission लेता है और वो रहने के लिए एक जगह कमरा किराये पर लेता है जहाँ उसकी मुलाकात रानाजय से होती है ।और जब दिलीप हॉस्टल मे वार्डन से मिलने जाता है तो हॉस्टल मे दादा टाइप लड़के कैसे पहले दिन ही उसकी रैगिंग करते है (बुरी तरह)और जब रानाजय को पता चलता है तो वो उसके साथ उन लड़कों की पिटाई करने जाता है पर .... । और फ़िर किस तरह चाहते हुए भी दिलीप राजनीति मे आता हैऔर जनरल सेक्रेटरी का इलेक्शन जीत जाता हैऔर फ़िर कैसे सारे हालात बदल जाते है किस तरह एक सीधे लड़के का जीवन फंस जाता है इस politics के चक्कर मे

यूँ student politics पर पहले भी फिल्में बनी है पर इसमे politics के साथ-साथ राजपूताना के अलग राज्य की मांग को भी दिखाया गया हैराजा और रजवाडों को दिखाया गया हैकिस तरह इलेक्शन जीतने के लिए क्या-क्या घपले किए जाते है और कैसे बाद मे अपने ही विरोधी के साथ लोग मिल जाते हैये अच्छा दिखाया गया हैपूरी फ़िल्म कहीं भी रुकती नही है

कुछ डाइलोग जैसे - जब कुछ नही है करने को तो law कर लोवैसे ७०-८० के दशक मे ऐसा कहा भी जाता था और होता भी था । :) और उस ज़माने मे यूनिवर्सिटी मे नेता टाइप लोग law ही किया करते थे जिससे वो लोग यूनिवर्सिटी मे भी रह सके और इलेक्शन भी लड़ सके
और दीवार के सीन मेरे पास माँ है का एक अलग ही नजारा देखने को मिलता हैऔर जो brain wash दिखाया गया उसके बारे मे पहली बार ८० मे हमने अपने कजिन जो कि उस समय मोती लाल इंजीनियरिंग कॉलेज इलाहाबाद मे पढता था ,सुना था

इस फ़िल्म मे एक्टिंग किसने सबसे अच्छी की है ,कहना मुश्किल है क्योंकि हर छोटे-बड़े कलाकार ने बेहतरीन अभिनय किया है फ़िर वो चाहे के.के.मेनन हो या आदित्य श्रीवास्तव हो या अभिमन्यु सिंह , या फ़िर नया हीरो राज सिंह चौधरी या फ़िर भाटी के रोल मे दीपक दोब्रियाल ही क्यों होयहाँ तक की जेसी रंधावा जो की एक मॉडल है उसने कम बोलते हुए सिर्फ़ आंखों से expreesion दिए हैमाही गिल और किरण के रोल मे आयेशा मोहन ने भी अच्छा अभिनय किया है . और सबसे अच्छे लगे पियूष मिश्रा जिन्होंने के.के.मेनन के बड़े भाई पृथ्वी का रोल किया हैफ़िल्म मे उनका किरदार भी बहुत अहम् हैमेनन और श्रीवास्तव राजपूत बनकर गजब के लगे है

सिर्फ़ शब्दों मे कहें तो गुलाल मतलब politics ,पॉवर ,और पैसा है

इस फ़िल्म के गानों के बोल बहुत असाधारण से लगे और आखिरी गीत वो दुनिया भी बहुत पसंद आयाइस गीत के एक-एक शब्द आज के समय मे बिल्कुल फिट बैठते हैऔर इस गीत की आखिरी लाइन और आखिरी सीन का फिल्माया जाना एक सवाल और जवाब छोड़ता हैतारीफ करनी होगी पियूष मिश्रा की जिन्हने इन गीतों को लिखा ,संगीतबद्ध किया और गाया भी हैवैसे ये गीत कुछ-कुछ प्यासा के गीत से इंस्पायर्ड है । तो आप भी सुनिए ये गीत ।

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Saturday, March 21, 2009

गुलाल फ़िल्म जिसे अनुराग कश्यप ने बनाया है ये गीत आरम्भ है उसी का है । वैसे अभी हमने फ़िल्म तो नही देखी ( सन्डे को देखेंगे ) पर इस फ़िल्म के २-३ गाने हमें बहुत पसंद आए है । एक-एक करके आपको सुनवायेंगे ।

इन गानों की सबसे अच्छी बात हमें ये लगी कि गाने के सारे बोल बहुत साफ़ है मतलब एक बार मे ही समझ आ जाते है । :) पियूष मिश्रा इसके गीतकार ओर संगीतकार है । राहुल राम ने गाया भी बहुत अच्छा है । पियूष मिश्रा का संगीत भी बहुत अच्छा है

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Friday, March 20, 2009

चुनावों की घोषणा के साथ ही देश मे एक अजीब से सरगरमी सी आ गई लगती है । अखबार पढिये या चाहे न्यूज़ देखिये हर जगह बस जोड़ तोड़ की राजनीति ही दिखाई दे रही है । कोई एक राजनैतिक दल छोड़कर दूसरे राजनैतिक दल मे जा रहा है तो कोई नई party ही बना रहा है ।

हर बार जब लोक सभा चुनाव आने वाले होते है तो एक नया (पर अब पुराना ) third front बनता है जिसमे हर वो राजनैतिक दल शामिल होता है जिसे सरकार या opposition से कोई न कोई प्रॉब्लम होती है ।

पर पिछले दो बार के चुनावों मे ये भी देखा कि जैसे ही चुनावों का नतीजा आता है तो third front पता नही कहाँ चला जाता है । और कुछ -कुछ शोले के असरानी वाले style मे आधे इधर जाओ आधे उधर जाओ और बाकी मेरे पीछे आओ ,जैसा हाल हो जाता है:)

खैर एक बार फ़िर third front की आवाज पूरे जोर-शोर से सुनाई दे रही है । और इस third front मे left party जो साढ़े चार साल तो यू.पी.ए.सरकार के साथ रही वो भी शामिल है ।लेफ्ट साढ़े चार साल तक लेफ्ट-राईट -सेंटर करती रही पर फ़िर अचानक उनके अन्दर का ओरिजनल लेफ्ट जाग गया और वो यू.पी..से अलग हो गए । जब से left यू.पी.ए से अलग हुए तब से रोज कोई न कोई यू.पी.ए की खामी बताते रहते है । जब साथ रहे तब भी नाखुश थे और अलग रह कर भी नाखुश ही है ।

अब इस third front मे तो कई पी.एम पद के उम्मीदवार है जैसे शरद पवार है जो टी.वी पर कहते नजर आए की महराष्ट्र की जनता इस बार मराठी प्रधानमंत्री चाहती है ।पर अब वो पलट गए है और कह रहे है की वो पी.एम.नही बनेंगे

तो वहीं मायावती है जो अपने आप को ख़ुद ही पी.एम.पद की उम्मीदवार घोषित किए बैठी है । जयललिता भी हो सकती है , अरे देवी गौडा को कैसे भूल सकते है ।

और फ़िर वैसे तो left party वाले कहते है कि उन्हें सत्ता का मोह नही है पर क्या पता कभी उनमें से किसी का भी मन भी हो जाए पी. एम.बनने का । :)

बी.जी.पी तो पहले से ही अडवाणी जी को पी.एम. के उम्मीदवार के रूप मे घोषित कर ही चुकी है हालाँकि आजकल बी.जे.पी .मे आपस मे ही इतनी ताना तनी चल रही है जिसे देख कर लगता है कि अडवानी जी का सपना पूरा होगा या नही अरे भाई अरुण जेटली मीटिंग मे जो नही जाते है तो वहीं वरुण गाँधी के भाषण ने मुसीबत कर रक्खी हैतो कहीं शत्रुघ्न सिन्हा अमर सिंह से मिलते नजर आते है (चलो अब शत्रुघ्न सिन्हा को तो टिकट देकर शांत कर दिया है । ) और कांग्रेस के मनमोहन सिंह तो है ही कांग्रेस के सहयोगी हर state मे सीटों को लेकर लड़ रहे है ।फ़िर वो चाहे बिहार हो या उत्तर प्रदेशअब तो कांग्रेस ने भी साफ़ कह दिया है कि यू.पी..की सरकार मे प्रधानमंत्री तो कांग्रेस का ही होगा


पहले भी ऐसा होता था पर शायद थोड़ा कम पर इस बार तो पूरी तरह से blackmailing की राजनीति चल रही हैअब अगले दो महीने तक यही खेल देखने को मिलेगा

राजनीती
भी क्या खेल है जिसके ख़िलाफ़ लड़ते है बाद मे उसी का साथ लेते है । :( :)

वैसे लालू यादव ने भी कुछ दिन पहले अपने इंटरव्यू मे कहा था कि वो भी बन सकते है प्रधानमंत्री । अब तो लालू के साले साधू ने ही उनका साथ छोड़ दिया है और कांग्रेस का हाथ पकड़ लिया है । क्या पता मुलायम सिंह भी पी.एम बनने का सपना संजोये हो । अब वैसे अगर मौका मिले तो शायद प्रणव मुखर्जी ,अर्जुन सिंह और .के.एंटोनी भी बन सकते है । अरे चिदाम्बरम भी तो बन सकते है ।

इस बार तो अगले दो महीने तक सभी पार्टियों के नेताओं मे पी.एम बनने की होड़ देखी जा सकती है । हर कोई अपने आप को दूसरे से बेहतर बताने की कोशिश मे लग गया है ।

लो इस सब मे राहुल को तो भूल ही गए । अरे वो भी तो बन सकते है प्रधानमंत्री ।

छोडिये काहे को अपना सर खपाया जाए ,दो महीने बाद तो पता चल ही जायेगा ।

Thursday, March 19, 2009

हमारा ये सवाल पूछने का ख़ास कारण है एक तो जिज्ञासा भी है कि इस तरह के बाल रखने का क्या कोई धार्मिक महत्त्व है जैसे साधू लोग जटा रखते है , या बस यूँ ही

वो क्या है कि पिछले हफ्ते जब हम सब्जी मंडी गए थे तो वहां पर हमने इस महिला को देखा और हमने फोटो खींच ली वैसे सब्जी बेचने वालों को थोड़ा आश्चर्य हुआ था जब हमने इसकी फोटो खींची थी फोटो हमने इसीलिए खींची थी ताकि आप लोगों से पूछ सकें क्योंकि ऐसी ही एक महिला को हमने बंगालारु के bull temple मे भी देखा था bull temple के बारे मे फ़िर कभी बाद मे बताएँगे

इन दोनों फोटो मे बाल रखने का एक ही style है और दोनों ने ऊपर लाल रंग का रिबन भी लगाया हुआ है पता नही कैसे इस तरह से मैनेज करती होगी

पहली फोटो bull temple की है जो हमने नवम्बर २००७ मे अपनी बंगालारु ट्रिप के दौरान खींची थी उस समय ये महिला मन्दिर की तरफ़ जा रही थी और हम मन्दिर की सीढियों से उतर रहे थे ।पर तभी अचानक इसके ऐसे बाल देख कर हमने फोटो खींच ली थी और फ़िर भूल गए

पर जब गोवा मे भी इस तरह के बाल वाली महिला देखी तो रहा गया और इसीलिए आज आप लोगों से ये सवाल कर रहे है

और ये दूसरी वाली फोटो गोवा के सब्जी मंडी मे खींची है


सब्जी मंडी से याद आया की गोवा की सब्जी मंडी जो की म्युनिसिपल मार्केट मे है वो भी देखने लायक है ।तीन floor की सब्जी मंडी है ।और काफ़ी well organised है और ऊपर दोनों तरफ़ मारियो मिरांडा की बनाई हुई पेंटिंग भी है यहाँ पर आपको दुनिया भर की सब्जियां और फल (कुछ ऐसी सब्जियां जिनके हमने सिर्फ़ नाम ही सुने थे पर अब स्वाद भी चख चुके है :) मिलते है

वैसे गोवा मे सरकारी दुकान भी है पर अन्य शहरों की तरह यहाँ पर हर जगह सब्जी वाले तो रिक्शे ठेले दीखते है और ही ज्यादा दुकाने (हाँ कभी कभी सुबह औरतें सिर पर डलिया मे साग वगैरा बेचती जरुर दिखती है )क्यूंकि सिवाय इस मंडी के पंजिम मे आपको और कहीं भी अच्छी सब्जी नही मिलेगी ।पंजिम की तरह ही मडगांव ,मापुसा और वास्को मे भी सब्जी मंडी है पर पंजिम जैसी नही

Wednesday, March 18, 2009

कल ज्ञान जी कि पोस्ट पर टूट मचान शीर्षक देख कर हमने समझा था कि उन्होंने मंच टूटने वाली घटनाओं पर लिखा है । खैर उन्होंने तो नही लिखा तो हमने सोचा कि हम ही इस पर लिख दे । अब वो क्या है कि आजकल चुनावों का मौसम है तो रोज ही नए और पुराने नेता और अभिनेता बड़ी-बड़ी रैली करते है । अब रैली होगी तो स्टेज या मंच भी बनेगा जहाँ से नेता भाषण बाजी करते है । पर आजकल या तो मंच बनाने वाले मंच ठीक से नही बना रहे है या फ़िर ये मंच इन नेताओं को इनकी सही जगह दिखा रहा है :)

कल ही किसी न्यूज़ चैनल पर दिखा रहे थे कि बंगाल मे कहीं भाषण देने पहुँची कोई फ़िल्म अभिनेत्री जो इस बार शायद चुनाव लड़ रही है , वो बाकी मंच पर खड़े कार्यकर्ताओं के साथ हाथ उठाकर शायद जनता का अभिवादन कर रही थी तभी अचानक मंच समेत वो और बाकी लोग नीचे गिर पड़े ।

इससे कुछ दिन पहले अमर सिंह भाषण देते-देते अचानक नीचे चले गए । अब जब तक लोग समझे तब तक अमर सिंह नीचे गिर गए । ये अलग बात है कि वो फटाफट उठा कर खड़े भी हो गए ।

अमर सिंह ही नही उमा भारती भी अपनी किसी रैली के दौरान बड़े शान से जैसे ही मंच पर पहुँची कि धम्म से मंच गिर पड़ा । और उमा भारती समेत सारे लोग नीचे ।

अब चुनावी रैली मे हर कोई तो मंच पर ही बैठना चाहता है वरना कैसे पता चलेगा कि कौन नेताजी के ज्यादा पास है । कभी-कभी तो पूरे का पूरा जत्था मंच पर चढ़ जाता है ।

लगता है मंच भी अब इन नेताओं का बोझ उठाने मे सक्षम नही रहा ।

नोट-- youtube पर इनके वीडियो भी है आप चाहे तो देख सकते हैstage collapsed in india शीर्षक से

Tuesday, March 17, 2009

सिनेमा या फ़िल्म इस शब्द का ऐसा नशा था क्या अभी भी है कि कुछ पूछिए मत ।वैसे भी ६०-७० के दशक मे film देखने के अलावा मनोरंजन का कोई और ख़ास साधन भी तो नही था । बचपन मे भी कभी पापा या मम्मी ने film देखने पर रोका नही मतलब हम लोगों के घर मे फ़िल्म देखने पर कभी भी कोई भी रोक- टोक नही थी ।बल्कि अच्छी इंग्लिश फ़िल्म तो पापा हम लोगों को ख़ुद ही दिखाने ले जाते थे .

और हम लोग अक्सर सपरिवार film देखने जाया करते थे ।और वो भी शाम यानी ६-९ का शो ।और फ़िल्म देखने के लिए स्कूल से आते ही फटाफट पढ़ाई करके बस तैयार होने लग जाते थे । पर हाँ पापा इस बात का जरुर ध्यान रखते थे कि film अच्छे हॉल मे लगी हो । इलाहाबाद मे उस ज़माने में सिविल लाईन्स का पैलेस और प्लाजा और चौक मे निरंजन सिनेमा हॉल हम लोगों का प्रिय हॉल था । वैसे अगर पिक्चर अच्छी हो तो कभी-कभी चौक मे बने विशम्भर और पुष्पराज हॉल मे भी देख लेते थे ।

उस समय film लगी नही कि film देखने का प्लान बनना शुरू हो जाता था । रेडियो पर बिनाका गीत सुन-सुनकर film देखने का तै होता था । और घर मे चूँकि हम ५ भाई-बहन थे तो उस ज़माने का कोई न कोई हीरो या हेरोईन हम पांचों मे किसी न किसी को ख़ास तौर पर पसंद होता था । इसलिए film देखने के लिए बहाने की ज्यादा जरुरत ही नही थी ।पर फ़िर भी हमें कभी-कभी छोटे होने का नुकसान भुगतना पड़ता था ।

इसी बात पर एक वाकया सुनाते है । अपने भाई-बहनों मे चूँकि हम सबसे छोटे है और हम film देखते हुए बहुत रोते थे जैसे मझली दीदी film को देखते हुए हमने रो-रोकर अपनी आँखें सुजा ली थी । :) वैसे अब भी रोते है :)

उस ज़माने मे मीना कुमारी की film देख कर अधिकतर महिलायें रोती ही थी क्योंकि उनकी एक्टिंग इतनी लाजवाब होती थी । और फ़िर हम तो बच्चे ही थे ।

खैर ये बात उन्ही दिनों की है हमें अच्छे से याद है वो गर्मियों के दिन थे जब काजल film आई थी तो सभी लोगों ने सोचा की ममता तो film मे बहुत रोती है तो इसे काजल film न दिखाई जाए और इसलिए पापा और दीदी लोगों ने रात का शो ९-१२ का देखने का प्रोग्राम बनाया । और बस फ़िर क्या था सारे लोग यानी हमारी दीदी लोग हमसे कुछ ज्यादा ही प्यार से बात करने लगी थी । पर हम भी कुछ कम नही थे हमें लग रहा था की जरुर कुछ माजरा है पर कुछ समझ नही पा रहे थे ।

खैर शाम को मम्मी ने सबको फटाफट खाना खिलाया और आँगन मे हमें लेकर लेट गई और दीदी लोगों को बोला कि तुम लोग जाओ और पढ़ाई करो । आम तौर पर हम जल्दी सोने वालों मे से थे पर उस दिन हमें नींद ही नही आ रही थी । और हम आँगन में लेटे-लेटे देख रहे थे कि दीदी लोग धीरे-धीरे तैयार भी हो रही थी । हम जब भी उठने कि सोचते मम्मी कहती कि बेटा सो जाओ । तभी हमें कार कि आवाज सुनाई पड़ी तो हमने मम्मी से पूछ कि पापा कहाँ गए है तो मम्मी ने कहा कि दीदी लोग पढ़ाई नही कर रही थी इसलिए पापा उन्हें डॉक्टर से इंजेक्शन लगवाने गए है । (उस जमाने का ये बहुत ही आम सा बच्चों को फुसलाने का बहाना था ) :)

वो तो अगले दिन पता चला कि कौन सा इंजेक्शन लगवाने गई थी हमारी दीदी लोग क्योंकि अगले दिन घर मे फिल्मी गाने की किताब मिली ।और फ़िर तो रो-रो कर हमने घर सिर पर उठा लिया था ।फिल्मी गाने की किताब आपको याद है की नही । भई उस ज़माने मे सिनेमा हॉल के बाहर गाने की किताब भी खूब बिका करती थी जिसमे ५-६ film के पूरे-पूरे गाने हुआ करते थे और उन गाने की किताबों को खरीदे बिना तो पिक्चर देखना पूरा ही नही होता था । :)

वो दिन और आज का दिन हमने काजल film नही देखी है । क्योंकि उसके बाद कभी काजल फ़िल्म हॉल मे देखने गए नही और t.v पर कभी देखी नही ।





Monday, March 16, 2009

होली के दिन शुरू होने वाले गोवा के इस वार्षिक शिग्मो फेस्टिवल का आयोजन १४ मार्च को किया गया था । ५ दिन तक (यानी ११ -१५ मार्च ) चलने वाले इस फेस्टिवल मे गोवा के लोगों का एक अलग ही जोश देखने को मिलता है । इस बार शिग्मो के मुख्य अतिथि के रूप मे नाना पाटेकर आए थे । और पूरे साढ़े पाँच- छः घंटे मौजूद रहे । पहले ढाई घंटे शिग्मो परेड देखी और उसके बाद आजाद मैदान में भाषण दिया और करीब साढ़े ग्यारह -बारह बजे तक पुरस्कार वितरण समारोह होता रहा । वैसे हम तो शिग्मो परेड के बाद घर आ गए थे और पुरस्कार वितरण टी.वी पर live देखा ।:)

नाना पाटेकर को वहां बैठा देख कर पहले तो लोग चौकते और फ़िर लोग उनकी फोटो खींचते ।(क्योंकि पहले शायद नाना सिर्फ़ prize distribution मे ही पहुँचने वाले थे ) और बच्चे तो पूरे समय आ-आ कर उससे हाथ मिलाते रहे और ऑटोग्राफ लेते रहे । बीच मे तो वहां ऐसा नजारा था कि लोग शिग्मो परेड देखना छोड़ नाना को ही देख रहे थे । यहाँ तक की शिग्मो परेड मे जो लोग डांस करते चल रहे थे वो भी जब नाना पाटेकर को देखते तो कुछ चौंक जाते और उनका सारा ध्यान नाना को ही देखने मे रहता और साथ-साथ अपना डांस करते आगे बढ़ते जाते । एक ग्रुप (जिसने नाना को वहां बैठे नही देखा था ) के डांस के बाद नाना ने बड़े जोर से ताली बजाकर एक अलग ही style मे वाह किया तो जब उन लड़कों ने नाना को वहां बैठे देखा तो उनका मुंह खुला रह गया । और थोड़ा आगे जाकर उसमे से कुछ लड़के कैमरा के साथ आए और फ़िर नाना के साथ फोटो खिंचाई । पता नही पिछली बार तो मिलिंद गुणाजी आए थे तब तो ऐसा जोश नही दिखा था ।:)

पिछले साल की तरह इस साल भी शिग्मो परेड का समय शाम साढ़े चार बजे दिया था पर शुरू किया ६ बजे . वो तो गनीमत थी की पिछले साल के अनुभव के बाद इस साल हम थोड़ा देरी से गए थे पर फ़िर भी इन लोगों ने शिग्मो परेड शुरू करने में बड़ी देर कर दी थी । हमारे लिए नही बल्कि नाना पाटेकर देर से आए थे । :)

इस बार भी शिग्मो के शुरू होने से पहले पटाखे चलाये गए और फ़िर फ़िर सबसे पहले बैंड ,उसके बाद फैंसी ड्रेस मे सजे लोग,रोम्तामेल,लोक नृत्य,और चित्ररथ यानी floats हालाँकि इस बार floats और डांस ग्रुप ज्यादा नही थे पर floats काफ़ी अच्छे बनाए थे । और हमें तो इस बार शिग्मो floats carnival floats से ज्यादा अच्छे लगे । फैंसी ड्रेस मे भी लोग कम थे पर जो थे वो अच्छे थे । ज्यादातर लोग कोई न कोई भगवान का रूप धारण करते है । जैसे हनुमान, शिव,दुर्गा जी,विष्णु ,गणेश

और फैंसी ड्रेस मे एक छोटे से गणेश जी जो चूहे को छोड़कर साइकिल पर चूहे समेत सवार थे बहुत अच्छे लगे ।


और इसके अलावा पंचमुखी हनुमान भी पसंद आए । और हाँ हनुमान जी को पुरस्कार भी मिला था ।

floats तो बहुत अच्छी थी और इनमे भी धार्मिक झलक देखने को मिली । इस बार हम floats की फोटो और floats के ही वीडियो लगा रहे है ।हालाँकि फोटो बहुत साफ़ नही है

वासुदेव बालक कृष्ण को लेकर यमुना पार करते हुए ।


छत्रपति शिवाजी का दरबार ।

अश्वमेध यज्ञ ।

कृष्ण और गोपियाँ ।

कुरमा अवतार ।




पिछले साल आपने कुछ डांस ग्रुप के वीडियो देखे थे पर इस बार हम दो float के बहुत छोटे-छोटे वीडियो लगा रहे है ।
इनमे ये जो पहली वीडियो वाली float है जिसमें रावण का दरबार दिखाया गया है इसे first prize मिला है । जिसमें विजेता को सर्टिफिकेट ,रोलिंग ट्राफी और ४५ हजार रूपये दिए गए है ।





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इस दूसरी float के वीडियो मे शिव जी युद्ध करते दिखाए गए है ।


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Saturday, March 14, 2009

आज लता मंगेशकर के गाये कुछ अलग से गीत लाये है आपके लिए । वैसे तो ये सभी गाने फ़िल्म में बड़े ही डरावने लगते थे पर सुनने मे उतने डरावने नही है । :)

वैसे गुमनाम है कोई और नैना बरसे फ़िल्म मे जरुर डरावने लगते थे क्योंकि फ़िल्म में जब भी ये गाने बजते थे तो कुछ न कुछ गड़बड़ होता था । याद है न आपको गुमनाम वाले गाने में तो गाना ख़त्म होते-होते किसी न किसी का मर्डर हो जाता था और नैना बरसे मे तो साधना भूत ही बनी थी । :)

वैसे हम आएगा आएगा गीत जो फ़िल्म महल का है उसे भी आप लोगों को सुनवाना चाहते थे पर esnip पर कहीं मिला ही नही । क्योंकि इस महल फ़िल्म को देख कर हम बहुत ज्यादा डरे थे । :( :)

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