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Showing posts from March, 2009

कार चलाना सीखा वो भी तीन दिन मे .....

अब साइकिल और स्कूटर सीखने का किस्सा तो हम ने एक जमाने पहले ही आप लोगों को बता दिया था पर कार का किस्सा बताना रह गया था ।तो सोचा आज आप लोगों को अपने कार चलाने के सीखने का अनुभव भी बता दिया जाए ।अबवोक्याहैनाचूँकिमायकेमेहमसबसेछोटेथेइसलिएकारसीखनेकानंबरआते-आतेहमारीशादीहोगईथी । :)

आपयहीसोचरहेहैनाकितीनदिनमेकारचलानासीखातोकौनसाबड़ातीरमारलिया। अरेभईहमजानतेहैकिआपलोगोंनेएकघंटेयाएकदिनमेकारचलानासीखाहोगा । :)

दिसम्बर ८९ की बात है उस समय बेटे छोटे थे और हम इलाहाबाद गए हुए थे और हमारी बाकी जिज्जी भी इलाहाबाद आई हुई थी । एक दिन शाम को हम सब चाय पी रहे थे और बातें हो रही थी तभी हमें कार चलाना सीखने का भूत चढ़ गया ।तो भइया बोले की कार चलाना तो बहुत आसान है । बस गियर लगाना आना चाहिए । और कार चलाते समय बिल्कुल भी डरना नही चाहिए । फ़िर भइया ने घर मे खड़ी कार मे ही गियर लगाना सिखाया ।क्योंकितबambassadorमेहैंडगियरहोताथा । ४-५ बार गियर लगाने की प्रैक्टिस करने के बाद ड्राईवर मुन्ना लाल को बुलाया गया और हम चल दिए कार सीखने के लिए ।

घर से तो मुन्ना लाल ही एमबैसडर कार लेकर चला और संगम के पहले बायीं ओर की सड़क ज…

कभी गिनती से जामुन खरीदा है .....

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आपकोगिनतीसेजामुनखरीदनेकाअनुभवहुआहैकिनहीहमनहीजानतेहैपरहमेंजरुरअनुभवहुआहै । गिनतीसेजामुनखरीदनेकाअनुभवहमेंहुआहैऔरवोभीगोवामें । कलकीहीबातहैहमसब्जीमंडीगएथेऔरवहांजामुनदेखकरजबबेचनेवालीसेपूछाकैसेदिया ? तोबोलीकी४०रूपयेमे१००।
तोहमनेकहाकिकिलोमेकैसे ?
तोवोबोलीकिलोनही ,४०रूपयेमे१००।
हमनेकहाकिइतनीगिनतीकरोगीतोमुस्कारातेहुएसरहिलाकरबोलीहाँ।

औरजबहमनेकहाकिगड़बड़तोनहीकरोगी तोबोलीनही।
औरहमारेकहनेपरकीठीकहैदेदोतो उसनेजामुनगिननाशुरूकियाऔर२-३मिनटमेजामुनसेभरापैकेटहमारेहाथमेथा। :)
कहनापड़ेगाकिबड़ेहीएक्सपर्टअंदाजमेफटाफटगिनतीकरतीहैयेजामुनबेचनेवाली।

पहलेजामुनकभीगिनतीकरकेनहीखरीदा।बनारस ,इलाहाबादऔरदिल्लीमेतोदरवाजेपर (घर )जामुनवालासिरपरटोकरीलिएआताथा । बनारस(६०-७० मे )मेतोजामुनवालेएकस्टैंडसाभीसाथलेकरचलतेथेजिसपरवोजामुनकीटोकरीरखतेथे । औरफ़िरजामुनकोतौलकरमिटटीकीहंडियामेजामुनऔरनमक -मसालामिलाकरझोरता (हिलाता ) थाऔरदोनेमेदेताथाऔरउसकोखानेमेबड़ाहीमजाआताथा।औरकोई -कोईजामुनवाले२-३अलग-अलगमापके लकड़ीकाडिब्बासाभीरखतेथेऔरजितनीकीजामुनलेनीहोउसीमापकेडिब्बेमेजामुनडालकरनमकलगाकरझोरतेथेऔरफ़िरदोनेमेदेतेथे ।

औरदिल्लीमेतोइंडियागेटकेआस-पासथोडी-थोडीदूरपर…

सजन रे झूठ मत बोलो .......

भईहैतोयेगानाबहुतपुरानापरआजभीइसकेएक-एकबोलबिल्कुलसोनेकेजैसेखरेहै । उससमयकीहिटचौकडीयानीराजकपूर ,मुकेश,शैलेन्द्रऔरशंकरजयकिशनकाकोईमुकाबलानहीहै । तोलीजियेहमज्यादाबक-बकनहीकरतेहैऔरआपलोगोंकोगीतसुननेदेतेहै ।
वैसेआपकोयादहैनकिआजरातसाढ़ेआठबजेसेसाढ़ेनौबजेतकयानीएकघंटेearthhourकेलिएलाइटबंदरखनीहै ।
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अब क्या होगा दादा ( सौरभ गांगुली )और चीयर लीडर्स का ....

इस साल मार्च मे जब से IPL के मैचों की घोषणा हुई है तब एक तरह का घमासान सा चल रहा है । पहले तो IPL की तारीखों के ले कर सरकार और B.C.C.i.और IPL के ललित मोदी के बीच खींच - तान चलती रही । क्योंकि देश मे लोक सभा चुनावों की घोषणा भी मार्च मे ही हुई और चुनाव देश के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है । ये तो सभी जानते है ।

और चूँकि अब चुनाव ५ फेज मे हो रहा है यानी १६ अप्रैल से १३ मई तक पोलिंग और १६ मई को counting यानी पूरा एक महीना । और IPL के मैच भी १० अप्रैल से शुरू होकर २४ मई तक होने थे । ऐसे मे जो तारीख ललित मोदी कहते उसमे गृह मंत्रालय राजी नही होता क्योंकि सुरक्षा की जरुरत चुनाव और IPL दोनों को है । अब ये दूसरी बात है कि मोदी और B.C.C.i.को शायद ऐसा नही लग रहा था ।औरIPLनहोनेपरइनलोगोंको१हजारकरोड़कानुक्सानउठानापड़तासोअलग ।वोभीआजकेrecessionकेसमयमे ।

हालाँकि चुनावोंकेमद्दे-नजर कई बार मैच की तारीखें बदली गई पर हर बार गृह मंत्रालय जब राज्य सरकारोंसे सुरक्षा देने की बात पूछता तो राज्य सरकार जहाँ पर ये IPL मैच होने थे ,ने भी सुरक्षा देने से इनकार किया तो आख़िर मे ललित मोदी ने IPL को भारत के…

आ गई प्यारी सी छोटी सी nano ....

अब जैसा की टाटा ने वादा किया था हिन्दुस्तान की जनता को लखटकिया कार देने का तो वो इंतजार ख़त्म हुआ और टाटा ने तीन दिन पहले अपना वादा पूरा किया । मुंबई मे पूरे शान-ओ- शौकत से nano को लॉन्च किया गया । और इस कार के एक नही बल्कि ३ नए मॉडल लॉन्च किए गए है । और हर मॉडल का दाम और सुविधाएं (फीचर्स)अलग -अलग है ।

वैसे टाटा ने एक लाख की कार का वादा किया था पर सबसे कम दाम वाली कार एक लाख बारह हजार की है (मतलब लाख से ऊपर) जिसमे न तो ए.सी.है और न ही स्टीरियो है पर हाँ इन सबके लिए कार मे स्पेस दिया हुआ है जिससे अगर कार लेने वाला चाहे तो बाद मे अपनी सुविधा से ए.सी.और स्टीरियो लगवा सकता है ।

बाकी के दूसरे मॉडल जैसे CX और LX मे जहाँ दाम ज्यादा है वहीं इन मॉडल मे ए.सी और स्टीरियो के साथहीसाथ कुछ और नए फीचर्स भी है । कार के रंग से भी जैसे अगर मेटलिक है तो कार का दाम ज्यादा हो गया है । इसके अलावा हर शहर मे भी nano का दाम अलग है । और सबसे महँगी एक लाख पचासी हजार (१.८५ )की होगी ।

जितना कुछ nano के बारे मे पढ़ा और देखा है उससे लगता है ये nano काफ़ी हलकी-फुलकी कार है पर sturdy हो सकती है क्यो…

क्या चमगादड़ सिर के बाल नोच सकता है ?

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आप लोग भी सोच रहे होंगे कि हम भी कहाँ सुबह-सुबह चमगादड़ (bats)की बात ले बैठे है । पर क्या करें । यहाँ गोवा मे इन सब जीवों से फ़िर से मुलाकात जो हो गई है । :)

अब है तो ये सवाल थोड़ा बेतुका पर क्या करें । असल मे यहाँ हमारे घर मे जो पेड़ है जिसमे कुछ चमगादड़ भी रहते है । वैसे पेड़ मे लटके हुए ये काफ़ी अच्छे लग रहे है । (वैसेभीफोटोतोदिनमेंखींचीहैऔरयेएकसालपुरानीफोटोहै । अरेमतलबकीअबयेचमगादड़भीबड़ेहोगएहै । ) दिन भर तो नही पर हाँ शाम को जैसे ही अँधेरा होने लगता है कि ये पेड़ से निकल कर चारों ओर उड़ने लगते है । और कभी-कभी काफ़ी नीचे-नीचे उड़ते है । कई बार तो ऐसा लगता है कि सिर छूते हुए ही उड़ रहे है । तो इस डर से की कहीं ये सिर के बाल ना नोच ले ,हम झट से सिर को हाथ से ढक लेते है ।

हम लोग रोज शाम को बाहर बैठते है पर जैसे ही चमगादड़ उड़ने लगते है तो हम लोग घर के अन्दर आ जाते है । वो क्या है कि हमेशा से सुनते आ रहे है कि अगर चमगादड़ सिर पर बैठ जाए तो वहां से बाल नोच लेता है । इसीलिए चमगादड़ को देखते ही हम घर मे आ जाते है और नही तो सिर को ढक लेते है ।

हालाँकि हमारे पतिदेव का मानना है…

गुलाल देख ली और अब पोस्ट हाजिर है आप लोगों के लिए

जैसा कि हमने अपनी पिछलीपोस्टमे कहा था सो कल हमने गुलाल देख ली । फ़िल्म तो अच्छी है ,और फ़िल्ममेयूनिवर्सिटी और स्टेट लेवल कीराजनीतिदिखाईगईहैपरगालीकुछज्यादाबोलीगईहै । हालाँकि इस फ़िल्म मे काफ़ी मार-पीट और खून-खराबा है पर फ़िर भी फ़िल्म देखने के बाद भी सिर मे कोई भारीपन नही महसूस होता है । ये शायद अनुराग कश्यप के डायरेक्शन का कमाल है । इसफ़िल्ममेभीरामलीलाकोबीच-बीचमेकहानीकेसाथजोड़ागयाहैबिल्कुलdelhi6कीतरह ।फ़िल्मकेपहलेसीनकीशुरुआतके.केसेहोतीहैऔरआखिरीसीन की ...... से ।


फ़िल्म की शुरुआत मे एक सीधा सा लड़का दिलीप सिंह law करने के लिए जयपुर कॉलेज - यूनिवर्सिटी मे admission लेता है और वो रहने के लिए एक जगह कमरा किराये पर लेता है जहाँ उसकी मुलाकात रानाजय से होती है ।और जब दिलीप हॉस्टल मे वार्डन से मिलने जाता है तो हॉस्टल मे दादा टाइप लड़के कैसे पहले दिन ही उसकी रैगिंग करते है (बुरी तरह)और जब रानाजय को पता चलता है तो वो उसके साथ उन लड़कों की पिटाई करने जाता है पर .... । औरफ़िरकिसतरहनचाहतेहुएभी दिलीपराजनीतिमेआताहै । औरजनरलसेक्रेटरीकाइलेक्शनजीतजाताहै । औरफ़िरकैसेसारेहालातबदलजातेहै ।…

आरम्भ है प्रचंड ......from गुलाल

गुलाल फ़िल्म जिसे अनुराग कश्यप ने बनाया है ये गीत आरम्भहै उसी का है । वैसे अभी हमने फ़िल्म तो नही देखी ( सन्डे को देखेंगे ) पर इस फ़िल्म के २-३ गाने हमें बहुत पसंद आए है । एक-एक करके आपको सुनवायेंगे ।

इन गानों की सबसे अच्छी बात हमें ये लगी कि गाने के सारे बोल बहुत साफ़ है मतलब एक बार मे ही समझ आ जाते है । :) पियूष मिश्रा इसके गीतकार ओर संगीतकार है । राहुल राम ने गाया भी बहुत अच्छा है । पियूषमिश्राकासंगीतभीबहुतअच्छाहै ।

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कौन नही बनना चाहता है इस देश का प्रधान मंत्री.......

चुनावों की घोषणा के साथ ही देश मे एक अजीब से सरगरमी सी आ गई लगती है । अखबार पढिये या चाहे न्यूज़ देखिये हर जगह बस जोड़ तोड़ की राजनीति ही दिखाई दे रही है । कोई एक राजनैतिक दल छोड़कर दूसरे राजनैतिक दल मे जा रहा है तो कोई नई party ही बना रहा है ।

हर बार जब लोक सभा चुनाव आने वाले होते है तो एक नया (पर अब पुराना ) thirdfront बनता है जिसमे हर वो राजनैतिक दल शामिल होता है जिसे सरकार या opposition से कोई न कोई प्रॉब्लम होती है ।

पर पिछले दो बार के चुनावों मे ये भी देखा कि जैसे ही चुनावों का नतीजा आता है तो third front पता नही कहाँ चला जाता है । औरकुछ -कुछशोलेकेअसरानीवालेstyleमेआधेइधरजाओआधेउधरजाओऔरबाकीमेरेपीछेआओ ,जैसाहालहोजाताहै । :)

खैर एक बार फ़िर third front की आवाज पूरे जोर-शोर से सुनाई दे रही है । और इस third front मे left party जो साढ़े चार साल तो यू.पी.ए.सरकार के साथ रही वो भी शामिल है ।लेफ्टसाढ़ेचारसालतकलेफ्ट-राईट -सेंटरकरतीरहीपरफ़िरअचानकउनकेअन्दरकाओरिजनललेफ्टजागगयाऔरवोयू.पी.ऐ.सेअलगहोगए । जब से left यू.पी.ए से अलग हुए तब से रोज कोई न कोई यू.पी.ए की खामी बताते रहते है । जब साथ रहे तब…

क्या ऐसे बाल या केश रखने का कोई ख़ास कारण होता है ....

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हमारायेसवालपूछनेकाख़ासकारणहै।एकतोजिज्ञासाभीहैकिइसतरहकेबालरखनेकाक्याकोईधार्मिकमहत्त्वहैजैसेसाधूलोगजटारखतेहै , याबसयूँही।

वोक्याहैकिपिछलेहफ्तेजबहमसब्जीमंडीगएथेतोवहांपरहमनेइसमहिलाकोदेखा।औरहमनेफोटोखींचलीवैसेसब्जीबेचनेवालोंकोथोड़ाआश्चर्यहुआथाजबहमनेइसकीफोटोखींचीथी।फोटोहमनेइसीलिएखींचीथीताकिआपलोगोंसेपूछसकेंक्योंकिऐसीहीएकमहिलाकोहमनेबंगालारुके bull temple मेभीदेखाथा। bull temple केबारेमेफ़िरकभीबादमेबताएँगे।

इनदोनोंफोटोमेबालरखनेकाएकही style है।औरदोनोंनेऊपरलालरंगकारिबनभीलगायाहुआहै।पतानहीकैसेइसतरहसेमैनेजकरतीहोगी।

पहलीफोटोbulltempleकीहै।जोहमनेनवम्बर२००७मेअपनीबंगालारुट्रिपकेदौरानखींचीथी।उससमययेमहिलामन्दिरकीतरफ़जारहीथीऔरहममन्दिरकीसीढियोंसेउतररहेथे।परतभीअचानकइसकेऐसेबालदेखकरहमनेफोटोखींचलीथी।औरफ़िरभूलगए ।

परजबगोवामेभीइसतरहकेबालवालीमहिलादेखीतोरहानगयाऔरइसीलिएआजआपलोगोंसेयेसवालकररहेहै।

औरयेदूसरीवालीफोटोगोवाकेसब्जीमंडीमेखींचीहै।


सब्जीमंडीसेयादआयाकीगोवाकीसब्जीमंडीजोकीम्युनिसिपलमार्केटमेहैवोभीदेखनेलायकहै।तीन floor कीसब्जीमंडीहै।औरकाफ़ी well organised है।औरऊपरदोनोंतरफ़मारियोमिरांडाकीबनाईहुईपेंटिंगभीहै।यहाँपरआपकोदुनिया…

नेताओं के मंचों का टूटना ,गिरना और बच जाना ...... :)

कलज्ञानजीकिपोस्टपरटूटमचानशीर्षकदेखकरहमनेसमझाथाकिउन्होंनेमंचटूटनेवालीघटनाओंपरलिखाहै । खैर उन्होंने तो नही लिखा तो हमने सोचा कि हम ही इस पर लिख दे । अब वो क्या है कि आजकल चुनावों का मौसम है तो रोज ही नए और पुराने नेता और अभिनेता बड़ी-बड़ी रैली करते है । अब रैली होगी तो स्टेज या मंच भी बनेगा जहाँ से नेता भाषण बाजी करते है । परआजकलयातोमंचबनानेवालेमंचठीकसेनहीबनारहेहैयाफ़िरयेमंचइननेताओंकोइनकीसहीजगहदिखारहाहै ।:)

कल ही किसी न्यूज़ चैनल पर दिखा रहे थे कि बंगाल मे कहीं भाषण देने पहुँची कोई फ़िल्म अभिनेत्री जो इस बार शायद चुनाव लड़ रही है , वो बाकी मंच पर खड़े कार्यकर्ताओं के साथ हाथ उठाकर शायद जनता का अभिवादन कर रही थी तभी अचानक मंच समेत वो और बाकी लोग नीचे गिर पड़े ।

इससे कुछ दिन पहले अमर सिंह भाषण देते-देते अचानक नीचे चले गए । अब जब तक लोग समझे तब तक अमर सिंह नीचे गिर गए । ये अलग बात है कि वो फटाफट उठा कर खड़े भी हो गए ।

अमर सिंह ही नही उमा भारती भी अपनी किसी रैली के दौरान बड़े शान से जैसे ही मंचपर पहुँची कि धम्म से मंच गिर पड़ा । और उमा भारती समेत सारे लोग नीचे ।

अब चुनावी रैली मे ह…

जब फिल्मी गीतों की किताब ने खोली पोल .... :)

सिनेमा या फ़िल्म इस शब्द का ऐसा नशा था क्या अभी भी है कि कुछ पूछिए मत ।वैसे भी ६०-७० के दशक मे film देखने के अलावा मनोरंजन का कोई और ख़ास साधन भी तो नही था । बचपन मे भी कभी पापा या मम्मी ने film देखने पर रोका नही मतलब हम लोगों के घर मे फ़िल्म देखने पर कभी भी कोई भी रोक- टोक नही थी ।बल्कि अच्छी इंग्लिश फ़िल्म तो पापा हम लोगों को ख़ुद ही दिखाने ले जाते थे .

और हम लोग अक्सर सपरिवार film देखने जाया करते थे ।और वो भी शाम यानी ६-९ का शो ।और फ़िल्म देखने के लिए स्कूल से आते ही फटाफट पढ़ाई करके बस तैयार होने लग जाते थे । पर हाँ पापा इस बात का जरुर ध्यान रखते थे कि film अच्छे हॉल मे लगी हो । इलाहाबाद मे उस ज़माने में सिविललाईन्सकापैलेसऔरप्लाजाऔरचौकमेनिरंजनसिनेमा हॉल हम लोगों का प्रिय हॉल था । वैसे अगर पिक्चर अच्छी हो तो कभी-कभी चौक मे बने विशम्भर और पुष्पराज हॉल मे भी देख लेते थे ।

उस समय film लगी नही कि film देखने का प्लान बनना शुरू हो जाता था । रेडियो पर बिनाका गीत सुन-सुनकर film देखने का तै होता था । और घर मे चूँकि हम ५ भाई-बहन थे तो उस ज़माने का कोई न कोई हीरो या हेरोईन हम पांचों …

गोवा का शिग्मो

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होली के दिन शुरू होने वाले गोवा के इस वार्षिकशिग्मोफेस्टिवलका आयोजन १४ मार्च को किया गया था । ५ दिन तक (यानी ११ -१५ मार्च ) चलने वाले इस फेस्टिवल मे गोवा के लोगों का एक अलग ही जोश देखने को मिलता है । इस बार शिग्मो के मुख्य अतिथि के रूप मे नानापाटेकर आए थे । और पूरे साढ़े पाँच- छः घंटे मौजूद रहे । पहले ढाई घंटे शिग्मो परेड देखी और उसके बाद आजाद मैदान में भाषण दिया और करीब साढ़े ग्यारह -बारह बजे तक पुरस्कार वितरण समारोह होता रहा । वैसे हम तो शिग्मो परेड के बाद घर आ गए थे और पुरस्कार वितरण टी.वी पर live देखा ।:)

नाना पाटेकर को वहां बैठा देख कर पहले तो लोग चौकते और फ़िर लोग उनकी फोटो खींचते ।(क्योंकि पहले शायद नाना सिर्फ़ prize distribution मे ही पहुँचने वाले थे ) और बच्चे तो पूरे समय आ-आ कर उससे हाथ मिलाते रहे और ऑटोग्राफ लेते रहे । बीच मे तो वहां ऐसा नजारा था कि लोग शिग्मो परेड देखना छोड़ नाना को ही देख रहे थे । यहाँ तक की शिग्मो परेड मे जो लोग डांस करते चल रहे थे वो भी जब नाना पाटेकर को देखते तो कुछ चौंक जाते और उनका सारा ध्यान नाना को ही देखने मे रहता और साथ-साथ अपना डांस करत…

फिल्में डरावनी पर गीत मधुर .......

आज लता मंगेशकर के गाये कुछ अलग से गीत लाये है आपके लिए । वैसे तो ये सभी गाने फ़िल्म में बड़े ही डरावने लगते थे पर सुनने मे उतने डरावने नही है । :)

वैसे गुमनामहैकोई और नैनाबरसेफ़िल्म मे जरुर डरावने लगते थे क्योंकि फ़िल्म में जब भी ये गाने बजते थे तो कुछ न कुछ गड़बड़ होता था । याद है न आपको गुमनाम वाले गाने में तो गाना ख़त्म होते-होते किसी न किसी का मर्डर हो जाता था और नैना बरसे मे तो साधना भूत ही बनी थी । :)

वैसे हम आएगाआएगा गीत जो फ़िल्म महल का है उसे भी आप लोगों को सुनवाना चाहते थे पर esnip पर कहीं मिला ही नही । क्योंकि इस महलफ़िल्मको देख कर हम बहुत ज्यादा डरे थे । :(:)

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